स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'बुद्ध का जादू'
बुद्ध पूर्णिमा पर स्मृति आलेख
'बुद्ध का जादू'
स्वप्निल श्रीवास्तव
जो लोग पचास लोगों से प्रेम करते हैं –
उनके पास खुश होने के पचास कारण हैं
जो किसी से प्रेम नही करता उसके पास
खुश होने की कोई वजह नहीं होती
महात्मा बुद्ध
बुद्ध और गांधी मुझे बहुत आकर्षित करते हैं।गांधी ने संभवतः बुद्ध की अहिंसा और करूणा को अपने जीवन और राजनीति का तत्त्व बनाया था। गांधी की हत्या 1948 में हुई, एक धर्म उन्मादी ने उनकी हत्या कर दी थी। गांधी के बारे में उन लोगों से जाना जिन्होंने उन्हें देखा था, उनके साथ जेल गए थे फिर मैंने उनके जीवन से संबंधित किताबों को पढ़ कर उन्हें जानने की कोशिश की। बुद्ध हजारों साल पहले पैदा हुए थे लेकिन वे हमारी स्मृति का हिस्सा बने हुए हैं।बुद्ध धर्म दुनिया का चौथा बड़ा धर्म है। इस धर्म के अनुयायी चीन, जापान, श्रीलंका, म्यांमार जैसे देशों के नागरिक हैं। सनातन (हिन्दू) के बाद बौद्ध धर्म का उदय हुआ। यह अपने समय का लोकप्रिय धर्म था। हिन्दू धर्म में जो कुरीतियाँ और कर्मकांड थे उसका बुद्ध ने उसका विरोध किया। सनातन धर्म में बलि और सामिष की परंपरा थी। अश्वमेघ यज्ञ इसका उदाहरण है। इस आयोजन में अश्व की बलि दी जाती थी तब जा कर यज्ञ पूर्ण होता था। बुद्ध इस तरह की हिंसा के विरूद्ध थे। मौर्य काल के बाद बौद्ध धर्म का धीरे–धीरे पतन होने लगा था, उसे राजाश्रय नही मिल पा रहा था। बाहरी और भीतरी आक्रान्ताओ ने बौद्ध मठों को काफी नुकसान पहुंचाया। इतिहासकार यह भी बताते है बौद्ध मठों की पवित्रता पहले जैसी नहीं रह गयी थी, उसमें धतकर्म भी होने लगे थे। कुछ अनुयायी धर्म का व्यवसाय करने लगते है। कबीर हों या गोरख नाथ, उन्होंने सहज जीवन जिया लेकिन उस पंथ के पथिक शानदार और विलासी जीवन जी रहे है। उनमें धर्मांधता बढ़ रही है, उनमें व्यवसाय की खोज हो रही है।
कोई धर्म आलोचना के परे नही है उनपर विमर्श तो होना ही चाहिए ताकि उसका मूल स्वरूप बना रहे। दुनिया में बहुत से धर्म है लेकिन जो धर्म जीवंत नहीं होते, जनता से नही जुडते, वे नष्ट हो जाते हैं या उनका स्वरूप बदल जाता है। बौद्ध धर्म में कुछ ऐसे सर्वकालिक तत्त्व है इसलिये वह प्रासंगिक बना हुआ है। बुद्ध ने अहिंसा और करूणा को एक मूल्य की तरह स्थापित किया। वे ईश्वर और आत्मा पर विमर्श से बचते थे। उनका दिया एक उदाहरण याद आता है वे कहते थे कि अगर पाँव में काटा गड़ जाए तो हमें तो काँटे के इतिहास के बारे में जानने का कोई अर्थ नही है बल्कि उससे पाँव से निकालने की कोशिश करनी चाहिए। वे बताते थे कि मनुष्य जीवन में दुख है तो उसका निरोध भी है। वे दुख के निरोध की विधि बताते थे इस हेतु उन्होंने चार आर्य सिद्धांत प्रतिपादित किए। उन्होंने तृष्णा और लालच से बचने के उपदेश दिया और कहा – स्वयं अपना दीपक बनो। वे अपने उपदेशों में नैतिक नियमों के पालन पर जोर देते थे। उनके सारे उपदेश जनभाषा पालि भाषा में सुरक्षित है जबकि हिन्दू धर्म की तमाम ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं जो आम जनों की भाषा नही थी। बुद्ध धर्म जन से जुड़ा हुआ था जनभाषा में संवाद होते थे। इसी कारण उसे को यथार्थवादी दर्शन कहा जाता है। आज के हिंसक समय में बुद्ध को दुनिया भर के लोग याद करते हैं।
थोड़ी देर के लिए यह कल्पना करने में हर्ज नही है कि अगर बुद्ध धर्म देश का मुख्य धर्म होता तो इस देश की स्थिति भिन्न होती। हमारी जीवन पद्धति बदल जाती। बुद्ध के बाद अगर किसी ने देश की आत्मा को जाना है, उस आदमी का नाम गांधी है, उनके जाने के इतने वर्षों बाद यह बात तसदीक हो रही है। राहुल ने कहा है बुद्ध की तुलना गांधी से ही की जा सकती हैं। लोहिया ने भी कहते थे कि इतिहास में बुद्ध के बाद दुनिया गांधी को याद करेगी। बुद्ध और गांधी के जीवन में समानताएं थी। गांधी लंदन से बैरिस्टरी पास कर बहुत अच्छा जीवन जी सकते थे लेकिन देश की आजादी के लिये अपने जीवन का बलिदान कर दिया। बुद्ध ने राजमहल की सुख और वैभव को त्याग कर समाज को बेहतर बनाने का काम किया।
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बुद्ध के बारे में प्राइमरी स्कूल की किताबों में पढ़ा था कि किस तरह बूढ़े, विकलांग और मृतक देख कर जीवन के बारे में उनकी धारणा बदल गयी थी। ये प्रश्न उनको विकल करने लगे। उनके जीवन की दूसरी कथा शाक्यों और कोलियों के बीच रोहिणी नदी के जल विभाजन को ले कर प्रचलित है। उनके विराग का यह कारण बना। इन्हीं दोनों घटनाओ ने उन्हें महाभिनिष्क्रमण की ओर प्रेरित किया।उनके जीवन के एक घटना का उल्लेख किया जाता है। उनके चचेरे भाई देवदत्त ने एक पक्षी को मारा था और बालक गौतम ने उसकी रक्षा की थी। पक्षी पर जब अधिकार की बात आयी तो राजसभा ने यह निर्णय दिया कि पक्षी को मारने वाले से ज्यादा अधिकार बचाने वाले का है। ये सब घटनाएं गौतम के भीतर बीज की तरह मौजूद थी, जब समय आया तो वह एक रात को अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र सोते हुए छोड़ कर बोधि की खोज में चले गये। राज–पाट, धन–वैभव को ठुकराना एक अदम्य साहस की बात थी। महाभारत में राज्य के अधिकार को ले कर कौरव और पांडव के बीच एक लंबा युद्ध हुआ जिसमें हजारों लोग मारे गये। विधवाओं, अनाथ बच्चों को इस युद्ध ने जन्म दिया और कितने लोग लापता हुए, इसका विवरण इतिहास में दफ्न है। युद्ध में विजेता को कुछ नही हासिल होता, अंत में उसे बर्फ के पहाड़ों में गलना पड़ता है। युद्ध से कोई सबक नहीं लेता, बस जीत का नशा उसकी आत्मा को नष्ट करता रहता है, उसे विजय के लिए बड़ी कीमत देनी पड़ती है।
अशोक ने राजसिंहासन के लिये अपने भाइयों की हत्या की। कलिंग में नरसंहार किया। इसके बाद उसने गहरा पश्चाताप किया और उनका जीवन बदल गया। वे बौद्ध धर्म की शरण में गये, उसने बौद्ध धर्म को राजधर्म बनाया। बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को देश की सीमा के बाहर भेजा। आज जब हम इस धर्म के बारे मे सोचते है तो उसमे अशोक की प्रमुख भूमिका रही है। उसके बाद के सम्राटों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और यह धर्म लंबे समय तक जीवित रहा। किसी धर्म तभी तक जीवंत रहता है, जब तक उसे जनता का समर्थन मिले।
