गोविन्द निषाद का संस्मरण 'स्मृतियों में राजेन्द्र कुमार'
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| राजेन्द्र कुमार |
राजेन्द्र कुमार जी की एक तरफ जहां वरिष्ठ लोगों से जुड़े हुए थे वहीं दूसरी तरफ वे बिल्कुल नए रचनाकारों से भी बिना किसी हिचक के शीघ्र ही जुड़ जाते थे। यही वजह है कि उनके चाहने वालों में एक बड़ा वर्ग उन युवाओं का रहा, जिन्हें उन्होंने कभी पढ़ाया नहीं, या कभी अपनी पत्रिका में प्रकाशित नहीं किया। इन युवाओं का जुड़ाव उनकी सरलता सहजता की वजह से हुआ। इन युवाओं का जुड़ाव उनकी विद्वता की वजह से हुआ। गोविन्द निषाद इलाहाबाद के उभरते हुए कवि कहानीकार हैं। उनका गद्य सरस, सहज और आकर्षक होता है। गोविन्द हालांकि राजेन्द्र कुमार जी से कभी मिल नहीं पाए। मिले भी तो मृत्यु की सूचना के पश्चात। लेकिन उनके पास राजेन्द्र कुमार जी से जुड़ा एक आत्मीय संस्मरण है। अपने संस्मरण में गोविन्द लिखते हैं 'अभी मेरी एक कहानी प्रकाशित हुई है तद्भव में, "तो आ रही है मिस काजल" जिसका शीर्षक है। सर ने उसको पढ़ा। इस समय तक वो पढ़ रहे थे कि 'तद्भव' में क्या लिखा जा रहा है? उस कहानी को उन्होंने पढ़ा और मेरा उस पर पता लिखा हुआ था कि मैं इलाहाबाद में रहता हूँ। मुझे यह बात तब पता चली जब किसी ने मुझे बताया मुझसे कि सर तुम्हारी कहानी पढे हैं और वो तुमसे बात करना चाहते हैं।' आज जब राजेन्द्र जी की महज स्मृतियों में रह गए हैं ऐसे में गोविन्द का यह संस्मरण राजेन्द्र कुमार जी की उस विशेषता को प्रदर्शित करता है जो उन्हें युवाओं में भी लोकप्रिय बनाता था। पहली बार पर आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं गोविन्द निषाद का संस्मरण 'स्मृतियों में राजेन्द्र कुमार'।
'स्मृतियों में राजेन्द्र कुमार'
गोविन्द निषाद
कल की सुबह एक ऐसी सुबह थी जिसमें थोड़ी सी गर्मी ज्यादा थी। जब मैं सो कर उठा तो धूप सिरहाने तक आ गयी थी। बाहर निकलने पर धूप इतनी तेज लगी कि मुझे एक बार को लगा कि कही जेठ सीधे नहीं आ गया है फागुन को बीच में छोड़ कर। यह दिन इसलिए खास था क्योंकि आज हम स्मितियों की एक दुनिया में जाने वाले थे वो दुनिया थी पिछले 16 जनवरी को हमारे बीच से चले गए हमारे शहर के विद्वान हम सबके प्रिय प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार सर की। स्मृतियों की इस दुनिया में आज उन्हें शहर याद करने के लिए जुटने वाला था अंजुमन रूह-ए-अदब के प्रांगण में जिसके पास ही है मेयो हाल जो अंग्रेजो के समय बना था और ठीक बगल में है अमिताभ बच्चन स्पोर्ट्स कांप्लेक्स।
मैं निकला तो धूप सर के ऊपर गिर कर सीधी होकर थोड़ी-थोड़ी टेढ़ी होनी शुरू हो गई थी इसका मतलब था कि दोपहर के एक बजे के बाद करीब-करीब दो बजने को हो आए थे जबकि मुझे दो बजे पहुंच जाना था। मैं झूंसी से ऑटो लिया सीधे चुंगी से आगे बैरहना डॉट पुल के पास पुराना देहाती रसगुल्ला वाली जगह पहुंचा। मैं खड़ा हो गया अपनी दोस्त का इंतजार करने के लिए जो मेरे साथ चलने वाली थी लेकिन वह थी कि कॉल पर कॉल करने पर बस यही कह रही थी कि बस पांच मिनट में आई। उसका पांच मिनट किस