प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया'




बौद्धिकता और प्रगतिशीलता के साथ साथ तन्त्र मन्त्र भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हालांकि इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता लेकिन प्राचीन काल में जब मनुष्य प्राकृतिक प्रकोपों से परिचित नहीं था तो उसने भय से उबरने के लिए जादू टोने और तन्त्र मन्त्र का सहारा लिया। अथर्ववेद में इनका पर्याप्त वर्णन मिलता है। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक युग में इन अंधविश्वासों का कोई मतलब नहीं फिर भी एक पद्धति के रूप में आज भी यह चलन में है। प्रचण्ड प्रवीर ने अपनी कहानी में इनके हवाले से जो बात की है वह महत्वपूर्ण है। साधक यह जो सोचता है कि उसे किसी बात का डर ही नहीं है वही साधना के अन्त में गेहूंवन सांप को देख कर उछल कर दूर भाग जाता है। और अन्ततः भागने के इस क्रम में ही उसे उसका जहान मिल जाता है। इस जहान का मिलना ही जीवन का प्राप्य है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं 'कल की बात' के अन्तर्गत प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया'।


कल की बात – 289

'मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया'


प्रचण्ड प्रवीर 


कल की बात है। जैसे ही मैँने बैठक मेँ कदम रखा, मेरी नजर एक पीले कुर्ताधारी व्यक्ति पर पड़ी जो दिल्ली पधारे मेरे मामा जी से मिलने आया था। मामा जी ने मुझे बैठने का इशारा करके बताया कि कविराज से उनके घनिष्ठ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध हैँ। आज के जमाने के अनुसार कविराज को रस, छन्द, अलन्कार, वक्रोक्ति से दुराव है, लेकिन तन्त्र-मन्त्र, भूत-प्रेत, चुड़ैल-पिशाचोँ मेँ उनकी गहरी दिलचस्पी है। मैँने मुस्कुरा कर कविराज का अभिवादन किया।

  

मेरे मामा जी बातोँ के क्रम मेँ कहने लगे कि उन सभी को वे विद्या नहीँ मानते किन्तु इसके कारण कविराज जो किस्से-कहानियाँ लिखते हैँ, उनको पढ़ने मेँ आनन्द आ जाता है। मेरी तरफ देख कर मामा जी ने मुझसे पूछा, “क्योँ नीलकण्ठ?” कहने को मैँ प्रोफेसर हूँ और धवलकेशी हूँ पर कड़क मामा जी के सामने मैँ सोलह साल के किशोरावस्था से बाहर नहीँ निकल पाता हूँ। अपने विचार भी रखने थे, साथ ही मामा जी और आगन्तुक कविराज की संवेदनाओँ का भी आदर करना था।

  

मैँने कहना शुरू किया — कविराज, मैँ आपको इससे जुड़ा एक अनुभव बताता हूँ। बात पुरानी है, लेकिन अभी भी सब कुछ ऐसे याद है कि जैसे कल की बात है। उन दिनोँ अठारह साल की उम्र रही होगी। उस वय मेँ उत्साह इतना रहता है कि आप दौड़ते हुए पहाड़ पर चढ़ जाइये या समंदर मेँ कूद कर पार करने का दुस्साहस कर लीजिये, कोई आश्चर्य की बात नहीँ। उन दिनोँ मुझमेँ जिज्ञासा प्रबल रहती थी। इधर-उधर, जहाँ-जिधर से मौका मिलता था कोई न कोई किताब चाट जाता था। संजोग से मैँ ननिहाल गया हुआ था। वहाँ नाना जी के पास ढेरोँ किताबेँ। वहाँ मैँ घण्टोँ किताबेँ पढ़ता रहता था। अगर पढ़ने मेँ कोई दिक्कत होती थी, तो वह थी गुड़िया और उसका रेडियो। गुड़िया मेरे पड़ोस मेँ रहती थी और उसका एक ही काम था कि मेरा मजाक उड़ाना। अगर छत पर पढ़ने जाऊँ, तब वह सहगल, गीता दत्त, हेमन्त कुमार के गाने तेज आवाज मेँ सुनने लगती। पता नहीँ उसको कितने स्टेशन, कितने चैनल पता थे कि हमेशा, दिन-दुपहर कोई न कोई गीत बज उठता। उसका घर भी ननिहाल से सटा था और मैँ कुढ़ता था। फिर मैँने तय किया कि अब योगी जैसा ध्यान करूँगा, चाहे कितना भी कोई गाना बजाय।

  

