एदुआर्दो गालेआनो के पुस्तक का अंश 'आईनाघर: करीब-करीब पूरी दुनिया का इतिहास'
एदुआर्दो गेलियानो का जन्म 3 सितंबर 1940 को मोंटेवीडियो, उरुग्वे में हुआ था। वे वेल्श, इतालवी, जर्मन और स्पेनिश मूल के थे। दो साल की माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, गैलियानो ने चौदह वर्ष की आयु में संदेशवाहक और किराया वसूलने सहित कई तरह की नौकरियाँ कीं। अंततः उन्हें एल सोल में नौकरी मिल गई। उरुग्वे के समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ने लेखन से पहले ही इस किशोर के कॉमिक्स प्रकाशित किए थे। गैलियानो का चित्रकला का शौक जीवन भर बना रहा; उनकी लघु चित्रकलाएँ उनकी बाद की कई पुस्तकों में देखी जा सकती हैं, जबकि उनके हस्ताक्षर के साथ अक्सर एक छोटा हाथ से बनाया हुआ सुअर होता था। 1960 के दशक में एक पत्रकार के रूप में गैलियानो वामपंथी प्रकाशनों में प्रमुखता हासिल करते हुए आगे बढ़े और मारियो वर्गास ल्लोसा , मारियो बेनेडेट्टी , मैनुअल माल्डोनाडो डेनिस और रॉबर्टो फर्नांडीज रेटामार जैसे लेखकों के योगदान वाले एक प्रभावशाली साप्ताहिक पत्रिका मार्चा के संपादक बने। उन्होंने दो वर्षों तक दैनिक एपोका का संपादन किया और यूनिवर्सिटी प्रेस के प्रधान संपादक के रूप में भी काम किया। 1959 में उन्होंने अपनी पहली पत्नी, सिल्विया ब्रांडो से शादी की, और 1962 में तलाक के बाद, उन्होंने ग्रेसिएला बेरो से दोबारा शादी की। उन्होंने अपने मातृ परिवार के उपनाम से लिखा; युवावस्था में, उन्होंने संक्षेप में उरुग्वे के एक समाजवादी प्रकाशन, एल सोल के लिए लिखा, लेखों पर "गियस" के रूप में हस्ताक्षर किए, "एक छद्म नाम जो उनके पैतृक उपनाम ह्यूजेस के स्पेनिश उच्चारण के लगभग समान था।" 1973 में, उरुग्वे में सैन्य तख्तापलट हुआ; गैलियानो को कैद कर लिया गया और बाद में उन्हें भागने के लिए मजबूर होना पड़ा, वे अर्जेंटीना में निर्वासन में चले गए जहाँ उन्होंने क्राइसिस पत्रिका की स्थापना की। उनकी 1971 की पुस्तक ओपन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका को दक्षिणपंथी सैन्य सरकार द्वारा न केवल उरुग्वे में, बल्कि चिली और अर्जेंटीना में भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। 1976 में उन्होंने तीसरी बार हेलेना विलाग्रा से शादी की; हालाँकि, उसी वर्ष, विडेला शासन ने अर्जेंटीना में एक खूनी सैन्य तख्तापलट में सत्ता संभाली और उनका नाम डेथ स्क्वॉड द्वारा निंदा किए गए लोगों की सूची में जोड़ दिया गया। इस बार स्पेन भाग गए, जहाँ उन्होंने अपनी प्रसिद्ध त्रयी, मेमोरिया डेल फ्यूगो (आग की स्मृति) लिखी, जिसे "अमेरिका में उपनिवेशवाद की सबसे शक्तिशाली साहित्यिक निंदा" के रूप में वर्णित किया गया है। एदुआर्दो गालेआनो की एक चर्चित किताब है Espejos: Una Historia Casi Universal यानी "आईने: करीब-करीब पूरी दुनिया का इतिहास"। यह किताब इतिहास को जानने समझने के शुरुआती प्रयासों का विश्लेषण करती है। खासकर उस समय का इतिहास जब मनुष्य इस दुनिया के बनने और ब्रह्माण्ड के संचालित होने की रुचिकर परिकल्पनाएं किया करता था। ये परिकल्पनाएं दुनिया के तमाम देशों में अलग अलग तरीके