चन्द्रभूषण का आलेख आल्हखंड का पुनर्पाठ
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| चन्द्र भूषण |
आमतौर पर आल्हा ऊदल का नाम सुनते ही हमारे जेहन में बुंदेलखंड अंचल और वहां की वीरता की अनुगूँज सहज ही सुनाई पड़ती है। यह अलग बात है कि भारत में इतिहास और लोक कथाएं आपस मे कुछ इस तरह अन्तर्गुम्फित हैं कि इन्हें अलग कर पाना खासा मुश्किल है। यह दरअसल तेईस लड़ाइयों की दास्तां है और हर लड़ाई में चार-छह ‘तरंगें’ अनिवार्य रूप में आती हैं। हालांकि अल्हैत इनसे सहमत नहीं और वे कुल बावन लड़ाइयों का दावा करते हैं जिसका जिक्र बाबू श्याम सुंदर दास ने अपने सम्पादन में किया है। बहरहाल आल्हा ऊदल की गाथा भले ही बुंदेलखंड अंचल की हो, इसकी ख्याति चारों तरफ रही है। हाल फिलहाल तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों में गवैए इसे पूरे तरन्नुम के साथ गाते बजाते थे। हर्षवर्धन के पश्चात उत्तर भारत में अनेक छोटे छोटे राज्य स्थापित हुए जिनमें गहरवार, चौहान, चंदेल और परिहार शासकों के राज्य प्रमुख हैं। ये राज्य अकसर आपस में ही लड़ा भिड़ा करते थे। कभी यह लड़ाई राज्य विस्तार के लिए तो कभी कभी शौर्य प्रदर्शन मात्र के लिए की जाती थी। कालिंजर के परमार शासक परमार्दि देव के राजकवि जगनिक ने महोबे के दो देशप्रसिद्ध वीरों - आल्हा और ऊदल के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में किया है। इसे 'आल्ह खण्ड' नाम से जाना जाता है जो आल्हा ऊदल नामक दो वीरों की गाथा है। आल्हा परमार शासक के सेनापति थे और अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। आल्हा के छोटे भाई का नाम ऊदल था और वह भी वीरता में अपने भाई से बढ़ कर थे। मान्यता है कि अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल 1182 ई. में वीरगति को प्राप्त हुए। अपने छोटे भाई के वीरगति की खबर सुन कर आल्हा अपना अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर टूट पड़े। पृथ्वीराज और आल्हा के बीच भीषण युद्ध हुआ। पृथ्वीराज चौहान इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो गए। अपने गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दे दिया और आल्हा ने अन्ततः नाथ पन्थ स्वीकार कर लिया। आल्हा ऊदल की लोक ख्याति कुछ इस तरह की है आज भी उनके अमर होने की धारणाएं आम जन के बीच है। संभवतः आल्हा ऊदल के संघर्ष और जुझारूपन में यह लोक अपनी तस्वीर देखता है और इसी क्रम में अमरता की यह अवधारणा गढ़ दी गई है। चन्द्रभूषण मूलतः पत्रकार रहे हैं और खोजी प्रवृत्ति उनके जेहन में है। उन्होंने आल्हा ऊदल पर शोधपरक तरीके से लेखन किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चन्द्रभूषण का आलेख 'आल्हखंड का पुनर्पाठ'।
'आल्हखंड का पुनर्पाठ'
बारहवीं सदी का कैसा चित्र खींचता है आल्हखंड
छुटपन से ले कर ऊंची पढ़ाई के लिए गांव छूटने तक लगभग हर साल मैंने बैसाख-जेठ की रातों में न जाने कितनी बार कहरवा के ताल पर चलने वाले आल्हा-प्रसंगों- ‘माड़ोगढ़ की लड़ाई’, ‘इंदल हरण’, ‘मलखे का ब्याह’ आदि की नौटंकी देखी और असाढ़ की शामों में ढोलक पर किसी न किसी खलीफा से आल्हा सुना। इसके बावजूद यह किस्सा अपनी समग्रता में मुझसे दूर ही रहा। सिर्फ इसके कुछ गिने-चुने हिस्से ही हाथ लग पाए, जिसके आधार पर ऐसी राय मन में बनी कि यह महज टुकड़ों-टुकड़ों में चलने वाली एक वीरगाथा है, जिसमें लड़ाई और श्रृंगार के मिलते-जुलते प्रसंग लगभग दोहराव की तरह लौट-लौट कर आते रहते हैं।
अभी, मुंशी नवल किशोर द्वारा अब से सवा सौ साल पहले दर्ज कराए गए आल्हा के पूरे 618 पेज बांच लेने के बाद, स्वीकार करता हूं कि इस गाथा को ले कर मेरी राय गलत थी। इस रचना को पढ़ने की कुछ शर्तें हैं, जिनकी अनदेखी करके आप इसका गंभीर पाठ नहीं कर पाएंगे। जैसे यह कि वर्णनों के दोहराव इसमें आएंगे। इसे मजमे में गाने के लिए रचा गया है, अकेले पढ़ने के लिए नहीं। कसे हुए संपादन की बात छोड़ें, इसकी कोई लिखित पांडुलिपि ही अब तक नहीं खोजी जा सकी है। लेकिन ध्यान रहे, दोहराव सिर्फ वर्णन में है। प्रसंगों में कोई दोहराव नहीं है और एक भी प्रसंग किस्से के लिए फालतू नहीं है।
दूसरी बात, आल्हखंड के जीवन मूल्य पुराने हैं लेकिन उन पर अपने बेचैन समय की अमिट छाप है। इस छाप का पीछा कर के हम इसके समय तक जा सकते हैं। यह भी कि किस्से के सारे तार आपस में तभी जुड़ेंगे जब आप इसे पूरा पढ़ें। पुराने जीवन मूल्य आप में बहुत वितृष्णा पैदा करते हों तो वक्त बर्बाद न करें, दूसरी लड़ाई से आगे आप नहीं बढ़ पाएंगे। यूं भी, हिंदी साहित्यालोचना की कुंडली में गुरु स्थान पर बैठे आचार्य रामचंद्र शुक्ल वीरगाथा काल के साहित्य में कोई गहरी बात पाने की कुछ विशेष संभावना नहीं देखते-
‘हर्षवर्धन के उपरांत ही साम्राज्य भावना देश से अंतर्हित हो गई थी और खंड-खंड हो कर जो गहरवार, चौहान, चंदेल और परिहार आदि राजपूत राज्य पश्चिम की ओर प्रतिष्ठित थे, वे अपने प्रभाव की वृद्धि के लिए परस्पर लड़ा करते थे। लड़ाई किसी आवश्यकतावश नहीं होती थी, कभी-कभी तो शौर्य प्रदर्शन मात्र के लिए यों ही मोल ली जाती थी। बीच-बीच में मुसलमानों के भी हमले होते रहते थे। सारांश यह कि जिस समय से हमारे हिंदी साहित्य का अभ्युदय होता है, वह लड़ाई-भिड़ाई का समय था, वीरता के गौरव का समय था। और सब बातें पीछे पड़ गई थीं।’ (वीरगाथा काल, हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ-17)
आल्हा के कथ्य को ले कर यह बातचीत शायद हमें अलग नतीजों तक ले जाए लेकिन वह बाद में। अग्रिम तौर पर इतना कहना जरूरी लगता है कि आल्हा का समय जरूर वीरता के गौरव का है, लेकिन यह काव्य उसकी विडंबना का ही है। यह भी कि मुसलमान इसमें इक्का-दुक्का ही आते हैं मगर आक्रामक शौर्य से ज्यादा वे अपने भाईचारे और सौहार्द के लिए पहचाने जाते हैं।
जगनिक विरचित परमाल रासो (मौखिक रूप ‘आल्हखंड’, लिखित रूप अप्राप्य) के बारे में आगे कुछ कहने से पहले इसका पूरा किस्सा मैं संक्षेप में दोहरा देता हूं, हालांकि 618 पृष्ठों का संक्षेप भी छोटा न होगा। प्रमुख पात्रों और घटनाओं का खाका समझ लेना जरूरी है, उसके बाद ही इस मौखिक काव्य पर गंभीर बात हो पाएगी।
आगे कुछ कहने से पहले एक वाक्य का निचोड़ कि यह सर्वनाश की रचना है। उल्का की तरह चमक कर विध्वंस मचाती हुई एक गूंज पीछे छोड़ कर अपने सभी मुख्य पात्रों के साथ नष्ट हो जाने वाली। ऊपर से देखने पर यह पराक्रम के अतिकथन वाली, अतिशयोक्तियों से भरी चीज लगती है, लेकिन सतह के नीचे इसमें दुख ही चमकता है। और हां, इसे सिर्फ किस्सा मान कर पढ़ें। एक-दो ऐतिहासिक चरित्र इसमें आते हैं लेकिन किस्से में ज्यादा इतिहास न खोजें।
किताब में उतरने से पहले एक बात इसके रचनाकार जगनिक के बारे में। ग्रंथ में वे खुद को महोबा नरेश परमालिक का भानजा और महोबिया योद्धाओं की पांत में एक बताते हैं। इसका सच-झूठ वे ही जानें। आचार्य शुक्ल की राय उनके बारे में सीधी-सी है- ‘ऐसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहां जगनिक नाम के एक भाट थे जिन्होंने महोबे के दो देशप्रसिद्ध वीरों - आल्हा और ऊदल (उदय सिंह)- के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था।’
केवल मौखिक रूप में उपलब्ध एक काव्य के रचयिता को ले कर कोई पक्की बात भला क्या ही कही जा सकती है, अलबत्ता कवि का पुकार का नाम यहां जगना और लिखित नाम ‘जगनायक’ मिलता है। लिंग्विस्टिक आर्कियोलॉजी (भाषिक पुरातत्व) किसी काव्य में प्रयुक्त शब्दों को पकड़ कर उसकी उम्र के बारे में कोई नतीजा निकालती है। लेकिन मौखिक काव्य की भाषा तो हर इलाके के मुताबिक, यहां तक कि गायक के अनुसार भी लगातार बदलती रहती है। यानी आल्हखंड या परमालरासो के रचे जाने का समय जानने में इसकी भाषा कोई मदद नहीं कर सकती।
छपी हुई किताब की शक्ल में केवल पिछले डेढ़ सौ वर्षों से मौजूद इस ग्रंथ में अध्याय बांटने के बजाय कुल 23 लड़ाइयों के किस्से सुनाए गए हैं। मेरे पास मौजूद नवल किशोर प्रेस वाले संस्करण में हर लड़ाई में चार-छह ‘तरंगें’ आती हैं। एक अर्थ में ये भांग के नशे में उठने वाली तरंगों जैसी ही हैं, लेकिन किस्से में बेतरतीबी नहीं है। इसके आगे की सारी बातें मैं किस्से को सरसरी तौर पर दोहरा देने के बाद ही करना चाहता था, लेकिन जो संस्करण मैंने पढ़ा है, उसे सुनाने और लिखवाने वाले सज्जनों के बारे में भी दो-एक बातें यहीं न कह दी गईं तो आगे लयभंग पैदा होगा।
अब से कोई 130 साल पहले, 19वीं सदी ईसवी के अंतिम वर्षों में उर्दू के सबसे बड़े मीडिया हाउस ‘अवध अखबार’ के संस्थापक-प्रकाशक मुंशी नवल किशोर के पुत्र और उत्तराधिकारी मुंशी प्राग नरायण ने ‘आल्हखंड’ शीर्षक से इसे लिपिबद्ध कराया था। शुरू से अंत तक इसे गाने वाले थे अवध अखबार के ही पुराने कर्मचारी ललित प्रसाद मिश्र, जो ‘उन्नाव से पांच कोस पूरब पंड़री गांव’ के संस्कृत विद्वान पंडित कृपाशंकर मिश्र के बेटे थे। हर साल नवरात्र में अखबार से छुट्टी ले कर वे अपने गांव में भागवत बांचते थे, साथ ही अपनी अद्भुत स्मृति के अलावा भांग की तरंग में भी लंबे समय से आल्हा गाते आ रहे थे। अपनी रौ में यह सारा ब्यौरा ललित मिश्र ने किताब के शुरू में ही दे रखा है।
हालांकि यह बात एकबारगी थोड़ी अजीब लगती है। भागवत बांचने वाला आल्हा क्या गाएगा, कैसा गाएगा? आल्हा से जुड़ी हमारी सामूहिक स्मृतियां हमें बार-बार खींच कर घुमंतू नट समुदाय की ओर ही ले जाती हैं। असाढ़-सावन के महीनों में ढोलक टांगे, लुंगी लगाए। सुबह अखाड़ा, शाम को आल्हा। अलबत्ता एक सीमा भी रही है कि इस मौखिक ग्रंथ की दो-चार लड़ाइयां ही खलीफा अल्हैतों को याद रहती हैं, इन्हीं को गाते-सुनाते उनका जीवन पार हो जाता है।
ललित प्रसाद मिश्र की वाचन शैली के बारे में बातें बीच-बीच में आती रहेंगी, लेकिन उससे पहले यहां यह बताना जरूरी है कि आल्हा को लिखित रूप देने का श्रेय सबसे ज्यादा अंग्रेज अफसर चार्ल्स इलियट को जाता है। उन्होंने ही कई गायकों से सुन कर सन 1865 ई. में इसकी कुल 23 लड़ाइयों- संयोगिता स्वयंवर से ले कर बेला के सती होने तक- का खाका तैयार किया और 1871 में इसका पहला लिखित संस्करण प्रकाशित कराया। प्रसिद्ध भाषाविद जॉर्ज ग्रियर्सन ने फिर जल्द ही कुछ जोड़-घटाव के साथ इसे जो शक्ल दी, उसके अंग्रेजी अनुवाद से आल्हा संसार भर में चर्चित हुआ।
ललित मिश्र की प्रस्तुति में इलियट और ग्रिएर्सन की बुनियाद इस बात से जाहिर होती है कि नवल किशोर प्रेस से छपे आल्हखंड में 23 लड़ाइयों के ही किस्से हैं, अल्हैतों के दावे वाली 52 लड़ाइयों के नहीं। बाद में बाबू श्याम सुंदर दास ने इसका जो संकलन-संपादन किया उसमें 52 लड़ाइयां हैं लेकिन वह प्रचलन में नहीं है।