पर मेरा ऐसा सोचना गलत ही था। एक तन्त्र-मन्त्र की किताब मेँ लिखा था कि एकान्त मेँ ही ध्यान करना चाहिये। खैर, बहुत-सी किताबेँ पढ़ने के बाद मैँने एक बहुत पुरानी, फटे पन्ने वाली, एकदम पीले पड़े पन्ने वाली किताब से मैँने एक मन्त्र ढूँढ निकाला जिसमेँ लिखा था कि इसकी सिद्धि से आपको जहान मिल जायेगा। कविराज, ये तो आपको पता होगा कि आमतौर पर मन्त्र की सिद्धि के लिये एक लाख से ले कर करोड़ोँ बार तक मन्त्र का जाप करना पड़ता है। जो मन्त्र मैँने ढूँढा था, उसको केवल दस हजार बार जाप करना था। मैँ बड़ा प्रसन्न कि काम आसानी से हो जायेगा। उसमेँ लिखा था कि किसी सूने शिवालय मेँ जा कर भौमवार से जाप आरम्भ करेँ।

  

कविराज ने टोका, “सोमवार?” मैँने ना मेँ सिर हिला कर कहा, “नहीँ बन्धु, भौमवार! मैँने गाँव से दूर एकदम सूने शिवालय मेँ भौमवार से जाप करना शुरू किया और दुनिया-जहान से दूर एकदम निर्विघ्न जाप हो गया। मैँ मन ही मन खुश भी हुआ कि सूने मेँ काम अच्छा होता है और यहाँ गुड़िया तंग करने के लिये नहीँ आई। नानी को कुछ-कुछ शक होता था कि मैँ इतनी-इतनी देर कहाँ गायब रहता हूँ पर किसी तरह मेरा काम होता रहा। अब किताब मेँ आगे निर्देश यह दिया हुआ था कि आप घर से निकलिये और ऐसे श्मशान के पास चले जाय, जहाँ पास मेँ नदी-नाला-नहर जैसे कुछ पानी बहता हो। वह श्मशान भी एकदम निर्जन होना चाहिये। घर से निकलते समय किसी ने टोक दिया तो वापस लौट जाइये। ऐसा ना हो तो आगे चलते जाइए और रास्ते मेँ १०८ घास के ऐसे हल्के हरे तिनके चुनिये जो पानी मेँ सरलता से बह जाय। याद रखना है कि तिनके १०७ या १०९ ना हो। जब १०८ तिनके हो जाय, तब श्मशान मेँ पानी के पास पहुँच कर मन्त्र पढ़ते हुए एक-एक कर के तिनके बहाते जाइये। जब १०८वाँ तिनका बह जायेगा तब जल मेँ से कोई जीव निकलेगा, उसे पकड़ लेना है। उसके बाद वह जीव आपको दुनिया-जहान का हर चीज दे सकता है।“

  

