प्रतुल जोशी का आलेख 'कोसी का घटवार' : प्रेम की वेदना और युद्ध के अवसाद से उपजी रचना
'कोसी का घटवार' : प्रेम की वेदना और युद्ध के अवसाद से उपजी रचना
प्रतुल जोशी
'कोसी का घटवार' और शेखर जोशी एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि कहीं भी शेखर जी का ज़िक्र आता है तो सबसे पहले उनकी प्रतिनिधि कहानी के रूप में 'कोसी का घटवार' का ही ज़िक्र होता है। ऐसा क्या है इस कहानी में, इस पर चर्चा होगी, लेकिन पहले कथासार -
"गुसाईं एक रिटायर्ड फ़ौजी है जो अपने रिटायरमेंट के बाद समय काटने के लिए गाँव के बाहर एक घट लगा लेता है। घट एक तरह की पनचक्की होती है, जिसमें पानी की धारा को मोड़ कर, उसके आधार में लगे डंडों को चलाया जाता है जिनके माध्यम से अनाज पिसता है।
पंद्रह-सोलह साल पहले गुसाईं का अपने गाँव के पड़ोस में रहने वाली लछमा से प्रेम हो गया था, लेकिन लछमा के माता-पिता गुसाईं से लछमा का विवाह इसलिए नहीं करते क्योंकि गुसाईं के माता-पिता जीवित नहीं हैं और उसकी सेना की नौकरी में बेहद असुरक्षा है-
'जिसके आगे-पीछे भाई बहन नहीं, माई-बाप नहीं, परदेस में बंदूक की नोंक पर जान रखने वाले को छोकरी कैसे दें हम ?' लछमा के बाप ने कहा था।" (शेखर जोशी कथा समग्र, पृ.-59)
नौकरी के दौरान ही गुसाईं को पता चलता है कि लछमा की शादी किसी और से हो गई है। गुसाईं इस घटना से बेतरह टूट जाता है और पंद्रह वर्ष तक अपने गाँव नहीं आता। आता है तो सेवानिवृत्ति के बाद ही। जीवन के इस दौर में अकेलापन ही उसका साथ है। वह अकेलापन जो उसके द्वार पर धरना दे कर बैठ गया है-"और कहीं कोई आवाज़ नहीं कोसी के बहाव में भी कोई ध्वनि नहीं। रेती-पाथरों के बीच में टखने-टखने तक फैला पानी क्या आवाज़ करेगा? पानी के गर्भ से निकल कर छोटे-छोटे पत्थर भी अपना सिर उठाये आकाश को निहार रहे थे। दोपहरी ढलने पर भी इतनी तेज़ धूप। कहीं चिरैया भी नहीं बोलती। किसी प्राणी का प्रिय-अप्रिय स्वर नहीं।
कभी-कभी गुसाई को यह अकेलापन काटने लगता है। सूखी नदी के किनारे का यह अकेलापन नहीं, ज़िंदगी भर साथ देने के लिए जो अकेलापन उसके द्वार पर धरना दे कर बैठ गया है, वही। जिसे अपना कह सके, ऐसे किसी प्राणी का स्वर उसके लिए नहीं। पालतू कुत्ते-बिल्ली का स्वर भी नहीं। क्या ठिकाना ऐसे मालिक का जिसका घर-द्वार नहीं, बीवी-बच्चे नहीं, खाने-पीने का ठिकाना नहीं।"
इसी घट पर एक दिन लछमा आती है अनाज पिसाने। लछमा गुसाईं को नहीं पहचान पाती, लेकिन गुसाईं लछमा को पहचान लेता है। लेकिन लछमा अब वह लछमा नहीं है जो गुसाईं के घुटने पर सिर रख कर अपने प्रेम का इज़हार करती थी।
"एक दिन बड़ी मुश्किल से मौक़ा मिला था उसे। लछमा को पात पतेल के लिए जंगल जाते देख कर वह छोकरों से कांकड़ के शिकार का बहाना बना कर अकेले जंगल को चल दिया था। गाँव की सीमा से बहुत दूर काफल के पेड़ के नीचे गुसाईं के घुटने पर सिर रख कर लेटी-लेटी लछमा काफल खा रही थी-पके, गदराए, गहरे लाल-लाल काफल।
खेल-खेल में काफलों की छीना-झपटी करते गुसाईं ने लछमा की मुट्ठी भींच दी थी। टप-टप काफलों का गाढ़ा रस उसकी पैंट पर गिर गया था। लछमा ने कहा था-
'इसे यहीं रख जाना, मेरी पूरी बाँह की कुर्ती इसमें से निकल आएगी।' वह खिलखिला कर अपनी बात पर स्वयं ही हँस दी थी।
पुरानी बात क्या कहा था गुसाईं ने, याद नहीं पड़ता "तेरे लिए मखमल की कुर्ती ला दूँगा, मेरी सुवा!' या कुछ ऐसा ही।
आज अचानक लछमा से भेंट हो जाने पर वह उन सब बातों को भूल गया, जिन्हें वह कहना चाहता था। इन क्षणों में केवल मात्र श्रोता बन कर रह जाना चाहता था। गुसाईं की सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि पा कर लछमा आँसू पोंछती हुई दुखड़ा रोने लगी, 'जिसका भगवान नहीं होता, उसका कोई नहीं होता! जेठ-जिठानी से किसी तरह पिंड छुड़ा कर यहाँ माँ की बीमारी में आयी थी, वह भी मुझे छोड़ कर चली गई। एक अभागा मुझे रोने को रह गया है, उसी के लिए जीना पड़ रहा है। नहीं तो पेट पर पत्थर बाँध कर कहीं डूब मरती, जंजाल कटता !'