हिसाब से आधा घंटा होता है इसका हिसाब दुनिया के किसी गणितज्ञ के पास शायद ही हो। जब वह आयी तो एक गाना गुनगुनाने लगी— "मैं देर करता नहीं देर हो जाती है।" मैंने कहा कि भाई देर नहीं हो जाती है, देर जानबूझ कर कर देती हो। तुम्हें समय का पाबंद होना चाहिए। उसने भी कह दिया कि देखो दोस्त हो तो दोस्त की तरह रहो, ज्यादा प्रेमी बनने की कोशिश न करो। मेरा प्रेमी तो पूरा दिन यहीं इंतजार करता रहेगा लेकिन चूं भी नहीं कर सकता है मेरे सामने। अच्छा तो तुमने प्रेमी पाला है या कुत्ता? मैं बिहस पड़ा और उसने मुझे एक जोर की थप्पड़ पीठ पर रसीद कर दिया।
ऑटो के लिए खड़े हुए तो ऑटो वाले जल्दी मिल ही नहीं रहे थे। मेला की ज्यादातर सवारियां उसमें बैठी हुई थी। किसी तरह एक बैटरी वाला खाली मिला जिससे हम दोनों मेयो हाल चौराहा पहुंचे। अंजुमन रूह-ए-अदब के गेट पर ही एक बड़ा सा राजेन्द्र सर का कट आउट लगा हुआ था जिस पर उनकी एक तस्वीर थी और नीचे उनका नाम और जन्मतिथि और पुण्यतिथि दर्ज़ थी। मैं उसको ध्यान से देखा तो लगा कि सर अभी उठेंगे—माइक पकड़ेंगे और बोलना शुरू कर देंगे क्योंकि वो अक्सर वैसे ही मुद्रा में हमें अक्सर सभाओं में बैठे हुए दिखाई देते थे। उनकी उसी मुद्रा को मैं उनकी केंद्रीय मुद्रा मानता हूँ कि वो अक्सर ऐसे गाल पर यूं ही हाथ टिका देते और ध्यान से वक्ताओं को सुनते रहते थे।
मैं थोडी देर वहाँ खडा उन्हें देख ही रहा था कि तभी वहाँ से बसंत त्रिपाठी सर गुजरे। मैंने उनको नमस्ते किया। उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा और वो चले गए। उसके तुरंत बाद संतोष भदौरिया सर आ गए। मैंने उन्हें भी नमस्ते किया और उन्होंने भी मेरा हालचाल पूछा और अंदर चले गए। मैं जैसे ही आगे बढूं उससे पहले ही मुझे दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर में हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर राम नरेश सर मिल गए जो मेरे जिले के रहने वाले हैं। मैंने उनसे भी उनका हालचाल पूछा। अब तो मुझे लगा कि अगर मैं यहाँ खड़ा रहा तो ऐसा लगेगा कि मैं सबका स्वागत करने के लिए यहाँ खड़ा हूँ। जितने लोग यहां से गुजरेंगे उन सब लोगों को मैं नमस्ते करूँगा- सब लोग मेरा हालचाल पूछेंगे। यह मुझे थोड़ा अटपटा लगा। यहाँ से मैं अंदर बढ़ा ही था कि सामने ही राजेन्द्र सर की स्मृतियों का कोलाज लगा हुआ मिल गया। उनकी तस्वीरें लगी हुई थी। उन तस्वीरों में राजेन्द्र सर का जीवन जो धीरे-धीरे बढ़ रहा था, उसको दर्शाया गया था। साथ में था उनकी साहित्यिक यात्रा का विवरण। उन तस्वीरों में वे थे, उनका परिवार था, उनकी पत्नी थी, बच्चे थे और उनके अध्यापकीय जीवन की तस्वीरें थीं, उनके शिष्य थे, मित्र थे, अनुज थे। जैसे ही मैं आगे थोड़ा और बढ़ा उनकी एक कविता का कट आउट मुझे मिला जिस पर उनकी कविता कुछ यूं अंकित थी—
"हम हों, न हों
साबुत दिल के वारिस
हरदम रहेंगे दुनिया में"
