रामजी तिवारी का यात्रा वृत्तांत 'सुदूर पूर्वोत्तर से'
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| रामजी तिवारी |
'सेवेन सिस्टर्स' भारत का वह क्षेत्र है, जहां आज भी प्रकृति अपने वास्तविक स्वरूप में दिख जाती है। वैसे भी पर्यटकों का आकर्षण जम्मू कश्मीर, राजस्थान या दक्षिण के राज्य होते हैं। लेकिन पूर्वोत्तर आज भी इस आकर्षण से थोड़ा बचा हुआ है। रामजी तिवारी पर्यावरण की दृष्टि से अगर पूर्वोत्तर को भारत का फेफड़ा कहते हैं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं। यायावरी भी एक शगल है। यह सबके बस की बात नहीं। लेकिन रामजी तिवारी तो जैसे यायावरी को जीते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले बुंदेलखंड गए थे, फिर वे पूर्वोत्तर की यात्रा पर चले गए। और आज जब उनकी यह पोस्ट लगा रहा हूं, वे तमिलनाडु घूम रहे हैं। घर, परिवार और नौकरी के साथ वे यायावरी का सन्तुलन सहज ही स्थापित कर लेते हैं। बहरहाल हमने उनसे आग्रह किया कि वे पूर्वोत्तर का यात्रा वृत्तान्त पहली बार के लिए भेजें। थोड़े टाल मटोल के पश्चात उन्होंने आखिरकार यह यात्रा वृत्तान्त हमें उपलब्ध करा दिया। इस वृत्तांत से हमें पूर्वोत्तर के कई ऐसे पहलुओं के बारे में जानकारी मिलती है जो सर्वथा नई हैं। अपने वृत्तांत में रामजी लिखते हैं "अरुणाचल में प्रवेश के बाद से ही यह महसूस होने लगता है कि साफ़ हवा और आक्सीजन की तासीर कैसी होती है। 50 से नीचे के एक्युआई में साँस लेना कितना आह्लादकारी होता है। जिस दिन हम लोग “काहो गाँव” से गुजर रहे थे, उस दिन वहां का एक्युआई 24 था। वहां के फूलों और पत्तियों में वह रंग दिखाई दे रहा था, जिसे हम लोग देखना लगभग भूल ही चुके हैं।" संयोगवश आज रामजी भाई का जन्मदिन भी है। उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं इस कामना के साथ कि वे इसी ऊर्जा के साथ आगे भी भ्रमण करते रहें और अपने वृत्तांत के जरिए हमें भी इस यात्रा में सहभागी बनाते रहें। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रामजी तिवारी का यात्रा वृत्तांत 'सुदूर पूर्वोत्तर से'।
'सुदूर पूर्वोत्तर से'
रामजी तिवारी
“एक”
पूर्वोत्तर भारत को ले कर हमारे हिस्से के समाज में अभी सहजता नहीं है। उनके रंग रूप को ले कर अक्सर फब्तियां कसी जाती हैं। उनके खान-पान को हेय दृष्टि से देखा जाता है। उनकी भाषा और संस्कृति को अबूझ बताया जाता है। और हद तो तब हो जाती है, जब उन्हें चाइनीज और नेपाली के रूप में चिन्हित किया जाता है। उन्हें चिंकी और मोमोज कह कर अपमानित किया जाता है। कहना न होगा कि पूर्वोत्तर के प्रति हिकारत और बेगानेपन के मामले में देश के महानगर सर्वाधिक क्रूर और बर्बर हैं। दिल्ली, मुंबई, बंगलौर और हैदराबाद जैसे महानगरों से आने वाली खबरें बताती रहती हैं कि तमाम दावों के बावजूद पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति अभी भी पर्याप्त मात्रा में नफरत और घृणा पायी जाती है।गत दिनों देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजल चकमा की नृशंस हत्या ने साबित किया है कि कथित रूप से अपने आपको मुख्य धारा कहने वाला समाज, अपने ही एक हिस्से के प्रति कितना बेगाना और बर्बर है।
पूर्वोत्तर के प्रति हमारा यह बेगानापन दोहरी मार करता है। अव्वल तो पर्यटन की अपार संभावनाएं होने के बावजूद अभी भी यह क्षेत्र उस स्तर पर पर्यटन मानचित्र का हिस्सा नहीं बन पाया है, जिसका वह हकदार है। और दूसरा यह कि इसने पूर्वोत्तर के लोगों के मन में भी एक तरह का भय बनाये रखा है कि शेष भारत के दिल में उनके लिए बहुत कम जगह है। मैं दूसरे किसी व्यक्ति से क्या शिकायत करूँ, जब मैं अपने आपको ही इस मामले में कटघरे में खड़ा हुआ देखता हूँ। अपनी ढाई दशक पुरानी यायावरी में मैंने देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण राज्यों और हिस्सों को कवर किया है। यहाँ तक कि अंडमान, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और कश्मीर जैसे सुदूरवर्ती इलाकों में चार-पांच बार की यात्राएं की हैं, लेकिन पूर्वोत्तर की पहली यात्रा करने का सौभाग्य मुझे तीन चार वर्ष पहले ही नसीब हुआ था, जब मैंने सिक्किम और दार्जिलिंग की यात्रा की थी। और उसके एक वर्ष बाद मेघालय को देखने का अवसर मिला, जिसमें थोड़ा बहुत गुवाहाटी को भी समझना हो सका था।
हिंदी साहित्य में कृष्ण नाथ के बाद अनिल यादव के यात्रा वृत्तान्त ने पूर्वोत्तर के प्रति हमारी समझ को जरुर थोड़ा विकसित किया है, लेकिन अभी भी हम कई मामलों में इस इलाके के प्रति अनजान हैं। इतना कि हमें नहीं पता कि जैसे अमेजन के जंगलों को दुनिया का फेफड़ा समझा जाता है, उसी तरह पूर्वोत्तर भारत का यह इलाका हमारे देश का फेफड़ा भी है। मसलन यदि आप अपने मोबाईल के मैप में सेटेलाईट मोड को आन करते हैं तो आपको यह ज्ञात होता है कि हरेपन के मामले में यह केरल और हिमालय के मुख्य भाग से बीस ही बैठता है, उन्नीस नहीं। जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत में यह हमारा प्रतिनिधि कहा जा सकता है। कहना न होगा कि सामरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भी इसकी भूमिका देश के किसी भी हिस्से से अधिक महत्वपूर्ण है।
