रवि रंजन का आलेख 'सत्ता, स्मृति और संवेदना: दीप्ति कुशवाह के रंग विमर्श का समाजशास्त्रीय एवं सौन्दर्यशास्त्रीय मानचित्र'


दीप्ति कुशवाह


रंग जीवन को एक अलग अर्थ प्रदान करते हैं। अलग अलग रंगों की अलग अलग अर्थ छटा होती है। इंद्रधनुषी आभा से भरा सूर्य जीवन को अर्थवान बना देता है। रंगों के बिना दुनिया की कल्पना ही नहीं की जा सकती। और जब ये रंग किसी कवि की कविता में आते हैं तो इनके अर्थ कुछ और ही हो जाते हैं। दीप्ति कुशवाह की कविताओं में ये रंग अपने अर्थों में मुखर हो उठते हैं। इस तरह दीप्ति की कविताओं में रंग महज सौंदर्यपरक अवयव न रह कर सामाजिक संरचनाओं, वर्गीय चेतना और स्त्री-अस्तित्व के द्वंद्वों के व्याख्याकार बन जाते हैं। वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन दीप्ति की इन कविताओं के रंगों की तहकीकात करते हुए लिखते हैं "दीप्ति की इन कविताओं का चित्रकला से संबंध मात्र विषयगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक और संवेदनात्मक भी है, जहाँ शब्द कैनवास पर रंगों की परतों की तरह बिछते चले गए हैं। पूरी काव्य-श्रृंखला एक 'कलर पैलेट' की तरह काम करती है, जहाँ हर कविता एक स्वतंत्र चित्र है, फिर भी वे एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। कवयित्री ने जिस प्रकार पीले रंग को 'स्वर्ण के स्वप्न', 'हल्दी की थाली' और 'अमलतास के भरेपूरेपन' के बिंबों से रचा है, वह चित्रकला की उस प्रविधि की याद दिलाता है जहाँ एक ही रंग के विभिन्न 'शेड्स' के माध्यम से अलग-अलग मानवीय भावनाओं को उकेरा जाता है। नीले रंग की कविता में तो वे सीधे तौर पर कला-इतिहास के महान चितेरों पिकासो और वैन गॉग का आह्वान करती हैं। पिकासो की 'ब्लू पीरियड' वाली उदासी और वैन गॉग की 'स्टारी नाइट' की लहरदार गतिशीलता का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि इन कविताओं का सृजन-बीज चित्रकला की दृश्य-चेतना में गहराई से धंसा हुआ है। यहाँ नीला रंग केवल एक रंग नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था है जिसे कूची के स्पर्श की तरह शब्दों से छुआ गया है।" आमतौर पर आलोचक स्थापित कवियों की कविताओं को ही अपने आलोचना का विषय बनाते हैं। नए कवियों की कविताओं पर विमर्श का जोखिम वे नहीं उठाते। इसीलिए आलोचक एक बने बनाए खांचे में ही बंध कर रह जाते हैं। रवि रंजन यह जोखिम सफलतापूर्वक उठाते हैं और दीप्ति कुशवाह जैसी कवयित्री की कविताओं पर साधिकार बात करते हैं। यह आलोचना का वह नया रंग है जो अभी तक हिन्दी साहित्य में नदारद था। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख 'सत्ता, स्मृति और संवेदना: दीप्ति कुशवाह के रंग विमर्श का समाजशास्त्रीय एवं सौन्दर्यशास्त्रीय मानचित्र'।


'सत्ता, स्मृति और संवेदना: दीप्ति कुशवाह के रंग विमर्श का समाजशास्त्रीय एवं सौन्दर्यशास्त्रीय मानचित्र'


रवि रंजन


‘समालोचन’ (18 मार्च, 2026) में प्रकाशित दीप्ति कुशवाह की आठ कविताओं पर हिन्दी कविता के किसी भी संवेदनशील एवं प्रबुद्ध पाठक का ध्यान गए बगैर नहीं रह सकता। ‘एक अकेली आभा’, ‘अपनी तरह की एक ध्वनि’, ‘प्रश्न में चमकता हुआ’, ‘एक धीमा उजाला’, ‘देखने से बाहर’, ‘बीच का ताप’, ‘एक अनुपस्थिति की उपस्थिति’ और ‘एक अनकही तपिश’ शीर्षक इन कविताओं का पाठ एक ऐसा बहुआयामी कोलाज निर्मित करता है जहाँ रंग केवल दृश्य अनुभव न रह कर सत्ता, स्मृति, देह और समाज के जटिल अंतर्संबंधों का घोषणापत्र बन जाते हैं।


दीप्ति कुशवाह की इन कविताओं का समाजशास्त्रीय पक्ष अत्यंत सुदृढ़ है, जहाँ रंग महज सौंदर्यपरक अवयव न रह कर सामाजिक संरचनाओं, वर्गीय चेतना और स्त्री-अस्तित्व के द्वंद्वों के व्याख्याकार बन जाते हैं। ‘एक अकेली आभा’ शीर्षक पहली कविता पीले रंग के बहाने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामंती संस्कारों के बीच पिसते किसान परिवार की त्रासदी को उघाड़ती है, जहाँ 'हाथ पीले करना' एक उत्सव से अधिक आर्थिक ऋण का बोझ है। यह रंग यहाँ उस पूंजीवादी छलावे की ओर भी संकेत करता है जहाँ स्वर्ण के स्वप्न दिखाए जाते हैं, पर यथार्थ में वह अनाथालय की रातों जैसा उजाड़ और थका हुआ है।


‘अपनी तरह की एक ध्वनि’ शीर्षक दूसरी कविता बैंगनी रंग के माध्यम से लोकप्रिय संस्कृति और मध्यवर्गीय आकांक्षाओं के अंतर्संबंधों को टटोलती है, जहाँ 'दीदी तेरा देवर दीवाना' जैसे फिल्मी बिंब एक पूरी पीढ़ी की सामूहिक स्मृति और नमी को व्यक्त करते हैं। इसमें पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के बीच पनपने वाले उस 'निषिद्ध' और 'मौन प्रेम' की समाजशास्त्रीय पड़ताल है, जिसे समाज ने 'अस्वीकार' की जामुनी स्मृतियों में धकेल दिया है।


‘प्रश्न में चमकता हुआ’ शीर्षक तीसरी कविता नीले रंग के समाजशास्त्र को प्रकृति से छीन कर तकनीक और सत्ता के गलियारों में ले जाती है, जहाँ 'ब्लू रे' और 'स्क्रीन' मनुष्य की जैविक शांति को थकान में बदल रहे हैं। यहाँ नीला रंग राजकीय प्रतीकों, स्कूली वर्दियों और ध्वजों के माध्यम से अनुशासन और नियंत्रण की उस प्रक्रिया को दर्शाता है, जिसमें एक मुक्त रंग को विचारधाराओं की प्यास बुझाने के लिए 'बाँधा' गया है।


‘एक धीमा उजाला’ शीर्षक चौथी कविता काले रंग को हाशिए के समाज और अभाव की गरिमा से जोड़ती है, जहाँ यह रंग केवल शोक का नहीं बल्कि 'काले मेघा पानी दे' जैसे लोक-आवाहनों और कोयले की खदानों में खटते श्रम का प्रतीक है। यह कविता उस सामाजिक सीमा और 'लकीर' की शिनाख्त करती है जिसे पार करना वंचितों के लिए आज भी एक कठिन चुनौती है, साथ ही यह स्याही बन कर ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का माध्यम भी बनती है।


‘देखने से बाहर’ शीर्षक पाँचवीं कविता हरे रंग के बहाने आधुनिक राजनीति के 'क्रोमा' संस्कृति पर प्रहार करती है, जहाँ असलियत को ओझल कर संभावनाओं का भ्रम रचा जाता है। यह रंग खेत की मेड़ से कट कर बैनरों पर चमकने वाली उस विडंबना का साक्ष्य है जहाँ 'हरा' केवल एक नारा है, जबकि जमीन पर वह रिश्वत की तरह दबा हुआ है।


‘बीच का ताप’ शीर्षक छठी कविता नारंगी रंग के माध्यम से धार्मिक और राजनीतिक सत्ता के उन प्रतीकों का विश्लेषण करती है जहाँ 'विद्रोह' का लाल और 'साधना' का भगवा एक ही देह में जड़े हुए हैं। यह रंग सत्ता की पताकाओं और पिता को खो कर लौटे बेटे की अंतिम किरण के बीच के उस फासले को दिखाता है, जहाँ पवित्रता और राजनीति के अर्थ आपस में गुँथे हुए हैं।