तो अब थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़ने पर एक बड़ा सा पांडा दिखा जिसमें बहुत सारे लोग इकट्ठा खड़े थे और उसमें लगभग चेहरे मेरे जाने-पहचाने से ही थे क्योंकि लगभग चेहरों को मैं देखता रहा हूँ तो मैं पहचान पा रहा था कि कौन कहां खड़ा है? इसमें इलाहाबाद की नवोदित पीढ़ी से युवा पीढ़ी से होते हुए वरिष्ठ जन सभी शामिल थे। कुर्सियाँ लगी हुई थीं। मुझे प्यास लगी थी क्योंकि मैं दूर से चल कर आया था तो मैं मयखाने की तरफ़ चल निकला। काफ़ी खोजने के बाद आखिर पानी मिल ही गया। मैंने पूरा लिया क्यूंकि मुझे डर नहीं था। क्यूंकि नशा शराब में होती तो नाचती बोतल तो मैं कैसे नाच सकता था। अगर किसी को नाचना था तो वह थी बोतल, जिसे मैं कूड़ेदान में फेंक आया। मैं पीछे पहुँचा तो वहां शाम का भोजन बनाने में बावर्ची जुटे हुए थे और मैंने फिर पानी पिया और वापस लौट कर पंडाल में आया। इतने सारे परिचित लोग लगभग सभी के सभी परिचित लोग और उसमें कई लोग तो बहुत दूर-दूर से विभिन्न शहरों से आए हुए थे। तो सबको नमस्ते कर पाना मेरे लिए संभव नहीं था क्योंकि बोतल नही नाच रही थी। मुझे थोड़ा सा अटपटा लगा कि इतने लोगों को एक साथ नमस्ते कैसे करें और कैसे मिले। मैंने उसका एक उपाय निकाला कि कुछ नहीं करते हैं। सीधा चलते हैं और एक कुर्सी पकड़ते हैं और बैठते हैं। अगर वहाँ पर अभी उपस्थित सभी लोगों को मैं नमस्ते करने लगूं तो बड़ा समय लगेगा और कितना अजीब कि सबको नमस्ते सर! नमस्ते सर! का रट्टा मारना पड़ जाएगा।
हां, तो मैं एक कुर्सी पकड़ कर बैठा और फिर मेरी नजरें एकदम सामने राजेन्द्र सर की फूलों से लदी हुई एक तस्वीर लदी मतलब फूल उस पर रखे हुए थे और एक तस्वीर का बड़ा सा कट-आउट लगा हुआ था, उस पर पड़ी। मैंने छात्रावासीय शैली में एक हाथ हृदय पर ला कर कमर को थोड़ा सा झुका कर उन्हें प्रणाम किया। सामने मंच था। पूरे शहर के वैचारिक लोग— वो चाहे किसी भी विचारधारा से जुड़े हो, वहाँ उपस्थित थे। अपने-अपने विरोधाभासों के बाद भी उसमें लेखक संगठन थे। मजदूर संगठन के लोग थे। प्रोफेसर थे। अलग-अलग कामों से जुड़े हुए लोग थे। राजेन्द्र सर को जिस तरह याद किया गया मुझे नहीं लगता कि मेरी याद में जब से मैं इलाहाबाद में रह रहा हूँ किसी को इस तरह से शहर ने याद किया हो। तो ये राजेन्द्र सर की बनाई हुई दुनिया थी कि सभी तरह के लोग इस तरह से याद करने के लिए वहाँ पर इकट्ठा हुए थे। सबके पास राजेन्द्र सर के लिए कुछ न कुछ था बोलने के लिए। लगभग हर कोई उसमें से राजेन्द्र सर से मिला था। राजेन्द्र सर के साथ अपने कुछ वक्त गुजारे थे। अगर उनके साथ वक्त नहीं गुजारा था तो उनको लगभग कहीं न कहीं, किसी न किसी गोष्ठी में जरूर सुना था।
मैंने खुद उन्हें बोलते हुए लगभग दस-पंद्रह गोष्ठियों में सुना है तो हम लोगों के बीच में राजेन्द्र सर एक किंवदंती हुआ करते थे। परास्नातक के दिनों में हमारी मित्र मंडली उन्हें आलू कहती थी। हम किसी कार्यक्रम का पोस्टर देखते तो हम मजाक में कहते थें कि, "कस बे कौन अध्यक्षता कर रहा है?" इस पर हमारा दूसरा दोस्त कहता है कि, "अरे वही सर होंगे और कौन होंगे? राजेन्द्र सर। और किसकी हिम्मत है कि अध्यक्षता करे?" फिर मेरा दोस्त हँसते हुए कहता अच्छा राजेन्द्र सर तो यार आलू हैं। उनको किसी भी सब्जी के साथ मिला दो तो बात बन ही