पर्यटन के मामले में पूर्वोत्तर के प्रति हमारा बेगानापन बहुस्तरीय है। अव्वल तो हम इसको अपनी आईटिनरी में कम जगह देते हैं और यदि देते भी हैं तो अमूमन वह न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर जा कर थम जाता है। वहां से हमारा रास्ता दार्जिलिंग और सिक्किम की तरफ मुड़ जाता है। और जो कुछ पर्यटक इस स्टेशन से आगे की तरफ बढ़ना जारी रखते हैं, वे गुवाहाटी में उतरने के लिए अपना बोरिया बिस्तर समेटने लगते हैं। यहाँ धार्मिक पर्यटक कामख्या देवी के दर्शन हेतु आते हैं। और प्राकृतिक सौंदर्य की तलाश में भटकने वाले लोगबाग़ टैक्सी पकड़ कर मेघालय के लिए निकल जाते हैं। आप दिल्ली और कोलकाता जैसे किसी भी बड़े शहर से आने वाली ट्रेन में सफ़र करते हुए इस बात की तस्दीक कर सकते हैं कि न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन के आगे उस ट्रेन की सीटें कैसे खाली होने लगती है और गुवाहाटी के बाद तो उस ट्रेन में दीमापुर और डिब्रूगढ़ उतरने वाले सेना के जवान ही बचते हैं, जो इन सीमावर्ती इलाकों में भारी संख्या में तैनात हैं। गुवाहाटी के बाद इन रेलगाड़ियों में इक्का-दुक्का ही कोई पर्यटक यात्रा करता हुआ मिलता है और इक्कादुक्कापन वहां के स्थानीय निवासियों की गिनती में भी देखा जा सकता है।
ऐसे में जब अपनी पूर्वोत्तर की यात्रा का मन बन रहा था तो यह बात जेहन में बैठ गयी थी कि इस बार हमें सिर्फ पूर्वोत्तर में नहीं, वरन सूदूर पूर्वोत्तर में जाना है और थोड़ा समय ले कर जाना है। हमने अपनी ट्रेन का आखिरी स्टेशन डिब्रूगढ़ चुना। वहां जाने से पहले मेरे पास उस क्षेत्र से सम्बंधित दो जगहों की सूचनाएं थीं। धार्मिक पर्यटन में रूचि रखने वाले लोगों ने परशुराम कुंड के बारे में बताया था। जबकि आफबीट लोकेशन की तलाश करने वाले कुछ यू-ट्यूबर ने अनिनी घाटी की तारीफ़ की थी। इन दोनों जगहों के अतिरिक्त इस यात्रा में लगभग दो सप्ताह के लिए हम लोग “वाइड ओपन” थे।
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| सेवेन सिस्टर्स स्टेट |
दो
पूर्वोत्तर भारत को “सेवेन सिस्टर्स स्टेट” भी कहा जाता है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा। इस हिस्से की दो और ख़ूबसूरत जगहों- सिक्किम और दार्जिलिंग- को “सेवेन सिस्टर्स स्टेट” का हिस्सा नहीं माना है। सिक्किम बेशक एक राज्य है, जिसमें पूर्वोतर भारत के शेष राज्यों से बहुत समानताएं भी हैं, लेकिन वह इस ग्रुप से बाहर ही रहता है और दार्जिलिंग चूंकि पश्चिमी बंगाल राज्य का हिस्सा है, इसलिए बंगाल उसे अपनी तरफ खींच लेता है। हालांकि दार्जिलिंग के लोगों के बीच बंगाल से जुड़े रहने को ले कर बहुत सहजता नहीं है। वहां पर अतीत में कई ऐसे आन्दोलन होते रहे हैं, जो अपने को स्वतन्त्र राज्य के रूप में देखना चाहते हैं। गोरखा नेशलन फ्रंट के सुभाष घिसिंग का आन्दोलन कैसे भुलाया जा सकता है। लेकिन बंगाल की केन्द्रीय राजनीति में यह आन्दोलन फिट नहीं बैठता, इसलिए यह अभी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश नहीं बन सका है।
तो पूर्वोत्तर के इन “सेवेन सिस्टर्स स्टेट” में से चार राज्यों में प्रवेश करने के लिए आपको इनर लाइन परमिट (आई. एल. पी.) लेनी होती है। जी हाँ, आपने सही सुना। यदि आप अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम की यात्रा करना चाहते हैं तो आपको इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में आपकी यात्रा अवैध मानी जाती है और इसके लिए आपको दण्डित भी किया जा सकता है। संभव है कि इस बात को सुन कर आपकी भावनाएं आहत हो जाएँ, लेकिन यह एक हकीकत है, जिसे आपको जानना चाहिए। इन चार राज्यों के प्रवेश द्वार पर चेक पोस्ट बनी होती हैं, जहाँ पर आपकी आई. एल. पी. चेक होती है। इस परमिट की फीस अरुणाचल प्रदेश में तीन दिन के लिए 300 रूपये है। यदि 15 दिनो की आई एल पी के लिए आपको 500 रूपये की फीस अदा करनी होती है। इसे आप आनलाइन भी बनवा सकते हैं और चेक पोस्ट पर प्रवेश करते समय, आधार कार्ड तथा फोटो के साथ नियत शुल्क को दे कर आफलाइन भी बनवा सकते हैं। हालाकि नागालैंड की आई. एल. पी. इस मामले में थोड़ी पेचीदा है। आनलाइन बनवाने में आपको आवेदन करना होता है, जो सामान्यतया अगले दिन अप्रूव होता है। जबकि आफलाइन की आई.एल.पी के लिए आपको दीमापुर के कमिश्नरेट आफिस में आवेदन करना होता है, जिसमें दो से तीन घंटे का समय लगता है। मुझे दीमापुर के इस कार्यालय में अपनी तरफ के कुछ मजदूर भी दिखाई दिए, जो वर्क परमिट के लिए वहां सुबह से ही कतारबद्ध थे।
इस आई. एल. पी. की जरुरत आपको कहीं भी पड़ सकती है। संभव है कि किसी चेक पोस्ट पर आपसे इसकी मांग कर दी जाय। होटल में ठहरने के लिए आपसे इसकी तहकीकात कर दी जाय। या किसी और स्थान पर प्रवेश के समय या चेकिंग के समय आपसे यह आई. एल. पी. मांगी जा सकती है। हालाकि इधर बीच एक ट्रेंड यह भी देखने में आया है कि कोहिमा को जाने वाले कई टैक्सी ड्राइवर आपको इसके बिना भी अपनी गाड़ी पर बैठा लेते हैं लेकिन उसमें पुलिस का डर हमेशा बना रहता है। और पकड़े जाने पर आपसे मोटी रकम की उगाही भी की जा सकती है। “आई. एल. पी.” नार्थ ईस्ट में एक संवेदनशील मुद्दा है। इसको लागू करने वाले राज्यों का तर्क है कि हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के बाहर से आने वाले लोगों की निगरानी की जाय। उनके आने के उद्देश्य को समझा जाय और उसे नियंत्रित किया जाय। जाहिर है, इसमें स्थायी निवास जैसा बड़ा मुद्दा भी शामिल है कि राज्य से बाहर का कोई व्यक्ति इन राज्यों का स्थायी निवासी न बन जाए। जमीन और सम्पत्ति से जुड़े मसले इसमें शामिल हैं।
