नीतेश व्यास की डायरी के अंश
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| नीतेश व्यास |
नीतेश व्यास की डायरी के अंश
19 जनवरी 2022
आज सवेरे सवा पांच बजे ही पड़ोसी के नल की तीखी धार और गली में भौंकने वाले शहरी-सियारों की आवाज़ों से आंख खुली। अभी ठंड से ठिठुररे बाल-सूर्य के चादर से बाहर निकलने मे बहुत देरी है। ये चादर भी कैसी है जिसका एक तरफ से मुंह खुला है और दूसरी तरफ एक दम स्याह। सोचता हूँ सूरज की गति को किसने तय किया कि भई इधर रात करनी है और इधर दिन। इधर उत्तरायण और इधर दक्षिणायन। मैंने तो कभी कल्पना की थी कि सूरज भी रात को विश्राम करता होगा, खाली बैठा-लेटा सुस्ताता होगा। उसी आवेग मे एक कविता भी लिखी थी-
रात को
खाली बैठा सूरज
क्या लिखता होगा कविताएं
या फिर
पिछले दिन का हिसाब करता हुआ
यूं ही गवा देता होगा
अपना एकान्त।
किसी विज्ञानविद् मित्र ने उपहास करते हुए कहा भी था क्या पंडित जी, कुछ भी? लेकिन मैं उन्हें उस समय कह नहीं पाया। आज सोचता हूं कि कवि को तो हमारी परम्परा में प्रजापति कहा गया है, उसे जैसी सृष्टि सुहाती वैसा रच लेता अपना काव्य-संसार-
अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापति।
यथास्मै रोचते वीश्वं तथैव परिवर्तते।।
इस बीच चाय बना कर पीता हूँ। कबूतरों की आवाज़ एक लय मे बंधी हुई चली आ रही है।अखबार वाला अखबार डाल कर चला गया है। मैं उसे अभी नहीं लेता, अगर मेरा बस चलता तो कभी नहीं। क्या ख़बर आती है जो हमें पहले से पता नहीं और हम भी हमारी मरी हुई आत्मा को कितनी बार मारें। कभी तीन साल की तो कभी तेरह साल की बच्ची को हैवानों ने ख़राब कर दिया। ये हैवानगी-दरिन्दगी गुज़रे वक्त़ों ने शायद ही देखी होगी, देखी-सुनी भी होगी इस कदर ख़बर बन लगातार अख़बार मे छपती हुई न देखी होगी। कहां जा रहा है मनुष्य, मानवता कहीं पीछे दम तोड़ चुकी। हाड़-मांस के लौथडे आगे बढते गये, कब आत्मा ने इस बर्बर देह से पीछा छुडाया। बस पींजरे ही सरके जा रहे हैं एक सदी से दूसरी सदी में।
सर्दी में आवाजें ओर भी अन्दर तक महसूस होती, भीतर तक इतने पास कि कभी तो लगता कुत्तों का भौंकना, कबूतरों की गुटरगूं, रेल का हार्न, अज़ान, आरती, नल से पानी का गिरना, फ्रिज़ का तानपुरा, बाइजी महाराज के कीर्तनियों की लय सब घुल-मिल कर न जाने मुझे क्या सुनाना चाहते या कि मेरे सुनने को ओर वैविध्यपूर्ण-ग्राह्य बनाना चाहते। जैसे कह रहे हों अभी सुन लो ये आवाजें, दिन के शोर में गुम हो जाएंगी और कल का कुछ पता नहीं कि ये सुबह फिर हो न हो, सुबह भी हो पर आवाजें, इतनी सारी एक साथ, प्रभाती राग सी जिसमें सारे संवादी और विवादी स्वर एक साथ बज रहे हों, अभी सुन लो कि सुनना ही होना है।
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| निर्मल वर्मा |
23 जनवरी 2022
