हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ


हरे प्रकाश उपाध्याय 


फ्रेडरिक एंगेल्स की एक महत्वपूर्ण क्लासिकल किताब है "वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका" The Part Played by Labour in the Transition from Ape to Man). यह निबंध मूल रूप से 1876 में लिखा गया था और बाद में एंगेल्स की पुस्तक "डायलैक्टिक्स ऑफ नेचर" (Dialectics of Nature) में शामिल किया गया। एंगेल्स ने तर्क दिया कि मानव विकास (Evolution) में केवल जैविक परिवर्तन ही नहीं, बल्कि 'श्रम' (Labour) भी मुख्य कारक रहा है। कहा जा सकता है कि श्रम ने ही मनुष्य की वास्तविक निर्मिति की। तमाम लोग तमाम तरह के काम आज भी करते रहते हैं। और इनके काम से ही हमारा जीवन आसान बन जाता है। औद्योगिक क्रान्ति को सफल बनाने में इन श्रमिकों की भूमिका को भला कैसे दरकिनार किया जा सकता है। इस औद्योगिक क्रांति ने मनुष्य के जीवन को आसान बनाया। लेकिन यह विडंबना ही है कि जिन मजदूरों के दम पर दुनिया की यह रौनक बनी हुई है वे मजदूर खुद तंगहाल जिंदगी व्यतीत करने के लिए विवाह हैं। वह औरों के लिए घर बनाते हैं लेकिन खुद आजीवन बेघर रह जाते हैं। वह औरों के लिए कपड़ा बुनते और सिलते हैं लेकिन उनके तन पर मुश्किल से ही कोई कपड़ा चढ़ पाता है। औरों के लिए मिठाइयां और तरह-तरह के व्यंजन बनाने वाले उन व्यंजनों का स्वाद प्रायः नहीं जान पाते। अनाज उपजाने वाला किसान न जाने कितने दिन और कितनी रातें भूखे रह कर अपना जीवन बिताता है। दूसरों के जूते बनाने, सिलने और पॉलिश करने वाले पूरे जीवन नंगे पांव रह जाते हैं। दूसरों के जीवन में रंग भरने वाले श्रमिकों का जीवन प्राय बेरंग ही बना रहता है। इन श्रमिकों के हक की पक्षधरता में एक मई को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। हरे प्रकाश उपाध्याय हिंदी कविता की दुनिया में जाना पहचाना नाम है। इधर वे रागात्मकता और लय से भरी हुई कविताएं लिख रहे हैं। हरे प्रकाश अपनी रचनाओं में सामान्य जन की कथा व्यथा को सामान्य शब्दों में ले कर सामने आते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर पहली बार पर हम उनकी 27 कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। इन 27 कविताओं में इतनी पीड़ा है कि ये 27 अध्याय की तरह हैं। यह कविताएं हमारे आसपास काम करने वाले उन मजदूरों की सच्ची दास्तां हैं जिन्हें हम प्रायः अनदेखा कर देते हैं। हमारे जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने में ये मजदूर दिन-रात एक किए रहते हैं। 'पूछने लगे मजदूर' कविता में कवि लिखता है : "भर जाता गोदाम सेठ का/ क्यों झोपड़ी में रह जाते बोझ उठाने वाले/... काम करने वाले को मिलता कम है/ क्यों मोटा माल पाते काम कराने वाले/ बता इसे हमारा भाग्य/ देखो कैसे इतराते कलम चलाने वाले।" इस उम्मीद के साथ कि इन मजदूरों का जीवन भी एक न एक दिन बेहतर होगा आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएं।


मई दिवस के अवसर पर विशेष

हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताएँ



सुनो मालिक

(दिल्ली - एन सी आर में जारी मजदूर आंदोलन को समर्पित, 2026 अप्रैल)


सर जी, क्या होता है बारह हजार में

घर का किराया

बिजली

राशन, पानी सब इसी पगार में

आप निकल कर देखिए बाजार में


सर जी, आदमी कभी-कभी बीमार भी पड़ता है

साल में कभी-कभी परब-त्योहार भी पड़ता है


सर जी हम भी इंसान हैं

और आप ही हमारे भगवान हैं


दिन-रात सब बीतता आपके यहाँ

मुसीबत में हुजूर जाएं कहाँ

आप और लम्बा दिन बनाइये

खटते रह जाएंगे आपके यहाँ


हुजूर बीच-बीच में थकान लगती है

चाय की तलब जगती है

इंसान का तन है हुजूर

कभी कभी पेशाब भी लगती है


कहें तो मूत दें आपके धन पर

तानाशाही के आपके मन पर

हुजूर रहम खाइये हम पर


हगने मूतने दीजिए

हमारा खून इस कदर भी न पीजिए

धन के नशे में जुल्म ऐसा न कीजिए


हमारे खून पसीने 

हमारे रात दिन महीने

सब तूने ले लिए कमीने


हाड़-तोड मेहनत की कमाई

समझो मेरे भाई!



पूछने लगे मज़दूर


पूछने लगे मज़दूर भवन बनाने वाले

भैया हमसे क्यों घिन खाते भवन में रहने वाले

हम ही इसे उठाते ऊंचा

हम ही इसे रंग पोत चमकाने वाले

काम हुआ ख़त्म हम पर ही लग जाते ताले


पाते खूब रुपैया कलम चलाने वाले

क्यों भूखे रह जाते कुदाल चलाने वाले

अन्न उपजाने वाले


भर जाता गोदाम सेठ का

क्यों झोपड़ी में रह जाते बोझ उठाने वाले


काम करने वाले को मिलता कम है

क्यों मोटा माल पाते काम कराने वाले

बता इसे हमारा भाग्य

देखो कैसे इतराते कलम चलाने वाले


अन्न हम उपजाते हैं

महल हम उठाते हैं

कपड़े जूते कार सब बनाते हैं

मगर मालिक आप कहलाते हैं

हमें दे कर टुकड़े जूठन दया दिखलाते हैं

हमें नचा कर अपना जी बहलाते हैं

पी कर-खा कर अपनी महफ़िल से हमें भगाते हैं!