‘एक अनुपस्थिति की उपस्थिति’ शीर्षक सातवीं कविता सफेद रंग के समाजशास्त्र को शुचिता और प्रतिरोध के बीच विन्यस्त करती है, जहाँ चरखे का सूत केवल वस्त्र नहीं बल्कि एक राजनीतिक विचार और प्रतिरोध की लय था। यह रंग अस्पताल की चादरों की ठंडी तटस्थता और समय के 'सफेद' होने के अनुभव के बीच उस वर्गहीन समाज की कल्पना करता है जो बिना पक्ष लिए सत्य की ऊँचाई पर टिकने का साहस रखता है। ‘एक अनकही तपिश’ शीर्षक अंतिम और आठवीं कविता लाल रंग के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समाजशास्त्र को व्यक्त करती है, जहाँ यह रंग लाल किले के इतिहास से ले कर स्त्री की माँग की उस सूक्ष्म रेखा तक फैला है जिसे रूढ़ियों ने प्रतीकों में बदल दिया। यहाँ लाल रंग जनपथ पर उमड़ते नारों और शर्म की निजी लोकधुन के बीच उस 'तपिश' का नाम है जो समाज की धमनियों में बिना किसी नाम के प्रवाहित हो रही है। इस प्रकार ये कविताएँ रंगों के भौतिक संसार से निकलकर हमारे समय के राजनैतिक और सामाजिक भूगोल का एक सूक्ष्म मानचित्र तैयार करती हैं।


दीप्ति की इन कविताओं का चित्रकला से संबंध मात्र विषयगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक और संवेदनात्मक भी है, जहाँ शब्द कैनवास पर रंगों की परतों की तरह बिछते चले गए हैं। पूरी काव्य-श्रृंखला एक 'कलर पैलेट' की तरह काम करती है, जहाँ हर कविता एक स्वतंत्र चित्र है, फिर भी वे एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। कवयित्री ने जिस प्रकार पीले रंग को 'स्वर्ण के स्वप्न', 'हल्दी की थाली' और 'अमलतास के भरेपूरेपन' के बिंबों से रचा है, वह चित्रकला की उस प्रविधि की याद दिलाता है जहाँ एक ही रंग के विभिन्न 'शेड्स' के माध्यम से अलग-अलग मानवीय भावनाओं को उकेरा जाता है। नीले रंग की कविता में तो वे सीधे तौर पर कला-इतिहास के महान चितेरों पिकासो और वैन गॉग का आह्वान करती हैं। पिकासो की 'ब्लू पीरियड' वाली उदासी और वैन गॉग की 'स्टारी नाइट' की लहरदार गतिशीलता का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि इन कविताओं का सृजन-बीज चित्रकला की दृश्य-चेतना में गहराई से धंसा हुआ है। यहाँ नीला रंग केवल एक रंग नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था है जिसे कूची के स्पर्श की तरह शब्दों से छुआ गया है।


वान गॉग की 'स्टारी नाइट'


गौरतलब है कि ‘प्रश्न में चमकता हुआ’ कविता नीले रंग के जिस दार्शनिक और राजनीतिक विस्तार की पड़ताल करती है, उसमें पाब्लो पिकासो और विन्सेंट वैन गॉग का उल्लेख मात्र कला-इतिहास की स्मृतियों का पुनरुद्धार नहीं है, बल्कि यह रंग की स्वायत्तता और उसके 'संस्थाकरण' (Institutionalization) के बीच के संघर्ष को उद्घाटित करने का एक सशक्त औजार है। कवयित्री जब कहती हैं कि 


"यह 

रंग 

पिकासो की उदासी में गहराता था 

और वैन गॉग की ‘स्टारी नाइट’ में


लहरों की तरह बहता रहा", तो वे नीले रंग को उसकी प्रकृति (आकाश और समुद्र) से निकाल कर मानवीय संवेदना और कलात्मक विद्रोह के धरातल पर प्रतिष्ठित करती हैं।


पिकासो का उल्लेख यहाँ उनके प्रसिद्ध ‘ब्लू पीरियड’ (Blue Period) के संदर्भ में है। 1901 से 1904 के बीच पिकासो ने अपने एक करीबी मित्र की आत्महत्या के बाद गहरे अवसाद में केवल नीले और नीले-हरे रंगों में चित्र बनाए थे। पिकासो के लिए नीला रंग केवल एक वर्ण नहीं था, बल्कि वह गरीबी, अकेलेपन, वंचना और अगाध मानवीय शोक का पर्याय बन गया था। कविता में पिकासो का संदर्भ यह स्पष्ट करता है कि नीला रंग ऐतिहासिक रूप से व्यक्ति की आंतरिक एकांतता और 'निजी त्रासदी' का वाहक रहा है। यह वह नीलापन है जो मन की गहराइयों से उपजता है और जिसमें एक प्रकार की गरिमापूर्ण उदासी समाहित है।


वहीं, वैन गॉग की ‘स्टारी नाइट’ (The Starry Night) का उल्लेख रंग की गतिशीलता और उसकी 'बेचैनी' को प्रदर्शित करता है। वैन गॉग ने जब यह चित्र बनाया, तब वे स्वयं मानसिक चिकित्सालय में थे। उनके चित्रों में नीला रंग स्थिर नहीं है, वह "लहरों की तरह बहता" हुआ एक ब्रह्मांडीय उथल-पुथल को दर्शाता है। यहाँ नीले रंग का औचित्य उस रचनात्मक 'पागलपन' और ऊर्जा से है जो सीमाओं को स्वीकार नहीं करती। पिकासो और वैन गॉग—इन दोनों महान कलाकारों के माध्यम से कवयित्री यह स्थापित करती हैं कि नीला रंग मूलतः एक 'मुक्त' और 'आत्मनिष्ठ' (Subjective) अनुभव था, जो कलाकार की चेतना के साथ अपनी भावना बदल लेता था।


इन दोनों के उल्लेख का सबसे गहरा औचित्य कविता के अगले हिस्से में खुलता है, जहाँ कवयित्री नीले रंग के इस 'कलात्मक और मुक्त' अतीत की तुलना उसके 'वर्तमान' और 'विज्ञापित' रूप से करती हैं। एक ओर पिकासो और वैन गॉग की वह असीम संवेदना है, और दूसरी ओर आधुनिक युग की "ब्लू रे की किरच" जो आँखों में जलन पैदा करती है, या फिर "स्कूली वर्दी" और "ध्वजों" में बाँधा गया अनुशासित नीला रंग है। पिकासो की उदासी और वैन गॉग की लहरों का सन्दर्भ यहाँ एक 'बेंचमार्क' की तरह कार्य करता है, जो यह दिखाता है कि कैसे एक रंग, जो कभी आत्मा की पुकार था, अब सत्ता, तकनीक और विचारधाराओं के द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है।


वस्तुत: पिकासो और वैन गॉग का सन्दर्भ इस कविता में 'विस्मृति के विरुद्ध स्मृति' का काम करता है। यह याद दिलाता है कि नीले रंग की असली 'नीलम सी गहराई' अंगूठी के पत्थर में नहीं, बल्कि उस मानवीय संताप और सृजनशीलता में थी जिसे अब "ध्वजों में, कविताओं में" बाँध कर उसका राजकीयकरण कर दिया गया है। यह उल्लेख उस "प्यास" को और अधिक गहरा बनाता है जिसके लिए अंत में कवयित्री किसी शब्द की तलाश करती हैं—ऐसी प्यास जो स्क्रीन के डिजिटल नीलेपन से नहीं, बल्कि कला की उस आदिम और सच्ची संवेदना से बुझती है जिसका प्रतिनिधित्व पिकासो और वैन गॉग करते हैं।


The Old Guitarist,” 1903-04.
One of Picasso’s most famous paintings, it is displayed at the Art Institute of Chicago. It is a part of the Helen Birch Bartlett Memorial Collection.
Image courtesy of: New City Art


कविता में चित्रकला की 'क्रोमा' तकनीक और 'ब्लैक' फिल्म के दृश्यात्मक अंधेरे का उपयोग यह दर्शाता है कि कवयित्री आधुनिक दृश्य-कला (विजुअल आर्ट्स) की बारीकियों से भलीभाँति परिचित हैं। ‘देखने से बाहर’ कविता में हरे रंग और ख़ास तौर से 'क्रोमा' का उल्लेख उस कृत्रिमता और यथार्थ के लोप को दर्शाता है जो समकालीन दृश्य-संस्कृति की बड़ी विडंबना है। जिस तरह एक चित्रकार 'नेगेटिव स्पेस' का उपयोग करता है, उसी तरह दीप्ति कुशवाह 'सफ़ेद' रंग को एक 'अनुपस्थिति की उपस्थिति' के रूप में चित्रित करती हैं—एक ऐसा ख़ाली कैनवास जिस पर समय अपनी सबसे धीमी लिपि में लिखता है। यहाँ सफ़ेद रंग केवल पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह चरखे के सूत और अस्पताल की चादरों के बीच एक वैचारिक बनावट (टेक्सचर) पैदा करता है।


नारंगी और लाल रंगों का चित्रण करते समय कवयित्री की शैली 'इम्प्रेशनिस्ट' (प्रभाववादी) चित्रकारों जैसी हो जाती है, जहाँ प्रकाश और ताप का खेल मुख्य होता है। 'पारिजात की सफेद देह का नारंगी तंतु से बँधना' या 'पिता को खो कर लौटे बेटे पर सूरज की अंतिम नारंगी किरण का पड़ना'—ये ऐसे बिंब हैं जो आँखों के सामने एक जीवंत 'लैंडस्केप' रच देते हैं। लाल रंग की कविता में 'बीरबहूटी' और 'लाल किले' का उल्लेख रंगों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूगोल को एक व्यापक कैनवास पर फैला देता है। चित्रकला में जिस प्रकार रंगों का परस्पर विरोधी संयोजन (कॉन्ट्रास्ट) तनाव पैदा करता है, इन कविताओं में भी मांगलिक पीले और अभाव के गिरवी रखे जेवरों के बीच का तनाव वही प्रभाव उत्पन्न करता है। अंततः, ये कविताएँ पाठक को केवल पढ़वाती नहीं हैं, बल्कि उसे एक आर्ट गैलरी से गुज़ारती हैं जहाँ हर कविता एक 'फ्रेम' की तरह है, जिसमें स्त्री-जीवन की जटिलताओं को रंगों के माध्यम से 'पेंट' किया गया है। यह शब्दों द्वारा रची गई एक ऐसी चित्रशाला है जहाँ कविता अपनी शाब्दिक मर्यादा लाँघ कर एक मुकम्मल दृश्य-कला बन जाती है।


