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हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ

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हरीश चन्द्र पाण्डे हरीश चंद्र पाण्डे अपने समय के अनूठे कवि हैं। उन की कविताओं से गुजरना समय की उन परतों से गुजरना होता है जो खासी पेचीदी होती हैं। एक कविता को पढ़ते हुए हम जीवन की तमाम सच्चाइयों से टकराते हैं। विकास की शताब्दी दर शताब्दी गुजारने के बाद आज भी दिक्कत यही है कि समाज महिलाओं के प्रति एक अजीब सी कुण्ठा से भरा हुआ है। महिलाओं के साथ बलात्कार ही नहीं सामूहिक बलात्कार जैसी घटनाएँ अब आम हो चली हैं। ऐसा लगता है जैसे हम संवेदनशून्य हो गए हैं। ऐसे में हरीश जी इस हकीकत से टकराते हैं और और बलात्कार के अभियुक्त अवयस्क बेटे से माँ के आत्मसंवाद को क्रिएट करते हैं। यह एक कवि की कल्पना है जो अन्ततः माँ के मन के साथ होते हुए भी उस नैतिक पक्षधरता का कायल है जिसमें ऐसे दुष्कृत्यों के लिए कोई जगह नहीं है। आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं हरीश चन्द्र पाण्डे की कुछ नई कविताएँ। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं मैं एक भ्रूण गिराना चाहती हूं ( बलात्कार के अभियुक्त अवयस्क बेटे से एक मां का आत्मसंवाद) मैं कैसे कह दूं तुमने मेरा दूध नहीं पिया था   तुम्...

हरबंस मुखिया का आलेख मध्यकालीन भारतीय इतिहास की गतिशील रूपरेखा

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  हरबंस मुखिया समय के साथ अवधारणाएं कुछ इस तरह रुढ हो जाती हैं कि हमें यह पता ही नहीं चल पाता कि इस के मूल में कौन से तथ्य हैं. एक दिलचस्प सच्चाई है कि भारतीय इतिहास के मध्यकाल की परिकल्पना एक विदेशी आयात है. इस तथ्य की तरतीबवार पडताल की है मध्यकालीन इतिहास के जाने माने इतिहासकार हरबंस मुखिया ने. यह आलेख अनहद-8 में प्रकाशित हुआ है. दुर्भाग्यवश पत्रिका के इस अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख के शीर्षक में ही ‘ मध्यकालीन ’ शब्द छूट गया है. पत्रिका में प्रूफ की कुछ अन्य त्रुटियां भी रह गयी हैं. यहाँ प्रस्तुत आलेख में हमने उन त्रुटियों को दूर करने की कोशिश की है. आज पहली बार पर प्रस्तुत है हरबंस मुखिया का आलेख ‘ मध्यकालीन इतिहास की गतिशील रूपरेखा ’ .      मध्यकालीन भारतीय इतिहास की गतिशील रूपरेखा  हरबंस मुखिया भारतीय इतिहास में ‘मध्य काल’ की परिकल्पना का कब और कैसे प्रवेश हुआ – यह स्वयम एक दिलचस्प सवाल है। इस परिकल्पना की उत्पत्ति भारतीय तो नहीं है। यह एक विदेशी आयात है। इसका यूरोप से उस समय आयात हुआ जब स्वयं यूरोप में और भारत में ...