परांस - 12 : निदा नवाज़ की कविताएं
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| कमल जीत चौधरी |
संघर्ष मनुष्य की मूल प्रवृत्ति रही है। मनुष्य के विकास में इस संघर्ष की एक बड़ी भूमिका है। आधुनिकता के बावजूद मनुष्य का संघर्ष आज भी थमा नहीं है। यानी कि संघर्ष के चलते ही मनुष्य की सर्वोच्चता कायम है। संघर्ष के इस क्रम में मनुष्य को तमाम दुःखों और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कहना न होगा कि संघर्ष और दुःख ने मनुष्य को कहीं अधिक मजबूत बनाया है। वह दुःख से भागता नहीं बल्कि दुख का डंट कर सामना करता है और एक दिन ऐसा आता है जब दुःख उसकी जीवनचर्या में शामिल हो कर स्वयं उसके अन्य दुःखों का नाशक बन जाता है। निदा नवाज़ हमारे समय के चर्चित कवि है अपनी कविता 'मूर्ति' में लिखते हैं : "मैं दुःखों की छैनी से/ तराशता हूँ/ अपनी जीवन शिला/ और एक दिन/ खड़ी हो जाती है/ मेरे समक्ष/ स्वयं मेरी मूर्ति/ दुःखों की नाशक बन कर।" इस छोटी कविता में मनुष्य की जैसे पूरी संघर्ष गाथा छिपी हुई है। आज परांस के हमारे कई कवि निदा नवाज़ हैं।
अप्रैल 2025 से कवि कमल जीत चौधरी जम्मू कश्मीर के कवियों को सामने लाने का दायित्व संभाल रहे हैं। इस शृंखला को उन्होंने जम्मू अंचल का एक प्यारा सा नाम दिया है 'परांस'। परांस को पहले हम हर महीने के तीसरे रविवार को प्रस्तुत करते थे। अपरिहार्य कारणों से दिसम्बर महीने से यह कॉलम चौथे रविवार को प्रस्तुत किया जाने लगा है। इस कॉलम के अन्तर्गत अभी तक हम अमिता मेहता, कुमार कृष्ण शर्मा, विकास डोगरा, अदिति शर्मा, सुधीर महाजन, दीपक, शाश्विता, महाराज कृष्ण संतोषी, मनोज शर्मा, कुंवर शक्ति सिंह और शेख मोहम्मद कल्याण की कविताएं प्रस्तुत कर चुके हैं। इस क्रम में आज हम बारहवें कवि निदा नवाज़ की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अन्तर्गत कवि की कविताओं पर कमल जीत चौधरी ने एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं निदा नवाज़ की कविताएं।
परांस - 12:
'इस हांक को सुना जाना चाहिए'
कमल जीत चौधरी
'बर्फ़ के घरों में रहते थे
वे लोग।
ठंडक बसती थी
उनकी सभ्यता में।
बर्फ़ के सपने उगते थे
उनकी आँखों में।
आज पहली बार वे
घर लाए थे
आग।
इतिहास में केवल इतना ही लिखा है।'
(बर्फ़ और आग)
यह कौन-सा इतिहास है? निःसंदेह, यह वह इतिहास है, जो सत-साहित्य में निहित है। तथाकथित इतिहास में इतिहास भी नहीं होता, साहित्य के होने का तो अर्थ ही नहीं। ऐसे में कवि-कलाकारों का सृजन, उनकी संवेदना के दायित्व बढ़ जाते हैं। उनकी अधूरी बातें, हमें पूरे तक जाने के लिए प्रेरित करती हैं। इस कविता की अंतिम पंक्ति में, विशेष समय-स्थान दर्ज़ है। यह जलता हुआ कश्मीर है। पूरी दुनिया इसे जानती है, और ज़रा-सा भी नहीं जानती। यह कविता कश्मीर-सरीखी हर जगह का प्रतिनिधित्व करती है। 'इतिहास में केवल इतना ही लिखा है', इस पंक्ति में एक चुप है। एक संकेत है। अधूरा। इस पँक्ति में कौन सी आग बताई गई है? यह आग क्रांति और भूख की तो कतई नहीं है। यह आग चूल्हे और मशाल के लिए नहीं लाई गई। यह सुन्दरता नष्ट करने और घर जलाने के लिए लाई गई। लाई नहीं गई, बल्कि थमाई गई है। इस आग का इतिहास बहुत लम्बा है। यह किसी विशेष धर्म, समुदाय, देश, प्रांत, भाषा, संस्कृति को राख करने के लिए लगवाई या लगाई जाती रही है। यह कार्य अब भी जारी है। कश्मीर के युवाओं को यह आग 1989 के आस-पास दी गई। उसके बाद हम सभी इस आग में झुलस रहे हैं। उपरोक्त कविता; निदा नवाज़ के लेखन का सन्धि-स्थल है। यह ऐसा प्रवेश-द्वार है, जहाँ से इनके लेखन के पूर्ववर्ती और उत्तरकालीन दरवाज़े अन्दर से खोले जा सकते हैं। यह कविता; हमें विश्व-कविता तक ले जाती है। निदा का लेखन; विश्व-नागरिक होने के पक्ष में है। वे मानवता के पक्षधर हैं। इनकी कविताई आतंकवाद, सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता को कटघरे में खड़ा करती है। यह सत्तारुढ़ों