‘इम्प्रेशनिज्म’ या प्रभाववादी कला दृष्टि के सन्दर्भ में निवेदन है कि यह आंदोलन पारंपरिक चित्रण पद्धतियों के विरुद्ध एक विद्रोह के रूप में उभरा था। जहाँ शास्त्रीय कला में रेखाओं की स्पष्टता और वस्तुनिष्ठ यथार्थ पर बल दिया जाता था, वहीं ‘प्रभाववाद’ ने 'क्षण' की महत्ता को प्रतिपादित किया। इसका मूल सिद्धांत यह है कि कोई भी वस्तु अपने आप में स्थिर रंग या रूप नहीं रखती, बल्कि वह उस पर पड़ने वाले प्रकाश और वातावरण की उपज होती है। आपके द्वारा उद्धृत 'नारंगी तंतु' या 'सूरज की अंतिम किरण' जैसे बिंब इसी दर्शन को पुष्ट करते हैं, जहाँ कवि या चित्रकार वस्तु को नहीं, बल्कि उस पर पड़ने वाले प्रकाश के 'प्रभाव' को चित्रित कर रहा है।


तकनीकी धरातल पर प्रभाववाद 'ऑप्टिकल मिक्सिंग' (Optical Mixing) के सिद्धांत पर कार्य करता है। इसमें रंगों को कैनवास पर आपस में पूरी तरह मिलाया नहीं जाता, बल्कि पास-पास छोटे-छोटे 'ब्रश स्ट्रोक्स' के रूप में लगाया जाता है। दूर से देखने पर दर्शक की आँखें स्वयं उन रंगों को मिला कर एक नया शेड निर्मित कर लेती हैं। दीप्ति कुशवाह की कविता के संदर्भ में भी जब 'बीरबहूटी' के लाल या 'पारिजात' की सफेदी का उल्लेख होता है, तो पाठक का मस्तिष्क उन रंगों के माध्यम से एक ऊष्मा या शीतलता का अनुभव स्वयं करने लगता है। यह तकनीक वास्तविकता के दस्तावेजीकरण के बजाय मानवीय संवेदना की स्मृति और तात्कालिक बोध को अधिक महत्त्व देती है।


प्रभाववाद का एक अन्य महत्वपूर्ण सैद्धांतिक स्तंभ है—'एन प्लेन एयर' (En plein air) यानी खुले आसमान के नीचे चित्रण। चित्रकारों ने स्टूडियो की कृत्रिम रोशनी को त्याग कर सूरज की बदलती हुई स्थितियों का पीछा किया। यही कारण है कि प्रभाववादी कृतियों में समय का एक गतिशील प्रवाह दिखाई देता है। दीप्ति की कविता में 'सूरज की अंतिम नारंगी किरण' का उदाहरण इसी गतिशीलता को दर्शाता है, जहाँ प्रकाश का एक क्षणिक स्पर्श पूरे दृश्य के मनोविज्ञान को बदल देता है। यहाँ रंग केवल दृश्य गुण नहीं रह जाते, बल्कि वे ताप, समय और यहाँ तक कि मृत्यु या विछोह जैसी मानवीय स्थितियों के संवाहक बन जाते हैं।


वस्तुत: प्रभाववाद में रंगों का विरोधाभास (Contrast) केवल सौंदर्यपरक चयन नहीं, बल्कि भावनात्मक तनाव की अभिव्यक्ति हुआ करता है। जैसा कि दीप्ति कुशवाह ने अपनी कविता में —मांगलिक पीले और अभाव के गिरवी रखे जेवरों के बीच का तनाव –का उल्लेख किया है। सैद्धांतिक रूप से प्रभाववाद पूरक रंगों (Complementary colors) के प्रयोग द्वारा दृश्य में एक जीवंत स्पंदन पैदा करता है। जब एक चमकदार रंग के पास उसका विरोधी या गहरा रंग रखा जाता है, तो वह दृश्य केवल सपाट नहीं रहता, बल्कि उसमें एक आंतरिक संघर्ष या दृश्यगत तनाव (विजुअल टेंशन) पैदा होता है। दीप्ति जी की कविता में जब सांस्कृतिक वैभव (लाल किला) और व्यक्तिगत अभाव (गिरवी जेवर) एक साथ आते हैं, तो वे वही प्रभाव पैदा करते हैं जो चित्रकला में प्रकाश और छाया के तीखे मेल से उत्पन्न होता है। यह कला दृष्टि दर्शक या पाठक को केवल बाहरी सौंदर्य नहीं दिखाती, बल्कि उसे उस क्षण विशेष की संवेदना में पूरी तरह डुबो देती है।


दीप्ति कुशवाह की ये कविताएँ रंगों के भौतिक आवरण को छील कर उनके भीतर छिपे उस स्त्री-समय को बाहर लाती हैं, जो अक्सर हाशिए पर या मौन की परतों में दबा रहता है। इन कविताओं का आलोचनात्मक विश्लेषण स्पष्ट करता है कि यहाँ रंग केवल प्रकृति के अवयव नहीं, बल्कि स्त्री की सामाजिक स्थिति और उसकी मुक्ति की आकांक्षा के जीवंत रूपक हैं। पीला रंग यहाँ केवल मांगलिक नहीं है, बल्कि पितृसत्तात्मक समाज की उस विसंगति को उघाड़ता है जहाँ स्त्री के ‘हाथ पीले’ करने की कीमत किसान का खेत और माँ के जेवर गिरवी रखकर चुकानी पड़ती है। यहाँ स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा उस ‘गुहार’ में छिपी है जो वसीयत के सरकारी कागज़ों पर नहीं, बल्कि मन की पीली पड़ चुकी स्मृतियों में दर्ज है। कवयित्री जब कहती हैं कि 


पीला हमेशा नत है अमलतास

अपने भरे-पूरेपन में भी

जैसे भीतर कोई क्षमा माँगता हो, 


तो वे स्त्री के उस पारंपरिक संस्कार पर चोट करती हैं जहाँ उसे पूर्ण हो कर भी सदैव अपराधबोध या झुकने की मुद्रा में रखा गया है।


‘अपनी तरह की एक ध्वनि’ कविता में बैंगनी रंग के चित्रण से स्त्री-जीवन की विसंगति और अधिक मुखर होती है, जहाँ फ़िल्मी ‘लोकप्रिय संस्कृति’ की चमक के पीछे एक पूरी पीढ़ी की नमी और चुप्पी दबी हुई है। यहाँ मुक्ति की आकांक्षा उस ‘निषिद्ध स्पर्श’ और ‘मौन प्रेम’ की भाषा में व्यक्त हुई है, जिसे तटों पर जगह नहीं मिली। कवयित्री स्पष्ट करती हैं कि जो स्त्री सिर्फ़ सुनी जाती थी/ समझी नहीं गई, उसने अपने उत्तर खुद गढ़ लिए हैं। यह ‘स्वयं उत्तर गढ़ना’ ही स्त्री-मुक्ति का वह बिंदु है जहाँ वह समाज द्वारा थोपी गई परिभाषाओं को अस्वीकार कर अपनी सत्ता का निर्माण करती है। नीले रंग के विश्लेषण में वे दिखाती हैं कि कैसे स्त्री के निजी आकाश को ‘स्क्रीन’ और ‘वर्दी’ के अनुशासनों में बाँधा गया है। यहाँ मुक्ति की छटपटाहट उस प्यास में है जिसे कोई शब्द नहीं बुझा पाता, अर्थात स्त्री की आकांक्षाएँ अभी भी भाषा और व्यवस्था की पकड़ से बाहर हैं।


काले रंग के माध्यम से कवयित्री स्त्री-मुक्ति को स्मृति और ज्ञान के अधिकार से जोड़ती हैं। पति के पुराने स्वेटर में धड़कते समय को महसूस करना और ‘ब्लैक’ की रानी मुखर्जी की तरह अक्षरों से पहले अँधेरे को पढ़ना, उस स्त्री-चेतना की गवाही है जो प्रतिकूलताओं के बीच भी अपनी ऊष्मा बनाए रखती है। यहाँ काला रंग शोक नहीं, बल्कि वह स्लेट और स्याही है जो ‘आखर के उजाले’ बाँटती है। इसी प्रकार, हरे रंग की कविता में वे उस राजनीतिक विसंगति को बेनकाब करती हैं जहाँ ‘क्रोमा’ की तरह स्त्री के सच को गायब कर दिया जाता है। यहाँ मुक्ति की आकांक्षा उस ‘हरी घास’ के नैसर्गिक आलिंगन में है, जहाँ वह किसी बैनर या नारे का हिस्सा बनने के बजाय पृथ्वी के वास्तविक स्पर्श को महसूस करना चाहती है।