कैसे वे ज़िंदा रहते हैं


कहीं भी आता-जाता हूँ

किसी न किसी को दु:ख में लिथड़ा पाता हूँ

उसके जीवट के आगे सिर नवाता हूँ


जो लोहा पीट कर रेल बनाते हैं

जो सड़क बनाते हैं पुल बनाते हैं

जो बिजली के खंभे पर चढ़ जाते हैं

जो सीवर टैंक में छप से कूद जाते हैं

जो महल बनाते हैं जो उसे रंग के चमकाते हैं


दुख तो महलों में रहने वालों को भी है

लूट रहे सब सुख, दुख कुछ उनको भी है


पर जो रोटी हेतु चूल्हे में लकड़ी सा जलते हैं

कड़ाही में अपने सपनों को ही तलते हैं

जो आंसू पी-पी कर पलते हैं

जिनको भरे पेट वाले मिल कर छलते हैं

जिनसे छू जाने भर से हम डरते हैं

सोचा कभी आपने, कैसे वे ज़िंदा रहते हैं


उनके सुख का पता लगाता रहता हूँ

उनसे मिलता-बतियाता रहता हूँ

उनकी सिफ़ारिश आपसे करता हूँ

कविता में इसीलिए उनकी बात मैं कहता हूँ।



क्षमा करें दुर्गा माई


क्या रावण क्या राम

दोनों से अपना काम

हमारा तो मिट्टी का काम

पूरे पखवारे भर लगे रहे

किया नहीं तनिक आराम

पूरा हुआ अपना काम

साहब हमारा दोनों को प्रणाम


हमने देवी-दानव दोनों बनाये

दोनों की मिट्टी एक ही खेत से लाये

मिट्टी को रौंद कर रंगे-पोते चमकाये

देखिए तो कैसी-कैसी मूरत हैं बनाये


इन मूरतों में क्यों चलती है लड़ाई

इतना जान सकें, नहीं ऐसी अपनी पढ़ाई

क्षमा करें दुर्गा माई


इन मूरतों में जब पंडी जी डालेंगे जान

पाएंगे मनोवांछित दान

अपनी ही मूरतों के सामने हो जाएंगे हम हैरान


हम किसे पूजें, किसे नहीं

हमें तो कुछ मालूम ही नहीं

इस दानव से भी हमें शिकवा नहीं


हमारे बच्चे भी पंडाल-पंडाल घूमेंगे

पर हम जानते हैं वे अंत में कहाँ रुकेंगे

वे तो जलेबी पर ही टूटेंगे


रावण मरे, जीतें राम

लौट जाएं वे घर अयोध्या धाम

पर नहीं बदलना हमारा पता-मुक़ाम

हमें तो बस काम से काम

आप भी यही कहेंगे -

अब चलो खतम हुआ तुम्हारा काम

अच्छा साहब! चलते हैं राम-राम!



हर जगह से भगाया गया हूँ


घर से मार कर भगाया गया कि कपूत हूँ

बायें मठ से भगाया गया कि अछूत हूँ

दायें मठ से दुरदुराया गया कि दुश्मन का दूत हूँ

जबरन जहाँ-तहाँ घुस कर झांक रहा जैसे कोई भूत हूँ


हर जगह करतब चल रहा है

बिन आग पानी उबल रहा है

सच के पर्दे में झूठ मचल रहा है

हारा हुआ आदमी अटपटा खल रहा है


एकदम से नहीं मुझे भगाया गया

पहले तो अंदर बुलाया गया

मंच पर बैठा कर सबको दिखाया गया

माला पहना कर फोटो खिंचाया गया


जब सब खाने लगे

तो लोग मुझे कुछ काम बताने लगे

अपनी जूठी पत्तलें हटवाने लगे

अंत में लोग मुझे दरवाजे दिखाने लगे


हर जगह से भगाया गया हूँ

पर ख़बरों के बीच सजाया गया हूँ

सहानुभूति सहित हाशिये पर लाया गया हूँ

व्यवस्था का केंद्र बताया गया हूँ!




पैसों से चलती है ज़िदगी की गाड़ी


सुबह उठता हूँ तो हे राम कहता हूँ

पर याद उस कमीने को करता हूँ

जिसके यहाँ काम मैं करता हूँ

जिसके इशारे पर हँस-हँस के पानी मैं भरता हूँ


उसको वाट्सअप से गुड मार्निंग भेज देता हूँ

नित्यक्रिया से निपटते उसका ही नाम लेता हूँ

अपमान करता है तो क्या उससे ही तो पगार लेता हूँ


पैसों से चलती है ज़िदगी की गाड़ी

पैसे तो नहीं उगते घर के पिछाड़ी

मुझे उसके लिए करनी पड़ती दिहाड़ी


अन्यायी पाखंडी के आगे गरदन झुकाता हूँ

जो हँसते हैं ताली बजा के, उन्हें नाच के दिखाता हूँ

तब जा के दो पैसे कमाता हूँ


जिसको करता है मारने का मन

उसके लिए खटाता हूँ तन

उसकी तिजोरी में धन

और मै आदमी निर्धन


ज़िंदगी जीने के लिए सब सहता हूँ

हाँ में हाँ मिला कर कहता हूँ

बोलने की जगह चुप रहता हूँ

सुनने की जगह बहरा हो लेता हूँ

मैं जो करता हूँ सब समझता हूँ

बताइये आप ही, मैं कर ही क्या सकता हूँ?



ठगी की वर्दी


गरीबी बेकारी से माथा था चकरा गया

हुआ कुछ, लगा कि नई ज़िंदगी पा गया

मिलेगी नौकरी सुन पगला गया

ठग के झांसे में आ गया


जैसे भी हो सका, किया

दौड़ कर दो लाख पहुँचा दिया

उबर जाएंगे दुख से, राहत की सांस लिया


जता कर हमदर्दी

ठग ने दिया वर्दी

फंसा दिया झांसे में बेदर्दी


वर्दी के जोश में ज़रा सा अकड़ लिया

तुरंत ही पुलिस ने पकड़ लिया

दु:ख ने दूने बेरहमी से जकड़ लिया


हे दु:ख! तुझसे बेवफ़ाई की क्षमा माँगता हूँ

साहब मैं अपनी नियति जानता हूँ

सपने देखने की गलती अपनी मानता हूँ


जो भी सज़ा दीजिए वो कम

मारिये हुजूर हो कर बेरहम

मिट जाए रहा-सहा वहम!