की क्रूरता को भी रेखांकित करती है। परांस के इस कवि ने कश्मीर को उजाड़ दिए जाने के हृदयविदारक दुःख को अभिव्यक्त किया है। मेरी उनसे पहली मुलाकात, जम्मू-विश्वविद्यालय में स्थित रैना कैंटीन के बाहर हुई थी। शायद 2010 में। अग्रज शेख़ मो. कल्याण जी ने इन्हें मेरा परिचय दिया। वे बहुत ठंडे मन से मुझसे मिले। उसी शाम मुझे प्रिय अग्रज मनोज शर्मा जी ने निदा और कल्याण समेत मिलने का न्योता दिया। हम मिले। बातें शुरू हुईं। मनोज भाई के कहने पर मैंने कुछ कविताएँ सुनाईं। उन्होंने कहा : निदा भाई, यह कमल जीत चौधरी हैं। साम्बा में रहते हैं। इतना सुन कर निदा बोले: 'यह आग और नज़र बची रहे। दिन में मैंने इन्हें प्रोफेसर ही समझा था, क्षमा!' वे जो कहना चाहते थे, वह समस्या उत्तरोत्तर बढ़ती गई। प्रोफेसर होना बुरी बात नहीं है, बशर्ते पहले सुन्दर शिक्षक हुआ जाए। और प्रोफेसर टाइप कवि होना; विद्यार्थियों, श्रोताओं/पाठकों और स्वयं शिक्षक के लिए श्रेयस्कर नहीं है। निदा के तीनों कविता संग्रह पढ़कर; और इससे इतर इनसे हुई मुलाकातों से; इनकी लेखनी पर कुछ कह सकता हूँ:
1- इनका लेखन; एक लोकतांत्रिक-सचेत नागरिक का लेखन है। वे कवि टाइप नागरिक नहीं, बल्कि नागरिक टाइप कवि हैं।
2- निदा नवाज़ एक कश्मीरी (मुस्लिम) कवि हैं। एक समय तक हिन्दी कविता की दुनिया में इस होने को टैग की तरह इस्तेमाल किया जा सकता था। मगर इन्होंने ऐसा नहीं किया। कोई बड़ा तथाकथित सरकारी-ग़ैर सरकारी पुरस्कार-सम्मान इन्हें नहीं मिला है। इन्होंने प्रायः सत्ता प्रतिष्ठानों से दूरी बना कर रखी।
3- इन्होंने कश्मीर में रह कर लिखा है, और अब भी लिख रहे हैं। इन्होंने प्रतिकूलता में लिखा है। वे आपदा में अवसर के कवि नहीं हैं। इनका लेखन अनुभवजन्य है। इनकी कविताओं में आतंकवाद, इस्लामिक धार्मिक कट्टरता, शासन की क्रूरता, देश-दुनिया में दक्षिणपंथी उभार और जनतांत्रिक-अधिकारों-मूल्यों के विघटन की सूचनाएँ व विवरण मौजूद हैं।
4- इन्होंने आतंकवाद, ईश्वर, धर्म, राजनीतिक सत्ताओं, बेलगाम वर्दी, फ़ासीवाद, कठमुल्लाओं और हिन्दू दक्षिणपंथियों की परस्परता का पर्दाफाश किया है, और इन सभी की क्रूरता और ज़ुल्म पर लिखते हुए, इन्होंने प्रबल प्रतिरोध और प्यार को चुना और रचा है।
5- इनकी कविताएँ दरअसल एक वृत्तचित्र कही जा सकती हैं। यह वृत्तचित्र कश्मीर को हर उस कोण से बयान करता है, जहाँ-जहाँ तथाकथित मीडिया, इतिहासकार, राजनेता कर्तव्यच्युत होते हैं। यहाँ अभिनय नहीं, ब्यौरे हैं। कल्पना कम और यथार्थ बहुत है। इनके कहन में एक दु:खद तब्सिरा है।
6- इनके कविता संग्रहों के शीर्षक भी जम्मू-कश्मीर की वृत्तियों और परिवेश को रेखांकित करते हैं। यह चौंकाने के लिए नहीं हैं। इन नामों से कश्मीर का पता चलता है। इससे हिन्दी के उन कवियों को सीखना चाहिए जिनकी किताबों के नाम न्यायसंगत नहीं हैं।
7- निदा नवाज़ के यहाँ भाव, विचार, कहन, कल्पना; सभी कुछ आमफ़हम है। इस आम कवि की किताबों को बड़े दिल वालों की अपेक्षा है। यह बड़े दिल; फ़िलहाल अपने छोटेपन में अपनी ही तरह के बड़े-बड़े लोगों पर बात करने में व्यस्त हैं।
8- इनकी कविताई में कश्मीरियत से अगाध जुड़ाव दिखता है। यहाँ नुन्द ऋषि, लल्लेश्वरी, वितस्ता, शंकराचार्य, हरि पर्वत, क्राल गुफ़ा, वितस्ता की छवियाँ हैं। निदा नवाज़ कश्मीरी संस्कृति और इसकी ज्ञान परम्परा के उदात्त के मुरीद हैं, और इन्हें नष्ट करने वालों को निशाने पर लेते हैं।
9- निदा का लेखन पहचान के संकट को रेखांकित करता है। यह विस्थापित-निर्वासित बना दिए गए कश्मीरी हिन्दुओं के बिना, घाटी को अधूरा समझता है। इस कविताई में जा चुके, और जा रहे को वापस पुकारने की करुण पुकार है। इस हांक को सुना जाना चाहिए।
10- इनकी कविताई; कवि-दायित्व के उचित निर्वाह का सशक्त उदाहरण है। इनकी कविताएँ; स्थानीय रोज़मर्रा-जीवन से ले कर, दुनिया की उन दुःखद जगहों तक ले जाती हैं, जहाँ पूंजीवादी शोषक और धार्मिक क्रूरताएँ मानवता का गला रेत रही हैं।