कल शाम से ही ठिठुरता रहा बल्कि सुबह ही से एक कंपकंपी, देह में झुरझुराने लगी थी जिसे दरकिनार करते हुए कालेज पहुंचा। जाते ही अपनी अध्ययन सामग्री ले कर धूप की तलाश में छत पर चला गया। जहां दो कुर्सियों पर सिमट कर बैठी धूप मेरा इन्तजार कर रही थी। बादल की चादर से मुंह निकालता सूरज मानो सर्दी के कारण अपनी रजाई से बाहर न आना चाहता हो। थोड़ी देर बैठा, चादर को ही मेरी हालत पर तरस आया वो खुद ब खुद अपने मे सिमटी और सूरज की तपतपाती देह ने मेरी देह-रोमावली को ज्यों ही छुआ एक गर्म-नर्म सा अहसास देह की परत के भीतर तक महसूस हुआ। मैं धुंध से उठती धुन के अन्तिम आलाप की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा था और वो धुन अपने कुहासे से मुझे ढके जा रही थी।
अक्षरों से लिपटने का ताप, भाप बन मेरे नासरंन्ध्रों से होता हुआ रक्तवाही हो रहा था। सर्दी बढ़ रही थी मानो किताब के पन्नों से निकल मेरे ऊपर बर्फ की हल्की फुहार कर रही हो। कुछ देर बाद धूप ने अपना आदिम रूप धरा तो देह के भीतर का लोहा पिघल कर धमनियों में दौड़ता महसूस हुआ। झट से कुर्सी ने छांव तलाशी और मैं एक उदासी ओढे उस पर जा धंसा। कैसा जीवन है? न धूप ज्यादा सुहाती, न ही ज्यादा छांव, तब निरन्तर बहने वाले सुख-दुख का प्रवाह मनुष्य को कहां टिकने देता भावैक्य में।
सोचते-सोचते धूप फिर हवा हो गयी, कक्षाएं ली, किताब पूरी की। कुछ किताबें पूरी होते-होते फिर फिर अपने में खींचती। हम पलट कर वापस शुरु करना चाहते लेकिन अगली किताब को पढ़ने की लालसा उसे रोक लेती। अपने जन्मदिन के एक दिन पूर्व समाप्त, ऐसा अन्तिम पृष्ठ पर लिख कर किताब को किनारे रखा। मैं किताब पढता तो शुरु और समापन की तारीखें उसमे अवश्य लिखता, ये एक नियम था।
एक लेखक (निर्मल वर्मा) कितने लेखकों से मेरा परिचय करवाता हुआ मेरे मानस में विश्व साहित्य के कितने पदचिन्ह छोड़ता चला जा रहा था।इनमें कईयों के तो नाम ही सुने थे आज तक। लेकिन उनके उत्कृष्ट एवं चेतना सम्पन्न उद्धरणों में अवगाहन कर अभी असीम शान्ति और परम तोष पाया। मानों सारा ब्रह्माण्ड शब्द ब्रह्म के रूप मे मेरा आलिंगन कर रहा है। कहां मिल पाता मैं इन लेखकों से। दोस्तोवस्की, नायपाल, रिल्के, चेखव, पाज़, सिम्बोर्सका, मार्केज़ और भी न जाने कितने शब्द ब्रह्म के उपासकों ने मेरी चेतना सिंधु मे अपने विचार बिंदु बरसा कर उसे सम्पन्न किया, कर रहे हैं। मैं अपना परम सौभाग्य मानता हूँ और लोर्का के पत्रों का सुशोभित कृत अनुवाद पढने निकल पड़ता हूँ।
14 फरवरी 2022
