परिचय दास का आलेख 'एक स्त्री, एक तंबूरा और महाभारत'


तीजन बाई


वेद भारत के प्राचीनतम ग्रन्थ माने जाते हैं। ये श्रुति परंपरा में आते हैं। लेखन कला के विकास के साथ श्रुति परंपरा में साहित्य सृजन की प्रक्रिया धीमी पड़ गई। अरसे बाद भक्ति काल के सन्त भी इस श्रुति परंपरा को अपनाते दिखाई पड़ते हैं। तीजन बाई ने अपने पंडवानी गायन के जरिए महाभारत के श्रुति परंपरा को पुनराविष्कृत किया। उत्तर भारत में यह कहते हुए लोग महाभारत को घर में नहीं रखते कि इससे घर में महाभारत मच जाता है। लेकिन तीजन बाई लीक पर चलने की आदी ही नहीं थी। उन्होंने उस महाभारत को अपनी स्मृतियों में रखा, अपनी जुबान पर रखा और लोगों को महाभारत की कथाएँ सुनाईं। वे इन कथाओं को आज के परिप्रेक्ष्य से जोड़ने का हुनर जानती थीं इसीलिए उनकी प्रस्तुति श्रोताओं के दिल दिमाग पर सीधा असर करती थी। तीजन बाई ने और कई लीक तोड़ी। वे कापालिक शैली में पंडवानी गाने लगीं, जिसमें कलाकार खड़े हो कर अपनी कल्पना से महाभारत के प्रसंगों को जीवंत करता है। हालांकि बरसों पंडवानी गाने के बाद भोपाल के भारत भवन में जब उनका कार्यक्रम रखा गया, तब उन्हें जा कर पता चला कि वो पंडवानी की कापालिक शैली की गायिका हैं। एक बार अभिनय में उनका सानी नहीं था। आलोक पुतुल लिखते हैं 'द्रौपदी की करुण पुकार, भीम का अदम्य बल, अर्जुन की बेचैनी और कृष्ण की रहस्यमयी मुस्कान, सब कुछ उनके स्वर में बसता था। वो केवल महाभारत की कथा नहीं कहती थीं, वो लोक की स्मृति गाती थीं।' बीते 5 जुलाई 2026 को तीजन बाई का निधन हो गया। उन पर श्रद्धांजलि विशेष के अन्तर्गत पहली बार दो पोस्ट प्रकाशित कर चुका है। इसी क्रम में आज तीसरी प्रस्तुति के अंतर्गत हम परिचय दास का आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। परिचय दास लिखते हैं - 'उनकी आवाज़ में मुझे कभी-कभी वेदों का उदात्त उच्चारण भी सुनाई देता था। यह आश्चर्य की बात नहीं है। भारत का समूचा वांग्मय अंततः ध्वनि का ही इतिहास है। पहले ऋचाएँ गाई गईं, फिर पुराण कहे गए, फिर लोकगीत जन्मे। लिखित शब्द बहुत बाद में आया। तीजन बाई उस प्राचीन ध्वनि-परंपरा की अंतिम नहीं, नवीन कड़ी थीं। वे स्मरण कराती थीं कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक निवास मनुष्य के कंठ में है, काग़ज़ पर नहीं।' तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं परिचय दास का आलेख 'एक स्त्री, एक तंबूरा और महाभारत'। 


श्रद्धांजलि विशेष - तीजन बाई : 3


'एक स्त्री, एक तंबूरा और महाभारत'


परिचय दास 


कुछ आवाज़ें केवल कानों तक नहीं पहुँचतीं, वे सभ्यता की स्मृति में उतर जाती हैं। उन्हें सुनते हुए लगता है कि समय अपनी पुरानी देह छोड़ कर फिर से वर्तमान हो गया है। तीजन बाई ऐसी ही आवाज़ थीं। वे गाती नहीं थीं, महाभारत को जीती थीं। उनके कंठ से निकलने वाला प्रत्येक स्वर किसी श्लोक का अर्थ नहीं, किसी युग की धड़कन बन जाता था। जब वे मंच पर आती थीं, तब ऐसा नहीं लगता था कि कोई लोकगायिका सामने है; प्रतीत होता था कि व्यास की कथा स्वयं लोक की भाषा में अपना नया जन्म ले रही है।


