जितेन्द्र कुमार का संस्मरण 'प्रतिबद्ध कथाकार-संपादक अनन्त कुमार सिंह'
![]() |
| अनन्त कुमार सिंह |
आज के समय में साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिका निकालना एक अत्यन्त दुष्कर काम है। यह एक घर फूंक तमाशा है। साहित्यिक पत्रिका निकालने के लिए जुनून की जरूरत होती है। अनन्त कुमार सिंह में वह जुनून था। एक छोटे से शहर आरा से वे 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते रहे। वे एक प्रतिबद्ध कहानीकार तो थे ही, सम्पादन में भी वह प्रतिबद्धता लगातार दिखाई पड़ती है। इस क्रम में वे विचारों को कभी आड़े नहीं आने देते थे। जनवादी लेखक संघ से जुड़े होने के बावजूद 'जनपथ' के सम्पादन में उन्होंने तमाम ऐसे रचनाकारों की मदद ली जो जन संस्कृति मंच या प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे। आज जब इंसानियत खत्म होती जा रही है, उनके बारे में कहा जा सकता है कि सही मायने में वे एक इंसान थे। जो उनके पास गया खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी मदद हो सकती थी, वे बढ़ चढ़ कर करते थे। 'जनपथ' के अंकों में उन्होंने तमाम नए रचनाकारों को प्रकाशित किया। समय समय पर उन्होंने कई विशेषांक प्रकाशित किए जो अब हिन्दी साहित्य की धरोहर हैं। वरिष्ठ आलोचक जितेन्द्र कुमार अरसे से 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े रहे हैं। अपने संस्मरण आलेख में उन्होंने अनन्त कुमार सिंह को शिद्दत के साथ याद किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं जितेन्द्र कुमार का संस्मरण 'प्रतिबद्ध कथाकार-संपादक अनन्त कुमार सिंह'।
'प्रतिबद्ध कथाकार-संपादक अनन्त कुमार सिंह'
जितेन्द्र कुमार
मैं प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय के आवास ‘साकेत’, डी. एम. कोठी रोड (आरा) पीर बाबा मोड़ की तरफ पैदल ही बढ़ रहा था कि स्मार्टफोन दस्तक देने लगा, स्क्रिन पर प्रोफेसर रवीन्द्र नाथ राय का नाम चमक रहा था; बटन दबाने पर दुखद सूचना की आवाज आयी: अनन्त कुमार सिंह नहीं रहे! राय जी का सुझाव था कि शाम पाँच बजे के आस-पास शोक-सभा होनी चाहिए। एकाएक मन को झटका लगा और चतुर्दिक उदासी छा गयी। लगभग साढ़े नौ बज रहे थे और मेरे पाँव मदन जी के हाता की ओर लौट रहे थे। हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का एक मजबूत, समर्पित, प्रतिबद्ध, मानवीय संवेदनाओं से लबालब भरा व्यक्तित्व, कई शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए, हृदयाघात के सामने अचानक ढह गया था।
अनन्त कुमार सिंह का चेहरा बार-बार स्मृति-पटल पर कौंध रहा था; मैं उनकी स्मृतियों में खोता जा रहा था। वे अर्थशास्त्र में मगध विश्वविद्यालय से एम. ए. थे। अर्थशास्त्र का व्याख्याता बनने की अपेक्षा गृह जिला गया के निकट भोजपुर (बिहार) में सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक में मुलाजिम बनना स्वीकार किया और हिन्दी साहित्य की ओर प्रवृत्त हो गये। उनकी कहानी ‘प्रदूषण’ ‘हंस’ कथा मासिक में छपी और वे युवा कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुए। सन् 1982 में जनवादी लेखक संघ की स्थापना हो चुकी थी। प्रो. चंद्रभूषण तिवारी वरिष्ठ आलोचक और जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में से एक, एच. डी. जैन महाविद्यालय, आरा में वरिष्ठ व्याख्याता थे। कथाकार डाॅ. नीरज सिंह भी दुमका, बिहटा से होते हुए आरा में पदस्थापित हो चुके थे और जलेस में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे थे। युवा कहानीकार अनन्त कुमार सिंह भी जलेस से जुड़ गये।
अनन्त कुमार सिंह से मेरी पहली मुलाकात आरा में हुई, लेकिन ठीक-ठाक तिथि और वर्ष मुझे याद नहीं है। उनकी पहली पदस्थापना चरपोखरी (प्रखण्ड) सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक शाखा में हुई थी। वे साहित्यिक पत्रिका ‘जनपथ’ निकालने का निर्णय ले चुके थे और उसका प्रवेशांक निकाल चुके थे। मैं सन् 1985 से 1992 दिसंबर तक दुमका (झारखण्ड) में पदस्थापित था और भाषा साहित्य संगम की गोष्ठियों में शामिल होता था जिसमें प्रो. रामवरण चौधरी, महाकवि सुमन सुरो (अंगिका), प्रो. संध्या गुप्ता (अब दिवंगत), विनय सौरभ (छात्र), ब्रजकिशोर पाठक (अधिकारी) आदि की उपस्थिति रहती थी। सन् 1993 जनवरी में मैं शेरघाटी अनुमंडल (गया) में आ गया जिसमें अनन्त कुमार सिंह जी का गाँव बहेरा कलाँ, पत्रालय, झरी वाया मदनपुर स्थित है। मैं दिसंबर 1996 तक शेरघाटी में रहा, लेकिन परिवार मदन जी का हाता (आरा) में रहता था। अनन्त जी भी मौलाबाग (आरा) में ग्रामीण बैंक के बैंकर साथी अजय श्रीवास्तव के साथ किराये के मकान में रहते थे। उन्हीं दिनों उनसे किसी रविवार को उनके आवास पर मिला और हमारी लेखकीय दोस्ती बढ़ने लगी। हमारी दोस्ती को मजबूती मिली हमारी विचारधारा से। दूसरी काॅमन चीज थी- हम दोनों अपने-अपने विभागों के यूनियनों से सक्रिय रूप से जुड़े थे। हमारे लिए मित्र होना सहज संभाव्य था। सन् 1991 में उनका कहानी-संग्रह ‘चौराहे पर’ प्रकाशित हो चुका था; उन्होंने मुझे वो कहानी-संकलन पढ़ने के लिए दिया था। उसकी प्रतियाँ कम थीं, मैंने संकलन पढ़ने के बाद लौटा दिया था।
1990 के दशक के मध्य बिहार में खेत खलिहान अति क्रांतिकारी से लगा कर क्रांतिकारी किसान आंदोलन की चपेट में थे। उस दौर में जनवादी विचारों से लैस साहित्यिक पत्रिका ‘जनपथ’ निकालना एक चुनौती थी। अनन्त कुमार सिंह ने समन्वयवादी दृष्टि अपनाई। ‘जनपथ’ के संपादन में तीन लेखकों - अनन्त कुमार सिंह, जवाहर पांडेय और शीन हयात के नाम छपते थे। उनकी व्यष्टि समष्टि में विस्तार पा गई थी। ‘जनपथ’ समय चेतना का साहित्यिक आयोजन थी। ‘जनपथ’ का परामर्श मंडल समयानुसार परिवर्तित होता रहा। ‘जनपथ- 7 (1996) के संपादकीय में वे स्पष्टतः घोषित करते है: ‘‘मानव-विरोधी जीवन संदर्भों से अलग लेखकों या इनके संगठनों का कोई सार्थक महत्व तब तक नहीं हो सकता जब तक समान विचारधारा वाले लेखक-रचनाकार एकजुट हो कर अराजक और गैर इंसानी निजाम का विरोध नहीं करते।’’ 