सफ़ेद और लाल रंगों के बहाने दीप्ति ने ‘एक अनुपस्थिति की उपस्थिति’ तथा ‘एक अनकही तपिश’ जैसी कविताओं में स्त्री-जीवन के सबसे गहरे अंतर्विरोधों को छुआ है। सफ़ेद रंग जहाँ उस ‘अश्रुपूर्ण संधि’ का प्रतीक है जिसे स्त्रियाँ अक्सर परिवार और समाज को बचाए रखने के लिए करती हैं, वहीं लाल रंग उस ‘माँग की सूक्ष्म रेखा’ की त्रासदी है जहाँ प्रेम तो अमर रहता है पर उसके प्रतीक रूढ़ियाँ छीन लेती हैं। लाल रंग की कविता में मुक्ति का स्वर उस ‘विद्रोह के अनकहे स्वर’ और ‘लाल टीन की छत’ के अकेलेपन में है, जहाँ स्त्री अपनी स्मृति की गिरहें खुद खोलती है। इन कविताओं में मुक्ति का अर्थ किसी बाहरी शोर या नारेबाज़ी में नहीं, बल्कि रंगों की तरह अपनी विशिष्ट आभा को सहेजने और व्यवस्था द्वारा दिए गए अर्थों के समानांतर अपने ‘स्वयं के अर्थ’ खोजने में है। दीप्ति कुशवाह की ये रचनाएँ इस बात की पुख्ता तस्दीक करती हैं कि स्त्री-मुक्ति की राह उसके अंतर्मन की गहराइयों और उन छोटी-छोटी वस्तुओं के प्रेम से हो कर गुज़रती है जिन्हें पुरुष-सत्ता ने प्रायः महत्त्वहीन मान कर छोड़ दिया था।


इन कविताओं का गहन विश्लेषण करने के लिए हमें सौंदर्यशास्त्र के पारंपरिक खाँचों से बाहर निकल कर समकालीन विमर्शों के विभिन्न निकषों पर इन्हें परखना ज़रूरी है।


'पीले रंग' पर केंद्रित कविता 'एक अकेली आभा' सौंदर्यशास्त्र और समाजशास्त्र के एक मर्मस्पर्शी द्वंद्व को प्रतिध्वनित करती है। संरचनावादी दृष्टि से विश्लेषण करें तो यहाँ 'पीला' केवल एक रंग नहीं, बल्कि एक बहुअर्थी चिह्न (Signifier) है, जिसके अभिधेयार्थ (Denotation) और लक्षितार्थ (Connotation) सामाजिक-आर्थिक संदर्भों के साथ निरंतर विस्थापित होते रहते हैं। भारतीय सांस्कृतिक मानस में 'हाथ पीले करना' विवाह और मांगलिकता की एक सुदृढ़ संरचना है, किंतु कवयित्री इस पारंपरिक संरचना का विखंडन (Deconstruction) करते हुए उसके भीतर दबी हुई आर्थिक त्रासदी को अनावृत करती हैं। यहाँ पीला रंग अपनी मांगलिक आभा खो कर 'गिरवी रखे जेवरों' और 'अभाव' की विद्रूपता का पर्याय बन जाता है। कवयित्री यह रेखांकित करती हैं कि कैसे एक ही रंग उत्सव के उल्लास और गरीबी की जर्द (पीली) हकीकत के बीच झूलता रहता है। इस प्रकार, यह कविता रंग के माध्यम से समाज के उस क्रूर विरोधाभास को उजागर करती है जहाँ रीति-रिवाजों का 'स्वर्ण आभा' वाला सौंदर्य, वर्ग-चेतना और आर्थिक विषमता के धरातल पर आकर फीका पड़ जाता है। दीप्ति लिखती हैं— 


"जब 

कहीं ‘हाथ पीले’ करने कहे गए 

तो किसी किसान ने 

अपना खेत गिरवी रखा 

किसी माँ ने अपने जेवर"। 


यहाँ पीला रंग 'मांगलिकता' के बाइनरी अपोजिट 'दरिद्रता' और 'ऋण' को सामने लाता है। मार्क्सवादी समाजशास्त्र के निकष पर यह रंग उस 'एक्सचेंज वैल्यू' का प्रतीक बन जाता है जहाँ एक स्त्री का सामाजिक भविष्य (विवाह) किसान की उत्पादन क्षमता (खेत) की बलि माँगता है।


कवयित्री इस रंग को 


"स्वर्ण 

के स्वप्न में चुपचाप उगा रंग 

जो मन का छलावा भी है 

व्याधि का संकट भी" 


कह कर इसके दार्शनिक पक्ष को उघाड़ती हैं। उत्तर-संरचनावादी परिप्रेक्ष्य में यह रंग एक स्थिर अर्थ नहीं रखता। यह मंदिर में 'आसन' की तरह पवित्र है, तो अनाथालय में "वह बल्ब है/ जो अनाथालय की रातों में/ नींद की जगह जलता है"। यहाँ पीला रंग यथास्थिति (स्टेटस क्वो) के विरुद्ध एक गवाही है। 'पीली छतरी वाली लड़की' का बिंब इस रंग को एक बौद्धिक एकांत प्रदान करता है, जहाँ वह "एक किताब अपने भीतर पढ़ती है"। अंततः यह कविता उस पीले कागज के टुकड़े पर समाप्त होती है जिस पर वसीयत नहीं बल्कि "बस एक गुहार लिखी गई थी"। यह 'गुहार' ही इस कविता का वह विखंडनवादी मोड़ है जो सत्ता के विमर्श (वसीयत) को विस्थापित कर मानवीय संकट (गुहार) को केंद्र में लाता है।


'अपनी तरह की एक ध्वनि' शीर्षक कविता बैंगनी रंग के माध्यम से चित्रकला और संगीत के ऐंद्रिय संमिश्रण ('सिनस्थेसिया) का एक विलक्षण संसार रचती है। यहाँ रंग केवल दृश्य बिंब नहीं है, बल्कि इंद्रधनुषीय विस्तार से गुजर कर आत्मा की गहराइयों में एक कंपन की तरह उतरता है। स्त्रीवादी चिंतन प्रणाली के आलोक में यह कविता उस 'मौन' की स्वायत्त भाषा गढ़ती है, जिसे मुख्यधारा के विमर्श ने सदैव हाशिए पर रखा है। कवयित्री जब "दो स्त्रियों के मौन प्रेम की भाषा" की बात करती हैं, तो वे वस्तुतः 'क्वीर थ्योरी' और निषिद्ध कामनाओं के उस भूगोल को स्वर देती हैं, जिसे उन्होंने फिल्म 'पर्पल सी' (मूल Viola di mare) के रूपक से अभिव्यक्त किया है। वे लिखती हैं, "जो तटों पर नहीं/ एक निषिद्ध स्पर्श में बहती रहीं"; यह पंक्ति सामाजिक सीमाओं के अतिक्रमण और देह की वर्जनाओं से जूझती एक तरल अस्मिता का साक्ष्य है। बैंगनी की गहराइयों में एक ऐसी जैविक स्मृति भी अनुगूँजित होती प्रतीत होती है, जिसका संकेत Viola di mare के सांकेतिक संसार में मिलता है, जहाँ समुद्री जीवन की कुछ प्रजातियाँ, जैसे Mediterranean rainbow wrasse, अपने अस्तित्व में लिंग को एक स्थिर परिभाषा नहीं मानतीं। यह अंतर्ध्वनि कविता को एक और आयाम देती है, जहाँ पहचान किसी एक रूप में बँधी न रह कर, लहरों की तरह बदलती, लौटती और स्वयं को पुनर्गठित करती रहती है।


Mediterranean rainbow wrasse


यहाँ जामुनिया रंग "एक अस्वीकार की स्मृति" बन जाता है, जिसे वह स्त्री अपनी आँखों में सहेजे फिरती है—एक ऐसी स्मृति जो "सिर्फ़ सुनी जाती थी/ समझी नहीं गई"। मिशेल फूको के दर्शन के आधार पर विश्लेषण करें तो 'सुनने' और 'समझने' के मध्य की यह फाँस दरअसल 'ज्ञान-सत्ता' (Power-Knowledge) का द्वंद्व है। पितृसत्तात्मक ढांचे ने स्त्री को एक 'ध्वनि' या 'वस्तु' के रूप में सुना तो सही, किंतु एक 'कर्ता' (Subject) के रूप में उसकी चेतना को समझने से इनकार कर दिया।


कविता का उपसंहार उस स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा का उत्सव है, जिसने "अपने उत्तर खुद गढ़ लिए/ रंगों की तरह"। यहाँ एक स्पष्ट उत्तर-संरचनावादी (Post-structuralist) मोड़ दिखाई देता है, जहाँ अर्थ अब किसी बाहरी सत्ता या परंपरा द्वारा थोपा नहीं जाता, बल्कि व्यक्ति अपनी अस्मिता और सत्य का सृजन स्वयं अपनी शर्तों पर करता है। कलात्मक प्रविधि की दृष्टि से यह कविता 'प्रभाववाद' (Impressionism) के उस शिल्प के निकट है, जहाँ यथार्थ को ठोस और स्पष्ट रेखाओं में बाँधने के बजाय रंगों के धब्बों, 'नमी' और प्रकाश के खेल से एक अमूर्त प्रभाव पैदा किया जाता है। यहाँ रंग केवल धरातल पर नहीं, बल्कि संवेदना के आकाश में अपनी अर्थछवियाँ बिखेरते हैं।