(जमुई बिहार में आईपीएस वर्दी में पकड़े गये मिथिलेश मांझी संबंधी ख़बर पढ़ कर)



दिन भर धोता-सुखाता हूँ


मेरे सपनों में आते हैं आपके गंदे कपड़े

मुझे रहता पता बहुतों के लफड़े

धो दिये दाग़, बिना आपको पकड़े

मुझे पता है झीने कपड़ों के जिस्म मोटे-तगड़े


धोने से पहले कपड़े गोता करता हूँ

पानी में राज़ सारे डुबोता रहता हूँ

मैं आँखें मूँद कर धोता रहता हूँ

आपको लगता होगा कि मैं सोता रहता हूँ


कभी इस घाट पर कभी उस घाट पर

ज़िंदगी मेरी घूमती है घाट-घाट पर

पता है मुझे कितना और कैसा पानी है किस घाट पर

आइये दिखाता हूँ कैसी गंदगी निकलती है पाट पर


आपके उतारे कपड़ों के गट्ठर सिर पर उठाता हूँ

दिन भर धोता सुखाता हूँ

मोड़ कर गर्म लोहा घुमाता हूँ

इस तरह पेट भरने - तन ढँकने की चीज़ें जुटाता हूँ


जी बुरा क्या मानना, मुझे तो आदत है आपकी डाँट का

क़िस्मत ऐसी है कि मेरा कुत्ता भी न घर का न घाट का

अपनी फटेहाली भूल ध्यान रखना है आपके ठाट-बाट का

इससे तो अच्छा था खटमल ही होता आपकी खाट का


ज़रा दूर खड़े रहा कीजिए छू जाएंगे आप

बिगड़ेंगे मुझ पर और मुझे लगेगा पाप

पता नहीं किसका है यह मेरे ऊपर शाप

मंत्र भी तो कोई नहीं कर सकता मैं जाप!



पढ़िये ताज़ा समाचार


लीजिए आ गया आज का अख़बार

पढ़िया ताज़ा समाचार

चार हत्या, तीन बलात्कार

ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगा रहे हैं राम आधार

क्या सबसे पहले ये पढ़ लेते सारा समाचार

जबकि महज छठवीं पास हैं राम आधार

अख़बार की ख़बर का है जो कारोबार

उसमें तो सबसे कम के हैं ये हिस्सेदार

मगर देखिए कैसे लहरा रहे हैं ये अख़बार


मंत्री ने किया है सरकारी खजाने से करोड़ों पार

नोटों के बंडल पर सोता अफ़सर हुआ है गिरफ़्तार

कुछ ख़बरें दबा कर कमाया होगा पत्रकार

सेठ तो ख़बरों से फ़ायदा उठा कर ही करता कारोबार

अख़बार बेच कर भी पेट नहीं भर पाएंगे राम आधार


साइकिल पर आगे बाँधे हैं कई अख़बार

कुछ दूर पैदल चलेंगे साइकिल के संग

फिर साइकिल पर हो के सवार

घर-घर डालेंगे मुल्क़ का समाचार


राम आधार का रोज़ का यह काम है

उनकी ज़िंदगी इसी पेशे में हो रही तमाम है

अख़बार में छपता वही नेताओं का ताम-झाम है

कभी नहीं निकलता अख़बार में इनका नाम है

पर ख़ुश हैं, कोई शिकवा नहीं

कहते, भैया हमें तो चार पैसों से काम है


अख़बार बेच कर करते तीन-चार हजार कमाई हैं

कहते शाम को अंडों की एक दुकान भी जमाई है

कपड़े सीने का कुछ काम करती लुगाई है

किसी तरह कटता महीना,

कह रहे भैया ज़िन्दगी बहुत दुखदाई है


पिछले महीने साइकिल में मोटर ने मारी थी टक्कर

गिर गए थे सड़क पर, आ गया था चक्कर

कर रहे हँस कर दुनिया में हैं बहुत घनचक्कर


अख़बार में छपी दुनिया अलग है

अख़बार वालों की दुनिया अलग है

राम आधार की दुनिया बिलकुल अलग-थलग है!




आपके जूतों पर क़िस्मत हमारी


उमर चौदह की भी नहीं है

पर देखो बातें करता कितनी बड़ी-बड़ी है

कह रहा, साहब करा लीजिए बूट पॉलिश

कहाँ भागे जा रहे

ज़िंदगी लंबी है, ऐसी क्या हड़बड़ी है

इन जूतों को भी देखिए, कितनी धूल पड़ी है


इतने प्यार से मनुहार से बोला कि रुक गया

न जाने उसकी आँखों में क्या था, झुक गया


कहा आपके जूतों पर क़िस्मत हमारी

आप समझते तो होंगे ही हमारी लाचारी

आपके जूतों के सहारे ही

कटती है ज़िंदगी हमारी


मार कर पॉलिश जूते नये बना दिये

चमक में चेहरे दिखा दिये

बोला साहब दस रुपये दीजिए

बोहनी भी नहीं हुई है, टूटे ही दीजिए


जबकि दिन के बारह बजने लगे थे

सूरज दादा सिर पर टहलने लगे थे

कौन बेरहम जो इसका भाग्य ऐसे लिखने लगे थे


कहने लगा सुबह से कुछ खाया नहीं है

आया है कमाने सुबह से घर में बताया नहीं है

दोपहर तक कुछ भी तो कमाया नहीं है

कल जो कुछ कमाया, बचाया नहीं है


कल एक साहब ने मारा था

पता नहीं क्या गलती थी मेरी

लगता है, कहीं और का गुस्सा उतारा था

जाने दीजिए, यही भाग हमारा था


चलते-चलते बोला, साहब फिर आइएगा

कोई काम हो मेरे लायक तो बताइएगा!



इडली-सांभर


अरे भाई सागर!

