श्याम सुन्दर सिंह की कविताएँ


श्याम सुन्दर 


एक सवाल कवियों के जेहन में बार बार उठता है कि देश का मतलब आखिर क्या है? अनेक कवियों ने इस पर कविताएं भी लिखी हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक मशहूर कविता का शीर्षक ही है 'देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता'। युवा कवि श्याम  सुन्दर भी इस सवाल से टकराते हुए लिखते हैं "मैं इस देश से नफ़रत नहीं करता,/ इसीलिए इसकी झूठी तारीफ़ नहीं करता।/ मेरे लिए देश/ किसी नेता का चेहरा नहीं,/ न किसी धर्म की जागीर है।/ देश वह मज़दूर है/ जो सुबह अपनी पीठ पर औज़ार बाँध कर निकलता है/ और शाम को अपनी थकान के साथ/ आधे पेट घर लौटता है।/ देश वह किसान है/ जिसकी फ़सल का दाम/ किसी और की मेज़ पर तय होता है।" आज का समय 'निंदक नियरे राखिये' वाला समय नहीं बल्कि झूठी तारीफों के पुल खड़ा करने वाला समय है। इसीलिए यह पुल मामूली से वजन को भी बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रखता और धराशाई हो जाता है। दरअसल यह देश केवल उन नेताओं का नहीं जो देश के प्रतिनिधि के तौर पर पूरी दुनिया में तिलिस्म रचने का प्रयास करते हैं। देश का नक्शा उन किसानों, मजदूरों और आम लोगों से बनता है जो आज भी बदहाली का जीवन जी रहे हैं। जिनके स्वभाव में धूर्तता या पाखण्ड नहीं बल्कि सहज सरल आत्मीयता है। श्याम सुन्दर उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक पिछड़े बुंदेलखंड अंचल के चित्रकूट जिले के एक दूर दराज क्षेत्र में रहते हुए कविताएं लिख रहे हैं। उनकी कविताएं न केवल प्रगतिशील चेतना से लैस हैं बल्कि मन में ढेर सारे सवाल भी पैदा करती हैं। और कविता तो वही सार्थक होती है जो मन मस्तिष्क को झंकृत कर दे। सवाल उठाने का विवेक पैदा कर दे। मुझे उम्मीद है कि इस युवा कवि की आवाज देर तक और दूर तक सुनी जाएगी। इस प्रतिवादी स्वर को गौर से पढ़ा जाना चाहिए। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं श्याम सुन्दर सिंह की कविताएँ।


श्याम सुन्दर सिंह की कविताएँ 


गाँव को लीज़ पर दे दो!


जिला प्रशासन से मेरा एक निवेदन है—

पूरा गाँव किसी उद्योगपति को

लीज़ पर दे दिया जाए।


अब गाँव को गाँव बनाए रखने की

कोई खास वजह नहीं बची।


खेतों की छाती पर

मशीनों के पंजे हैं,

पहाड़ों की हड्डियाँ

क्रेशर में पिस रही हैं,

चरागाहों की देह पर

बोल्डरों के रैम्प उग आए हैं।


मिट्टी की कोख से अब अन्न नहीं,

पत्थरों का साम्राज्य निकलता है।

धरती के गर्भ में हल नहीं,

पूँजी के नुकीले औजार उतर रहे हैं।


इसलिए बेहतर होगा—

गाँव का नक्शा भी नीलाम कर दीजिए,

नदियों के बहाव पर पहरा बैठा दीजिए,

तालाबों की जगह गड्ढे,

हरियाली की जगह पत्थरों के पहाड़

और खेतों की जगह

मशीनों के लिए खुला मैदान बना दीजिए।


आखिर कब तक

धरती का सीना छलनी होगा?

कब तक पहाड़

अपनी संतानों को

मशीनों के जबड़ों में खोते रहेंगे?


