हेमन्त कुमारी देवी का आलेख 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं'
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| हेमन्त कुमारी देवी |
हेमन्तकुमारी देवी ने मर्यादा के 1914 अंक में 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं' नामक एक आलेख लिखा था। यह आलेख स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उस समय स्त्रियों पर कैसी बंदिशें थीं। हेमन्तकुमारी ने अपने इस आलेख में वे रास्ते बताए हैं जिस पर चल कर स्त्रियाँ एक सम्मानित जीवन जी सकती हैं। वर्ष 1888 में हेमन्त कुमारी देवी ने ‘सुगृहिणी’ नामक स्त्री पत्रिका नागरी भाषा में निकाली थी। हिन्दी नवजागरण काल के इतिहास में किसी स्त्री द्वारा संपादित ‘सुगृहिणी’ पहली पत्रिका और श्रीमती हेमन्त कुमारी देवी हिन्दी साहित्य इतिहास में पहली स्त्री संपादिका है। ऐसा इसलिये कि श्रीमती हरदेवी की पत्रिका ‘भारत भगिनी’ सन 1889 में निकली थी। ‘सुगृहिणी’ पत्रिका का पहला अंक फरवरी 1888 में निकला था। नवजागरणकालीन यह पत्रिका सुखसंवाद प्रेस, लखनऊ में पण्डित बिहारी लाल के द्वारा मुद्रित होती थी। इस पत्रिका में कुल बारह पृष्ठ होते थे। ‘सुगृहिणी’ का पहला और आखिरी पृष्ठ रंगीन हुआ करता था। जिस समय हिन्दी में बालकृष्ण भट्ट, बदरी नारायण चौधरी, राधाचरण गोस्वामी और पंडित देवी सहाय जैसे विद्वान पत्रिका निकाल रहे थे। इन संपादकों के बीच हेमन्त कुमारी देवी ने स्त्रियों की बेहतरी के लिए सुगृहिणी पत्रिका निकाल कर स्त्री वैचारिकी की जमीन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। हेमन्त कुमारी देवी उसी समय स्त्रियों के लिए विद्यार्जन को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानती थीं। उनकी पत्रिका ‘सुगृहिणी’ की यह टैग लाइन ही थी : "विद्या और साध्विता के भूषण से जब नारी अलंकृत होती है तब मैं उसे अंलकृता समझती हूँ; सोने से भूषिता होने से ही अंलकृत नही होती”। ध्यातव्य है कि हेमन्त कुमारी देवी ने उस समय पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया जब नारी शिक्षा का पूर्णतया अभाव था और देश अंग्रेजों का गुलाम था। हेमन्त कुमारी अपनी ये बातें तब कर रही थीं जब "ब्राह्मण" पत्रिका के सम्पादक प्रताप नारायण मिश्र "पतिव्रता" शीर्षक अपने सम्पादकीय लेख मे स्त्रियों के लिए पतिव्रत पर अधिक जोर देने का परामर्श देते हुए आगे यह जोड़ते हैं 'जिसमें सर्वसाधारण स्त्रियों को वास्तविक लाभ हो।' आज भी स्त्रियों के प्रति हमारी सोच लगभग पुरातन ही है। उनके अंदर भय और असुरक्षा की भावना हमेशा भरी होती है। हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में फिर एक महिला के साथ गैंग रेप किया गया है। अबोध बच्चियां तक ऐसे भेड़ियों से सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में हम विकसित भारत की उस संकल्पना को कैसे पूरा कर पाएंगे जिसका ख्वाब सभी पाले हुए हैं। यह आलेख पंकज मोहन जैसे शोधकर्ता के सौजन्य से हमें प्राप्त हुआ है। पंकज जी इसे "हिन्दी समाज में स्त्री नवजागरण" विषय के अध्येताओं के लिये महत्त्वपूर्ण मानते हुए एक टिप्पणी के साथ प्रस्तुत करते हैं। पहली बार के पाठकों के लिए हम इस दस्तावेज को विशेष रूप से प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हेमन्त कुमारी देवी का आलेख 'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं'।