भारत की सांस्कृतिक परंपरा में महाभारत केवल एक ग्रंथ नहीं, मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्षों का सबसे विराट आख्यान है। इस आख्यान को अनेक विद्वानों ने पढ़ा, अनेक कलाकारों ने मंचित किया, अनेक भाषाओं ने अपनी-अपनी शैली में व्यक्त किया, पर तीजन बाई ने उसे 'लोक के हृदय की धड़कन' बना दिया। उन्होंने महाभारत को पुस्तकालयों से निकाल कर चौपालों तक पहुँचाया और चौपालों से उठा कर विश्व के बड़े मंचों तक पहुँचा दिया। यह यात्रा केवल एक कलाकार की सफलता नहीं थी, लोक की प्रतिष्ठा की यात्रा थी।


उनके हाथ में एक साधारण-सा तंबूरा होता था, किंतु वह कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी द्रौपदी के खुले केश और कभी युद्धभूमि का ध्वज। एक ही वाद्य उनके हाथों में अनेक रूप धारण कर लेता था। अभिनय, संगीत, कथा और संवाद उनके भीतर इतने स्वाभाविक ढंग से एकाकार थे कि दर्शक भूल जाता था कि वह किसी प्रस्तुति को देख रहा है। वह स्वयं कुरुक्षेत्र का साक्षी बन जाता था।


तीजन बाई की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे शब्दों के अर्थ नहीं, उनकी अग्नि गाती थीं। द्रौपदी का चीरहरण उनके स्वर में करुणा नहीं, प्रतिरोध बन कर उतरता था। भीम का क्रोध केवल गर्जना नहीं रहता था, न्याय की भूख बन जाता था। कर्ण का दान केवल उदारता नहीं, मनुष्य की नियति का सबसे करुण अध्याय बन जाता था। अभिमन्यु के चक्रव्यूह में प्रवेश के साथ उनकी आवाज़ में ऐसी बेचैनी भर जाती थी कि श्रोता का अपना हृदय भी उस युद्ध में उतर जाता था। वे कथा नहीं सुनाती थीं, कथा के भीतर मनुष्य की धड़कन सुनाती थीं।


वे अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनकी स्मृति में जितना महाभारत जीवित था, उतना शायद अनेक पुस्तकालयों में भी एक साथ न मिलता हो। उन्होंने सिद्ध किया कि ज्ञान केवल अक्षरों का नहीं होता, अनुभव का भी होता है; और लोक की स्मृति कभी-कभी विश्वविद्यालयों से भी अधिक विशाल होती है। उन्होंने अपनी साधना से यह प्रमाणित किया कि कला का सबसे बड़ा विद्यालय जीवन है। जिस स्त्री ने औपचारिक शिक्षा कम पाई, उसने संसार को भारतीय महाकाव्य की ऐसी शिक्षा दी, जिसे कोई पाठ्यक्रम नहीं दे सकता।


उनकी आवाज़ में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की गंध थी। उसमें खेतों की हरियाली थी, जंगलों की नमी थी, लोकभाषा की सहजता थी और श्रम से भरे जीवन की सच्चाई थी। यही कारण है कि जब वे विदेशों में भी गाती थीं, तब भाषा न समझने वाले लोग भी भाव समझ लेते थे। संगीत का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि वह शब्दों की सीमाएँ पार कर जाता है। तीजन बाई ने इस चमत्कार को अनेक बार सच किया।


उन्होंने केवल पंडवानी नहीं गाई, लोक कला का सम्मान भी गाया। ऐसे समय में, जब लोक कलाओं को अक्सर पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया जाता था, उन्होंने दिखाया कि लोक ही संस्कृति का सबसे गहरा स्रोत है। शास्त्र की जड़ें भी अंततः लोक की मिट्टी में ही उतरती हैं। यदि लोक सूख जाएगा, तो शास्त्र भी अधिक दिनों तक हरा नहीं रह सकेगा। तीजन बाई इस सत्य की जीवित व्याख्या थीं।