'यहाँ काका-काकी के साथ रह रही हो?' गुसाईं ने पूछा।
'मुश्किल पड़ने पर कोई किसी का नहीं होता जी! बाबा की जायदाद पर उनकी आँखें लगी हैं। सोचते हैं, कहीं मैं हक़ न जमा लूँ।' मैंने साफ़-साफ़ कह दिया, 'मुझे किसी का कुछ लेना-देना नहीं। जंगलात का लीसा ढो-ढो कर अपनी गुज़र-बसर कर लूँगी, किसी की आँख का काँटा बन कर नहीं रहूँगी'।"
कहानी का कथानक गुसाईं और लछमा के आपसी वार्तालाप से आगे बढ़ता है-
"गुसाईं, लछमा को कुछ पैसे देने का आग्रह करता है, परंतु लछमा मना कर देती है। गुसाईं को लछमा से अधिक आग्रह करने का साहस नहीं होता, लेकिन वह लछमा से छुपा कर उसके थैले में अपने निजी आटे के टीन से दो-ढाई सेर के क़रीब आटा निकाल कर लछमा के आटे में मिला देता है। गुसाई को किसी काम से उस स्थान से हटना पड़ता है, लेकिन जाने से पहले वह एक बार लछमा के पास जाता है और अटक-अटक कर कहता है, 'कभी चार पैसे जुड़ जाएँ तो गंगनाथ जागर लगा कर भूल-चूक की माफ़ी माँग लेना। पूत-परिवार वालों को देवी-देवता के कोप से बचे रहना चाहिए!'
(यहाँ इन वाक्यों का संदर्भ लछमा की उस क़सम से था जो क़सम लछमा ने एक दिन गुसाईं से खाई थी।)
गुसाईं सोचने लगा उस साल छुट्टियों में घर से विदा होने से एक दिन पहले वह मौक़ा निकाल कर लछमा से मिला था।
'गंगनाथ ज्यू की क़सम, जैसा तुम कहोगे, मैं वैसा ही करूँगी।' आँखों में आँसू भर कर लछमा ने कहा था।
वर्षों से वह सोचता आया है, कभी लछमा से भेंट होगी, तो वह अवश्य कहेगा कि वह गंगनाथ का जागर लगा कर प्रायश्चित ज़रूर कर ले। देवी-देवताओं की झूठी क़समें खा कर उन्हें नाराज़ करने से क्या लाभ?" (शेखर जोशी, कथा समग्र, पृ.-60)
कहानी यहीं समाप्त हो जाती है।
कहानी का अंत कुछ इस तरह होता है, "घट के अंदर काठ की चिड़ियाँ अब भी किट-किट आवाज़ कर रही थीं, चक्की का पाट खिस्सर-खिस्सर चल रहा था और मथानी की पानी काटने की आवाज़ आ रही थी, और कहीं कोई स्वर नहीं, सब सुनसान, निस्तब्ध।"
(शेखर जोशी कथा समग्र, पृ.-69)
भैरव प्रसाद गुप्त जी द्वारा संपादित कहानी पत्रिका के सन् 1957 के 'कहानी विशेषांक' में प्रथम बार प्रकाशित इस कहानी में ऐसा क्या था कि यह कहानी उस दौर की बेहद चर्चित कहानियों में से एक हो गई। और अपने प्रकाशन के 68 वर्षों बाद आज भी पढ़ी जाती है। विभिन्न संस्थाओं द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में इस कहानी पर नाटक खेले गए। दूरदर्शन ने इस पर एक टेलीफ़िल्म भी बनाई। किसी ने इसे प्रेम के औदात्य स्वरूप की कहानी कहा तो किसी ने जिजीविषा और महत्वाकांक्षा के द्वंद्व की कहानी बताया। शेखर जी का पहला कहानी-संग्रह सन् 1958 में 'कोसी का घटवार' के नाम से ही प्रकाशित हुआ। उसी साल दिसंबर माह में आकाशवाणी, इलाहाबाद से प्रसारित अपनी वार्ता में श्रीपत राय (प्रसिद्ध साहित्यकार प्रेमचंद के सुपुत्र) ने कहा था, "कोसी का घटवार कहानी में प्रेम का शाश्वत अंकन है। इसके प्रेम वर्णन में अपनी एक मादकता है। अपनी एक टीस है, अपना एक रस है। अपनी इस शैलीगत विशिष्टता के कारण ही यह पाठक का ध्यान आकर्षित कर सकी है और उसकी सहानभूति भी प्राप्त कर सकी है। इस प्रेम कथा की अतृप्ति बहुत ही करुण है। इसमे वर्णित एक-एक प्रसंग अमिट है।"