कितनी पीढ़ियाँ

अपनी ही जमीन पर

बेदखली का पट्टा ले कर

जीने को अभिशप्त रहेंगी?


यह महज खनन नहीं है,

यह जमीन पर कब्जे की नई भाषा है।


यह साम्राज्यवाद का वह नया चेहरा है

जो तोप ले कर नहीं आता,

समझौते ले कर आता है।


सेना ले कर नहीं आता,

मशीनों का काफिला लाता है।


झंडा नहीं गाड़ता,

जमीन के नीचे

अपनी सुरंगें बिछाता है।


उसके हाथ में बंदूक नहीं,

लीज़ का कागज है;

उसकी जेब में बारूद नहीं,

निवेश का प्रस्ताव है।


वह पहले पहाड़ खरीदता है,

फिर पानी पर दावा करता है,

फिर खेतों की मेड़ नापता है

और अंत में

आदमी की मेहनत की कीमत तय करता है।


पूँजी का पेट बहुत बड़ा है,

उसे खेत निगलने के बाद भी भूख लगती है,

पहाड़ पीसने के बाद भी प्यास लगती है।


वह जंगल को लकड़ी,

नदी को पानी का कारोबार,

पहाड़ को गिट्टी

और आदमी को सस्ता श्रम समझती है।


यह कैसी व्यवस्था है

जहाँ धरती के मालिक

अपनी ही जमीन पर मजदूर हैं

और जमीन निगलने वाले

विकास के देवदूत कहलाते हैं!


गाँव के लोगों को भी

किसी कंपनी के हवाले कर दीजिए।


वे मजदूर बनेंगे,

अपनी ही जमीन पर काम करेंगे,

अपने ही पहाड़ों का सीना चीरेंगे,

अपनी ही धरती से निकले पत्थर ढोएँगे

और बदले में

दो वक्त की रोटी पाएँगे।


जिसके पुरखों ने खेत जोते,

उसकी अगली पीढ़ी

उन्हीं खेतों में मशीन चलाएगी।


जिसके पुरखों ने

पहाड़ों की छाया में अपनी उम्र काटी,

उसके बच्चे

उन्हीं पहाड़ों का मलबा ढोएँगे।


कितना सुंदर होगा यह विकास!


जिसकी जमीन थी,

वही मजदूर होगा;


जिसका पहाड़ था,

वही पत्थर ढोएगा;


जिसका पानी था,

वही खरीद कर पिएगा;


जिसकी हवा थी,

वही धूल में साँस लेगा;


जिसकी धरती थी,

वही उस पर रहने के लिए

किराया चुकाएगा।


पूँजीवाद का गणित भी

कितना सीधा है—


मुनाफा निजी हाथों में,

बर्बादी सार्वजनिक खाते में;


तिजोरी उद्योगपति की भरेगी,

फेफड़े मजदूर के भरेंगे;


राजस्व का आँकड़ा सरकार दिखाएगी,

और उजड़े हुए गाँव का हिसाब

किसी रजिस्टर में नहीं मिलेगा।


गाँव के हिस्से में अब

सिर्फ तीन चीजें बची हैं—

धूल, बेदखली और इंतजार।


न खेत बचाने की झंझट,

न चरागाह का सवाल,

न पानी की चिंता,

न आने वाली पीढ़ियों का हिसाब।


सब कुछ बाजार के हवाले,

सब कुछ मुनाफे के नाम।


अब तो ऐसा लगता है

कि लोकतंत्र की चौखट पर

बाजार ने अपना ताला जड़ दिया है

और जनता

अपने ही घर में

दरवाजे की चाबी खोज रही है।


इसलिए जिला प्रशासन से

फिर निवेदन है—


पूरा गाँव लीज़ पर दे दीजिए।

उसकी मिट्टी, पहाड़, जंगल, पानी

और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी

किसी कंपनी के नाम लिख दीजिए।


बस, एक काम और कर दीजिएगा—


गाँव के प्रवेश द्वार पर

एक बड़ा-सा बोर्ड लगवा दीजिएगा।


उस पर बड़े अक्षरों में लिखवाइएगा—


'यहाँ कभी गाँव हुआ करता था,

अब यहाँ विकास का कारोबार होता है!'