से की गईं। इस खूबसूरत किताब में गालेआनो छोटे-छोटे दृष्टांतों को किस्सागोई की शैली में बयान करते इस धरती पर मानवता के पूरे सफ़र को हमारे सामने खोल कर रख देते हैं, रूह तक पहुँचने वाली नफासत, बारीकी और ईमानदारी के साथ. इस किताब का हिंदी अनुवाद कर्नाटक केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्पेनी भाषा के अध्येता डॉ पी. कुमार मंगलम कर रहे हैं, जिसकी कड़ियाँ समय-समय पर यहाँ आपसे साझा की जाएंगी। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं एदुआर्दो गालेआनो के पुस्तक का अंश 'आईनाघर : करीब-करीब पूरी दुनिया का इतिहास'।
'आईनाघर: करीब-करीब पूरी दुनिया का इतिहास'
मूल स्पेनिश : एदुआर्दो गालेआनो
अनुवाद : पी. कुमार मंगलम
सुंदरता की शुरुआत
वे दिखती हैं। गुफाओं की दीवारों और छतों पर।
वे आकृतियाँ। ऊँचे कूबड़ वाली भैंस। बारहसिंगे, भालू, घोड़े, चीलें, औरतें, पुरुष। इन सबकी कोई उम्र यहाँ दर्ज नहीं है। इनकी पैदाइश हज़ारों-हज़ार साल पहले की है। लेकिन, हर बार जब कोई इन्हें देखता है, तब ये दुबारा जन्म लेते हैं। कैसे किया उन्होंने? दूर के हमारे पूर्वज दादाओं ने। कैसे इतने महीन तरीके से ये चित्र बनाए होंगे उन्होंने? उन बर्बर लोगों ने जो जंगली जानवरों से नंगे हाथ ही भिड़ जाया करते थे। इतनी नज़ाकत से भरी आकृतियों को कैसे बनाया होगा? वे कैसे उन लहराते रेखाचित्रों को उकेर पाए, जो लगता है चट्टानों से निकल कर हवा में मिल जाना चाहते हैं। वे कैसे यह सब कर पाए?
या फिर वे दादियाँ थीं?
चचेरे भाई-बहन
अंतरिक्ष की दुनिया के विजेता हाम (Ham) का शिकार अफ्रीका में किया गया था। वह पहला चिंपांज़ी था, जो दुनिया से दूर, बहुत दूर के सफ़र पर गया था। पहला अंतरिक्ष चिंपांज़ी! वह मरकरी (Mercury) नाम के अंतरिक्ष यान में बैठ कर गया था। उसके शरीर में किसी टेलीफोन एक्सचेंज से ज़्यादा तार लगे हुए थे।
वह सकुशल और स्वस्थ इस धरती पर वापस आया था। उसके शरीर की हर गतिविधि से यही साबित होता था कि हम इंसान भी अंतरिक्ष के इस लंबे कठिन सफ़र में ज़िंदा रह सकते थे।
हाम प्रतिष्ठित पत्रिका लाईफ के मुख पृष्ठ का चेहरा बना था। और उसने अपनी बाकी की ज़िन्दगी चिड़ियाघरों के पिंजरों में बिताई थी।
दादा-दादियाँ
काले लोगों की बहुलता वाले अफ़्रीकी महादेश के बहुत से समुदायों के लिए उनके पुरखे रूह बन कर हमेशा मौजूद रहते हैं। वे उस पेड़ में ज़िंदा हैं, जो उनके घर के आस पास बड़ा हो रहा है। और उस गाय में भी जो किसी खेत में घास चार रही है। उनकी मानें तो आपके लक्क्ड़ दादा के भी परदादा अब पहाड़ पर साँप की तरह बलखाते झरने में मौजूद हैं। वह कोई भी रूह आपका पुरखा हो सकता है, जो इस दुनिया में आपके सफ़र का हमराह बनना चाहता हो, चाहे वह कभी आपका कोई रिश्तेदार या जान-पहचान वाला भी न रहा हो। परिवार होने की दरअसल कोई सीमा नहीं होती- दगारा समुदाय से आने वाले सोबूफू सोमे (Soboufu Some) समझाते हैं:
हमारे बच्चों की ढेर सारी माएँ हैं। उनके कई पिता हैं। इतना जितना वे चाहें!
ज़िंदगी के सफर में हमारा साथ देने वाली पूर्वज आत्माएँ वो ढेर सारे दादा-दादियाँ हैं, जो हममें से हर एक के पास हैं। उतने जितने हम चाहें!!
