प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'पिया तोसे नैना लागे रे'


प्रचण्ड प्रवीर 


उम्र के एक पड़ाव के दौरान एक दूसरे के प्रति लगाव सहज ही हो जाता है। कई बार यह लगाव महज दोस्ती तक सीमित रह जाता है तो कई बार यह प्यार जनम जनम के रिश्ते में तब्दील हो जाता है। कभी लगता है प्यार झूठा है तो कभी यह सच्चा लगने लगता है। हँसी मजाक जीवन की एकरसता को तोड़ते हैं और व्यक्ति को जीवन्त बनाते हैं। खासकर प्यार में इस हँसी मजाक की भूमिका अलग रंगत लिए होती है। प्रचण्ड प्रवीर अपनी कहानियों में हिन्दी फिल्मी गीतों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। इस कहानी में भी कुछ रोमांटिक गीत गज़ल का प्रयोग उन्होंने बखूबी किया है। इस कहानी का शीर्षक ही एक लोकप्रिय गीत के मुखड़े से लिया गया है। बहरहाल आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'पिया तोसे नैना लागे रे'।


 कल की बात – २९१

'पिया तोसे नैना लागे रे'


प्रचण्ड प्रवीर 


कल की बात है। जैसे ही मैँने बृजेश के घर मेँ कदम रखा, मेहमानों की भीड़ मेँ से दमकती सुचित्रा भाभी निकल कर मेरी तरफ आयीँ। मैँने उनको जन्मदिन की बधाई देते हुए फूलों का गुच्छा उनकी ओर बढ़ायी। उन्होँने उलाहना दिया, “ये क्या फूल-पत्ते? मुझे लगा था कि आप चाँद-तारे तोड़ कर लाएँगे। वैसे मेरे देवदास, हाथ मेँ छड़ी, कलाई मेँ घड़ी, बटन, चेन पूरे बाबू साहब बन गये हैँ आप तो। मैँने मुस्कुरा कर बृजेश के बारे मेँ पूछा। तभी बगल से बृजेश ने आ कर दोनोँ बाँहेँ फैला कर कहा, “अरे राजू, क्या हाल है?” मैँने बेचारगी मेँ गले लगते हुए कहा, “वही हड्डी, वही खाल है। आप लोग की नजर-ए-इनायत का सवाल है। सुचित्रा भाभी ने नाराज हो कर कहा, “आप ऐसी बातेँ क्योँ करते हैँ?” मैँने बृजेश से नजरेँ बचाते हुए कहा, “इसलिये कि कहीँ बृजेश को हमारे प्यार पर कोई शक न हो जाय। आप तो जानती ही हैँ कि इतनी बड़ी दुनिया मेँ शक का कोई इलाज नहीँ। बृजेश ने चिढ़ कर कहा, “मैँ जानता हूँ तुम्हारी सारी कहानियाँ और सारी शैतानियाँ। क्या झूठी कहानी बनायी है तुमने कि सुचित्रा और तुम बचपन के साथी हो। साथ-साथ खेल कर पले-बढ़े और साथ ही गाते-गुनगुनाते थे। पर मैँ इन गप्पोँ से परेशान होने वाला नहीँ। लिख कर रख लो।

सुचित्रा भाभी ने नजरेँ झुकाते हुए कहा, “जब आप पहली बार दिल्ली से लौट कर बाबू साहब बन कर लौटे थे, उस रात पूनम का चाँद घने बादलोँ मेँ छुपा जाता था। मुझे यकीन था कि आप मुझसे मिलने जरूर आयेँगे, देर से ही सही। उन दिनोँ बिजली नहीँ रहा करती थी। अँधेरा घिर आने से ही मैँ आँगन मेँ खड़ी-खड़ी आपकी प्रतीक्षा कर रही थी, जबकि आपने कुछ संदेश नहीँ भिजाया था। पर मेरी आकुलता किसी विश्वास की डोरी मेँ बँधी ऐँठी जा रही थी। ठण्डी बयार मेँ माँ-बाबा जब छत पर सो गये और मैँने दरवाजे की साथ वाली खिड़की से दूर बादलोँ मेँ पीला चाँद देखा था। रात को जब चाँद चमके जल उठे तन मेरा, मैँ कहूँ मत कर ओ चँदा इस गली का फेरा। मैँने खिड़की के साथ का दरवाजा खोल दिया कि आप आएँगे। अँधेरे मेँ आप कैसे आएँगे, यह सोच कर मैँने जैसे ही दीपक जलाया कि आप उस अधखुले दरवाजे से किसी अधिकार से अन्दर चले आये। मेरा मन मेँ यह खयाल आया कि यह चाँद अभी बुझ जाये। आना मोरा सँइयाँ जब आये, चमकना उस रात को जब...।