प्रेम के लिए कोई दिवस विशेष नही होता। हां, हम सदा से ही उत्सव प्रिय रहे हैं अतः हम हर देशी-विदेशी त्योहार और परम्परा को मनाते रहते हैं। मेरी जीवन संगिनी जिनका नाम ही प्रेमलता (प्रेमा) है उनके साथ, आने वाले मई माह में ग्यारह वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। बहुत सरल एवं सुलझी हुई सीरत और करुणामयी मूरत ने सात कदम चल कर ग्यारह वर्षों का सफर मेरी परछाई बन कर तय किया है। हर सुख, हर दुःख, हर खुशी, हर ग़म में कंधे से कंधा मिला कर एक दोस्त की तरह मुझे संभाला है और मैं कृतघ्न की भांति उनके हर त्याग और भरपूर सेवा को कभी रेखांकित ही नहीं कर पाया। हालांकि उन्होंने इस विषय मे भी मुझसे कभी भी शिकायत नहीं की। कल मेरी पुस्तक का लोकार्पण कार्यक्रम था, वहां भी सारे परिवार जन के नाम-स्मरण अवसर पर भी प्रमादवश उनका आभार व्यक्त करना चूक गया। जैसे आत्मा से भिन्न देह कुछ भी नहीं जैसे शक्ति के बिना शिव भी शव है। वैसे ही आपके बिना नितेश व्यास कुछ नहीं। आपने मुझे अवकाश दिया तभी मैं अपने अध्ययन और लेखन में निरन्तर संलग्न रह पाया। घर-परिवार की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों को आप स्वयं अपने स्तर पर निभाती चलीं, इस हेतु धन्यवाद या आभार शब्द बहुत छोटे हो कर एक तरफ हो जाते हैं क्योंकि आपके विराट समर्पण के सामने मेरा तीन अक्षरों वाला शब्द रेत में कण के समान कहीं खो जाता है। ग्यारह वर्षों के मेरे व्यवहार या किसी आचरण से आपको ठेस पहुंची हो तो आज के दिन उसे अपने नेह से धो दें और मुझे फिर-फिर से अपनी निर्मल-ज्योत्स्ना (उनका नाम) में आश्रय देती रहें।
4 मार्च 2022
हताशा की एक लम्बी रेखा खिंचती है मेरे चेहरे पर। वह और लम्बी होती जा रही है। शायद अब वो मेरी आत्मा को छू रही है।
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उदासी इस धरती की सातवीं ऋतु तो नहीं?
कभी बैठे-बैठे विचार मौन हो जाते, शब्द तंग करने लगते, स्मृति दूर पेड़ के हिलते हुए पत्ते सी कांपती दिखती तब उदासी की एक चादर सारे प्रपंच को झाड़ कर, मुझे अपने में समेट लेती और सबसे दूर अन्तरंग जगत् की गूढतम खोह में मुझे छुपा कर बिठा देती जैसे पहले कभी छुपाछुपी खेलते हुए घर के पास वाली बावड़ी के अंधेरे हिस्से में जा कर छुप बैठता था। जहां आलोक तो था ही नहीं। था तो बस सन्नाटे का शोर। किसी चोर की तरह वहां छुप बैठना खेल था। आज अपने ही भीतर किसी आले में जहां कभी रखा था चेतन-दीप, अपनी उदासी मे लिपटा पड़ा हूँ।
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| सत्यनारायण |
15 मार्च 2022
कल ही सत्यनारायण सर का रेडियो पर प्रसारित साक्षात्कार सुना। सत्यनारायण सर को सुनना हर बार समृद्ध करता है और उनके पास बैठना अपने भीतर मौन को भरना होता है। प्रस्तावक ने सर के जन्म-जीवन से सम्बन्धित आरम्भिक बातों और प्रारम्भिक शिक्षा से बात शुरु की जो कि लेखन-यात्रा के आरम्भ पर आ ठहरी। सर ने बताया कि किस तरह वे हर दिन डायरी में अपनी आपबीती लिखते थे। लेकिन जब विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए शहर आये तो मित्रों ने उनकी