सभ्यता का संक्षिप्त इतिहास
और तब हम जंगलों में तथा नदियों के किनारे भटकते-भटकते थक चुके थे। और फिर हमने ठहर कर रहना शुरू किया। हमने बस्तियाँ बसाईं और साथ में रहना ईजाद किया। हमने हड्डियों को सुई में, और नुकीली चीज़ों को मछली पकड़ने वाली बर्छी में तब्दील किया। इन औज़ारों ने हमारे हाथों की पहुँच बढ़ाई और कुल्हाड़ी, कुदाल और चाक़ू के पीछे लगने वाले हत्थे ने उनकी ताकत बढ़ाई।
हमने धरती से धान, जौ, गेंहूँ और मकई उगाना शुरू किया। हमने भेड़ तथा बकरियों को बाड़े में रखना शुरू किया। तथा अनाज को ओसारे-गोदामों में संजो कर रखना सीखा, ताकि हम बुरे वक़्त में भूख से न मरें। हम जिन खेतों में काम करते, वहाँ हमने उर्वरता तथा पैदावार बढ़ाने वाली देवियों की पूजा की। चौड़े नितम्बों तथा बड़े, पुष्ट स्तनों वाली देवियाँ। लेकिन वक़्त के साथ उन देवियों की जगह युद्ध करने वाले, रोबदार मर्द देवताओं ने ले ली। फिर हमने राजाओं, युद्ध के सरदारों तथा बड़े पुरोहितों की स्तुतियाँ गानी-सुनानी शुरू कर दीं।
और तब हमने 'तुम्हारा' और 'मेरा' शब्दों की खोज की। जमीन को तब एक जमींदार मिला तथा औरत अपने पति की जायदाद हुई, और पिता बच्चों के मालिक बने।
वो दौर अब बहुत पीछे छूट चुका था, जब हम बिना किसी ठिकाने और तय मंजिल के यूँ ही यायावरी किया करते थे। सभ्यता के नतीजे सचमुच हैरान कर देने वाले रहे हैं: हमारी ज़िंदगी पहले से कहीं सुरक्षित थी, लेकिन हम कहीं कम आज़ाद थे। और अब हम पहले से कहीं ज़्यादा देर काम कर रहे थे।
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| एदुआर्दो गालेआनो |
हवा-पानी की खराबी की शुरुआत
अफ्रिका से आने वाले पिग्मी लोग, जिनका कद छोटा लेकिन याददाश्त लंबी होती है, समय से पहले के समय की याद आज भी रखे हुए हैं। वो दौर जब धरती आसमान के ऊपर हुआ करती थी।
ऊपर जमीन से नीचे आसमान पर तब लगातार धूल और कचरे की बारिश हुआ करती। इतना कि उससे देवताओं के घर गंदे हो जाया करते, उनका खाना ज़हरीला हो जाया करता।
वो सारे देवी-देवता एक लंबे अरसे से इस गंदे, सड़े-गले कूड़े की आमद झेलते आ रहे थे। और तब जा कर उनका धैर्य समाप्त हो गया था।
उन्होंने फिर एक कड़कती हुई बिजली की धार धरती की ओर भेजी। उस धार ने धरती को दो हिस्सों में फाड़ दिया। इस तरह खुली धरती के सीने से उन्होंने सूरज, चंद्रमा और सितारों को ऊपर भेज दिया। उसके बाद ख़ुद वे भी ऊपर आ गए। और फिर दूर ऊपर, हमसे दूर, हमसे अलग, देवताओं ने अपना नया राज बसाया।
हम तब से ही नीचे रह रहे हैं।
सामाजिक तबकों की बुनियाद
पहले-पहल के दौर में, भूख के दौर में, वह पहली औरत जमीन खुरच रही थी जब सूरज की किरणें पीछे से उसमें दाखिल हुई थीं। थोड़ी ही देर में, वहाँ एक नवजात शिशु जन्मा था।