और नीचे छोटे अक्षरों में—


'इस गाँव के मूल निवासी

अब कंपनी के कर्मचारी हैं।'


और सबसे नीचे

एक आखिरी सूचना भी टँगवा दीजिएगा—


'यह जमीन कभी लोगों की थी,

अब लोगों को यहाँ रहने के लिए

पूँजी की अनुमति चाहिए।'




जंग में फूलों का क्या होता है?


जंग में बंदूकें बिक जाती हैं,

बारूद की कीमत बढ़ जाती है,

मगर कोई यह नहीं बताता—

खेतों में खिले फूलों का

आख़िर क्या होता है?


जब शहर पर बम गिरते हैं,

तो सिर्फ़ मकान नहीं टूटते,

किसी बच्ची की गुड़िया टूटती है,

किसी माँ की गोद उजड़ती है,

किसी बूढ़े की आँखों में

घर लौटने का इंतज़ार मरता है।


हथियार बनाने वाले

मुनाफ़े का हिसाब रखते हैं,

सिपाही मौत का,

और अख़बार

मरने वालों की गिनती—

मगर उस फूल का हिसाब

किसी के पास नहीं,

जो खिलने से पहले ही

मलबे के नीचे दफ़न हो गया।


एक बूढ़ा खाँसता है,

बेटा रात भर जागता है—

उसे डर दुश्मन की गोली से नहीं,

पिता की अगली साँस से लगता है।

जंग सरहद पर चलती है,

मगर उसकी सबसे लंबी लड़ाई

घर के भीतर लड़ी जाती है।


काश!

कारख़ानों में बारूद नहीं,

बच्चों के खिलौने ढलते;

खेतों में खाइयाँ नहीं,

फूलों की क्यारियाँ बनतीं;

सिपाहियों के हाथों में

बंदूक की जगह बीज होते,

और किसी राष्ट्र की महानता

उसकी तोपों की मारक क्षमता से नहीं,

उसके नागरिकों को हासिल

**आज़ादी, बराबरी और न्याय**

की वास्तविक स्थिति से मापी जाती।


मगर दुनिया का बाज़ार

अभी इतना भी मासूम नहीं—

यहाँ मौत बिकती है

तो उसे सुरक्षा कहते हैं,

नफ़रत बिकती है

तो उसे राष्ट्रभक्ति;

और शांति की बात करने वाला

अक्सर सबसे पहले

संदेह के कटघरे में खड़ा किया जाता है।


मैं पूछता हूँ—

जिस धरती पर

एक फूल उगाने में महीनों लगते हैं,

उसी धरती पर

एक शहर मिटाने में

कुछ पल क्यों लगते हैं?


किसी दिन

इतिहास के सारे हथियार

एक संग्रहालय में रखे जाएँ,

और बच्चे पूछें—

इनसे क्या होता था?


तब कोई बूढ़ा

काँपते हाथों से कहे—

इनसे घर उजड़ते थे,

फूल डरते थे,

और आदमी

आदमी से बिछुड़ जाता था।


दुनिया को जीतना है

तो ज़मीन मत छीनो,

दिलों में जगह बनाओ;