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| आल्हा |
आल्हखंड का पुनर्पाठ-2
सय्यद और बनाफर
आल्हखंड की शुरुआत ‘संयोगिनी स्वयंवर’ से होती है। यह संयोगिनी वही हैं, जो ऐतिहासिक पात्र हों या नहीं, लेकिन ‘पृथ्वीराज रासो’ के रास्ते जिन्हें हम जयचंद्र की बेटी और पृथ्वीराज की प्रेमपात्र (बाद में पत्नी) संयोगिता या संयुक्ता के नाम से जानते आए हैं। यूं कहें कि पृथ्वीराज आल्हखंड में किनारे का चरित्र न हो कर इसका किस्सा शुरू होते ही आ गए हैं। किताब की कुल 23 लड़ाइयों में से 12 में उनका दखल है। एक बेरहम लेकिन असाधारण क्षमताओं वाले गुणग्राही राजा के रूप में उनका जिक्र बार-बार होता है। बड़े वीरों से लैस महोबिया फौज के सामने उनको एक बार भी हारते हुए नहीं, लेकिन दो या शायद तीन लड़ाइयों में किसी न किसी कारण से पीछे हटते जरूर दिखाया गया है।
तात्पर्य यह कि अगर आपके मन में ऐसी कोई राय बनी हुई हो कि भाट शैली की वर्णन प्रक्रिया के तहत पृथ्वीराज इस ग्रंथ में इतिहास को दरेरा दे कर खड़े किए गए कोई ढीले-पोले खलनायक भर हैं, तो इसे अभी के अभी त्याग दें। उनका और कवि चंद बरदाई का नाम आल्हखंड में हर बार क्रमशः अपने समय के सबसे बड़े धनुर्धर और कवि के रूप में लिया गया है। जयचंद्र का जिक्र अलबत्ता पहली लड़ाई के बाद जरा सा ही आता है- प्रतापी लेकिन ढलते हुए राजा के रूप में। आगे उनकी विरासत संभालते हैं राजकुमार लाखन- नौ रानियों के अकेले पुत्र- जिनकी शक्ल हमें आधा आल्हखंड गुजर जाने पर ही दिखती है। इस दुखांत ग्रंथ के ठेठ अंत में वे खुद पृथ्वीराज के हाथों मारे जाते हैं।
संयोगिता (आल्हखंड में ‘संयोगिनी’) के स्वयंवर की कहानी हमें विविध स्रोतों से उपलब्ध है। ‘पृथ्वीराजरासो’ में ‘संयोगिता समय’ उसे ही समर्पित है, उसे यहां क्या दोहराना। बस इतना कि संयोगिता को घोड़े पर बिठा कर तलवार चलाते भाग रहे पृथ्वीराज की तस्वीर थोड़ी देर के लिए हम अपने मन से मिटा दें। चौहानों के अजमेर तथा तोमरों की दिल्ली को मिला कर बनी विशाल सत्ता संभालने वाले पृथ्वीराज और अपने समय में उत्तर भारत की सबसे मजबूत रियासत कन्नौज के राजा जयचंद्र गाहड़वाल के बीच अहं का टकराव आल्हखंड के किस्से में भी मौजूद है। लेकिन यहां कन्नौज के सिंहद्वार पर अपनी फौज लिए डटे पृथ्वीराज यह प्रस्ताव रखते हैं कि लड़ाई में प्रजा का नुकसान न हो, इसके लिए संयोगिता का डोला कहीं बाहर रखवा दिया जाए, जो लड़ाई जीते, वह अपनी तरफ डोला ले जाए।
लड़ाई खत्म होने पर नहीं, इसके बीच में ही दिल्ली वाले डोला उठा कर चल देते हैं और उन्हें रोकने के लिए कन्नौज वाले लड़ते-लड़ते दिल्ली के दरवाजे तक चले आते हैं। यहां के आखिरी मोर्चे पर पृथ्वीराज के भाई कान्ह कुंअर और जयचंद्र के भाई रतीभान मारे जाते हैं। वहां चंद कवीश्वर (बरदाई) के समझाने पर जयचंद्र अपनी फौजें वापस मोड़ लेते हैं, लेकिन संयोगिनी-हरण का घाव कन्नौज के मन में हरा रह जाता है। जिन लाखन कुंअर का जिक्र ऊपर आया है वे इन्हीं रतीभान के, या जयचंद्र के तीसरे भाई अजय पाल के बेटे हैं। किस्से में अलग-अलग जगहों पर उनकी दोनों वल्दियत दिखाई पड़ती है। जयचंद्र की सरपरस्ती में कन्नौज का शासन पहले रतीभान, फिर अजय पाल चलाते थे, यह जिक्र किस्से में आया है। लाखन में दिल्ली के प्रति बचपन से मौजूद खुन्नस आगे उन्हें खास कैरेक्टर बना देती है।
महोबा और माड़ोगढ़
महोबे का जिक्र इस मौखिक ग्रंथ की दूसरी लड़ाई में आता है। ध्यान रहे, कहानी के मुख्य नायक अभी एक पीढ़ी दूर हैं। उनके आने का प्रसंग शुरू होता है माड़ोगढ़ नाम की जगह से, जो उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में पड़ती है या मध्य प्रदेश के मांडला में, यह बहस अब तक हल नहीं हो पाई है। किस्से में यहां के शासकों का जिक्र ‘बघेला’ के रूप में आता है तो माड़ोगढ़ को अभी के बघेलखंड इलाके में स्थित माना जा सकता है।
माड़ोगढ़ का राजा जंबै अपने बेटे करिंगा राय (करिया) को जाजमऊ गंगाघाट के मेले में जाने से मना करता है, क्योंकि कन्नौज का नियमित कर उसने पिछले 12 वर्षों से अदा नहीं किया है। कन्नौज की कर-वसूली रुकी होने का जिक्र आगे अन्य संदर्भों में भी आता हैं और इससे कन्नौज की सत्ता की एक ढलती हुई छवि बनती है। खैर, करिंगा राय एक उभरता हुआ योद्धा है और वह अपने बाप को समझाता है कि अगर मेले में कन्नौज के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया तो वह माड़ोगढ़ का सारा बकाया माफ करवा कर ही लौटेगा।
घर से निकलते हुए उसकी बहन बिजैसिनि कहती है कि मेले से कोई यादगार उपहार वह उसके लिए लाना न भूले। यह नाम ‘बिजैसिनि’ आप याद रखें। किस्से में आगे इसका जिक्र अचानक ही आएगा। मेले में गहनों की दुकानों पर अपनी बहन की पसंद का नौलखा हार खोजते करिंगा राय उर्फ करिया की मुलाकात आल्हखंड के एक दिलचस्प पात्र माहिल से होती है। ‘मामा माहिल’ के रूप में चर्चित, चुगलखोरी की प्रवृत्ति के लिए मशहूर यह पात्र करिया को सुराग देता है कि नौलखा हार उसकी बहन, महोबे की रानी मल्हना के पास है। यह भी कि महोबा में अभी कोई बड़ा वीर नहीं है और किले की रक्षा के लिए कुछ खास इंतजाम भी नहीं है।
आगे बढ़ने से पहले थोड़ा-सा आल्हा सुन लेते है।
कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान।
चलिभो करिया फिर मोहबे को मन में किहे गंग को ध्यान।।
त्यही समइया की बातैं हैं यारो सुनि ल्यो कान लगाय।
चारो भाई हैं बकसर के जिनका कही बनाफर राय।।
रहिमल टोंड़र बच्छराज औ चौथे देशराज महराज।
मीरा ताल्हन हैं बनरस के जिनके नौ लड़िका सिरताज।।
अली अलामत औ दरिया खां बेटा जानबेग सुल्तान।
मियां बिसारत औ दरियाई नाहर कारे औ कल्यान।।
कारे बाना करे निशाना कारे घोड़न पै असवार।
चीरा सिर पर है सुल्तानी मीरा ताल्हन केर कुमार।।
ये सब मिलिके यकठौरी ह्वै डांड़ पे किहेनि बखेड़ा जाय।
जयचंद केरी तहं ठकुरी है जिनका कही कनौजी राय।।
बिल्कुल हवा से टपकी चीज की तरह बक्सर से आ रहे चार बनाफर भाइयों रहिमल, टोंड़र, बच्छराज और देशराज की मुलाकात बनारस से आ रहे मीर ताल्हन (या तल्हान या तलहा) से होती है, जो अपने नौ बेटों- अली, अलामत, दरिया खां, जानबेग सुल्तान, मियां बिसारत, दरियाई, नाहर, कारे और कल्यान के साथ कन्नौज की किसी चुंगी पर पहुंचते हैं। (‘डांड़’ शब्द वैसे तो दंड का तद्भव रूप समझा जाता है, लेकिन यहां यह सीमा-कर की तरह आया है।)
दोनों दलों का आपस में पहले से कोई संपर्क नहीं है। वे किस काम के लिए निकले हैं, कहां जा रहे हैं, इस बारे में भी आल्हखंड पूरी तरह खामोश है। बस, कन्नौज के चुंगी अधिकारियों से दोनों का कुछ विवाद हो जाता है तो वे साथ मिल कर वहां के दरबार में शिकायत करने का फैसला करते हैं। लेकिन कन्नौज दूर है तो कोई उन्हें सलाह देता है कि जयचंद्र के नायब (कनिष्ठ) राजा परिमाल महोबे में ही राज करते हैं, उन्हीं के यहां अर्जी लगा दें, काम हो जाएगा।
वह रात वे महोबे में ही बताते हैं और संयोग से यही रात करिंगा राय द्वारा महोबे पर हमले (या डकैती) की रात भी निकलती है। माहिल ने खबर दी थी कि बचाव का कोई बड़ा उपाय उस रात महोबे में नहीं है लेकिन करिया को अप्रत्याशित रूप से इन चौदह योद्धाओं का सामना वहां करना पड़ता है। बहुत भीषण युद्ध होता है, जिसका नतीजा हमें इतना ही बताया जाता है कि करिया को मैदान छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। लड़ाई में हुई मौतों के बारे में कुछ नहीं कहा जाता। लेकिन किस्से में आगे बक्सर के सिर्फ दो योद्धाओं बच्छराज और देशराज का नाम ही आता है, रहिमल और टोंड़र गायब हो जाते हैं। इसी तरह मीर तल्हान सैयद के कुछ वीर पुत्रों का भी जिक्र आगे नहीं मिलता।
जाते-जाते बच गए
महोबा राज्य भले ही कन्नौज के अधीन आता रहा हो लेकिन अपने किले की सामान्य सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी अपनी ही थी। इस काम में दैवयोग से मिल गई सहायता के लिए महोबा ने दोनों दलों का एहसान माना। महोबे की रानी मल्हना ने मीर तल्हान सैयद को अपना देवर कहा और अपने पति, राजा परिमाल (परमार्दिदेव) से कह कर उन्हें महोबा का प्रधान सेनापति बनवा दिया। बच्छराज और देशराज, दोनों भाई महोबा की नौकरी में ले लिए गए। मल्हना की ही पहल पर दोनों का ब्याह ग्वालियर के दलपति राय की दो बेटियों देवलि और बिरमा से हुआ और उनके बसने के लिए महोबा राज्य में ही, लेकिन महोबा नगर से कुछ दूरी पर दशहरिपुर नाम का एक गांव बसा दिया गया।
मीर तल्हान सैयद को किस्से में सैकड़ों जगह बनारस का रहने वाला बताया गया है- ‘सय्यद बनरस का सरदार’। समूचे आल्हखंड में उनकी भूमिका आल्हा-ऊदल और मलखान के सबसे भरोसेमंद संरक्षक की है। उनकी बात भी महोबिया वीरों में हर कोई मानता है। ऐसा एक शब्द भी नहीं मिलता, जिससे उनके विदेशी या विजातीय होने की गंध आती हो। यह बात उन लोगों को अटपटी लगेगी, जो मानते हैं कि उत्तर भारत की मुख्य धारा में मुसलमानों का दखल बारहवीं-तेरहवीं सदी ईसवी की संधि पर मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम सरदारों के कब्जे से शुरू हुआ।
बतौर योद्धा और रणनीतिकार, एक ठेठ देसी आदमी के रूप में ही सैयद का जिक्र हमेशा आता है। उनके घोड़े का नाम सिर्गा है- ‘कारे बाना करै निशाना सय्यद सिर्गा का असवार’। सब पूजा करते हैं तो वे बंदगी करते हैं। संप्रदाय की पहचान वाला कोई रंग उनके चित्र में नहीं है। ऐसे में सहज बुद्धि उन्हें मुसलमान योद्धा से ज्यादा एक खानदानी व्यक्ति की तरह ही देख पाती है। रही बात बनाफरों की, तो इस शब्द के मायने खोजने में पीढ़ियां गुजर चुकी हैं।
किस्से में आगे बच्छराज और देशराज को भी कुछ ज्यादा उमर नसीब नहीं होती। महोबे की लड़ाई में न जाने कहां से आ धमके अनजान योद्धाओं से पिट कर करिया वहां से चला गया था, लेकिन दो-तीन साल बाद ठीक से थाह ले कर एक रात उसने बच्छराज-देशराज के नए ठिकाने दशहरिपुर पर हमला किया। रानी मल्हना के दिए हुए नौलखा हार समेत उनका सब कुछ लूट लिया, पूरा गांव जला कर खाक कर दिया, दोनों के धड़ कोल्हू में पेरवा दिए और उनके सिर काट कर मांड़ोगढ़ में अपने दरबार के करीब एक आंगन में खड़े बरगद के पेड़ पर लटका दिए।
उनकी गर्भवती पत्नियों ने कहीं छिप कर अपनी जान बचाई। इस हमले के वक्त देवलि को आल्हा और बिरमा को मलखान पैदा हो चुके थे, जबकि ऊदल या ऊदन (उदय सिंह) और सुलखान दोनों के पेट में थे। रानी मल्हना के बेटे ब्रह्मा और रंजीत भी इनके आस पास ही पैदा हुए। इन छह कुमारों के अलावा इनके हमउम्र, मैनपुरी के देबा चौहान का जिक्र आल्हखंड में लगातार आता है, हालांकि भविष्य भाखने वाले इस चरित्र का नाम नटों से सुने आल्हा में ‘डेभा तिवारी’ याद पड़ता है। खैर, एक रियासत के रूप में महोबे की प्रतिष्ठा तब कितनी रही होगी, इसका पता इस बात से चलता है कि करिया के इस हमले का जवाब देने की कोई कोशिश भी उसकी तरफ से नहीं की गई। परिवार को दशहरिपुर से महोबा बुला लिया गया और बच्चों को सुरक्षा के ख्याल से इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया गया।
