यादवेन्द्र का आलेख 'जब उजाले यादों के स्याह हो जाएँ'
यादवेन्द्र आत्मीय सम्बन्ध हमें जीवन की ऊष्मा प्रदान करते हैं। ये सम्बन्ध हमें निराशा के बियाबान से बाहर निकाल कर उम्मीद की किरणें बिखेरते हैं। इन सबके मूल में स्मृति का बड़ा हाथ होता है। रोजमर्रा की जिन्दगी जीते हुए हमें इसका अहसास ही नहीं होता कि स्मृतिलोप हो जाने पर क्या परिस्थितियों बनेंगी। स्मृतिलोप होने पर व्यक्ति खुद अपना होशो हवाश खो बैठता है। आत्मीय लोगों यहाँ तक कि पति, पत्नी, मां, पिता, भाई, बहन, बेटे, बेटी तक को पहचान नहीं पाते। आप इस त्रासद स्थिति की कल्पना कर सकते हैं कि आपका अपना कोई अजीज ही आपको पहचानने की क्षमता खो चुका होता है। डिमेंशिया ऐसी ही बीमारी है जिसमें व्यक्ति अपने अतीत की सारी स्मृतियों को विस्मृत कर जाता है। यादवेन्द्र जी ने जी बी प्रभात की कहानी चॉकलेट के साथ साथ लवीनिया ग्रीनलॉ की कविताएँ प्रस्तुत की हैं जो डिमेंशिया की भयावह त्रासदी को व्यक्त करते हैं। लवीनिया ग्रीनलॉ अपनी कविता 'मेरे पिता का जानना न जानना' में लिखती हैं ' वे पेंसिल के बारे में सोचते हैं/ उसी तरह जुराब के बारे में भी/ जब बाथरूम में घुसते हैं/ तो अपने हाथ...