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बचपन से बुद्ध की कहानी पढ़ कर उनके प्रति मेरा गहरा लगाव पैदा हुआ। बुद्ध से संबंधित स्थलों को जानने और समझने की ललक पैदा हुई और ये स्थल किसी न किसी रूप में हमारे आसपास ही थे। हमारी अदम्य इच्छाएं हमे रास्ता दिखाती है लेकिन उसके लिए दीवानगी की जरूरत होती है। सहज कुछ नही मिलता, उसके लिए कीमत अदा करनी पड़ती है। बुद्ध की जीवनी में गौतम के जन्मस्थल लुम्बिनी का उल्लेख किया गया था और मुझे वहाँ जाने का मार्ग मिल चुका था। बड़ी बुआ का व्याह नेपाल की तराई में हुआ था – बुआ के गाँव से लुम्बिनी तीन–चार किलोमीटर की पैदल की दूरी पर था थोड़ा बड़ा हुआ तो वहाँ आना जाना शुरू हुआ और लम्बिनी के प्रति मेरा आकर्षण बढ़ता गया। जब मैं बुआ से बुद्ध के बारे में चर्चा करता था तो वह कहती थीं– क्या तुम भी बुद्ध की तरह अपना घर–द्वार छोड़ कर सधुआ जाओगे? अपना दिमाग खराब न करो। पढ़ो–लिखो और नौकरी करके शादी–व्याह करो।
लुम्बिनी के पास मधेनगर में बुआ की पाही थी – वहाँ उसके खेत थे जहां खूब जड़हन पैदा होते थे, वहाँ का काला नमक चावल खूब महकता था। वहाँ से हम चावल लाते थे। जब वे रसोई में बनते थे तो उसकी महक गाँव में फैल जाती थी। लोग जान जाते थे कि बुआ के घर से लाया हुआ चावल बन रहा है। उस समय लुम्बिनी बहुत छोटी सी जगह थी – बुद्ध के जन्मस्थल के पास पीपल का पेड़ और तालाब था। पीपल के पेड़ पर लाल पताकाएं हवा में लहरा रही थी। उसके आस-पास छोटे छोटे मंदिर बने थे, उनमें बुद्ध के अनुयायी और उनके दर्शन के लिए आये लोग ठहरते थे। वहाँ लंबे–लंबे घास के मैदान और झाड़ियाँ थीं जिसमें खरहे कूदते रहते थे। पेड़ों पर विभिन्न तरह के परिंदे थे जिन्हें मैंने पहली बार देखा था। बुआ बताती थी ये परिंदे पहाड़ों से आते हैं। बुआ ने बताया था जब गौतम की माँ गर्भवती हुई तो बच्चे के जन्म के लिए मैके देवदह जा रही थी, जब उन्हें प्रसव पीड़ा हुई तो वह वहाँ रुक गयी, वहीं पर गौतम का जन्म हुआ। बुद्ध के जीवन को ले कर मेरे मन में तमाम जिज्ञासाएं थीं जिसे बुआ इस ताकीद के साथ बताती थीं कि मैं इन किस्सों को किस्सा ही समझूं, उसमें रमू नहीं, अपना सहज जीवन जीऊँ। पढ़ने और नौकरी की चिंता करूं।
पाही के पास खेतों की देखभाल के लिए एक झोपड़ी थी। फसलों को चरने के लिए वहाँ जंगली जानवर आते थे इसलिए वहाँ रहना जरूरी था। कभी फूफा और कभी फुफेरे भाई वहाँ डेरा डालते थे। पाही की रातें बहुत सुहानी होती थीं। पेड़ पौधों में जुगुनू चमकते थे जैसे पेड़ों पर बिजली की झालर लटका दी गयी हो। रात के सन्नाटे में सियारों की हुआँ–हुआँ सुनाई पड़ती थी। सियारों की आवाज बहुत वीभत्स होती थी। बाद में जब लुम्बिनी का विस्तार हुआ तो बुआ की जमीन छिन गयी। बुआ ने मुझसे कहा कि जिस बुद्ध ने दुनिया का दुख दूर किया, उस बुद्ध ने मुझे दुख में डाल दिया। जमीन छिनने का दुख आदमी के जीवन का सबसे बड़ा दुख होता है। इसे बेजमीन लोग अच्छी तरह से जानते हैं। बुआ इस सदमे से बहुत दिनों तक जीवित नहीं रही, इस दुनिया से प्रयाण कर गयी। जब भी मैं लुम्बिनी जाता हूँ उस जगह ठहर कर सोचता हूँ तो बुआ बहुत याद आती हैं। केवल बुआ ही लुम्बिनी की जमीन से बेदखल नहीं हुई थी, सैकड़ों परिवार इस यंत्रणा के शिकार हुए। वे बुद्ध को इस तरह नहीं याद कर सकते है जैसे हम करते हैं। बुद्ध मूर्तिपूजा के विरूद्ध थे, वे निरंतर श्रवण में रहते थे। उन्होंने अपना कोई ठिकाना बनाया और किसी राजा के दरबार से ही जुड़े थे लेकिन उनके अनुयायियों ने उनकी स्मृति में स्तूप और मूर्तियाँ बनायी।