मीर तल्हान सैयद को यहां बनारस का रहने वाला बताया गया है और समूचे आल्हखंड में ऐसा एक भी शब्द नहीं आता, जिससे उनके विदेशी या विजातीय होने की गंध आती हो। यह बात उन लोगों को बहुत अटपटी लगती है, जो यह मानते हैं कि उत्तर भारत की मुख्य धारा में मुसलमानों का दखल बारहवीं और तेरहवीं सदी ईसवी की संधि पर मोहम्मद गोरी और उसके तुर्क गुलाम सरदारों के कब्जे से ही शुरू हुआ।
आल्हा के समूचे किस्से में सैयद का जिक्र बतौर योद्धा और रणनीतिकार, एक ठेठ देसी आदमी के रूप में आता है। विजातीयता या सांप्रदायिकता उन्हें कहीं से छूती तक नहीं दिखती। ऐसे में सामान्य बुद्धि उन्हें कई पीढ़ी पहले धर्मांतरित हुए किसी प्रतिष्ठित खानदान की ही उपज मान पाती है। रही बात बनाफरों की, तो इस शब्द के मायने खोजने में विद्वानों की पीढ़ियां गुजर चुकी हैं।
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| आल्हा ऊदल पैलेस, महोबा |
आल्हखंड का पुनर्पाठ-3
बिजमा उर्फ बिजैसिनि
माड़ोगढ़ की लड़ाई का माहौल बनाफरों के ठिकाने दशहरिपुर पर करिया के हमले के काफी समय बाद बनना शुरू होता है। तब, जब ऊदल बारह बरस के हो जाते हैं। साथियों के साथ शिकार खेलते हुए एक दिन वे उरई चले जाते हैं, जहां माहिल से बाताबाती के क्रम में उन्हें यह ताना सुनने को मिलता है कि अगर इतने ही लड़ैते निकल रहे हो तो माड़ोगढ़ जा कर अपने बाप का बदला क्यों नहीं लेते, जिसकी खोपड़ी इस समय भी वहां के राजदरबार के किसी कोने में लटकी पड़ी है।
ऊदल के लिए यह सूचना कुछ ज्यादा ही भारी पड़ती है। घर जा कर वे मां के सामने अपने कलेजे पर कृपाण रख देते हैं कि पिता की मृत्यु का सच बताओ, वरना अभी खुद को खत्म कर लूंगा। सच्चाई का पता चल जाने के बाद, आल्हा की शुरुआती हिचक के बावजूद सिर्फ पांच लोगों को ले कर माड़ोगढ़ का अभियान शुरू होता है-
‘आल्हा ऊदन मलखे देबा सय्यद बनरस का सरदार,
पांचों मिलिकै सम्मत कैकै जोगी भेष लिह्यनि फिरि धार।’
इसी योगी वेष में वे महोबे के राजा परमाल से मिलते हैं और उन्हें अपने साथ राज्य की सेना रवाना करने के लिए राजी कर लेते हैं।
किस्साकोताह यह कि फौज साथ होने के बावजूद माड़ोगढ़ पर सीधे चढ़ाई करने की उनकी स्थिति नहीं है, लिहाजा ये पांचो योगी विधिपूर्वक किले में जा कर राजपरिवार के सामने बड़े श्रृंगारिक अंदाज में नाच-गाना करते हैं। वहां राजकुमारी बिजैसिनि- जो उम्र में निश्चित रूप से ऊदल से काफी बड़ी होगी- उन्हें पहचान लेती है, फिर एकांत में ले जा कर प्रणय निवेदन करते हुए यह धमकी भी देती है कि बात नहीं माने तो सबके सामने सारी कहानी खोल देगी। यह प्रकरण एक कथा के रूप में आल्हा की जटिल अंतर्वस्तु का नमूना है।
अकेले में ही ऊदल बिजैसिनि से पूछते हैं कि योगी वेष में उनकी मां तक उन्हें नहीं पहचान पाई थी, फिर वह उन्हें कैसे पहचान गई, तो वह बताती है कि मामा माहिल के बेटे अभय सिंह के विवाह के समय उसने उन्हें देखा था, तभी से उसका मन उनसे जा लगा था। ऊदल कोई भी रिश्ता बनाने से पहले विवाह को जरूरी शर्त बताते हैं तो बिना किसी को कुछ बोले वह उनसे विवाह कर लेती है, साथ ही लड़ाई जीतने के लिए ऊदल को कुछ बहुत जरूरी सुराग भी देती है। ऊदल उसे वचन देते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, उसे साथ लिए बिना वे महोबा वापस नहीं जाएंगे।
यह बात आल्हा को पता चलती है तो वे दुश्मन की बेटी से ब्याह करना तो दूर, ऐसा कुछ सोचने तक को गलत मानते हुए ऊदल पर नाराज होते हैं। ऊदल की उम्र कम होना कोई समस्या नहीं है। आल्हा साफ कहते हैं कि करिया की बेटी को घर लाने का मतलब यही है कि उसे जब भी मौका मिलेगा, सबके गले काट देगी। मलखान आल्हा को समझाते हैं कि पहले बाप का बदला ले लें, फिर इस मामले में जो होगा सो देखा जाएगा। जल्द ही भीषण युद्धों की श्रृंखला के बाद करिया एकबारगी ऊदल की मुश्कें बांध कर अपने हाथी पर चढ़ा लेने में कामयाब हो जाता है। लेकिन अंततः मलखान उसे मार देते हैं और महोबा वालों को माड़ोगढ़ पर एक विध्वंसक जीत हासिल होती है।
युद्ध में पराक्रम ज्यादा बनाफरों का ही दिखता है लेकिन मीर तल्हान के युद्ध वर्णन भी श्रोताओं में जोश जगाते हैं। ध्यान रहे, इस समय वे महोबा के सेनापति हैं जबकि आल्हा, ऊदल और मलखान सिर्फ महोबा राज की नौकरी करते हैं-
‘अली अली कहि सय्यद धावैं, रण मां गली गली ह्वै जाय।
भली भली कहि आल्हा बोलैं, देखत थली थली थर्राय।।’
दिवंगत देशराज की पत्नी देवलि अपने बच्चों के इस पहले युद्ध में मैदान के पास तक चली गई हैं। लड़ाई तक गुजरा एक साल का वक्त उन्होंने बबुरीवन में बिताया है, और इस जीत का श्रेय वे सैयद तल्हान को ही देती हैं।
बड़ी बड़ाई की सय्यद की, तुम्हरी दया जीति भै आज।
बहुत सहाई की लरिकन की, धर्म सों देवर लगो हमार।।
सखा तुम्हारे की नारी हन, सय्यद बनरस का सरदार
कियो सहाई जस हमरी है, तैसे भला करी करतार॥
सय्यद बोले तब द्यावलि ते, सांची मानो कहा हमार।
खुदा सहाई सब दुनियाँ का, बिसमिल भला करें सब क्यार।।
बार न बांका इनका जाई, अल्ला धरम निबाहनहार।
सुनिकै बातैं ये सय्यद की, बोला उदय सिंह सरदार।।
मैदान में जीत हासिल करने के बाद युद्ध के घृणित पहलू दिखाई पड़ते हैं। करिया का सिर महोबा भेजा जाता है और लूटा हुआ नौलखा हार रानी मल्हना को लौटाया जाता है। लेकिन कुछ जरूरी किस्सा अभी इस लड़ाई में बचा रह गया है। माड़ोगढ़ की एक ताकत करिंगा राय उर्फ करिया का युद्ध कौशल था, जिसका निपटारा हो चुका है। दूसरी ताकत लोहागढ़ का अजेय दुर्ग है, जहां करिया का पिता जंबै अपने परिवार के साथ रहता है। उसकी तीसरी ताकत है इस परिवार की स्त्रियों का जादू, जिसमें राजकुमारी बिजमा (बिजैसिनि) को बड़ी महारत हासिल है।
माड़ोगढ़ जीतकर और राजा जंबै के चारो बेटों को खत्म कर के महोबे वाले जब लोहागढ़ पर घेरा डालते हैं तो जंबै राय बोलते हैं कि किसी तरह ऊदल का कुछ हो जाए तो अब भी दुश्मन को हराया जा सकता है। बाप की इस चिंता का समाधान खोजती हुई बिजैसिनि उसी रात कोई गुटका मुंह में डाल कर अदृश्य हो जाती है। फिर महोबे के खेमे में जब सब सोए पड़े हैं, तब उसमें घुस कर, मसान की पुड़िया से ऊदल के अंगरक्षकों को बेसुध करके ऊदल को भेंड़ा बना कर वहां से उठा ले जाती है और झारखंड ले जा कर झिलमिला गुरू की कुटिया में बांध देती है।
अगले दिन ऊदल को गायब पा कर महोबा वाले सकते में आ जाते हैं लेकिन पराशक्ति से लैस उनके योद्धा देबा चौहान (डेभा तिवारी?) ध्यान में जा कर यह पता लगा लेते हैं कि ऊदल को भेड़ा बना कर झारखंड ले जाया गया है। तंत्र-मंत्र की दुनिया में कुछ भी संभव है, लेकिन आल्हा का यह झारखंड अभी का झारखंड राज्य ही है, यह मानने का कोई कारण नहीं दिखता। खैर, मलखान और देबा चौहान बिना देर किए झिलमिला गुरू की कुटिया में पहुंचते हैं, वहां योगी वेश में उनसे भेंड़े की भिक्षा मांगते हैं, उसे मनुष्य रूप में वापस लाते हैं और यह सारा काम संपन्न कर के अपने साथ रत्ती भर भी गलत व्यवहार न करने वाले झिलमिला गुरू की गर्दन बड़ी सदाशयता से काट देते हैं।
आगे लोहागढ़ की विकट लड़ाई में आल्हा खुद जंबै राय को हाथी से गिराकर गिरफ्तार करते हैं और ऊदल उन्हें जिंदा ही कोल्हू में पेरवा कर, उनका सिर काट कर उसी बरगद के पेड़ पर टांग देते हैं, जहां अब तक उनके बाप और चाचा की खोपड़ियां लटकी हुई थीं। फिर रानी कुशला को बुला कर तुरंत राजकुमारी बिजैसिनि से अपने फेरे पड़वाने का आदेश देते हैं। चंदन का खंभा गाड़ कर उसके इर्द गिर्द फेरे चल ही रहे हैं कि आल्हा सनक जाते हैं।
अपने परिवार के लिए जान का खतरा बताते हुए वे पहले ऊदल से ही कहते हैं कि वहीं के वहीं अपनी पत्नी को मार डालें- ‘कन्या बैरी की ज्यहि के घर, नाचै मृत्यु सीस पर आय। त्यहिते मारो तुम ऊदन यहि, सारा काम सिद्ध ह्वै जाय।’ ऊदल इसके लिए राजी नहीं होते तो बिजैसिनि के बारे में यही आदेश आल्हा मलखान को देते हैं, जो बिना हिचके उसे सिरोही (तलवार?) मार देते हैं।
मरती हुई बिजैसिनि मलखान को शाप देती है। कहती है, उन्हें ऐसी जगह रहना होगा जहां ऊदल न रहते हों। बहुत कम उम्र में इतने बड़े हादसे से गुजर रहे ऊदल जब पत्नी से पूछते हैं- ‘अबकी बिछुरी फिर कब मिलिहौ, सांचे हाल देउ बतलाय’- तो वह कहती है कि उसका अगला जन्म राजकुमारी फुलवा के रूप में होगा और काबुल की राह में वह उनसे मिलेगी। उसकी मौत के बाद ऊदल उसे जलाते नहीं। अकेले ही ले जाकर नर्मदा नदी में बहा देते हैं। आल्हखंड की प्रतापी स्त्रियों की यह एक बानगी है। उनकी किस्मत भरसक वे खुद ही तय करती हैं, कोई और नहीं। लड़ाई में तलवार भले न चलाएं लेकिन नियति की नदी में अपनी पतवार किसी न किसी तरह जरूर पकड़े रखती हैं।
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| आल्हा ऊदल की कचहरी, चिल्ला, इलाहाबाद |
आल्हखंड का पुनर्पाठ-4
बनाफर यानी क्या : सुदूर अतीत में एक पड़ताल
एक सामान्य उत्सुकता को लेकर हम अभी इतिहास के एक अनजाने दायरे में धंसने जा रहे हैं। यह एक लंबी खोजयात्रा की शुरुआत है, जो आगे न जाने कहां-कहां से गुजरने वाली है। लेकिन इसका शुरुआती हिस्सा ही हमें सारनाथ में अब से सौ साल पहले खोजे गए कुछेक उत्तरवर्ती बौद्ध अवशेषों से लेकर कुषाण साम्राज्य के मामूली चर्चा वाले दो पहलुओं और कम से कम तीन पुराणों में आए लगभग एक-से भयाक्रांत उद्धरणों तक ले जाने वाला है।
‘ओछी जात बनाफर केर’ की टेक आल्हा में कई बार आती है, लेकिन बनाफर को ‘वन-फल’ कहकर इन्हें अज्ञात कुल-शील बताने का ही चलन रहा है। इस नाम की कोई जाति, वंश या कुल मध्यकालीन इतिहास में चर्चित नहीं रहा। हाल में मध्य प्रदेश ग्रंथ अकादेमी से प्रकाशित किताब ‘पद्मावती’ (लेखक मोहनलाल शर्मा, प्रकाशन वर्ष 1971) पढ़ते हुए दो सूचनाओं पर नजर गई। एक तो यह कि बुंदेलखंड के किसी इलाके की बोली को ‘बनाफरी बोली’ कहा जाता है। दूसरी यह कि ब्रज क्षेत्र में कहीं-कहीं ज्यादा नटखट या चंट बच्चों को बनाफर कहने का चलन है।
बुंदेलखंड और ब्रज क्षेत्र के रहने वाले, या इन इलाकों से ठीक से परिचित अपने मित्रों से मैंने इन सूचनाओं की सत्यता जांचने का आग्रह किया तो उन्होंने इसकी पुष्टि की। आल्हा में जिन बनाफरों का जिक्र हमने ऊपर सुना है, वे बक्सर से आए हुए बताए गए हैं। मैंने अपने भोजपुरिया मित्रों से पूछा तो पश्चिमी बिहार के भोजपुर और बक्सर जिलों में सब्जियों के किसान, कोइरी बिरादरी की एक बनाफर उपजाति के बारे में जानकारी मिली। एक खंडन भी कि वनक्षेत्र में बसे हुए कोइरी बनाफर कहलाते हैं, आल्हखंड में आए बनाफरों से वे अपना कोई रिश्ता भी नहीं जोड़ते।