“और आपके हाथोँ मेँ जलती तीली कुछ और जल कर आपकी नाजुक उँगलियाँ जलाने लगी। आप तीखी जलन से सिहर उठीँ। एक बेहद सजी-धजी मुस्काती नवयौवना ने सुचित्रा की बात पूरी की। सुचित्रा ने कुछ रूठ कर कहा, “जाओ सुषमा रानी, तुमने सारा मजा किरकिरा कर दिया। फ्लर्ट करना क्या लड़कोँ का ही कॉपीराइट है? अभी देवदास के गाने का दृश्य बाकी था कि किस तरह ये मेरे घर के बाहर आम के पेड़ के पास खड़े मेरी एक झलक देखने के लिये खड़े रहा करते थे।

सुषमा रानी ने भूल सुधार कहते हुए कहा, “पिया तोसे नैना लागे रे – ‘देवदास’ का नहीँ ‘गाइड’ का गीत है। सुचित्रा ने प्रतिवाद किया, “तुझे कुछ नहीँ पता है। पहले यह गीत बिमल रॉय की ‘देवदास’ के लिये बनी थी, जो 1955 मेँ आयी थी। लेकिन बिमल रॉय ने इस गीत को फिल्म मेँ नहीँ लिया। लेकिन गाना इतना अच्छा बना था कि सङ्गीतकार सचिन देव बर्मन ने इसे सहेज कर रख लिया किसी अच्छी फिल्म मेँ इसका प्रयोग किया जायेगा। बाद मेँ देव आनन्द ने जब अपनी महत्त्वाकांक्षी फिल्म ‘गाइड’ बनायी तो उसमेँ इसी गीत को रख लिया। यह फिल्म 1965 मेँ आयी थी। सुषमा रानी ने कहा, “नहीँ दीदी, यह अफवाह है। मैँ बम्बई फिल्म इण्डस्ट्री मेँ काम करती हूँ। मैँने यह कई जानकारोँ से पूछा। यह गाना कभी ‘देवदास’ के लिये नहीँ बना था।

सुषमा के रूप से मन्त्रमुग्ध मुझे हैरत मेँ पड़ा देख कर सुचित्रा भाभी ने उससे मेरा परिचय कराया, “इनसे मिलिये। यही है हमारे शहर की शान, मेरी छोटी बहन जैसी सुषमा रानी। बचपन मेँ मेरे ही मोहल्ले मेँ रहा करती थी। इसी ने मायानगरी मुम्बई मेँ अपने नृत्य और रूप से इन दिनों जादू चला रखा है। कल वापस मुम्बई जाने वाली है। बड़ी मुश्किल से मेरी जन्मदिन की पार्टी मेँ यह कह कर आयी है कि इसकी पहचान उजागर ना हो और ज्यादा मेहमान इसके साथ तस्वीर खिँचाने की जिद ना करेँ। इसकी पर्सनल सिक्युरिटी टीम किनारे खड़ी है। मेरी नजर किनारे खड़े दो मजबूत बाउंसर पर जा पड़ी। इधर सुचित्रा भाभी ने बात पूरी की, “और ये हैँ कविराज। इन्हीँ के देवदास वाले गीत के कारण तेरी किस्मत चमकी।

सुषमा रानी मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोली, “अरे, बचपन से मैँने आपके इतने किस्से सुने हैँ। बृजेश भैया आपको राजू बुलाते हैँ ना? देखिये, आज राजू से मिलने का मौका मिल गया। हाँ, मुझे आपको शुक्रिया कहना ही चाहिए। उस ‘देवदास’ के दृश्योँ पर जो ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ का विडियो है, उसने ऐसा जादू किया कि असली गाने को मैँ भूल ही गयी थी। लेकिन जब मुझे टीवी पर रियलिटी शो मेँ ‘डांस परफॉर्म’ करना था, तब मैँ ‘गाइड’ मेँ फिल्माये गीत की तरह तैयार हुयी। गाने मेँ एक पैरा है – भोर की बेला सुहानी नदिया के तीरे, भर के गागर जिस घड़ी मैँ चलूँ धीरे-धीरे – इसमेँ नायिका वेशभूषा तपस्विनी जैसी है। मैँ भी तापसी जैसी पाँव और कलाई मेँ मोटे-मोटे कड़े, कानोँ मेँ चाँदी के बड़े झुमके और बस एक लाल बिन्दिया के साथ सफेद साड़ी मेँ परफॉर्मेंस देने गयी और मुकाबला जीत भी गयी। आपने टीवी पर देखा था?”



