सुरजीत मजूमदार का वक्तव्य 'भूमंडलीकरण के बाद की आर्थिक प्रक्रियाएं और अमेरिकन पूँजी'


सुरजीत मजूमदार


विविधताएं किसे नहीं सुहाती। विविधताओं से भरी हुई अपनी यह धरती खूबसूरत दिखती है। बोली, भाषा, संस्कृति, धर्म, नस्ल आदि विविधताओं से भरी यह दुनिया अपने आप में नायाब है। लेकिन कुछ शक्तियों के लिए यह बर्दाश्त नहीं कि दुनिया अपनी मर्जी से चले। ये ताकतवर शक्तियाँ चाहती हैं कि उनकी मर्जी के बिना पत्ता तक न हिले। वे अपनी भाषा, बोली, धर्म और मुद्रा तक का वर्चस्व पूरी दुनिया पर चाहती हैं। अमरीका इन शक्तियों का सरगना है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व स्तर पर अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ा। इसके बाद भूमंडलीकरण की ज़मीन तैयार की गई Washington Consensus (WC) के जरिए। वाशिंगटन कंसेंसस, यानी अमेरिका के वाशिंगटन शहर में स्थित तीन संस्थाओं — ‘विश्व बैंक’, ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ और ‘यू.एस. ट्रेज़री’ — द्वारा सुझाए गए दस नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के फ़ॉर्मूले ने निजीकरण, मुक्त व्यापार, टैक्स सुधार और डी-रेगुलराइजेशन की वकालत की और पूरी दुनिया को भूमंडलीकरण के जाल में बुरी तरह उलझा दिया। लेकिन अब महाशक्ति के तौर पर उसका आसन डोलने लगा है। चीन की शक्ति की आहट को अब सब महसूस करने लगे हैं। आज अमरीका ईरान के साथ लड़ाई में उलझा हुआ है। इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा है। भारत पर खास तौर पर ज्यादा। क्योंकि हम तेल और खाद दोनों के लिए विदेशों पर ही अवलंबित हैं। हमने इसका कोई विकल्प तैयार नहीं किया। आज स्थिति यह है कि भारत को अमेरिका के सामने घुटने टेकने पड़ रहे हैं। रूस से तेल मंगवाने के लिए अमरीका के इशारे पर चलना पड़ रहा है। क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में वह क्षमताएँ नहीं हैं कि वह किसी रूप में आत्मनिर्भर हो सके, या विश्व अर्थव्यवस्था में इस तरह शामिल हो कि उसकी स्वायत्तता पर नकारात्मक असर न पड़े। हमारे देश की राजनीति ने अर्थव्यवस्था को और पलीता ही लगाया है। अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त का राशन बांट कर आप अपनी पीठ कब तक थपथपाएंगे। क्या जनता के इस बड़े वर्ग को स्वावलंबी बनाने की कोई गम्भीर कोशिश की गई है। सुरजीत मजूमदार उचित ही कहते हैं कि 'अगर हिंदुस्तान को इस स्थिति से निकलना है तो दूरदर्शिता की ज़रूरत है। आपको समझना पड़ेगा कि इस तरह की आर्थिक विकास प्रक्रिया से बहुसंख्यक आबादी का कोई भला नहीं होने जा रहा है। हो सकता है कि कुछ पूँजीपतियों ने इस प्रक्रिया से ख़ूब कमाई कर ली हो, ख़ूब फ़ायदा उठा लिया हो, लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता को इसका लाभ नहीं पहुँचा। हमारी अर्थव्यवस्था के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं।' जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर सुरजीत मजूमदार ने अपने एक वक्तव्य में इस आर्थिक जटिलता को आसान भाषा में समझाने की कोशिश की है। प्रेस क्लब, लखनऊ के सभागार में 25 अप्रैल 2026 को उन्होंने अपना यह महत्वपूर्ण वक्तव्य रखा। पहली बार के लिए प्रतुल जोशी ने इस वक्तव्य को अंग्रेजी से हिन्दी में ट्रांसलेट और ट्रांसक्राइव करने का दुरूह कार्य किया। तो आइए आज पहली बार बात पर हम पढ़ते हैं सुरजीत मजूमदार का वक्तव्य 'भूमंडलीकरण के बाद की आर्थिक प्रक्रियाएं और अमेरिकन पूँजी'।



भूमंडलीकरण के बाद की आर्थिक प्रक्रियाएं और अमेरिकन पूँजी'