भारतेन्दु युग में जब हेमन्तकुमारी देवी ने सदियो से अज्ञान के अंधकार में सोयी हुई हिन्दी समाज की स्त्रियों को "सुगृहणी" नामक पत्रिका के माध्यम से जाग्रत करने का प्रयास किया, उस जमाने के विख्यात पुरुष लेखकों ने नारी नवजागरण के प्रति किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की, इसके सम्यक विश्लेषण की भी आवश्यकता है। 1886 में "ब्राह्मण" पत्रिका के सम्पादक प्रताप नारायण मिश्र ने "पतिव्रता" शीर्षक सम्पादकीय लेख मे हेमन्तकुमारी देवी को यह परामर्श दिया "हम आशा करते हैं कि श्रीमती हेमन्तकुमारी देवी (रतलाम वासिनी) अपनी 'सुगृहिणी' नामक पत्रिका में पतिव्रत पर अधिक जोर देंगी जिसमें सर्वसाधारण स्त्रियों को वास्तविक लाभ हो। फोटोग्राफी आदि की अभी हमारी गृहदेवियों के लिए अधिक आवश्यकता नहीं है। नवीन ग्रंथकारों को भी चाहिए कि जहाँ और बहुत सी बातें लिखते हैं, कभी कभी इधर भी झुकते रहें। व्याख्यानदाता लोग कभी कभी स्त्रियों को भी परदे के साथ स्त्री धर्म की शिक्षा दिया करें। यही सब पतिव्रत प्रचार की युक्तियाँ हैं।
इधर हमारे गृहस्थ भाइयों को समझना चाहिए कि दोनों हाथ ताली बजती है। उन्हें पतिव्रता बनाने के लिए इन्हें भी स्त्रीव्रत धारण करना होगा। एक बात और भी है कि स्त्रियाँ अभी विशेषतः मूर्ख हैं। अतः साम, दाम, दंड, भेद से काम लेना ठीक होगा। निरे न्याय और धर्म से वे राह पर न आवेंगी। ऐसी युक्ति से बर्तना चाहिए कि वे प्रसन्न भी रहें और कुछ डरती भी रहें। तभी प्रीत करेंगी। कनौजियों की तरह निरी डंडेबाजी से वे केवल डर सकती हैं, प्रीति न करेंगी। अग्रवालों, खत्रियों की भाँति निरी स्वतंत्रता सौंप देने से भी वे सिर चढ़ेंगी। अतः भय और प्रीति दोनों दिखाना, स्वतंत्र, परतंत्र दोनों बनाए रहना। मौके मौके से उन्हें अनुमति और शिक्षा भी देते रहना, और कभी कभी उनकी सलाह भी लेते रहना। बस इन उपायों से संभव है कि भारत कन्याएँ पुनः पतिव्रत की ओर झुकने लगेंगी और पतिव्रताओं के प्रभाव से फिर हमारी सौभाग्यलक्ष्मी की वृद्धि होगी । ब्राह्मण खं० 4, सं० 12 (15 जुलाई 1886)
पंकज मोहन
'युक्तप्रदेश की स्त्रियों की उन्नति के मार्ग में सामाजिक बाधाएं'
लेखिका श्रीमती हेमन्त कुमारी देवी
प्रस्तुति : पंकज मोहन