इन बिंदुओं को यथातथ्य या अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिए; आलोच्य कवि की कविताएँ पढ़ना ज़रूरी है। हिन्दी कविता में निदा नवाज़ अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने कश्मीरी-आतंकवाद पर सबसे पहले, और पूरे साहस से लिखा है। इनकी कविताई; हिन्दी कविता में नया जोड़ती हैं। मेरे जानने में इनसे पहले किसी अन्य हिन्दी कवि ने कश्मीर में व्याप्त इस्लामिक कट्टरता की शिनाख़्त व तस्दीक़ नहीं की है। निदा जिस धर्म से आते हैं, वे इसकी सीमाओं, पाखण्ड और कट्टरता पर भी लिखते हैं। यह होना भी चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सरंक्षण हेतु धर्म के राजनीतिकरण को रोकना आवश्यक है। हमें अपने-अपने धार्मिक अंधविश्वासों पर चोट करनी ही चाहिए। आत्ममंथन करना चाहिए। निदा ने बचने के इरादों से नहीं लिखा है। डर न हो तो क्या हो? जो ग़लत रास्तों पर हैं, वे निडर हैं। यह निर्भयता इन्हें कहाँ से मिलती हैं? पैसे और ताकत से मिलती है, और धर्म और झूठे स्वर्ग-जन्नत का नशा इनसे कुछ भी करवा सकता है। दूसरी ओर इस क्रूर निडरता के सामने अभय कैसे हुआ जा सकता है? मानवता के प्रति सच्ची निष्ठा, क्रांतिकारी सोच और सामूहिक चेतना से किसी भी सत्ता से टकराया जा सकता है। निदा नवाज़ ने कश्मीर में रह कर आतंकवाद और हुकूमतों की तानाशाही के विरुद्ध लिखा है। यह कम हिम्मत की बात नहीं है। वे आतंक से इस तरह सम्बोधित होते हैं:
'मैं तुम्हारे विचारों की
हकलाहट को
तुम्हारी क्रूर मुस्कुराहट से भी
अधिक
जान चुका हूँ
तुम कुतरते हो
अपने साम्प्रदायिक दाँतों से
मानव संस्कृति का आँचल
और चाहते हो धकेलना हमें
प्रागैतिहासिक गुफाओं के
अँधेरे में वापस'
[संस्कृति (आतंकवादी से)]
मेरा ख़याल है कि निदा; हिन्दी के बजाए अगर कश्मीरी या उर्दू में लिखते तो हो सकता है कि इन्हें अधिक परेशानियां झेलनी पड़तीं। जम्मू-कश्मीर में 1989-90 में आंतकवाद शुरू हुआ। इसी दौर में निदा ने लिखना शुरू किया। 1997 में इनका पहला कविता संग्रह (अक्षर-अक्षर रक्त भरा) प्रकाशित हुआ। यह आतंकवाद के ख़िलाफ़ दहकता हुआ दस्तावेज़ है। अगले दोनों संग्रहों में भी इनकी इसी संवेदना का विस्तार होता है।
निदा हिन्दी से प्यार करते हैं। इन्होंने ऐसे दौर में भी हिन्दी का दामन थामे रखा, जब कश्मीर सम्भाग में हिन्दी पढ़ने-लिखने वाले दुर्लभ हो गए थे। हिन्दी पढ़ने वालों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था। कश्मीरी पण्डितों के घाटी से पलायन करने के बाद; कश्मीर की सड़कों पर तो छोड़ें, कश्मीर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग तक में हिन्दी पढ़ने वाला कोई विद्यार्थी नहीं बचा।
निदा की कविताई निजी दु:खों से अधिक कश्मीर के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश से उपजी है। निदा बुतपरस्त नहीं हैं मगर इन्हें उस प्रतिमूर्ति में विश्वास है, जो जीवन-शिला से सृजित की गई है। यह निर्मिति; दु:ख के औजारों से सम्भव हुई। यह दु:ख उस मिट्टी से मिला है, जहाँ अक्षर-अक्षर रक्तभरा है:
'आशा, पुष्प और सत्य की क्यारी
हठधर्मी से रौंधी जाए
दु:ख होता है।'
(दुख होता है)
***
'मैं दुःखों की छैनी से
तराशता हूँ
अपनी जीवन शिला
और एक दिन
खड़ी हो जाती है
मेरे समक्ष
स्वयं मेरी मूर्ति
दुःखों की नाशक बन कर।'
(मूर्ति)
इनकी कविताई में भयावह रातें हैं। यहाँ लाशें हैं। अनेक-अनेक दरोगा हैं। अनेक-अनेक अत्ता हुसैन हैं। यहाँ ज़िंदा लाशें हैं। नक़ाबपोश हैं। अम्मा की अपमानित ओढ़नी है। यह रातें; दिन में भी रातें हैं। रात को और अधिक रातें हैं। यह कर्फ़्यू में, कंटीली तारों में, तलाशी में, क्रेकडाउन में, हड़तालों-प्रदर्शनों, पत्थरबाज़ी, ऑंसू गैस और रबर बुलेट में भी हैं। यह रातें पाठक को सोने नहीं देतीं :
'अँधेरे की पाज़ेब पहने
आती है काली गहरी रात
दादी माँ की कहानियों से झाँकती
नुकीले दांतों वाली चुड़ैल-सी