सुरजीत मजूमदार


प्रस्तुति : प्रतुल जोशी


बतारीख़ 25 अप्रैल 2026

बमुक़ाम प्रेस क्लब, लखनऊ

वक़्त सायं 04:30 से 07:00 बजे शाम


हमारी संस्था 'जन विचार मंच' तक़रीबन पिछले 25 वर्षों से लखनऊ में सक्रिय है। इस संस्था का एक ही मक़सद रहा है — विभिन्न आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर समय-समय पर संगोष्ठियाँ आयोजित करना। इसी सिलसिले की एक कड़ी के तौर पर हम लोगों ने प्रोफे़सर सुरजीत मजूमदार को 'अमेरिका, इज़राइल-ईरान युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था' पर बोलने के लिए आमंत्रित किया था।

प्रोफे़सर मजूमदार से मेरी पहले कोई मुलाक़ात नहीं थी। हमारे एक साथी को छोड़ कर कोई भी उनसे नहीं मिला था। बस इतना पता था कि वह अकेले शख़्स हैं, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली छात्रसंघ के अध्यक्ष होने के साथ-साथ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अध्यापक संघ के भी अध्यक्ष रह चुके हैं। अर्थशास्त्र के बड़े विद्वान हैं। लेकिन मुझे उनके नाम को लेकर संशय था। थोड़ी-बहुत बांग्ला जानने के चलते मैं कह सकता था कि उनका नाम सुरजीत तो नहीं हो सकता, क्योंकि बांग्ला में 'स' शब्द है ही नहीं। वहाँ हिंदी के 'स' का उच्चारण 'श' के तौर पर किया जाता है।

25 अप्रैल 2026 को प्रेस क्लब के गेट पर जैसे ही मेरी उनसे मुलाक़ात हुई, मैंने पहला प्रश्न किया — “आपका नाम शूरोजीत है ना?” उन्होंने मुस्करा कर सहमति जताई। साथ ही जोड़ा, “अंग्रेज़ी में तो और भी न जाने कैसे-कैसे उच्चरित करते हैं?”

प्रोफेसर सुरजीत एक रोचक व्यक्तित्व के स्वामी हैं। बिरले हैं कि अपने Alma Mater में छात्रसंघ और अध्यापक संघ — दोनों के अध्यक्ष रहे। आर्थिक जगत में भूमंडलीकरण के प्रश्नों पर काफ़ी काम किया है। भारतीय उद्योग जगत पर बहुत से शोधपत्र लिखे हैं। उनकी माँ वीणा मजूमदार देश की ख़्यातिनाम महिला एक्टिविस्ट थीं, जिन्होंने देश में महिला विकास अध्ययन की नींव रखी। वह ICSSR (इंडियन काउंसिल ऑफ़ सोशल साइंस रिसर्च) के तहत स्थापित Centre for Women's Development Studies की संस्थापक निदेशक थीं। पिता शंकर मज़ूमदार संगीतकार थे। वीणा जी ने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से 1962 में डी. फिल. की उपाधि प्राप्त की थी।

25 अप्रैल, 2026 को लखनऊ में सूरज के तेवर बहुत कड़े थे। तापमान तैंतालीस डिग्री के क़रीब पहुँच गया था। लेकिन इस तपिश को भी धता बताते हुए तक़रीबन 80-90 लोग पाँच बजते-न-बजते लखनऊ प्रेस क्लब में थे। इसमें बहुत-सी महिला आंदोलन से जुड़ी महिलाएँ थीं, तो कुछ वरिष्ठ पत्रकार, डिग्री कॉलेजों के अध्यापकगण, रंगकर्मी, लेखक, शोध छात्राएँ, विभिन्न ट्रेड यूनियनों के कार्यकर्ता, गृहिणियाँ आदि-आदि थे।

संगोष्ठी तय समय से 15 मिनट देर से, यानी 4 बज कर 45 मिनट पर प्रारंभ हुई। डॉक्टर अंशु केडिया ने संचालन की ज़िम्मेदारी संभाली, तो जाने-माने मानवशास्त्री डॉक्टर नदीम हसनैन जी ने वक्ता का परिचय श्रोताओं से करवाया। संगोष्ठी की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. रमेश दीक्षित ने की।