युक्तप्रदेश की सामाजिक प्रथा इस अब प्रकार की है कि महिला गण सहज में आपस में मिल जुल कर नहीं रह सकतीं। सब से प्रथम यही कुप्रथा हम लोगों की उन्नति के मार्ग में बाधक है। मनुष्य जब तक एक दूसरे से मिलते नहीं तब तक वे अपना भाव एक दूसरे पर नहीं प्रकट कर सकते। स्त्री और पुरुष दोनों ही के लिए यह बात एक समान प्रयोजनीय है। पुरुष के लिए बाहर निकलने में किसी प्रकार की रोक टोक न होने से वह अपने अभाव दूर कर सकता है परन्तु स्त्री यह नहीं कर सकतीं। स्त्री जाति के जो स्वाभाविक अभाव हैं उन सबको पुरुष भली भांति समझ नहीं सकते, इसलिए कि उनमें उन लोगों की आशा के अनुरूप सहृदयता नहीं होती। इस कारण पुरुष प्रायः अपनी रुचि, अभाव, और अवस्था के अनुसार रमणीगणों को पराधीन बनाना चाहते हैं। जब तक स्त्री जाति अपने विषय को स्वयं सोच कर स्वाधीन भाव से काम नहीं कर सकती तब तक उसकी उन्नति होना असम्भव है। स्वाधीन भाव का अर्थ पर पुरुष के साथ वार्तालाप, मुँह खोल कर सड़क पर घूमना अथवा खाने पीने में विचार न करना नहीं है। क्योंकि कोई समझदार इस प्रकार की अनुचित बात नहीं कहेगा और यदि कहे भी तो उसकी बात मानी नहीं जाएगी। रमणियों का कार्यक्षेत्र ही स्वतन्त्र है। स्त्रियां पढ़ के भीतर भी बड़े से बड़े कार्य कर सकती हैं। कम से कम वे अपना अभाव दूसरे पर प्रकट कर सकती हैं और इसके द्वारा उसको पूरा कर सकती हैं। इस समय पर्दा प्रणाली प्रचलित रहने से उनका आपस में एक दूसरे से मिलना कठिन है। इसी कारण अपने मन का भाव दूसरी रमणी से कहने का अवसर भी उन्हें नहीं मिलता। पुरुष आपस में मिल सकते हैं और अपने अभाव को विदित कर सकते हैं। सुधार भी कर सकते हैं, परन्तु रमणीगण को यह सुविधा नहीं है? युक्त प्रदेश में रमणीगण के आपस में मिलने के स्थान (1) न्योता और (2) रहस हैं। परन्तु यहां पर भी मिलते समय इनमें अहंकार, द्वेष, हिंसा और कलह स्पष्ट दिख पड़ते हैं। कोई अपने गहने को गर्मी के मारे दूसरे के साथ बोलती चालती तक नहीं। यदि कोई दिल खोल कर मिली भी तो असभ्य विषयों की चर्चा कर के अपनी बुद्धिमानी प्रकट करती हैं। यदि विवाहादि में औरतें आई तो वे अश्लील भाषा में लीन हो कर गालियों की वर्षा करने लगती हैं। उस समय वे भूल कर भी नहीं सोचतीं कि निर्लज्जता की भी सीमा होनी चाहिए। असभ्य भाषा में गाना सुशिक्षिता का परिचायक नहीं है। भद्रता, सभ्यता और सामाजिकता के लिए ये सब बातें स्त्रियों को छोड़ देनी पड़ेगी। अब वह समय आ गया है जब कि रमणियों को आदर्श बनना चाहिये। समाज में जो स्त्रियां शिक्षिता, सभ्य, पुण्यात्मा और धर्मात्मा हैं वे चाहें तो अपने स्वामियों को उत्साहित कर के रमणीगण के मिलने के लिए एक स्थान नियत करा सकती हैं। इस जगह रमणीगण इकट्ठी हो कर यथार्थ उन्नति और सामाजिक सुधार की आलोचना कर सकती हैं। लखनऊ नगर में एक हिन्दू बालिका विद्यालय है। इसमें हर महीने स्त्रियां एकत्र हो कर गम्भीर विषयों की चर्चा करती हैं। उक्त सभा बहुत से बड़े कार्य कर रही है इसमें कोई सन्देह नहीं। आपस में मिलने के कारण स्त्रियों में एकता, सहृदयता और अनुसंधिता बढ़ रही है और साथ साथ इन विषयों की आलोचना करने की शिक्षा भी आपस में हो रही है। यदि प्रत्येक नगर में ऐसी सभाएं स्थापित हो जाएं तो स्त्रियों की उन्नति का मार्ग सुगम हो जायगा। उक्त सभा का पुरुषों के साथ, किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है। रमणी