मारती रहती है चाबुक
मेरी नींदों की पीठ पर
काँप जाते हैं मेरे सपने।'
(अँधेरे की पाज़ेब)
यहाँ आदमी ग़ायब कर दिए जाते हैं। इन्हें लाशें बना कर ठिकाने लगा दिया जाता है। कश्मीर को वहाँ की बेनाम क़ब्रें और क़ब्रिस्तान भी बयान करते हैं। कश्मीर क्या था, और क्या होता गया, यह जानने वाले वितस्ता के महत्व को जानते हैं। जिसका रंग लाल हो चुका है। यह अकारण नहीं है कि निदा नवाज़ वितस्ता से सम्बोधित होते हैं:
'वितस्ता
तुम इस बात की भी
साक्षी रहना
कि अजनबियों के
भारी बूटों तले
विकृत हो कर
मैं
तुम्हारी जननी
घायल घाटी
अपना परिचय खो बैठी।'
(वितस्ता तुम साक्षी रहना)
आलोच्य कवि धर्म और ईश्वर के नाम पर हो रहे छल को बार-बार रेखांकित करते हैं। वे आतंकवाद के पीछे धार्मिक कट्टरता देखते हैं। इनके लेखन में दुःख के साथ तल्ख़ी, नाराज़गी और प्रतिरोध भी है। वे व्यवस्थाजनित असमानता, ग़रीबी और अत्याचार का भी प्रतिकार करते हैं। सत्य को संगसार किए जाने को देख कर वे फ़तवा देने वालों पर दो टूक लिखते हैं:
'एक और फ़तवा जारी किया है
हमारे शहर के बड़े मौलवी ने
लोग घरों के फूल-दानों में फूल नहीं
बल्कि पत्थर रख लें
और जिस गली से भी सत्य चलता दिखाई दे
उसे संगसार किया जाए'
(फ़तवा)
इनकी अधिकतर कविताएँ; कश्मीर की प्रत्यक्षदर्शी हैं। 1990 के बाद से ले कर अब तक कश्मीर पर बहुत लिखा गया है। इस पर इतिहासकारों, नेताओं, अधिकारियों, पत्रकारों और अन्य लेखकों ने भी खूब लिखा। कश्मीर पर उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, संस्मरण, डायरियां और यात्रा-वृत्तांत लिखे गए। इस पर कविताएँ भी लिखी गईं। कश्मीर को अलग-अलग कवियों की नज़र से देख कर; निदा के लेखन के अलगपन को समझा जा सकता है। इस सन्दर्भ में हमें महाराज कृष्ण संतोषी, अग्निशेखर, क्षमा कौल, संजना कौल, निदा नवाज़, कुमार कृष्ण शर्मा आदि के लेखन तक अवश्य जाना चाहिए। निदा की आँखों के लाल समुद्र में कितना कुछ डूबता दिखाई दे रहा है:
'चिनार की सारी टहनियाँ
बन जाती हैं उँगलियाँ
और फैल जाती हैं हैरतें
जड़ों तक भी
मेरी रीढ़ की हड्डी में
भर जाती है
विष की बूँदें
और मेरी आँखों के
लाल समुद्र के बीच
कहीं मर जाता है
दोपहर का अकेला सूरज।'
(दोपहर का सूरज)
दरअसल यह कविताएँ; 'आओ मेरे पास' कह कर; कश्मीर को देखने, सुनने, समझने और इसकी तस्दीक़ के लिए आमंत्रित करती हैं। हिंसा और रक्त से भरी इस धरती पर निदा नवाज़; गाँधी जी को याद करते हैं, जिन्होंने 1947 में अपनी कश्मीर यात्रा में जम्मू-कश्मीर को अंधकार में प्रकाश की किरण बताया था। उस समय देश के अन्य हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हो रही थी। उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें कहीं शांति और भाईचारा नज़र आता है, तो वह कश्मीर ही है, जो उपमहाद्वीप में सांप्रदायिक सौहार्द का उदाहरण बन सकता है।' मगर यह दुःखद सत्य है कि आज यह आदर्श ख़त्म हो गया है:
'मेरे शहर में
आना हो तो
अपनी आँखें निकाल कर
सिगरेट-बट की तरह
पाँव-तले मसल दो।
आदर्शों के सारे पन्ने
सूखी लकड़ी की तरह
जला दो।
क़लम की जीभ
किसी सिरफिरे के सिर की तरह
काट दो।
कि अब यहाँ
देखना, सोचना
और लिखना है पाप।'
(आदर्श)
लगभग एक दशक पहले मैंने एक सवाल पूछा था कि कश्मीर से निर्वासित कर दिए गए कवि और कश्मीर में रह रहे हिन्दी-कवि एक दूसरे के लेखन में कितना आते-जाते हैं? क्या इन्होंने एक दूसरे को याद करते हुए कविताएँ लिखी हैं? उत्तर में एक लम्बी चुपी थी। यक़ीनन इनमें परस्परता की कमी रही है। लेकिन निदा के पास विस्थापितों पर कुछ कविताएँ हैं। वे कश्मीरी पण्डितों के बिना कश्मीर को; कश्मीर नहीं समझते, और इनके कहीं भी होने-बसने से, उस जगह को कश्मीर समझते हैं:
'वे निकले थे मध्य रात्रि को
सूर्य उनकी जेब में था
और चाँद को वे
अपनी हथेलियों पर सजा रखे थे
उनकी सांसों में थी
'गुफा-क्राल'^ की मिट्टी की महक
और रक्त में थीं
'बुर्ज़हामा' की यादें'
'वे निकले थे...