उनका जीवन संघर्षों से भरा था। सामाजिक उपेक्षाएँ थीं, आर्थिक कठिनाइयाँ थीं, पर उन्होंने अपने स्वर को कभी पराजित नहीं होने दिया। उन्होंने अपने जीवन से यह बताया कि प्रतिभा सुविधा की देन नहीं होती, वह साधना की संतान होती है। उनकी कला में इसलिए केवल सौंदर्य नहीं, श्रम की चमक भी दिखाई देती थी।


जब उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत किया गया, तब लगा कि सम्मान वास्तव में एक कलाकार को नहीं, लोक की उस परंपरा को मिला है जो सदियों से बिना किसी शोर के भारत की आत्मा को जीवित रखे हुए है। किंतु सच तो यह है कि पुरस्कार उनके व्यक्तित्व का विस्तार भर थे; उनकी वास्तविक पहचान उन असंख्य लोगों के हृदय में थी, जिन्होंने उनकी पंडवानी सुन कर पहली बार महसूस किया कि महाभारत केवल अतीत की कथा नहीं, आज भी मनुष्य के भीतर घटित हो रही है।


अब उनका स्वर प्रत्यक्ष नहीं सुनाई देगा, पर कुछ आवाज़ें मृत्यु के बाद और अधिक दूर तक जाती हैं। वे हवा में घुल जाती हैं, स्मृतियों में बस जाती हैं, नई पीढ़ियों के कंठ में उतर जाती हैं। तीजन बाई भी अब उसी अमर लोक ध्वनि का हिस्सा हैं। जब भी कहीं पंडवानी गूँजेगी, जब भी कोई कलाकार तंबूरा हाथ में ले कर भीम, कर्ण, अर्जुन या द्रौपदी को पुकारेगा, तब तीजन बाई की छाया वहाँ अवश्य उपस्थित होगी।


कुछ कलाकार अपने समय का प्रतिनिधित्व करते हैं, कुछ समय को ही नया अर्थ दे देते हैं। तीजन बाई दूसरी श्रेणी की कलाकार थीं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि लोक की आवाज़ कभी छोटी नहीं होती। यदि उसमें साधना, सत्य और संवेदना का संगम हो, तो वह महाभारत की तरह युगों-युगों तक सुनाई देती रहती है।


तीजन बाई को सुनना वस्तुतः उस भारत को सुनना था, जो अभी भी अपने ग्रंथों को कंठ में रखता है, अलमारी में नहीं। वे जब गाती थीं तो लगता था कि छत्तीसगढ़ की लाल मिट्टी पर व्यास ने अपनी कलम रख दी है और शब्दों ने स्वर का रूप धारण कर लिया है। भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा सौभाग्य यह रहा है कि यहाँ शास्त्र और लोक कभी दो पृथक नदियाँ नहीं रहे। एक हिमालय से उतरती है, दूसरी खेतों के मेड़ों से; अंततः दोनों गंगा में ही मिलती हैं। तीजन बाई उसी संगम की गायिका थीं। उनके भीतर व्यास भी थे, गाँव की बूढ़ी दादी भी; कुरुक्षेत्र भी था और चूल्हे की आँच भी।


लोक में महाभारत कभी समाप्त नहीं होती। प्रत्येक गाँव में एक दुर्योधन है, जो अधिकार को अपना जन्मसिद्ध मानता है; प्रत्येक घर में कोई न कोई कुन्ती है, जो अपने दुःखों को भीतर ही भीतर पीती रहती है; प्रत्येक युग में एक कर्ण है, जो सम्मान की तलाश में भटकता है; प्रत्येक समाज में कोई अभिमन्यु है, जो अधूरे ज्ञान के साथ जीवन के चक्रव्यूह में उतरता है। तीजन बाई इन पात्रों को इतिहास से निकाल कर वर्तमान में रख देती थीं। उनके लिए महाभारत बीत चुकी घटना नहीं थी; वह मनुष्य की शाश्वत अवस्था थी।