पर्दे के भीतर पुरुष की दृष्टि से छिपी हुई काम करती है। इस प्रकार की सभा में जाने से किसी को प्रतिवाद नहीं हो सकता बल्कि पुरुष इसमें स्त्रियों के सहायक हो सकते हैं। बड़े ही हर्ष की बात है कि इस प्रदेश में ऐसी दो रमणियां हैं जो केवल अपनी असाधारण विद्या ही का परिचय न दे कर अपने समाज के हित में भी भलीभांति से लगी हुई हैं। ऐसी रमणियों का नाम लेना भी पुण्य है। खैरीगढ़ की रानी, दियरा की रानी, प्रतापगढ़ की रानी, स्त्री दर्पण की सम्पादिका, गृह-लक्ष्मी की सम्पादिका, इत्यादि रमणी भूषणों के नाम उल्लेख योग्य हैं। इनमें से कोई दो सर्वसाधारण के हित के लिए पुस्तक लिख कर और कोई समाचारपत्रों द्वारा रमणी समाज का विशेष उपकार कर रही हैं। अन्य स्त्रियां भी यदि इन्हीं की तरह काम करें तो स्त्री समाज की बहुत कुछ उन्नति हो सकती है।
केवल रमणियों के आपस में मिलने ही से सब कुछ नहीं हो सकता। इसके साथ ही साथ विद्या पढ़ने की भी आवश्यकता है। विद्यालय और पुस्तकालय खोलने ही पड़ेंगे। वर्तमान समय में पुरुष और स्त्री उभय वगों में केवल एक ही की शिक्षा होने से आपस में अन्तर पड़ रहा है। इस कारण से विद्वान् युवकगण स्त्रियों के साथ क्या राजनीति, क्या साहित्य, क्या विज्ञान; क्या धर्म और दैनिक सांसारिक कार्य किसी विषय में सम्मिलित नहीं होते। स्त्री और पुरुष में यदि एक सुशिक्षित और दूसरा अशिक्षित रहे तो उनमें एकता नहीं हो सकती, जहां पति और पत्नी के इच्छा में विरोध है, वहां सुख कहाँ? यह विषय क्या हमारे देश के पुरुषों के विचार करने के योग्य नहीं है? समाज के एक अङ्ग को अशिक्षा के गड्ढे से निकालना क्या पुरुषों का कर्तव्य नहीं है? मेरे मत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली स्त्री और पुरुष में भेद पैदा कर समाज में दुःख का परिमाण बढ़ा रही है। यदि दोनों अङ्गों को सुशिक्षा दी जाय तो दोनों ही उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो कर सुखी हो सकते हैं। वे केवल पवित्र भाव से गृहकार्य करने में यथाशक्ति परस्पर सहायता ही न देंगे परन्तु सर्व जाति के चरित्र गठन और उन्नति साधन में भी वे मिल कर परिश्रम करेंगे। सहस्त्रों वर्ष से जिन दो कुसंस्कारों और अनिष्टकारक देशाचारों ने इस देश पर अधिकार जमा लिया है उन सब के नाश करने के लिए स्त्री और पुरुष एक स्थान में बैठ कर उपाय सोचेंगे। इस प्रकार वे लोग अपने उच्च ज्ञान और संस्कार के प्रभाव से सारे समाज और परिवार का संशोधन कर सकेंगे।
देश के पुरुषगण! यदि आप रमणियों को मूर्खता के पंजे से छुड़ाना चाहते हैं, यदि आप उन्हें सभ्यता का शुभफल चखाना चाहते हैं तो अवश्य ही उनको सुशिक्षा देने का प्रबन्ध करिये। सुशिक्षा देने में उनको विजातीय भाव न सिखाइये। यदि स्त्रियों का गहना पहिनना, अङ्गरेज़ी भाषा में वार्तालाप करना, मातृभाषाघाती बनना, पियानो बजाना इत्यादि को आप सत् शिक्षा समझते हैं। तो आप पछतायेंगे। विजातीय अनुकरण से भारतीय ललनाओं को किसी प्रकार