सूत्रों की इस तलाश को हम फिलहाल यहीं छोड़ देते हैं और आल्हखंड के रचना समय नहीं, इसमें आए ऐतिहासिक व्यक्तित्वों- जयचंद्र, पृथ्वीराज, परमार्दिदेव- के साझा समय (1160-1190 ईसवी) से हजार साल पीछे की एक यात्रा करते हैं। शौकिया इतिहासकार, लेकिन इतिहास लेखन के पेशे से जुड़े प्रोफेशनल लोगों से कहीं बेहतर काम कर गए डॉ. के.पी. जायसवाल ने अपने ग्रंथ ‘अंधकारयुगीन भारत’ में ठोस तथ्यों के आधार पर कुछ मजबूत प्रस्थापनाएं दी हैं। इनसे बहस की जा सकती है लेकिन किसी हाल में इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
ईसा युग की शुरुआत में ही उत्तर भारत पर काबिज कुषाण वंश से जुड़ी कुछ जानकारियों को डॉ. जायसवाल ने पुराणों में आए कुछेक प्रसंगों से जोड़कर समझने का प्रयास किया। इससे वनस्पर या वनस्फर नाम वाले एक व्यक्ति का नाम निखरकर आया, जो कनिष्क के प्रमुख क्षत्रपों में से एक था और कुषाण साम्राज्य के पूर्वी हिस्से पर, यानी ब्रज क्षेत्र से लेकर मौजूदा बिहार तक जिसकी छाप पाई गई। इस चरित्र की खोज का किस्सा दिलचस्प है।
असल में, नाम-साम्य का एक धागा पकड़कर अभी हम लगभग 2000 साल पहले हुए एक ऐसे व्यक्ति का खाका बनाने निकले हैं, जो न राजा था, न ऋषि, न कवि, न ही विशाल मंदिर या स्तूप बनवाने वाला कोई दानदाता। फिर भी, भारतीय समाज में उसने एक इतनी बड़ी हलचल पैदा कर दी कि उसकी स्मृति उसके कुछ संभावित वंशजों से जुड़कर आज भी चलती चली आ रही है। खास बात यह कि वनस्पर की तरह ये वंशज भी कहीं के राजा नहीं थे।
बाला बोधिसत्व
सारनाथ की खुदाई में निकली मूर्तियों में केवल एक लगभग संपूर्ण मानी जा सकती है। जर्मन पुरातत्वविद एफ. ओ. ओएर्टेल ने सारनाथ की पहली खुदाई (1794 ई.) के लगभग सौ साल बाद 1904-05 में इसको यहीं से खोदकर निकाला था। सारनाथ म्यूजियम में यह अलग ही नजर आती है। इसके पीछे पत्थर का एक स्तंभ है और बगल में जमीन पर एक बड़ा छत्र रखा है, जो कभी स्तंभ के शीर्ष पर रहकर इसको छाया देता रहा होगा। इस छत्र का निचला हिस्सा बहुत अलंकृत और ज्योतिषीय चिन्हों से समृद्ध है, जबकि इसके ऊपर एक लंबी लिखावट मिलती है।
इस मूर्ति को हम ‘बाला बोधिसत्व’ के नाम से जानते हैं, हालांकि महायान में दिखने वाले अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, मैत्रेय, सामंतभद्र आदि बोधिसत्वों में से किसी के भी साथ न इसकी मुखमुद्रा मिलती है, न शारीरिक बनावट। इससे लगता है कि यह महायानी धारणा के अनुरूप किसी देवतुल्य बोधिसत्व की नहीं, शायद स्वयं बुद्ध की ही मूर्ति है। सिद्धार्थ गौतम को यहां उस समय में देखा गया है, जब वे बुद्ध बनने की राह पर थे, बुद्धत्व उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था।
गांधार शैली में बनने वाली बुद्ध की अंडाकार मुखाकृति से इसका कुछ लेना-देना नहीं है। थोड़े भारी शरीर, मुंड़े हुए सिर और गोल चेहरे वाली इस मानवाकृति की कद-काठी और गढ़न ठेठ हिंदुस्तानी है। ऐसा लगता है कि यह बुद्ध की शुरुआती मूर्तियों में से एक है, जब उन्हें पदचिह्नों के बजाय मनुष्य रूप में दिखाते ज्यादा देर नहीं हुई थी। इसे लाल बलुआ पत्थर (रेड सैंडस्टोन) से बनाया गया है, जो मथुरा की मूर्तिकला की खासियत है। काफी संभावना है कि इसको कनिष्क की द्वितीय राजधानी मथुरा में बनाकर सारनाथ (तब का नाम मृगदाव) में स्थापित किया गया होगा।
बहरहाल, यहां ज्यादा बड़ी चीज स्तंभ, उससे अलग हुए छत्र, और मूर्ति पर मौजूद लिखावटें हैं, जिनकी लिपि ब्राह्मी और भाषा बुद्धिस्ट हाइब्रिड संस्कृत (बीएचएस) है। इन लिखावटों की संख्या तीन है और इनमें एक ही सूचना अलग-अलग आकारों में दी गई है। सबसे बड़ी लिखावट की दस पंक्तियां (कहीं-कहीं से मिटी हुई) इस प्रकार हैं-
1. महाराजस्य कणिष्कस्य सं 3 हे 3 दि 22 (महाराज कनिष्क का तीसरा वर्ष, जाड़े का तीसरा माह, तिथि 22),
2. एताए पूर्वाए भिक्षुस्य पुष्यवुद्धिस्य सद्धेवि (इस तिथि में श्रद्धेय भिक्षु पुष्यबुद्धि ),
3. हारिस्य भिक्षुस्य बालस्य त्रेपिटकस्य (के साथ त्रिपिटकाचार्य भिक्षु बाला ने),
4. बोधिसत्वो छत्र्यास्ति च प्रतिष्ठापितो (बोधिसत्व और छत्र की स्थापना की),
5. बाराणसिए भगवतो चंक्रमे सह मात (वाराणसी में भगवान के चंक्रमण के स्थान पर माता और),
6. पिथि सह उपाध्यायचर्येहि (पिता तथा शिक्षकों के साथ),
7. हि अंतेवसिकेहि च सह बुद्धमित्रये त्रेपिटिका (और त्रिपिटकाचार्य बुद्धमित्र के छात्रों के साथ),
8. ये सह क्षत्रपेण वनस्परेन खरपल्ल,
9. नेन च सह चतुहि परिसहि सर्वसत्वनाम,
10. हितश्च सुखरत्थम (और क्षत्रप वनस्पर, खरपल्लन तथा चारो समुदायों के साथ सभी प्राणियों के कल्याण और उनकी प्रसन्नता के लिए (तीनों पंक्तियों 8, 9 और 10 को मिलाकर)।
कुछ अटपटी सी संस्कृत में लिखवाए गए इतने पुराने पाठ का तात्पर्य इतिहासकारों ने मोटे तौर पर यह निकाला है- ‘कनिष्क शासन के तीसरे साल में भिक्षु बाला ने अपने परिजनों, गुरुओं, उनके कुछ शिष्यों और कनिष्क के दो क्षत्रपों वनस्पर और खरपल्लन की उपस्थिति में चारो समुदायों (इसका अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र है या कुछ और, क्या पता) के कल्याण और उनकी खुशी के लिए छत्र सहित बोधिसत्व की स्थापना की।’
कनिष्क के शासनकाल को लेकर इतिहासकारों में कोई सटीक सहमति अभी तक नहीं बनी है, लेकिन जितनी भी सहमति है, उसके आधार पर इस मूर्ति की स्थापना का समय 130 ईसवी के आसपास का माना जा सकता है। रही बात कनिष्क के दो क्षत्रपों वनस्पर और खरपल्लन की तो उनका जिक्र मथुरा में और कुछ अन्य जगहों पर भी मिलता है। खरपल्लन को ‘महाक्षत्रप’ कहा गया है। बाद में यह दर्जा वनस्पर को भी हासिल हुआ।
वनस्पर ने क्या किया
ये दोनों जन कनिष्क के क्षत्रप तो थे, लेकिन ये कौन थे, कहां से आए थे, इनकी शक्ल-सूरत कैसी थी, इन सब पहलुओं को सामने रखकर इनके बारे में हम कुछ नहीं जानते। सिर्फ दोनों का प्रशासनिक ओहदा पता है। लेकिन इनमें वनस्पर को लेकर डॉ. के. पी. जायसवाल ने पुराणों से काफी जानकारियां जमा कर रखी हैं। अपनी किताब ‘अंधकारयुगीन भारत’ में वे बताते हैं कि क्षत्रप वनस्पर ने गंगा घाटी में कैवर्तों (केवटों) और पंचकों (पंचम वर्ण, जिसे बाद में अछूत कहने का चलन चल पड़ा) को जुटाकर उनकी सेना बनाई, विदेशों से भाड़े पर सैनिक बुलाए, ब्राह्मणों और कुलीन क्षत्रियों को लंबे समय तक परेशान किया और उत्तर भारत की समाज-व्यवस्था में उथल-पुथल मचा दी।
‘पद्मावती’ के लेखक मोहन लाल शर्मा अपनी कल्पना की तरंग से के. पी. जायसवाल की थीसिस को और आगे ले जाते हैं। किसी पुराण में समाज को उलट-पुलट देने वाले व्यक्ति की तरह वर्णित वनस्पर के ‘क्लीववत’ यानी हिजड़े जैसे चेहरे का हवाला देकर वे उसको हूण बताते हैं। वे कहते हैं कि उसके दाढ़ी-मूंछ नहीं उगती रही होगी और उसका चेहरा चीनी ढंग का रहा होगा। इस संबंध में पहली बात तो यह कि जिस दौर में महाकवि अश्वघोष ने ‘बुद्धचरित’ जैसा ग्रंथ लिखा हो, मृगदाव में इतनी सुंदर बुद्ध मूर्ति स्थापित हुई हो, वह किसी भी हाल में ‘अंधकारयुग’ कहलाने लायक नहीं है। डॉ. के.पी. जायसवाल के प्रति सारे सम्मान के बावजूद यह एतराज मुझे जताना ही होगा। फिर, जिन पौराणिक उद्धरणों के आधार पर वे इस समय को अंधकारयुग कहते हैं, उनको भी ठीक से परखना होगा।
सबसे पहले डॉ. जायसवाल ‘गर्ग संहिता’ से एक उद्धरण देते हैं- ‘शकों का राजा बहुत ही लोभी, शक्तिशाली और पापी था।… इन भीषण और असंख्य शकों ने प्रजा का स्वरूप नष्ट कर दिया था और उनके आचरण भ्रष्ट कर दिए थे।’ भारत के प्राचीन शास्त्रों में शकों और कुषाणों के बीच कोई फर्क नहीं किया गया है, हालांकि शक (सीथियन) मध्य एशिया में पश्चिम-उत्तर दिशा से यानी रूस की तरफ से और कुषाण पूरब-उत्तर से यानी चीन की तरफ से आए थे। उनके चेहरे-मोहरे की बनावट एक-दूसरे से काफी अलग थी, लेकिन चीन के शिन्च्यांग प्रांत में मिले म्यूरल्स से पता चलता है कि चीनी ढंग की मुखाकृति इन दोनों ही जातियों से जुड़े लोगों की नहीं थी। इससे जरूरी बात यह कि वनस्पर की जातीयता (एथनिसिटी) के बारे में हम दावे के साथ कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं।
डॉ. जायसवाल की टिप्पणी के पक्ष में मोहनलाल शर्मा अपनी किताब में ब्रिटिश ओरिएंटलिस्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीश (भारत में तब सुप्रीम कोर्ट नहीं था) एफ. ई. पारजिटर द्वारा तैयार किए गए पौराणिक पाठों से तीन पुराणों के काफी मिलते-जुलते उद्धरण पेश करते हैं, हालांकि तीनों में ही क्रियाप्रयोग भविष्यतकाल के दिखाई पड़ते हैं-
कैवर्त यदु पुलिंद अब्राह्मणानाम, राज्ये स्थापयिस्यति उत्साद्येखिल क्षत्र-जातिः। (क्षत्रिय जाति का उच्छेद करके केवट, यदु, पुलिंद जैसे अब्राह्मणों को राज्य में स्थापित करेगा) - (विष्णु पुराण)
करिष्यति अपरान् वर्णान् पुलिंद यवु मद्रकान, प्रजाश्चाब्रह्म भूयिष्ठाः स्थापयिष्यति दुर्मतिः। (वह दुर्बुद्धि पुलिंद, यवु और मद्रक जैसे बाहरी वर्णों और प्रजाओं को ब्राह्मणों जैसी प्रतिष्ठा में ला देगा।) - (भागवत पुराण)
उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् सोsन्यान् वर्णान् करिष्यति, कैवर्तान् पंचकांश्चैव पुलिंदान् अब्रह्मणांस्तथा। (सारे पार्थिवों का उच्छेद करके वह केवटों, पंचकों, पुलिंदों और अब्राह्मणों से अन्य वर्णों का निर्माण करेगा।) - (वायु पुराण)
कुषाण क्षत्रप वनस्पर ने देश की श्रमशील जातियों से आए लोगों को अब से कोई दो हजार साल पहले अगर सचमुच सेना और राज्य मशीनरी में जगह दी होगी तो इससे ब्राह्मण और क्षत्रिय समुदायों में बड़ी बेचैनी पैदा हुई होगी। उनके बौद्धिक प्रतिनिधि इसके इर्दगिर्द ‘अंधकारयुग’ का बिंब निर्मित कर अपनी मनोभावना व्यक्त करें, यह स्वाभाविक है। लेकिन इसका दूसरा पहलू वह है जो सारनाथ में मिली मूर्ति पर दर्ज लिखावट में जाहिर होता है। कनिष्क के समय में कुषाण शासन बौद्ध मतावलंबी था। चातुर्वर्ण की ऊंच-नीच वह नहीं मानता था। ऐसे में ब्राह्मण-क्षत्रिय प्राधान्य वाली राज्य मशीनरी और सेना को ज्यों का त्यों रखकर ही वह अपनी सत्ता चलाता तो यह एक अधार्मिक कृत्य होता।
वनस्पर से बनाफर तक
मोहनलाल शर्मा का काम ग्वालियर के पास पड़ने वाली पवाया नाम की जगह पर है, जिसे प्राचीन नगरी पद्मावती का अवशेष कहा जा रहा है। यह शहर लगभग एक हजार साल तक अस्तित्व में रहा और एक बड़े सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा रही। आठवीं सदी ईसवी के मध्य में हुए महाकवि भवभूति अपने नाटक ‘मालती-माधव’ में इस शहर का जिक्र बड़ी इज्जत से करते हैं और इसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में जो कुछ बताते हैं, वह काफी हद तक पवाया से मिलता-जुलता है। मोहनलाल शर्मा के मुताबिक इस नगरी को सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा ईसा की तीसरी-चौथी सदी में नवनाग शासकों ने दी, लेकिन उसके पहले यह कनिष्क के क्षत्रप वनस्पर का गढ़ हुआ करती थी। वही वनस्पर, जिसपर हम अभी ऊपर बात कर रहे थे।