हमारा देश विविध है और आई. एल. पी. उस विविधता को संरक्षित करने का एक प्रयास है। संविधान की धारा 371 के उप-प्रावधानों में इन राज्यों को विशेष अधिकार दिए गये हैं, जिससे वे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने का प्रावधान कर सकें। चूंकि जम्मू कश्मीर पर लागू होने वाली धारा 370 को ले कर राजनीति बहुत अधिक हो चुकी है इसलिए पूर्वोत्तर के इन राज्यों के लिए बनाये गए विशेष उपबंधों को जानना जरुरी हो जाता है। हम उत्तर-भारतीय लोगों को कई बार यह भ्रम हो जाता है कि यह देश उनके सिद्धांतों के अनुसार ही चलना चाहिए। उनके जैसा सबका खान-पान होना चाहिए। उनके जैसा सबका पहनावा ओढावा होना चाहिए। उनके जैसा सबका तीज- त्यौहार होना चाहिए। और सिविल मामलों में भी सबके ऊपर एक जैसा कानून लागू होना चाहिए। ऐसे लोगों को एक बार पूर्वोत्तर के इन राज्यों का अवश्य भ्रमण करना चाहिए। तब शायद उनके भीतर यह समझ विकसित होगी कि हमारा देश बहुत विविध है और हमारी मान्यताओं से भिन्न समाज भी देश का उतना ही अभिन्न हिस्सा है, जितना कि हम।
तीन
डिब्रूगढ़ स्टेशन किसी उत्तर भारतीय स्टेशन की तरह ही लगता है। बस वहां पर चहल-पहल का पैमाना थोड़ा अलग है। असम से अरुणाचल प्रदेश में दाखिल होने पर आई. एल. पी. की जांच होती है, और हम अपने पहले पड़ाव “वाक्रो” के लिए आगे बढ़ जाते हैं। पता चलता है कि अरुणाचल प्रदेश के इस हिस्से में होटल की संकल्पना अभी ठीक से विकसित नहीं हो पायी है। उसके स्थान पर सरकार ने “होम-स्टे” का विकल्प लांच किया है, जो कहें तो अच्छी तरह से काम भी कर रहा है। इस इलाके में पर्यटन अभी उस तरह से विकसित नहीं हुआ है तो उतने होटल भी नहीं बने हैं। इसके स्थान पर लोगों ने अपने घरों को “होम स्टे” के रूप में विकसित कर दिया है। जिस घर में वे रहते हैं, उसी घर के एक या दो कमरे उन्होंने पर्यटकों के लिए भी बना दिए हैं। उसी घर में खाना और नाश्ता भी मिल जाता है और इसके बदले में उन्हें एक अच्छी खासी रकम हासिल हो जाती है।
यहाँ आ कर पता चला कि न्याय और बराबरी की लड़ाई एकरेखीय नहीं होती है। वह कई स्तरों पर चलती रहती है। मसलन पूर्वोत्तर के राज्यों की सामान्यतया शिकायत होती है कि देश के पर्यटन मानचित्र पर उन्हें वह स्थान हासिल नहीं होता, जिसके वे हकदार हैं। लेकिन जब हम पूर्वोत्तर के भीतर प्रवेश करते हैं तो इन राज्यों की शिकायत अपने सहोदर बड़े भाई असम से हो जाती है। मसलन अरुणाचल के लोग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि हमारे पर्यटन का एक हिस्सा तो असम ले कर चला जाता है। जैसे कोई व्यक्ति यदि अरुणाचल प्रदेश के इस इलाके की यात्रा करना चाहता है तो उसकी आइटिनरी डिब्रूगढ़ या तिनसुकिया में तय हो जाती है। वहीं से उसकी गाड़ी निकलती है, जो हमारे क्षेत्र के लोगों का एक बड़ा हिस्सा ले कर चली जाती है और यही कहानी “तवांग सर्किट” पर भी लागू होती है, जिसकी रूपरेखा गुवाहाटी में तय होती है। और असम की गाड़ियां ही तवांग सर्किट पर दौड़ती मिलती हैं। “वाक्रो” में होम स्टे की मालकिन महिला का कहना था कि हमारे यहाँ भी लद्दाख जैसी व्यवस्था लागू होनी चाहिए जिसमें आप कश्मीर या हिमाचल या किसी और राज्य की गाड़ी ले कर लद्दाख तो जा सकते हैं लेकिन वहां का भीतरी टूर करने के लिए आपको लद्दाख क्षेत्र की गाड़ी ही लेनी पड़ती है।
वैसे अरुणाचल के सूदूर पूर्वी हिस्से की शिकायत सिर्फ शेष भारत या असम से ही नहीं है। यहाँ के लोगों का मानना है कि अरुणाचल में पर्यटन को लेकर भी हमारी सरकार भेदभाव करती है। वह “तवांग सर्किट” को जिस तरह से प्रोत्साहित करती है, उस तरह से “अनिनी, मेचुका और दोंग घाटी” के पर्यटन को प्रोत्साहित नहीं करती। यह कुछ इस तरह का प्रभाव डालता है कि लोगबाग “तवांग सर्किट” को ही अरुणाचल सर्किट समझने की भूल कर बैठते हैं। “वाक्रो” की होम स्टे की मालकिन इसमें राजनीति का एंगल भी ढूँढते हुए कहती हैं कि हमारा प्रतिनिधित्व न तो संसद में ठीक से है और न ही विधान सभा में। यहाँ का मुख्यमंत्री भी तवांग इलाके का है और हमारा केन्द्रीय मंत्री भी उसी पश्चिमी अरुणाचल का है। यहाँ तक कि लोकसभा में अरुणाचल को जो दो सीटें मिली हैं, उसमें पश्चिमी अरुणाचल पर तो उनका अधिकार है ही, पूर्वी अरुणाचल की सीट पर भी जो सांसद महोदय चुने गए हैं, वे वास्तव में मध्य अरुणाचल के रहने वाले हैं। ऐसे में हमारी उपेक्षा तो होगी ही। उनकी बात सुनते हुए ऐसा लगता है कि न्याय और समानता की अवधारणा कितनी बहुस्तरीय होती है।
वाक्रो के “होम स्टे” मे शाम के खाने के दौरान की बातचीत में वे सलाह देती हैं कि परशुराम कुंड की यात्रा के बाद हम लोगों को “दोंग घाटी” की यात्रा के लिए सूदूर पूरब में निकल जाना चाहिए और वहां से लौटने के बाद “अनिनी” की यात्रा करनी चाहिए।
आमीन...।
चार