62 वर्षीय प्रोफेसर सुरजीत मजूमदार जब बोलने के लिए माइक के सामने आए, तो अधिकांश लोगों को उम्मीद थी कि वह Hormuz की खाड़ी से बात शुरू करेंगे या बताएँगे कि अमेरिका, इज़राइल-ईरान युद्ध से भारतीय शेयर बाज़ार को कितना झटका लगा है, या फिर कैसे एलपीजी का संकट खड़ा हो गया था। लेकिन एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री की तरह उन्होंने पहले उस आर्थिक पृष्ठभूमि को विस्तार से बताना शुरू किया, जो इस युद्ध की जड़ों में थी। फिर एक घंटे के अपने वक्तव्य में, बिना किसी उत्तेजना के, वह धीरे-धीरे, बड़े आराम से, स्मित मुस्कान के साथ एक-एक कर आर्थिक पृष्ठभूमि की गाँठें खोलते गए। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई महिला स्वेटर बुनने के पहले उलझे हुए ऊन की गाँठें खोलती जाए, खोलती जाए, और जब सारी गाँठें खुल जाएँ, तो फिर जनता को पता चले कि कितनी आसानी से इस उलझे हुए ऊन को सुलझाया जा सकता था।


प्रोफे़सर सुरजीत ने प्रारंभ किया यह कहते हुए कि हमारे सामने चुनौतियाँ गंभीर हैं और युद्ध का आधार क्या है। लेकिन उन्होंने चुनौतियाँ क्या हैं, इसका उद्घाटन नहीं किया। यह चुनौतियाँ क्या हैं, इसका पता दर्शकों/श्रोताओं को उनके वक्तव्य के अंत में लगा। वह सीधे आ गए भूमंडलीकरण पर। बताने लगे कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया स्थायी है, निरंतर है। फिर उन्होंने भूमंडलीकरण का इतिहास बताया।


शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व स्तर पर अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ गया था। रूस कमज़ोर हो गया था। न तो कोई और महाशक्ति थी, जो अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती दे सकती थी, न ही अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन का कोई देश। अमेरिका के प्रभुत्व का आधार था — राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक।



प्रोफे़सर सुरजीत का मानना है कि भूमंडलीकरण की ज़मीन तैयार की Washington Consensus (WC) ने। वाशिंगटन कंसेंसस, यानी अमेरिका के वाशिंगटन शहर में स्थित तीन संस्थाओं — ‘विश्व बैंक’, ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ और ‘यू.एस. ट्रेज़री’ — द्वारा सुझाया गया दस नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का फ़ॉर्मूला। इस फ़ॉर्मूले ने निजीकरण, मुक्त व्यापार, टैक्स सुधार और डी-रेगुलराइजेशन की वकालत की। यह मुद्दा लैटिन अमेरिकी देशों के लिए था। लेकिन वर्ष 1991 में भारत ने भी इसी सलाह को अपनाया, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कम पड़ गया था।


प्रोफ़ेसर मजूमदार ने अमेरिकी दादागिरी के बारे में और जानकारी देते हुए कहा कि अमेरिका का ऐसा प्रभुत्व था कि आप अपनी पूँजी दुनिया में कहीं भी लगाइए, वह सुरक्षित रहेगी।


भूमंडलीकरण के बाद किस तरह की आर्थिक प्रक्रियाओं ने जन्म लिया? अमेरिकन पूँजी, जो पूरी दुनिया भर में लगाई गई, उससे अत्यधिक फ़ायदा हुआ। अमेरिका के सबसे ऊपरी तबके के जो दस फ़ीसदी थे, उन्हें अत्यधिक फ़ायदा हुआ। जहाँ उत्पादन नहीं था, वहाँ अमेरिका ने वित्तीय निवेश किया। इस वित्तीय निवेश से भी अमेरिका को ख़ूब फ़ायदा मिला।


भूमंडलीकरण के बाद एक और विशिष्ट प्रक्रिया ने जन्म लिया कि उत्पादन एक देश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई इकाइयों में बँट गया। वस्तुओं के उत्पादन का बहुत बड़ा हिस्सा किसी और देश से करवाया गया। प्रोफ़ेसर सुरजीत ने Apple फ़ोन का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे Apple फ़ोन के अलग-अलग पार्ट्स अलग-अलग देशों में बनते हैं, लेकिन कोई एक शक्ति है, जो इसको संगठित करती है। और Apple एक ब्रांड के तौर पर बिकता है।


भूमंडलीकरण का अमेरिका में प्रभाव?