से सफलता प्राप्त न होगी। यदि आपको उन लोगों का दुःख दूर करना अभीष्ट है, यदि आप उनकी उन्नति चाहते हैं तो उन लोगों के मन को उन्नत और पवित्र करने का उपाय कीजिये। वस्त्र, भूषण, भोजन आदि वाह्य आडम्बर के विषय में उनको शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं है। उनको देशी भाषा में साहित्य, विज्ञान, धर्मनीति और धर्म के उन्नत भाव की शिक्षा दीजिये। इसी मार्ग पर चलने से उद्देश्य की सिद्धि हो सकती है अन्यथा नहीं।
विद्या
विद्या के बल से मनुष्य क्या नहीं कर रहे है! विद्या के कारण मानव सन्तान पृथ्वी के क्षुद्रतम प्रदेश स्थित भूपृष्ठ की सारी बातें जान कर ही सन्तुष्ट नहीं होती। विद्वान लोग भू मण्डल की आभ्यन्तरीण घटनाओं को देख कर चुप नहीं हैं। लाखों योजन की दूरी पर अवस्थित अनन्त आकाश का असंख्य नक्षत्र मण्डल उनका आलोच्य विषय है। वे पृथ्वी में रह कर असीम और जगत् के ग्रहोपग्रह-नक्षत्र तत्व को जान रहे हैं। छोटी-छोटी नक्षत्र मालाओं के सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन्तव्य पथ का वे आविष्कार कर रहे हैं। चन्द्र, सूर्य प्रभृति ज्योतिमण्डली की ग्रहण गणना कर वे पृथ्वी में आश्वर्य-वर्षा कर रहे हैं। कोई अनिर्दिष्ट दुर्लक्ष्य सौरजगत् को अपनी कक्षा में घुमाने की कल्पना कर रहे हैं। कोई अचला पृथ्वी की सचलता प्रतिपन्न कर रहे हैं-अन्यान्य ग्रह उपग्रहों का सूर्य की किरणों से प्रकाशित होना सिद्ध कर रहे हैं। इस प्रकार के अनेक अलौकिक तत्वों का आविष्कार विद्वान मनुष्य कर रहे हैं। बुद्धिमान मानव परिदृश्यमान इस विश्व के सूक्ष्मतम तत्वों की आलोचना करने मात्र से सन्तुष्ट नहीं है। नश्वर मानव का लक्ष्य, अदृश्य, अश्चिन्तनीय, अलक्ष्य अवाङ मनस-गोचर परमेश्वर का तत्व जानना है। संसार के दुरुच्छेद्य झंझटों को दूर कर निर्वाण मुक्ति की वे अभिलाषा करते हैं। इन सभी अलौकिक कार्यों का प्रवर्तक कौन है? अनन्त संसार सागर में मानव बुदबुद के समान उत्पन्न और विलीन हो रहे हैं। परन्तु बुदबुद के समान मानव संतति से जो सारवान और स्पृहणीय सिद्धान्त निकल रहे हैं उन्हें सहस्त्रों शताब्दियाँ मिटा नहीं सकेंगी। सर्वभक्षी काल का कराल मुंह उसको खा नहीं सकेगी। अतीत युग के मानवों की शुभकामना का फल वर्त्तमान युग के मानवगण भोग रहे हैं। फिर यह प्रश्न उठता है कि इन अलौकिक कार्यों का प्रवर्तक कौन है? इसका उत्तर है "विद्या"। विद्या अध्ययन से होने संस्कार के सिवा और कुछ नहीं है। मानव बाल्यकाल से जिस प्रकार की शिक्षा पाते हैं उनका संस्कार और उनकी रुचि भी उसी के समान होती है। रमणियों की शारीरिक और मानसिक कोमलता शिक्षा के लिए किसी प्रकार बाधक नहीं हो सकती वरन् कोमल अंतःकरण शिक्षा के लिए अधिक उपयोगी है। क्योंकि बालकों के कोमल हृदय में विद्या का बीज बड़ी जल्दी अंकुरित होता है। अतएव स्त्री जाति का कोमल अन्तःकरण विद्या सीखने के लिए समीचीन है। विद्या से स्त्रीगणों के दुर्वल हृदय में बल आ जाना युक्तियुक्त है। विद्या एक प्रकार की रक्षिका है। विद्या से बलवती होने पर स्त्रियां बड़ी सरलता के आत्मरक्षा कर सकती हैं। इसलिए मनु ने कहा है कि -