धरती को बनाने वाले देवता पाचाकामाक (Pachacamac) को सूरज की यह दरियादिली ज़रा भी नहीं भाई थी और उसने उस नए जन्मे बच्चे के कई टुकड़े कर दिए। उस नन्ही-सी मरी हुई जान से पहले-पहल के पौधे जन्मे थे। उसके दाँत अब मकई के दाने बन गए थे, उसकी हड्डियाँ कसावा, तथा जिमीकंद इत्यादि बने, उसके मांस से आलू-शकरकंद और कद्दू बने।
उसके बाद सूरज भी अपना गुस्सा नहीं रोक सका। उसकी धधकती किरणों ने पेरू देश के पूरे समुद्री तट को जला कर हमेशा-हमेशा के लिए सुखा दिया था। उसका बदला तब जा कर पूरा हुआ जब सूरज ने उस धरती पर तीन अंडे गिराए थे:
सोने के अंडों से धरती पर राज करने वाले निकले।
चांदी के अंडों से इन मालिकों की मालिकाएँ निकली थीं।
और तांबे के अंडों से वे निकले जो उनके लिए काम करने वाले थे।
दास तथा मालिकान
कोको के पौधे को सूरज की ज़रूरत नहीं होती, क्यूँकि सूरज उसके अंदर चल रहा होता है। उस भीतर बैठे सूरज से ही वह खुशी और आनंद पैदा होते हैं, जो हम चॉकलेट से लिया करते हैं। ताज़िंदगी जवान और खुशहाल बना देने वाले इस गाढ़े पेय पदार्थ पर तब सिर्फ ऊपर आसमान में बैठे देवताओं का अधिकार था। हम इंसान तो सिर्फ़ इसे देख कर अनदेखा कर देने के लिए अभिशप्त थे।
केतसालकोआत्ल (Quetzalcoatl) वह कोकोआ उसे अपना आराध्य मानने वाले तोल्तेक (Toltec) सभ्यता के लिए चुरा कर लाया था। तब जबकि बाक़ी सारे देवी-देवता सो रहे थे वह कोकोआ के कुछ बीज निकाल लाया था। वह उन्हें अपनी लंबी दाढ़ी में छुपा, मकड़ियों के एक लंबे धागे के सहारे धरती पर उतरा था और उसने उन बीजों को तोल्तेका की राजधानी तुला को भेंट कर दिया था।
केतसालकोआत्ल की वह भेंट राजकुमारों, पुरोहितों तथा सेनापतियों ने हड़प ली थी। केवल उनकी जीभों को ही कोकोआ चखने के क़ाबिल माना गया था। ऊपर आसमान में बैठे देवताओं ने चॉकलेट को नीचे धरती पर रहने वाले नश्वर इंसानों के लिए वर्जित किया था। और इधर धरती के हुक्मरानों ने उसे आम, देसी लोगों के लिए वर्जित कर दिया था।
शासक तथा शासित
येरूसलम की बाईबल यह बताती है कि इज़रायल के लोगों को ईश्वर ने चुना था, वे ईश्वर की संतान थे।
हिब्रू तथा पुराने टेस्टामेंट वाली बाईबल का हिस्सा रहे साल्म 2 (Psalm) की मानें , तो इस चुनी हुई कौम को ईश्वर ने दुनिया का मालिकाना दे दिया था:
तुम मुझसे मांगो
और मैं तुम्हें वसीयत में
दुनिया के सारे मुल्क सौंप दूँगा
और तब तुम दुनिया के एक छोर के दूसरे छोर के मालिक होंगे!
लेकिन इसी ईश्वर को इज़रायल की कौम बेहद नागवार गुजरने लगी थी। वे अहसान-फ़रामोश और पाप में डूबे रहने वाले लोग थे। और फिर, दुनिया की तमाम बुरी ज़बानों की मानें, तो ढेर सारी धमकियों, लानतों तथा सज़ाओं के बाद ईश्वर का धैर्य आख़िरकार चुक गया था।
और तबसे ईश्वर की सौगात मिलने का दावा दूसरी क़ौमों के जिम्मे रहा है।
1990 में संयुक्त राज्य अमरीका की संसद के ऊपरी सदन के सदस्य अल्बर्ट बेवरिज (Albert Beveridge) ने यह खुलासा किया था:
-सर्वशक्तिमान ईश्वर ने हमें अपने ख़ास पसंदीदा लोगों की तरह चुन लिया है। आज से दुनिया को फिर से बनाने का काम हमारे जिम्मे है!