प्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया 'कोसी का घटवार' पर अपनी राय व्यक्त करते हुए लिखती हैं "कोसी का घटवार में जीवन की त्रासदी का कारुणिक किन्तु यथार्थवादी अंकन है। यों तो इसके मूल में निहायत मामूली-सा प्रतिघात है, गुसाई का लछमा से ब्याह न हो पाना। ब्याह न हो पाने का कारण है, लछमा के बाप नहीं चाहते कि उनकी बेटी एक सिपाही से ब्याही जा कर हर समय वैधव्य की संभावना से अभिशप्त रहे। विवाह संबंध में उनकी समस्त चौकसी के बावजूद लछमा विधवा हो जाती है। वैधव्य और विपन्नता का बोझ साथ-साथ ढोते उसका गुसाई से आकस्मिक साक्षात्कार अभूतपूर्व करुणा की उत्पत्ति करता है। इस स्थल पर लेखक की सूझ-बूझ अद्भुत है। यद्यपि दोनों प्रेमी बाधाहीन हैं, उनका संयोग अब भी नहीं हो पाता है क्योंकि अब बाधा है 'समय'। पनचक्की की-सी ही एकरसता में बँधे दोनों प्रेमी अब प्रेम की स्थिति से परे अपनी-अपनी गर्दिश के दिन जैसे-तैसे काट रहे हैं। प्रेम की यह अनिवार्य परिणति एक नियति की तरह गुसाईं और लछमा को ग्रस लेती है।" (सारिका, 16-31 जनवरी 1979, पृ.-68-69)
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार नवीन जोशी 'कोसी का घटवार' का विश्लेषण पहाड़ के परिप्रेक्ष्य में करते हैं: "कोसी का घटवार उनकी बहुचर्चित एवं प्रसिद्ध कहानी है। विगत प्रेम की टीस और पहाड़ का कठिन, रोखड़ जीवन जैसे एक हो गए हों। जेठ की तपती दुपहरी, सूखती नदी की क्षीण धारा मे। मंथर गति से चलता घट (पनचक्की), गुसाईं का एकाकी जीवन, लछमा की कष्ट भरी जिंदगी के बीच राख में चिंगारी की तरह प्रेम की तलाश। पहाड़ का बीहड़ यथार्थ यहाँ मौजूद है। कल्पना करना कठिन है कि इस कहानी को किसी और भौगोलिक परिवेश में भी इतने संश्लिष्ट रूप से लिखा जा सकता था। यहाँ विगत प्रेम की झलक भर है, चंद लाइनों में वर्णित। बाक़ी प्रेम की उदात्तता है, उसकी प्रतीति है और एक कसक हैं यही इस कहानी को श्रेष्ठ और कालातीत बनाता है। उसमें पहाड़ की उपस्थिति कितनी स्वाभाविक और यथार्थ रूप में है। स्मृतियाँ मधुर ही नहीं होती हैं, भावुक ही नहीं बनातीं, वे निर्ममता से खरोड़ती भी हैं।।" (शेखर जोशी : कुछ जीवन की, कुछ लेखन की, पृ.-70)
इस बहुचर्चित कहानी की लोकप्रियता को समझने के लिए आज से 78 वर्ष पूर्व के भारत देश में जाना पड़ेगा। यह वह समय था जब देश ब्रिटिश सत्ता से नया-नया आज़ाद हुआ था। आज़ादी के आंदोलन के मूल्य अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुये थे। अपसंस्कृति का वह दौर प्रारंभ नहीं हुआ था जिसने बाद के दशकों में अपनी उपस्थिति दर्ज की। प्रेम का औदात्य स्वरूप उपस्थिति बनाए था। दूसरी तरफ द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका की स्मृतियाँ ताज़ा थीं। 'कोसी का घटवार' जैसी रचना ने अचानक जन्म नहीं ले लिया। शेखर जी ने अपने एक साक्षात्कार में यह दर्ज किया कि उनकी पहली कहानी 'राजे खत्म हो गए' की बड़ी भूमिका 'कोसी का घटवार' के सृजन में है।