'प्रश्न में चमकता हुआ' शीर्षक कविता हमारे समय में व्याप्त डिजिटल पैनोप्टिकॉन (Digital Panopticon) के साथ-साथ सैद्धांतिक स्तर पर मिशेल फूको के 'निगरानी और दंड' (Discipline and Punish) दर्शन का एक मर्मस्पर्शी काव्यात्मक विस्तार है। नीला रंग, जो कभी आकाश की अनंतता और मुक्ति का प्रतीक था, अब "एक स्क्रीन से झाँकता हुआ/ आँखों में जलन छोड़ जाता है"। यहाँ 'ब्लू रे' (नीली किरणें) केवल एक प्रकाश तरंग नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के लिए निरंतर निगरानी, थकान और अदृश्य नियंत्रण का औजार बन गई हैं। कवयित्री नीले रंग के राजकीयकरण और संस्थागत नियंत्रण की ओर सूक्ष्म संकेत करती हैं


"नीला 

खुला भी था 

पर बाँधा गया 

ध्वजों में, कविताओं में"। 


यहाँ 'ध्वज' और 'वर्दी' उस अनुशासन के प्रतीक हैं, जो व्यक्ति की सहज स्वायत्तता को सोख कर उसे एक 'आज्ञाकारी देह' (Docile Body) में तब्दील कर देते हैं।


विखंडनवादी दृष्टि से विश्लेषण करें तो कविता का नीला रंग पिकासो की उदासी (Blue Period) और वैन गॉग की 'स्टारी नाइट' की कलात्मक बेचैनी से संधान करता है, किंतु अंततः यह "स्कूली वर्दी" और "प्रभु के रंग" के बीच एक वैचारिक अंतर्विरोध उत्पन्न करता है। यहाँ नीलापन अब तरलता नहीं, बल्कि "शंख पर जमे/ पुरातन समुद्र के सूखे नीलेपन" की तरह जड़ और रूढ़ हो चुका है।


कवयित्री का यह अनुत्तरित प्रश्न— 


"क्या कोई शब्द है 

जो इस रंग के भीतर की प्यास को बुझा सके?"


—उस मौलिक मानवीय तृष्णा की ओर संकेत है जिसे तकनीक और विचारधाराओं के बंद घेरे कभी तृप्त नहीं कर सकते। यह 'नीलम सी गहराई' अब अंगुली की अंगूठी का बाह्य आभूषण नहीं, बल्कि मन के अंधे कोने में जड़ी एक ऐसी टीस है, जो आधुनिक मनुष्य के आंतरिक अलगाव (Alienation) का सौंदर्यशास्त्रीय साक्ष्य प्रस्तुत करती है। यह कविता दर्शाती है कि कैसे सत्ता और तकनीक ने मिलकर एक रंग के 'आकाश' को छीन कर उसे एक 'स्क्रीन' और 'अनुशासन' में सीमित कर दिया है।


'एक धीमा उजाला' शीर्षक कविता काले रंग के पारंपरिक सौंदर्यबोध का एक रेडिकल विखंडन (Deconstruction) प्रस्तुत करती है। पश्चिमी और भारतीय दोनों ही सांस्कृतिक विमर्शों में काला रंग प्रायः मृत्यु, अवसाद, अज्ञान या 'अशुभ' के एक स्थिर चिह्न (Signifier) के रूप में रूढ़ रहा है। किंतु दीप्ति कुशवाह इस रंग को एक नितांत निजी और आत्मीय 'टेक्सचर' प्रदान करती हैं। वे इसे "एक पुराना स्वेटर है पति का/ अलमारी में टंगा अब भी" कह कर इसे मृत्यु की शीतलता से खींच कर जीवन की ऊष्मा और 'टैक्टाइल' (स्पर्शजन्य) स्मृति में रूपांतरित कर देती हैं। यहाँ काला रंग शोक की जड़ता नहीं, बल्कि उस समय की धड़कन है जो 'छाती के पास' आज भी जीवंत है।


संरचनावादी निकष पर देखें तो यह कविता काले और सफ़ेद की बाइनरी (Binary Oppositions) को ध्वस्त कर देती है। पारंपरिक रूप से 'श्वेत' को ज्ञान और 'श्याम' को अज्ञान माना गया है, परंतु यहाँ काला रंग "स्लेट बन कर/ आखर के उजाले बाँटे" की भूमिका में उभरता है। यहाँ काला रंग वह 'आधार' (Canvas) है, जिसके बिना रोशनी या ज्ञान का कोई अस्तित्व संभव नहीं है। यह उत्तर-संरचनावादी (Post-structuralist) मोड़ है, जहाँ केंद्र और हाशिए के संबंध उलट जाते हैं।


समाजशास्त्रीय धरातल पर यह रंग श्रम और लोक-चेतना का भूगोल रचता है। यह "कोयले की खदान से निकला" पसीने और संघर्ष का रंग है, जो पूंजीवादी चमक-दमक के विपरीत उस आधारभूत ऊर्जा का प्रतीक है जिससे दुनिया चलती है। इसके साथ ही, यह "काले मेघा/ पानी दे" की लोक-पुकार के माध्यम से प्रकृति और मनुष्य के आदिम जुड़ाव को स्वर देता है, जिसे "धरती की प्यास ने रचा था"। यहाँ कालापन अभाव का नहीं, बल्कि सृजन की संभावना और जीवनदायी वर्षा का वाहक है।


मिशेल फूको 


मिशेल फूको के 'प्रतिरोध' (Resistance) के सिद्धांत के आलोक में कविता का एक और आयाम खुलता है। जब कवयित्री 'काली पट्टी' को "असहमत की चुप घोषणा" कहती हैं, तो वे संकेत करती हैं कि जहाँ 'सत्ता' (Power) होती है, वहीं 'प्रतिरोध' भी जन्म लेता है। यहाँ मौन और कालापन निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक वक्तव्य है। यह उस 'प्रच्छन्न भाषा' की तरह है जो व्यवस्था की आँखों में आँखें डालकर अपनी अस्वीकृति दर्ज कराती है।


अंततः, 'ब्लैक' फिल्म के संदर्भ से अंधेरे को 'अक्षरों से पहले पढ़ने' की जो बात कविता में आई है, वह यूरोपीय 'प्रबोधन विमर्श' (Enlightenment discourse) को एक गंभीर चुनौती देती है। मुख्यधारा का दर्शन 'रोशनी' को ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत मानता रहा है, जबकि यह कविता 'अंधेरे' को एक वैकल्पिक ज्ञान-मीमांसा (Alternative Epistemology) के रूप में प्रस्तावित करती है। यह उस अंतर्दृष्टि की पहचान है जो आँखों की रोशनी न होने पर भी संसार को उसकी समग्रता और संवेदना में 'पढ़' सकती है। इस प्रकार, काला रंग यहाँ अंधकार का पर्याय न रहकर एक ऐसे 'धीमे उजाले' में बदल जाता है, जो भीतर से फूटता है।


'देखने से बाहर' शीर्षक कविता हरे रंग के बहाने हमारे समकालीन सत्यातीत (Post-truth) युग और डिजिटल यथार्थ की एक तीखी मीमांसा है। यहाँ कवयित्री ने 'क्रोमा' (Chroma) तकनीक को एक गहरे राजनीतिक और दार्शनिक रूपक के रूप में प्रयुक्त किया है। क्रोमा वह तकनीक है जहाँ पीछे का 'हरा पर्दा' किसी भी कृत्रिम यथार्थ को आरोपित करने के लिए उपयोग किया जाता है; कविता में यह उस राजनीतिक छलावे का प्रतीक बन जाता है जहाँ सत्ताएँ और व्यक्ति "अपने सबसे अंतरंग सच को/ क्रोमा की तरह गायब कर देते हैं"। यह उस दौर की शिनाख्त है जहाँ यथार्थ अब मौलिक नहीं रहा, बल्कि उसे तकनीकी रूप से निर्मित (Manufactured) किया जा रहा है।


समाजशास्त्रीय धरातल पर यह कविता उस भयावह 'डिसकनेक्ट' या विच्छेद को उजागर करती है, जहाँ 'हरा रंग' नारों, विज्ञापनों और राजनीतिक बैनरों पर तो प्रचुरता में चमकता है, किंतु वास्तविक "खेत की मेड़ तक/ उसकी छाया नहीं पहुँचती"। यह विकास के उस छद्म को बेनकाब करती है जो प्रतीकों में तो जीवित है, पर धरातल से नदारद है। विखंडनवादी (Deconstructionist) निकष पर देखें तो यहाँ 'हरा' अब प्रकृति, उर्वरता या शांति का नैसर्गिक चिह्न नहीं रह गया है, बल्कि वह 'सत्ता' और 'संस्थागत पहचान' का रंग बन चुका है। जिसे झंडे और प्रतीकों पर ऊँचा उठा कर, विडंबनापूर्ण ढंग से "ज़मीन से काट दिया गया है"।