उनकी आवाज़ में मुझे कभी-कभी वेदों का उदात्त उच्चारण भी सुनाई देता था। यह आश्चर्य की बात नहीं है। भारत का समूचा वांग्मय अंततः ध्वनि का ही इतिहास है। पहले ऋचाएँ गाई गईं, फिर पुराण कहे गए, फिर लोकगीत जन्मे। लिखित शब्द बहुत बाद में आया। तीजन बाई उस प्राचीन ध्वनि-परंपरा की अंतिम नहीं, नवीन कड़ी थीं। वे स्मरण कराती थीं कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक निवास मनुष्य के कंठ में है, काग़ज़ पर नहीं।


कितना विचित्र है कि जिन लोगों ने विश्वविद्यालयों में महाभारत का आलोचनात्मक संस्करण तैयार किया, वे भी शायद उतने लोगों तक नहीं पहुँचे, जितने लोगों तक तीजन बाई पहुँचीं। इसका कारण यह नहीं कि विद्वता कम महत्त्वपूर्ण है; कारण यह है कि ज्ञान जब तक रस में नहीं बदलता, तब तक वह जन का नहीं हो पाता। तीजन बाई ने ज्ञान को रस बनाया, रस को लोक बनाया और लोक को पुनः संस्कृति का केंद्र बना दिया।


उनकी प्रस्तुति में एक अद्भुत देहभाषा थी। वे स्थिर हो कर भी गतिशील रहती थीं। उनके पैर जैसे पृथ्वी पर होते थे, किंतु उनका स्वर आकाश में विचरता था। भारतीय नाट्यशास्त्र में 'अंगिक', 'वाचिक', 'आहार्य' और 'सात्त्विक' अभिनय की जो चर्चा है, उसका सहज और अनगढ़ रूप उनके भीतर देखा जा सकता था। उन्होंने शास्त्र पढ़ कर नहीं, जीवन जी कर नाट्यशास्त्र रचा।


आज जब लोककलाएँ बाज़ार की चकाचौंध और डिजिटल शोर में अपना स्थान खोज रही हैं, तब तीजन बाई का जीवन एक गहरी सीख नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संकेत है। कोई भी सभ्यता अपनी तकनीक से महान नहीं होती; वह अपनी स्मृति से महान होती है। जिस दिन हमारी स्मृति लोक से कट जाएगी, उसी दिन हमारी भाषा भी भीतर से रिक्त होने लगेगी। तीजन बाई उस स्मृति की अंतिम मशालों में से एक थीं। उनके जाने से अँधेरा नहीं हुआ है, लेकिन यह अवश्य हुआ है कि अब हमें अपने भीतर की रोशनी स्वयं बचानी होगी।


उनके निधन पर शोक इसलिए नहीं है कि एक महान गायिका चली गईं। शोक इसलिए है कि हमारी सभ्यता की एक जीवित ध्वनि अब प्रत्यक्ष नहीं रहेगी। किंतु भारतीय परंपरा का विश्वास मृत्यु पर नहीं, अनुगूँज पर है। स्वर मरते नहीं, वे प्रतिध्वनि बन जाते हैं। तीजन बाई भी अब प्रतिध्वनि हैं। जब भी किसी गाँव में कोई बच्चा पहली बार पंडवानी की तान उठाएगा, जब भी कोई कलाकार तंबूरा हाथ में लेकर भीम का नाम पुकारेगा, जब भी कोई श्रोता महाभारत को पुस्तक से बाहर जीवित अनुभव करेगा, तब कहीं न कहीं तीजन बाई मुस्करा रही होंगी।


भारत को यदि समझना हो तो उसके राजमहलों से अधिक उसकी चौपालों में बैठना चाहिए। वहाँ कोई तीजन बाई मिल जाए, तो समझिए व्यास अब भी जीवित हैं।


सम्पर्क 


मोबाइल : 9968269237

टिप्पणियाँ

  1. साधुवाद, बहुत अच्छा लिखा, कहीं कहीं तो दिल को छू गया

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  2. तीज़न बाई को लाजवाब श्रद्धांजलि दी परिचय दास जी ने।
    जितेन्द्र कुमार, आरा

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