1998 मार्च में मैं आरा आ गया था। अनन्त जी ने जनपथ- 1998 में उषा यादव और सुलतान अहमद के साथ मेरी दो ग़ज़लें छापीं। इतना ही नहीं, ‘दर्पण’ स्तम्भ के अंतर्गत चार सद्यः प्रकाशित पुस्तकों- तेलुगु की हास्य-व्यंग्य रचनाएँ (वाई सी वी बेंकटरेड्डी द्वारा अनुवादित), ‘अमराइयाँ’ (उषा यादव का ग़ज़ल-संग्रह), ‘पाँव कटे बिम्ब’ (कुमार नयन का ग़ज़ल), ‘आदिम अग्नि’ (श्याम मोहन अस्थाना का एकांकी-संग्रह) पर मुझसे समीक्षाएँ लिखवायीं। किताबें पढ़ने का मुझे खूब शौक है; उनपर अपना मंतव्य देने की आदत भी है। अनन्त जी शायद मुझमें एक समीक्षक की दृष्टि परख रहे थे। लेखकों और पाठकों के बीच ‘जनपथ’ की पहचान बढ़ रही थी। दूर-दूर से कवि-कथाकार अपनी नयी किताबें समीक्षार्थ ‘जनपथ’ को भेज रहे थे। लगभग 28 पुस्तकें समीक्षार्थ प्राप्त हो चुकी थी। संपादक त्रय के डाॅ. जवाहर पाण्डेय अस्वस्थ चल रहे थे। अनन्त जी ने 24 और पुस्तकें परिचयात्मक टिप्पणी के लिए मुझे दे दीं। ‘एक नजर में’ स्तम्भ के अंतर्गत उन्होंने चौबीस पुस्तकों पर मेरी टिप्पणियाँ छाप कर संपादकीय उदारता का परिचय दिया। सन् 2003 अंक के विशिष्ट संपादक थे मुशर्रफ आलम ‘जाॅकी’ (1962-2021) जो आरा शहर के मूल निवासी थे।
बाद में अनन्त कुमार सिंह ने ‘जनपथ’ का आकार, कलेवर एकदम बदल दिया; इसके संपादन सहयोगी भी बदल गये। 2010 में जगदीश नलिन, अजित आजाद, उपेन्द्र चौहान, अरुण नारायण, ओम प्रकाश मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, शेषनाथ पाण्डेय (मुंबई) आ गये। वर्ष में एक से अधिक अंक निकलने लगे। स्तंभ भी बदल गये- समहुत, स्रोत, बखार और पहली हराई। संपादकीय का नामकरण पहली हराई हो गया था। ‘बखार’ के अंतर्गत विरासत, संस्मरण, इस मोड़ पर, दृष्टि, साक्षात्कार, कथांगन, काव्यांगन, समीक्षा और ‘रपट’ उप-स्तंभ आये। वे विशेषांकों की ओर प्रवृत्त हो गये। 2011 में संपादन सहयोग में नयापन आया। पत्रिका मासिक छपने लगी। ग़ज़ल विशेषांक, नागार्जुन विशेषांक, गोपाल सिंह नेपाली पर केन्द्रित अंक प्रकाशित हुए। 2013 में उन्होंने ओम प्रकाश मिश्र (प्रलेस) और सुनील श्रीवास्तव (जलेस) को सह-संपादक बना दिया और जवाहर पाण्डेय और दिवाकर पाण्डेय को संपादन सहयोगी बनाया। अक्टूबर 2012 का अंक कथाकार मधुकर सिंह पर केन्द्रित था। जून 2013 में जवाहर पाण्डेय और दिवाकर पाण्डेय के साथ मेरा नाम जुड़ गया। मैं जनवरी 2012 में सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण कर चुका था। जवाहर पाण्डेय आरा से पटना चले गये थे। मैं ‘जनपथ’ में रचनात्मक सहयोग बराबर करते आ रहा था। एक बार उनको लगा कि आवास बदलना पड़ेगा। वे जनवरी 2013 में सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक की सेवा से अवकाश ग्रहण कर चुके थे, लेकिन ‘जनपथ’ के लिए आरा ही रहना चाहते थे। अवकाश-ग्रहण के बाद अस्वस्थ रहने लगे थे। वे गठिया रोग (अर्थराइटिस) की गिरफ्त में आ चुके थे। उनके पाँव की अँगुलियाँ टेढ़ी होती जा रही थीं, जोड़ों में दर्द रहता था। पैदल चलना मुश्किल था इसलिए रिक्शे का सहारा लेना अनिवार्य था। पारिश्रमिक देने में इतने उदार थे कि कई रिक्शे वाले उनके भक्त बन चुके थे।