डायरी देख शैली की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह तो लेखकों वाली भाषा है। तुम इसे प्रकाशित कराओ। तब पहली बार जोधपुर से निकलने वाली किसी पत्रिका में डायरी के कुछ अंश प्रकाशित हुए। तब से सतत रूप से आप लेखन में समर्पित हैं। सर ने डायरी के अतिरिक्त संस्मरण, रिपोर्ताज़, कविताएं, रेखाचित्र आदि विधाओं मे भी लेखन किया है और आज भी लिख रहे हैं।
आज 15 मार्च की सुबह भास्कर मे प्रकाशित सर का एक आलेख जैसलमेर भादरिया पुस्तकालय को ले कर छपा। जैसा कि सत्यनारायण जी को जानने वालों को पता है कि सर यायावर प्रकृति के हैं। सुबह जोधपुर में मिल कर आया। शाम को फोन किया तो बोले जयपुर आ गया। यात्राएं जीवन को नित नूतन अनुभवों से भरती हैं। मुक्तिबोध ने कहा है कविता एक आवेग त्वरित कालयात्री है तो कवि-लेखक का यात्री होना कोई अचरज की बात नहीं। यात्राएं भीतर-बाहर की, हमें मांजती हैं, निखारती हैं, दृष्टि को विकसित और विस्तारित करती हैं।लेखक के लिए तो यात्राएं आवश्यक खूराक की तरह होती हैं। लेकिन आज मुझ जैसे अनेक हैं जो वर्ष भर में भी बहुत कम यात्राएं कर पाते।
जीवन की यातनाएं, घर-गृहस्थी, प्राइवेट नौकरी आदि जिम्मेदारियों में ही जीवन खपा रह जाता। ऐसे में कैसे यात्राओं के आनन्द और उनके मर्म को भला जान सकते।
भादरिया की रिपोर्टिंग करते हुए सर ने उसके इतिहास और वर्तमान के मध्य एक सेतु बना दिया जिससे होता हुआ मैं उस रेत-नदी की लहरों पर सवार हो पहुंचता हूँ, वहीं जहां दो टिमटिमाते मोती झांकते हैं। भीतर पुस्तकालय के या जिसके बीचो-बीच लाखों पुस्तकें, बंधकों सी झांकती शीशों से और सूरज की किरणों पर लिख भेजती अपना संदेश बाहर की दुनिया को, देती अपना पता हवा को कि कोई पवन-पखेरु या कोई रश्मिरथी सुन सके उनकी मूक-हूक। मुझे ऋग्वैदिक इन्द्र सूक्त में वृत्र द्वारा अपने बाड़े में बन्द की गयी गायों (प्रकाश की किरणों) की याद आती है जिन्हें इन्द्र ने वृत्र (नाम मेघ जो किरणों का तिरोधान कर छुपा लेता ओट में) का वध कर छुडाया और लोक को पुन आलोकित किया। 562 तालों के पार लाखों प्रकाश की गोएं लोक को आलोकित करने को आतुर बैठी भीतर ही भीतर कलप रही हैं कि कब कोई इन्द्र इस रेत-सरित् को पार कर आए और छुडाए हमें बन्धन से कि हमारे प्रकाश-स्पर्श से मानव जाति में हो सके नूतन प्राण-संचार, हो ज्ञान का विस्तार। किताबें क्यूं झांकती है बन्द अलमारी के शीशों से। उन्हें झांकनी चाहिए मेरी, आपकी, हम सबकी आंखों से।
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| लोर्का |
19 मार्च 2022
