मनीष चौरसिया की रपट "हम हरदम रहेंगे दुनिया में"
किसी भी व्यक्ति की लोकप्रियता का आंकलन करना हो तो देखना चाहिए कि उसके जीवन के उपरान्त वह लोगों की स्मृतियों में किस तरह जिंदा है। 16 जनवरी 2026 को राजेन्द्र कुमार का देहावसान हुआ। उनकी अनुपस्थिति से इलाहाबाद में वह सन्नाटा पैदा हो गया है जिसकी भरपाई सम्भव नहीं है। 8 फरवरी 2026 को राजेन्द्र कुमार की स्मृति में एक सभा का आयोजन इलाहाबाद के सभी संगठनों की तरफ से किया गया। किसी भी लेखक की स्मृति में एक साथ इतने दिग्गजों का जुटान मैने नहीं देखा। यह राजेन्द्र कुमार के व्यक्तित्व का चुम्बकीय आकर्षण था कि सब अपने प्रिय शिक्षक, कवि, आलोचक को श्रद्धांजलि देने के लिए स्वतः स्फूर्त ढंग से आए। रांची से रणेंद्र, रविभूषण, बनारस से सदानंद साही, कृष्ण मोहन सिंह, विंध्याचल यादव, देहरादून से धीरेन्द्र तिवारी, उत्तराखंड से ही शैलेय, दिल्ली से सन्ध्या नवोदिता और मृत्युञ्जय, लखनऊ से कौशल किशोर के साथ साथ इलाहाबाद से सुधांशु मालवीय, अजामिल, हरीश चन्द्र पाण्डे, अली अहमद फातमी, अजामिल, अनीता गोपेश, सन्तोष भदौरिया, प्रणय कृष्ण, लालसा यादव, विवेक निराला, बसंत त्रिपाठी, शिवानन्द मिश्र, संगम लाल, अवनीश यादव, जैसे दिग्गज जुटे। अशोक वाजपेई और विजय बहादुर सिंह जैसे ख्यातनाम साहित्यकार जो किसी वजह से इस कार्यक्रम में नहीं आ पाए उन्होंने अपना सन्देश भेजा। इस कार्यक्रम की एक विस्तृत रपट हमें सी एम पी डिग्री कॉलेज के हिन्दी विभाग के शोध छात्र मनीष चौरसिया ने लिख भेजा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनीष चौरसिया की रपट "हम हरदम रहेंगे दुनिया में"।
रपट - राजेंद्र कुमार : स्मृति सभा
"हम हरदम रहेंगे दुनिया में"
मनीष चौरसिया
विश्वविद्यालय में सर्दी की छुट्टियाँ समाप्त हो रही थीं। दक्षिण भारत की यात्रा से अभी लौट रहा था। 30 दिसंबर 2025 से लगातार 14 दिन यात्रा करते ही बीते। सबसे पहले बेंगलुरु गया। बेंगलुरु- चेन्नई- रामेश्वरम- मदुरै- कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम- कोयंबटूर- बेंगलुरु का पूरा एक चक्कर लगाते हुए भारत के मुख्य भूमि के दक्षिण पूर्व होते हुए भारत के सुदूर दक्षिणतम बिंदु यानी आखिरी चट्टान तक जा कर दक्षिण पश्चिम होते हुए पूरा एक चक्कर लगा आया इन 14 दिनों में। फिर बेंगलुरु से सीधे गोरखपुर के लिए बस और गोरखपुर से 80 किमी. दूर सीधे घर यानी अपने गांव परसौनी, कुशीनगर जिले के खड्डा तहसील का एक छोटा सा गांव।
कवि विनोद कुमार शुक्ल के शब्दों में कहें तो- "वो जानते थे कि घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता, जितना लौट आने के लिए होता है।" मैं भी घर लौट आया था। अपने गांव। अपने घर। अम्मा के पास। दो दिन घर पर रहा फिर इलाहाबाद आने की तैयारी में था। अम्मा कुछ दिन और रुकने को कह रही थीं। मेरी अम्मा कितना प्यार करती है मुझसे ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन इतना जानता हूं कि जब भी मैं दूर जा रहा होता हूं घर से या यूं कहूं कि अपनी अम्मा से, वो मुझे रोक लेना चाहती है हर बार। बस "एक और दिन" के लिए...। उसे फर्क नहीं पड़ता इससे, कि मैं कितने दिनों से उसके साथ हूं वो साथ चाहे कुछ दिनों का हो, या हो कई महीनों का.. लेकिन "वो एक और दिन..." हमेशा उसके पास बचा रहता है। ज्यादा ख्वाहिशें नहीं हैं मेरी मैं जिंदगी से सिर्फ इतना चाहता हूं, मैं बस "वो एक और दिन " उसके साथ रहूं। खैर!