जाती हैं। अध्यक्षता करने के लिए उनसे अच्छा और कौन हो ही सकता है तो राजेन्द्र कुमार सर के लिए हम लोग ने जो उपनाम रखा था हालांकि वह नाम सही नहीं था लेकिन हम लोग उनको आलू इसलिए कहते थे कि वह लगभग प्रगतिशील मंचों से अध्यक्षता करते हुए हम लोगों को मिल जाया करते थे और वो बहुत लंबा बोलते थे। बहुत तल्लीनता के साथ बोलते थे। जब वो बोलते थे तो मंत्रमुग्ध हो जाते थे और बोलते जाते थे और उनके बोलने में कभी नहीं लगता कि उनमें जो ऊर्जा है वह कहीं कम पड़ रही है। सर लगातार और धाराप्रवाह बोलते थे। विभिन्न विषयों पर उनकी पकड़ थी। हम लोग कहते कि राजेन्द्र सर जो है वह किसी भी विषय पर बोल देते हैं। किसी भी विषय की अध्यक्षता कर देते हैं। तो ऐसे थे राजेन्द्र सर, जो हर प्रगतिशील कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए तैयार रहते थे। मैं परास्नातक तक तो मुर्ख ही था। यह बात मुझको बहुत बाद में पता चली कि राजेन्द्र सर का अध्ययन बहुत व्यापक है। वह विज्ञान की पृष्ठिभूमि से आए थे और उन्होंने हिंदी साहित्य में आलोचनात्मक कई सारी किताबें लिखी हैं और जब कोई आलोचक होता है तो वो सिर्फ आलोचक नहीं होता है वो तब साहित्यकार होता ही है उसके साथ में वो इतिहासकार होता है, वो समाजशास्त्री होता है, वो अर्थशास्त्री होता है, राजनीति विज्ञानी होता है, वो मनोविश्लेषक हो सकता है। इन कई सारी विधाओं को साधने के बाद कोई आलोचक बनता है। आलोचक होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है। मैं यह बात तब समझ पाया जब पी-एच. डी. करने लगा था और हिंदी साहित्य की दुनिया में मेरे कदम पड़ चुके थे। तब हमारे दोस्त लोग भी समझ पाए कि राजेन्द्र सर हर विषय पर क्यों बोल लेते हैं और उन्हें हर विषय पर बोलने के लिए या अध्यक्षता करने के लिए क्यूं आमंत्रित किया जाता था।
उसके साथ में विभिन्न क्षेत्रों के लोग थे। सर ने एक पूरा संसार रचा था जिसमें तरह-तरह के लोग थे। जैसे इंद्रधनुष होता है और वो कभी एक रंग का नहीं होता है। उसमें कई सारे रंग होते हैं वैसे भी राजेन्द्र सर की दुनिया एक इंद्रधनुषी दुनिया थी जिसमें तरह-तरह के रंग मौजूद थे। मैं अपना एक संस्मरण आपको बताता हूं। सर को मैं तो सीधे आंख में आंख डाल कर कभी नहीं देख पाया लेकिन सर को बोलते हुए मैंने कई बार सुना। उन्हें हिंदी विभाग, विश्वविद्यालय में, धरना-प्रदर्शन में बहुत बार सुना। 'सबद' के कई सारे सबद-संवाद में सुना। सबद की स्थापना दिवस के अवसर पर उन्हें मैंने दो बार सुना। उनको सुनने का मुझे सौभाग्य मिला जैसे लाल बहादुर वर्मा सर को सुनने का सौभाग्य मिला।
अभी मेरी एक कहानी प्रकाशित हुई है तद्भव में, "तो आ रही है मिस काजल" जिसका शीर्षक है। सर ने उसको पढ़ा। इस समय तक वो पढ़ रहे थे कि 'तद्भव' में क्या लिखा जा रहा है? उस कहानी को उन्होंने पढ़ा और मेरा उस पर पता लिखा हुआ था कि मैं इलाहाबाद में रहता हूँ। मुझे यह बात तब पता चली जब किसी ने मुझे बताया मुझसे कि सर तुम्हारी कहानी पढे हैं और वो तुमसे बात करना चाहते हैं। मुझे बहुत असमंजस और आश्चर्य हुआ।