कब से बेचने लगे ये इडली-सांभर

और कहो, सब कैसा है घर-बाहर

तुम तो कमाने गये थे मद्रास

वहाँ का हाल कहो

कब आये, क्या पुरानी नौकरी छोड़ आये


वह जो तुम लाये थे वहाँ से छाता

वह रेडियो वह घड़ी

पिछली बरसात 

फिर गये तो मैं भी चला गया दिल्ली

तुमसे तब से हुई ही नहीं मुलाक़ात


मेरे गाँव की तरफ तो हुई ही नहीं 

अब की बारिश

धान सूख रहा खेत में लावारिस

कितना चलाये कोई बोरिंग

किसके घर में धरी है इतनी हींग


क्या बंटवारा हो गया भाइयों में

कुछ झगरा था लुगाइयों में


तो अब तय किया कि

अब यही कमाओगे

बाहर नहीं जाओगे

इडली-सांभर बेच के घर चलाओगे


अच्छा है गाँव-घर में रहोगे

गरू-बछरू भी करोगे

अपना काम है यह

किसी के अधीन तो नहीं रहोगे


बढ़िया किये गये बाहर

सीख आये बनाना इडली सांभर

हमारे यहाँ के लोग भी

देखें दूर दखिन का स्वाद खा कर


आओ मुन्ना, आओ चाचा

खा लो इडली-सांभर!



मर गए तो देना प्रभु कफ़न


माथे पर सूटकेस, दोनों कंधों पर उठा कर झोला

चलिए सर, कितने प्यार से वह मुस्कुरा कर बोला

बस्ती से कमाने, चारबाग स्टेशन आया है भोला 

डेरा लखनऊ शहर से बाहर, दूर है इसका टोला

सर दिन भर खटता हूँ, सात आठ सौ कमाता हूँ

जो लोग खड़े हैं पहरे में, उनसे ही लुट जाता हूँ

दौड़ते भागते हाँफते, दिन भर पसीने से नहाता हूँ

यही लिखा कर लाया हूँ ऊपर से, तभी मार खाता हूँ


पिछले साल घर वाली की बीमारी में करजा चढ़ा है

हमारी किस्मत में बीमारी लाचारी दुख ही तो मढ़ा है

माफ़ करते नहीं देव गलती हमारी, वे कितने नकचढ़ा हैं

हमने भी अक्सर खाते कमाते, हनुमान चालीसा पढ़ा है


हमें क्या चाहिए, पेट भरने को अन्न तन पर वसन

मेहनत करते गाली सुनते ही अघाया रहता है मन

बच जाएं बीमारी अकाल से, कौन चाहिए हमें धन

पेट भरते सामान ढोते, मर गए तो प्रभु देना कफ़न


कहते हैं बड़े लोग हिकारत से कि मैं दारू पीता हूँ

हाँ मालिक, किसी इन्सान का खून तो नहीं पीता हूँ

सब लेते हैं अग्नि परीक्षा, कहूँ क्या कैसे जीता हूँ

राम हैं आप लोग, फटे धरती अब मैं भी सीता हूँ!



किससे लगाऊं गुहार


कहाँ से शुरू हुई बात

कब कैसे हुई वो निगोड़ी मुलाक़ात

उग आया चंदा, प्यारी हुई रात


करने लगी मैं भी प्यार

न जाने कैसे कब गई दिल अपना हार

खेत आते-जाते, मिला मनोज खरवार


छुप-छुप कर हम मिलने लगे

बेमक़सद ही सपने सिलने लगे

जल की मछरी सी रहने लगे


क्या नाता था हमारा मनोज खरवार से

कमाने वह आया था खेड़ा, दूर बिहार से

पगला देखता था, गजब वह प्यार से


न कुछ लेना न देना

बस टुकुर-टुकुर देखना

मुश्किल था, उसकी आँखों को झेलना


उसके पास बातें भी बहुत नहीं थी

सादी उसकी जिंदगी की खाता-बही थी

यही तो बात, मुझे मथ रही थी


पर प्यार की यह बात, मेरे बापू को खटक गई

भाई ने सुना, तो उसकी सांसें भी अटक गई

माई गुस्साई, खाने की थरिया जोर से पटक गई


पर हमारे प्यार की गाड़ी तो खुल चुकी थी

भीतर की छटपट, लोकलाज भूल चुकी थी

बारिश निगोड़ी, लछमन रेखा धुल चुकी थी


सोचा हम दोनों मिल कर कहीं कमाते हैं

संग मिल कर, अपना एक नया घर बसाते हैं

चलो यहाँ से, वहाँ जहाँ-तहाँ भाग जाते हैं


ज़माना था पीछे, हम आगे-आगे भागे

कई रातें बीत गईं हमारी, जागे ही जागे

भागते रहे हम, पैरों में लिपटे रहे धागे


चौकी के दरोगा ने हमें किया गिरफ्तार

मनोज पर पड़ी सैकड़ों डंडों की मार

दीवान जी ने चौकी में किया मेरा बलात्कार


अब कहिये मैं किससे लगाऊं गुहार

आँखों से बह रही खून की धार

है कोई धरती पे मानुख जो सुने पुकार!






राम अकेला


यह है मेरा ठेला

नाम लिखिए राम अकेला!


बाज़ार हो या मेला

मिलता लगाए मैं अपना ठेला

कभी तरकारी बेचता, कभी केला


इस ठेले के बल अपने दुख को ठेल रहा हूँ

मौसम की मार

जीवन का भार

बारहो मास खूब बढ़िया से झेल रहा हूँ

जिंदगी खेल नहीं भाई

पर देखिये अड़ा हुआ हूँ, खेल रहा हूँ


कोई क्या कुछ देगा मुझको

कहते सब, क्या पड़ी जीने को तुझको

रोने से नहीं चलेगा साहब

लड़ना होगा 


भले न मानो

लाख भृकुटी तुम अपनी तानो

हम भी तो मनुष्य हैं

गढ़ रहे इस सभ्यता का भविष्य हैं


तेरे पैसे से ही नहीं चलता यह संसार

सबको लूट रहे, बन कर दुनिया का भार

हम अपनी मेहनत से, नाव यह खे रहे हैं

इस दुनिया को, हम अपना पसीना दे रहे हैं


मेरा यह ठेला हो

या तेरा महल अकेला हो

सब ठाठ तो यहीं रह जाएगा

हर आदमी एक ही बाट से आया

एक ही बाट वह जाएगा


ऐसे न अपनी गाड़ी का पों-पों बजाओ

रहम करो शरम करो

अपने भरम को न ऐसे ओढ़ो-बिछाओ

उसे समेट किनारे धरो!