उस जगह पहुँच कर फूफा के बड़े भाई के बेटे काशी प्रसाद श्रीवास्तव की भी बहुत याद आती है। वे नेपाल के नेता थे। उनकी पढ़ाई बी एच यू में हुई थी। वे भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे और उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिला हुआ था। उन्हें पेंशन भी मिलती थी। बी एच यू में पढ़ते हुए उन्हे गांधी के दर्शन हुए थे। उस समय नेपाल के राजा वीरेंद्र बीर बिक्रम शाह उनके सहपाठी थे। उन्होंने मुझे बताया था कि एक बार जब गांधी वहाँ आये थे तो उन्होंने उनके पाँव पर सिर रख दिया। उसके बाद वे रूपांतरित हो गए थे। अपने गाँव पैसिया पहुँच कर जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया। वे जीवन भर गाँधीवादी बने रहे। खादी के कपड़े और पैर में मामूली चप्पल पहनते थे। वे बताते थे कि जब उनकी बेटी जापान से उनके लिये मुलायम जूते लायी थी तो उन्होंने पहनने से इनकार कर दिया था।
उन्होंने मुझे बताया था कि नेपाल में जिस तरह का रंगभेद है, उस तरह का रंगभेद दुनिया में कहीं नहीं है। नेपाल के बड़े ओहदों पर पहाड़ी काबिज हैं। मैदान और तराई के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। भारत की सीमावर्ती जगहों पर बसे हुए लोगों को व्यंग से मदेसी कहा जाता है। वे नेपाल के पढे–लिखे बुद्धिजीवी नेपाली नेता थे। वे गाँधीवादी विचारों पर विश्वास करते थे और उसी तरह नैतिक आचरण करते थे। अगर वे तिकड़म और जोड़तोड़ की राजनीति में दक्ष होते तो बड़े पद पर पहुंचते। वे नेपाल कांग्रेस के नेता थे। किन्ही मतभेदों के कारण उन्होंने निर्वासित जीवन जिया। जीवन का उत्तरार्ध उन्होंने गोरखपुर में व्यतीत किया। पहली पत्नी के देहांत के बाद उन्होंने पचास साल की पकी उम्र में नेपाल के राणा परिवार की लड़की से विवाह किया। वे दो बेटों और दो पुत्रियों के पिता बने। आज वे दुनिया में नही हैं लेकिन उनकी याद स्थायी बनी हुई है।
मधेनगर मे भी उनकी पाही थी, जहां वे यदा–कदा आ कर रहते थे। उन्हें जमीन का मामूली मुआवजा मिला लेकिन उन्होंने लेने से इनकार कर दिया। वे घूमन्तू आदमी थे और अक्सर यात्रा में रहते थे। वे हमारे बीच काशी भैया के नाम से मशहूर थे। उन्होंने 'नेपाल का इतिहास' नाम से बहुत अच्छी किताब लिखी है।
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पिता देवरिया के एक घूसर कस्बे में नौकरी करते थे, जहां चीनी की दो मिले धुआँ उगलती रहती थीं। सड़के कच्ची थीं जब लोग बैलगाड़ी में गन्ना लाद कर मिल की तरफ जाते थे तो खूब धूल उड़ती थी। धुयें और धूल से आसमान भर जाता था। उसी के बीच मिल का घंटा और हूटर बजता रहता था। कस्बे में बिजली की आमद नहीं हुई थी। बस चौराहों और गलियों में लैंपपोस्ट जलते थे। वे किसी जासूसी फिल्म की याद दिलाते थे। वह बीस साल बाद जैसी जासूसी फिल्म का जमाना था। दूर से लैम्पोस्ट को देखना अच्छा लगता था। कभी-कभी हम उसकी रोशनी के नीचे आ कर ठहर जाते थे। बचपन ढिबरी और लालटेन की रोशनी में बीता। यहाँ आ कर यह जरूर तरक्की हुई कि हम लैंप के प्रकाश में पढ़ने लगे।
इस कस्बे में भी मैं बुद्ध का पीछा कर रहा था। इसी जनपद में कुशीनगर बुद्ध का महापरिनिर्वाण स्थल था। कस्बे से सीधी बस कुशीनगर जाती थी। पहले वहाँ पिता के साथ जाते थे फिर समय मिलते ही खुद जाने लगे। उस समय कुशीनगर बहुत विकसित नहीं था। धीरे–धीरे पर्यटनस्थल के रूप में उसका विकास होने लगा। जब गोरखपुर में पढ़ने अथवा नौकरी पर आया तो कुशीनगर बहुत दूर नहीं था। समय मिलते हम पक्षी की तरह उड़ जाते थे। कुशीनगर के बारे में अनेक स्मृतियाँ हैं।