बंदूकें बेच कर अमीर होने से बेहतर है

फूल उगा कर मनुष्य होना—

क्योंकि युद्ध में जीतने वाला भी

आख़िरकार उसी धरती पर लौटता है,

जहाँ शांति के बिना

कोई फूल नहीं खिलता।


दिल्ली


दिल्ली की सड़क पर

जब एक आवाज़ ने सदियों की चुप्पी तोड़ी,

तो सत्ता के संगमरमरी महलों में

जैसे किसी ने नींव हिला दी।


सड़कों पर बैरिकेड उग आए,

वर्दियों का जंगल खड़ा हो गया,

हुक्मरानों को पहली बार लगा—

कि उनके सामने कोई भीड़ नहीं,

एक जागता हुआ तूफ़ान खड़ा हो गया।


कोई अपने श्रम का हिसाब माँग रहा था,

कोई अपनी भूख का जवाब,

कोई पीढ़ियों से दबे अपमान को

शब्दों में ढाल कर निकला था,

तो किसी के हिस्से आया

हिरासत का अँधेरा और बंद रास्तों का हिसाब।


तुम हमें दिल्ली से भगाते हो,

मानो यह धरती तुम्हारी जागीर है!

मानो सड़कों पर चलने का हक़

सिर्फ़ तुम्हारी बनाई हुई तक़दीर है!

तुम्हें लगता है,

आदेश लिख देने से इतिहास बदल जाता है,

मगर याद रखो—

जब पेट की आग विचार बनती है,

तो साम्राज्यों का अभिमान जल जाता है।


हम वही लोग हैं

जिनकी पीठ पर लदा बोझ

तुम्हारे वैभव की इमारत उठाता है,

जिनके पसीने से शहर चमकता है,

जिनके श्रम से तुम्हारा संसार सजता है।

हमारे हाथों ने कारखाने खड़े किए,

हमारे पैरों ने सड़कें नापीं,

हमने अपने हिस्से की धूप बेच कर

तुम्हारे महलों में रोशनियाँ ढालीं।


मगर जब हमने अपने हिस्से की रोटी माँगी,

तुमने हमें सब्र का पाठ पढ़ाया;

जब हमने बराबरी की बात उठाई,

तुमने हमें हमारी औकात बताई;

जब हमने अन्याय के विरुद्ध सिर उठाया,

तुमने दमन का पूरा तंत्र जुटाया।


सुनो हुक्मरानो!

अब सब्र की सीमा टूट रही है,

सदियों से जमी बर्फ़

भीतर ही भीतर फूट रही है।

जो पीड़ा कल आँसू बन कर बहती थी,

वह आज प्रतिरोध की भाषा सीख रही है;

जो चुप्पी कल तुम्हारी ताक़त थी,

वही आज तुम्हारे विरुद्ध

एक संगठित आवाज़ बन रही है।


तुम्हें हमारे हाथ चाहिए,

मगर उन हाथों का उठना मंज़ूर नहीं;

तुम्हें हमारी मेहनत चाहिए,

मगर मेहनतकश का बोलना मंज़ूर नहीं।

तुम चाहते हो—

हम मशीन के पुर्ज़े बने रहें,

तुम्हारे इशारों पर चलते रहें,

अपनी भूख को भाग्य समझें,

अपने अपमान को संस्कार समझें

और तुम्हारे अत्याचार को

व्यवस्था का व्यवहार समझें।


मगर अब यह नहीं होगा!

अब खेतों की मेड़ों से आवाज़ उठेगी,

कारखानों की चिमनियों से धुआँ नहीं,

प्रतिरोध की चेतना उठेगी।

झुग्गियों की बुझती आग में

फिर से चिनगारी जागेगी,

मज़दूर की मुट्ठी में

अपने भविष्य की ललकार जागेगी।


हम दिल्ली से लौट भी गए,

तो अपने भीतर दिल्ली छोड़ जाएँगे—

हर अन्याय की याद,

हर अपमान का घाव,

हर अधूरे सपने की चुभन

और हर शोषित मनुष्य का सवाल

अपने गाँव तक ले जाएँगे।


वे सवाल चौपालों पर बैठेंगे,

खेतों की मेड़ों पर उगेंगे,

मज़दूर बस्तियों में फैलेंगे,

और एक दिन

तुम्हारी ऊँची दीवारों से पूछेंगे—

जिस दुनिया को हमने अपने श्रम से बनाया,

उस दुनिया में हमारा हिस्सा कहाँ है?


