प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की फिल्म समीक्षा “मैं वापस आऊँगा : विभाजन की स्मृति, प्रेम की प्रतीक्षा”
संचार के सशक्त माध्यम के रूप में सिनेमा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दुनिया भर में जनमानस को प्रभावित करने में फिल्मों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। भारतीय सन्दर्भ में फिल्मों के प्रति लोगों की दीवानगी कुछ अधिक ही रही है जिसकी तस्दीक सिनेमा से जुड़े अभिनेताओं, निर्माता निर्देशकों, गायक गायिकाओं की लोकप्रियता से की जा सकती है। लेकिन इसका एक दूसरा भी पक्ष है जो चिंताजनक है। आजकल बदले हुए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में हमारे यहाँ ऐसी प्रोपेगेंडा फिल्में बनाई जा रही हैं जो तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का काम कर रही हैं। इन फिल्मों का निशाना एक खास वर्ग ही होता है। इन्हीं परिस्मेंथितियों में एक ऐसी फिल्म आई है जिससे कुछ उम्मीदें की जा सकती हैं। यह फिल्म है 'मैं वापस आऊँगा'। कवि प्रकर्ष विपुल इस फिल्म की समीक्षा करते हुए लिखते हैं 'पिछले कुछ सालों में इन प्रोपेगंडा फ़िल्मों द्वारा हिंदी सिनेमा के उजले दामन पर जो गहरे दाग छोड़े गए हैं यह फ़िल्म उनको भी साफ़ करने का जिम्मा उठाती है। जब हम पाते हैं कि विभाजन विभीषिका दिवस के बहाने उन ज़ख़्मों को फिर से कुरेदने के लिये योजनाबद्ध तरीक़े से काम हो रहा है उस समय में यह फ़िल्म विभाजन की त्रासदी को एक प्रेम कहानी के बहाने इतने धीमे लेकिन सशक्त स्वर में कहती है कि दर्शक प्रेम के उस प्रवाह में बहने लगता है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रकर्ष मालवीय 'विपुल' की फिल्म समीक्षा “मैं वापस आऊँगा : विभाजन की स्मृति, प्रेम की प्रतीक्षा”।
“मैं वापस आऊँगा : विभाजन की स्मृति, प्रेम की प्रतीक्षा”
विपुल प्रकर्ष
“ये कौन लोग हैं जो आ गए हैं, अब तक तो नहीं दिखाई देते थे। कहाँ से आ गए हैं?” ये वह संवाद है जो एक प्रेमिका अपने प्रेमी से कहती है ये जानते हुए कि अगर समाज सांप्रदायिक ना भी हुआ हो तब भी अलग अलग धर्मों का होने के कारण उनका मिलन कितना मुश्किल है और फिर ये समय तो अंधेरे का समय है। जब देश बँटवारे की आग में जलने को है और सांप्रदायिकता का ज़हर धीरे धीरे समाज पर अपना असर छोड़ने लगा है। ये साधारण सा लगने वाला संवाद जैसे हमारे अपने समय का आधारवाक्य हो गया है। “वो” लोग जो उस समय समाज में विभाजन के बीज बो रहे थे, वे आज कहीं अधिक संगठित और प्रभावशाली दिखाई देते हैं। वे जानते हैं कि विभाजन केवल भूगोल का नहीं होता; उसकी सबसे गहरी रेखाएँ मनुष्य के मन और स्मृति पर खिंचती हैं। यदि दीवारें सिर्फ़ धरती पर उठें तो वह विभाजन नहीं हुआ, विभाजन तब पूरा होता है जब वे दीवारें दिलों, रिश्तों और आपसी विश्वास के बीच खड़ी हो जाती हैं। लेकिन ये विभाजन का सिर्फ़ एक पहलू है जो इसका राजनीतिक पक्ष दिखाता है लेकिन विभाजन का दूसरा पक्ष होता है मानवीय पक्ष जिसमें मानवीय भावनाएँ वो ज़ख़्म झेलती हैं जिन्हें वक़्त का मलहम भी ठीक नहीं कर पाता। मानवीय मूल्यों का जो ह्रास होता है उसे लंबे समय तक दोबारा हासिल नहीं किया जा पाता। इम्तियाज़ अली की ये फ़िल्म उन्हीं लोगों और उन्हीं ज़ख़्मों की बात करती है।
वैसे तो विभाजन पर साहित्य में खूब लिखा गया है। कहानीकारों और उपन्यासकारों ने विभाजन की त्रासदी को उकेरती कई उत्कृष्ट कृतियाँ हिंदी समाज को दी हैं जिनमें झूठा सच, तमस, पिंजर, कितने पाकिस्तान जैसी कालजयी रचनाएँ शामिल हैं। ये फ़िल्म भी उन्हीं कृतियों की तरह उन ज़ख़्मों को कुरेदने के बजाय सहानुभूति का मलहम लगाती है। इस फ़िल्म को देखते हुए लगता है जैसे कोई उपन्यास पढ़ रहे हों और फ़िल्म ख़त्म होने पर आप उसी तरह कुछ देर शांत हो जाते हैं जैसे किसी अच्छी किताब को पूरी करने के बाद।