सर ने मेरी कहानी कैसे इतने कष्ट में पढ़ी होगी जो उनका जीवन है इस समय। वो दर्द से गुजर रहे हैं और उसमें उन्होंने मेरी कहानी को पढ़ा और उन्होंने मेरी कहानी को सिर्फ पढ़ा नहीं उन्होंने कहा कि मैं इस लड़के से मिलना चाहता हूँ। तो यह जब बात मुझे पता चली तो मैं अंदर से पहले तो डर गया कि मैं सर से मिलूँगा कैसे और मैं सर को इस हालत में देख पाऊँगा कि नहीं देख पाऊँगा। वह लगातार मुझसे कहते रहे मुझे मिलने के लिए और मैं कमबख्त टालता रहा। मुझे लगता कि मैं नहीं जा पाऊँगा क्योंकि मैं मानसिक रूप से अभी पिछले दिनों बहुत परेशानियों के बाद उबरा हूं और उन मानसिक परेशानियों को देखते हुए मैं नहीं चाहता था कि कोई दर्द मेरे भीतर से फिर उठे और मुझ पर छा जाए और मुझे फिर से अपनी आगोश में ले ले। इससे बचने के लिए मैं सर से मिलने से बचता रहा। फिर उन्होंने यह भी कहा कि मैं चाहता हूँ कि गोविंद मेरे कविता संग्रह "उदासी का ध्रुपद" उसको पढ़े और वो मेरा एक साक्षात्कार करें और वो प्रश्न खुद बनाकर ले आए और साक्षात्कार को धीरे-धीरे करें। मैं धीरे-धीरे करके उससे बात करूँगा।
मैं कहना यह चाहता हूं कि सर ने पता नहीं कैसे मेरे बारे में ये सोचा क्यूंकि उनसे मैं कभी मिला नहीं था और उनके आस-पास बहुत सारे लोग थे जो उनका साक्षात्कार कर सकते थे लेकिन मुझे क्यूं कहा? इसका जवाब शायद ही मुझे कभी मिले। मैं उनसे कभी नहीं मिला था। वो मुझे नहीं जानते थे कि मैं कौन हूँ? कैसा हूँ? लेकिन उन्होंने मेरी बस कहानी पढ़ी थी। हो सकता है उन्होंने मेरा कोई लेख भी पढ़ा हो। कभी और किसी ने बताया हो मेरे बारे में। वही मैं सोच रहा हूं कि वह सबको लेकर किस तरह चिंतित रहते थे। जब उन्होंने मुझे कभी देखा भी नहीं था और वो मेरा इस तरह से नोटिस ले रहे थे तो जिनको वो जानते रहे होंगे या जानते थे—उनको कितना प्यार करते रहे होंगे। मैं उनके बुलावे को अब टालना नहीं चाहता था। बार-बार मिलने की बात सुनकर मन भावविह्वल हो जाता था। हालांकि मैंने अंत समय में तय कर लिया था कि मैं सर का साक्षात्कार करूँगा। और मैंने उनकी कविताएँ बहुत मन से पढ़ी और मैंने कई सारे प्रश्न तैयार किए और मैं पूरी तरह से तय कर चुका था कि अब मैं सर से मिलूँगा और उनसे बात करूँगा। उसी के दूसरे दिन मुझे शाम को फेसबुक के जरिए एक खबर मिली कि राजेंद्र सर की तबीयत बहुत खराब है और वो इस समय आईसीयू में है तो मेरी दिल की धड़कनें बढ़ गई कि मैंने अभी प्रश्न बनाया है और सर जो है आईसीयू में चले गए।
उस समय थोड़ा सा डर मुझे लगा कि कहीं मेरी उनसे मिलने की जो ख्वाहिश है वो अधूरी न रह जाए। और इस डर के साथ मैं उस रात सोया और जब सुबह उठा तो मेरे फोन पर कई सारी लोगों की मिस कॉल पड़ी हुई थी. मुझे कुछ अंदेशा सा हुआ कि कुछ न कुछ तो जरूर हुआ है और जैसे ही मैंने फेसबुक खोला और उस पर पहली ही पोस्ट किसी की मुझे दिखी कि राजेंद्र सर अब नहीं रहे। और मैं एक उदासी की दुनिया में खो गया। जो प्रश्न बनाए थे वो आज ही मेरे पास है लेकिन सर नहीं थे। मैं पहुँचा सर के पास अंतिम विदाई देने। मैं सोचा कि मैंने तय कर लिया था कि सर को देखना है तो अब मैं अंतिम दर्शन तो उनका नहीं छोड़ सकता था। मैं पहुँचा तो सर का जो शरीर है वो शीशे के भीतर रखा हुआ था। मैं गया उनके पास बहुत हिम्मत के साथ। उनके पास खड़ा हुआ और बहुत देर तक उन्हें निहारता रहा। अंतिम समय उनका चेहरा एकदम मेरे पिता के चेहरे जैसा हो गया था।