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यादवेन्द्र का आलेख 'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'

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यादवेन्द्र  आत्मीय सम्बन्ध हमें जीवन की ऊष्मा प्रदान करते हैं। ये सम्बन्ध हमें निराशा के बियाबान से बाहर निकाल कर उम्मीद की किरणें बिखेरते हैं। इन सबके मूल में स्मृति का बड़ा हाथ होता है। रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए हमें इसका अहसास ही नहीं होता कि स्मृतिलोप हो जाने पर क्या परिस्थितियों बनेंगी। स्मृतिलोप होने पर व्यक्ति खुद अपना होशो हवाश खो बैठता है। आत्मीय लोगों यहाँ तक कि पति, पत्नी, मां, पिता, भाई, बहन, बेटे, बेटी तक को पहचान नहीं पाते। आप इस त्रासद स्थिति की कल्पना कर सकते हैं कि आपका अपना कोई अजीज ही आपको पहचानने की क्षमता खो चुका होता है। डिमेंशिया ऐसी ही बीमारी है जिसमें व्यक्ति अपने अतीत की सारी स्मृतियों को विस्मृत कर जाता है। यादवेन्द्र जी ने जी बी प्रभात की कहानी चॉकलेट के साथ साथ लवीनिया ग्रीनलॉ की कविताएँ प्रस्तुत की हैं जो डिमेंशिया की भयावह त्रासदी को व्यक्त करते हैं। लवीनिया ग्रीनलॉ अपनी कविता 'मेरे पिता का जानना न जानना' में लिखती हैं  ' वे पेंसिल के बारे में सोचते हैं/   उसी तरह जुराब के बारे में भी/  जब बाथरूम में घुसते हैं/  तो अपने हाथ...

गीताश्री की कहानी 'ट्रायल'

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गीताश्री हमारा समाज आधुनिक होने का चाहें जितना दावा कर ले, बहुत मामलों में वह आज भी पारम्परिक और पितृसत्तात्मक है। हमारे समाज में आज भी लड़कियों की शादी का दायित्व उस घर का पुरुष ही उठाता है। लड़की से उम्मीद की जाती है कि बिना ना नुकुर किए वह अपने घर के पुरुष सदस्यों के निर्णय को स्वीकार करे। अगर उसने ना कहा तो तुरन्त ही उस पर मनबढ़ होने का आरोप चस्पा कर दिया जाता है। लड़की कैसे रहे, क्या पहने, कैसा काम करे सब तय करने का अधिकार पुरुषों ने जबरन अपने हाथों में ले रखा है। शादी के बाद नव ब्याहता से अपेक्षा की जाती है कि वह घर परिवार की मर्यादा का ध्यान रखे और उसी के अनुसार काम करे। सिर झुका कर पति के साथ साथ सास ससुर, जेठ और देवर का आदेश माने और उनका हुकुम जगाएं। इस तरह शादी करने के बाद लड़की प्रायः अपना अस्तित्व ही खो बैठती है। लेकिन समय बड़ी तेजी से बदल रहा है। लड़कियों की सोच बदल रही है। वे आर्थिक मामलों में ही आत्मनिर्भरता नहीं चाहतीं बल्कि खुद अपने जीवन का निर्णय करना चाहती हैं। माहिया ऐसी ही लड़की है जो पारम्परिक ढाँचे में बंधने की बजाए शादी अपने मन के अनुकूल उस लड़के से करने की हिमा...

पंकज मोहन का आलेख 'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'

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प्रेमचंद स्वाधीनता आन्दोलन केवल राजनीति के मोर्चे पर ही नहीं लड़ा गया। यह लड़ाई लेखन के जरिए भी लड़ी गई। प्रेमचंद ने लेखन के जरिए अपना काम किया। वे गांधी जी से प्रभावित थे। अपने आलेख में पंकज मोहन प्रेमचंद के उस कथन का जिक्र करते हैं जो राष्ट्रवाद की अवधारणा के बारे में है। अपने एक लेख में प्रेमचंद ने लिखा था कि “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगें या सभी हरिजन होंगे।” आगे उन्होने यह भी जोड़ दिया कि “हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि उस सामाजिक जुए से भी, उस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।" प्रेमचंद ने अपने लेखन के जरिए वह प्रतिमान स्थापित किया जो अन्य लेखकों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है। आज प्रेमचंद जयंती पर उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर हम पढ़ते हैं पंकज मोहन का आलेख  'धनकुबेर धनपत राय, हाजिर हो'। ...

नीरज सिंह की कहानी 'दूसरा आदम'

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नीरज सिंह  लोकतन्त्र की रीढ़ होते हैं चुनाव और इस चुनाव में जनता के एक एक वोट का महत्व होता है। हमारे देश में जाति पांति की व्यवस्था इस चुनाव पर भारी पड़ती रही है। गाँव के रसूखदार लोग तमाम तरह के भय दिखा कर कमजोर लोगों को वोट डालने से रोक दिया करते थे। चुनाव सम्पन्न हो जाता और लोकतन्त्र अपने अंदाजा में चलता रहता। आजकल ई वी एम का जमाना है। ई वी एम का अपना अलग गुणा भाग है। फूल प्रूफ दिखने वाली व्यवस्था पर भी तमाम सवाल उठाये जाते रहे हैं। नीरज सिंह सातवें आठवें दशक के प्रमुख कहानीकार रहे हैं। अपनी कहानी 'दूसरा आदम' में वे बड़ी बारीकी से इन चुनावों की हकीकत बता देते हैं। कहानी की ये पंक्तियाँ पढ़िए " भिखारी सिंह चीख उठता है-ठेंगा लिखा है तुम्हारे संविधान में। गोली मारो इस संविधान को मास्टर..। यह संविधान हिजड़ा है, नपुंसक संविधान है। आज ही गये थे न हम लोग बी० डी० ओ० के पास यह कहने कि वोट के दिन जबरदस्ती की जायेगी बाबुओं द्वारा। जवाब तो तुमने सुना था न बी० डी० ओ० का कि वह कुछ नहीं कर सकता। अगर वोट के दिन मारपीट होती है तो उसकी रोकथाम पुलिस करेगी। लेकिन अब तो मारपीट होने का कोई प...