श्रम के बँटवारे की बुनियाद
कहा जाता है कि यह राजा मनु थे, जिन्होंने भारत में जातियों की व्यवस्था को दैवीय प्रतिष्ठा दिलवाई थी।
ईश्वर के मुँह से पुरोहित पैदा हुए थे। उसकी बाँहों से राजा और सेनापति आए थे। उसकी माँसपेशियों से व्यापारी तथा उसके पैरों से दास तथा कारीगर निकले थे। और तब से उस सामाजिक पिरामिड के बनने की शुरुआत हो गई थी, जिसकी आज के भारत में तीन हज़ार से ज़्यादा सीढ़ियाँ हैं। यहाँ हर एक का जन्म वहीं होता है, जहाँ उसका जन्म होना चाहिए, वह करने के लिए, जो उसे करना चाहिए। तुम्हारे पालने में तुम्हारे मरने की नियत जगह तय है, तुम जिस जगह जन्मे हो, वही तुम्हारा भाग्य तय करता है। तुम्हारा जीवन तुम्हारी पिछली ज़िंदगियों को मिला ईनाम या दंड है और तुम्हारी पीढ़ियों का इतिहास तुम्हारी जगह और तुम्हारा काम तय करता है।
राजा मनु की यह सख्त हिदायत थी कि 'ग़लत' आचरण करने वालों की 'ठीक' किया जाए: अगर 'नीची' जात का कोई व्यक्ति पवित्र ग्रंथों के श्लोक सुन ले, तो उसके कानों में पिघला शीशा डाल दिया जाए, अगर वह इन श्लोकों को पढ़े, तो उसकी जुबान काट दी जाए । आजकल ये 'शिक्षाएँ' लागू नहीं होतीं, लेकिन आज भी जो कोई भी प्रेम, कामकाज या किसी और वजह से अपनी तय जगह से बाहर आता है, तो उसे सरेआम, सबके सामने इस ‘गुस्ताख़ी’ की सज़ा मिलती है। यहाँ उसकी जान भी जा सकती है, या फिर उसे मौत से भी बदतर ज़िंदगी मिलती है।
हर पाँच में से एक भारतीय वर्ण-व्यवस्था की चौहद्दी से बाहर रखे गए, शूद्र लोगों का हिस्सा है, जो सबसे नीचे रखी गई जातियों से भी नीचे आते हैं। इन्हें अछूत कहा जाता है, क्यूंकि इनके छूने से लोग गंदे हो जाते हैं। वंचितों में भी वंचित रहे ये लोग, दूसरों से बात नहीं कर सकते, उनके रास्तों पर नहीं चल सकते और न ही उनके बर्तन-गिलास छू सकते हैं। कानून इनकी हिफ़ाजत करता है, और हक़ीक़त इन्हें बाहर का रास्ता दिखाती है। यहाँ से आने वाले पुरूषों को कोई भी अपमानित कर जाता है, तथा औरतों के साथ कोई भी बलात्कार कर देता है। ‘अछूत’ रही ये औरतें तब ज़रूर छुए जाने लायक हो जाती हैं!
2004 के आखिर में जब भारत में समंदर के किनारे बसे इलाकों में सुनामी ने तबाही मचाई थी, तब कूड़े तथा मृत लोगों की लाशों को उठाने का काम इन्हीं अछूतों को दिया गया था।
हमेशा की तरह!
सम्पर्क
पी. कुमार मंगलम
मोबाइल : 7291914968


आदरणीय संतोष सर. मेरे अनुवाद को अपने इस महत्वपूर्ण मंच पर जगह देने के लिए हार्दिक आभार
जवाब देंहटाएंयह अच्छा है.इसमें नयापन है.इस अनुवाद के और अंश क्रमिक रूप से सामने आये तो बेहतर.
जवाब देंहटाएंइन अनुवादों के साथ डॉ. पी. कुमार मंगलम ने यह साबित कर दिया है कि वह केवल स्पैनिश इतिहास और संस्कृति के प्रखर अध्येता ही नहीं हैं, बल्कि उनके पास वहां के मूल्यों, परंपराओं आदि की गहरी समझ भी है और भारतीय परिप्रेक्ष्य से उनका साम्य ढूंढकर इतने सुंदर रूप में रखने की सलाहियत भी।
जवाब देंहटाएंयह अनुवाद बहुत सुंदर हैं, जिसका एक कारण मूल और अनुवाद की भाषा के बीच से अंग्रेजी की रुक्षता का गायब होना भी है। यह श्रृंखला जारी रहनी चाहिए। ब्लॉग और अनुवादक दोनों को साधुवाद।