और उन ही के साथ निकले थे
फूल-शहर के रंग
फूल-शहर की खुशबूएँ
वे जहाँ-जहाँ भी खीमें गाड़ते थे
वहाँ-वहाँ बनती थी कश्मीर घाटी
क्योंकि वे स्वयं कश्मीर थे।'
(वे स्वयं कश्मीर थे)
निदा ने प्रेम कविताएँ भी लिखी हैं। इनका प्रेम ऐसा ही है, जैसा कश्मीर, फिलिस्तीन या सीरिया आदि में हो सकता है। इन्होंने अपनी एक हिन्दू दोस्त (सरिता) के लिए स्नेह भरी कविताएँ लिखी हैं। ऐसी कविताओं में प्यार-स्नेह-नाते सर्वोपरि हैं, मगर सामाजिक सरोकारों से बढ़ कर नहीं हैं। कवि इन्हें भूलता नहीं है:
'जब मैं धार्मिक दलालों, नफ़रतों के सौदागरों
और तानाशाह प्रशासन के बीच फँस गया हूँ
तो अपनी कविता को
तुम्हारे रेशमी बालों, गुलाबी होंठों, रहस्यमयी आँखों
दरिया-सी देह, सूर्य किरण-सी मुस्कान से
दूर ले जाना
लाज़िमी ठहरता है मेरी जानां
और लाज़िमी ठहरता है
शब्दों के सशक्त प्यालों में
कड़वा यथार्थ परोसना
हर तानाशाह और आतंकी के ख़िलाफ़
दर्ज़ करना एक पुरज़ोर विद्रोह
वरना मैंने भला कब चाहा था
अपनी कविताओं में
तुम्हारे प्यार के सिवा कुछ भी लिखना।'
(कविताओं का चरवाहा)
निदा के पास सवालों से भरी कविताएँ हैं। जिस जगह सवाल करना गुनाह बना दिया गया, वे उस जगह पर देखने, सुनने, बोलने और समझने को लेकर कर्तव्यच्युत होते लोगों से सम्बोधित होते हैं। उन्हें प्रश्नांकित करते हैं:
'और क्या तुम्हें भी कभी
अपने विचारों के धरातल पर
अनिवार्य लगती है
एक क्रांति
पथरीले खेत की मुंडेर पर खड़े
उस कंकाल आदमी के लिए
जो अभी तक चूस रहा है
दु:खों की दरांती से कटा
अपना अँगूठा?'
वे सवाल न करने वालों को क़ब्रिस्तान के उस पेड़ के समान बताते हैं, जिनकी छाँव में केवल मुर्दे दफनाए जाते हैं। मगर यह तुलना ठीक नहीं। आख़िर पेड़ का तो जीवन, मृत्यु और नवनिर्माण से अटूट और गहरा रिश्ता है। यहाँ कवि के सौन्दर्य-बोध और दृष्टि में एक सीमा दिख रही है। पेड़ कहीं भी हो, सुन्दर ही होता है। हाँ, यह ज़रूर है कि पेड़ यहाँ अत्ता हुसैन की विवशता के गवाह ज़रूर बन सकते थे। जिस अत्ता हुसैन से दरोगा ने कई रातों तक नींद में भी क़ब्रें खुदवाईं, और सैकड़ों लाशों को ठिकाने लगवाया, उस अत्ता की मनोस्थिति, विवशता और अनकहे ने मुझे निःशब्द कर दिया। ऐसे मजबूर आदमी के लिए, आदमी होने की तुलना में क़ब्रिस्तान का पेड़ होना सुखद हो सकता है। हमारा कवि व्यथित है। इनकी मनोस्थिति समझी जा सकती है। इनके पास खुश होने के बहाने छीन लिए गए हैं। वे सच्ची उत्सवधर्मिता चाहते हैं, जबकि इनके सामने त्रासद स्थितियाँ रख दी गई हैं:
'तुम ईद मनाओ, जगन्नाथ के रथ को हाँको
पटाख़े फोड़ो और तसबीह के दाने गिन लो
मेरे गिनने के लिए तुम सब ने
चारों तरफ़ बहुत सी लाशें बिछा रखी हैं।'
(लाशें, ईद और रथयात्रा)
कविताएँ पढ़ना, सौन्दर्य में सेंध लगाने की कला नहीं है। आलोच्य कवि के लिए लिखना हस्तक्षेप करना तो है, मगर यह हस्तक्षेप सौन्दर्य को नष्ट नहीं करता। अन्यथा खींचातानी और छूने से देह और आत्मा के बीच जो कीड़ा फड़फड़ाता है, वह प्यार में बड़ी बाधा है:
'बस देखने में भली है
तितली
छूने से
पकड़ने से
नहीं रहती वह
तितली
रहता है
देह और आत्मा के बीच
फड़फड़ाता
बस एक कीड़ा।'
इस खलल को कवि जानता है। वह सृष्टि के प्यार में डूबा कवि है। प्यार और सौन्दर्य का खेल निराला है। इनमें वसंत, तितली और रंग के अर्थ (और अर्थ के रंग, तितली और वसंत) बदल जाते हैं। यहाँ पतझड़ का फूल और विलाप का रंग; वसंत की तितली तक ले जाता है। यह किसी स्वर्ग की सीढ़ी और जन्नत की हूरों से अधिक श्रेयस्कर है।
एक और 'परांस' को मेड़ तक ले आया हूँ। इसके पार नई भाव-भूमि है, निदा की कविताई को वहाँ जाना है। इसी जगह से उत्तर कोरोना काल का मूल्यांकन भी हो सकता है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 (35 A) हटने और इसके केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद; राज्य के कवियों के लिए चुनौती, दायित्व और सम्भवनाएँ बढ़ गई हैं। ऐसे में निदा से फ़िलहाल हुई कविता से आगे की कविताई की अपेक्षा है। अभी हमें इनके कहन-कला को भी अलहदा होते देखना है। इनकी कविताएँ; प्रामाणिक दस्तावेज़ और ज़रूरी कविताओं की तरह हमेशा पढ़ी जाएँगी। यह जन द्वारा सत्यापित कविताएँ हैं। आख़िर यह अँधेरों से लड़ रहे कवि की कविताएँ हैं:
मैंने किसी भगवान के आगे
कभी नहीं किया कोई मन्त्र पाठ
और न ही माँगी
किसी अंधविश्वास के देवता से
कोई जीवनदान की दुआ
मैं धर्म के दलालों को
सदैव जज़िया देने से इनकारी हुआ
मैं दर्ज़ करना चाहता हूँ
रात के गहरे अँधेरे के ख़िलाफ़
एक मशाल भर विद्रोह।'
(विद्रोह)
यह मशाल जलती रहे। 'परांस' के इस धीर-गम्भीर कवि को स्नेह-सलाम और शुभकामनाएँ!