पढ़ने का आनन्द लिखने के आनन्द से सहस्र गुना अधिक है। पढ़ना रचे हुए का पुनर्रचन है जिए हुए का पुनर्जीवन भी। मेरे लिए पढ़ना अपने देश-काल से छिटक कर पन्नों की पगडंडियों से होते हुए उस भूत तक पहुंचने का साधन भी है, जहां जिस परिस्थिति मे लेखक रहा होगा। उसकी करुणा उसकी संवेदना मानो मेरे भीतर मुझे छिटक उस की हो जाती। अभी सुशोभित द्वारा लोर्का के पत्रों से गुज़रने का आशीष मिला। स्पेनिश कवि जो अल्पवय में ही फासिस्टों के द्वारा मार दिया गया लेकिन देह मरने से विदेही को क्या, स्थूल के विनाश से सूक्ष्म में क्या घटता? वैसे ही कवि-लेखक की मृत्यु से उसके विचार में, उसके रचे हुए में क्या कमी आती, वो तो दिन की आभा की तरह फैलता और कोने-कोने को भर देता प्रकाश से। प्रकाश भी साधारण आंखों में चुंधियाने वाला नहीं। ज्ञान का शीतल प्रकाश, प्रज्ञा का स्नेहित आतप जो धीरे धीरे मौढ्य को हरता, विकसाता हृद-पंकज को, पंक मध्य अपंक।
अनुवाद किस तरह से किसी भी भाषा के लेखन को (चुंकि वो भाव-भावना में एक ही होता) पाठक तक पहुंचा कर उसे तदाकाराकारित कर ही देता। लोर्का के पत्रों को पढ़ते हुए मैं संवेदना की उसी आंच का अनुभव करता हूं जो निर्मल वर्मा के पत्रों, महादेवी की कविताओं, हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखों और कुबेर नाथ राय के ललित निबन्धों में। पढ़ना हर समय आत्मा को भरना होता है केवल विचार से नहीं संवेदना से भी। संवेदना का सूक्ष्म तन्तु मेरे पढ़े हुए हर लेखक कवि के चेतनावचेतन को इस प्रकार निज में पिरोता चला जाता जहां भाषाएं दूर तट पर खडी पताका सी लहराती और भाव, सिन्धु में उछालें मारती तरंगों सा हृदय को हिलोरता।
हर पुस्तक अपने छुपे रहस्य के प्रति एक कौतुक ले कर मेरे निकट आती और जब वह मुझ पर खुलती तो किसी रहस्य-लोक की दिव्य आभा-सा मीठा प्रकाश भीतर उतरता, आलोक का एक बिन्दु हृदय-सिन्धु में मिल अनन्त गुना हो जाता जो कभी छलक आता नेत्र-नद से। मैं अपने में अहोभाव से युक्त होता कि जीवन की इस अथक रेलम्पेल में ईश्वर ने मुझे संजीवनी के रूप में दी हैं ये पुस्तकें।
जैसे एक अच्छा और सच्चा मित्र अपने मिलने वाले मित्र को दूर से अच्छे और सच्चे मित्र का पता अवश्य देता है वैसे एक पुस्तक अपने पाठक को दूसरी पुस्तक का पता देती है और इनकी दोस्ती इतनी पक्की है कि एक के आते ही दूसरी अपने को गौण कर लेती।
पत्र मे एक पंक्ति आती है- 'अंजाने अरण्य में भोर एक गुप्त चाबी छुपा कर रखती है'। मेरी भी कल्पना में बहुत पहले से एक गुप्त चाबी जो जीवन-रहस्य के बन्द-कपाट को खोल उससे मेरा सामना करवा सके, को खोजता रहा हूं। मेरा मित्र अनूप यह जानता है क्योंकि ऐसी अनर्गल चर्चाएं मैं कभी-कभी उससे करता हूं। कभी मैंने उसे कहा था कि कुछ रहस्यमय तरीके से मेरे जीवन में अवश्य घटित होगा, शायद कोई चमत्कार और अब जब कि मैं पढ़ने लिखने की दुनिया में आनन्द से अपने सारे दुखों, ओछी एषणाओं को तकिये तले दबा कर आराम से किताब पढ़ता हूं तो क्या पुस्तक ही मेरे उस रहस्य लोक की द्वार-अर्गला का उत्कीलन है? जो भी हो निरन्तर पढ़ने की चाह का बना रहना, किसी वरदान से कम नहीं।