कविराज सावधान हो कर बैठ गये। मामा जी भी मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे। मैँने कहना चालू रखा — यूँ तो मैँ बहुत बहादुर हूँ। इसके अलावा मुझे खुद पर बड़ा नाज था कि ऐसा कसरती बदन है कि चार-चार को अकेला धोबीपछाड़ दे सकता हूँ। इतना ही नहीँ रात-दिन महाकाली की उपासना करता हूँ। काली के भक्त का कोई बाल भी बाँका नहीँ कर सकता था। ऐसा विचार कर के मैँ मन ही मन उछल रहा था। मैँ निर्जन श्मशान पहुँचा। एक तो मेरा ननिहाल गाँव मेँ था और ये श्मशान गाँव से बहुत दूर। दूर-दूर तक कोई आदमी नहीँ। एकदम नीरव अरण्य। वहाँ छोटी-सी नदी बहती थी। मैँ नदी के किनारे पत्थर पर बैठ गया। घर से दुपहर के अढ़ाई बजे निकला था। जब मैँने तिनके बहाने की प्रक्रिया शुरू की तब तक पौने चार हो रहे होँगे। पहले २० तिनके बहाने के बाद मुझे कुछ अजीब-सा लगने लगा। ऐसा लगा जैसे कोई मुझे देख रहा है। ऐसा भाव उत्पन्न होना बड़ी अजीब बात है। मेरा अनुभव ऐसा रहा है कि आमतौर पर ऐसा भाव उत्पन्न होता है, सच मेँ कोई न कोई देख रहा होता है। मैँने चारोँ तरफ देखा, कोई नहीँ था। मैँने तिनके फिर बहाने शुरू किये। चालीसवाँ तिनके बहने के बाद ऐसे लगा कि जैसे हवा चलनी बन्द हो गयी है और नदी के उस पार जो अमलतास का पेड़ है, वह अमलतास मुझे देख रहा है। ऐसा नहीँ कि पेड़ पर कोई हो, बल्कि लग रहा था कि पूरा पेड़ ही मुझे पीली आँखोँ से देख रहा है। मन कुछ घबराने लगा। फिर मन मेँ याद किया कि वीर तुम बढ़े चले, धीर तुम बढ़े चलो। खुद को ढाँढ़स देते हुए मैँने तिनके बहाने जारी रखा। अभी सत्तरवाँ तिनका बहने के बाद ऐसा लगा कि केवल सामने वाला अमलतास ही नहीँ चारो तरफ के पीपल, बरगद, नीम और बेल के पेड़ सब मुझे ही देख रहे हैँ। मेरे डरने का कोई जैविक कारण नहीँ था, हाँ पीपल के पेड़ की भूतोँ की सारी कथाएँ याद आ गयीँ। मुझे तन्त्र की किताब याद आने लगी, जिसमेँ लिखा था कि मन्त्र का अभ्यास बिना गुरु के नहीँ करना चाहिये। मैँने विचारा कि अब वापस लौट जाऊँ। फिर सोचने लगा कि इतने दिन की मेहनत बेकार जायेगी। आज निर्णय हो ही जाना चाहिये कि मन्त्र से फल मिलता भी है या नहीँ। मनुष्य के जीवन का उद्देश्य सत्य को जानने के सिवा और क्या है? यह सोच कर मैँ फिर नदी मेँ एक-एक कर के तिनके बहाने लगा। जब सौवाँ तिनका बहा, तब तक साढ़े पाँच बज गये होँगे। शाम ढलने लगी थी। भगवान् मार्तण्ड अस्ताचल को बढ़ चले थे। अब ऐसा लगने लगा कि नदी मेँ अन्दर से उबाल आने लगा है। लेकिन देखो तो नदी एकदम शान्त बही जा रही थी। कहीँ कोई हलचल नहीँ, पर मैँ स्पष्ट सुन सकता था कि जैसे कोई पानी पर छप-छप कर के मेरी तरफ चला आ रहा है। मैँने तय कि अब उठ जाना चाहिये। बिना गुरु के मन्त्र साधना ठीक नहीँ है। तभी मन मेँ विचार कौँधा, श्रीकृष्ण मेरे गुरु हैँ। काशी विश्वनाथ मेरे गुरु हैँ। मुझे किस बात का डर है? मैँ युवा हूँ, बलशाली हूँ, निरपराध हूँ, अच्छे कुल का हूँ, काली की कृपा मुझ पर है। पानी से निकलेगी तो मछली ही। यहाँ मगरमच्छ थोड़े ही आयेगा। मछली या मेढ़क को झट से पकड़ लिया जायेगा। इस उत्साह से वापस मैँ एक-एक करके तिनके बहाने लगा। एक सौ पाँच.. (कोई है), एक सौ छह.. (कोई आ रहा है), एक सौ सात...(एकदम पास आ गया है), एक सौ आठ...। जैसे ही मैँने एक सौ आठवाँ तिनका नदी के जल मेँ प्रवाहित किया, जिस पत्थर पर मैँ बैठा था उसके ठीक नीचे से एकदम से बड़ा गेहुँअन साँप निकल कर पानी मेँ सामने आ गया। मैँ एकदम से उछला और पीछे गिर पड़ा। उसके बाद वापस उठ कर मैँने सरपट भागना शुरू किया। करीब एक किलोमीटर तक मैँ दौड़ता रहा। बदहवासी मेँ कभी पीछे कभी इधर-उधर देखता मैँ एकदम से किसी से जा टकराया। घबराहट मेँ मैँने सामने वाले के कन्धे थाम लिये और धीरे-धीरे निढाल हो कर घुटनोँ पर बैठ गया।

     

कविराज ने हैरत से पूछा, “वीराने मेँ कौन आ गया?” मैँने कहा, “अरे, वह गुड़िया थी। नानी और माँ अचानक से मुझे ले कर परेशान हो गयी। दुपहर से ही मेरी खोज होने लगी थी। सभी इधर-उधर मुझे ढूँढ रहे थे। गुड़िया मुझे ढूँढते आ गयी थी। अन्धेरा छाने लगा था। जंगल मेँ क्या रोशनी, किसी तरह चाँद-सितारोँ से भरी रात मेँ खोये-खोये रास्तोँ से हम वापस घर पहुँचे। इस प्रकार मन्त्र-तन्त्र का विषय मेरे लिये अनिर्णीत ही रहा। तभी बैठक मेँ मेरी पत्नी ने प्रवेश किया। मैँने उससे कहा, “रत्ना, इनसे मिलिये। ये कविराज हैँ। दिल्ली मेँ ही रहते हैँ। मामा जी से मिलने आये हैँ। इनके लिये कुछ चाय-नाश्ता की व्यवस्था कीजिये।” श्रीमती जी ने कहा, “क्या आप लोग ऐसे बैठे हैँ? मैँ रेडियो पर गाने लगा देती हूँ। पाँच मिनट मेँ लाती हूँ चाय और नाश्ता।” मैँने खीज कर कहा, “गुड़िया, तुम्हेँ भी हर समय...।” मेरे कहते ही कविराज मुस्कुराने लगे। रेडियो पर हेमन्त कुमार और गीता दत्त का युगल गीत बजने लगा।

  

जिसपे चल रहे हैँ हम, है प्यार का ये रास्ता

चाँद और सितारोँ का, बहार का ये रास्ता

ले के क़रार आया है प्यार, क्या है अगर मेरा दिल गया

  मुझको तुम जो मिले, ये जहान मिल गया

   ये थी कल की बात!


दिनाङ्क: २३/०५/२०२६


सन्दर्भ: १. गीतकार – शैलेन्द्र, चित्रपट- डिटेक्टिव (१९५८)


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