भूमंडलीकरण के चलते अमेरिका में आय की असमानताएँ बहुत तेज़ी से बढ़ीं। अमेरिका में जो ऊपरी 10 फ़ीसदी हैं, आय का बढ़ा हुआ हिस्सा उसी के पास जाता है। लेकिन जो निचली पायदान पर 40 फ़ीसदी हैं (अमेरिकी मज़दूर), पिछले 40 वर्षों में उनकी आय में बढ़ोतरी बेहद नगण्य रही। जब एक बड़े हिस्से की आय नहीं बढ़ी, तो घरेलू बाज़ार तैयार नहीं हुआ। बाज़ार न बढ़ने के कारण उत्पादन में बढ़ोतरी में मुश्किलें आईं।


विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के पीछे के ख़तरे

भूमंडलीकरण के दौर में विभिन्न सरकारों द्वारा विदेशी पूँजी को आकर्षित दो वजहों से किया गया। प्रथम, वह आपके बाज़ार के लिए उत्पादन करें एवं द्वितीय, पूरी दुनिया के बाज़ार के लिए उत्पादन करें। अगर किसी देश को विदेशी पूँजी को आकर्षित करना है, तो घरेलू स्तर पर भारी टैक्स नहीं लगा सकते। भारी टैक्स लगाया, तो पूँजी कहीं और चली जाएगी। अब राजस्व प्राप्ति के लिए टैक्स कम होगा, तो सार्वजनिक ख़र्च को कम करना होगा।


सार्वजनिक ख़र्च, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च ज़्यादा होगा और राजस्व प्राप्ति कम होगी, तो महँगाई बढ़ेगी। महँगाई बढ़ेगी, तो मुद्रा का मूल्य घटेगा। मुद्रा का मूल्य घटेगा, तो दूसरे देशों की मुद्रा की क़ीमत पर असर पड़ेगा। यदि किसी देश की मुद्रा का मूल्य घटेगा, तो विदेशी निवेशक उस देश से ज़्यादा व्यापार करने के इच्छुक नहीं होंगे।


अमेरिकी प्रभुत्व का असर यह भी है कि आज पूरा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह रहता है कि डॉलर के बदले आपकी मुद्रा का मूल्य क्या होगा? यदि आपकी अर्थव्यवस्था कमज़ोर है, तो विदेशी शक्तियाँ पैसा निकालेंगी। जैसे ही पैसा निकालेंगी, सब डॉलर माँगना प्रारंभ कर देंगे, डॉलर का संकट हो जाएगा।


भूमंडलीकरण के दौर में यदि आपकी अर्थव्यवस्था सबके लिए खुली है, तो आपकी चुनौती है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का मूल्य स्थिर रहे। इसके लिए ज़रूरी है कि सार्वजनिक ख़र्चों को सीमित रखें, ताकि कोई यह अपेक्षा न करे कि आपकी मुद्रा का मूल्य घट सकता है। यानी आप न टैक्स लगा सकते हैं, न ख़र्च कर सकते हैं। इन सबके चलते उत्पादन में वृद्धि हो, यह संभव नहीं। पिछले 30-40 वर्षों में उत्पादन में जो वृद्धि की रफ़्तार है, वह द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात उत्पादन की वृद्धि के मुक़ाबले धीमी पड़ गई है।



विश्व स्तर पर उत्पादन के भूगोल में ऐतिहासिक परिवर्तन

प्रोफेसर सुरजीत औद्योगिक क्रांति से अपनी बात प्रारंभ करते हैं और कहते हैं कि औद्योगिक क्रांति के बाद औद्योगिक उत्पादन का बड़ा हिस्सा कुछ विकसित देशों में केंद्रित हो गया था। उसी के आधार पर यह फ़र्क बना कि कुछ देश विकसित हैं और बाकी विकासशील। औद्योगिक उत्पादन में यह संभावनाएँ अधिक हैं।


प्रोफेसर सुरजीत अर्थव्यवस्था के पारंपरिक वर्गीकरण को प्रस्तुत करते हुए बताते हैं कि किसी भी देश में उत्पादन के तीन क्षेत्र होते हैं— प्रथम कृषि, द्वितीय औद्योगिक क्षेत्र और तृतीय सेवा क्षेत्र। कृषि में उत्पादन तो किसी एक सीमित क्षेत्र में ही हो सकता है। इसी तरह सेवा क्षेत्रों में यह संभव है कि उसका उत्पादन वहीं हो जहाँ उनका उपयोग हो। जैसे यदि कोई नाई के पास बाल कटवाने जाता है तो जहाँ नाई की उपस्थिति होगी वहीं जाएगा। अब कोई अमेरिकी अमेरिका में है तो हिंदुस्तान में बैठे नाई से बाल नहीं कटवा सकता। लेकिन औद्योगिक उत्पादन में स्थान विशेष तक सीमित रहना संभव नहीं है।