अज्ञेय


कविता में अज्ञेय की प्रसिद्ध कविता 'हरी घास पर क्षण भर' का संदर्भ एक अत्यंत सार्थक अंतःपाठ (Intertextuality) के रूप में उपस्थित है। अज्ञेय के यहाँ हरी घास उस 'क्षण' की गवाह थी जो मनुष्य को प्रकृति और अपनी आदिम संवेदना से जोड़ता था, जबकि दीप्ति कुशवाह की कविता में यह स्मृति वर्तमान के "शुष्क नारों" और "रिश्वत की तरह रखे गए हरे" के बीच एक गहरा नैतिक अंतराल पैदा करती है। यह 'रिश्वत का हरा' उस क्षरण की ओर संकेत है जहाँ प्रकृति को भी एक वस्तु (Commodity) में तब्दील कर दिया गया है।


स्त्रीवादी चिंतन और इको-फेमिनिज्म (Ecofeminism) के आलोक में कविता का एक और मर्मस्पर्शी पक्ष उभरता है। 'दूब की लुनाई' और 'पृथ्वी का स्पर्श' जैसे बिंब उस स्त्री-चेतना को स्वर देते हैं जो सरहदों की कठोरता और राष्ट्रवाद की 'सतर्कता' के बजाय, जमीन की नमी और संवेदना की भाषा को चुनती है। यहाँ हरा रंग यह निर्धारित करता है कि हम "किस ओर देखते हैं/ किसे ओझल करते हैं"—यह स्पष्ट रूप से 'दृष्टि की राजनीति' (Politics of Gaze) का विश्लेषण है। यहाँ 'देखना' एक तटस्थ क्रिया नहीं है, बल्कि एक चुनाव है; सत्ता हमें वह 'हरा' दिखाती है जो वह चाहती है, जबकि उस 'हरे' के नीचे दबे हुए यथार्थ को दृष्टि से ओझल कर दिया जाता है। अंततः, यह कविता पाठक को उस दृश्य के 'बाहर' देखने के लिए प्रेरित करती है जहाँ असली संघर्ष और असली रंग आज भी अपनी पहचान के लिए जूझ रहे हैं।


'बीच का ताप' शीर्षक कविता नारंगी रंग के माध्यम से संरचनावाद के 'द्वैत' (Binary Oppositions) को एक नवीन और सघन संश्लेषण में रूपांतरित कर देती है। पारंपरिक विमर्शों में अक्सर लाल (विद्रोह, क्रांति, लौकिकता) और भगवा (साधना, त्याग, पारलौकिकता) को दो विरोधी ध्रुवों के रूप में देखा जाता है, किंतु दीप्ति कुशवाह की यह कविता इन दोनों को एक ही मानवीय चेतना की दो भुजाओं के रूप में देखती है। कवयित्री के अनुसार— "लाल/ जब विद्रोह का चेहरा गढ़ रहा था/ भगवे ने समर्पण की आँखें दीं"। यहाँ नारंगी रंग एक 'संधि-स्थल' की तरह उभरता है, जहाँ संघर्ष की आँच और साधना की शांति परस्पर मिलकर एक 'संतुलित ताप' का निर्माण करते हैं।


चित्रकला के सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य में यह कविता प्रकाश (Light) और दीप्ति (Glow) का ऐसा सूक्ष्म प्रयोग करती है, जो 'इम्प्रेशनिस्ट' (प्रभाववादी) कैनवास की जीवंतता को शब्दों में उतार देता है। प्रभाववाद में प्रकाश का कोई स्थिर रूप नहीं होता; वह क्षण-क्षण बदलता है। इसी तरह, कवयित्री नारंगी रंग को "मौन में सुलगती एक दीर्घ पुकार" कहती हैं, जहाँ रंग केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक 'अनुभव' (Sensory Experience) बन जाता है। यहाँ 'पारिजात' का बिंब सौंदर्यबोध की पराकाष्ठा है, जहाँ 


"सफेद देह 

एक नारंगी तंतु से बँधी हुई 

जो भूमि तक पहुँचने से पहले

गंध में ठहर जाती है"। 


यह बिंब रंगों के भौतिक अस्तित्व को उनके आध्यात्मिक और गंधात्मक गुणों से जोड़ता है। यहाँ 'तंतु' वह महीन कड़ी है जो नश्वर शरीर (सफेद) को उस प्राणवान ऊर्जा (नारंगी) से जोड़ती है जो उसे गिरने के बाद भी सुगंधित रखती है।


समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक धरातल पर यह कविता अत्यंत कारुणिक और उदात्त है। 'पिता को खो कर लौटे बेटे' के चेहरे पर पड़ती सूरज की अंतिम नारंगी किरण का बिंब केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि वह उस विराट करुणा का प्रतीक है जो मृत्यु के असीम शोक को एक 'विराट स्वीकृति' में बदल देती है। यह 'अंतिम किरण' जीवन की सांध्य-वेला का वह ताप है जो मनुष्य को संताप से निकालकर बोधि (Enlightenment) की ओर ले जाता है। यहाँ नारंगी रंग शोक का रंग नहीं है, बल्कि उस 'बीच के ताप' का रंग है जहाँ विदा और स्मृति एक साथ घुल मिल जाते हैं।


अंततः, यह कविता सिद्ध करती है कि नारंगी रंग न तो पूरी तरह अग्नि है, न पूरी तरह सूर्यास्त; वह इन दोनों के बीच का वह मानवीय 'स्पेस' है जहाँ शांति और संघर्ष, गंध और ताप, तथा स्मृति और यथार्थ एक संवेगात्मक संतुलन प्राप्त करते हैं। यह रंग के माध्यम से जीवन के दर्शन को फिर से परिभाषित करने का एक उत्कृष्ट प्रयास है।


'एक अनुपस्थिति की उपस्थिति' शीर्षक कविता सफ़ेद रंग के माध्यम से उत्तर-संरचनावादी 'शून्यता' (The Void) का एक गहन पाठ प्रस्तुत करती है। यहाँ सफेद केवल एक रंग नहीं, बल्कि एक ऐसी उपस्थिति है जो अपनी रिक्तता में ही पूर्ण है। कवयित्री के लिए सफेद रंग अस्पताल की चादरों की ठंडी निर्जीवता मात्र नहीं है, बल्कि यह उस सूक्ष्म अंतराल में व्याप्त है "जो साँस लौट न सकी"। यह रंग "अश्रुपूर्ण संधियों का/ धुँधलाता हुआ व्रत" बन कर उभरता है, जो पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री द्वारा किए जाने वाले उन अदृश्य समझौतों और उसकी उस मौन सहनशीलता की ओर संकेत करता है, जिसे अक्सर 'पवित्रता' के नाम पर महिमामंडित कर दिया जाता है।


समाजशास्त्रीय निकष पर देखें तो यह कविता सफ़ेद रंग को एक नई ऐतिहासिक चेतना प्रदान करती है। यहाँ 'चरखे का सूत' केवल वस्त्र निर्माण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि "प्रतिरोध की लय" बन कर गूँजता है। यह गांधीवादी शुचिता और सत्याग्रह के उस विचार का विस्तार है जहाँ सफेद रंग सादगी का प्रतीक न रह कर एक सक्रिय 'विचार' और सत्ता के विरुद्ध एक 'नैतिक हस्तक्षेप' बन जाता है। यहाँ सफेद पहनना स्वयं को विज्ञापित करना नहीं, बल्कि एक मूल्य तंत्र को अंगीकार करना है।


विखंडनवादी (Deconstructionist) दृष्टि से विश्लेषण करें तो सफ़ेद रंग अपनी कोई आरोपित व्याख्या ले कर नहीं आता। वह स्वयं को सँवारने या सिद्ध करने की चेष्टा नहीं करता, बल्कि "सबने उसे अपने अर्थ से भर दिया"। यह रंग एक 'ओपन टेक्स्ट' (Open Text) की तरह है जिस पर दर्शक या समाज अपनी धारणाएँ आरोपित करता है। यह रंग "आरंभ भी है / और समापन भी"—अर्थात् यह जन्म के पहले वसन (कोरी स्लेट) और मृत्यु के अंतिम आवरण (कफन) के बीच की पूरी मानवीय यात्रा को समेटे हुए है। यह अस्तित्व का वह 'शून्य' है जहाँ से सब कुछ उपजता है और जहाँ सब कुछ विलीन हो जाता है।


चित्रकला की प्रविधि के धरातल पर यह कविता उस 'प्राइम' किए हुए कैनवास की तरह है, जिस पर समय अपनी सबसे धीमी और पारदर्शी लिपि में इतिहास लिखता है। चित्रकार के लिए सफेद कैनवास रिक्त नहीं होता, बल्कि वह संभावनाओं से भरा होता है। कविता में सफेद रंग की 'तटस्थता' ही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रतिपादित हुई है। यह तटस्थता उदासीनता नहीं है, बल्कि वह तटस्थता है जो बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के सत्य की दुर्गम ऊँचाई पर टिकने का साहस रखती है। अंततः, यह कविता सफ़ेद रंग को एक 'रंग' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'बोध' के रूप में स्थापित करती है—एक ऐसा बोध जो शोर के बीच संगीत और भीड़ के बीच एकांत की तरह उपस्थित है।