बनस्पर के प्रशासनिक प्रभाव वाला इलाका बहुत बड़ा था लेकिन मथुरा में कुषाण सत्ता का केंद्र होने के कारण ब्रज, बुंदेलखंड और चंबल क्षेत्रों में ‘बनाफर’ जैसे घिसे हुए उच्चारण में उसकी उपस्थिति बने रहने की संभावना अधिक है। लेकिन वनस्पर की सदेह उपस्थिति के एक हजार साल बाद उसके तार बक्सर जैसी सैकड़ों मील पूरब की जगह से जोड़ने का क्या औचित्य बनता है? पता नहीं। जातिनाम के रूप में वनस्पर और बनाफर दोनों हमारे लिए समान रूप से अजनबी हैं। बस, उच्चारण में दोनों आसपास पड़ते हैं और गौर करने पर गुणों में भी साम्य दिखाई देता है।
आल्हा-ऊदल की ठीक पिछली पीढ़ी के लोग- रहिमल, टोंड़र, बच्छराज और देसराज- बक्सर से चलकर किस काम के लिए कहां जा रहे थे, इसका कोई जिक्र आल्हखंड में सुनने या पढ़ने को नहीं मिलता। अपनी पूर्वज परंपरा की कोई जानकारी उन्हें थी या नहीं, यह भी हम नहीं जानते। लेकिन अपना परिचय वे हमेशा लोगों को बनाफर के रूप में ही देते थे और लोग भी इज्जत से उन्हें ‘बनाफर राय’ ही कहते थे। इससे पता चलता है कि कोई उनके बारे में चाहे कुछ भी कहे, उनसे अपनी बेटी भले न ब्याहना चाहे, लेकिन उन्हें खुद बनाफर बनकर रहना ही अच्छा लगता था।
आल्हखंड पूरी तरह सामंती सोच का मौखिक महाकाव्य है, लेकिन जाति और धर्म को लेकर उसकी समझ अपने समय की अन्य रचनाओं की तुलना में कहीं बेहतर है। सैयद मीर तल्हान का जिक्र ऊपर आ ही चुका है लेकिन उससे बड़ी बात यह कि रूपन नाम का बारी बिरादरी का व्यक्ति, जिसकी पारंपरिक भूमिका हिंदू कर्मकांडों में एक कमजोर प्रजा की रही है, आल्हखंड की लगभग हर लड़ाई में पहला मोर्चा संभालता है, बतौर नेग कोई धन-संपत्ति नहीं, प्रतिपक्षियों से एक पहर की लड़ाई मांगता है और ऐसे हर युद्ध के बाद किला टापकर जिंदा भी निकल आता है।
आल्हा-ऊदल की बहुजातीय फौज का किस्सा रूपन की वीरता तक ही सीमित नहीं है। ऐसे कितने ही नाम आते रहते हैं। ‘लला तमोली धनुआं तेली मन्ना गूजर की हनकार। लाखनि ऊदन देबा ठाकुर रण मा खूब करैं तलवार।’
के. पी. जायसवाल अपनी किताब ‘अंधकारयुगीन भारत’ में भारशिव वंश को कुषाणों से गंगा घाटी को मुक्ति दिलाने वाला और डगमगाते हिंदू धर्म की दृढ़ता से पुनर्स्थापना करने वाला राजवंश बताते हैं। इस मामले में वे उन्हें गुप्तवंश से ज्यादा महत्व देते हैं, हालांकि गुप्तवंश ने सत्ता संभालने के एक-दो पीढ़ी के अंदर ही भारशिवों का पूरी तरह अस्तित्व-लोप कर दिया।
जायसवाल की इस प्रस्थापना को इतिहासकारों ने कितनी सख्ती से जांचा है, मुझे नहीं पता। लेकिन यह खंडित न हुई हो तो सारनाथ में कनिष्क-कालीन बाला बोधिसत्व को ढहाने वाले और इस बौद्ध तीर्थ का प्रथम विलोप करने वाले भी भारशिव ही होने चाहिए। त्रिपिटक में नाग जाति की निकटता बौद्ध धर्म के साथ दिखती है। एक बार सत्ता खोकर दूसरी बार इसे हासिल करने के बाद खुद को 'नव-नाग' कहने वाले भारशिवों की ऐसी भूमिका समझ से परे है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने उपन्यास ‘चारु चंद्रलेख’ में और शिवप्रसाद सिंह ‘नीला चांद’ में ईसा की बारहवीं और ग्यारहवीं सदियों के सारनाथ का जिक्र एक जिंदा जगह की तरह करते हैं, जहां अलग-अलग मिजाज के बौद्धों की चहल-पहल हुआ करती थी, हालांकि इसका कोई प्रमाण वे नहीं देते। मगध के महाविहारों की पांत में रखकर इसको भी बख्तियार खिलजी का ही शिकार मान लिया जाता है। लेकिन पता किया जाना चाहिए कि तीसरी सदी में हुए पहले और तेरहवीं सदी में हुए अंतिम विध्वंस के बीच कभी यह पुनर्जीवित भी हुआ था या नहीं।
पुरातत्वविदों की कोशिश किसी साइट के सबसे पुराने बिंदुओं को खोजने में ज्यादा होती है, लेकिन इतिहास के काम की चीज वह तब बनती है, जब साइट की जीवंतता का अंतिम बिंदु खोजा जाता है। यह कि अपनी स्थापित भूमिका में वह कबतक जिंदा रही। इसके बाद ही यह सवाल आता है कि दोनों बिंदुओं के बीच उसके साथ क्या-क्या हुआ। सारनाथ के मामले में ऐसा काफी कुछ खोजा जाना बाकी है। खैर, यहां यह प्रकरण बनाफरों के जिक्र से जुड़ कर आया है। उनके तार कभी कुषाण क्षत्रप वनस्पर की वंश परंपरा से जोड़े जा सकें तो आल्हा-ऊदल के किस्सों का कुछ अलग ही अर्थ निखर कर आएगा।
आल्हा का पुनर्पाठ-5
दो शादियों के बीच गुजरे चौदह साल
नैनागढ़ और सोनवां का जादू
आल्हखंड में वर्णित लड़ाइयों का कोई बड़ा उद्देश्य नहीं है। उनकी एक बड़ी तादाद शादियों से जुड़ी है। लेकिन आल्हा से ऊबे कुछ लोगों का यह कहना बिल्कुल गलत है कि ये लड़ाइयां राजपरिवारों से लड़कियां उठा लाने के लिए लड़ी जाती थीं। अव्वल तो इस ग्रंथ में ऐसी एक भी लड़ाई नहीं मिलती, जो लड़कियों के साथ जोर-जबरदस्ती की वकालत करती हो या उनकी मर्जी की अनदेखी करती हो। दूसरे, शादी-ब्याह में लड़ाई होने की अपनी वजहें हैं, जिनकी जटिलताओं में जाने का मौका हमें आगे मिलेगा।
अभी तक यहां हमने देशराज और बच्छराज की शादी देखी है, जिसमें कोई लड़ाई नहीं हुई। फिर ऊदल की शादी देखी, जिसमें दुल्हन की हत्या फेरों के दौरान ही कर दी गई। इससे पहले हुई लड़ाई, माड़ोगढ़ की लड़ाई शादी के लिए नहीं थी और बिजैसिनि का हत्या का कारण भी जटिल था। अगली लड़ाई, नैनागढ़ की लड़ाई निश्चित रूप से शादी से जुड़ी है और उसमें ज्यादा उलझाव नहीं है।
नैनागढ़ के भूगोल के बारे में सिर्फ एक सूचना आल्हखंड में मिलती है कि आल्हा की बारात वहां से महोबा वापस लौटते हुए प्रयागराज में रुकी थी। किस्सा शुरू यहां से होता है कि कुछ वीर युवकों द्वारा माड़ोगढ़ में अपने बाप की हत्या का विध्वंसक बदला लिए जाने की चर्चा राजपरिवारों में चलने लगी है। नैनागढ़ की राजकुमारी सुनवां (सोनवां या सोनमती) को यह सूचना अपनी सखियों से मिलती है और वह आल्हा से ही विवाह करने का प्रण ठान लेती है।
नैनागढ़ की एक खासियत यह है कि उसके शासक को अपने परिवार में किसी की तपस्या से एक अमरढोल मिल गया है। एक ऐसा ढोल, जिसकी आवाज मुर्दों के कान में पड़ जाए तो वे जिंदा हो जाते हैं। इस ढोल के बल पर वे लड़ाई में मरे अपने सैनिकों को जिला लेते हैं और उन्हें कोई हरा ही नहीं पाता। दूसरी खासियत इस परिवार में मौजूद जादू की परंपरा है। राजकुमारी सुनवां खुद एक श्रेष्ठ जादूगरनी है और उसके पिता, नैनागढ़ के राजा तो इस हुनर के उस्ताद हैं। कथाक्रम में एक जगह बाप-बेटी के बीच ही जादू का मुकाबला चल पड़ता है और आल्हा की पत्नी के रूप में सोनवां की जादुई शक्ति हमें इस प्रकरण के बाद भी आल्हखंड में दो-तीन जगह दिखाई पड़ती है।
किस्सा यह है कि सुनवां की मां को जैसे ही पता चलता है कि उसकी लड़की ने आल्हा से ब्याह करने का प्रण लिया है, वह अपने पति से सिर्फ इतना कहती है कि अब इसकी शादी कर दी जानी चाहिए। नैनागढ़ से शादी का टीका महोबा को छोड़कर हर जगह जाता है, हालांकि इस बहिष्कार का कारण यहां स्पष्ट नहीं है। सुनवां को जैसे ही इस बात का पता चलता है, वह एक तोते के गले में चिट्ठी बांधकर उसे महोबा रवाना कर देती है कि उसका विवाह या तो आल्हा से होगा, या वह कुआंरी ही रहेगी। महोबे में राजा परमाल बनाफरों को नैनागढ़ जाने की इजाजत नहीं देते। यह कहकर कि वहां का राजा जादूगर है और वहां जाने में जान का खतरा है। लेकिन चुनौती कबूल की जा चुकी है।
संक्षेप में कहें तो इस किस्से में बहादुरी से ज्यादा युक्ति काम आती है। आल्हा दो बार विरोधी पक्ष की कैद में चले जाते हैं और दोनों बार ऊदल घोड़ों के सौदागर बनकर उन्हें मुक्ति दिलाते हैं। सुनवां की सूचना पर ही ऊदल को अमरढोल का ठिकाना पता चलता है, जहां से वे उसे चुरा लाते हैं, फिर देवता उसे नष्ट कर देते हैं। आगे आल्हा के फेरों के वक्त उनकी हत्या की पक्की योजना से सुनवां का जादू ही उन्हें बचाता है।
रुप्पन बारी का प्रवेश इसी किस्से में होता है, जो यहां से आगे शादी-ब्याह से जुड़ी हर लड़ाई में एक युद्धक कर्मकांड की तरह कन्यापक्ष के सामने महोबा की पहली चुनौती पेश करते हैं। राजा परमालिक के बेटे, राजकुमार ब्रह्मा को हम यहीं पहली बार एक योद्धा की तरह देखते हैं। साथ ही आल्हखंड के सर्जक जगनिक की शक्ल भी जगनायक या जगना के नाम से इसी किस्से में दिखाई पड़ती है- परमालिक के भानजे, जो महोबियों की अगली पांत में रहते हैं।
अवांतर प्रसंग के रूप में नैनागढ़ की लड़ाई के दौरान ही हमें आल्हा-ऊदल और मलखान को लेकर चलने वाले जातिगत दुराग्रहों की जानकारी भी मिलती है। चुगलखोर मामा माहिल यहां काफी सक्रिय हैं। नैनागढ़ के राजा नैपाली को उन्होंने धमका रखा है कि आल्हा से बेटी ब्याहने का मतलब होगा अपनी नाक कटा देना। ‘कोई क्षत्रिय तुम्हारे यहां रिश्ते के लिए तो दूर, दरवाजे पर पानी पीने भी नहीं आएगा।’
अमरढोल के नाकाम हो जाने के बाद राजा नैपाली एक बार दुविधा में पड़ जाते हैं और माहिल से पूछते हैं कि आल्हा के खानदान में गड़बड़ी क्या है। माहिल उन्हें बताते हैं कि आल्हा और मलखान की माताएं अहीर बिरादरी से आती हैं और ये लोग वर्णसंकर हैं। उनकी चुगली से बनाफरों का ‘ओछा’ होना नहीं साबित होता, अलबत्ता माहिल वर्ण-व्यवस्था के पहरेदार जरूर दिखते हैं।
और कठिन शादियां, और गहरे टोटके
आल्हा की कुल 23 लड़ाइयों में चार अभी पीछे छूट चुकी हैं- कन्नौज, महोबा, माड़ोगढ़ और नैनागढ़। पांचवीं लड़ाई पथरीगढ़ की है और इसका संबंध मलखान के ब्याह से है। रफ्तार बढ़ाते हुए अभी हम एक के बजाय तीन लड़ाइयों पर बात करेंगे। इस तरह महोबिया वीरों की एक समूची पीढ़ी के विवाह का सिलसिला पूरा हो जाएगा और कहानी नया मोड़ लेगी।। पथरीगढ़ के तुरंत बाद दिल्ली की पहली लड़ाई, जो राजकुमार ब्रह्मा के विवाह से जुड़ी है। फिर नरवर की लड़ाई, जिसका रिश्ता ऊदल के ब्याह से है।
एक ब्याह उनका हम पीछे भी देख चुके हैं, जिसमें पत्नी ने अगले जन्म में उनसे दोबारा मिलने का वादा किया था। यह विवाह वही फिर से मिलना है, जगनिक बताते हैं। जितनी शादियां, उतनी लड़ाइयां। घटनाक्रम भी कमोबेश एक से। लेकिन थमकर देखें तो किस्सा हरहराता हुआ बढ़ रहा है।
पथरीगढ़ के राजा गजराज की बेटी गजमोतिनि के मन में किसी का यश सुनकर नहीं, यूं ही ब्याह करने की इच्छा पैदा होती है। बिसेन वंश के इस शासक की एक ताकत इसका अगिनियां घोड़ा है, जिसके आगे कोई नहीं टिकता। लेकिन उसकी सबसे बड़ी शक्ति सेमा भगतिनि नाम की एक योगिनी है, जिसकी तंत्रशक्ति से पार पाना किसी मनुष्य के बूते की बात ही नहीं है।