बाल काटते संजय भाई


तेलीबाग सब्जी मंडी में बाल काटते संजय नाई

राम राम! कैसे हो कहो अपनी कुछ प्यारे भाई!


भैया दिन भर काटत हैं, तो है पाँच छह सौ कमाई

छूटा है इधर शादी ब्याह मरनी जीनी में आवाजाई

पापा की चल रही पीजीआई में चार महीने से दवाई

हर तीन दिन पर डाक्टर साहेब लेते हैं उन्हें बुलाई 


यही ले लिये हैं बगले में बढ़िया एक कमरे का डेरा

भैया देखिये, कब तक छँट पाता है जो दुख आ घेरा

दिन भर खटते बीतता, आशंका के संग होता सवेरा

क्या कर सकते हैं मालिक ने लिखा यही भाग है मेरा


गाँव में रहते मेरे पप्पू रिंकू छोटू और उनकी माई

घर छोड़ कर सूरत कमाने चला गया है छोटा भाई

बरसात में घर गिरा, तो मेहरी कर्जा ले कर है बनवाई

रोज़ उसकी वसूली में, घर आता शंकर सिंह का भाई


मेहरी ने कल फोन किया था, चिढ़ कर बोल रही थी

गाँव की हालत सही नहीं, सबका पोल खोल रही थी

पल्ले कुछ न आया, जैसे पीट वो बेसुरा ढोल रही थी

पूछा खाया क्या, मालूम कि रोज सतुआ घोल रही थी


बच्चे छोटे-छोटे हैं, पर वे भी अब कुछ न कुछ कमाते हैं

बड़का तो पंडी जी की भैंस, छोटके सब बकरी चराते हैं

अब ये न कहिएगा कि स्कूल भेज कर क्यों नहीं पढ़ाते हैं

अरे वहाँ तो जाते ही हैं सब, उन्हें मीड डे मील खिलाते हैं


भैया कोई ख़ास दिक्कत नहीं है, सरकार भी राशन देती है

यही कर्ज-तर्ज हारी बीमारी जोंक जैसी खून चूस लेती है

बहुत है कर्ज भर देंगे कुछ, बकरिया अबकी बच्चा देती है

मेरी उसकी का क्या, वह तो फटा-पुराना भी पहन लेती है


राशन कार्ड आधार कार्ड वोटर कार्ड श्रमिक कार्ड आयुष्मान कार्ड

बहुत बने हैं भैया तरह-तरह के कार्ड, हमको तो बोलने में भी लगता है हार्ड

उनको संभाल कर रखना तो और भी हार्ड, जब ज़रूरत जिसका वही नहीं मिलता कार्ड

भैया! वीडियो मत बनाइए, अच्छा नहीं लगता हमको ये सब रेकार्ड!


सबसे सुन्नर भिंडी का फूल


कल फोन कर, खेत पर बुलाये यार मनसोखा

आओ भैया, बनेगा झोपड़िया पे लिट्टी-चोखा!


मनसोखा ने गाँव के सिवान पर सब्जी उपजाई है

खेत के किनारे बड़ी सुंदर छोटी एक झोपड़ी बनाई है

दिन रात खेत में खटते रहते, घर पे रहती भौजाई है

गरू-बछरू वे देखतीं, यही उनके परिवार की कमाई है


मनसोखा भाई करते हैं मुझसे पूरी मन की बात

फोन-तोन रेडियो-फेडियो से बनती नहीं वो बात

इसीलिए पखवारे-महीने में चाहते हैं एक मुलाकात

साथ जुट कर कभी हम लिट्टी, कभी खाते मछली भात

कल तो भैया खाते-पीते बतियाते हो गई बहुत देर रात

मेरी जान ने कहा गुस्से में, वही सो जाओ आना तुम प्रात


भैया खैर अपने मनसोखा दिलचस्प इन्सान हैं

उनकी बातों में गरू बछरू खेती का बखान है

बता रहे थे गोरू बछरू ही उनके भगवान हैं

उनके ही बलबूते पल रहे उनके चार नादान हैं

उनका पड़वा कमबख्त तनिक हो गया शैतान है

पी कर दिन दोपहर दूध महीने भर में हुआ जवान है


मनसोखा बोले, भैया बहुत मेहनत माँगती खेती तरकारी

खुरपी लेके जुटे रहते धूप बारिश जाड़ा में क्यारी-क्यारी

टूट कर जाती तोरई लौकी, बाज़ार में तो फिरती मारी-मारी

हम हिम्मत से लगे रहते, हारने लगती सूरजा की महतारी

ऊपर से धौंस जमावत हैं खेत के मालिक वीरेंदर तिवारी 

बंदर जइसन पौधन के नोचत तोड़त हैं खेत की तरकारी


करो नौकरी सरकारी या बोओ तरकारी, लोग कहत हैं

बोले मनसोखा, सबको भला आन के काम लगत है

भैया जड़ जमीन जल को क्या बूझे जो नगर बसत है

आ कर कौन सूंघे हमार पसीना, जो दिन रात महकत है

हमरे ऊपर बहत जल, पर अंदर हमरे आग लहकत है

मजबूरी में पड़ल मानुख ही सबके दू-चार बात सुनत है


अच्छा मनसोखा, छोड़ो हो जाओ तनिक अब कूल

कहो क्या जाते हैं तुम्हारे बच्चे भी अब पढ़ने इस्कूल

नदी पार कर थोड़ा सा आगे, जहाँ है पेड़ तरकूल

तुम्हारा बगीचा भी होगा हरा भरा, खिलेंगे खूब फूल

क्या देख कर जीते हो भाई, कहो कड़वाहट अपनी भूल

हँस कर बोले मनसोखा, भैया सबसे सुन्नर भिंडी का फूल!