औद्योगिक उत्पादन का ऐतिहासिक केंद्रीकरण हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और जापान औद्योगिक उत्पादन के बड़े केंद्र बन कर उभरे थे। सन् 2000 तक पूरे विश्व के औद्योगिक उत्पादन का 75 फ़ीसदी विकसित देशों में हो रहा था। लेकिन पिछले 25 वर्षों में, और विशेष रूप से इस सदी के पहले दशक में, एक गंभीर परिवर्तन हुआ। विकसित देशों का हिस्सा 75 फ़ीसदी से घट कर 40 फ़ीसदी से कम हो गया। इसका मतलब यह नहीं कि विकासशील देशों में उत्पादन बढ़ गया, बल्कि एक नया केंद्र विश्व पटल पर उभरा, और यह था चीन।


वर्ष 1990 तक चीन का पूरे विश्व स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में हिस्सा दो फ़ीसदी से कम था। हिंदुस्तान से ज़्यादा नहीं था। लेकिन अब वह 30 फ़ीसदी से ज़्यादा हो गया है। औद्योगिक उत्पादन की एक लंबी कड़ी होती है। एक हिस्सा यहाँ, एक हिस्सा वहाँ। इन्हें ‘Intermediate Products’ कहते हैं। आज स्थिति यह है कि किसी औद्योगिक उत्पादन की कड़ी अब ऐसी नहीं है जिसका एक हिस्सा चीन में उत्पादित न हो रहा हो। इसलिए Intermediate Products में भी चीन का हिस्सा 40 से 50 फ़ीसदी तक पहुँच गया है।


पहले जिन पूर्वी एशियाई देशों में औद्योगीकरण हुआ, उसके मुकाबले चीन बड़ा देश है और चीन ऐतिहासिक रूप में अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में उस रूप में नहीं था जितना बाकी देश थे। चीन का इतिहास अलग था। वह भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का फ़ायदा उठाते हुए अपने को विकसित कर पाया। जब चीन इस प्रक्रिया में शामिल हुआ तो वहाँ आय का बँटवारा अपेक्षाकृत समान था, घरेलू बाज़ार बड़ा था और उसके पास स्वायत्तता थी। पहले तो वहाँ उत्पादन आया क्योंकि वहाँ मज़दूरी सस्ती थी। चीन के पास वह स्वायत्तता थी जिसे भूमंडलीकरण के दौर में बाकी देशों को खोना पड़ा था।


चीन ने अपने आप बड़े पैमाने पर तकनीकी विकास किया और विदेशी कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम की। चीन और पूर्वी एशिया के देश पूरे विश्व के लिए औद्योगिक उत्पादन का केंद्र बन गए। उनके यहाँ जो निर्यात होता है वह आयात से अधिक है। वे विदेशी मुद्रा के भंडार बना सके। बहुत-सी अमेरिकी कंपनियों का चीन में पैसा लगा है।


एक बार चीन ने अपनी क्षमताएँ विकसित कर लीं तो इसका असर बाकी विकासशील देशों पर पड़ा। अब चीन और पूर्वी एशिया बाज़ार बन गए। दूसरी तरफ़ विदेशी मुद्रा के भंडार के लिए विकासशील देशों को अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों का मुँह नहीं देखना था। चीन और पूर्वी एशिया के देश भी उनकी मदद के लिए तत्पर थे। चीन ने तीसरी दुनिया के देशों को अमेरिका की जकड़ से बाहर निकाला। यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।


भूमंडलीकरण के भीतर ही जिस समय चीन औद्योगीकरण के विश्व पटल पर तेज़ी से उभर रहा था, उस वक़्त अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों में ग़ैर-औद्योगीकरण (De-industrialisation) की प्रक्रिया चल रही थी। ग़ैर-औद्योगीकरण यानी सकल उत्पाद एवं रोज़गार में औद्योगिक क्षेत्र के हिस्से का कम होना।