यह किस्सा बहुत लंबा है। लड़ाइयां इसमें चलती ही जाती हैं। उनमें हम थोड़ा तो घुसेंगे, लेकिन इस प्रसंग की यह परिणति महत्वपूर्ण है कि मलखान इसके थोड़े ही समय बाद सिरसा में अपना अलग राज कायम करते हैं। इस तरह बनाफरों की कोई शाखा पहली बार अपनी रियासत संभालती दिखती है, हालांकि किस्से में इसकी वजह नहीं उभरती। महोबे से सिरसा काफी दूर है। कोई बहुत बड़ा कारण इसके पीछे होना चाहिए।
अभी एक बात समय के बारे में। नैनागढ़ और पथरीगढ़ की लड़ाइयों के बीच काफी वक्त गुजर चुका है। किताब में इसका कोई जिक्र नहीं है, लेकिन पथरीगढ़ की लड़ाई में आल्हा के बेटे इंदल की एक अहम भूमिका है, जिसको दस-बारह साल से कम उम्र में नहीं निभाया जा सकता। इसमें एक प्रसंग आता है जब सेमा भगतिन महोबे की पूरी फौज को पत्थर की मूर्तियों में बदल देती है।
फेरों के लिए महल में अकेले ले जाए गए निहत्थे मलखान को बांसों से पीटकर हथकड़ी-बेड़ी डालकर वहीं किसी खंदक में फेंक दिया गया है। खेमे में आल्हा अकेले बैठे हैं और एक देबा चौहान ही हैं जो पत्थर बने बगैर मोर्चे से लौट पाते हैं। आल्हा उन्हें किसी तरह इंदल को बुलाकर लाने को कहते हैं। इंदल देवी के बहुत बड़े भक्त हैं और आल्हा को उम्मीद है कि इस विपत्ति से निपटने का वे कोई रास्ता निकाल सकते हैं।
देबा चौहान रातोंरात महोबे जाकर इंदल से बताते हैं कि सेमा भगतिनि ने तो महोबे का वंशनाश कर दिया है। इंदल सुबह-सुबह जाकर देवी की मठिया में तांत्रिक पूजा पर बैठ जाते हैं- ‘बड़ी अस्तुती की देबी की, इंदल तंत्रशास्त्र अनुसार। अमृतसानी भइ मठ बानी, इंदल आल्हा केर कुमार।’ सहायता के लिए स्वर्ग निकलने से पहले देवी कहती हैं-
बैठु मठी कछु देर कुमार अबार नहीं करिहउं मैं काजा।
या कहिकै गई देबि तहां जहं बैठ सुराधिप सोहत राजा।।
जाय बिनै बहुभांति कियो सुरराज लख्यो तहं देबि अकाजा।
लैकर अमृत देत जबै ललिते मठि में फिर होत अवाजा।।
यहां अमृत के अलावा इंदल की मां सुनवां या सोनवां की जादुई शक्ति का साथ भी जरूरी है। देबा चौहान, इंदल, अमृत लिए स्वयं देवी और चील बनकर आसमान में उड़ती हुई सुनवां, चारो लोग पथरीगढ़ के युद्धक्षेत्र में पहुंचते हैं। वहां अमृत छिड़क कर देवी फौज को और पत्थर बने सारे योद्धाओं को वापस जिंदा कर देती है, लेकिन आगे और भी कमाल करने के लिए अभी सेमा भगतिन मौजूद है और राजा गजराज का वह अगिनियां घोड़ा भी, जिसके सामने कोई टिक ही नहीं पाता।
वहां सोनवां को चील रूप में देखकर सेमा भगतिन भी चील बनकर उसपर टूट पड़ती है। फिर दोनों जमीन पर आकर एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हो जाती हैं। इंदल परेशान कि क्षत्रिय होकर वे एक स्त्री को कैसे मारें। तब सोनवां उन्हें भगतिन का जूड़ा और अगिनियां घोड़े की पूंछ काटकर लड़ाई खत्म करने को कहती है।
राजकुमार ब्रह्मा के ब्याह से जुड़ी दिल्ली की लड़ाई की पृष्ठभूमि बनने से पहले मलखान सिरसा में अपनी रियासत कायम कर चुके हैं। राजा परमालिक उनसे पहली ही मुलाकात में पूछते हैं कि सिरसा में राजकाज कैसा चल रहा है। राजघरानों में यह बात सर्वमान्य सी हो चली है कि महोबे से किसी तरह का विवाह संबंध रखना ही नहीं है। वहां का शासन चंदेलों के हाथ में है, जिनकी पहचान चंद्रवंशी क्षत्रिय के रूप में है। बनाफरों की तरह अज्ञात कुल-शील होने जैसी कोई दुविधा उनके साथ नहीं जुड़ी है। फिर भी एक धारणा बन चुकी है कि जिसने भी महोबा से रिश्ता जोड़ा, उसकी धाक पहले जैसी नहीं रह जाएगी। लड़ाई लगी तो बनाफरों से हारकर ज्यादा बेइज्जती झेलनी पड़ सकती है।
अभी के खास मामले में पृथ्वीराज की बेटी बेला के लिए रिश्ता खोजा जा रहा है। दिल्ली की छवि उस समय के सबसे शक्तिशाली राज्य की बन चुकी है। शब्दवेधी बाण मारने की क्षमता के लिए पृथ्वीराज को अपने युग का सबसे बड़ा धनुर्धर माना जाने लगा है। उनके सेनापति चौड़ा ब्राह्मण और राजकुमार ताहर बेला का टीका लेकर निकलते हैं जिसकी चिट्ठी में यह बात साफ लिखी है कि जो भी बेला से अपना बेटा ब्याहने आएगा उसे कदम-कदम पर लड़ाई का सामना करना होगा और दूल्हे तक को मंडप से लेकर कोहबर तक कहीं भी मारा जा सकता है। जिसे भी यह शर्त कबूल हो, वह शादी के लिए टीका पकड़ ले। कन्नौज समेत कोई भी राजवंश ऐसी शर्त मानने के लिए तैयार नहीं होता, लेकिन टीका वालों को महोबा न जाने के साफ निर्देश के बावजूद मलखान उन्हें भुलवा कर वहीं लेते आते हैं।
आल्हखंड में अभी तक का सारा किस्सा ही एक से एक भयानक घटनाओं से भरा है लेकिन अपशकुनों की कतार महोबा में पहली बार दिखाई पड़ रही है। रानी मल्हना अपने बेटे के लिए दिल्ली वालों का टीका लेने को किसी भी सूरत में तैयार नहीं हैं लेकिन मलखान अपनी इज्जत का सवाल बनाकर उन्हें इसके लिए राजी करते हैं। छोटे-मोटे बदलावों के साथ ब्रह्मा की शादी भी वैसे ही निपट जाती है, जैसे आल्हा और मलखान की निपटी थी, लेकिन शादी के बाद अपनी बेटी विदा करने को पृथ्वीराज राजी नहीं होते। अपने कुल की रीत बताते हुए वे कहते हैं, गौने के लिए महोबियों को दोबारा आना होगा।
आल्हखंड की कुल 23 लड़ाइयों में सबसे विनाशकारी अंतिम चार बेला के गौने से ही जुड़ी हैं। खैर, अभी तो हम एक तिहाई भी नहीं पहुंचे हैं। आल्हा के किस्से में आगे बहुत सारे मोड़ आने बाकी हैं।
ऊदल की शादी अलबत्ता जरा सस्ते में निपट जाती है। मामा माहिल राजा परमालिक को समझाते हैं कि आपका यश तेजी से बढ़ रहा है और रियासत का प्रभाव भी अच्छा-खासा हो चला है, लेकिन महोबा की जो धाक है उस हिसाब से अच्छी नस्ल वाले, जवान घोड़े उसके पास नहीं हैं। घोड़े काबुल से ही मंगवाए जाने चाहिए और इसके लिए ऊदल को भेजा जाना चाहिए, यह इंतजाम भी दरबार के इसी परामर्श में हो जाता है।
ऊदल और मैनपुरी के युवराज देबा चौहान तीन घोड़ों पर अशरफियां लादकर इस काम के लिए निकल पड़ते हैं। रास्ते में एक जगह कुएं पर बहुत सुंदर पनिहारिनों को देख ऊदल उनसे बात करने लगते हैं। वहीं उनसे पता चलता है कि नरवर नाम के इस राज्य की राजकुमारी का नाम फुलवा है। उनके मन में खटका सा होता है कि बिजैसिनि ने मरते वक्त उनसे अपने अगले जन्म की मुलाकात काबुल के रास्ते में होने की जो बात कही थी, उसका संबंध कहीं इस फुलवा से ही तो नहीं है।
देबा चौहान के बार-बार मना करने के बावजूद वे नरवर में शाहखर्ची से रहते हैं, किसी तरह फुलवा से मिलने का इंतजाम करते हैं, वहां उनके संदेह की पुष्टि भी हो जाती है और इस बीच देबा चौहान को भी ताकाझांकी में आनंद आने लगता है, लेकिन लंबे समय तक यहां ठहर जाने से सारे पैसे उनके नरवर में ही खर्च हो जाते हैं, घोड़ा खरीदने काबुल जाने की नौबत ही नहीं आती। फिर महोबा लौटकर वे अपनी बीमारी का प्रपंच रचते हैं। सुनवां की कोशिश से महोबा वाले बिना किसी टीका के अपनी बारात बनाकर विवाह के लिए नरवर निकल पड़ते हैं। वहां वह सब होता है, जो पिछले विवाहों में होता आया है लेकिन राजा नरपति अपेक्षाकृत जल्दी बेटी विदा करने को राजी हो जाते हैं।
अलबत्ता इस प्रकरण में एक विचित्र बात यह होती है कि महोबे के सीमाक्षेत्र में ऊदल को मरणासन्न ढंग से लेटा देख कर आल्हा का क्रोध भड़क उठता है और वे राजा परमाल से कहते हैं कि ‘तुम्हारे ही काबुल भेजने पर मेरे भाई का ऐसा हाल हो रखा है, अगर वह जिंदा नहीं बचा तो मैं पूरा महोबा फुंकवा दूंगा।’ वीरगाथा काल में राजा की नौकरी कर रहे एक व्यक्ति का ऐसा कथन अटपटा लगता है, लेकिन आगे आने वाला घटनाक्रम यह बताएगा कि यहां पहुंच कर अपने संरक्षक के साथ बनाफरों के रिश्ते पहले जितने सहज नहीं रह गए थे। यूं भी, आल्हा के चचेरे भाई मलखान इस समय तक अपनी अलग रियासत कायम कर चुके थे, यानी कमोबेश वे राजा की बराबरी में आ गए थे।
आल्हखंड का पुनर्पाठ-6
बनाफरों का महोबे से निकाला जाना
आल्हखंड के अगले तीन हिस्सों में दो तो स्पष्ट लड़ाइयां हैं, तीसरी को लड़ाई कहना ठीक नहीं है और इसका नाम भी बाकियों की तरह 'अमुक जगह की लड़ाई' के बजाय ‘आल्हानिकासी’ ही रखा गया है। पहली (कुल आठवीं) का नाम बौरीगढ़ की लड़ाई है। बौरीगढ़ दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं, शायद हरियाणा-पंजाब या मौजूदा राजस्थान की कोई रियासत है और उसपर यदुवंशी राज करते हैं। अंदाजे के मुताबिक यह जगह आज का मेवात जान पड़ती है।
अभी तक हमने महोबे में सिर्फ लड़कों का ब्याह देखा है, जिसमें लड़ाई हर बार एक खतरनाक कर्मकांड की तरह आती है। किस्से में न्यौते पर आए एक योद्धा के रूप में बौरीगढ़ के राजकुमार इंद्रसेन का जिक्र पीछे, ऊदल के ब्याह में आया था। उन्हें राजा परमालिक का दामाद भी वहां बताया गया था, लेकिन महोबे की राजकुमारी चंद्रावलि से उनकी शादी की कोई कहानी सुनने में नहीं आई। इस लड़ाई का संबंध ‘चंद्रावल की चौथ’ से है, जिसे ऊदल महोबे से बौरीगढ़ लेकर जाते हैं।
किस्से में यदुवंशी क्षत्रियों को लेकर बार-बार जन्म-आधारित दुराग्रह उभरते हैं, हालांकि उन्हें क्षत्रिय मानने में कोई दुविधा नहीं दिखती और बनाफरों की तरह उनकी जाति हमेशा सवालों के दायरे में नहीं रहती। सबसे पहले महोबे की रानी मल्हना में यह दुराग्रह दिखाई पड़ता है- ‘कठिन यादवा बौरीगढ़ के, जिनके लूटि मार का काम। बेटी ब्याही तिनके घर मा, कबहुं न द्यखी आपनो धाम।’
मामला यह है कि सावन के झूले पड़ गए हैं और मल्हना को अपनी बेटी याद आ रही है। वे कहती हैं कि ससुरालियों की दुष्टता के चलते कोई चंद्रावलि के यहां जाता ही नहीं, फिर उसे विदा कराकर महोबे कौन लाएगा। इस पर ऊदल कहते हैं कि वे चंद्रावलि की चौथ लेकर बौरीगढ़ जाएंगे और उसे विदा करा कर लाएंगे। राजा परमालिक उन्हें इसके खतरे बताते हैं, जाने नहीं देना चाहते, लेकिन ऊदल का जाना पक्का जानकर उन्हें दिल्ली में पृथ्वीराज से मुलाकात कर के, उन्हें जानकारी दे कर ही बौरीगढ़ जाने को कहते हैं।
इस प्रसंग का एक उद्देश्य शायद यह दिखाना भी है कि दो राजपरिवारों में विवाह-संबंध के समय पैदा हो जाने वाली कटुता रिश्तेदारी कायम हो जाने के बाद समाप्त हो जाती थी। आगे हमें इसका अपवाद भी देखने को मिलेगा, लेकिन इस बार ऊदल के अपने दरबार में पहुंचकर पगड़ी पैर पर रख देने से पृथ्वीराज उनपर बड़े प्रसन्न होते हैं। फिर उनके बौरीगढ़ जाने की बात सुनकर वे भी कहते हैं- ‘मारे जैहो बौरीगढ़ में ऊदन सांचे कहैं हवाल, हवैं लुटेरा यदुवंशी सब कैसे पठै दीन परमाल।’
पृथ्वीराज के महल में संयोगिता के होने का कोई जिक्र नहीं है। ऊदल को महल के भीतर भेजा जाता है तो वहां उनकी मुलाकात रानी अगमा से होती है। वे इस सुंदर पुरुष का सत्कार अपने बेटे की तरह करती हैं, लेकिन बौरीगढ़ जाने से साफ मना करती हैं- ‘बिना दया के बौरी वाले नित उठि करैं निर्दयी काम, जानि बूझि के कैसे पठवैं ऊदन जाउ यमन के धाम।’ सवाल यह है कि ऐसे वंश में महोबा राज की रिश्तेदारी कैसे हुई?