मेरी भीषण पीर


न जाने कौन देवता, कौन फकीर

वहीं हरते-रहते मेरी भीषण पीर

कह रहे ओला बाइक चलाते सुधीर

सर, मन हो जाता है कभी बहुत अधीर

पहले एक सिक्यूरिटी कंपनी में गुड़गांव जा के कमाते थे

उसके पहले एक फैक्ट्री में पानी की टंकी बनाते थे

सब खर्चा काट-पीट कर महीने का पाँच हजार बचाते थे

चल रही थी ज़िंदगी सही ही, सर हम भी ठीक ही कमाते थे


इस बीच सुनीता मेरी वाइफ की किडनी में हो गई दिक्कत

सर आंधी-तूफान में कैसे उखड़ते हैं पेड़ समझ गए हकीकत

होता था बीपी अप एंड डाउन पर अचानक आई ऐसी मुसीबत

पता नहीं किस जनम का पाप, जो चुका रहे उसकी अब कीमत


लखनऊ में हफ्ते में होती है दो दिन सुनीता की डाइलिसिस

चार हजार किराया, दो हजार बिटिया की जाती है फीस

सर पेट-मुँह दाबते, कैसे भी उड़ जाते हैं बीस-इक्कीस

किसी महीने में उधारी दे देता है प्यारा दोस्त सतीश


बारह बजे दिन से बारह बजे रात तक गाड़ी चलाता हूँ

बहुत कोशिश कर के महीने में बीस या बाईस कमाता हूँ

सर इतने से कैसे चलेगा, मैं लोगों को प्लॉट भी दिलाता हूँ

आपको कुर्सी रोड की तरफ चाहिए तो कहिए बताता हूँ


सीतापुर के बाशिंदा, सुधीर के भाई हैं पाँच

सर आज के ज़माने में कौन किसका, यही है साँच

सब अपने में मगन, दूर से हकीकत लेते हैं जाँच

सर लीजिए पहुँच गए, रुपये हुए कुल एक सौ पाँच!




रफीक मास्टर


हरदोई से भाग कर आये हैं रफीक मास्टर

पंडितखेड़ा में डेढ़ कमरे का किराये का घर

बरतन बासन कपड़ा लत्ता और बिस्तर

हँस कर कहते हैं, देख रहे नवाबों का शहर


कुछ अपनों ने मारा, कुछ गैरों ने मारा

कब तक सहते, छोड़ आये निज घर सारा

ज़िंदगी ऐसी दिखा रही, दिन ही में तारा

सी कर ढँक रहे गैरों के तन, फट गया वसन हमारा


पुलिया से आगे, फुटपाथ के किनारे

तानी है पन्नी, बांस बल्ली के सहारे

यही झोपड़िया लगाएगी नैया किनारे

फटी सब सीएंगे, टूटी मशीन के सहारे


सुनो रे भैया कहानी उनकी तुम सच्ची

कभी-कभी फांका कभी पक्की औ कच्ची

नेक है बगल वाली अपनी कलावती चच्ची

दे जाती है सुबह में रात की रोटी उनकी बच्ची


घर में मुर्गी न बकरी बस बीवी और बच्चे

समय पर चुके किराया, मौला दे न गच्चे


सुबह से शाम करते हैं काम

कभी न उनको छुट्टी-आराम

बड़े-छोटे सबको करते सलाम


हफ्ते के सौ रुपये लेता चौराहे का सिपहिया

कभी आ जाता रंगदार मनोजवा चलाता दुपहिया

फटी-उघड़ी सबकी बनाते, देखते सुखवा के रहिया

कैंची चलाते सोचते, जाएगा दुखवा ई कहिया


पैंडल मार मार फूल रहा दम, टूटही सड़क पे चलना मुश्किल

कहते रफीक होके उदास, कैसे चलेगी जीवन की साइकिल

कहिये भैया, अब आप ही कहिए

लग रहा पंचर भी हैं इसके दोनों पहिये!



रामचनर उरांव


बहुत दिनों बाद गए जब अपने गाँव

धूप से हार कर बैठे पीपल की छाँव

वहीं मिल गए मुझे, बकरी चराते रामचनर उरांव!


दुआ सलाम के बाद शुरू हो गई अपनी बात

बोले, अच्छा किये भैया आ गए हो गई मुलाक़ात

अब तो हुए हम पके आम

जाएंगे टपक जल्दी ही किसी दिन या रात


रामचनर भी गजब इन्सान हैं

लगे कहने, भैया हमको नहीं पता हम कौन कुल-खनदान हैं

ये सब ऊ लोग जानत हैं, जो खावत माँग के दान हैं

ई सब मामला में, हम तो भैया बहुत नादान हैं


बोले भैया

अपने गाँव में दूबे जी का लड़का है प्रधान

मनरेगा में काम के बदले मांगत है दछिना-दान

बुलेट पर उड़त फिरत है

मुर्गा-दारू में डूबल रहत है

धारे खादी के कुरता गजबे उसका शान


हम नहीं चढ़ा पाए चढ़ावा, ससुर प्रधान के

खा गया पैसा, हमरा पैखाना और मकान के

भैया हम कहाँ से उसको कुछ देते

बोलो कर्जा किससे हम ले लेते

हमरे ऊपर चार महीने की उधारी, दुकान परचून के

हम तो खावत है रोटी, अपना पसीना औ खून के


वृद्धा पेंशन भी हमारा नहीं आता है

कैसे जिएं हम, हमें नहीं बुझाता है

काहे भैया, हर आदमी कमजोरे को सताता है


रोने लगे रामचनर उरांव

यह देख शर्माने लगी पीपल की छांव


अच्छा छोड़ो काका

कहो तुम काकी का हाल

बोले, भैया बुढ़िया अलग बवाल

साल भर से पायल-पायल रटत है

समझाए बहुत, मगर अब पास में नहीं सटत है

उसको लगता है

बूढ़ा बहुत कमाता है

सब बहराइच वाली पतरकी को दे आता है!