'एक अनकही तपिश' शीर्षक अंतिम कविता लाल रंग के माध्यम से 'इतिहास' और 'इच्छा' (Desire) के जटिल अंतर्संबंधों की पड़ताल करती है। यहाँ लाल रंग अपनी पारंपरिक सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है; यह न तो केवल युद्ध का रक्त है और न ही केवल श्रृंगारिक प्रेम का उल्लास। यह वस्तुतः वह 'आंतरिक ताप' है जो "धमनियों में बिना नाम के बहती है"। यह एक ऐसी आदिम ऊर्जा है जो मनुष्य के अस्तित्व और उसकी जिजीविषा को संचालित करती है। कवयित्री इस रंग को 'बीरबहूटी' की कोमल लोक-संवेदना से उठा कर 'लाल किले' की ऐतिहासिक भव्यता और राजनीतिक प्राचीर तक विस्तारित करती हैं, जिससे यह कविता एक विराट सांस्कृतिक विमर्श का रूप ले लेती है।


स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य में 'माँग की सूक्ष्म रेखा' का बिंब इस कविता का सबसे मर्मस्पर्शी और क्रांतिकारी मोड़ है। यहाँ कवयित्री एक कड़वी हकीकत को अनावृत करती हैं— "प्रेम तो अमर रहा/ पर प्रतीक छीन लिए रूढ़ियों ने"। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर एक सीधा प्रहार है, जहाँ स्त्री की 'इच्छा' और उसके 'प्रेम' को प्रतीकों (सिंदूर, बिंदी) के माध्यम से एक संस्थागत ढांचे में जकड़ दिया गया है। लाल रंग यहाँ उस दमित इच्छा का प्रतीक बन जाता है, जिसे समाज ने संस्कारों की आड़ में अनुशासित करने का प्रयास किया है। विखंडनवादी दृष्टि से देखें तो लाल रंग यहाँ निरंतर विस्थापित होता रहता है—वह कभी "लाल टीन की छत" पर उतरते हुए एकांत और उदासी का बिंब बनता है, तो कभी "पान की हँसी" के बीच एक खिलखिलाते हुए लोक-यथार्थ में तब्दील हो जाता है।


यह कविता लाल रंग को नारों की राजनीतिक गर्जना से मुक्त कर उसे "विद्रोह के अनकहे स्वर" के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह वह विद्रोह है जो बाहर सड़कों पर नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना के भीतर घटित होता है। यह फूको के उस सिद्धांत की याद दिलाता है जहाँ सूक्ष्म सत्ता के विरुद्ध सूक्ष्म प्रतिरोध ही सबसे अधिक प्रभावी होता है। यहाँ लाल रंग का अर्थ केवल क्रांति का झंडा नहीं, बल्कि वह व्यक्तिगत साहस है जो अपनी अस्मिता को बचाने के लिए चुपचाप संघर्ष करता है।


अंततः, यह रंग स्मृति की उन बंद गिरहों को खोलता है जहाँ "भीतर चुपचाप कुछ भीगता है"। यह 'भीगना' संवेदना की वह नमी है जो कठोर से कठोर इतिहास के बीच भी मनुष्यता को बचाए रखती है। लाल रंग यहाँ एक 'कैथार्सिस' (विरेचन) की तरह कार्य करता है, जो मनुष्य को उसके दुखों, उसकी दबी हुई इच्छाओं और उसके अनकहे इतिहास से रूबरू कराता है। इस प्रकार, यह कविता लाल रंग को केवल एक 'वर्ण' (Colour) के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत 'ऊष्मा' (Energy) के रूप में स्थापित कर आलेख को एक दार्शनिक पूर्णता प्रदान करती है।


कुल मिला कर कहा जा सकता है कि दीप्ति कुशवाह की ये कविताएँ सामूहिक रूप से एक ऐसे 'डिस्कोर्स' का निर्माण करती हैं जहाँ सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) अनिवार्य रूप से राजनीति (Politics) और आचारशास्त्र (Ethics) से जुड़ा हुआ है। संरचनावादी दृष्टि से ये कविताएँ रंगों की एक ऐसी व्यवस्था (System) निर्मित करती हैं जहाँ हर रंग दूसरे रंग की उपस्थिति से अर्थ ग्रहण करता है। उत्तर-संरचनावादी निकष पर ये अर्थ स्थिर नहीं हैं, बल्कि वे पाठक की चेतना और सामाजिक यथार्थ के साथ लगातार टकरा कर नए संकेतक या  'सिग्निफायर्स' पैदा करते हैं।


इन कविताओं में स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा कोई बाहरी नारा नहीं है, बल्कि वह रंगों की अपनी स्वायत्तता खोजने की प्रक्रिया में निहित है। रंगों को ध्वजों, नारों और वर्दियों की कैद से मुक्त करना ही वास्तव में मनुष्यता और स्त्रीत्व को मुक्त करना है। चित्रकला के संदर्भ में ये कविताएँ 'प्रभाववाद' और 'अभिव्यंजनावाद' (Expressionism) के बीच का एक ऐसा धरातल तैयार करती हैं जहाँ शब्द कैनवास की तरह उपयोग किए गए हैं। दीप्ति कुशवाह का यह 'रंग-विमर्श' हमारे समय की उन सूक्ष्म विसंगतियों का एक ऐसा गहरा आलोचनात्मक पाठ है, जो 'अनुपस्थिति' में भी 'उपस्थिति' को देख लेने के धीरज से उपजा है।


इन कविताओं में निहित काव्य-दृष्टि केवल रंगों के बाह्य सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भौतिक जगत के दृश्यमान तत्वों के माध्यम से अदृश्य मानवीय अनुभूतियों और अस्तित्वपरक सत्यों की एक गहरी छानबीन है। यहाँ रंगों को एक रूपक की तरह इस्तेमाल किया गया है, जो जीवन की जटिलताओं, सामाजिक विसंगतियों और व्यक्तिगत स्मृतियों के बीच एक दार्शनिक सेतु का निर्माण करते हैं। इन कविताओं में व्यक्त जीवन दर्शन 'स्वीकार' और 'अतिक्रमण' का दर्शन है। कवयित्री यह मानती हैं कि जीवन कोई एकरंगा रैखिक प्रवाह नहीं है, बल्कि यह अंतर्विरोधों का एक ऐसा कोलाज है जहाँ उल्लास के पीलेपन के ठीक पीछे गिरवी रखे गए खेत की कड़वाहट छिपी होती है। यह काव्य-दृष्टि वस्तुनिष्ठ यथार्थ को आत्मनिष्ठ संवेदना के धरातल पर परखने की कोशिश करती है, जहाँ 'सफेद' केवल एक रंग नहीं बल्कि एक 'आरंभ और समापन' के बीच का वह शून्य है जो समय की धीमी लिपि को अपने भीतर धारण किए हुए है।


कवि दीप्ति कुशवाह का जीवन दर्शन इस विचार पर टिका है कि अभाव और सौंदर्य साथ-साथ चलते हैं। जब कवयित्री अनाथालय के पीले बल्ब को 'नींद की जगह जलता हुआ' देखती हैं या काले रंग को 'पुराने घाव की तरह सूखता हुआ' चित्रित करती हैं, तो वे दुख को एक रचनात्मक गरिमा प्रदान करती हैं। यहाँ दार्शनिक दृष्टि यह है कि पीड़ा भी जीवन का एक अनिवार्य रंग है जिसे नकारा नहीं जा सकता, बल्कि उसे 'स्याही' और 'आखर' बना कर सुबहों के उजाले में बदला जा सकता है। यह दृष्टि सत्ता और व्यवस्था के कृत्रिम 'क्रोमा' (हरे रंग) को पहचानती है और उसके बरक्स 'दूब की लुनाई' और 'पृथ्वी के स्पर्श' जैसे नैसर्गिक सत्यों को बचाए रखने का आह्वान करती है। यह जीवन को उसकी समग्रता में देखने का आग्रह है, जहाँ नारंगी रंग में 'लड़ना' और 'तपना' दोनों एक ही देह के हिस्से बन जाते हैं।


स्त्री-दृष्टि से सिंचित यह दर्शन 'मौन' और 'अस्वीकार' को भी एक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करता है। जामुनी रंग की स्मृतियों में रची-बसी वह स्त्री जिसने 'अपने उत्तर खुद गढ़ लिए', उस स्वायत्त व्यक्तित्व का प्रतीक है जो बाहरी दुनिया की समझ पर निर्भर नहीं है। यहाँ जीवन दर्शन यह संदेश देता है कि मनुष्य का आंतरिक जगत उसकी अपनी अनुभूतियों के रंगों से निर्मित होता है, न कि थोपे गए सामाजिक प्रतीकों से। लाल रंग की 'बेनाम तपिश' और धमनियों में बहते रक्त का बिंब यह स्पष्ट करता है कि जीवन मूलतः एक ऊष्मा है जो विद्रोह और लज्जा, इतिहास और वर्तमान, सबको एक सूत्र में पिरोती है। अंततः, दीप्ति कुशवाह की काव्य-दृष्टि एक ऐसी समतावादी और संवेदनशील दुनिया की तलाश करती है जहाँ रंगों को ध्वजों और नारों की कैद से मुक्त कर पुनः मानवीय संवेदनाओं, स्मृतियों और प्यास के नैसर्गिक धरातल पर लौटाया जा सके। यह एक ऐसा जीवन दर्शन है जो 'अनुपस्थिति में भी उपस्थिति' को देख लेने के धीरज और कौशल से निर्मित हुआ है।