कुशीनगर में मेरी मुलाकात दिल्ली से आयी एक युवा कवयित्री से हुई जिसने मुझे यह कहा था कि अगर युद्ध हो जाए तो मैं अपनी किताबें और डाक टिकट कहां रखूंगी। उसने मुझे यह भी बताया था कि दिल्ली एक प्रेमविहीन नगर है। उस लड़की से हुई विलक्षण मुलाकात के बाद मैंने बोधिसत्व नाम की कविता लिखी थी।
अपनी चिर–निद्रा से उठो बोधिसत्व
एक लड़की तुम्हें बुला रही है
उसकी किताबें संकट में हैं
उसके ऊपर मंडरा रहा है परमाणु युद्ध का खतरा
वह अपनी बेहतर इच्छाएं
और डाक टिकट कहां रखे।
वह अजीब लड़की थी। उसने मुझे सूर्य को देखने की विधि बतायी थी। उसने कहा कि देर तक सूर्य को देखो फिर उसका गोला नजर आएगा। इस तरह सूर्य को देखने का अभ्यास करोगे तो तुम्हारी आँखों की ज्योति बढ़ जाएगी। तुम दूर तक देख सकोगे। कभी–कभी ट्रांस में पहुंच जाओगे। उसे कुशीनगर बहुत पसंद आया। वह अन्य लोगों की तरह कुशीनगर में बसना चाहती थी। अजीब बिडम्बना है कि लोग जहां बसना चाहते हैं वहाँ नहीं बस पाते। जहां बसते हैं, वह उनके पसंद की जगह नहीं होती है। कबीर बनारस में रहना चाहते थे लेकिन अंत में उन्हे मगहर आना पड़ा। कवि केदार नाथ सिंह कुशीनगर बसना चाहते थे लेकिन पडरौना से दिल्ली चले गये। दिल्ली उनके पसंद का नगर नहीं था।
वे यदा–कदा यहाँ आते रहते थे। उन्होंने कुशीनगर के चीना बाबा पर 'मंच और मचान' नामक कविता लिखी है। चीना बाबा रामाभार स्तूप के ऊपर बट वृक्ष के खोंखल में रहते थे। वही उनका घर था। बरगद के जड़ों के फैलाव के कारण जब स्तूप क्षतिग्रस्त हो रहा था तो उन्हें उस बट वृक्ष से बलात उतार कर एक कमरे में रखा गया लेकिन वह उनका घर नही था इसलिए वे बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सके। घर छूटने की यंत्रणा में वे निर्वाण के पथ पर चले गये। कवि केदार नाथ सिंह ने इस कविता में घर से बेघर होने की पीड़ा व्यक्त की है। प्रकारान्तर से यह उनकी भी पीड़ा थी। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखें -
मैंने कितने शहर नापे
कितने घर बदले
और मैं हैरान हूँ,
मुझे लग गया इतना समय
इस सच तक पहुँचने में
कि उस तरह देखो
तो कोई हुक्म कोई नहीं
पर घर जहां भी है
उसी तरह टंगा है
हम सब अपने-अपने बनारस में रहना चाहते है लेकिन हम जीवन के मगहर पहुँच जाते हैं। हमारी परिस्थितियाँ ही हमारी रिहाइश तय करती हैं। एक तरह से हम सब विस्थापित हैं। रोजी -रोटी और महत्वाकांक्षाओं के लिए अपने मूल जगहों से दूर जाते रहते हैं। जब से दुनिया आधुनिक हुई है यह आवागमन बढ़ता जा रहा है।
इसी इलाके में गीतकार कवि देवेन्द्र कुमार पैदा हुए थे जिन्होंने लोक जीवन को ले कर अद्भुत गीत लिखे हैं। कुशीनगर पहुँच उनके गीतों की याद आती है। कवि-लेखक अज्ञेय कुशीनगर में पैदा हुए थे। जगह-जगह भटकते हुए वे दिल्ली पहुंचे। बुद्ध भटकते नहीं थे भटके हुए लोगों को राह दिखाते थे। वे निरंतर भ्रमणशील रहते थे और जीवन के सत्य को खोजते रहते थे। घने-घने जंगलों को पार करते हुए वे प्रकृति के समीप रहते थे। वे राजदरबारों की अपेक्षा आम्रमंजरियों में रूकना पसंद करते थे।
आम्रपाली की कथा बुद्ध प्रेमियों को जरूर याद होगी। जब आम्रपाली का यहाँ उल्लेख हुआ तो बुद्ध का वाक्य याद आया। उन्होंने कहा था –दुनिया में स्त्री ही मनुष्य की आत्मा को बांध सकती है। उन्हें अपने जीवन में स्त्रियों की करूणा मिली और इससे ज्यादा करूणा उन्होंने वापस की थी।
