हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ
हरीश चन्द्र पाण्डे हरीश चंद्र पाण्डे अपने समय के अनूठे कवि हैं। उन की कविताओं से गुजरना समय की उन परतों से गुजरना होता है जो खासी पेचीदी होती हैं। एक कविता को पढ़ते हुए हम जीवन की तमाम सच्चाइयों से टकराते हैं। विकास की शताब्दी दर शताब्दी गुजारने के बाद आज भी दिक्कत यही है कि समाज महिलाओं के प्रति एक अजीब सी कुण्ठा से भरा हुआ है। महिलाओं के साथ बलात्कार ही नहीं सामूहिक बलात्कार जैसी घटनाएँ अब आम हो चली हैं। ऐसा लगता है जैसे हम संवेदनशून्य हो गए हैं। ऐसे में हरीश जी इस हकीकत से टकराते हैं और और बलात्कार के अभियुक्त अवयस्क बेटे से माँ के आत्मसंवाद को क्रिएट करते हैं। यह एक कवि की कल्पना है जो अन्ततः माँ के मन के साथ होते हुए भी उस नैतिक पक्षधरता का कायल है जिसमें ऐसे दुष्कृत्यों के लिए कोई जगह नहीं है। आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं हरीश चन्द्र पाण्डे की कुछ नई कविताएँ। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं मैं एक भ्रूण गिराना चाहती हूं ( बलात्कार के अभियुक्त अवयस्क बेटे से एक मां का आत्मसंवाद) मैं कैसे कह दूं तुमने मेरा दूध नहीं पिया था तुम्...