तुम सोचते हो,

गाँव लौट कर हम फिर चुप हो जाएँगे,

सूखी रोटी के साथ

अपने अपमान को भी निगल जाएँगे।

मगर गाँव की मिट्टी

दर्द को बहुत गहराई से सँभालती है,

वह पैरों के निशान ही नहीं,

पीढ़ियों के घाव भी पहचानती है।


यहाँ खेत की मेड़ गवाही देगी,

यहाँ खाली चूल्हा सवाल करेगा,

यहाँ मज़दूर की फटी कमीज़

तुम्हारे वैभव से सवाल करेगी।

यहाँ भूख किसी आँकड़े में नहीं सिमटेगी,

यहाँ बेकारी कोई खबर नहीं बनेगी,

यहाँ हर पीड़ित की आँख में

एक नई दुनिया का सपना जगेगा।


याद रखो,

क्रांति केवल नारों से नहीं आती,

वह चेतना की मिट्टी में पलती है,

अनुभव के पानी से बढ़ती है,

संगठन की जड़ों से शक्ति पाती है

और अन्याय की दीवारों पर

जनता के संकल्प की तरह चढ़ती है।


क्रांति का अर्थ केवल

पुरानी कुर्सी को गिराना नहीं,

उस व्यवस्था को बदलना है

जो मनुष्य को मनुष्य से छोटा बनाती है;

उस सोच को तोड़ना है

जो किसी के श्रम पर महल बनाती है

और उसी श्रमिक को

अपनी देहरी पर खड़ा रहने की सज़ा सुनाती है।


हमें ऐसी सुबह नहीं चाहिए

जिसमें केवल सूरज का रंग बदले,

हमें ऐसी सुबह चाहिए

जिसमें जीवन के नियम बदलें;

जहाँ खेत जोतने वाला भूखा न सोए,

जहाँ कारखाने का श्रमिक बेबस न हो,

जहाँ स्त्री की आवाज़ पर पहरे न हों,

जहाँ जाति के नाम पर

किसी मनुष्य के सपने छोटे न हों।


हमें ऐसी दुनिया बनानी है

जहाँ श्रम का सम्मान हो,

जहाँ रोटी पर सबका अधिकार हो,

जहाँ किसी की गरीबी

किसी दूसरे की अमीरी का आधार न हो,

जहाँ सत्ता सेवा का दायित्व बने,

और मनुष्य की गरिमा से

बड़ा कोई सिंहासन न हो।


सुनो हुक्मरानो!

तुम लाठियों से रास्ते रोक सकते हो,

दीवारों से आवाज़ें घेर सकते हो,

जेलों में शरीर बंद कर सकते हो,

मगर विचारों के बीज कहाँ-कहाँ दबाओगे?

एक बीज मिट्टी में दफ़न होगा,

हज़ार अंकुर बन कर निकलेगा;

एक आवाज़ को ख़ामोश करोगे,

तो हर गली से नया स्वर उठेगा।


तुम्हारे पास आदेशों की ताक़त है,

हमारे पास एकजुट लोगों का विश्वास;

