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राजेन्द्र कुमार की कविताई पर पंकज पराशर का आलेख 'सघन तम की आँख एक लघु जीवन में'।

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  राजेन्द्र कुमार   आज बिरले ही ऐसे कवि हैं जो बिना किसी शोरोगुल के अपना लेखन प्रतिबद्धता के साथ कर रहे हैं। अब जबकि सच बोलना दूभर हो गया है , बिरले कवि सच के ध्वज को आज भी उठाए हुए हैं। ऐसे ही बिरल कवि हैं प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार। एक बेहतरीन आलोचक होने के साथ साथ वे एक उम्दा कवि हैं। इधर कुछ उम्दा ग़ज़लें भी उन्होंने लिखी हैं। राजेन्द्र कुमार की   कविताई पर विस्तार से रोशनी डाली है युवा कवि आलोचक पंकज पराशर ने। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं पंकज पराशर का आलेख ' सघन तम की आँख एक लघु जीवन में ' ।   सघन तम की आँख लघु एक जीवन में   (संदर्भः राजेन्द्र कुमार की कविताएँ)     पंकज पराशर       कविता में अनुभूति की शुद्धता, भाषिक और अभिव्यक्तिगत वैभिन्य, गहरी संवेदनशीलता और सामाजिक दायित्व-बोध की जब एक साथ हिंदी काव्य-आलोचना में ज़रूरत महसूस की जाएगी, तो शुद्ध कविता के विशुद्ध रचयिताओं की शायद उतनी याद नहीं आएगी, जितनी आलोचना और कविता दोनों को अपना रचना-कर्म बनाने वाले कवियों की। वह चाहे अँगरेज़ी साहित्य के मैथ्यू आर्न...