दुनिया के बहुत से कवि, लेखक, बुद्धिजीवी बेघर हुए हैं और बेघर होने की तकलीफ बयान किया है। कोई शौक से बेमकान नहीं होता। रोजी रोटी की खोज उसे दूर ले जाती है। बुद्ध जानबूझ कर बेघर हुए थे लेकिन उन्होंने दुनिया जो रोशनी दी, उससे हम सब किसी न किसी रूप से प्रकाशित हो रहे हैं।
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मैं कोई घूमन्तू और भ्रमणशील नहीं था। नौकरी ने मुझे शहर दर शहर भटकाया। इस भटकाव में कुछ जगहों की खोज की, तो कुछ जगहों ने मुझे खोजा। इन्हीं जगहों ने मुझे संवेदनशील और रचनात्मक बनाया। यह संयोग ही था कि जीवन यात्राओं में मुझे सारनाथ और श्रावस्ती जैसी जगहें मिली और उन्हें बार-बार देखा। इन यात्राओं से मेरे संवेदन का विस्तार हुआ। बीते इतिहास में जाने की जिद्द पैदा हुई। मुझे यह पता लगा कि खंडहरों मे भी जीवन धड़कता है। ये मृत जगहें नहीं हैं। जब हम उनके इतिहास के बारे में सोचते है तो हमारी कल्पना को विस्तार मिलता है। इस अतीत-राग में हमारा वर्तमान छिपा है।
बुद्ध की उपस्थिति का पता तब चलता है जब हम दुख में होते हैं। उसी समय उनका दर्शन याद आता है। इक्कीसवी सदी के शुरू में जब महाविपत्ति में पड़ा था, मेरा जीवन हिल गया था। उसी समय मेरा तबादला देवरिया हो गया था या लोकसत्य की शब्दावली में कहा जाय कि बुद्ध ने मुझे बुला लिया था। देवरिया के एक कस्बे से जो यात्रा शुरू हुई थी उसका विस्तार सदर देवरिया तक हो गया था। इस बीच जीवन में बहुत कुछ बदल चुका था। एक जीवन में कई जीवन के दुख एक साथ मिले। बुद्ध के जीवन और दर्शन से संबंधित कई किताबें थीं जिसे मैं पढ़ कर बुद्ध के जीवन संदर्भों को जान रहा था जैसे पाल कारूस की किताब 'गास्पेल आफ बुद्ध', राहुल सांकृत्यायन की 'महामानव बुद्ध', टी डब्लू राइज डेविड की 'द हिस्ट्री एण्ड लिटरेचर आफ बुद्धइज़्म'। लेकिन वियतनाम के आध्यात्मिक संत और विद्वान तिक न्यात हुनह की पुस्तक 'ओल्ड पाथ ह्वाइट क्लाउड' अत्यंत जरूरी किताब है। लेखक ने बुद्ध के जीवन से संबंधित स्थलों की यात्रा कर के इस आख्यान को पूर्ण किया था।
बुद्ध के जीवन यात्रा को याद करते हुए सर एडविन अर्नोल्ड की पुस्तक 'लाइट आफ एशिया' की याद आती है। यह किताब लंदन से 1879 में प्रकाशित हुई। यह बुद्ध के जीवन की महाकाव्यात्मक कविता थी। इस किताब के प्रकाशन से बुद्ध की विश्व में चर्चा होने लगी। इस किताब का अनुवाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया था। उसके बाद में राहुल जी ने बुद्ध के अवदान के बारे में काम किया। उन्होंने बौद्ध धर्म को धारण किया। यह गांधी की मनपसंद किताब थी। आर्थर लेवेलिन बाशम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द वन्डर दैट वाज इंडिया' में भारत की सभ्यता और संस्कृति की चर्चा करते हुए प्राथमिकता के साथ बुद्ध की भूमिका का उल्लेख किया है। अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। बौद्ध धर्म की व्याप्ति बड़ी है। उसकी उदारता अदभुत है। वह किसी जाति और धर्म के बंधन को नहीं मानता।
किताबों को पढ़ कर हम किन्हीं जगहों के बारे में नहीं जान पाते। उन जगहों को जानने के लिये तहखानों में उतरना पड़ता है। उस समय को महसूस करना पड़ता है जिस समय उसका वजूद था। समय के साथ जगहें और चीजें बदलती रहती हैं। बुद्ध के जीवन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनकी कथाएं और गाथाएं प्रमाणिक हैं। चाहें धम्म पद हो या थेरी गाथा, उन्हें पढ़ते हुए ऊर्जा मिलती है। बुद्ध ने कहा था - 'अप्प दीपो भव'। लेकिन आदमी अपने भीतर के प्रकाश को नहीं देख पाता। बाहर के अँधेरों में भटकता रहता है।