हम अपने इतिहास में एक दूसरी क़िस्म का ग़ैर-औद्योगीकरण भुगत चुके हैं, जब अंग्रेज़ अपने उत्पाद हमारे बाज़ार में बेचते थे तो हमारे पारंपरिक उद्योग-धंधे नष्ट हो गए थे। लेकिन 20वीं सदी के अंतिम दशक से 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में विकसित देशों में De-industrialisation की प्रक्रिया औद्योगीकरण के बाद की प्रक्रिया है, जिसमें औद्योगिक क्षेत्र का हिस्सा कम होता है और सेवाओं का हिस्सा बढ़ता है। यह प्रक्रिया सभी विकसित देशों में देखने को मिलती है।


ग़ैर-औद्योगीकरण की प्रक्रिया हिंदुस्तान में भी हुई। फ़र्क यह है कि विकसित देशों में यह प्रक्रिया बड़े औद्योगीकरण के पश्चात शुरू हुई। ये देश प्रति व्यक्ति आय का एक स्तर हासिल कर चुके थे, लेकिन बाकी देशों में बड़े औद्योगिक उत्पादन के पहले ही ग़ैर-औद्योगीकरण शुरू हो गया। अपवाद थे पूर्वी एशिया के कुछ देश, जिनमें द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात बहुत तेज़ी से औद्योगीकरण हुआ था। ये देश थे— साउथ कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, हांगकांग, मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड।




अमेरिका को चुनौती

अमेरिका आज भी पूरे विश्व की नंबर एक महाशक्ति है। अमेरिकी डॉलर के आधार पर पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चलती है। तकनीकी, वित्तीय एवं सैनिक शक्ति के मामले में अमेरिका आज भी नंबर एक पर है। उसको अभी भी कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन अब अमेरिका को यह एहसास होने लगा है कि उसकी पकड़ कमज़ोर होने लगी है। उसके प्रभुत्व का आधार कमज़ोर हो रहा है। इसलिए अमेरिका अपनी बची-खुची शक्ति लगा रहा है ताकि भूमंडलीकरण की वर्तमान प्रक्रिया अपने अंजाम तक न पहुँचे। हो सकता है कि वह वापस हो जाए, ताकि अमेरिका का प्रभुत्व बरक़रार रहे।


इस प्रयास में वह सैनिक, आर्थिक— जो भी हथियार इस्तेमाल कर सकता है— कर रहा है। तो जो भी हम देख रहे हैं, वह इसी अंतर्विरोध का असर है। इसलिए यह नहीं कि कोई पागल आदमी अमेरिका का राष्ट्रपति बन गया, इसलिए यह हो रहा है; या अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम से बचने के लिए इज़राइल युद्ध लड़ रहा है। पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था इधर से उधर हो गई है।


आज अमेरिका चाहे कि सारा उत्पादन चीन से वापस आ जाए, तो यह संभव नहीं। उसके यहाँ जो भी उत्पादन होता है वह चीन के उत्पादन पर निर्भर है। अमेरिका के इन प्रयासों के चलते हम अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में तमाम तरीक़े के disruptions देख रहे हैं। कोई भी महाशक्ति चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी कि दुनिया बदल गई है। इसलिए हम आज जो चुनौतियाँ देख रहे हैं, यह स्थिति लंबे दौर तक देखने को मिलेगी। भूमंडलीकरण के दौर में अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं। आप उनसे निकल नहीं सकते।


हिंदुस्तान के सामने विशेष चुनौती

भारत में जितनी विदेशी पूंजी औद्योगिक क्षेत्र में आई, वह केवल हिंदुस्तान के बाज़ार में बेचने के लिए आई। यानी हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी नहीं रही कि वह अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में सफल हो पाए। यहाँ मज़दूरी सस्ती थी, लेकिन यह स्थिति नहीं थी कि आप औद्योगिक क्षेत्र में मज़बूती से खड़े हो सकें। केवल एक क्षेत्र है, और वह है दवाइयों का क्षेत्र। इसमें 1970 के पेटेंट एक्ट की ख़ासियत की वजह से ऐसा संभव हुआ।


भारत की अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में औद्योगिक क्षेत्र की जो कड़ियाँ बनीं, उनका झुकाव आयात की तरफ़ है, निर्यात की तरफ़ नहीं। भारत को Information Technology के क्षेत्र में सफलता मिली। आईटी क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को भारत में अपेक्षाकृत सस्ते दर पर श्रमिक मिले, इसलिए वे यहाँ काम करवाते हैं— कुछ हिंदुस्तानी कंपनियों से और कुछ अपना निवेश करके। आईटी में भारत में जितना उत्पादन हो रहा है उसका 80 फ़ीसदी निर्यात हो रहा है।