डिब्रूगढ़ से पूरब की तरफ लगभग 200 किमी चलने के बाद परशुराम कुंड आता है, जो इस इलाके में हिन्दू धार्मिक पर्यटकों के लिए इकलौता स्थान है। यहाँ मकर संक्रांति के अवसर पर बड़ा मेला लगता है, जिसमें हालिया वर्षों में काफी भीड़ उमड़ने लगी है। ब्रह्मपुत्र की सहायक लोहित नदी के किनारे पर बने एक कुंड में लोगबाग पवित्र स्नान के लिए आते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। इसके अतिरिक्त इस इलाके में कोई बड़ा धार्मिक स्थान नहीं है, जिसके आसपास पर्यटन का गुच्छ विकसित हो सके. इस इलाके में पर्यटकों की कम संख्या होने का एक बड़ा कारण यह भी है, क्योंकि भारत में देशी पर्यटन मुख्य रूप से धार्मिक-स्थलों के इर्द गिर्द ही विकसित हुआ है। सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम से लेकर सूदूर उत्तर में अमरनाथ और केदारनाथ की दुर्गम यात्राएं इस बात की गवाही देती हैं कि धार्मिक विश्वासों के कारण लोगबाग अपने जीवन की बाजी लगाते हुए, कठिन से कठिनतर यात्राएँ भी कर लेते हैं।
बहरहाल हम लोग वहां थोड़ा समय बिताने के बाद आगे डोंग घाटी की तरफ बढ़ जाते हैं, जहाँ के बारे में दो बातें प्रसिद्ध बतायी जाती हैं। अव्वल तो यह कि इसी घाटी के अंतिम सिरे पर “काहो” गाँव पड़ता है, जो पूरब में भारत का सबसे आखिरी, या कहें से सबसे पहला गाँव है। और दूसरी प्रसिद्धि इसलिए मानी जाती है कि इसी इलाके की “डोंग घाटी” मे भारत की भूमि पर सूर्योदय की पहली किरण का आगमन होता है। यह इलाका काफी निर्जन और वीरान है। दूर-दूर तक कोई मानव बस्ती दिखाई नहीं देती। और यदि कोई कस्बा या गाँव दिखाई भी देता है, तो वह मूलभूत सुविधाओं के पैमाने पर काफी दूर प्रतीत होता है। परशुराम कुंड से “काहो गाँव” की लगभग 200 किमी की यात्रा में हमें किसी भी मोड़ पर शेष भारत के पर्यटक नहीं मिले। न तो किसी होटल में, न किसी खाने पीने की दुकान पर। न ही किसी सार्वजनिक स्थान पर, जहाँ सामान्यतया पर्यटकों की आवाजाही रहती है। इस पूरे रास्ते पर मुझे जो इक्का-दुक्का पर्यटक मिले, वे सब के सब पूर्वोत्तर भारत से ही ताल्लुक रखने वाले थे।
अरुणाचल में प्रवेश के बाद से ही यह महसूस होने लगता है कि साफ़ हवा और आक्सीजन की तासीर कैसी होती है। 50 से नीचे के एक्युआई में साँस लेना कितना आह्लादकारी होता है। जिस दिन हम लोग “काहो गाँव” से गुजर रहे थे, उस दिन वहां का एक्युआई 24 था। वहां के फूलों और पत्तियों में वह रंग दिखाई दे रहा था, जिसे हम लोग देखना लगभग भूल ही चुके हैं। “काहो” गाँव के प्रवेश द्वार हम लोग घंटे भर बैठे रहे, जहाँ सेना की कुछ गाड़ियों के अलावा सड़क पर कोई दूसरी हलचल दिखाई नहीं दे रही थी। इस गाँव में भी कुछ होम-स्टे हैं, जहाँ एडवेंचर के शौक़ीन पर्यटक आते रहते हैं। यहाँ से आगे की सड़क पर असम राइफल्स का पहरा है, जहाँ लगा बैरिकेट बताता है कि यहाँ से आगे भारत की भूमि समाप्त होती है और चीन की भूमि शुरू होती है।
अगली सुबह हमें “डोंग घाटी” का सूर्योदय देखना था, जिसके बारे में कहा जाता है कि भारत में सूरज की पहली किरण इसी गाँव में पड़ती है। इस सूर्योदय को देखने के लिए 2 घंटे का एक छोटा सा ट्रैक भी करना होता है, जिसमें लगभग 1600 सीढियां हमारे फिटनेस की परीक्षा लेती हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों मे भ्रमण करने के क्रम में अनगिनत जगहों से सूर्योदय देखने का अवसर मिला है। हर एक जगहों की अलग विशेषताएं होती हैं। हर एक जगह का अलग मंजर होता है। लेकिन पर्यटन की दुनिया में अपनी ख़ास जगह के सूर्योदय को बेचने की कवायद चलती रहती है। कन्याकुमारी का सूर्योदय विशेष माना जाता है, जहाँ सूरज हिन्द महासागर से निकलता हुआ दिखाई देता है। यदि मौसम साफ़ हो तो उसका नजारा अलग ही होता है। जैसलमेर का सूरज रेत के टीलों के आगोश से निकलता दिखाई देता है तो कौसानी में सूरज की पहली किरणें जब बर्फ की चोटियों पर पड़ती हैं तो वही चोटियाँ सुनहली दिखाई देने लगती हैं। समूचे पूर्वी तट पर बंगाल से ले कर रामेश्वरम तक एक ही बात कही जाती है कि यहाँ सूरज महासागर के भीतर से निकलता है। जबकि सिक्किम, दार्जिलिंग से लेकर लद्दाख तक के पहाड़ों में दूसरी बात दुहराई जाती है कि अमुक चोटी पर जब पहली किरण पड़ती है तो वह दृश्य अद्वितीय होता है। जाहिर है, इन दावों और विशेषणों में दम भी है, लेकिन क्या कहें कि जो सूर्योदय मुझे अपने गाँव में “सुबह की सैर” में चलते हुए गंगा के दियारे में दिखाई देता है, वह मुझे सबसे प्यारा है।
तो अरुणाचल के इस सूदूर पूर्वी गाँव में एक ख़ास नाम से सूर्योदय को देखने की मार्केटिंग की गयी है। यहाँ कहा जाता है कि भारत के जिस पहले गाँव में सूरज की किरणें पड़ती हैं, वह “डोंग” गाँव है। यहाँ उस सूर्योदय को देखने के लिए लगभग दो घंटे के ट्रैक के बाद एक चोटी पर जाना होता है, जिसकी कवायद आधी रात के बाद ही शुरू हो जाती है। जहाँ से पर्यटकों का ट्रैक शुरू होता है, वहां पर एक बेस कैम्प बना हुआ है। वहीँ पर अपने-अपने होम स्टे से निकल कर लोगबाग़ आते हैं, जिन्हें एक गाइड अपने साथ ले कर उस चोटी तक पहुंचता है। यह ट्रैक पहले पहाड़ी पगडण्डी वाले रास्ते से हो कर गुजरता था, लेकिन पिछले दशक में इन्स्टा की रील और पर्यटन लाबी की मार्केटिंग ने इसे थोडा पापुलर बनाया है तो अब इस ट्रैक पर सीढियाँ बन गयी हैं। इनकी संख्या लगभग 1600 के आस-पास हैं। कहना न होगा कि यह ट्रैक आपके फिटनेस का एक टेस्ट भी लेता है। मुझे यह ट्रैक करते समय “चेरापूंजी” का डबल डेकर ट्रैक याद आया, जिसमें लगभग 4000 सीढियाँ आती हैं।