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कुछ साल बाद मेरी पोस्टिंग देवरिया में हुई। देवरिया से कुशीनगर दूर नही था। इस कठिन समय में मुझे बुद्ध और कुशीनगर में शरण मिली। दफ्तर के काम कम बोझिल नही होते, वे दिल और दिमाग दोनों को थका देते हैं। जब हम त्रासद स्थितियों का सामना करते हैं उस समय हमारे पास कोई राहत देने वाला चेहरा जरूर होना चाहिए। इस शून्य को भरने के लिए मैंने अपने किराये के कमरे में बुद्ध की मूर्ति रख ली। जब परेशान होता तो उनके चेहरे की ओर ध्यान लगाता था। उधर से आवाज आती थी – 'बुद्धम शरणंम गच्छामि'। यह आवाज मुझे बहुत ताकत देती थी।
सप्ताह के छः दिन दफ्तर की मारामारी में बीत जाता था। रविवार का दिन मेरे लिए खाली होता था। कुशीनगर दस ग्यारह बजे पहुँच कर विभिन्न स्थलों पर घूमता था। जैसे–जैसे साँझ घिरने लगती देवरिया पहुँचने की जल्दी रहती थी। देर होने के बाद कोई बस, जीप नही मिलती थी। कुशीनगर की तीन जगहें मुझे बहुत पसंद थीं। पहली जगह बुद्ध का महापरिनिर्वाण स्थल दूसरा हिरण्यवती नदी, जिसे पार कर बुद्ध ने कुशीनारा में प्रवेश किया था और तीसरा रामाभार स्तूप। बताया जाता है कि हिरण्यमयी नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ था और उनकी अस्थियाँ रामाभार स्तूप में रखी गयी थीं। दूसरा स्तूप परिनिर्वाण स्थल के पास था, वहाँ भी अस्थियां सुरक्षित थीं।
श्रद्धालु स्तूप की परिक्रमा करते थे और वहाँ पर लगे चक्र को घुमाते रहते थे। इस क्रिया से आत्मा को शांति मिलती थी। जब यहाँ बुद्ध आये होंगे तो यहाँ घने शाल वन थे। अब भी इस जगह की स्वाभाविकता को बनाए रखने के लिए शाल वन लगाए गए हैं। फूलों की रंगबिरंगी क्यारियाँ थीं। उस पर भौरें और तितलियाँ मंडरा रही थीं। वहाँ हरे–भरे घास के मैदान थे जहां पर्यटक अपने परिवार और दोस्तों के साथ लुत्फ उठा रहे थे। ये वे सैलानी थे जो बुद्ध के बारे में जानने के लिए उत्सुक नहीं थे लेकिन जब यहाँ विदेशों से बौद्ध अनुयायी आते थे तो बुद्ध के जीवन से संबंधित तथ्य को जानने के लिए जिज्ञासु रहते थे।
बुद्ध की मूर्ति को मैं घंटों निहारा करता था। यह मूर्ति नहीं एक रहस्य थी, जितनी बार उसे देखो उतनी बार उसकी छवि बदलती रहती थी। उनकी मूर्ति में जादुई आकर्षण था। इस जादू का पता उन लोगों को नहीं चलेगा जो किसी जगह को छू कर चले जाते हैं। किसी मर्म तक पहुँचने के लिए डूबने की क्रिया आवश्यक होती है। दिन में मैंने सोचा कि एक रात वहाँ रुक कर इस नगर को महसूस करूं। रात की नीरवता में वे आवाजें सुनाई पड़ती है जिसे हम दिन में नहीं सुन पाते। दिन के शोर शराबे से रात का संगीत भिन्न होता है। सड़कें खामोश रहती हैं, उस पर धीमे–धीमे चलना अच्छा लगता है।
मैंने वहाँ के एक धर्मशाले में एक कमरा ले लिया जिसकी खिड़की सड़क की तरफ खुलती थी। शाम होते ही लोग शहर से विदा हो रहे थे। उसके बाद मैं परिनिर्वाण स्थल पहुँच चुका था। बौद्ध अनुयायी उस स्थल की ओर मंथर गति से बढ़ रहे थे। उनके हाथों में फूल और सुगंधित सामग्री थी। वे कुछ बुदबुदा रहे थे। उनकी आवाज इतनी धीमी थी कि कुछ सुना नहीं जा सकता था। वे मूर्ति तक पहुँच कर मूर्ति के चारों तरफ फैल चुके थे। वाद्य यन्त्र धीरे-धीरे बजने लगे और वह स्थल सुगंधित हो चुका था। मैं उनके बीच पहुँच चुका था। वे धम्म पद का गायन कर रहे थे। वे कंठ से नही हृदय से गा रहे थे। उनके बीच मैं अभिमंत्रित हो चुका था। यह जीवन का अनिर्वचनीय अनुभव था। लगा कि बुद्ध मेरे भीतर उतर चुके हैं।