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| निदा नवाज़ |
कवि-परिचय :
निदा नवाज़ कश्मीर में रहते हैं। वे हिन्दी के सुपरिचित कवि-लेखक-अनुवादक हैं। इनका जन्म 3 फरवरी 1963 को पुलवामा, कश्मीर (भारत) में हुआ। लगभग साढ़े चार दशक की लेखन यात्रा में इन्होंने; मुख्य रूप से कविताएँ लिखी हैं। कुछ कहानियाँ, एक डायरी और आलेख लिखने के अतिरिक्त इन्होंने अनुवाद कार्य भी किया है। इनकी कविताएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। इनका लेखन कुछ ऑनलाइन मंचों पर भी उपलब्ध है। अब तक इनके तीन कविता संग्रह- अक्षर-अक्षर रक्त भरा (1997), बर्फ़ और आग (2015), अँधेरे की पाज़ेब (2019), 'किरण-किरण रौशनी (उर्दू कविता संग्रह -2017) प्रकाशित हैं। इसके अलावा 'सिसकियाँ लेता स्वर्ग' (2015) शीर्षक से इनकी एक डायरी भी शाया हुई है। जो काफी चर्चित रही। इन्होंने साहित्य अकादमी के लिए अनेक अनुवाद किए हैं। इनमें 'घाव चिन्ह' नाम से कश्मीरी कहानियों का अनुवाद, वरिष्ठ हिन्दी कवि लीलाधर जगूड़ी की कविताओं का कश्मीरी अनुवाद और शाद रमज़ान के कश्मीरी कविता संग्रह का हिन्दी अनुवाद; इनके प्रमुख अनुवाद कार्य हैं। इसके अलावा इन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार की 35 पुस्तिकाओं का अंग्रेज़ी से हिन्दी, उर्दू और कश्मीरी में अनुवाद किया है। इन्होंने विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं टेक्नालॉजी विभाग, भारत सरकार के लगभग 150 वृत्तचित्रों का हिन्दी से कश्मीरी अनुवाद भी किया है। इनकी कविताओं का अंग्रेज़ी और कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इनकी कविताएँ कुछ साझा संग्रहों में भी संकलित हुई हैं।
निदा नवाज़ की कविताएँ
मूर्ति
मैं दुःखों की छैनी से
तराशता हूँ
अपनी जीवन शिला
और एक दिन
खड़ी हो जाती है
मेरे समक्ष
स्वयं मेरी मूर्ति
दुःखों की नाशक बन कर।
कंकाल आदमी
क्या तुम्हें भी कभी
अपने भीतर
पत्तों के झरने की
आवाज़ें सुनाई देती हैं?
क्या तुमने भी कभी
कबूतर की लाल होती
आँखों के सागर में
ख़ुशी-ख़ुशी अपनी नाव को
डुबो दिया है?
क्या तुम्हें भी कभी
अपने भीतर
अपने रेवड़ से
बिछुड़ने वाले
मेमने की अंतिम चीख़
सुनाई देती है?
क्या तुमने भी कभी
रेत होती हुई आँखों के पन्नों पर
उभरने वाली अंतिम इबारत को
पढ़ा है?
क्या तुम्हारे हाथों से भी
अधिकतर
फिसल जाती हैं मछलियाँ
और तुम देखते रहते हो
पानी पर लहरों से लिखे
प्रश्न को?
क्या तुमने भी कभी
मरुस्थल की लपेट में आने वाले
पेड़ की
अंतिम हरियाली की
वसीयत देखी है?
और क्या तुम्हें भी कभी
अपने विचारों के धरातल पर
अनिवार्य लगती है
एक क्रांति
पथरीले खेत की मुंडेर पर खड़े
उस कंकाल आदमी के लिए
जो अभी तक चूस रहा है
दुखों की दरांती से कटा
अपना अंगूठा?
यदि तुम्हारे पास
ऐसा कोई अनुभव नहीं
तो समझना
कि जीवन से तुम्हारा रिश्ता
टूट चुका है
और तुम क़ब्रिस्तान के
वह पेड़ बन चुके हो
जिसकी छाँव में
केवल मुर्दे दफनाए जाते हैं।
तितली
1
वह वसंत की एक तितली
और मैं
पतझड़ का एक फूल
वह रंगों का एक पर्व
और मैं
रंगों का विलाप:
फिर यह संगम कैसा।
2
बस देखने में भली है
तितली
छूने से
पकड़ने से
नहीं रहती वह
तितली
रहता है
देह और आत्मा के बीच
फड़फड़ाता
बस एक कीड़ा।
बर्फ़ और आग
बर्फ़ के घरों में रहते थे
वे लोग
ठंडक बसती थी
उनकी सभ्यता में
बर्फ़ के सपने उगते थे
उनकी आँखों में
और आज पहली बार वे
घर लाए थे
आग
इतिहास में केवल इतना ही लिखा है।
सूना गर्भ
चाँद का परिंदा
पानी की टहनी पर
लहरों के तिनकों से
बुन रहा है अपना नीड़
मेरी आँखों के
ज़मुर्दी बिन्दुओं में
फड़फड़ाने लगती है
अल्हड़ किरणें
इंद्रधनुष
घोषित करता है बारिश
लेकिन
मेरी सीपी का गर्भ
अभी तक सूना है।
विद्रोह
मैंने काले घनघोर मेघों से
कभी रास्तों का पता नहीं पूछा
मैंने रेबीज़ से ग्रस्त लोगों से
कभी यारी नहीं गांठी