हम लोग डोंग गाँव के होम-स्टे से निकल कर सुबह 2.30 बजे तक बेस कैम्प पहुँच गये थे, जहाँ उस गाँव की एक महिला गाइड हमारा इन्तजार कर रही थी। उसने बताया कि इस गाँव में हर घर का एक दिन टर्न आता है, जिस दिन उस घर का कोई सदस्य यहाँ बतौर गाइड काम करता है। उसे प्रति सदस्य 500 रूपये की आमदनी होती है, जिसमें से कुछ रकम गाँव के विकास, रास्ते के रखरखाव और शायद सरकार के पास भी चली जाती है। आज इस ट्रैक में हमारे साथ कुल 22 यात्री थे, जिनमें अधिकतर युवा थे। इन्स्टाग्राम की रील ने उन्हें यहाँ आने के लिए प्रेरित किया था, ऐसा वे बता रहे थे। जाहिर है, उनकी अपनी तैयारी भी एक मस्त रील बनाने की थी, जिसमें हम जैसे कुछ उम्रदराज लोग भी उनका साथ दे रहे थे।
मगर ऊपर पहुँचने पर पता चला कि पूरी डोंग घाटी ही धुंध और धुएं की चादर में लिपटी हुई थी। दरअसल पिछले दो दिनों से डोंग घाटी की उपरी हिस्से में आग लगी हुई थी, जिसके कारण पूरी घाटी में धुआं भर गया था। जाहिर है, उसका प्रभाव सूर्योदय पर भी पड़ना ही था। इतनी चढ़ाई के बाद एक झुंझलाहट तो सबके भीतर पैदा हो रही थी। लेकिन “जेन-जी” पीढ़ी ख़ास तौर पर नाराज थी। अरुणाचल के दूसरे हिस्से से यहाँ सूर्योदय देखने आई एक युवती ने कहा कि यदि ऐसी आग दिल्ली या मुबई में लग जाय तो क्या सरकार उसे भी उनके भाग्य पर छोड़ देगी कि वह अपने आप ही जल कर बुझ जाए। जाहिर है, हाशिये के लोगों का यह दुःख सांझा है, जिसमें मैं अपने क्षेत्र की जनता को भी ऐसे तमाम मसलों पर सरकार को कोसते हुए देखता हूँ। और कहना न होगा कि उनके दुख का वाजिब कारण भी है। अगली दोपहर में जब हम लोग वहां से वापस लौट रहे थे, तो वह आग उसी तरह से डोंग घाटी को धुआं-धुंआ किये हुए थी। उसको बुझाने की एक छोटी सी कवायद भी नदारद थी।
बहरहाल अपुन के यात्रा-अनुभवों ने सिखाया है कि यात्राएं प्रकृति और जगह के साथ-साथ माहौल में भी चलती रहती हैं. और कहना न होगा कि आपके भीतर भी। तो डोंग घाटी का सूर्योदय धुंधला ही सही।
है न।
पांच
हमारा अगला पड़ाव अनिनी की तरफ था, जो उपरी दिबांग घाटी का प्रमुख शहर है। यहाँ पहुँचने के लिए आपको डोंग घाटी से तेजू आना पड़ता है या फिर वाक्रो होकर भी आप अनीनी के लिए दरवाजे का शहर कहे जाने वाले “रोइंग” कस्बे में पहुंचते हैं। यह कस्बा निचली दिबांग घाटी का प्रमुख शहर है और एक तरह से अनिनी शहर के लिए दरवाजे का काम करता है। रोइंग कस्बे से पांच सात किलोमीटर आगे बढने पर ही अनिनी की चढ़ाई शुरू हो जाती है, जो पहली स्ट्रेच में मायोदिया पास तक पहुँचती है, जो इस रास्ते का सबसे ऊँचा स्थान है। यह समुद्र तल से लगभग 8 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित है। अनिनी जाने के लिए लगभग 200 किमी. के रास्ते से गुजरते हुए मुझे भारत भ्रमण के दौरान आने वाले विभिन्न रास्ते याद आने लगते हैं।
जैसे कि लेह से अलची जाते समय पहाड़ अपने आपको पीछे हटा कर पांच सात किलोमीटर की एक सीध वाली रेंज प्रदान करते हैं, और फिर लगभग वही मंजर जैसलमेर में सम गाँव से तनोत माता मंदिर और पाकिस्तान बार्डर जाते समय भी उपस्थित रहता है। लद्दाख का खार्दुन्गाला पास, कश्मीर का जोजिला पास, उत्तराखंड में धारचुला से नारायण आश्रम का रास्ता, सोनप्रयाग से त्रिजुगी नारायण मंदिर जाने का रास्ता, और फिर सिक्किम में लाचेन से गुरुडोंगमार झील जाने का रास्ता इसलिए याद रहता है क्योंकि यहाँ पर चलते हुए आप जीवन की मोहमाया से निर्लिप्त हो जाते हैं। मैं चेन्नई से पांडिचेरी जाने के लिए ईस्टकोस्ट रोड को चुनता हूँ, क्योंकि इस रास्ते में हमारा सहयात्री समुद्र भी होता है और केरल में नागरकोइल से त्रिवेंद्रम जाने के लिए दिन के समय में यात्रा करना पसंद करता हूँ क्योंकि इस रास्ते में छोटी पहाड़ियां, केले और नारियल के खेत, और उनके मध्य बिखरी धान की हरियाली वह जादू रचती है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। अमृतसर से चंडीगढ़ के बीच फरवरी महीने की यात्रा हमेशा याद रहती है, क्योंकि गेंहू की लहलहाती फसल आपको स्वर्ग की यात्रा में ले कर जा रही होती है।
रास्ते के मामले में सिक्किम और हिमाचल के ऊपरी हिस्से को मैं हमेशा याद करता हूँ। और याद करता हूँ झारखण्ड की यात्राओं को, जिसमें हरे भरे जंगल और उनके मध्य छोटी पहाड़ियां स्वप्निल दुनिया रचती हैं। दक्षिण के चारो हिल स्टेशनों- उटी, कोदईकनाल, मुन्नार और कूर्ग- की यात्राएं भी मुझे उनके रास्तों के लिए ही याद रहती हैं। कहना न होगा कि अंडमान में पोर्टब्लेयर से दिगलीपुर की बरसात के समय की गयी यात्रा की कहानी रास्ते की खूबसूरती के लिए ही जेहन में बसी रहती है। उसी तरह पश्चिमी घाट के रास्ते मुझे बार-बार खींच कर ले जाते हैं। कभी मुंबई से गोवा और कभी त्रिवेंद्रम से गोवा। एक बार मैंने बरसात के दिनों में गोवा से बेलगाम शहर की यात्रा की थी, वह आज भी आँखों में उसी तरह से बसी हुई है।