खेत में एतवारू


खेत पर मिल गए आज एतवारू

दोनों, मरद और मेहरारू


हाड़ तोड़ कर मेहनत करते

कहते कैसा अंधा कुँआ है यह पेट

जो भी उपजाते

चढ़ जाता सब इसके ही भेंट

खाद बीज पानी के 

प्रबंध में खाली रहती इनकी चेट

फसल उपजती तो घट जाती उसकी रेट

बोले भैया

मीठा-मीठा बोल के

हर गोवरमिंट करती हम लोगों का ही आखेट


खा कर सुर्ती

दिखा रहे एतवारू खेत में फुर्ती


सूरज दादा ऊपर से फेंक रहे हैं आग

जल रहे हैं एतवारू के भाग

हुई न सावन-भादो बरसा

बूंद-बूंद को खेत है तरसा

एतवारू के सिर पर चढ़ा है कर्जा

बिन कापी किताब ट्यूशन के

हो रहा बबुआ की पढ़ाई का हर्जा

हो गई है बिटिया भी सयानी

उसके घर-वर को ले कर चिंतित दोनों प्रानी


थोड़ी इधर-उधर की कर के बात

मेड़ पर आ सीधी कर अपनी गात

गम में डूब लगे बताने एतवारू

रहती बीमार उनकी मेहरारू


बोले

भैया सपनों में भी अब सुख नहीं है

जीवन किसान का रस भरा ऊख नहीं है


अच्छा छोड़ो एतवारू

क्या पीते हो अब भी दारू

मुस्का कर बोले भैया यह ससुरी सरकार

है बहुत बेकार

जबसे बिहार में बंद है दारू

तबसे गरदन पे चढ़ने को थाना-पुलिस उतारू

साहेब सब पीते हैं

पैसे वाले भी पीते हैं

हम लोग भी थोड़ा-मोड़ा जब तब ले लेते हैं

पर शराब माफ़िया भैया खून चूस लेते हैं


ले ली मैंने भी ज़रा चुटकी एतवारू से

बोला सुना के उनकी मेहरारू से

लाओ बना लें खेत में ही दो पेग एतवारू

लाया हूँ मिलेट्री से बढ़िया दारू

हँस रहे हैं बेचारे एतवारू

आँख तरेर देख रही हम दोनों को

उनकी मेहरारू!



जैसे यह जीवन


हींग हल्दी जीरा लहसुन

कभी ड्यूटी

कभी दुकान परचून


ड्यूटी है करोलबाग में

डेरा यमुना पार

मालिक देखता हमें बैठ कर

सीसीटीवी में नौ से चार


आती पगार तीस-इकतीस को

उड़ जाती लगते बीस को

किराया बिजली राशन-पानी

भैया को लगता

बबुआ काट रहा दिल्ली में चानी

जैसे-तैसे कटते

महीने के अंतिम दस दिन

काम आ जाते बच्चों के गुल्लक

जिसमें रखते चिल्लर गिन


घरनी के हैं छोटे-छोटे अरमान

गुस्सा जाती है देख झोला भर सामान


पगार मिलने के दिन

जब थोड़ा पी लेता हूँ

ज़रा सा जी लेता हूँ

सो जाती है पगली चादर तान

उसके छोटे-छोटे अरमान

यार यह जीवन जैसे जंग हो

बताना भाई

अगर कोई सुविधाजनक ढंग हो!





आगरे से आया राजू


गोरखपुर में फेमस दुकान है चाय की

मऊ से आ कर बस गये गोरख राय की

वही बरतन धोता आगरे से आया राजू

बैठ गया जा कर एक दिन उसके बाजू


बरतन धोता जाता था

क्या खूब सुरीला गाता था

उमर महज बारह की थी

मगर खैनी वह खाता था


खैनी खा कर बोला, भैया

दस साल की उमर रही

मर गई खांस-खांस कर मैया


बापू के बदन पे फटी बनियान थी

हम तीन भाई बड़े थे

बहन मेरी नादान थी


बापू कैसे पेट अब भरता सबका

गैया तो हम लोगों की बिक गई थी कब की

मामू कलकता से हमारे घर

आया एक बार


उसने ही किया हम सबका बेड़ा पार

लग गये सब अपने खित्ते

भले गया बिखर अपना परिवार


बड़का रहता एक साहेब के घर

चल कर अब बंगाल में

उससे छोटका काम करता असम के चाय बागान में

बहन की हो गई शादी

जीजा का चलता है ट्रक

देख रहे हैं भैया हम लोगों का लक


बापू की उमर छियालीस साल

पक गये हैं उसके सारे बाल

टूट गये हैं दांत सब

पिचके उसके गाल

आगरे में टेसन पे रिक्शा चलाता है

बाबू जी वह भी अच्छा कमाता है


मेरा तो देख ही रहे हैं हाल

राय ससुर आदमी है या बवाल

बाबूजी इधर आइये

कान में बोला, बाबूजी इसके ठीक नहीं हैं चाल

रात में मुझे भी जबरन पिलाता है

मुर्गा अपने हाथ से खिलाता है

बाबूजी लेकिन अपनी खटिया पर ही

अपनी खटिया पर ही

मुझे भी सारी रात सुलाता है!