मैँने कहा, “सुषमा जी, मैँने आपको केवल मेकअप के प्रचार वाले बड़े पोस्टरोँ मेँ देखा है। आपका नाम बड़ा सुना है। खुशकिस्मती से आज आपके साक्षात् दर्शन हो गये। सुषमा रानी हँसने लगी। सुचित्रा भाभी ने पूछा, “देवर जी, एक सवाल का जवाब दीजिये। आपको देवदास वाले विडियो वाले ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ और गाइड वाले विडियो मेँ कौन ज्यादा असरदार लगता है?” मैँने कहा, “भाभी जी, दोनोँ का अपना-अपना महत्त्व है। देवदास वाले विडियो मेँ बड़ी चतुराई से गाने को फिट कर दिया गया है। वहाँ प्राकृतिक सुन्दरता है, बादल है, चाँद है, नदी है, कोयल है, आम का पेड़ है और सुचित्रा है। सुचित्रा भाभी मेरी बात सुन कर शरमा गयीँ। सुषमा रानी ने कहा, “आप बातेँ बहुत बनाते हैँ। गाइड वाले विडियोँ मेँ कितने सुन्दर सेट हैँ। मैँने माथे पर बल डालते हुए अपनी स्मृति पर जोर देते हुए कहा, “हाँ.. नौका है, ताड़ के पेड़ हैँ, कार्डबोर्ड का बना बड़ा चाँद है, होली है, दीवाली है। साथ ही तपस्विनी-सी नर्तकी की सुषमा है। यह सुनते ही सुषमा रानी लजा गयीँ।

सुचित्रा ने सुषमा पर एक नजर डालते हुए मुझसे पूछा, “आप ही बताइए ना फिर। प्राकृतिक सुन्दरता अधिक मनमोहक है या बनावटी सज-धज। सुषमा का चेहरा कुछ तना पर खुद को सँभालते हुए उसने पूछा, “आप समय ले कर उत्तर दे सकते हैँ। हर सवाल का जवाब वहीँ के वहीँ देना जरूरी तो है नहीँ। मैँने कहा, “सुषमा रानी जी, मेरा मानना है कुछ ऐसे निर्णय होते हैँ जिन्हेँ लेने मेँ समय लग सकता है, जहाँ भविष्य के बहुत से पक्षोँ और प्रभावोँ पर विचार करना पड़ता है। वह सत्य न हो कर सत का निर्माण है। किन्तु सत्य का मौलिक स्वरूप ऐसा है कि ज्ञान होते ही उसे बेझिझक कहा और साझा किया जा सकता है। जहाँ सत्य का निर्धारण किया जाता है, वह सचेत हो कर सत्य के सुग्राह्य होने की प्रक्रिया मात्र है। मेरा मानना है...।

सुषमा रानी ने गालोँ पर दोनोँ हाथ रखते हुए आश्चर्य से कहा, “बाप रे बाप। इतनी हिन्दी मुझे समझ नहीँ आती। पता नहीँ आपने क्या कहा। आप सीधे-सीधे क्योँ नहीँ कह देते?” मैँने उसे देखते हुए कहा, 

“आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब, 

दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होते तक। 

बृजेश मेहमानोँ को देखता मेरे पास आ कर बोला, “राजू, शेर गलत है। ’होते तक’ नहीँ, ‘होने तक’।“ बिना मेरे उत्तर के ही बृजेश हाथोँ मेँ कोल्ड-ड्रिंक का गिलास लिये आगे बढ़ गया। फिर सुचित्रा भाभी केक काटने मेँ व्यस्त हो गयीँ। केक कटने के कुछ देर बाद ही सुषमा रानी अपने बाउंसरोँ के साथ बाहर चली गयीँ।

जब मैँ जाने को हुआ, तब सुचित्रा भाभी ने बड़े प्यार से मुझसे कहा, “आप उस समय कहते-कहते रुक गये थे। मुझसे तो बेझिझक कह ही सकते हैँ। मैँ कोई गैर तो नहीँ? मैँने कहा, “सुचित्रा भाभी, हमेँ विडियो को कहानी से अलग कर के देखने से क्या मिलेगा? देवदास को पारो का प्यार ना मिल सका और ना ही देवदास पारो को प्यार दे पाया। राजू गाइड का प्यार रोजी को मिला पर रोजी उसे अपना ना सकी और वहीँ राजू को कभी रोजी का प्यार नहीँ मिल पाया। हाँ, एक बात दोनोँ कहानियोँ मेँ हैँ। अपनी-अपनी प्रेम कहानियोँ के अन्त मेँ देवदास और राजू, दोनोँ मर जरूर जाते हैँ।“

सुचित्रा भाभी ने सोच मेँ पड़ते हुए कहा, “लेकिन देवर जी, यह तो आप मानेँगे कि पारो का प्रेम उसके रंग-रूप की तरह असली था और वहीँ रोजी का प्रेम उसकी सज-धज की तरह नकली था। मैँने उन्हेँ नमस्ते कहा और बृजेश से मिले बिना ही महफिल से बाहर निकल आया।

ये थी कल की बात!


दिनाङ्क : १२/०७/२०२६


सन्दर्भ:


  १. गीतकार – शैलेन्द्र, चित्रपट- गाइड (१९४२)

  २. मिर्जा ग़ालिब (१७९७-१८६९) की ग़ज़ल से

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