मैंने किसी भगवान के आगे
कभी नहीं किया कोई मन्त्र पाठ
और न ही माँगी
किसी अंधविश्वास के देवता से
कोई जीवनदान की दुआ
मैं धर्म के दलालों को
सदैव जज़िया देने से इनकारी हुआ
अपनी उम्र के सूर्योदय से ले कर
आज तक
मैं समेटता रहा
रोशनी की एक एक किरण
अपने विवेक का आहार
मैं दर्ज़ करना चाहता हूँ
रात के गहरे अँधेरे के ख़िलाफ़
एक मशाल भर विद्रोह।
कर्फ़्यू
चील ने भर दी है
अपने पंजों में
शहर की सारी चहल-पहल
सड़कों पर घूम रही है
नंगे पाँव चुप्पी की डायन
गौरैया ने अपने बच्चों को
दिन में ही सुला दिया है
अपने मन के बिस्तर पर
और अपने सिरहाने रखी है
आशंकाओं की मैली गठरी
दूर बस्ती के बीच
बिजली के खम्भे के ऊपर
आकाश की लहरों पर
कश्ती चलाता एक पंछी
गिर कर मर गया है।
आओ मेरे पास
आओ मेरे पास
मैं बताऊँगा
कैसे अटक जाता है काँटा
मछली के गले में
और छलनी हो जाता है एक पूरा समुद्र
आओ मेरे पास
मैं दिखाऊँगा
कैसे जलाए जाते हैं
आतंक की आग में
विश्वास के सारे मूल्य
आओ मेरे पास
मैं सुनाऊँगा
कैसे सूली चढ़ाया जाता है
अंधों के शहर में सूर्य
और की जाती है पूजा
अंधेरी रात की
आओ मेरे पास
मैं समझाऊँगा
कैसे लुढ़क जाता है
हमारे संविधान का पहिया
संसद जाने वाली सड़क के
बीचो-बीच
आओ मेरे पास
मैं बताऊँगा
कैसे चाट रहे हैं पुलिस प्रशासन के दीमक
बापू के अहिंसा ग्रंथ का
एक-एक पन्ना।
डर
आता है काला नक़ाब पहने
हाथ में चाकू या बंदूक़ लिए
शाम ढलते ही
और ले जाता है मुझे
जंगल की तरफ छोड़ देता है मुझे
किसी भूखे शेर के सामने
या मगरमच्छों भरे तालाब के
बीचों-बीच
या ले जाता है मुझे
किसी पहाड़ की चोटी पर
और गिरा देता है
अजगरों भरी गहरी खाई में
नहीं होता है वह कोई और
बल्कि होता है वह
मेरे साथ ही जन्म लेने वाला
मेरा डर।
हमारी अम्मा की ओढ़नी
वे जब आते हैं रात-समय
दस्तक नहीं देते हैं
तोड़ते हैं दरवाज़े
और घुस आते हैं हमारे घरों में
वे दाढ़ी से घसीटते हैं
हमारे अब्बू को
छिन जाती है
हमारी अम्मा की ओढ़नी
या हम एक दूसरे के सामने
नंगे किए जाते हैं
सिसकती है शर्म
बिखर जाते हैं रिश्ते।
वे नक़ाबपोश होते हैं
लेकिन
हम खोज ही लेते हैं उनके चेहरे
अतीत की पुस्तक के एक एक पन्ने से
बचपन बिताए आंगन से
दफ़्तर में रखी सामने वाली कुर्सी से
एक साथ झुलाये हुए झूले से
स्कूल की कक्षा में बैठे लड़कों से।
हमारे बचपन के आँगन पर
रेंगते हैं सांप
यमराज दिखाई देता है
हमारी सामने वाली कुर्सी पर
जल जाती है
हमारे बचपन के झूले की रस्सी
हम उस काले नक़ाब के पीछे छिपे
कभी उस लड़के का चेहरा भी देखते हैं
जिसको हमने पढ़ाया होता है
पहली कक्षा में।
वे जब आते हैं रात-समय
ले जाते हैं जिसको वे चाहें घर-परिवार से
और कुछ दिनों के बाद
मिलती है उसकी लाश
किसी सेब के पेड़ से लटकी
या किसी चौराहे पर लटकी
मारने से पहले वे
लिख देते हैं अपना नाम
उसकी पीठ पर
आतंक की भाषा में
दहकती सलाखों से
आग के अक्षरों में।
वे जब आते हैं रात-समय
दस्तक नहीं देते हैं
तोड़ते हैं दरवाज़े
रौंदते हैं पाँव तले
हमारी संस्कृति को
हमारे रिश्तों को
हमारी शर्म को।
वे स्वयं कश्मीर थे
वे निकले थे ...
जैसे उखड़ता है कोई चिनार
जड़ों की बांहों में भर कर
अपनी सारी मिट्टी
और हाथ-पत्तों में भर कर
अपनी सारी छाँव
वे निकले थे मध्य रात्रि को
सूर्य उनकी जेब में था
और चाँद को वे
अपनी हथेलियों पर सजा रखे थे
उनकी सांसों में थी
'गुफा-क्राल'^ की मिट्टी की महक
और रक्त में थीं
'बुर्ज़हामा' की यादें
वे निकले थे ...
उन के मन में था शिव
और पीठ पर 'हरिपर्वत'
उनकी झोलियों में थे
नाग-पूजा के पुष्प
और आँखों में प्राचीन मन्दिर
वे हो के आए थे
'करकोटा' के सभ्य शहर से
वे निकले थे ...
'ललितादित्य' था उन का आदर्श
और 'अनन्ता' के चश्मे
उनके पाँव से फूटते थे
उनकी ध्वनि में था
आचार्य आनन्दवर्धन
और शब्दों में
आचार्य अभिनवगुप्त
उन के सिर पर था
'कश्यप' का आशीर्वाद
वे निकले थे...