मैंने लगभग उन्हें खड़े होके पाँच मिनट तक अपलक देखा होगा। सर और वो सारा कुछ जो पिछले दिनों मैंने उनके बारे में सुना था, वह धीरे-धीरे मेरी स्मृतियों से गुजरता रहा। उस बीच में मुझे एक संदेश मिला व्हाट्सएप पर कि क्या कोई मुझे राजेन्द्र सर को दिखा सकता है? रितेश गांव में थे। मैंने तुरंत उन्हें वीडियो कॉल लगाया और साथ में उन्हें भी दिखाया राजेन्द्र सर को और खुद भी देखा। फिर राजेन्द्र सर को लोग बाहर ले जाने की तैयारी करने लगे। इस बीच मुझे एक लोक गीत याद आ रहा था जो हमारे गाँव में बहुत लोग गाते थे कि, "चला डोली उठावा कहार/ पिया मिलन की ॠतु आई।" सर की डोली उठने वाली थी अंतिम बार और सर अंतिम विदाई पर जाने वाले थे। एंबुलेंस आ गई थी क्यूंकि सर ने अपना देह दान कर दिया था। फूल ही फूल बिखरे थे उनकी राहों में लाल-लाल फूल। सूर्ख गुलाब के। लाल फूलों के बीच नारे भी लग रहे थे "कामरेड राजेन्द्र को लाल सलाम"
लाल गुलाबों के बीच उनका शरीर रखा हुआ था। लोग उन्हें तरह-तरह से श्रद्धांजलि दे रहे थे। उनका शरीर जब उस गाड़ी में रखा गया तो वो सिर्फ गाड़ी नहीं रह गयी बल्कि एक स्मृति बनने वाली थी। फिर उनके पीछे पूरे शहर के बुद्धिजीवी चल पड़े और सर पहुँचे मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज। वहाँ पर सर का देह दान किया गया वहाँ का जो दृश्य था वो बहुत ही मार्मिक था। अगर आप उस दृश्य में मौजूद होते तो शायद आप उसको भूल नहीं पाते। वो ऐसा दृश्य था, ऐसी मार्मिक विदाई थी कि उसको देखना ही अपने आप में एक बहुत ही भावपूर्ण और बहुत ही सांत्वनापूर्ण क्षण हो सकता था कि किसी की विदाई इस तरह से भी हो सकती है। उनकी कुछ कविताएँ कुमार वीरेन्द्र सर ने पढ़ी और बड़ी संख्या में चारों तरफ लोग थे। इस तरह राजेन्द्र सर अपनी कविताओं के साथ ही अंतिम बार विदा हुए।
और जब विदा हुए तो पूरा शहर उन्हें याद करने के लिए आज जुटा हुआ था और उन्हें तरह-तरह से लोग याद कर रहे थे। कुमार वीरेन्द्र, प्रणय कृष्ण, अजय जैतली, बसंत त्रिपाठी और प्रियम अंकित ने श्रमसाध्य कार्य करके बहुत कम समय में राजेन्द्र सर के ऊपर एक संस्मरणात्मक पुस्तिका प्रकाशित कर दी थी जो वहां उपस्थित सभी लोगों को बांटी गई। कार्यक्रम में इतने सारे वक्ता थे—जितनी तेज़ थी धूप वहां। ऐसा लग रहा था कि यह कोई अप्रैल का महीना है और कार्यक्रम चलता रहा। लगभग शाम होने को हो आई और वक्ताओं की सूची खत्म नहीं हो रही थी। खाना लग चुका था, पंडाल के बाहर लोग धीरे-धीरे अब खाने की तरफ बढ़ रहे थे। और मैंने भी सोचा कि अब खाने की तरफ ही बढ़ते हैं। मैं भी भोजन की लाइन में खड़ा हो गया। और वो लाइन राजेन्द्र सर की स्मृतियों की हो कर जाती हुई हमारी आहार नली से हो कर मस्तिष्क में बैठने वाली थी। एक ऐसी लाइन की जो शायद कभी खत्म नहीं होगी। राजेन्द्र सर हर साल ऐसे ही याद आते रहेंगे। याद किए जाते रहेंगे। यहां मैं कुछ लोगों के बयान सारांश में आपको सुना देता हूं जो पिछले दिनों इलाहाबाद में उन्हें याद करते हुए विभिन्न लोगों ने कहीं हैं—