इन कविताओं की भाषा-शैली अत्यंत पारदर्शी, बिंबात्मक और संवेदनात्मक है, जहाँ शब्द अपनी रूढ़ अर्थछवियों को छोड़ कर नए संस्पर्शों से लैस हो कर उभरते हैं। इनकी शैली की सबसे बड़ी विशेषता 'रंगों का मानवीकरण' और 'अमूर्त को मूर्त' करने की कला है।


कवयित्री रंगों को केवल देखती नहीं हैं, बल्कि उन्हें छूती और सुनती हैं। जैसे बैंगनी रंग के लिए वे लिखती हैं, यह रंग इंद्रधनुष से शुरू हो कर ध्वनि में उतरता है और चुपचाप आत्मा में थरथराता है। यहाँ भाषा केवल दृश्य का वर्णन नहीं कर रही, बल्कि एक 'सिनस्थेसिया' (ऐंद्रिय मिश्रण) पैदा कर रही है जहाँ रंग संगीत या कंपन बन जाता है। उनकी भाषा में लोक और आधुनिकता का सुंदर सामंजस्य है; एक ओर 'बीरबहूटी', 'हल्दी की थाली' और 'दूब की लुनाई' जैसे ठेठ देसज बिंब हैं, तो दूसरी ओर 'क्रोमा', 'ब्लू रे' और 'स्क्रीन' जैसे समकालीन तकनीकी शब्द, जो कविता को आज के समय का जीवंत दस्तावेज़ बनाते हैं।


एक स्त्री-कवि की मनोदशा इन कविताओं में बहुत ही सूक्ष्म और गरिमामय ढंग से व्यक्त हुई है। स्त्री की दृष्टि यहाँ बाहरी संसार के स्थूल वैभव की जगह घरेलू वस्तुओं और स्मृतियों के 'अदृश्य' को पकड़ने की कोशिश करती है। जब वे काले रंग का विश्लेषण करती हैं, तो वे किसी दार्शनिक की तरह बात न करके एक स्त्री की स्मृतियों से उसे जोड़ती हैं—एक पुराना स्वेटर है पति का/ अलमारी में टंगा अब भी/ जिसमें समय की धड़कन/ छाती के पास सुनाई देती है। यह एक स्त्री की वह कोमल मनोदशा है जहाँ एक निर्जीव वस्तु भी प्रेम की ऊष्मा और उपस्थिति का एहसास कराती है। इसी प्रकार, लाल रंग के संदर्भ में उनकी दृष्टि स्त्री के सामाजिक प्रतीकों पर पड़ती है—यह रंग उस माँग की सूक्ष्मरेखा में/ अदृश्य हो गया था/ जिसमें प्रेम तो अमर रहा/ पर प्रतीक छीन लिए रूढ़ियों ने। यहाँ स्त्री की पीड़ा और समाज के रूढ़िवादी ढाँचे के प्रति एक मौन लेकिन गहरा विक्षोभ झलकता है।


कवयित्री की रचनाधर्मिता में 'अस्वीकार' और 'मौन' के प्रति एक गहरी, लगभग रूहानी सहानुभूति है। ये तत्व किसी अभाव के सूचक नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन के उन अनिवार्य अनुभवों के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने सदियों से उसकी अस्मिता को गढ़ा है। बैंगनी रंग की कविता में जिस स्त्री का उल्लेख है—जो "सिर्फ़ सुनी जाती थी/ समझी नहीं गई"—वह केवल एक व्यक्तिगत पात्र नहीं, बल्कि उस सार्वभौमिक स्त्री-नियति का आर्केटाइप (Archetype) है, जहाँ संवाद की औपचारिकता तो मौजूद है, पर संवेदना का धरातल अनुपस्थित है। यहाँ 'सुनने' और 'समझने' के बीच की जो खाई है, वह दरअसल पितृसत्तात्मक समाज के उस 'संज्ञानात्मक बोध' (Cognitive Empathy) की विफलता है, जो स्त्री को एक 'कर्ता' (Subject) के बजाय केवल एक 'ध्वनि' या 'वस्तु' के रूप में ग्रहण करता है।


अमलतास 


उनकी काव्य-भाषा में एक अत्यंत दुर्लभ 'क्षमा' और 'विनम्रता' का पुट है, जो समकालीन विमर्शों के आक्रामक तेवरों से सर्वथा भिन्न है। अमलतास के सघन पीलेपन को निहारते हुए जब उन्हें लगता है कि "भीतर कोई क्षमा माँगता हो", तो यह 'क्षमा' आत्म-अपराध (Guilt) का बोध नहीं है। यह तो उस विराट प्रकृति और अस्तित्व के सम्मुख अपनी लघुता की स्वीकारोक्ति है। यह एक प्रकार की 'कॉस्मिक विनम्रता' है, जहाँ सौंदर्य की पराकाष्ठा मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर उसे करुणा से भर देती है।


स्त्री-सुलभ इस 'नत' होने की प्रवृत्ति को पारंपरिक अर्थों में 'कमज़ोरी' समझना एक बड़ी भूल होगी। वास्तव में, यह उस 'भरे-पूरेपन' की करुणा है जो केवल वही दे सकता है जिसके भीतर संवेदनाओं का अक्षय भंडार हो। जैसे फलों से लदी डाली झुक जाती है, वैसे ही कवयित्री की यह विनम्रता उनके अनुभवों की सघनता और उनकी आत्मिक प्रौढ़ता का प्रमाण है। यह झुकना पराजय नहीं, बल्कि एक प्रकार का 'सृजनात्मक आत्म-समर्पण' है, जो संसार के कठोर यथार्थ को अपनी कोमलता से पिघलाने की सामर्थ्य रखता है। उनकी कविताओं में 'मौन' केवल चुप्पी नहीं है, बल्कि एक प्रतिरोधी शक्ति है, जो चीखने के बजाय 'होने' की सार्थकता में विश्वास रखती है।


दीप्ति कुशवाह की कविताओं की शैली में 'सूक्ष्म पर्यवेक्षण' कूट-कूट कर भरा है। एक पुरुष कवि शायद रंगों को विजय या वीरता के प्रतीक के रूप में देखता, लेकिन दीप्ति कुशवाह उन्हें 'मन्नत की तरह काँपता', 'नींद की जगह जलता' या 'अश्रुपूर्ण संधियों का धुँधलाता व्रत' कहती हैं। उनकी मनोदशा यहाँ सुरक्षा, सहेजने और बचाने की है—जैसे इस रंग को कविता में बचाया जा रहा है। कुल मिला कर, दीप्ति कुशवाह की भाषा-शैली और उनकी स्त्री-सुलभ दृष्टि मिल कर रंगों का एक ऐसा भूगोल रचती हैं, जहाँ सौंदर्यशास्त्र केवल कला तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह जीवन की जद्दोजहद, स्मृतियों मंजूषा और स्त्री-अस्तित्व की अनकही गुहारों का एक कोमल लेकिन दृढ़ स्वर बन जाता है।



सन्दर्भ :


https://samalochan.com/deepti-kushwaha-more/


Foucault, Michel. ‘Discipline and Punish: The Birth of the Prison’. Translated by Alan Sheridan, Vintage Books, 1995.


Marx, Karl. ‘Capital: A Critique of Political Economy’. Vol. 1, Translated by Ben Fowkes, Penguin Books, 1990.


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Barthes, Roland. ‘Mythologies’. Translated by Annette Lavers, Hill and Wang, 1972.


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Spivak, Gayatri Chakravorty. ‘In Other Worlds: Essays in Cultural Politics’. Routledge, 1987.


Beauvoir, Simone de. ‘The Second Sex’. Translated by Constance Borde and Sheila Malovany-Chevallier, Vintage Books, 2011.


Marcuse, Herbert. ‘One-Dimensional Man: Studies in the Ideology of Advanced Industrial Society’. Beacon Press, 1964.


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Agyeya. ‘Hari Ghaas Par Kshan Bhar’. Bharatiya Jnanpith, various editions.


Richardson, John. ‘A Life of Picasso: The Blue Period’. Random House, 1991.


Naifeh, Steven, and Gregory White Smith. ‘Van Gogh: The Life’. Random House, 2011.


रवि रंजन 


सम्पर्क 


प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), 

हिन्दी विभाग, 

हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद


ई-मेल : raviranjan@uohyd.ac.in

टिप्पणियाँ

  1. वाह वाह, ऐसे समालोचक का मिलना भी सचमुच बड़े सौभाग्य की बात है दीप्ति जी, और आपकी कविताओं की सम्यक व्याख्या तो ऐसे ही कोई प्रतिभाशाली करने में समर्थ हैं हमारे लिए तो "गूंगे का गुड" ही है ❤️🙏👌🌹

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