और उन ही के साथ निकले थे
फूल-शहर के रंग
फूल-शहर की खुशबूएँ
वे जहाँ-जहाँ भी खीमें गाड़ते थे
वहाँ-वहाँ बनती थी कश्मीर घाटी
क्योंकि वे स्वयं कश्मीर थे।
गुफा-क्राल^- कश्मीर के त्राल में ऐसी गुफाएँ हैं, जिनके लिए माना जाता है कि किसी समय वहाँ कुम्हार रहते थे। कश्मीरी में क्राल का अर्थ कुम्हार होता है।
अँधेरे की पाज़ेब
अँधेरे की पाज़ेब पहने
आती है काली गहरी रात
दादी माँ की कहानियों से झाँकती
नुकीले दांतों वाली चुड़ैल-सी
मारती रहती है चाबुक
मेरी नींदों की पीठ पर
काँप जाते हैं मेरे सपने
वह आती है जादूगरनी सी
बाल बिखेरती
अपनी आँखों के पिटारों में
अजगर और साँप लिए
मेरी पुतलियों के बरामदे में
करती है मौत का नृत्य
अतीत के पन्नों पर
लिखती है कालिख
वर्तमान की नसों में
भर देती है डर
भविष्य की दृष्टि को
कर देती है अंधा
मेरे सारे दिव्य-मन्त्र
हो जाते हैं बाँझ
घोंप देती है खंजर
परिचय के सीने में
रो पड़ती है पहाड़ी श्रृंखला
सहम जाता है चिनार
मेरे भीतर जम जाती है
ढेर सारी बर्फ़ एक साथ।
मैं तो कविताओं का चरवाहा हूँ
(अपनी दोस्त के नाम)
मैंने भला कब चाहा था अपनी कविताओं में
तुम्हारे प्यार के सिवा कुछ भी लिखना
मैंने भला कब चाहा था
बम, बारूद और बंदूकों पर कविता लिखना
या कर्फ्यू , क्रेकडाउन और क्रॉस फायरिंग की बातें करना
या उन सैंकड़ों नरसंहारों को दर्ज़ करना
जिनमें हज़ारों निर्दोष लोग मारे गए
मैंने भला कब चाहा था
कि मैं उन सैकड़ों फ़र्ज़ी झड़पों की बात करूँ
जिनमें हज़ारों युवाओं का इस्तेमाल हुआ
और न ही कभी चाहा था उन बेनाम क़ब्रों पर बात करना
जिनमें मौजूद कंकालों पर भी
कोतवाल की बर्बरता के निशान मौजूद हैं
मैं तो कविताओं का चरवाहा हूँ
भला कब चाहूँगा कि मेरे कोमल शब्दों के रेवड़ पर
आतंकवाद का ज़हरीला साया भी पड़े
न ही चाहा था कि मेरी कविताओं में
कोई कोतवाल मुझे डराए
या कोई नकाबपोश घुसपैठ करे
वही नकाबपोश जिनके फ़तवों के डर से
रात के भयभीत अँधेरों को फलाँग कर
तुम अपनी मातृभूमि से निकले थे
मैंने ये सब कब चाहा था
मैं तो चाहता था अपनी कविताओं में बस प्यार लिखूँ
विश्व भर के प्रेमियों के लिए
और तुम्हारे लिए भी मेरी जानाँ
मैं तो चाहता था तुम्हारे बालों को लहराते बादल लिखूँ
लेकिन यहाँ तो टियरगैस और मिर्चीगैस के गहराते बादल हैं
मैं तो तुम्हारी आँखों को रहस्यमय जंगल लिखता
लेकिन अब तो मेरी पूरी घाटी
अनिश्चितता के आतंकी जंगल में बदल गई है
मैं चाहता था तुम्हारे लाल-लाल होंठों को
सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियाँ लिखूँ
लेकिन यहाँ के सारे गुलाब मुरझाए गए हैं
मैं चाहता था तुम्हारी मुस्कान को सूर्योदय लिखूँ
लेकिन यहाँ सच के सभी सूर्यों पर पहरे बिठाए गए हैं
मैं चाहता था तुम्हारे स्वरूप को दरिया लिखूँ
लेकिन यहाँ का इकलौता दरया-ए-झेलम भी
लहू रंग हो गया है
जब मैं धार्मिक दलालों, नफ़रतों के सौदागरों
और तानाशाह प्रशासन के बीच फँस गया हूँ
तो अपनी कविता को
तुम्हारे रेशमी बालों, गुलाबी होंठों, रहस्यमयी आँखों
दरिया-सी देह, सूर्य किरण-सी मुस्कान से
दूर ले जाना
लाज़िमी ठहरता है मेरी जानां
और लाज़िमी ठहरता है
शब्दों के सशक्त प्यालों में
कड़वा यथार्थ परोसना
हर तानाशाह और आतंकी के ख़िलाफ़
दर्ज़ करना एक पुरज़ोर विद्रोह
वरना मैंने भला कब चाहा था
अपनी कविताओं में
तुम्हारे प्यार के सिवा कुछ भी लिखना।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं)
सम्पर्क
मोबाइल : 09797831595
ई मेल : nidanawazbhat@gmail.com

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सर्वप्रथम इतनी खूबसूरत पेंटिंग्स के लिए विजेन्द्र जी को साधुवाद, इतनी सघन लेखन पढ़ते समय भी पेंटिंग्स पर से नज़र हट नहीं रही थी.. कविता का ही विस्तार लग रहीं थी, मैं कोई कलाकार तो नहीं मगर रंगों और स्टोक्स का समन्वय आपको बिना उसे सराहे आगे बढ़ने नहीं देता.. कमलजीत जी को भी शाबाशी ,विजेन्द्र जी की कला से मिलाने के लिए..🙏🙏
जवाब देंहटाएंअब आते है निदा जी की कविता पर.. मैंने कमलजीत जी को पढ़ने के बाद मैसेज किया कि कवितायों को पढ़ने के बीच रुकना पड़ा, नहीं तो रो देती.. निदा जी की कविता सीधी दिल से उतरी और कमलजीत जी के बुने पुल से गुज़र सीधे दिल तक पहुंची..आभार आपका इतना साफ़, शफ़्फ़ाफ़ लिखने के लिए
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