तुम्हारे पास भय का कारोबार है,

हमारे पास बदलते समय का एहसास।

तुम्हारे महलों की नींव में

हमारे श्रम की ईंटें लगी हैं,

हम जब अपने होने का अर्थ समझेंगे,

तुम्हारी ऊँचाइयाँ

अपनी ही बुनियाद से हिलेंगी।


हम कोई भीड़ नहीं

जिसे इशारों पर हाँका जा सके,

हम कोई बेज़ुबान जमात नहीं

जिसे हर बार बहलाया जा सके।

हम खेतों की दरारों में

दबी हुई नमी का प्रतिरोध हैं,

हम कारखानों की चिमनियों में

जमा हुआ सदियों का अवरोध हैं।


हम उन हथेलियों की लकीरें हैं

जिन्होंने पत्थरों पर रास्ते लिखे,

हम उन पैरों के छाले हैं

जिन्होंने मंजिलों के नक्शे बदले।

हम इतिहास के हाशिये पर

छूटी हुई कोई टिप्पणी नहीं,

हम वह अधूरा वाक्य हैं

जिसके बिना तुम्हारी पूरी कहानी

अपना अर्थ खो देती है।


दिल्ली सिर्फ़ एक शहर नहीं,

यह उन तमाम सवालों का नाम है

जो सत्ता के दरवाजे तक पहुँचते हैं।

यह उस किसान की उम्मीद है

जो अपनी मिट्टी का हक़ माँगता है,

उस मजदूर की पुकार है

जो अपने पसीने की कीमत माँगता है,

उस स्त्री का संकल्प है

जो अपनी जिंदगी के फैसले खुद करना चाहती है,

उस विद्यार्थी का सपना है

जो डिग्री नहीं, अपने भविष्य का रास्ता माँगता है।


और सुनो!


हम किसी एक चेहरे को हटा कर

दूसरा चेहरा ताज पर नहीं बैठाना चाहते,

हम तो ताज बनाने वाली

पूरी कार्यशाला का हिसाब चाहते हैं।


हमें केवल शासक नहीं बदलना,

शासन की सोच बदलनी है।

हमें केवल कानून की किताब नहीं,

उसके भीतर दर्ज बराबरी

जमीन पर उतारनी है।


हमें ऐसी क्रांति चाहिए

जिसमें बंदूक से पहले विचार जागें,

नफरत से पहले विवेक जागे,

और किसी भी विजय से पहले

मनुष्य के भीतर मनुष्यता जागे।


क्योंकि हमारा संघर्ष

किसी कुर्सी के लिए नहीं,

किसी झंडे की ऊँचाई के लिए नहीं,

किसी नए मालिक की नियुक्ति के लिए नहीं है।


हम उस सुबह के लिए लड़ रहे हैं

जहाँ किसी इंसान को

अपनी इंसानियत साबित न करनी पड़े।


जहाँ रोटी पर पहरा न हो,

पानी पर पहरेदार न हों,

ज्ञान पर किसी जाति का ताला न हो,

और संविधान की रोशनी

हर झोपड़ी तक बराबर पहुँचे।


तुम इतिहास को

अपने भाषणों में कैद कर सकते हो,

लेकिन आने वाली पीढ़ियों के सवालों को

किस जेल में रखोगे?


तुम दिल्ली की सड़कों को

खाली करा सकते हो,

मगर उन सड़कों पर चलने वालों के

सपनों को कहाँ भेजोगे?