आत्मानमात्ममा यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षितः।।
जो रमणी अपनी स्वयं रक्षा कर सकती है वही सुरक्षिता है। स्त्री विदुषी होने पर इस श्लोक को सहज ही काम में ला सकती है। अविदुषियों के लिए यह कठिन काम है, इसमें सन्देह नहीं।
मनुष्य समाज का अर्ध स्थान स्त्री जाति से अधिकृत है। स्त्री शिक्षा अनुचित होने पर समाज के अर्द्धांश के साथ विद्या लोक का किसी प्रकार संपर्क नहीं रहता। सुमेरु और चन्द्रमण्डल की भांति मनुष्य समाज का एकार्द्ध उज्ज्वल आलोक से आलोकित और आपरार्द्ध सदा अंधतम साच्छन्न रहेगा। यह वास्तविक सूक्ष्म सिद्धान्त से ठीक हो सकता है पर मेरी स्थूल बुद्धि उसकी सत्यता पर अणुमात्र विश्वास करने को तैयार नहीं है। जो विद्या अन्न, वस्त्र से भी ज़रूरी और उपादेय है, स्त्री जाति उससे वंचित रहे, यह नैसर्गिक नियम नहीं हो सकता। पुरुष कठोर चिन्ता के प्रभाव से जितनी दूर अग्रसर होते हैं स्त्रियां उतनी दूर न जाने पर भी जो सिद्धान्त करती हैं, वह बड़ी जल्दी से करती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि स्त्रीगण सर्वदा भाव राज्य में विचरण करती हैं। पुरुषगण किसी सिद्धान्त में बहुत ही धीरगति से उपस्थित होते हैं। उन लोगों में व्यग्रता का भाव नाममात्र को है। वे लोग कठोर चिन्ता का अवलम्बन कर विषय की मीमांसा करते है। देश की भाषा न जानने पर स्त्रीगण अपरिज्ञात भाषा सुन कर जिस प्रकार वक्ता का मानसिक भाव समझ लेती है, पुरुषगण उस प्रकार नहीं समझ पाते। सारांश यह है कि स्त्रीगण की कल्पना शक्ति पुरुषों से अधिक है। सुतरां शिक्षा के ऊपर उन लोगों का जितना हक है पुरुषगणों का उतना नहीं। आजकल अर्थ के अभाव से सन्तति की विद्या, शिक्षा के लिए, उपयुक्त मास्टर रखना कठिन है। सुतरां इस अवस्था में यदि स्त्रियां शिक्षित होवें तो उन्हें शिक्षा के काम में लगाया जा सकता है।
मनुष्य के यौनावस्था में पैर रखने पर प्रखर ज्ञान के प्रभाव और स्वाभाविक, तेजस्विता के कारण विचार न कर अनेक समय सहसा इच्छा को काम में लाने का प्रयत्न करते हैं। उस अवस्था में पिता प्रभृति रूपी प्रकृति पुरुष के उपदेश उन लोगों के अहंकार स्फीत चित्त को वश में नहीं ला सकते, परन्तु माता यदि पुत्र से ज्ञान में उन्नत हो तो वह उस समय अपने स्वभाव सिद्ध आश्वर्यकारक वशीकरण गुण से सहज ही यौवन के औद्धत्य को दूर कर उनका यथार्थ ज्ञान मार्ग में ला सकती हैं। मातृहृदय का निष्कपट स्नेह और पवित्रता के साथ यदि उज्ज्वल ज्ञान का संयोग हो तो उस से सन्तान का बहुत कल्याण हो सकता है और शिशुकाल में जिस प्रकार माता के ऊपर लड़के की अंकपट श्रद्धा रहेगी उसके यौवन में भी माता की संमानना उतनी ही बढ़ जावेगी।