बड़ी मान मनुहार के बाद तय हुआ कि विश्वविद्यालय की छुट्टी के बाद तय हुआ कि खिचड़ी (मकर संक्रांति) के बाद चला जाऊंगा। घर से बुआ और भाई के लिए लाई और तिल के लड्डू भी लेते आऊंगा, जो इलाहाबाद ही रह कर पढ़ाई करते हैं।
16 को सुबह जब सो के उठा तो मौसम कुछ ज्यादा ही सर्द था। कोहरा पिछले दिन के मुकाबले कुछ ज्यादा घना था। नींद भी काफी देर से खुली। मोबाइल चेक किया, लोगों के व्हाट्सएप अपडेट देखा तो चारों तरफ एक ही खबर थी कि प्रो. राजेंद्र कुमार का 84 वर्ष की आयु में हृदय गति रुक जाने से निधन। बीते पिछले एक साल से वे कैंसर की बीमारी से लड़ रहे थे। मन पहले से ही किसी अनहोनी की आशंका में था। और अब ये खबर!
न जाने क्यों उस दिन बाबा की याद आने लगी। शायद इसलिए भी कि मेरे बाबा भी तो कैंसर से ही लड़ते-लड़ते छोड़ गए थे हमें। तब मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था। बाबा को मुंह का कैंसर था। 2007 में एक बार ऑपरेशन भी हो चुका था। पांच-छह साल एकदम ठीक भी थे। डॉक्टर के मना करने पर बाबा ने पान खाना तो बंद कर दिया था लेकिन सुरती खाने की आदत नहीं छोड़ पाए और कैंसर फिर से उभर आया था। मुझे याद है मैं अकेले दुकान पर बैठता था। पापा बाबा को दवा कराने के लिए कहाँ-कहाँ नहीं गए थे। दो बार तो मैं खुद बाबा को दवा कराने ले गया था। बाबा के कैंसर का ऑपरेशन सूरत में हुआ था। तब पापा अम्मा मैं मेरी बहन और छोटा भाई सभी वहीं रहते थे। उसके बाद सभी घर आ गए थे। पापा भी अब घर रहने लगे थे। पान की गुमटी वाली दुकान से ही पूरे घर परिवार का खर्चा चलता था। खैर! ये आपबीती फिर कभी....।
राजेंद्र कुमार या राजेंद्र सर से मेरा कभी वैसा आत्मीय जुड़ाव नहीं रहा जैसा मेरे संग-साथ के और लोगों का है। उनके घर पर अक्सर लोग जाया करते थे। जब भी सुना उन्हें मंचों पर अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए ही सुना था विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग हो या शहर के अन्य किसी कार्यक्रमों में। ये मेरा दुर्भाग्य ही है। जीते जी कई मौके मिले उनके घर पर कई बार बैठकी या कोई कार्यक्रम हुआ करता था लेकिन मैं नहीं जा पाया। जब कोई सहज ही आपको उपलब्ध हो तब आपको उसकी कीमत नहीं समझ आती। उसके चले जाने से उसकी कमी का एहसास होता है। वही कमी आज मुझे खल रही है।
उनके जाने के बाद विभाग में, विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल परिसर में श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम रखे गए। इनमें भी मैं शामिल न हो पाया।
17 जनवरी को गोरखपुर से इलाहाबाद के लिए रात को 11:30 बजे ट्रेन थी। 18 को सुबह मैं इलाहाबाद में था। उसके बाद अन्य कई कार्यक्रम हुए। विश्वविद्यालय में, कॉलेज में, जिनमें शामिल हुआ। उन कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग भी की। फोटोज़ भी खींचे। 27 जनवरी को चौधरी महादेव प्रसाद कॉलेज में रणविजय सिंह 'सत्यकेतु' की पुस्तक चेतना के दस द्वीप' पर गंभीर चर्चा, 29 जनवरी को '"साहित्य और अनुवाद'" विषय पर प्रो. अर्जुमंद आरा जी का विशेष व्याख्यान और 30 जनवरी यानी गांधी जी के पुण्य तिथि पर हिंदी विभाग में पहले गांधी जी के विचारों की पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई और प्रो. बहादुर सिंह परमार का विशेष व्याख्यान हुआ जिसका विषय रखा गया '"गांधी और बुंदेली का लोकवृत्त"। इस दौरान जो रपट लिखा था काफी लोगों ने सराहा।
एक दिन प्रेमशंकर सर का मैसेज आया कि मनीष 8 फरवरी को राजेंद्र सर की स्मृति में एक सभा होनी है और तुमको रहना है और रपट भी लिखनी है। मैंने तुरंत हामी भर दी। सर ने कार्यक्रम का पोस्टर भेजा जिसमें कार्यक्रम की पूरी जानकारी लिखी हुई थी - वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र कुमार की स्मृति सभा रविवार को दोपहर दो बजे से अंजुमन रूह-ए-अदब (मेयो हॉल चौराहा) में आयोजित होगी। इसमें शहर एवं देश भर से साहित्यिक, संस्कृतिकर्मी, शिक्षाविद्, शोधार्थी व विद्यार्थी आमंत्रित हैं। इस अवसर पर राजेंद्र कुमार पर केंद्रित लघु फिल्म दिखाई जाएगी एवं उनके कृतित्व से जुड़ी पोस्टर की प्रदर्शनी लगेगी। साथ ही उन पर केंद्रित 40 पृष्ठों की एक पुस्तिका का लोकार्पण भी होगा। यह आयोजन राजेंद्र कुमार स्मृति आयोजन समिति की देखरेख में सम्पन्न होगा।