आल तू जलाल तू
आई बला को टाल तू।
मेरे पठन-प्रेम को बुरी नज़र से बचाना। ऐ शैतानों के देवता मैं पहले तुझे प्रणाम करता हूँ, लोर्का को उसके बाद।
21 मार्च 2022
शैली की एक कविता है 'प्रोमेथियस अनवाउंड' जिस पर धर्मवीर भारती ने 'प्रमथ्यु गाथा' नाम से एक कविता लिखी है। प्रमथ्यु पृथ्वी लोक के मानवों का प्रतिनिधि है। यह स्वर्ग में कैद अग्नि को देवताओं (द्युपितर/जुपिटर) से छुड़ा कर पृथ्वी लोक में लाता है जिससे पृथ्वी लोक का अंधकार दूर हो सके। जिसकी सजा उसे बहुत कड़ी मिलती है। इस अपराध हेतु देवता उसे जंजीरों से बांध कर लटका देते हैं तथा उसे मृत्यु न दे कर विविध यातनाओं द्वारा उसका शोषण करते हैं। एक बूढ़ा गिद्ध उसके कंधे पर बैठ धीरे-धीरे उसके हृदय-पिंड को खाता है, घाव रिसता जाता गिद्ध खाता जाता।
लोर्का ने एक पत्र में पंक्ति लिखी है- 'प्रमथ्यु की तरह मैं बेड़ियों में जकड़ा हुआ हूं जिन्हें खींचते हुए आगे बढ़ना मेरे लिए कठिन है।' लेकिन आगे बढ़ने और स्वयं के भीतर छुपी उस अनन्त कविता को अभिव्यक्त करने की उत्कट आकांक्षा के सामने भला कौन बेड़ियां टिक सकती। प्रकाश अथवा ज्ञान की खोज करने वाला प्रमथ्यु से कम तो क्या ही हो सकता।
भीतर-बाहर, परिवार-समाज, जाति-धर्म, वर्ण-समुदाय की अनन्त बेड़ियों से जकड़ा प्रमथ्यु मथिजता है स्वयं में।
प्रमथ्यु के कंधे पर बैठा हुआ बूढ़ा गिद्ध खाता है उसका हृदय पिंड रोज़ नोच-नोच कर। रात होते-होते घाव फिर भर जाता और अगले दिन गिद्ध फिर हृदय पिंड भक्षण में लग जाता।
मेरे कंधे पर भी बैठा है लालच का, ईर्ष्या का, क्रोध का, घृणा का ऐसा ही कोई गिद्ध जो प्रतिदिन मेरे हृदय को नोच-नोच खाता। हालांकि मैं नही लाया अग्नि को स्वर्ग से निकाल कर लेकिन अपने पूर्वजों के दंड भागी तो मैं भी हूं ना। मैं भीड़ में हूं। अभी सोया है मेरा प्रमथ्यु और तुम्हारा भी। उसे जगाना है, जाग का स्वप्न मुझे रोज़ आता है लेकिन फिर-फिर गिद्ध मेरे हृदय को खाता है वो भी स्वयं को मेरा पूर्वज कहता।मेरी धरती अंधेरे से आच्छादित और मेरे हृदय-रक्त से रंजित है उसे त्राण चाहिए, चेतना के तरकश का एक बाण चाहिए जो भेद सके गिद्ध का हृदय, धनुष की टंकार; जो सोये प्रमथ्यु को जगा सके कि कोई दूसरा नहीं लाएगा तुम्हारे लिए आग, जागना होगा खुद को ही जगाने उस आग को।
15 सितम्बर 2022
मैं छटपटा रहा हूँ।
कुछ दिनों से मेरे भीतर एक युद्ध चल रहा है न लिख पाने का। कुछ न कुछ पढ़ना मेरे लिए लिखने का एक मार्ग रहा है लेकिन कभी-कभी पढते हुए भी लिखने के लिए एक शब्द नहीं होता। हमारे कई पुरखे ऐसे भी हुए हैं जो प्रतिदिन कुछ न कुछ लिखे बिना भोजन तक ग्रहण नहीं करते थे। लिखा तो अभी भी बहुत कुछ जा रहा है लेकिन लिखे हुए को पढ़ने से जो आत्मिक शान्ति मिलनी चाहिए आज के फेसबुकिया लेखन मे वो नहीं दिखती।