हम औद्योगिक क्षेत्र में अपनी स्थिति मज़बूत नहीं कर पाए, इसलिए हमारी आर्थिक प्रणाली पूर्वी एशिया से आयात करने पर निर्भर हो गई। पूर्वी एशिया के साथ जो भी व्यापार है उसमें हिंदुस्तान का घाटा है। वहाँ से आयात ज़्यादा है, निर्यात कम। व्यापार घाटे के भुगतान के लिए डॉलर की ज़रूरत पड़ती है।


हम पेट्रोलियम पदार्थों और खाद के लिए आयात पर निर्भर हैं। हमारे देश में खाद का उत्पादन इतना नहीं कि हमारी आवश्यकताओं को पूरा कर सके, इसलिए हमें आयात करना पड़ता है। खाद उद्योग में कच्चा माल भी आयात करना पड़ता है। इसी तरह तेल निर्यात करने वाले देशों के साथ व्यापार में भी हमारा घाटा है।


इन देशों में हमारे मज़दूर जाते हैं और वे जो पैसा भेजते हैं, उससे हम कुछ हद तक घाटा पूरा करते हैं। इसी तरह अमेरिका और अन्य विकसित देशों को जो औद्योगिक उत्पादन निर्यात करते हैं, उससे भी हमें फ़ायदा होता है। एक अन्य क्षेत्र है जहाँ से व्यापार घाटा पूरा होता है, और यह क्षेत्र आईटी सेक्टर का है। आईटी सेवाओं का 55 फ़ीसदी हम अमेरिका को निर्यात करते हैं और 35 फ़ीसदी अन्य विकसित देशों को।


भारत के हज़ारों-हज़ार कुशल एवं अकुशल श्रमिक विदेशों में बसे हैं। वे जो धन-प्रेषण (Remittance) करते हैं, वह हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छी-ख़ासी वृद्धि करता है। पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा Remittance अगर किसी देश को आता है तो वह भारत है। इसमें से आधा विकसित देशों से आता है और 27 फ़ीसदी अमेरिका से आता है, क्योंकि अमेरिका बड़े पैमाने पर आईटी क्षेत्र से जुड़ा है।


भारत की विदेशों पर तीन तरह की निर्भरता है-

1. पूर्वी एशियाई देशों पर अपने औद्योगिक उत्पादन के लिए।

2. खाड़ी देशों पर तेल और खाद के कच्चे माल के लिए।

3. अमेरिका और विकसित देशों पर आईटी क्षेत्र की सेवाओं के निर्यात के लिए।


जो भी बचा हुआ विदेश व्यापार घाटा है, उसको पूरा करने के लिए जो विदेशी पूंजी हमारे देश में आती है, वह अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों से आती है। इसलिए हम उन पर भी निर्भर हैं।


अब इस स्थिति में हिंदुस्तान के लिए क्या भविष्य है? इसके परिणाम हम पहले ही देख चुके हैं, जब अमेरिका के साथ भारत ने ट्रेड डील पर हस्ताक्षर किए। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि यह एक असामान्य डील है। अमेरिका ने टैरिफ वापस नहीं लिया, बल्कि कम किया; जबकि हमने तो कोई टैरिफ लगाया ही नहीं। अमेरिकी बाज़ार हमारे लिए सीमित हो गया और हिंदुस्तानी बाज़ार अमेरिका के लिए खुल गया।



यह क्यों किया गया? क्या मजबूरी थी?

मजबूरी यह थी कि $80 की कमाई बचाने के लिए $10 छोड़ दिए जाएँ, क्योंकि आप उस पर निर्भर हैं। अगर वह नहीं आया तो आपकी उत्पादन प्रणाली कैसे चलेगी? हिंदुस्तान की सरकार न इधर जा पा रही है, न उधर।


आज दुनिया में स्थिति यह है कि अमेरिका को स्वीकार करना पड़ेगा कि दुनिया बदल गई है। वह अब अकेली महाशक्ति नहीं है। अगर अमेरिका यह स्वीकार कर ले तो हम शांति से रह सकते हैं, नहीं तो अमेरिका-ईरान जैसे युद्ध और तनाव बने रहेंगे। दूसरा विकल्प यह है कि आप अमेरिका के साथ जुड़ जाइए और उसके प्रभुत्व को बरक़रार रखिए।


हिंदुस्तान इस स्थिति में क्यों पहुँचा?