"एक तरह से मेरी पहली कहानी 'राजे खत्म हो गए', मेरी प्रसिद्ध कहानी 'कोसी का घटवार' का बीज है। क्योंकि जो (युद्ध से) लौटे थे वह भी अंदर से इतने टूटे हुए थे, अपराधग्रस्त थे कि जिससे उनको कुछ लेना-देना नहीं, उनको उन्होंने छुरा भोंक दिया, गोली मार दी, मार दिया। उनमें से कुछ शराब के नशे में अपने को भुला रहे थे। गुसाईं ऐसे ही पात्रों में एक है।"(शेखर जोशी: कुछ जीवन की, कुछ लेखन की, पृ.-44)
अगर शेखर जी के उपर्युक्त वक्तव्य से 'कोसी का घटवार' के सूत्र तलाशें तो पाएँगे कि युद्ध की विभीषिका और प्रेम की वेदना का असर गुसाईं पर ऐसा है कि वह गाँव से बाहर, एक निर्जन में घर डाल कर बैठा है। यह उस युग का एक सत्य था। युद्ध, विभाजन में हज़ारों लोगों के रक्तपात ने जीवन में वीतराग की स्थिति निर्मित कर दी।
युवा आलोचक दिव्यानंद पहल पत्रिका के एक अंक में शेखर जी की कहानियों पर अपने आलेख 'युद्ध, पहाड़ और कोसी का घटवार' में लिखते हैं: "यह रेखांकित किया जाए कि प्रथम विश्व युद्ध ने हिंदी कथा साहित्य को 'उसने कहा था' जैसी कहानी दी, तो द्वितीय विश्व युद्ध ने 'कोसी का घटवार'।" (पहल, पृ.-212)
असफल प्रेम और युद्ध की विभीषिका से उपजी इस कथा को शेखर जी ने जिस बिंब विधान और वातावरण से निर्मित किया है, उसने प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह का भी ध्यान खींचा, "शेखर जोशी की 'कोसी का घटवार' में बिंब विधान तथा वातावरण के सार्थक प्रयोग को देखा जा सकता है। कहीं कोसी नदी की सूखी धार घटवार के अकेलेपन का बिंब है, तो कठफोड़वा की किट-किट तथा पनचक्की की मथानी की छिच्छर-छिच्छर सूने हृदय की निरर्थक धड़कन का नादमय चित्र है।" (कहानी, नयी कहानी, पृ.-43)
शेखर जी द्वितीय विश्व युद्ध की इस विभीषिका के प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं। बचपन की स्मृतियों ने उनके अंतर्मन पर गहरा प्रभाव डाला, "दूसरे विश्व युद्ध में हमारे पहाड़ों से हजारों युवा फौज में चले गए थे, आर्थिक कारणों से। जो कुमाऊं मोटर ऑनर्स यूनियन थी, उसकी जो मोटरें हल्द्वानी से गरुड़ तक चलती थी, उसमें आम आदमियों के लिए सुविधा नहीं होती थी, क्योंकि फौजियों को जाना होता था। एक बार जब मेरी उम्र ज्यादा से ज्यादा दस साल रही होगी, हमको अल्मोडा जाना था। अल्मोडा पैदल रास्ते से सोलह मील होता था और हवालबाग तक मोटर रोड से जाना होता था। उसे बाद रैकोट की चढ़ाई चढ़ कर अल्मोड़ा पहुँचना होता था। तो हम चले पैदल। जहाँ-जहाँ बस्ती थी, देखा कि फ़ौजी जवान अपनी चुस्त वर्दी में खड़े हुए हैं। गाड़ी की प्रतीक्षा में, और उनको विदा देने के लिए उनके परिवार की बहुत-सी महिलाएँ भी वहाँ थीं। पुरुष कम दिखाई देते थे। उनमें माँएँ होंगी, भाभियाँ होंगी, किसी-किसी की पत्नी भी होगी। जैसे ही गाड़ी आती, फ़ौजी चट से गाड़ी के अंदर बैठ जाता अपना सामान ले कर और जैसे ही गाड़ी चलती थी, पीछे जो रुलाई फूटती थी, इतनी दर्दनाक कि मेरे बाल मन में अमिट रह गई।" (शेखर जोशी : कुछ जीवन की, कुछ लेखक की, पृ.-43)