यही वह पवित्र जगह थी जहां बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद को अंतिम उपदेश दिया था। उन्होंने कहा था “आनंद शोक न करो, मत रोओ। सभी प्रिय जनों से बिछुड़ना पड़ता है –जो जन्मा है,जो बना है, उसका नाश होता है।” यह जीवन का ऐसा सत्य है जिस पर मुश्किल से यकीन कर पाते हैं। यही तो जीवन का यक्ष–प्रश्न है जिसका उत्तर युधिष्ठिर के भाई नही दे पाये थे जिसके कारण यक्ष ने उन्हें अचेत कर दिया था, लेकिन युधिष्ठिर के उत्तर से वे जीवित हो गये थे। जीवन- मृत्यु का यह संघर्ष अनंत काल से चल रहा है, यह जानते हुए कि जो इस दुनिया में आया है वह अपने विदा के साथ आया है। लेकिन हम माया के साथ रहते है और सोचते हैं कि हम मरणशील नहीं हैं।
बुद्ध भक्तों से धम्म पद का गायन सुन कर मैं सुध –बुध खो बैठा था। पतंग की तरह हल्का हो कर मैं हवा में उड़ रहा था। वहाँ से मैं घूमते हुए रामाभार स्तूप तक गया जो शहर का अंतिम छोर था। मैं नितांत अकेला था लेकिन मेरे साथ उन लोगों की स्मृतियाँ थी जिन्हें मैं गवां चुका था। स्मृतियाँ एकांत में साफ अनुभव की जा सकती थीं। मेरे साथ बुद्ध का यह वाक्य था कि जो इस दुनिया में आया है उसे बिछुड़ने का दुख तो सहना ही पड़ता है। इस सच को स्वीकर करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
निर्वाण स्थल से लौट कर जब धर्मशाला लौटा तो रात भर नींद नहीं आयी। मैं बुद्ध के सपने में भटकता रहा। जैसे मैं धरती पर नहीं किसी अन्य लोक में विचरण कर रहा हूँ।
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प्रातः मैं निर्वाण स्थल पर पहुँच चुका था। वहाँ विदेशी सैलानी थे जो बुद्ध की पूजा-अर्चना के लिए तैयार हो रहे थे। वे चीवर धारण किए हुए थे जो बौद्धों के परम्परागत परिधान थे। वे लंबी चादर तान कर उसके नीचे धीरे–धीरे बढ़ रहे थे। कुछ लोगों के हाथ में पुष्पगुच्छ थे। बुद्ध को कमल के फूल बहुत पसंद थे। वह भी कुछ लोगों ने ले रखे थे। उस समारोह में दो वियतनामी लड़कियां थीं जिनके हाथ में फूल थे। वे बहुत प्यारी और युवा नन की तरह लग रही थीं। मैंने जब उन्हें कैमरे के सामने आने का आग्रह किया तो वे सहर्ष तैयार हो गईं। मैनें उन्हें कैमरे में दर्ज कर लिया था। वे टूटी- फूटी अंग्रेजी में बात कर रही थीं।जब मैंने उनसे पूछा कि वे किस देश से आयी हैं तो उन्होंने वियतनाम का नाम लिया और कहा कि आप लोग भाग्यशाली हैं कि आप बुद्ध के देश में रहते हैं जहां वे कण–कण में व्याप्त हैं। बुद्ध के जीवनी लेखक तिन न्याह हुनह वियतनाम के लेखक थे। किताब का नाम 'ओल्ड पाथ ह्वाइट क्लाउड : वाकिंग इन दि फुटस्टेप्स ऑफ दि बुद्धा' की कुछ मूल्यवान पंक्तियां याद आ गईं। ये पंक्तियाँ जीवन के लिये पाथेय का काम करती हैं।
“अतीत का पीछा न करो
भविष्य के भ्रम–जाल में न फँसो
अतीत व्यतीत हो गया
भविष्य अभी अनागत है
यहाँ और इसी क्षण जीवन जैसा है
उसकी धारणा करो"
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स्वप्निल श्रीवास्तव
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