सामाजिक हित के लिए रमणियों का साथ देना संसार में नई बात नहीं है। पुरातत्व के अनुसन्धान करने पर हम लोगों को बहुतेरे दृष्टांत मिलते हैं। रामायण और महाभारत में सीता और द्रोपदी के वृत्तान्त कौन नहीं जानता। वे कार्यक्षेत्र में स्वामी की परामर्शदात्री थीं और उनके साथ बन में जाते भी भीति न हुई। जिस देश में पर्दा का कठिन नियम है उसमें भी इस प्रकार के उदाहरण हम लोगों को बहुत से मिलते हैं। पुराकाल में अरब देश में मुसलमान रमणी गण को पुरुष के साथ विद्या शिक्षा में समान अधिकार था। मुहम्मद की अन्तःपुरचारिणी महिला आलस्य से काल नहीं बिताती थी। उनकी प्रथम स्त्री खादिजा अन्यून 25 वर्ष तक उनके दुःख और सुख को समभागिनी थीं। प्रथम स्त्री के मरने के बाद मुहम्मद की युवती स्त्री आयशा ऊंट की लड़ाई में स्वयं निष्काषित तलवार हाथ में लेकर सैन्य संचालन करती थी। उनकी कन्या "फातिमा" राजनैतिक विचार में सर्वोच स्थान पर अधिकार किये थी। उनकी पोती पारिवारिक और सामाजिक कार्य में विशेष क्षमता रखती थी। मुहम्मद ने रमाणीगणो को आलस्य में काल बिताने का किसी प्रकार का नियम नहीं रखा था। मुसलमान स्त्रियां एक समय राजा, शिक्षक और धर्मवक्ता थीं। सुलतान बयाजिद के राजत्व काल में ललनाएं मसजिदों में धर्म पर वक्तृता देती थीं। आधुनिक समय में हम लोग देखते हैं कि फिनलैंड, प्रभृति देशों में स्त्रियों का आदर अधिक है। फिनलैंड में स्त्रियों को वोट देने का अधिकार है। वे पार्लियामेंट की सदस्या बन सकती हैं। नार्वे में जिन महिलाओं को म्युनिसिपिल कार्य में वोट देने का अधिकार है, वे पार्लियामेंट में भी वोट दे सकती हैं। कहां तक कहें, असभ्य रूस देश में भी रमणीगणों का अधिकार पुरुषों के समान ही है। विलायत में रमणीगणों की उन्नति किस प्रकार हुई है उसकी आलोचना भी समयानुकूल है। 1870 ई० में विवाहिता रमणीगणों की सम्पत्ति का आईन पास हुआ। इससे विवाहिता ललनाओं को सम्पत्ति खरीदने बेचने का अधिकार मिल गया। 1864 ई० में शिक्षिता स्त्रियों को District Council, Boards of Guardians, Loudon County Council और Parish Council की सदस्या बनने का अधिकार मिला। 1607 ई० में महिलाओं को Alderman और Mayor का पद प्राप्त करने का अधिकार दिया गया। केवल विचार के आसन पर बैठने का अधिकार वहां स्त्रियों को अप्राप्य है। परन्तु अमेरिका, नार्वे और फिनलैण्ड में यह अधिकार भी रमणियों को प्राप्त है। यूरोप में स्त्रियों की संख्या अधिक होने से और सामाजिक अवस्था भारतवर्ष से सम्पूर्ण स्वतन्त्र होने के कारण रमणियों का जीविकार्जन का रास्ता न खोलने से यूरोपीय समाज में एक बड़ी गड़बड़ पैदा हो जाती। भारत में रमणी गण समय पर विवाहिता होने से उन लोगों के भरण पोषण का भार पुरुषों के ऊपर आ जाता है, सुतरां जीवन संग्राम में भारतीय पुरुषों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यूरोपीय सामाजिक प्रथा में ज़्यादातर स्त्रियों के भाग में शादी नहीं होती है, सुतरां अपने पोषण के लिए रमणीगणों को स्वयं मेहनत करनी पड़ती है। इसलिए रुपया पैदा करने के लिए नए नए ढंगो का आविष्कार यूरोप में होता रहता है। भारत में मध्यवित्त के आदमी की सामाजिक अवस्था अति सोचनीय