17 अक्टूबर 2022
अगर लिखने वाला गायक है तो प्रतीक्षा एक राग है जो चलती ही रहती उसके भीतर। मैं लिखने की प्रतीक्षा से भरा हुआ हूं। कब से कांटा डाल कर बैठा हूं नदी के तट पर। एक भी शब्द न लिख पाने की हताशा। एक भी शब्द, जिसके विषय मे पतंजलि लिख गये : 'एक शब्द ही जानो, शास्त्रसम्मत जानो, अच्छी तरह से प्रयोग करो तो वह स्वर्ग और इस लोक दोनों में कामना की पूर्ति करने वाला होता है।' कामना किसकी, शब्द की या उससे साध्य अर्थ की। रिल्के ने अपने पत्रों में बड़े मार्मिक ढंग से प्रतीक्षा को गाया और पाया भी। प्रतीक्षा को पाना भी इतना आसान नहीं, वह भी साधना के सातत्य का परिपाक है।
09 मार्च 2026
भैरव, गुर्जरी और रामकली ये सुबह के राग हैं कोमल स्वर रे, ध के प्रयोग से इनका गायन होता है। सामान्य बुद्धि से सोचने यह व्यक्ति वाला जिसे संगीत का विशिष्ट ज्ञान नहीं, सोचता हूं कि राग भैरव में जो भैरव शब्द का प्रयोग है वह तो भीषण रव का द्योतक है। इसका प्रयोग सुबह और वो भी कोमल स्वरों के साथ। कितना प्रतीक विपर्यय प्रतीत होता है। प्रतीति वास्तविक हो ऐसा जरूरी तो नहीं?
सुबह के छः बजे छत पर पक्षियों के गान को सुनते हुए, पूर्व दिशा की राग को देखते हुए भैरव का विकराल और कारुणिक रूपद्वय की स्मृति हो आई।
"करकलित कपाल:कुंडली दंडपाणि,
तरुणतिमिरनील: व्यालयज्ञोपवीति
क्रतुसमयसपर्या विघ्नविच्छेदहेतुर्
जयति बटुकनाथ: सिद्धिद:साधकानाम्।।
हाथ में कपाल है, दण्ड है तरुणतिमिरनील:, क्या ही उपमा है युवा अन्धकार जैसे नील, नील कृष्णवर्ण को भी कहते शिव का एक नाम "नीललोहित" भी है, सर्पोपवीतधारी हैं। लेकिन कोई शरणागत हो आत्मार्पणपूजन करे तो उसके सारे विघ्न हर कर उसे सिद्धि देने वाले भी यही हैं।
सृष्टि की राग-प्रभाती भी क्या नहीं होती नीललोहित। पूर्वाकाश के लालित्य की किंचित आभा शेषाकाश का कृष्णवर्णी प्रभा मिल कर स्तुति करती है प्रात:भैरव की। उज्जैन महाकाल की प्रातःकालीन भस्म आरती डिमडिम निनाद के साथ भैरव को जगाती। हालांकि कपाली कब सोते हैं वे तो रात को जगत की पीड़ा पर रोते हैं, ओस की बूंदें जो आंसुओं के रूप में बरसती, फूलपात उन्हें अपनी हथेलियों पर सहेज लेते और वे ओस कण, मणि बन भोर की मांग में सजते, जिसे दिवसावसान में भैरवी सुहागिन सेज पर शयन करती हुई अपनी मांग में धारण कर अन्त में गायी जा कर जगत् को विश्रांति देती है।
सम्पर्क
मोबाइल : 9829831299





बहुत ही सधे शब्दों में Dr.नितेश व्यास ने आज की वस्तुस्थिति को कलमबद्ध किया है l
जवाब देंहटाएंसाधुवाद
लेखक शब्दों से रचता है। इसलिए वह जिस जगत को रचता है उसका विधाता होता है। डायरी में एक जगत रचा गया है। यह एक उत्कृष्ट साहित्यिक रचना बन पड़ी है।
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