**याद रखना हुक्मरानो!**


क्रांति कोई बारात नहीं

जो रास्ता रोक देने से लौट जाएगी,

यह कोई जुलूस नहीं

जो शाम ढलते ही बिखर जाएगा।


यह उस माँ की आँख में पलता सपना है

जो अपने बच्चे को भूखा नहीं देखना चाहती,

यह उस मजदूर की मुट्ठी में पलता सवाल है

जो अब अपनी मेहनत का अपमान नहीं सहना चाहता।


यह खेत की मिट्टी में दबा

अगली फसल का बीज है,

यह इतिहास के सीने में धड़कता

आने वाले समय का संगीत है।


**दिल्ली से उठी आवाज़

दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगी,

वह गाँव की पगडंडियों से गुजरेगी,

कारखानों के फाटकों पर ठहरेगी,

विद्यालयों की खिड़कियों से झाँकेगी,

और हर उस घर में दस्तक देगी

जहाँ बराबरी का सपना

अभी तक अधूरा पड़ा है।**


क्योंकि जिस दिन

मेहनत करने वाला अपने श्रम का अर्थ समझ लेगा,

जिस दिन भूखा आदमी

अपनी भूख का कारण पहचान लेगा,

जिस दिन बँटे हुए लोग

अपने साझा दुख की भाषा सीख लेंगे—


उस दिन इतिहास का पन्ना नहीं,

इतिहास लिखने वाला हाथ बदलेगा।


**और उस दिन दिल्ली में

सिर्फ़ सत्ता का पता नहीं बदलेगा,

इस देश में मनुष्य के होने का

पूरा अर्थ बदल जाएगा।**




मैं अपने समय के कटघरे में खड़ा हूँ


मैं अपने समय से इंक़िलाब माँगता हूँ,

मगर उससे पहले

उस भाषा का हिसाब माँगता हूँ

जिसमें भूख को समस्या,

बेरोज़गारी को चुनौती

और अन्याय को व्यवस्था की मजबूरी कहा जाता है।


मैं हर सवाल का जवाब माँगता हूँ,

ऐसा जवाब नहीं

जो किसी मंत्री की मुस्कान में छिपा हो,

जो अख़बार के विज्ञापन में चमकता हो,

जो चुनाव के बाद

अपना पता बदल लेता हो।


मैं उन लोगों से अपना ख़्वाब माँगता हूँ

जिन्होंने मेरी आँखों में भविष्य बोया

और मेरे हिस्से की ज़मीन पर

अपने महल उगा लिए।


मैं उनसे पूछता हूँ—

मेरे हिस्से का सूरज कहाँ है?

मेरी मेहनत की मज़दूरी कहाँ है?

मेरे बच्चे की किताब में

रोटी का अध्याय इतना छोटा

और धर्म का पाठ इतना मोटा क्यों है?


वे कहते हैं—देश बदल रहा है!


मैं अपनी जेब टटोलता हूँ,

वहाँ कुछ सिक्के हैं,

कुछ अधूरे बिल हैं,

एक पुरानी उम्मीद है

और नौकरी की उम्र पार कर चुका

एक नौजवान बैठा है।


मैं पूछता हूँ—

यह बदलाव किसकी जेब में रहता है?


संसद में बैठे लोग

जब जनता की बात करते हैं,

तो मुझे अक्सर ऐसा लगता है

जैसे कसाई

बकरे की सेहत पर चर्चा कर रहे हों।


वे संविधान की शपथ लेते हैं,

फिर उसी की आत्मा को

अपने स्वार्थ की मेज़ पर रख कर

टुकड़ों में बाँट देते हैं।


वे बराबरी की बात करते हैं,

मगर आदमी को उसकी जाति से नापते हैं।

वे आज़ादी का उत्सव मनाते हैं,

मगर सवाल पूछने वाले चेहरे

उन्हें राष्ट्र के नक़्शे पर

एक ख़तरनाक दाग़ दिखाई देते हैं।


मैं इस देश से नफ़रत नहीं करता,

इसीलिए इसकी झूठी तारीफ़ नहीं करता।

मेरे लिए देश

किसी नेता का चेहरा नहीं,

न किसी धर्म की जागीर है।


देश वह मज़दूर है

जो सुबह अपनी पीठ पर औज़ार बाँध कर निकलता है

और शाम को अपनी थकान के साथ

आधे पेट घर लौटता है।


देश वह किसान है

जिसकी फ़सल का दाम

किसी और की मेज़ पर तय होता है।


देश वह दलित बच्चा है

जो किताब में समानता पढ़ता है

और समाज में अपनी औक़ात का पाठ।


देश वह औरत है

जिसकी आज़ादी पर पहरा दे कर

लोग अपनी संस्कृति बचाने का दावा करते हैं।


मैं ऐसे देशभक्तों से सावधान हूँ

जिन्हें देश तो दिखाई देता है,

मगर देश के भीतर का आदमी नहीं।


मैं अपने समय से जवाब माँगता हूँ—

कि मेहनत करने वाला

हमेशा कमज़ोर क्यों है?

कि सच बोलने वाला

अक्सर अकेला क्यों है?