बसंत त्रिपाठी सर ने राजेंद्र कुमार सर की रचनाधर्मिता पर महत्वपूर्ण वक्तव्य दिया था। वह अपनी शैली के अनुरूप पूरी तैयारी के साथ आए थे। उन्होंने कहा कि सर के अध्यापकीय जीवन और आलोचना के बरक्स कविता पर बहुत कम बातें हुईं. उनकी आलोचकीय भूमिका को याद किया। मैं अभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तिलक भवन में बैठा हूं और यह लिख रहा हूं। यहां एक नाटक देखने आया हूँ, तो मुझे याद आया है कि बसंत त्रिपाठी सर ने अपने वक्तव्य के अंत में कहा था कि राजेन्द्र कुमार सर की कविताओं का नाट्य रूपांतरण किया जाना चाहिए, जिसका मंचन इलाहाबाद सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हो। जब वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक बोलने आएं तो उन्होंने इस बात कि पुष्टि की कि बसंत और हम सब मिल कर सर की कुछ कविताओं का नाट्य रूपांतरण कर रहे हैं जिसे आगे हम प्रदर्शित करेंगे।
जब वक्ताओं में रणेन्द्र से ले कर रवि भूषण ने उनकी स्मृतियों को याद किया तो ऐसा लगा जैसे इस माघ में मघा नक्षत्र के बादल छा गए हों और उनके बोलने के साथ-साथ वे इलाहाबाद के ऊपर मंडराने लगे हों। सभी वक्ताओं ने उन्हें तीन रूप में याद किया—पहला उनका अध्यापकीय रूप, दूसरा उनका अभिभावक रूप और तीसरा उनका मित्र रूप। जिस तरह उन्होंने उनके संस्मरणों को शब्दों में पिरोया, वह निर्झर की तरह बरसता रहा और हमें भिगोता गया। यह बरसात ऐसी थी कि हमारी आँखों में पानी भर आया—वह पानी उस पानी से मिल गया, जो वक्ताओं के गले से बह रहा था. सभी वक्ताओं ने उनसे जुड़े कई मार्मिक क़िस्से सुनाए—कि कैसे सर सबको ले कर एक अभिभावक की तरह चिंतित रहते थे, कि किसी की पढ़ाई और दवाई न छूटे, किसी गरीब की बेटी की पढ़ाई न रुके। वे ऐसे ही अनेक प्रसंगों से हमें सराबोर करते रहे।
सर के बारे में वहाँ पर बोलने के लिए जब 'सबद' की संचालक सुनीता आईं तो उन्होंने 'सबद संवाद' जिसे राजेन्द्र सर ने ही शुरू किया था उसका एक वाकया सुनाया जो यूँ था कि सर चाहते थे कि हम लोग संवाद करें और इसके लिए एक जगह की ज़रूरत थी। पहले झुग्गी-झोपड़ी में इसे आयोजित करने की रूपरेखा बनी, लेकिन यह सुचारू रूप से नहीं चल पाया। तब उन्होंने ‘सबद’ पुस्तक-दुकान का चुनाव किया और इसका नाम ‘सबद संवाद’ रखा। शुरुआत में सर स्वयं व्याख्यान देते थे।
उनकी इच्छा थी कि कविता को सिर्फ़ कवि ही न सुनें, बल्कि वे लोग भी सुनें जो कविता नहीं लिखते। उनका मानना था कि श्रोताओं में विविधता होनी चाहिए। वे चाहते थे कि इंजीनियरिंग, वकालत और प्रबंधन के छात्र भी इसमें आएँ—ख़ासकर वे, जो किसी छात्र संगठन या साहित्यिक समूह से नहीं जुड़े हों। उनका कहना था कि साहित्य और समाज को समझना सबके लिए ज़रूरी है; हम आपस में बात करके ही सब कुछ नहीं कर पाएँगे। यह राजेन्द्र कुमार सर की सोच के विस्तार को दर्शाता है। किसी वक्ता ने यह भी बताया कि सर चाहते थे कि संवाद में कही गई बातों को एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया जाए, लेकिन यह संभव नहीं हो सका. यह हमारी विफलता है. यदि ऐसा हो पाता, तो आज हमें राजेन्द्र सर के विचारों के और भी आयाम जानने को मिलते।