चेरापूंजी में डबल डेकर रूट ब्रिज देखने के लिए जो रास्ता हमें ले कर जाता है, शास्त्रों में शायद उसे ही स्वर्ग का रास्ता कहा गया होगा। तीन वर्ष पहले की गयी पश्चिमी घाट के रास्ते भी बार बार याद आ रहे हैं, खासकर कर्णाटक के हिस्से वाले रास्ते। बेलगाम से डांडेली होते हुए सिरसी। वहां से पश्चिमी घाट को पार कर जोग फाल्स होते हुए कोल्लूर तक की यात्रा, फिर कोल्लूर से इन पहाड़ियों को श्रृंगेरी और धर्मस्थला जाते हुए पार करना। और मंगलोर के किनारे को पकड़ने के लिए एक बार फिर। वाह .... तीन वर्ष पहले जब हमने स्पीति घाटी की यात्रा में “की मानेस्ट्री” के रास्ते को देखा था तो ऐसा लगा कि इसके बाद यदि कुछ और देखने को नहीं मिलेगा, तो भी जीवन में बहुत कुछ देखने को नसीब हो गया।
आज अनिनी जाते समय, रास्ते की उसी कहानी में एक और नगीना साथ में जुड़ गया, जब हम लोगों ने निचली दिबांग घाटी के शहर रोइंग से उपरी दिबांग घाटी के शहर अनिनी तक की यात्रा पूरी की। पहाड़ कितने आत्मीय, हरे भरे, मोहक और आकर्षक हो सकते हैं, इस रास्ते पर चल कर समझा जा सकता है।
छह
ऊपरी दिबांग घाटी के मुख्यालय शहर अनिनी को कहीं से भी बैठ कर निहारा जा सकता है। किसी चौराहे पर ट्रैफिक को नियंत्रित करने की जरुरत नहीं। किसी पर्यटक को कोई परेशान करने वाला नहीं। किसी दुकानदार द्वारा अपने सामान को बेचने का आग्रह नहीं। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालय और बंगले पर कोई अतिरिक्त सुरक्षा नहीं। अस्पताल के बाहर न तो कोई अफरातफरी और न ही दवा की दुकानों का जंजाल। यहाँ तक कि दलालों का आतंक भी नहीं। कमाल है...।
आफबीट के शहरों में मुझे उत्तराखंड का मुन्सियारी और अंडमान का डिगलीपुर कस्बा, दोनों बहुत प्रिय रहा है। जहाँ आप आपाधापी से दूर, ठहर कर जीवन का आनंद ले सकते हैं। जहाँ सब कुछ जीवन की गति से चल रहा होता है। जहाँ आपको महसूस होता है कि हम, अपने शहर और कस्बे में, जो दौड़ते हुए जीवन जी रहे हैं, उससे अलग भी एक शांतिपूर्ण जीवन हो सकता है। जिसमें तनाव की रेखाएं बहुत कम है और सुख की बहुत अधिक। अनिनी शहर को देखने के बाद मैं अपनी दोनों पसंदीदा जगहों-मुन्सियारी और दिगलीपुर- की रेटिंग को कम करने पर विवश हो रहा हूँ। क्योंकि अब मेरे पास देखने का पैमाना थोड़ा और ऊंचा हो गया है।
इस कस्बाई शहर की एक सड़क पकड़ कर हम लोग उसके किनारे तक पहुंचे, जहाँ आईटीबीपी कैम्प के बाद उस सड़क ने विराम ले लिया था। वहां हमारी मुलाकात एक जवान से हुई, जो अपने कैम्प के मुहाने पर अकेले ड्यूटी निभा रहे थे। पता चला कि वे मथुरा के रहने वाले हैं। फिर उनसे यहाँ के जीवन और उनके अनुभवों पर बात होने लगी। इस बीच एक थार वाले यू-ट्यूबर का आगमन हुआ, जो सत्रह पाकेट वाला पैंट और सत्ताईस पाकेट वाला जैकेट धारण किया हुआ था। वह युवा बहुत जल्दी में था। पता चला कि वह दिल्ली से यहाँ पहुंचा है और इस बात पर दुखी है कि यहाँ तो कोई पर्यटक ही नहीं दिखाई दे रहा है। बातचीत कर रहे जवान ने हमारी तरफ इशारा करते हुए कहा कि यहाँ अभी दो लोग तो हैं ही। और इनसे पहले भी दो गाड़ियाँ यहाँ पहुंची हैं, जिसके यात्री ऊपर ट्रैक पर गये हैं। इसलिए आपका यह कहना उचित नहीं है कि यहाँ कोई पर्यटक दिखाई नहीं दे रहा है।
उस बेचैन युवा ने अपने कंधे उचका दिए, गोया वह इस उत्तर को भी उचका देना चाहता हो। फिर उस जवान ने समझाया कि यहाँ पर पर्यटन का पैमाना अलग है। जिस दिन इस कैम्प के मुहाने पर दस गाड़ियां आ जाती हैं, उस दिन को यहाँ के लिए व्यस्त माना जाता है। दिल्ली वाला नौजवान एक-दो रील नुमा वीडियो सूट करने के बाद जल्दी ही वापस लौट गया। जबकि हम लोग घंटे दो घंटे तक वहीं कैम्प के मुहाने पर बैठ कर साथी जवान से बातचीत करते रहे। उन्हें सुनते रहे और प्रकृति का आनंद लेते रहे।
अनिनी से ब्रूनी तक के लगभग 65 किलोमीटर लम्बे इस रास्ते में हमें मुश्किल से 65 गाड़ियां भी नहीं मिली होंगी। अलबत्ता इस रास्ते में 65 वाटरफाल्स जरुर मिले होंगे। हालाकि इस रास्ते पर आजकल बहुत सारे रिजार्ट्स खुलने लगे हैं। वहीं रोइंग से अनिनी तक की सडक भी अब दुहरी होने लगी है। क्या पता आने वाले समय में अनिनी भी बदल जाय और यहाँ भी गाड़ियों की कतार लग जाय। राम जाने।
सात
वैसे तो पूर्वोत्तर भारत के समाज में महिलाओं की उपस्थिति बहुत सक्रिय दिखाई देती है, लेकिन इसमें भी अरुणाचल प्रदेश बहुत ख़ास है। वे लगभग हर उस काम को संभाल रहीं हैं, जो हमारे इलाके में पुरुषों के लिए आरक्षित समझे जाते हैं। हम लोग वाक्रो के जिस होम-स्टे में रुके थे, उसकी मालकिन एक महिला ही थीं, जिन्होंने हमको फोन पर गाइड भी किया और ठहरने, घूमने तथा खाने-पीने से सम्बंधित हमारी सभी जिज्ञासाओं को शांत भी किया। उस होम-स्टे में काम करने वाली और दो लड़कियां थीं, जो खान पान का सारा दायित्य संभाल रहीं थी। डोंग घाटी में भी हमारी होम-स्टे की ओनर एक महिला ही थीं, जो बता रही थीं कि उनके पति “तेजू” शहर में काम करते हैं और वे अपने होम स्टे को संभालती हैं। उनका होम स्टे छोटा था तो खाने और रहने की सारी जिम्मेदारी वे अकेले ही संभाल रही थीं। उसी डोंग गाँव में जब हम लोग सूर्योदय देखने के लिए ट्रैक की चढ़ाई कर रहे थे, तो उसे लीड करने वाली भी एक महिला ही थीं। बाईस लोगों के हमारे ग्रुप में उन्होंने एक एक व्यक्ति का खयाल रखा और सबको उत्साहित किया।