पिछले कुछ समय में विभाजन फिल्मकारों का प्रिय विषय हुआ है क्योंकि यह सांप्रदायिक विद्वेष के एजेंडे को बढ़ाने का भी सबसे आसान टूल है। लेकिन यह फ़िल्म सिर्फ इसलिए हमारा ध्यान आकर्षित करती है और इस बात के लिए फ़िल्मकार की तारीफ़ की जानी चाहिये कि यह विभाजन में अंतर्निहित सांप्रदायिक विद्वेष के बरक्स एक प्रतिरोध खड़ा करती है और एक ख़ूबसूरत प्रेम कहानी के बहाने उस त्रासदी को चित्रित करती है।
अपने समय में जब धुरंधर, कश्मीर फाइल्स, केरल फाइल्स इत्यादि जैसी प्रोपेगंडा फ़िल्मों की बाढ़ आई हुई हो या कबीर सिंह, एनिमल इत्यादि जैसी फ़िल्में बन रही हों जो घोषित रूप से हिंसक पुरुषवादी एजेंडे को सुदृढ़ करने और बढ़ावा देने का काम करती हों और बॉक्स ऑफिस पर भी खूब सफलता हासिल कर रही हों उस दौर में कोई निर्माता “मैं वापस आऊँगा” जैसी फ़िल्म को बनाने का जोखिम उठाता है तो ये पहलकदमी ही इस समय संतोष की बात है। पिछले कुछ सालों में इन प्रोपेगंडा फ़िल्मों द्वारा हिंदी सिनेमा के उजले दामन पर जो गहरे दाग छोड़े गए हैं यह फ़िल्म उनको भी साफ़ करने का जिम्मा उठाती है। जब हम पाते हैं कि विभाजन विभीषिका दिवस के बहाने उन ज़ख़्मों को फिर से कुरेदने के लिये योजनाबद्ध तरीक़े से काम हो रहा है उस समय में यह फ़िल्म विभाजन की त्रासदी को एक प्रेम कहानी के बहाने इतने धीमे लेकिन सशक्त स्वर में कहती है कि दर्शक प्रेम के उस प्रवाह में बहने लगता है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आज जब मानव स्मृति पर सबसे अधिक हमले हो रहे हैं. एक पूरा इकोसिस्टम काम कर रहा है कि किस तरह मनुष्य को उसकी सामूहिक चेतना से विमुख किया जाय और मानव समाज को स्मृति लोप और एलीनेशन के गहरे अंधकार में ढकेल दिया जाय। उस वक़्त में कोई फ़िल्मकार कहानी कहने के लिए स्मृतिभ्रंश के बिम्ब का ही उपयोग कर रहा है ये बात फ़िल्म के पक्ष में एक मज़बूत दलील देती है। फ़िल्म में डिमेंशिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि स्मृति के संकट का रूपक बन जाता है। ऐसे समय में जब समाज को उसकी सामूहिक स्मृतियों से काटने की कोशिशें तेज़ हैं, फ़िल्मकार का इस बिम्ब का चयन अर्थपूर्ण और विचारोत्तेजक है।
एक ऐसे समय में जब प्रतिबद्धताओं, वचनों, शपथों और वादों की दुर्गति होती हुई दिखती हो और वे अपना नैतिक प्रभाव खो चुके हों, यह बात कितनी अजीब लगती है कि इस फ़िल्म का मुख्य किरदार अठहत्तर साल पहले अपनी प्रेमिका से किए हुए एक वादे को पूरा करना चाहता है। पंचानबे वर्ष की अवस्था में उसका शरीर जीवन का बोझ और ढोने को तैयार नहीं है लेकिन उसकी आत्मा, उसकी चेतना, उसका मन उस वादे के पूरा हुए बग़ैर शरीर छोड़ने को तैयार नहीं जो उसने सालों पहले अपनी प्रेमिका से किया था और यह कितनी सुंदर बात है कि इस दशा में उसका पोता अपने दादा की मदद करना चाहता है। वह अपने दादा की इस अधूरी इच्छा को पूरी करने के लिए उस जगह की यात्रा करता है जहाँ उसके दादा के प्राण बसे हैं। बंटवारे के समय जहाँ उसने अपनी ज़िंदगी, अपना मन छोड़ दिया था और सिर्फ़ अपना शरीर ले कर सरहद पार की थी इस वादे के साथ कि “मैं वापस आऊँगा”। फ़िल्म के अंत में डिमेंशिया से पीड़ित एक बुजुर्ग का अपनी प्रेमिका से यह कहते हुए इजाज़त लेना कि बंटवारे के समय अपना वतन छोड़ते हुए तो वह उससे इजाज़त नहीं ले पाया था लेकिन अब शरीर छोड़ने के लिए लेना चाहता है वाक़ई दर्शक के अंतर्मन को छू लेता है। यहाँ यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि यही कथा किसी स्त्री की होती जो अपने प्रेमी से किए वादे को पूरा किए बग़ैर अपना शरीर नहीं छोड़ना चाहती तो भी क्या उसका परिवार, समाज और स्वयं फ़िल्मकार