सर कहा करते थे कि कवियों को जो है कवियों के बीच में कविताएँ नहीं पढ़नी चाहिए। उन्हें कविताएँ उन लोगों के बीच में पढ़नी चाहिए जो कविता से नहीं जुड़े हैं या जो कविता नहीं पढ़ते हैं—तब जा कर कविता की सार्थकता बन पाएगी। कविता सिर्फ कवियों के बीच में पढ़ी जाती रहे, कवि ही उसे सुनते रहे और कवि ही पढ़ते रहे तो फिर कविता का वो मूल्य नहीं आ पाएगा जो कविता के लिए होना चाहिए या किसी कवि के लिए होना चाहिए।
सर इस तरह के व्यक्तित्व के धनी थे। उनके भीतर और कई तरीके से उनको आप देखेंगे तो पाएँगे कि क्यूं महत्वपूर्ण थे? यहां स्मृति सभा में उमड़ी भीड़ उसकी गवाही दे रही थी। इलाहाबाद शहर ने उन्हें इस तरह से अपनी अंतिम विदाई दी जब उस शाम का सूरज ढल रहा था तो शाम का सिर्फ सूरज ढल रहा था लेकिन राजेन्द्र सर की स्मृतियों का जो सूरज है वो सबके भीतर उग आया था। सबके भीतर कुछ न कुछ वह समा गए थे जो अब नहीं मिटने वाला था। वो आगे भी ऐसे ही सबकी स्मृतियों में बने रहेंगे। हां, यह शहर उन्हें हर साल ऐसे ही याद करता रहेगा ऐसे ही राजेंद्र सर हमें याद आते रहेंगे और जो इलाहाबाद उनके होने पर आबाद था—उनके जाने के बाद भी इलाहाबाद ऐसे ही आबाद रहेगा। ऐसी हम उम्मीद करते हैं। यह राजेन्द्र सर के लिए हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। सर! आप हमारी स्मृतियों में हमेशा अमर रहेंगे।
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| गोविन्द निषाद |
सम्पर्क
मोबाइल : 9140730916




बहुत अच्छा संस्मरण सर जी, पढ़ते हुए मन भावुक होने लगा।
जवाब देंहटाएंस्मृति शेष राजेन्द्र कुमार जी के बारे में अद्भुत संस्मरण है।उनके व्यक्तित्व के इन आयामों से परिचित होते हुए भी मैं अनजान था। युवा गोविंद निषाद जी की निर्झर कलम के बारे में क्या लिखूं।बस अद्भुत!
जवाब देंहटाएंयह बहुत अच्छा संस्मरण लिखा गया है और राजेंद्र जी के व्यक्तित्व को एक अलग ढंग से देखने की कोशिश की गई है इसलिए रोचक संस्मरण बहुत कम लिखे जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि इसके लेखक की नजर में राजन कुमार जी एक अच्छे व्यक्ति है और वह उनकी अच्छाइयों की तारीफ कर रहा है लेकिन गोविंद निषाद जी की नजर में किसी अंधभक्त की नजर शामिल है और ना भक्ति ही संस्मरण ऐसे ही लिखा जानी चाहिए एक विनम्रता से पूर्व की बात कहूंगा संस्मरण की लंबाई को ज्यादा हो गई है संस्मरण अधिक से अधिक 5 मिनट की अवधि में पढ़े जाने योग्य होना चाहिए सारी बातें एक ही संस्मरण में कहना भी नहीं चाहिए आवश्यकता हो तो कई हिस्सों में उसे बांट देना चाहिए बावजूद इसके गोविंद निषाद जी ने बहुत अच्छी भाषा में से लिखा है और मैं तो ऐसे एक ही बार में पड़ गया पहली बार का बहुत-बहुत शुक्रिया इतनी खूबसूरत रचना प्रकाशित की है.
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