निचली दिबांग घाटी के कस्बाई शहर रोइंग के होम स्टे की देखभाल भी एक महिला के जिम्मे ही थीं, जो दो अन्य महिला सहयोगियों के साथ अपना होम स्टे चला रही थी। उनके पति अरुणाचल पुलिस में कार्यरत थे। रोइंग कस्बे में ही एक फल विक्रेता महिला मिली, जो बलिया की रहने वाली थी। अनिनी कस्बा इस मामले में और भी विकसित दिखाई दिया, जहाँ के लगभग सभी होम स्टे को महिलायें ही देखती संभालती मिली। अनिनी का हमारा होम-स्टे नया था, तो उसकी मालकिन ने एक दूसरी महिला से खान पान का टाईअप कर लिया था। वह महिला अपने घर से खाना बना कर, स्कूटी से हम लोगों के होम-स्टे तक आती थीं। मांस और मदिरा की दुकानें भी महिलायें संभालती हुई मिली। अनिनी चौराहे पर गाड़ियों की बुकिंग करने वाली भी एक महिला ही थीं, जो अनिनी से रोइंग के लिए चलने वाली टाटा सूमो को मैनेज कर रही थीं। उन्होंने बताया कि अनिनी से रोइंग का किराया एक हजार रूपये है और यह सफर लगभग आठ घंटे में तय होता है। इस सीजन में दो या तीन गाड़ियों के पैसेंजर प्रतिदिन हो जाते हैं।
अरुणाचल इस मामले में हमारा आदर्श हो सकता है कि औरतों को किस तरह से समाज के क्रियाकलाप में शामिल किया जाय। बल्कि यह कहना अधिक मुफीद होगा कि इस मामले में समूचा पूर्वोत्तर ही हमारा आदर्श हो सकता है।
आठ
देश में आजकल शाकाहार और मांसाहार की बहस बहुत तीखी हो गयी लगती है। हालाकि उसमें एक उलटबांसी भी है कि सामने से जहाँ शाकाहार को बहुत महिमामंडित किया जा रहा है और तरह तरह से नैरेटिव बनाया जा रहा है कि मांसाहारी लोगों को किस तरह का मांस खाना चाहिए। किस महीने में खाना चाहिए, किस दिन को खाना चाहिए। किस त्योहार में खाना चाहिए, आदि आदि। वहीँ दूसरी तरफ देश में खान-पान को समझने वाला एक सर्वे बताता है कि हमारे यहाँ लगभग 65 से 70 प्रतिशत लोग मांसाहार करते हैं। अर्थात देश में शाकाहारी लोगों की संख्या 30 से 35 प्रतिशत ही है। लेकिन अल्पमत में होते हुए भी यही 30-35 प्रतिशत लोग खानपान के व्यवहार का नैरेटिव बनाते हैं। और फिर हम उत्तर भारतीय लोगों को लगने लगता है कि जो खान-पान के जो नियम हमने विकसित किये हैं, वे पूरे देश पर भी लागू होने चाहिए। वे आक्रामक तरीके अपनी बात रखते हैं और चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उनकी बात को माने।
पूर्वोत्तर भारत इस नैरेटिव को तार-तार कर देता हैं। वहां के खान-पान को देख कर उत्तर भारतीय शाकाहारी लोगों को धक्का लग सकता है. उनकी भावनाएं बड़े पैमाने पर आहत हो सकती हैं। गुवाहाटी जैसे बड़े शहर को छोड़ दें, तो बाकी पूर्वोत्तर भारत में शुद्ध शाकाहारी होटल की तलाश करना बहुत ही कठिन कार्य है। लगभग दो सप्ताह की यात्रा में हम एक भी ऐसा होटल नहीं ढूंढ पाए, जो शुद्ध शाकाहारी हो। हालाकि मेरे जैसा शाकाहारी व्यक्ति फिश, चिकन और मटन के मेन्यू वाले होटलों में खाना खा ही लेता है. क्योंकि अपने क्षेत्र के कई ऐसे होटलों में हमने नान वेज के इस प्रकार को देखा होता है। और राह चलते ऐसी दुकानें भी दिख जाती हैं, जिनमें फिश, मटन और चिकन बनता है, खाया जाता है। लेकिन पूर्वोत्तर के मांसाहार में बात यहीं तक नहीं रुकती। यहाँ अरुणाचल के सूदूरवर्ती क्षेत्रों में मांसाहार में सबसे प्रचलित भोजन “पोर्क” है। और जब हमने नागालैंड की राजधानी कोहिमा का रुख किया तो यहाँ के होटलों के मेन्यु को देख कर पता चला कि यहाँ पर पोर्क और बीफ साथ साथ बिकते हैं। अर्थात बात अब वेज और नानवेज से आगे बढ़ कर पोर्क और बीफ से बचने तक पहुँच गयी है।
जिस नागा ड्राइवर के साथ हम लोगों ने कोहिमा में दो दिन का समय गुजारा, वह हमारे खान-पान को देखकर आश्चर्य से भरा हुआ था। और कहना न होगा कि हम भी उसके खान-पान को सुन कर परेशान थे। हम इस बात से परेशान थे कि हमें ऐसे होटल में खाना पड़ेगा, जिसमें पोर्क और बीफ भी बनता है। और वह इस बात से आशचर्यचकित था कि बिना पोर्क के आदमी जीवन कैसे व्यतीत कर सकता है। वह सरवाइव कैसे कर सकता है। यहाँ खान-पान को ले कर मन में इतना खौफ समाया हुआ था कि आदमी फल विक्रेता से भी पूछ सकता है कि इसमें नान वेज तो नहीं है न।
तो उत्तर भारत के खान-पान के नियम पूरे देश में लागू नहीं होते। खासकर पूर्वोत्तर भारत में तो बिलकुल भी नहीं। यह जान लेना बहुत जरुरी है कि अपना देश कई मामलों में बहुत विविध है, जिसमें खान-पान भी शामिल है। मैं शाकाहारी हूँ, इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरा देश ही शाकाहारी है। और सबको मेरी तरह से ही खाना पीना चाहिए। यदि आपको यह बात फिर भी नहीं समझ में आ रही है तो एक बार पूर्वोत्तर भारत का भ्रमण करके देख लीजिए, शाकाहार और मांसाहार पर चलने वाली बहस में आपके भीतर थोड़ी स्थिरता जरुर आ जायेगी।
नौ
देश के किसी कोने में चले जाइए, आपको पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगबाग जरुर मिल जायेंगे। उनका देश भर में फैलाव इतना अधिक है कि वह सामने से दिखाई देता है। इस दिखाई देने में एक बात कामन है और वह है इन लोगों की आर्थिक पृष्ठभूमि का कमजोर होना। बेशक कि महानगरों में कुछ ह्वाईट कालर जाब करने वाले लोग भी मिल जाते हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत प्रभावशाली दिखाई नहीं देती। हमारी तरफ के लोग अधिकतर सड़क किनारे की अनियमित छोटी दुकाने, ठेकदार के यहाँ काम या फिर किसी दुकान में कोई साधारण काम करते हुए आपको मिल जाते हैं।