कहानी उनकी प्रिय विधा थी। वे लगातार राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छप रहे थे। सन् 1991 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘चौराहे पर’ प्रकाशित हो चुका था और वे चर्चित युवा कथाकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। छह साल बाद उनका दूसरा कहानी-संग्रह ‘‘और लातुर गुम हो गया’’ प्रकाशन-संस्थान (नई दिल्ली- 2) से प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं। शीघ्र ही, प्रकाशन-संस्थान से उनका तीसरा कहानी संग्रह ‘राग-भैरवी’ सन् 2002 में प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी पन्द्रह नई कहानियाँ संकलित हैं। इसी कड़ी में सन् 2004 में साहित्य-संसद (नई दिल्ली- 45) से 12 कहानियों का संकलन ‘‘तुम्हारी तस्वीर नहीं है यह’’ आया। तीन साल बाद 2007 में आलेख प्रकाशन (दिल्ली-32) से ‘दस कहानियों का संकलन ‘‘कठफोड़वा तथा अन्य कहानियाँ’ प्रकाशित हुआ। अब तक उनकी साठ कहानियाँ चार-संकलनों में प्रकाशित हो चुकी थीं और अन्य कहानियाँ राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छप रही थीं। प्रकाशित संकलनों की प्रतियाँ वे उदारता पूर्वक मित्रों-समीक्षकों को गिफ्ट करते थे, लेकिन उनकी समीक्षा का आग्रह उन्होंने मुझसे कभी नहीं किया, शायद अन्य मित्रों से भी नहीं करते होंगे। उनकी कहानियों की चर्चा जितनी होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई। उनकी कहानियों पर पटना दूरदर्शन से टेलीफिल्म प्रसारित हुआ। ‘‘और लातुर गुम हो गया’ कथा-संग्रह के लिए उनको तीन सम्मान मिले-
(1) राजेश्वर प्रसाद सिंह कथा सम्मान (1997),
(2) साहित्यकार संसद, समस्तीपुर (बिहार) द्वारा 1998 का ‘यशपाल कथा सम्मान’ और
(3) बिहार राष्ट्रभाषा 1998-99 का ‘साहित्य सेवा सम्मान।’
वे पटना आकाशवाणी के प्रिय कथाकार थे। उनकी दर्जनों हिन्दी और मगही कहानियाँ, रूपक और नाटक आकाशवाणी से प्रसारित हैं। उनके सौजन्य से मेरा संपर्क भी पटना आकाशवाणी से हो गया और मेरी दर्जनों वार्ताएं पटना आकाशवाणी से प्रसारित हुई।
अनन्त कुमार सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कथाकार, संपादक, ट्रेड यूनियनिस्ट, सच्चे मित्र तो थे ही, वे साहित्यिक कार्यकर्ता भी थे। वे साहित्यिक पत्रिका ‘उद्भावना’, ‘वागर्थ’, ‘नया ज्ञानोदय, ‘कथन, ‘वर्तमान साहित्य, ‘वसुधा आदि पत्रिकाओं के स्थानीय (आरा) के अभिकर्ता भी थे। अजेय कुमार द्वारा संपादित ‘उद्भावना’ के अनेक जरूरी अंक आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। सव्यसाची, पी. साईनाथ, कैफ़ी आज़मी, कामकाजी महिला विशेषांक, गदर शताब्दी पर विशेष, सहित प्रचुर पठनीय सामग्रियों से सामाजिक-ऐतिहासिक-राजनीतिक चेतना को समृद्ध करने में मदद मिली। उद्भावना की पुस्तिकाएँ बहुत जरूरी लगीं। अनन्त जी के सौजन्य से आरा शहर को ‘उद्भावना’ का रामविलास शर्मा महाविशेषांक (724 पृष्ठ), एवं ‘ज्योति बसु विशेषांक’ (224 पृष्ठ) सुलभ हुए। ‘वसुधा’ के अंक- 71 (समकालीन मराठी साहित्य विशेषांक) अंक- 77, अंक- 72 (पृष्ठ 320), अंक- 58, अंक- 62, अंक- 59-60 मेरे पास सुरक्षित हैं। ‘वसुधा’ प्रगतिशील लेखक संघ का प्रकाशन है। लेकिन अनन्त कुमार सिंह जलेस-प्रलेस-जसम के बीच एक पुल थे। वर्तमान साहित्य के अंक उनके मार्फत मिलते रहे जो संग्रहणीय और पठनीय हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित ‘नया ज्ञानोदय’ का हर अंक विशेषांक होता है। अनन्त कुमार सिंह आरा में ‘नया ज्ञानोदय’ के अभिकर्ता थे। ‘नया ज्ञानोदय’ मैं उन्हीं से लेता था। स्मृतिशेष केदारनाथ सिंह पर केन्द्रित अप्रैल 2018 अंक सहित, महाकवि निराला पर एकाग्र नामवर सिंह (1962-2019), रवि हुआ अस्त, ग़ालिब हर दौर का शायर (1979-1869), मुक्तिबोध पर विशेष (नवम्बर 17) अनेक अंक आज भी मेरी निजी लाइब्रेरी में संरक्षित है। मेरे मार्फत शहर के कई युवा पाठक इनका लाभ उठा चुके है। अनन्त जी की अपनी निजी लाइब्रेरी भी काफ़ी समृद्ध है। जब वे अपने गाँव बहेरा कलाँ, पत्रालय - झिरी, जिला - गया रहने लगे तो अपनी लाइब्रेरी भी गाँव लेते गये।
हम लोगों को बहुत प्रसन्नता तब हुई जब ‘मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग, बिहार सरकार ने हिन्दी सेवी शीर्ष सम्मान एवं पुरस्कार, वर्ष 2016-2017 में अनन्त कुमार सिंह को फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार (दो लाख रुपये) से सम्मानित किया। हिन्दी भवन, पटना में आयोजित उस सम्मान समारोह में मित्रों के साथ मैं भी उपस्थित था।
‘नई धारा’ के संपादक शिवनारायण जी एवं कथाकार अशोक कुमार सिन्हा, अनन्त कुमार सिंह के गहरे मित्र हैं। अशोक जी भोजपुर के हैं और मोहनलाल महतो वियोगी पुरस्कार से सम्मानित हैं। कवि केदारनाथ सिंह ने अशोक कुमार सिन्हा के कथा-संकलनों का लोकार्पण पटना संग्रहालय (पुराना) के सभागार में किया था। मंच संचालक शिवनारायण जी थे। अनन्त जी सामाजिक सरोकार के लेखक थे, शारीरिक परेशानियों के बीच भी केदारनाथ सिंह के सम्मान में पटना हवाई अड्डे पर उपस्थित थे। पटना संग्रहायल में केदार जी के साथ हम लोगों ने सामूहिक फोटो खिंचवाये।
अनन्त कुमार सिंह की जनवादी प्रतिबद्धता स्पष्ट थी। वे जनवादी लेखक संघ की बिहार इकाई के उपाध्यक्ष थे। 16 अप्रैल, 2026 को बहेरा कलाँ (एन. एच. 19, जिला गया) में ब्रह्मभोज एवं श्रद्धाजलि सभा आयोजित थी। नई दिल्ली से भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी सह वरिष्ठ लेखक एवं चिंतक सुभाष शर्मा पधारे थे। उनके साथ पटना से सुधी आलोचक डाॅ. जवाहर पाण्डेय भी थे। गया-औरंगाबाद के अनेक नेता और राजनेता श्रद्धांजलि समारोह में शिरकत कर रहे थे। पचासों फोर व्हीलर उनकी लोकप्रियता और सज्जनता के गवाह थे। जनवादी लेखक संघ के बिहार राज्य सचिव विनीताभ कुमार (बेगुसराय), कूलभूषण जी (पटना), कवि एवं शिक्षक संघ के नेता विजय कुमार सिंह, न्यूज 24 चैनेल के वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे। मेरे साथ प्रगतिशील लेखक संघ के ओम प्रकाश मिश्र थे।