है। पुरुष गण दफ्तर में बाबूगीरी के सिवाय और किसी काम के लिए अनुपयोगी सिद्ध होते हैं। इसलिए द्रव्योपार्जन कम होता है परन्तु खर्चा दिन दिन बढ़ रहा है। रुपया पैदा करने की कोशिश मर्दों में है ही नहीं। पुरुष रमणीगणों को शिक्षा नहीं देते सुतरां उनके पश्चात् स्त्रियों को बड़ा ही कष्ट उठाना पड़ता है। विधवा स्त्रियों को किस प्रकार कठिन कष्ट भोगने पड़ते है उसका वर्णन साध्य नहीं है। स्वामी की मृत्यु के बाद देवर प्रभृति आत्माओं की कोशिश यह होती है कि किस प्रकार विधवा को ठगें। जिस समय विधवा का धन उन लोगों को प्राप्त हो जाता है उस समय से उसकी अवस्था मज़दूरिन से अच्छी नहीं रह जाती। साधारणतः विधवा के भाग्य में निर्यातन की कोई बात ही नहीं। यह तो होता ही है। इस निर्यातन के सबब से बहुत सी विधवाएं असत्पथ का अवलम्बन करती हैं। क्षुधा से बढ़ कर दुःखदायी पदार्थ पृथ्वी में और कोई नहीं है। भूख क्या नहीं कराती। बाल्यकाल से बालिका गणों को विद्या न सिखाने से विधवा होने पर वे लड़का पढ़ा कर अपनी उदरपूर्ति नहीं कर सकती। देश के पुरुष स्वदेशी वस्त्र या शिल्प के पक्षपाती नहीं हैं। सुतरां विधवाएं कपड़ा तैयार कर अथवा शिल्प द्वारा जीविका निर्वाह नहीं कर सकतीं। विधवा होने पर पितृगृह अथवा श्वसुर गृह में उनको स्थान नहीं। क्या इस प्रकार की अवस्था में रमणीगणों का प्रलोभन में आ जाना आश्चर्य की बात है? पुरुषगण अपनी प्रकट बुद्धि के सबब से रमणीगणों की जीविका का रास्ता नहीं खोजना चाहते किन्तु वे साथ ही चाहते हैं कि स्त्रियां आदर्श रमणी हो जाएं। कैसे आश्चर्य की बात है।
पुरुषगण! तुम लोग रमणी गणों की सामाजिक अवस्था को क्या समझ नहीं पाते हो। कितने दिन और आंखों में पट्टी बाँध कर बैठे रहोगे! तुम्हारी सामाजिक प्रथा तुम्हारे कर्मों का फल है। जब तक सामाजिक सुधार नहीं करोगे तब तक अपनी माता, स्त्री, बहन और कन्या की दशा क्या होगी यह सोचने से भी हृदय कांप उठता है। यदि रमणीगणों की उन्नति चाहते हो तो रमणीगणों का किया हुआ सिलाई का काम आपस में खरीदने का यत्न करो, विलायती चीज़ों की तरफ न दौड़ो। इसमें तुम्हारे परिवार का ही भला है। हर गांव में, हर शहर में नारीशिल्प प्रदर्शिनी आगार बनाया जाय। वहां नारीगणों का बनाया हुआ शिल्प रखा और बिक्री किया जाये। स्वदेशजात शिल्प का जिसमें आदर वैसे काम करो। रमणीगणों के शिल्प की विक्री के लिए एक दलाल रखो जिसको फी सैकड़ा चार या पांच रुपया कमीशन दिया जाय। ऐसा करने से रमणीगणों की उदरपूर्ति का एक रास्ता खुल जाएगा। रमणी गणों के लिए और एक रास्ता खुला हुआ है। यह पेशा डॉक्टरी का है। रमणी की चिकित्सा रमणी से ही होनी चाहिये। इस ओर रमणीगणों की दृष्टि आकर्षित होनी चाहिये। यह सब बातें केवल पुरुषों की सहायता से ही हो सकती हैं। उन लोगों के मदद न करने से रमणियों की उन्नति की आशा केवल दुराशा मात्र है। मेरी परमेश्वर से यही अन्तिम प्रार्थना है कि वे पुरुषों को सुबुद्धि दें।


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