मैं यहाँ दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता की बात नहीं कर रहा हूँ। वरन मेरा आशय सूदूरवर्ती जगहों में भी इनकी उपस्थिति को ले कर है। जो इलाके अत्यंत दूरदराज और निर्जन हैं, वहां भी ये लोग पहुंचे दिखाई देते हैं। एक दशक पहले की लद्दाख यात्रा में मुझे कुछ ऐसे मजदूर मिले थे, जो पैंगांग झील की तरफ जाने वाली सड़क पर काम कर रहे थे। वे लोग उत्तरी बिहार के रहने वाले थे। इसी तरह स्पीति यात्रा में भी, जब हम लोग काजा शहर में टहल रहे थे, तो मेरे कानों में भोजपुरी भाषा की मिठास सुनाई दी थी। पता चला कि ये लोग किसी ठेकेदार के लिए काम करते हैं और आरा, बिहार के रहने वाले हैं। दो वर्ष पहले जब मैं अंडमान गया था तो हैवलाक द्वीप पर एक सज्जन से मुलाकत हुई, जो कालापत्थर बीच पर स्कूबा डाइविंग को गाइड कर रहे थे। वे गोरखपुर के निषाद जी थे। तीन वर्ष पूर्व हम्पी यात्रा के मुहाने वाले शहर होसपेट में भी एक शर्मा जी मिले थे, जो वहां ठेला लगा कर चाट बेच रहे थे। वे छपरा के रहने वाले थे।
इसी तरह पूर्वी असम के दोनों बड़े शहरों- डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया- में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की उपस्थिति साफ़-साफ़ दिखाई देती है। और जब हम वहां से आगे अरुणाचल प्रदेश में परशुराम कुंड, वाक्रो, डोंग घाटी और काहो गाँव की तरफ बढ़ते हैं, तब भी लगभग हर छोटे बड़े कस्बे में अपनी तरफ के लोग आपको मिल जाते हैं। अनिनी के प्रवेश द्वारा वाले शहर रोइंग में मेरी मुलाक़ात एक फल विक्रेता से हुई, जो बलिया के रहने वाले थे। उनका कहना था कि यहाँ अपनी तरफ के कई लोग काम करते हैं। अनिनी में जिस दुकान पर हम लोगों ने दो दिन नाश्ता किया, वह चंपारण जिले के साह जी की दुकान थी। वहीं परशुराम कुंड में फूल माला बेचने वाले भाई साहब जौनपुर के रहने वाले थे।
मुझे इस बात पर अधिक आश्चर्य हुआ, जब नागालैंड की राजधानी कोहिमा में भी अपनी तरफ के कई लोगों से मुलाक़ात हुई। फल की दुकान, बेकरी की दुकान और कपडे की दुकान पर इनकी उपस्थिति पूरे कोहिमा में दिख जाती है। मेरा नागा ड्राइवर जिन दो बातों पर बहुत वोकल था, उसमें पहली बात खान-पान को लेकर थी। जबकि दूसरी बात में उसकी आवाज तल्ख़ हो जाती थी, जब वह जिक्र करता था कि कोहिमा का सारा व्यवसाय बाहर के लोगों के हाथों में चला गया है। इस बाहरी में बिहारी, बंगाली और असमी तीनों का जिक्र था। दीमापुर के कमिश्नर आफिस में, जहाँ हम लोग आई एल पी के लिए पहुंचे थे, वहां भी बिहार से आये कई मजदूर कतारबद्ध मिले, जो अपना वर्क परमिट बनवाने के लिए उस आफिस में पहुंचे थे।
इन लोगों को देखते हुए बिहार, उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड के हुक्मरानों से सवाल करने की इच्छा होती है कि इन लोगों को अपने राज्य में, जांगर का सुख भोगने का अवसर क्यों नहीं मिल सकता है? बेशक कि यह कहानी पहले से चली आ रही है। लेकिन यह आज भी तो उसी तरह बदस्तूर जारी है। गोया हमारे यहाँ के लोगों ने अब यह मान लिया है कि उन्हें काम की तलाश में कहीं न कहीं बाहर निकलना ही है। बकौल धूमिल, ये लोग अपनी पीठ पर दूसरे की ऊन ढोने के लिए अभिशप्त हैं।
दस...
दीमापुर रेलवे स्टेशन नागालैंड और मणिपुर का दरवाजा है। इन राज्यों में प्रवेश करने के किये ट्रेन का सफ़र यहीं तक का रहता है। इसके बाद आपको नागालैंड या मणिपुर की यात्रा करने के लिए सड़क मार्ग का सहारा लेना होता है। दो राज्यों को जोड़ने वाले इस स्टेशन की महत्ता साफ़ साफ़ दिखाई देती है, और यह इसलिए भी होती है क्योंकि इन सीमावर्ती राज्यों में सुरक्षा बलों की उपस्थिति काफी अधिक होती है. जाहिर है, इस नाते इनका मूवमेंट भी काफी अधिक रहता है। शाम के समय दीमापुर रेलवे स्टेशन, किसी छावनी की तरह दिखाई देता है। अव्वल तो कारण सुरक्षा बलों का भारी मूवमेंट है. लेकिन नागालैंड और मणिपुर, दोनों राज्यों में शाम ढलने के बाद का मूवमेंट लगभग नगण्य हो जाना भी एक बड़ा कारण है। नागालैंड के दोनों बड़े शहर- दीमापुर और कोहिमा- शाम को 7 बजे के बाद लगभग खाली हो जाते हैं।
यहाँ पर जो भी महत्वपूर्ण ट्रेने गुजरती हैं, उनका समय शाम या रात का होता है। ऐसे में इन जवानों को अपना अच्छा ख़ासा समय स्टेशन पर ही गुजरना पड़ता है। यहाँ से गुजरने वाली दोनों राजधानी गाड़ियां रात में ही हैं, जिनको पकड़ने या उतरने के लिए भारी भीड़ जमा रहती है। इन दोनों गाड़ियों की आधी सीटें इसी स्टेशन पर भरती और खाली होती हैं। त्रासदी यह है कि इतने महत्वपूर्ण जंक्शन पर जो सुविधाएं होनी चाहिए, वे दिखाई नहीं देती हैं। यहाँ कहने के लिए तीन प्लेटफार्म जरुर हैं, लेकिन प्लेटफार्म संख्या एक को छोड़ कर, अन्य दोनों प्लेटफार्मों पर बेसिक सुविधाएं लगभग शून्य हैं। यहाँ तक कि उन प्लेटफार्म पर शेड भी नहीं है। इसलिए सारी जनता प्लेटफार्म संख्या एक पर ही जमी रहती है।
ग्यारह...
पूर्वोत्तर की इस यात्रा ने हमारे अंतर्मन को गहराई से भर दिया है। कहना न होगा कि इसने हमें अगली यात्रा का बेटन भी थमा दिया है।
तो फिलवक्त के लिए एक विराम...।
(इस पोस्ट की सारी तस्वीरें हमें रामजी तिवारी के सौजन्य से ही प्राप्त हुई हैं। इसके लिए हम उनके आभारी हैं।)
सम्पर्क
रामजी तिवारी
बलिया , उ.प्र.
मोबाइल : 9450546312











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