लेकिन 'कोसी का घटवार' सिर्फ गुसाईं की ही कहानी नहीं है। वह जितनी गुसाई की है, उतनी ही लछमा की भी है। लछमा का गृहस्थ जीवन तहस-नहस हो चुका है। पति मर चुका है। एक बच्चा है। पति की मृत्यु के पश्चात् वह मायके रहने चली आई है। लछमा का जीवन कष्टों से भरा हुआ है : "गुसाईं की सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि पा कर लछमा आँसू पोंछते हुए अपना दुखड़ा रोने लगी, जिसका भगवान नहीं होता, उसका कोई नहीं होता! जेठ-जेठानी से किसी तरह पिंड छुड़ा कर यहाँ माँ की बीमारी में आई थी, वह भी मुझे छोड़ कर चली गई। एक अभागा मुझे रोने को रह गया है, उसी के लिए जीना पड़ रहा है! नहीं तो पेट पर पत्थर बाँध कर कहीं डूब मरती, जंजाल कटता।"
"यहाँ काका-काकी के साथ रह रही हो?" गुसाईं ने पूछा।
"मुश्किल पड़ने पर कोई किसी का नहीं होता जी! बाबा की जायदाद पर उनकी आँखें लगी हैं, सोचते हैं, कहीं मैं हक़ न जमा लूँ। मैंने साफ़-साफ़ कह दिया, मुझे किसी का कुछ लेना देना नहीं। जंगलात का लीसा ढो-ढो कर अपनी गुज़र कर लूँगी, किसी का कांटा बन कर नहीं रहूँगी।"
'कोसी का घटवार' में गुसाईं और लछमा दोनो के पास यौवनावस्था के प्रेम की स्मृतियाँ हैं, लेकिन गुसाई आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर है तो लछमा अपनी गरीबी से संघर्षरत। आलोचक विजय मोहन सिंह अपने आलेख 'शेखर जोशी की कहानियाँ' में इस पक्ष पर प्रकाश डालते हैं: "गौर करें तो यह कहानी घोर ग़रीबी तथा उसके प्रति स्वतः उमड़ती हुई गहरी मानवीयता की कहानी है : 'लछमा' की गरीबी और आश्रयहीनता केवल लछमा की नहीं है? गुसाईं और लछमा वर्षों बाद मिलने पर भी अपनी स्मृतियों में जिंदा हैं, पर गुसाईं जहाँ अपनी मानवीयता के सहारे सजग तथा सक्रिय है, वहीं लछमा की ग़रीबी ने उसे मार डाला है : 'गुसाईं ने गौर से लछमा के मुख की ओर देखा। वर्षों पहले उठे ज्वार और तूफ़ान का वहाँ कोई चिह्न भी शेष नहीं था। अब वह सागर जैसे सीमाओं में बँध कर शांत हो चुका था।'
गुसाई के घुटनों पर सिर रख कर 'काफल' खाने वाली अल्हड़ पहाड़ी युवती लछमा के इस ज्वार को किसने शांत कर दिया? कहा जा सकता है कि 'समय', उमर और दूरी ने। अगर इतना ही होता तो कहानी सचमुच महज़ रोमांस और भावुकता की होती, किंतु गुसाईं जिसे सँजोए हुए है लछमा उसे खो कर खाली है क्योंकि गुसाईं के पास पनचक्की है और लछमा आर्थिक चक्की में पिस कर चुस चुकी है। इस तरह कहानी गुसाईं से अधिक लछमा की हो जाती है।" (कहानी और कहानी, सं. राजेंद्र मेहरोत्रा, पृ.-161)
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| प्रतुल जोशी |
सम्पर्क
मोबाइल : 8736968446




यह कहानी सिर्फ दो लोगों के जीवन की त्रासदी नहीं है, बल्कि इसमें पहाड़ की दुर्गम जीवन की झलक है, बहुत मार्मिक और भावनामय कथा है. जो मन को भिगो देती है, शेखर जी की हार कहानी यथार्थ औरसत्य का आइना होती है, प्रतुल जी की भक्ति औरशक्ति को प्रणाम करती हूं 🙏🌹🌹🌹
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