आरा-पटना की साहित्यिक-सांस्कृतिक संगोष्ठियों में मैं अनन्त जी के साथ शामिल हुआ करता। कालिदास रंगशाला में मधुकर सिंह लिखित नृत्य नाटिका का प्रदर्शन था। कवि कृष्ण कल्पित पटना दूरदर्शन के निदेशक थे। दर्शकों के साथ साथ भारतीय पुलिस सेवा के डी. एन. गौतम भी थे। नृत्य नाटिका के प्रदर्शन के बाद मुझे और अनन्त जी को आरा लौटना था। सुभाष शर्मा जी ने हम लोगों को अपनी गाड़ी से पटना जंक्शन छोड़वा दिया। शर्मा साहब जब विश्वेसरैया भवन में पोस्टेड थे तब अनन्त जी ने कहा कि चलिए उनसे उनके कार्यालय में मिला जाये। हम लोगों के साथ जवाहर पाण्डेय भी थे। शर्मा साहब की ईमानदारी और किफ़ायतदारी जगत प्रसिद्ध थी। किसी ने कह दिया कि आज कुछ मीठा-नमकीन होना चाहिए। गुलाबजामुन और समोसे खा कर हम लोग निकले। अनन्त जी सामाजिक समरता के उत्कृष्ट प्रतीक थे।
पाँच अप्रैल 2026 को सुबह अनन्त जी के निधन का समाचार सुन कर आरा के साहित्यिक-सांस्कृतिक समाज में शोक की लहर छा गयी। जलेस के बिहार राज्य अध्यक्ष डाॅ. नीरज सिंह ने कहा कि हम लोगों को चारपहिया वाहन से बहेरा कलाँ चलना चाहिए; चालक नहीं मिला। हम लोग अनन्त जी के अंतिम संस्कार में शिरकत नहीं कर सके। उस दिन संध्या पाँच बजे प्रो. दिवाकर पाण्डेय के आवास पर त्वरित शोक-सभा का आयोजन किया गया; शोकांजलि दी गई। सभी बहुत मर्माहत थे।
तीन दिन बाद गाड़ी का चालक मिल गया। डाॅ. नीरज सिंह, अखिलेश कुमार के साथ मैं भी बहेरा कलाँ गया; हम लोग अनन्त जी के बड़े पुत्र राजेश से मिले, छोटे पुत्र विकास अस्थि-कलश गंगा में विसर्जित करने बनारस गये थे।
16 अप्रैल 2026 को श्राद्ध कर्म निर्धारित था। डाॅ. नीरज जी अस्वस्थ हो गये। ‘जनपथ’ के सह-संपादक ओम प्रकाश मिश्र बहेरा चलने के लिए तैयार हो गये। मारुति वैगनर के लिए चालक भी उपलब्ध हो गया। दिन में गर्मी ज्यादा थी। हम लोग दो बजे दिन में बहेरा पहुँच गये। शब्दांजलि और पुष्पांजलि के शब्द मर्माहत कर रहे थे। अनंत जी मुझसे एक साल बाद सेवानिवृत हुए थे और पहले चले गये। उन्होंने साहित्य, समाज, संस्कृति की अतुलनीय सेवा की।
(आलेख में प्रयुक्त जनपथ के आवरण चित्र हमें जितेन्द्र कुमार जी ने उपलब्ध कराए हैं। इसके लिए हम उनके आभारी हैं।)
![]() |
| जितेन्द्र कुमार |
सम्पर्क
मोबाइल : 9113426600






जितेन्द्र कुमार, आरा,
जवाब देंहटाएंवरिष्ठ कथाकार एवं 'जनपथ' के यशस्वी संपादक स्मृतिशेष अनन्त कुमार सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर मेरा संस्मरण आपने पहली बार ब्लॉग पर प्रकाशित किया है।आभारी हूं।
मार्मिक!
जवाब देंहटाएंअनंत बाबू की सहजता और समर्पण को याद रखा जाएगा। फोन पर हमारी बातें इतनी आत्मीयता से होती थी, जैसे सालों का याराना हो।
संस्मरण बहुत मार्मिक है।
शैलेंद्र शांत