इधर भी मजबूर, उधर भी मजबूर। कुछ नहीं बोल पा रहा। हिंदुस्तान इस स्थिति में इसलिए पहुँचा क्योंकि कई सरकारों ने यह सोचा कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में शामिल हो कर हम सफल होंगे। अगर अमेरिका और चीन में तनाव हो तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा; अमेरिका हमें अपना दोस्त बना लेगा और सारी फ़ैक्ट्रियाँ चीन छोड़ कर हिंदुस्तान में आ जाएँगी। इसी सोच के आधार पर नीतियाँ बनाई गईं।


लेकिन यह एक शॉर्ट-टर्म नज़रिया है, क्योंकि आप पूरे विश्व स्तर पर हुए परिवर्तन को नहीं देख रहे हैं। आज लड़ाई है, जंग है, तनाव है— और उसी के बीच में क्या हो सकता है, बस वही देखा जा रहा है। अगर आपमें दूरदर्शिता हो तो आपको समझना पड़ेगा कि यह स्थिति हिंदुस्तान के लिए बेहद ख़तरनाक है। यहाँ आपको अमेरिका के सामने घुटने टेकने पड़ रहे हैं, क्योंकि आपकी अर्थव्यवस्था में वह क्षमताएँ नहीं हैं कि वह किसी रूप में आत्मनिर्भर हो सके, या विश्व अर्थव्यवस्था में इस तरह शामिल हो कि आपकी स्वायत्तता पर नकारात्मक असर न पड़े।


अगर हिंदुस्तान को इस स्थिति से निकलना है तो दूरदर्शिता की ज़रूरत है। आपको समझना पड़ेगा कि इस तरह की आर्थिक विकास प्रक्रिया से बहुसंख्यक आबादी का कोई भला नहीं होने जा रहा है। हो सकता है कि कुछ पूँजीपतियों ने इस प्रक्रिया से ख़ूब कमाई कर ली हो, ख़ूब फ़ायदा उठा लिया हो, लेकिन देश की बहुसंख्यक जनता को इसका लाभ नहीं पहुँचा। हमारी अर्थव्यवस्था के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं।


आज स्थिति यह है कि अगर हमारे यहाँ तेल नहीं हो तो हम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन कहीं न कहीं निर्भरता कम करनी होगी। औद्योगिक उत्पादन तो हम कर सकते हैं। विदेशी बाज़ार पर ही निर्भरता क्यों हो? हमारे यहाँ इतनी बड़ी जनसंख्या है, इतना बड़ा बाज़ार है। इस बाज़ार को विकसित करने की ज़रूरत है।


आज हम भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में शामिल तो हो रहे हैं, लेकिन उसका एक ही आधार है— सस्ती मज़दूरी। जिस तरह से हम इस प्रक्रिया में शामिल हुए हैं, उसमें हमारा कोई भविष्य नहीं है। इसे पहचान कर हमें एक नया रास्ता निकालना पड़ेगा— अगर निकाल पाए तो। हिंदुस्तान का तभी कोई भविष्य हो सकता है, नहीं तो यह संकट और गहरा होगा।


अभी तो एलपीजी की दिक़्क़त हुई है। चुनाव हो जाने दीजिए, उसके बाद देखिए तेल का क्या होता है, खाद का क्या होता है। और इन सबका असर हिंदुस्तान के रुपये पर भी पड़ेगा। हम एक बेहद गंभीर और नाज़ुक स्थिति में हैं।


आज जो तनाव हम देख रहे हैं, उसमें तो हम यह भी भूल गए कि क्लाइमेट चेंज भी कोई मुद्दा है। 2030 तक कुछ करना था, नहीं तो ऐसे परिवर्तन हो जाएँगे जिन्हें हम वापस नहीं कर पाएँगे।


विश्व स्तर पर तो एक संकट है, लेकिन हमारा एक विशेष संकट भी है। जिस तरह से हम भूमंडलीकरण में शामिल हैं, उसमें हमारा कोई उज्ज्वल भविष्य नहीं है। इसे पहचान कर अगर हम कोई नया रास्ता निकाल पाए, तभी हिंदुस्तान आगे बढ़ सकता है। नहीं तो यह संकट और गहरा सकता है।


यह हम सबकी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपनी सामाजिक ज़िंदगी में ऐसी भूमिका निभाएँ जिससे हिंदुस्तान की राजनीतिक प्रक्रियाएँ सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ें।

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