उसे इसी सहानुभूति के साथ देखते? यह प्रश्न फ़िल्म की सीमा नहीं, बल्कि हमारे समाज की लैंगिक संरचना की ओर संकेत करता है। ख़ैर, नसीर साहब ने अपने अभिनय से ईशर सिंह उर्फ कीनू के इस किरदार को अमर कर दिया है। हिंदी सिनेमा के फलक पर यह किरदार नसीर साहब की वजह से लंबे समय तक याद किया जाएगा। यदि नसीर साहब ने पंचानवे बरस के ईशर सिंह को अमर बना दिया तो कीनू के जवानी के किरदार को वेदांग रैना ने भी बखूबी निभाया है। दूसरी तरफ शर्वरी कमसिन युवती के किरदार में खूबसूरत लगती हैं। दिलजीत दोसांझ की उपस्थिति फ़िल्म को और सशक्त करती है। वे ना सिर्फ़ उत्कृष्ट अभिनेता हैं बल्कि बेहतरीन गायक भी हैं। ए. आर. रहमान का संगीत हमेशा की तरह देर तक मन में जगह बनाने वाला और ज़ुबान पर चढ़ जाने वाला है।
इस फ़िल्म के कमज़ोर पक्षों और कमियों पर भी लंबी चौड़ी बातें लिखी जा सकती हैं लेकिन इस समय जब समाज में नफ़रत का बोलबाला है उस समय किसी लंबी प्रेम कविता की तरह इस फ़िल्म का होना ही आश्वस्ति है उम्मीद के बचे रहने की। यह कहा जा सकता है कि इस फ़िल्मकार ने भी सांप्रदायिक उन्माद के चित्रण के लिए भी उसी तरह के बर्बर दृश्यों का प्रयोग किया है जैसा प्रोपेगंडा फ़िल्में करती हैं और एक समुदाय अधिक सांप्रदायिक दिखाई पड़ता है. यह फिल्मांकन के कमज़ोर पक्ष हैं लेकिन फिर भी वे दृश्य दर्शक के अंदर किसी ख़ास समुदाय के प्रति ईर्ष्या और घृणा पैदा नहीं करते। बल्कि उन्मादियों और दंगाइयों के संप्रदाय से ताल्लुक रखने वाला एक व्यक्ति जब दूसरे समुदाय की औरतों की रक्षा करते हुए अपने स्वयं के परिजनों को खो देता है और अपने ही समुदाय के द्वारा ग़द्दार घोषित कर दिया जाता है तो फिर दर्शक अपने समय के उन लोगों के बारे में सोचने को बरबस विवश हो जाता है जिन्हें न्याय के पक्ष में खड़ा होने और बोलने, दूसरे समुदाय से घृणा ना करने के लिए गद्दार, एंटी नेशनल इत्यादि घोषित कर दिया जाता है। फिर उसी व्यक्ति द्वारा इन दंगाइयों के नेतृत्वकर्ता को मारने का दृश्य फिल्मकार द्वारा न्याय के पक्ष में दिया गया स्पष्ट बयान है। फिर भी फिल्मकार को ऐसे हिंसक दृश्यों के फिल्मांकन से बचना चाहिए था।
यह भी कहा जा सकता है कि फ़िल्म के समाप्त होने के बाद दिलजीत दोसाँझ पर फ़िल्माया गया उनकी ही आवाज़ में एक गीत “क्या कमाल है” में दुनिया भर के विस्थापितों, रिफ्यूजियों, युद्ध पीड़ितों के जो दृश्य और विज़ुअल्स दिखाए गए हैं वो ग़ैरज़रूरी हैं। लेकिन दरअसल फ़िल्मकार उनके माध्यम से फ़िल्म के बाद एक सशक्त संदेश देना चाहता है कि उसने मानव इतिहास की एक त्रासदी के एक किरदार पर केंद्रित एक कहानी यहाँ कही है जबकि दुनिया में आज भी ना जाने इस तरह की कितनी त्रासदियाँ पैदा हो रही हैं और उनको झेलने वाले लाखों करोड़ों लोग अपनी त्रासद कहानी ले कर हमसे रूबरू हैं. क्या हम इन कहानियों को सुन रहे हैं?
अंत में बस इतना कहा जाना चाहिये कि इम्तियाज़ अली की यह फ़िल्म सिर्फ एक फ़िल्म नहीं है बल्कि एक पुकार है, एक आह्वान है। प्रेम, स्मृति और मनुष्यता के पक्ष में दिया गया एक सिनेमाई वक्तव्य है। यह हमें याद दिलाती है कि इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों के बीच भी मनुष्य को बचाए रखने वाली शक्ति प्रेम ही है।”
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| प्रकर्ष विपुल |
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मोबाइल : 9389352502


बेबाक। प्रकर्ष जी ने बहुत सटीक समीक्षा की है। आ. जी ने जो एक प्रश्न उठाया है कि जैसे इस फिल्म में पुरुष के प्रेम को दर्शाया गया है अगर उस जगह स्त्री रहती तो क्या यह समाज उसे स्वीकारता? यह फिल्म सराही जाती ? जाहिर सी बात है कि नहीं
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