कि सत्ता के दरवाज़े पर

जनता की दस्तक

इतनी बेआवाज़ क्यों है?


और अगर ये सवाल

तुम्हारी व्यवस्था को चुभते हैं,

तो समझ लो—

बीमारी सवालों में नहीं,

तुम्हारे जवाबों में है।


मुझे कोई नया भगवान नहीं चाहिए,

कोई नया मसीहा नहीं,

कोई ऐसा नेता नहीं

जो मेरी जगह मेरे लिए सोचने लगे।


मुझे अपनी समझ चाहिए,

अपने विवेक की धार चाहिए,

अपने हिस्से की ज़मीन पर

अपने पैरों से खड़े होने का अधिकार चाहिए।


मैं क्रान्ति को

सिर्फ़ नारों में नहीं खोजता,

मैं उसे उस दिन देखना चाहता हूँ

जब जाति किसी आदमी की पहचान पर

अपना ताला नहीं लगाएगी,

जब धर्म किसी भूखे की थाली से

उसका निवाला नहीं छीनेगा,

जब सत्ता के सामने

सच को अपना परिचय नहीं देना पड़ेगा।


मैं अपने दौर से इंक़िलाब माँगता हूँ,

लेकिन ऐसा नहीं

कि पुराने शोषक की कुर्सी पर

कोई नया शोषक बैठ जाए।


मैं सिर्फ़ हुक्मरान नहीं बदलना चाहता,

हुक्म चलाने की मानसिकता बदलना चाहता हूँ।

मैं सिर्फ़ कानून की किताब नहीं,

उसके भीतर सोया हुआ न्याय जगाना चाहता हूँ।


क्योंकि मेरे लिए इंक़िलाब का मतलब

सिर्फ़ तख़्त का गिरना नहीं है—

उस आदमी का उठ खड़ा होना है

जिसे सदियों से

अपनी ही ज़िंदगी में

गवाह तो बनाया गया,

मगर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं दिया गया।


मैं अपने समय से

बस इतना-सा हिसाब माँगता हूँ—

कि अगली पीढ़ी जब हमसे पूछे

तुम्हारे दौर में अन्याय ज़िंदा था,

तो हम सिर झुका कर यह न कहें

कि हाँ, ज़िंदा था,

और हम तमाशा देखते रहे।


मैं अपने दौर से इंक़िलाब माँगता हूँ—

क्योंकि चुप रहना अब तटस्थ रहना नहीं,

कई बार अन्याय की तरफ़ खड़े होना है।


श्याम सुन्दर सिंह चित्रकूट, उत्तर प्रदेश के शिक्षक, कवि, लेखक और सामाजिक चिंतक हैं। उनकी लेखनी में सामाजिक न्याय, समानता, वैज्ञानिक चेतना, स्त्री मुक्ति और मानवीय स्वतंत्रता के स्वर प्रमुख हैं। वे जातिवाद, अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड और सामाजिक शोषण के विरुद्ध तार्किक एवं प्रगतिशील विचारों के पक्षधर हैं।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


सम्पर्क


मोबाइल : 9621914199

टिप्पणियाँ

  1. मैंने उनकी सभी कविताएँ पढ़ीं। कविताएँ अपेक्षाकृत लंबी हैं, लेकिन अपनी विषयवस्तु और वैचारिक प्रवाह के कारण पाठक को बाँधे रखने में सक्षम हैं। इनमें सामाजिक असंतोष, बदलाव की आकांक्षा, युद्धकालीन परिस्थितियों की त्रासदी, देश में बढ़ते पूँजीवाद के विरुद्ध प्रतिरोध और इंकलाब की मांग प्रमुखता से उभरती है। इन कविताओं में व्यवस्था के प्रति असहमति के साथ सामाजिक परिवर्तन की बेचैनी और एक नई व्यवस्था की तलाश भी दिखाई देती है।

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