शंभु प्रजापति


जबसे पास आई है दिवाली

उड़ते हुए चल रहे शंभु प्रजापति और उनकी घरवाली

रात दिन छाती पर माटी उठाये 

घूम रहा है चाक

बहुत बिजी है, दिखता नहीं है आजकल कभी खाली 


नाच रहा है चाक मिट्टी नाच रही है

बिटिया भी ख़ुश है, वह कितनी उम्मीदों से ताक रही है


मिट्टी को पहले पानी में मिलाया गया

चाक पर चढ़ा कर उसको नचाया गया

फिर आवे में उसको पकाया गया


अब निखर आये हैं मिट्टी के अंग

उस पर लगा देंगे ये ज़रा सा रंग

फिर हाट में ये जाएगी शंभु के संग


ये जो हैं दिये खिलौने गुल्लक कलश

एक-एक में भरा है इन्होंने हाथों से रस


लोग बाज़ार में इन्हें बजा-बजा कर देखेंगे

उलट-पलट कर परखेंगे

जो भी बताएंगे ये दाम, लोग महंगा ही कहेंगे


कह रहे शंभु भाई, ये ही परब त्यौहार दो पैसे कमा लेते हैं

मौक़े-कुमौक़े के लिए अठन्नी-रुपैया बचा लेते हैं

बाकी तो हरदम विधाता परीक्षा ही लेते हैं

कभी पानी से खिलौने गला देते हैं

कभी गरमी से घड़े चटका देते हैं

अक्सर तो चाक पर चढ़ा कर हमें ही नचा देते हैं

आवें में हमें भी पका देते हैं


शादी-ब्याह मरनी-जीनी

शंभु भाई का जीवन मशीनी


कह रहे चिंता से भर, अब हमारे भी दिन जा रहे

प्लास्टिक के खिलौने और बरतन चढ़े आ रहे


तय किया है कि अब छोड़ेंगे गांव

देख रहे हैं शहर में कोई अच्छा सा ठांव 


रिक्शा चला लेंगे फल का ठेला लगा लेंगे

लग गया चांस तो किसी फैक्ट्री में लग के कमा लेंगे

यहाँ से तो बेहतर जिनगी की गाड़ी चला लेंगे।



सोनू कबाड़ वाला


आया है सोनू कबाड़ लेने, है छब्बीस साल का

कबाड़ का काम में जुटा, रहा जब चौदह साल का

कबाड़खाने के मालिक से रिश्ता बताता ननिहाल का

पूछने पर कहने लगा एक्सपीरियंस है बारह साल का


टूटा हुआ ठेला कभी पैदल कभी चढ़ कर चलाता है

दे दो रद्दी-सद्दी लोहा-लक्कड़ आवाज़ लगाता है

हरदम तो उसको देखता हूँ मसाला चबाता है

कह रहा कि रोज़ पाँच-छह सौ कमाता है


भैया! दो सौ तो खाने-पीने में ही उड़ जाता है

बाबू बीमार थे, मर गये वे कल

आज ही आया काम पर निकल

कह रहा, उनसे बहुत मिलता था बल

अब तो टूट गया, हो गया निर्बल


मालिक से उधार ले कर बस लेगा वो धर

बलरामपुर में है टूटा हुआ सा घर

कमाते सब मिल इतना कि पेट जाए भर

कभी कुछ गाँव में काम, कभी आते शहर


यहाँ जहाँ कबाड़ रखते हैं

वही बगल में रहते हैं

आपके कबाड़ पर पलते हैं

अच्छा भैया! बुलाइएगा फिर, चलते हैं!




रामधन! मत करना विश्वास


ये बड़े-बड़े स्कूल

नज़र फेर लो, जाओ भूल


ये बड़े-बड़े अस्पताल

पहले तुम देखो अपना हाल


ये बड़े-बड़े पुल

रामधन तेरे हिस्से कच्ची सड़क की धूल


ये रेल ये जहाज

तुम इन सपनों से आओ बाज


ये शहरों की बड़ी-बड़ी इमारतें

बदल नहीं पाएंगी तेरे जीवन की सूरतें


तेरे हिस्से हाड़ तोड़ के खटना

सबकी सुनना और चुप ही रहना


सबका साथ सबका विकास

रामधन तुम मत करना इस पर विश्वास।



मज़दूरी में क्या देंगे


रोज़ शहर के चौराहे पर 

ज़िंदगी की रोशनी आँखों में भर

अलसुबह ही जुटते हैं दस-बारह गांवों के लोग


खड़े रहते हैं

हर गुजरते को तकते रहते हैं

वे मन ही मन कुछ तो कहते रहते हैं

क्या आपने सुना जब आप बगल से गुज़रते हैं


किसी की मां बीमार है

किसी पर पंसारी का उधार है

हर आदमी यहाँ जो खड़ा है, लाचार है

साहब! समझते तो होंगे क्या दरकार है


आप टहल के आ रहे हैं

सुबह का सुहाना मौसम, गाना गा रहे हैं

वे आपको उम्मीद से देखते जा रहे हैं

क्या आप कुछ समझ पा रहे हैं


वे दूर से आये हैं चल कर

चिड़ियों के जगने से पहले घर से निकल कर

अपनी मुसीबतों से जूझेंगे आपके यहाँ वे खट कर

जीते हैं रोज़ इसी तरह ज़िंदगी से लड़ कर


सुनो सूरज भैया, तुम आराम से आना

काम चाहिए इन्हें पहले, जिसे ज़रूरत हो बताना


कल चंदर को नहीं मिला था काम

हो नहीं पाया था उसके आटे का इंतज़ाम

आज तो‌ मन ही‌ मन जप रहा वह राम-राम

बबन कहता है, देखिए हमें पसंद नहीं आराम

कुछ भी बताइये, हमें तो करना है काम


बाबूजी ये आपका मकान बना देंगे

आपकी शानो-शौकत रंग कर चमका देंगे

आपके गमलों में ख़ुशबू के फूल खिला देंगे

कर देंगे हर काम जो आप बता देंगे

कहिए बाबूजी! मज़दूरी‌ में क्या देंगे?



एक मजदूर का आत्मालाप


माना गरीब हैं मजबूर हैं

आपके कारखाने के मजदूर हैं

अगर मजबूरी न होती सर

तो क्यों छोड़ कर आते अपना गांव

अपना घर

आप चाहते हैं कि हम

भूख प्यास से जाएं मर


हुजूर दो पैसा कमाने आए हैं

आफत से अपनी जिंदगी

बचाने आए हैं


घर पर बाबूजी बीमार रहते हैं

हर महीने के अंत में

हमारी पगार की राह तकते हैं

हमारे बच्चे भी इसी पर पलते हैं


आठ घंटे खड़े खड़े आपकी मशीन चलाता हूँ

हुजूर बहुत मेहनत से दस हजार पाता हूँ

गुजरे चार साल इसी पर

आपको जरा सा भी तरस नहीं आता हम पर


चार घंटे ओवर टाइम करा कर

शर्म आती नहीं आपको

दो घंटे की मजदूरी थमा कर


कमरे का किराया बढ़ गया है

राशन कपड़ा लत्ता सबका भाव

आसमान चढ़ गया है


हुजूर हम भी हू ब हू आपकी तरह दीखते हैं

आप हमें क्यों कीड़ा मकोड़ा समझते हैं

भूल जाते हैं मगर

कि हमारी कमाई पर ही आप पलते हैं


माना कि सीएम आपका

डीएम आपका

कप्तान गुलाम आपके बाप का

मगर हुजूर गर हम नहीं रहे

तो कुछ भी नहीं रहेगा आपके काम का


आपको है अपने धन का अभिमान

तो हमें भी है अपनी मेहनत का गुमान

इस बात ठीक से समझ लीजिए श्रीमान!



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क 


मोबाइल : 8756219902

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