खैर, काफी लाव-लश्कर और बहुत सारी भेंट के साथ ऊदल बौरीगढ़ रवाना होते हैं। उनका वहां खूब स्वागत होता है। सबकुछ ठीक चल रहा है लेकिन इसी बीच मामा माहिल इस रियासत के राजा वीरशाह से भेंट करते हैं और उन्हें बताते हैं कि ‘आल्हा-ऊदल को राजा परिमाल ने महोबे से निकाल दिया है। आल्हा जाकर नैनागढ़ में बैठे हैं जबकि ऊदल इधर चले आए हैं। चंद्रावलि को इनके साथ आपने विदा कर दिया तो उसे अपने घर की नौकरानी बना लेंगे।’ कमाल की बात है कि बौरीगढ़ वाले तुरंत उनकी बात का यकीन कर लेते हैं। फिर पहले ऊदल को जहर देकर मारने की कोशिश की जाती है, वह कामयाब नहीं होती तो हाथ-पैर बांधकर खंदक में डलवा दिया जाता है।
फिर जैसा होता आया है, चंद्रावलि एक तोते के जरिये सिरसा में मलखान और महोबा में मल्हना के पास ऊदल की दुर्गति की चिट्ठी भेजती है। दोनों जगह से, और दिल्ली से भी फौजें सजकर बौरीगढ़ पहुंचती हैं। आल्हा, मलखान, ब्रह्मा और कुछ अन्य योद्धा योगी बनकर ऊदल की खंदक का पता लगाते हैं, सुरंग खोदकर उन्हें बाहर निकालते हैं, फिर युद्ध में बौरीगढ़ की फौज को परास्त करने के बाद चंद्रावलि को विदा कराकर महोबा लाते हैं।
इस प्रकरण में एक दिलचस्प बात और रह जाती है। आल्हा की ओर से वीरशाह को भेजी गई क्षमायाचना की चिट्ठी- ‘नातेदारी में उत्तम हौ आहिउ कृष्णबंश महराज, गुरू श्वसुर से संगर ठानै क्षत्री जन्म युद्ध के काज।’ एक तरफ कृष्णवंशी कहना, दूसरी तरफ लुटेरा और दुष्कर्मी मानना! यदुवंशी क्षत्रियों के लिए यह समय बहुत आसान नहीं रहा होगा। इससे यह अंदाजा भी मिलता है कि 14वीं सदी में मेवात के जादौन राजा लखनपाल ने धर्म बदलकर ‘ख़ानज़ादा’ होने का फैसला क्यों किया होगा।
अगली लड़ाई इंदल के ब्याह से जुड़ी है और इसपर लिखी हुई नौटंकी मैंने बहुत बार खेली जाते देखी है। पूरे आल्हखंड में यह अकेला प्रसंग है जिसमें ऊदल को आल्हा बुरी तरह, लगभग मरने की हद तक पीटते हैं और ऊदल चुपचाप मार खाते रहते हैं। बात यह कि ऊदल और देबा चौहान सोलह-सत्रह साल की उम्र वाले इंदल को लिवा कर गंगास्नान के लिए महोबे से बिठूर जाते हैं।
वहां बलख-बुखारे की राजकुमारी चित्ररेखा जादू के जोर से इंदल को तोता बनाकर अपने साथ लिए जाती है। इधर मामा माहिल आल्हा को समझा देते हैं कि ऊदल ने इंदल को मारकर गंगा में बहा दिया है और अभी वे आकर ऐसा नाटक करेंगे कि ऊदल कहीं खो गए हैं। नौटंकी में तो सुनवां भी ऊदल के साथ गंगास्नान को जाती है और इंदल की हत्या का कारण माहिल दोनों का अवैध संबंध बताते हैं।
खैर, नतीजे का जिक्र ऊपर किया जा चुका है। ऊदल को मार-पीट कर महोबे से निकाल दिया जाता है। वे सिरसा में शरण लेने जाते हैं तो वहां किले का दरवाजा ही उनके लिए नहीं खुलता। अंत में वे अपनी ससुराल बौरीगढ़ आते हैं, वहां अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में बताते हैं और वे लोग, खासकर उनके साले मृत्युंजय उनकी मदद करने के लिए तैयार हो जाते हैं। बड़ी कोशिशों के बाद उन्हें बलख-बुखारे का सुराग देने वाला एक स्वप्न आता है और वे अटक के रास्ते काबुल होते हुए इस सुदूर स्थान तक पहुंच जाते हैं।
ध्यान रहे, बल्ख अभी अफगान का एक उत्तरी प्रांत है और बुखारा उज्बेकिस्तान का सबसे पुराना शहर है। आगे की कहानी जानी-पहचानी है। योगी बनकर ऊदल महल में पहुंचते हैं, चित्रलेखा से मिलते हैं, उसकी शादी इंदल से कराने का वचन देकर इंदल को वहां से वापस महोबे भेजते हैं, फिर बनाफरों के ब्याह में जो-जो होता आया है, वह सब करके किस्से का यह हिस्सा पूरा होता है।
आल्हखंड के सबसे दारुण प्रसंगों में एक बनाफरों को महोबे से निकाले जाने का है। ऊपर वाले प्रसंग से जुड़कर इसमें यह विशेष रूप से रेखांकित होता है कि आल्हा-ऊदल के बहाने जिस समाज की गाथा यहां गाई जा रही है, उसमें कोई किसी का नहीं है। किसी को किसी पर न्यूनतम भरोसा भी नहीं है। माहिल की चुगली सिर्फ एक बहाना है। वे ताकतवर लोगों के मन में बसे डर से खेलते हैं और लोग उनके इस खेल के लिए तैयार बैठे रहते हैं।
कैसा समाज कि इसमें फेरे लेते हुए भाई की पत्नी मारी जा सकती है। बेटे को मार देने के शक में खुद भाई को भी मरने की हद तक मारा जा सकता है। जिन वीरों ने महोबा को ऊंचा मुकाम बख्शा, एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उसकी पहचान बनाई, उन्हें ही बहुत बुरी शर्तों के साथ महोबा से भगाया जा सकता है। आगे और भी बहुतेरी घटनाएं यही बताएंगी कि गाथा में आ रहे ये लोग वीर चाहे जितने हों, इनका मूलभाव भय और असुरक्षा का ही है।
कन्नौज राज की नौकरी
बनाफरों को महोबा से निकाले जाने का घटनाक्रम मामूली है। पृथ्वीराज के दरबार में माहिल बनाफरों के पराक्रम के गीत गाकर उनमें खूब जलन पैदा करते हैं, फिर समझाते हैं कि महोबा की ताकत दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, मलखान दिल्ली के बगल में आकर सिरसा बैठ गए हैं, कभी दांव लग गया तो बनाफर दोनों तरफ से कैंची की तरह दिल्ली को कतर देंगे। पृथ्वीराज माहिल से बनाफरों को हराने का तरीका पूछते हैं। वे बताते हैं कि बनाफरों के पास पांच उड़न बछेड़े हैं- ऊदल का बेंदुला, आल्हा का पपिहा, मलखान की कबुतरी, इंदल की हंसामनि और ब्रह्मा का हरनागर। ‘इन्हीं घोड़ों के बल पर बनाफर हर जगह जीतते जा रहे हैं। इन्हें आप मंगा लें, फिर वे कुछ न कर पाएंगे।’
पृथ्वीराज यही संदेश अपने समधी, महोबा के राजा परिमाल के पास भेज देते हैं, जिसमें यह धमकी भी शामिल है कि घोड़े अगर न भेजे गए तो वे सेना सहित खुद आकर उन्हें ले जाएंगे। परिमाल आल्हा-ऊदल को बुलाते हैं और उन्हें पृथ्वीराज की मांग के बारे में बताते हैं। वे मना करते हैं तो कहते हैं कि पृथ्वीराज का हमला हो गया तो न जाने कितने घोड़े अपने सवारों समेत मारे जाएंगे, ऐसे में क्या यह अच्छा न होगा कि घोड़े खुद ही उन्हें सौंपकर इस विपत्ति से जान छुड़ाई जाए। ऊदल साफ कहते हैं कि आज वे घोड़े मांग रहे हैं, कल पत्नी मांग लेंगे, यह तो नहीं हो पाएगा।
अंत में परिमाल गुस्से में आकर आल्हा से तुरंत दशहरिपुर खाली कर देने को बोलते हैं- यह कसम धराते हुए कि आगे वे लोग महोबा रियासत में जो भी खाएंगे वह गोमांस और जो पीएंगे वह गोरक्त होगा, यह भी यहां उनका पत्नी से संग करना बहन से संग करने के बराबर होगा। इसके बाद बनाफरों के पास वहां बने रहने का कोई आधार नहीं बचता। कुछ तकलीफदेह दृश्य खिंचते हैं। दोनों भाइयों में सलाह होती है कि आखिर जाएंगे कहां। पता चलता है, ऐसा कोई राजा नहीं जिससे शत्रुता न हो, एक कन्नौज के राजा जयचंद्र बचे हैं जिनसे नौकरी मांगी जा सकती है।
मलखान को अपने चचेरे भाइयों की दुर्दशा की खबर मिलती है तो वे महोबा आते हैं और उन्हें सिरसा में बस जाने को कहते हैं। लेकिन ऊदल इस प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं और कन्नौज जाना ही अपने लिए बेहतर बताते हैं। फिर दोनों भाई अपने बीबी-बच्चों और घोड़ों समेत कन्नौज के लिए निकल पड़ते हैं।
दूरी काफी है और महीना भादों का। कहीं टिकना मुश्किल है। नदियों का पानी भी साफ नहीं जिसे सीधे पिया जा सके। कन्नौज की सीमा में पहुंचकर वे इतने बेहाल हो चुके हैं कि वहां का एक बाजार लूट लेते हैं। मामला जयचंद्र के दरबार में पहुंचता है। फौज सजने लगती है। बनाफरों पर हमले की तैयारी चल रही है, तभी महोबा के सेनापति मीर तल्हान सय्यद वहां पहुंच जाते हैं।
वे जयचंद्र को समझाते हैं कि जिस चीज को वे एक संकट की तरह देख रहे हैं उसमें कन्नौज के लिए एक बहुत अच्छा अवसर है। बनाफर बहुत वीर हैं। फलां-फलां को उन्होंने सीधी लड़ाई में शिकस्त दी है और दिल्ली के दरवाजे पर जाकर दो मस्त हाथी मारे हैं। जयचंद्र कहते हैं कि ऐसा है तो उन्हें कन्नौज के दरवाजे पर भी दो हाथियों को हरा कर दिखाना होगा।
हाथी तैयार किए जाते हैं, उन्हें शराब पिलाई जाती है, फिर बनाफरों को बुलाया जाता है। ऊदल अकेले ही भाला मारकर एक हाथी को गिरा देते हैं और दूसरे को सीधे उसके दांत पकड़कर पटक देते हैं। यह परीक्षा पास कर लेने के बाद आल्हा-ऊदल कन्नौज की नौकरी में आ जाते हैं और उन्हें लंबित कर वसूली का काम मिल जाता है। खास बात यह कि मीर तल्हान सय्यद भी महोबा का ऊंचा ओहदा छोड़कर कन्नौज चले आते हैं।
यहां से आगे एक बड़ी लड़ाई कन्नौज के युवराज लाखन राना के ब्याह से जुड़ी है, जिसका संबंध कोटा के बगल की रियासत बूंदी से है। यह लड़ाई भी शादी-ब्याह की बहुतेरी बाकी लड़ाइयों जैसी ही है लेकिन इसमें एक बुनियादी फर्क है। एक तो यह कि इस लड़ाई में आल्हा-ऊदल महोबे की तरफ से नहीं, कन्नौज के नौकर की तरह लड़ रहे हैं और मलखान को इसकी खबर तक नहीं है। दूसरे, यह किले में घुसकर लड़ी जाती है और पहली बार इसमें स्ट्रैटेजी दिखाई पड़ती है। कुंअर लाखन और उनके साथ सहबाला बनकर ब्याह करने गए ऊदल बांधकर खंदक में फेंक दिए जाते हैं। आल्हा को लगता है, किलेबंदी तोड़ना मलखान और महोबे के कुंअर ब्रह्मा के बिना नहीं हो पाएगा।
उनका संदेश मलखान के पास पहुंचता है तो शुरू में उन्हें लगता है कि इस झंझट में नहीं फंसना चाहिए। महोबा से निकाले जाने पर और उसके पहले भी उन्होंने आल्हा-ऊदल से सिरसा में ही आकर रहने को कहा था लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया था। ऐसे में फंसने पर ही याद करना बेतुकी बात है। खैर, पत्नी के समझाने पर वे राजी होते हैं और महोबा से बनाफरों के रिश्ते बहुत कड़वे हो जाने के बावजूद ब्रह्मा को अपनी फौज लेकर बूंदी चलने के लिए मना लेते हैं। वहां बाकी फौज किले के तीन तरफ लगाकर खुद पिछले दरवाजे से हमला करके वे लड़ाई जीतते हैं।
कन्नौज के लिए आल्हा-ऊदल की दूसरी लड़ाई, ‘गांजर की लड़ाई’ दरअसल कई लड़ाइयों का एक समुच्चय है। कन्नौज रियासत की स्थिति इस समय काफी कमजोर हो चुकी है और उसके अधीन रहे कई इलाकों से बीते बारह वर्षों में कर के रूप में एक भी पैसा नहीं आया है। इस लड़ाई के ब्यौरे बारहवीं सदी में सामंतवाद की स्थिति के बारे में काफी कुछ बताते हैं।
बड़े से भी बड़े नाम से काम नहीं चलने वाला, साम्राज्य की बैटरी को हमेशा चार्ज करते रहना जरूरी है। एक तूफानी अभियान में कन्नौज की फौज वहां के राजकुमार ब्रह्मा को आगे रखते हुए आल्हा-ऊदल के नेतृत्व में बहुत सारी रियासतों का धावा मारती है, उनके सामने बारह साल का बकाया जमा करने या फिर कन्नौज के हमले में पाई-पाई लूट लिए जाने की शर्त रखती है। भूगोल में ये ब्यौरे अटपटे लगते हैं- पट्टी, बनारस, गोरखपुर, पटना, असम और बंगाल, जहां का राजा गोरखा है!
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| कोटा से प्राप्त पृथ्वीराज चौहान का एक चित्र |
आल्हखंड का पुनर्पाठ-7
महोबा पर पृथ्वीराज का प्रकोप
मलखान की यशगाथा
यहां से आगे तकरीबन पूरा आल्हखंड महोबा और कन्नौज के खिलाफ पृथ्वीराज के हमलों और जब-तब जवाबी कार्रवाइयों से भरा हुआ है। लेकिन यह सिलसिला शुरू होता है सिरसा के खिलाफ दिल्ली की मुहिम और योजना बनाकर सुनिश्चित की गई मलखान की मौत से। उत्प्रेरक की भूमिका में हमेशा की तरह उरई के राजा, परमार्दिदेव (परिमाल) के साले माहिल परमार, जो दिल्ली दरबार में सूचना पहुंचाते हैं कि आल्हा-ऊदल महोबा छोड़कर कन्नौज की नौकरी में जा चुके हैं। यह भी कि सिरसा और महोबा, दोनों को ही निपटा देने का यह अच्छा समय है।
सिरसा अगर वही सिरसा है, जिसे हम अभी हरियाणा के धुर दक्षिण-पश्चिमी जिले के रूप में जानते हैं- इसके कहीं और स्थित होने का कोई संकेत भी आल्हखंड से नहीं मिलता- तो मलखान द्वारा वहां रियासत कायम किए जाने को उस समय की दृष्टि से एक आश्चर्य ही कहा जाएगा। पृथ्वीराज चौहान को अजमेर का राज्य पिता की तरफ से और दिल्ली का राज ननिहाल की तरफ से तोमर राजवंश की विरासत की तरह प्राप्त हुआ था।
इतिहास को एक तरफ रख दें, सिर्फ किस्से के ढंग से सोचें, तो भी मलखान का महोबा से, यानी बुंदेलखंड के पूर्वी-दक्षिणी छोर से आकर सिरसा में रियासत कायम कर लेना एक नजर में कन्नौज और महोबा की ओर से पृथ्वीराज की घेरेबंदी जैसा ही लगता है।
माहिल की चुगली से नहीं, सामान्य कूटनीतिक समझ से भी पृथ्वीराज का सिरसा पर हमला बोलना स्वाभाविक लगता है। हालांकि महोबे के राजकुमार ब्रह्मा से अपनी बेटी बेला के विवाह के बाद वह मलखान को अपना रिश्तेदार मानकर भविष्य की किसी बड़ी गोलबंदी में उनका सहयोग भी ले सकता था।
खैर, कई चिर-परिचित पात्रों के अभाव में सिरसा और दिल्ली के बीच हुई दो लड़ाइयां वर्णन की दृष्टि से आल्हखंड में सबसे सादी हैं और इनसे इस ग्रंथ के ट्रैजिक उत्तरार्ध का खाका खिंचता है। सिरसा पर हमले को लेकर पृथ्वीराज की ओर से एक ही शर्त रखी गई है। मलखान अपनी ओर से ही सिरसा के किले को ढहवा दें तो लड़ाई रुक सकती है। जवाब में संदेश जाता है कि इलाके को बंजर जानकर मलखान ने यहां किला बनवाया, रैयत को सुरक्षा दी, अब अपने हाथों बनवाया किला ढहा कैसे दें?
फिर लड़ाई होती है, जिसमें पृथ्वीराज का एक बेटा और दो बड़े सरदार मारे जाते हैं तो वे फौजें वापस खींच लेते हैं। मलखान की वीरता से लोग पहले ही परिचित थे, अभी इसकी चर्चा मिथकीय पैमानों तक पहुंच जाती है। फिर माहिल को ही उनका कोई कमजोर पहलू पता लगाने के लिए भेजा जाता है।
माहिल की पहुंच रियासतों में अंतःपुर तक रहती है। मलखान की मां बिरमा को अपनी सगी बहन जैसी बताते हुए उनके ही मुंह से वे यह राज निकलवा लेते हैं कि मलखान के पैरों में पद्म है। सुने हुए आल्हा में एक पंक्ति ध्यान आती है- ‘सारी देह बनी पत्थर की औ तरुए में बसै परान।’ ग्रीक पौराणिक पात्र एकिलीज की तरह, जिसकी अकेली कमजोरी उसकी एड़ी में थी, मलखान को तलवे में कुछ चुभोकर ही मारा जा सकता था। बिरमा पद्म तक आती हैं, अपने बेटे को पत्थर का बना नहीं बतातीं।
माहिल यह सूचना पृथ्वीराज तक पहुंचा देते हैं और बिना देर किए दिल्ली की ओर से सिरसा पर दूसरा आक्रमण होता है। इसके लिए पहले से तैयारी करके रखी गई है। युद्धक्षेत्र कुछ अलग ढंग से तैयार किया गया है। पृथ्वीराज की बाकी सेना किले पर हमले के लिए भेजी जाती है लेकिन खुद हाथी पर सवार राजा अपनी सेना के पीछे से मलखान को ललकार रहा है। बीच में एक खंदक खुदी दिखाई पड़ रही है लेकिन उसके आगे एक और खंदक है जो लकड़ी के पत्तरों से ढकी हुई है और उसपर मिट्टी फैला दी गई है।
घोड़ी कबुतरी पर सवार मलखान पहली खंदक पार करके पृथ्वीराज तक पहुंचने की कोशिश करते हैं और घोड़ी समेत दूसरी खंदक में जा पड़ते हैं, जिसमें बर्छों के फल गड़े हैं। राजा के एक भी वार किए बिना ही बैरी मारा जाता है और सिरसा पर गधे का हल चला दिया जाता है। आगे हम आल्हखंड में पहली स्त्री को सती होते देखते हैं। मलखान की पत्नी गजमोतिनि लगातार ऊदल और इंदल को याद करती हुई अपने पति के शव के साथ सती हो जाती है।
पछतावे की मारी उसकी सास बिरमा उसे जलते हुए देखती है लेकिन यहां से आगे उसका क्या हुआ, किस्से में इसका कोई जिक्र नहीं आता। मलखान की दुखद मृत्यु की चर्चा महोबे तक तो पहुंच जाती है लेकिन आल्हा-ऊदल और उनका परिवार इसके बारे में देर से जानते हैं। सिरसा को निपटाने के तुरंत बाद पृथ्वीराज का हमला अपने समधियाने, महोबा पर ही होता है।
ग्यारहवीं सदी ईसवी के प्रतापी चंदेल राजा कीर्तिसिंह चंदेल के नाम पर बनी झील कीरतसागर और मदनताल पर पृथ्वीराज की फौज उतरती है और उनका संदेश लेकर माहिल महोबे जाते हैं- खजुहा की बैठक, ग्वालियर का राज, पारस पत्थर, नौलखा हार, पांचों उड़न-बछेड़े और राजकुमार ताहर के लिए चंद्रावलि का डोला तत्काल भेजवा दें, नहीं तो महोबा शहर लूट लिया जाएगा। इन सारी चीजों के अलावा और भी बहुत कुछ खोना पड़ेगा सो अलग।
चंद्रावलि एक विवाहित स्त्री है, थोड़ा ही समय पहले ऊदल उसकी चौथ पहुंचाकर और खुद पृथ्वीराज के समर्थन से एक बड़ी लड़ाई लड़ कर बौरीगढ़ से उसे विदा कराकर लाए हैं, यह किसी के लिए कोई मुद्दा नहीं है। मध्यकालीन काव्य संस्कृति में विवाह के लिए स्त्री का अविवाहित होना गैरजरूरी है।
कीरत सागर की लड़ाई
कीरत सागर की पहली लड़ाई में ऊदल का प्रवेश एक सपने की वजह से होता है। महोबे से आकर कन्नौज में बसे एकाधिक लोगों को एक ही रात में यह सपना आता है कि रानी मल्हना रोती हुई उनसे लौट आने को कह रही हैं। आल्हा-ऊदल और सय्यद तल्हान समेत उनके साथ आए कई वीर इस समय कन्नौज राज के नौकर हैं। अतीत में कभी रियासत का अंग रही जगहों से बारह साल का बकाया वसूलना उनकी नौकरी है। यह काम कभी रुकने वाला नहीं, लेकिन इसकी पहली मुहिम में ही एक बड़ी बात यह हुई कि युवराज लाखन से ऊदल की गहरी छनने लगी।
लाखन को बदले हुए वेश में महोबा घुमा लाने के लिए वे पहले ही राजी कर चुके हैं, लेकिन अभी यह झूठ बोलने के लिए भी तैयार कर लेते हैं कि दोनों लोग साथ में फौज लेकर कर-वसूली के लिए जा रहे हैं। इस बार उनकी फौज में आल्हा नहीं हैं और फौजियों में एक बड़ी संख्या महोबा से आए लड़ाकों की है। कन्नौज से कुछ दूर निकल आने के बाद ये सारे लोग योगी वेश धारण कर लेते हैं और कीरतसागर के ही पास में अपना डेरा डाल देते हैं।
आगे लंबे किस्से को छोटा करते हुए इतना ही कि योगी वेश में महोबा पहुंचे ऊदल, लाखन, देबा और सैयद मल्हना को पृथ्वीराज से सुरक्षा का वचन देते हैं। चंद्रावलि को पबनी नाम का एक पर्व करना है, जिसे ससुराल से लौटी महोबा की राजकुमारियां कीरतसागर में ही मनाती आई हैं। अभी पृथ्वीराज की फौज वहां बैठी है, यह कहकर राजकुमार ब्रह्मा अपनी बहन को वहां ले जाने से साफ मना कर देते हैं। ऐसे में उनके छोटे भाई रंजित और माहिल के बेटे अभई (अभय सिंह परमार) चंद्रावलि और मल्हना को सुरक्षा देते हुए कीरतसागर पहुंचते हैं। वहां उनपर दिल्ली की फौज का हमला होता है और सख्त लड़ाई के बाद पृथ्वीराज के एक बेटे को मारकर वे मारे जाते हैं।
भाई का मरना सुनकर ब्रह्मा भी महोबे की बाकी फौज के साथ कीरतसागर पहुंचते हैं। तबतक दिल्ली वालों ने मल्हना के सामने ही चंद्रावलि का डोला उठा लिया है, लेकिन योगी वेश में आए ऊदल, लाखन और अन्य महोबिया वीरों की कोशिश से डोला वापस हो जाता है। काफी नुकसान झेलकर पृथ्वीराज वहां से मोर्चा उठा लेते हैं, यह कहकर कि बेहतर तैयारी के साथ लौटेंगे। राजा परिमाल को योगीवेश में ऊदल के ही वहां होने का पता चलता है तो वे उन्हें रोकने की भरसक कोशिश करते हैं। लेकिन ऊदल इसे अपनी निश्चित मृत्यु बताकर कन्नौज चले आते हैं।
ज्यादा दिन नहीं बीतते, पुरानी शर्तों के साथ ही पृथ्वीराज पूरी तैयारी के साथ फिर से कीरतसागर पर हाजिर होते हैं और सूची में मौजूद सारी चीजें सौंप देने के लिए इस बार महोबा को बारह दिन का वक्त देते हैं। तेरहवें दिन सिरसा की तरह महोबा भी लूट लिया जाएगा और उसपर भी गधे का हल चला दिया जाएगा। इस बार किसी संयोग से बात नहीं बनने वाली, दिल्ली के राजा ने बारह दिन की मोहलत दे दी, यही बड़ी बात है, ऐसा सोचकर रानी मल्हना राजा परिमाल के भानजे, खुद आल्हखंड के रचनाकार जगनायक को आल्हा-ऊदल को मनाकर लाने कन्नौज भेजती हैं।
जगनायक का कन्नौज पहुंचना भी किसी छोटे-मोटे युद्ध जैसा ही है। बेतवा नदी पार करते वक्त उनसे हरनागर घोड़ा छीन लेने के लिए पृथ्वीराज का हमला होता है, फिर बेतवा पार करके कन्नौज की सीमावर्ती रियासत कुड़हरि में प्रवेश के थोड़ी ही देर बाद घोड़ा और कोड़ा, दोनों चोरी चले जाते हैं। वहां के राजा, लाखन कुंअर के मामा गंगाधर के दरबार में जाकर वे किसी तरह घोड़ा तो पा लेते हैं लेकिन कोड़ा रह जाता है।
आगे सिर्फ इतना कि बनाफर परिवार को मलखान की मृत्यु और सिरसा के विध्वंस की सूचना उन्हीं से मिलती है। इस महाशोक में भी आल्हा को महोबा लौट चलने के लिए वे किसी तरह राजी करते हैं लेकिन आल्हा जैसे ही कुछ दिन के लिए महोबा जाने का निवेदन जयचंद्र से करते हैं, जयचंद्र उनपर वसूला गया टैक्स चुराने का आरोप लगाकर उन्हें कैद करवा देते हैं।
यह सूचना ऊदल को मिलती है तो वे जगनायक को लेकर कन्नौज के दरबार में जाते हैं और कहते हैं कि ‘कर-वसूली की लड़ाइयों में पपिहा जैसा उड़नबछेड़ा घायल हुआ है और भाभी सोनमती (सुनवां) के दोनों भाई, जोगा ठाकुर और भोगा ठाकुर मारे गए हैं। वसूली का ब्यौरा कहीं कागज में लिखा हुआ है, उसे देख लें और आल्हा को तत्काल रिहा करें, लेकिन पपिहा का मोल चुकाने में तो कन्नौज की रियासत बिक जाएगी। फिलहाल उसकी कोई बात ही न करके जोगा-भोगा की मौत के एवज में मैं लाखन कुंअर को महोबा ले जाने की इजाजत आपसे मांग रहा हूं।’
महाराजा जयचंद्र ऊदल की क्षमताओं से अच्छी तरह वाकिफ हैं लिहाजा वे तुरंत अपने तेवर बदल देते हैं। आल्हा को हवालात में डालने की बात को वे यूं ही एक मजाक का हिस्सा बताते हैं, साथ में कहते हैं कि लाखन पर उनकी ठकुरी नहीं चलती, उनके बारे में कोई भी फैसला उनकी मां और नवोढ़ा बहू ही करेंगे, उन्हीं से बात करके देखें।
लाखन की मां तिलका इसके लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन बेटे को लड़ाई में जाने से रोकने का जिम्मा गुपचुप उसकी पत्नी पर डाल देती हैं। आल्हा का एक सघन श्रृंगारिक प्रसंग यहां आता है- ‘करी बदरिया तुमका ध्यावैं, कउंधा बीरन की बलि जायं। झिमिकि के बरसो मोरे महलन मा कंता एक रैनि रहि जायं।’ (काली बदली, मैं तुम्हारा ध्यान करती हूं। बिजलियों का कौंधा मेरा भाई है, उसकी बलि-बलि जाती हूं। मेरे महल में झमक कर बरसो, मेरे पति एक रात रुक जाएं।) लेकिन बूंदी की राजकुमारी पद्मिनी इस प्रार्थना से पहले अपने पति लाखन से आल्हा-ऊदल को लेकर जो-जो बातें कहती है, जैसे श्राप उन्हें देती है, उनसे उस दौर की सत्ता संरचना का एक अंदाजा लगाया जा सकता है।
राजा के यहां नौकरी करने वाला योद्धा खुद को कितना भी वीर समझे, राजपरिवार के लिए इसका कुछ मायने नहीं है। आल्हा-ऊदल के बारे में पद्मिनी कहती है- ‘ये टुकड़खोर कल तक महोबा नरेश से टुकड़ा पाते थे, वहां से भगाए गए तो अभी आपके यहां पा रहे हैं। क्या ये इस लायक हैं कि इन्हें साथ लेकर आप महोबा के लिए पृथ्वीराज जैसे बड़े सम्राट से युद्ध में उतरने जाएं?’ फिर वह सोनवां, फुलवा और चित्रलेखा के लिए सद्यः वैधव्य की कामना करती है। खैर, लाखन अड़े रहते हैं तो पत्नी मान जाती है और बाहर खड़े ऊदल उन्हें लिवाकर महोबा के लिए चल पड़ते हैं।
लड़ाई में जाने से पहले उन्हें दो काम कन्नौज राज्य की सीमा में ही करने हैं। यह ब्यौरा भी सामंती राजकाज का ढांचा समझने के लिए काम का है। पद्मिनी ने लाखन को विदा करते वक्त कहा है कि जाने से पहले वे परहुल का दिया बुझाते जाएं। बात समझ में नहीं आती। शायद इस रियासत में किसी चोटी पर मशाल जलती रहती है, जिसे देखकर पद्मिनी को नींद नहीं आएगी।
यह शर्त परहुल के राजा के सामने रखी जाती है तो वह खीझ में लड़ने आता है, फिर पराजित होकर दिया बुझा देता है और अपनी पलटन लेकर लाखन और आल्हा-ऊदल की फौज में शामिल हो जाता है। अगला नंबर कुड़हरि का है, जहां जगनायक से चुराया हुआ कोड़ा रखा है। यहां का राजा लाखन का सगा मामा है लेकिन वह भी खुन्नस में युद्ध लड़ता है और हारकर अपनी सेना के साथ हमलावर फौज का हिस्सा बन जाता है।
लाखन से पृथ्वीराज का सामना
अगली लड़ाई कीरतसागर की दूसरी लड़ाई भी हो सकती थी, लेकिन पृथ्वीराज की फौज आगे बढ़कर बेतवा नदी के दूसरे तट पर ही कन्नौज की फौज का रास्ता रोकती है और लड़ाई वहीं शुरू हो जाती है। आल्हखंड के युद्धों में ब्यौरे अक्सर एक से ही होते हैं, जो चीज यहां अलग है उसी पर बात की जाए। लाखन कुंअर के लिए यह पहली बड़ी लड़ाई है और उत्साह में उनसे एक बड़ी गलती हो जाती है।
गलती की एक और वजह पृथ्वीराज से उनकी खानदानी खुन्नस भी है। आदिभयंकर नाम के हाथी पर पृथ्वीराज का विशाल झंडा युद्धभूमि में लहराता हुआ देखकर वे खुद को रोक नहीं पाते और उस तरफ बढ़ते हुए तीन सौ हाथियों की घेरेबंदी में फंस जाते हैं। यह इतना कठिन, लगभग हारा हुआ मोर्चा है कि कहीं दूर इसके बारे में किसी से खबर सुनकर मार-काट मचाते ऊदल इस तरफ बढ़ते हैं तो उन्हें देबा चौहान, धनुआं तेली और मन्ना गूजर ही नहीं, सय्यद तल्हान भी मोर्चा छोड़कर भागते हुए दिखाई देते हैं।
हाथियों के बीच से रास्ता बनाते हुए ऊदल अपने दोस्त लाखन के पास पहुंचते हैं तो देखते हैं कि पृथ्वीराज ने लोहे की कमान पर जहरीला तीर रख लिया है और लाखन का किस्सा खत्म ही होने वाला है। ऐसे में वे पगड़ी उतारकर पृथ्वीराज से निवेदन करते हैं कि ‘राजा की लड़ाई राजा से होनी चाहिए। यहां आपके सामने न तो राजा परिमाल हैं, न ही महाराजा जयचंद्र। आप जैसा धनुर्धर अपने अचूक बाण से अगर लाखन कुंअर को मार भी देता है तो इससे अपयश ही हाथ लगने वाला है। आने वाली पीढ़ियां आपका नाम इज्जत से नहीं लेंगी।’ यह सुनकर पृथ्वीराज ने धनुष रख दिया और लड़ाई को चौंड़ा ब्राह्मण और ताहर पर छोड़कर महावत से अपना हाथी पीछे रखने को कह दिया।
नतीजे के बारे में ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है। महोबा बच जाता है। भारी नुकसान उठाकर पृथ्वीराज को एक बार फिर बैरंग दिल्ली वापस लौटना पड़ता है और बिना जीत के महोबे से दो बार लौटने की मजबूरी दोनों रियासतों की अधर में लटकी रिश्तेदारी को विस्फोटक बना देती है। आल्हखंड का आखिरी प्रकरण बताता है कि राजकुमारी बेला और राजकुमार ब्रह्मा को इसका सही-सही अंदाजा होता तो उनकी ट्रैजडी कुछ कम हो सकती थी।
लड़ाई खत्म होने के बाद राजा परिमाल आल्हा की चार बातें सुनकर भी उनके मन का मैल धोने का फैसला करते हैं। अपने परिवार के साथ आल्हा वापस दशहरिपुर में बसने को राजी होते या नहीं, यह तुरंत स्पष्ट नहीं होता लेकिन आल्हखंड के अंत में आए कुछ प्रकरण बताते हैं कि बनाफरों का परिवार महोबा और कन्नौज, दोनों ही राजवंशों को अपनी सेवाएं देने के वायदे के साथ कन्नौज छोड़ कर स्थायी निवास के लिए वापस महोबा ही रहने चला आया था।
सम्पर्क
मोबाइल : 9811550016







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