स्मृति सभा को बीते दो दिन हो गए हैं, मैंने कुछ भी नहीं लिखा। लौट कर आया तो मन भारी था। सर दर्द अलग से। कुछ भी करने का मन नहीं था, सो गया। अगले दिन भी तबीयत कुछ खराब सी ही थी। विश्वविद्यालय में रणेंद्र जी का "आदिवासी साहित्य और महाश्वेता देवी" पर एक विशेष व्याख्यान होना था। प्रो. सुनील विक्रम सिंह जी की किताब "आषाढ़ का आखिरी दिन" का विमोचन और तिलक भवन में यूनिवर्सिटी थिएटर के बच्चों द्वारा "क्रेजी किया रे" होना था उसमें भी नहीं जा पाया। पूरा दिन सोते ही गुजरा।
उस दिन पूरे कार्यक्रम की वॉयस रिकॉर्डिंग और नोट्स ले रखे थे कि बाद में एक विस्तृत रपट लिख दूंगा। लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा कैसे लिखें। किसी एक कार्यक्रम में इतने वक्ता किसकी बात लिखें, किनको छोड़ें। अपने आप में मुश्किल काम। एक मन कर रहा था कि छोड़ दें न लिखें। लेकिन नहीं लिखूंगा तो शायद चैन से सो न पाऊं। स्मृति सभा की पूरी बात हूबहू लिखना तो कठिन है लेकिन फिर भी कोशिश करूंगा कि लगभग सारी बातें आ जाएं।
सबसे पहले कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रो. प्रणय कृष्ण ने आवाज़ दी प्रो. कुमार वीरेंद्र को सभा की रूपरेखा बताने के लिए। जिसके बाद कुमार वीरेंद्र ने इस स्मृति सभा की रूपरेखा प्रस्तुत की और कहा - आज हम एक ऐसे व्यक्तित्व को याद करने के लिए एकत्रित हुए हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से ही हिंदी और उर्दू साहित्य का संगम जीवंत हो उठता था। प्रोफेसर राजेंद्र कुमार जी, एक ऐसे मनीषी थे जिन्होंने अपने जीवन काल में न केवल अकादमिक जगत को समृद्ध किया, बल्कि अपनी सहजता और विद्वत्ता से असंख्य लोगों के हृदय में एक अमिट छाप छोड़ी। यह स्मृति सभा, जो पूरे शहर की ओर से आयोजित की गई है, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक विनम्र प्रयास है।
प्रोफेसर राजेंद्र कुमार जी का निधन 16 जनवरी 2026 को हुआ, और तब से ले कर अब तक, देश के कोने-कोने से उनके शिष्यों, मित्रों और प्रशंसकों ने जिस तरह से अपने संस्मरण साझा किए हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि उनके परिवार का दायरा कितना विशाल था। वे केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि एक गुरु, एक संपादक, एक वक्ता और एक मार्गदर्शक थे, जिनकी वाणी में जादू था और जिनके विचारों में गहराई।
उनके व्यक्तित्व के कई पहलू थे। गुरु के रूप में वे हद से अधिक लोकप्रिय थे। विभागाध्यक्ष के रूप में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। बतौर संपादक, उन्होंने 'अभिप्राय' पत्रिका', 'बहुवचन' और 'सृजन सरोकार' के दो गांधी विशेषांक जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। उनका कविता संग्रह और आलोचनात्मक पुस्तकें साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर हैं। वक्ता के तौर पर, उनके लिए यह मुहावरा सटीक बैठता है कि वे 'कहनी और सुनने का एका' रखते थे। जब वे बोलते थे, तो श्रोता उनसे पूरी तरह जुड़ जाते थे। वे हमेशा विद्यार्थियों और साहित्यिक रुझान के लोगों के सवालों के जवाब देने के लिए तत्पर रहते थे, और उनका दरवाजा बातचीत के लिए हमेशा खुला रहता था।
यह सुखद संयोग है कि उनके दोनों सुपुत्रों, प्रियम जी और प्रेयस जी की शादी के आमंत्रण पत्र पर, दर्शनाभिलाषी में देश भर के उनके शिष्यों के नाम प्रकाशित थे। यह दर्शाता है कि वे अपने शिष्यों को अपने परिवार का ही हिस्सा मानते थे। उनके शिष्यों में से अनेक आज भी उनकी परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं, और देश भर से लोग इस स्मृति सभा में उपस्थित हो कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। उन्होंने कहा प्रोफेसर अजय जैतली के अथक प्रयासों से, इस अवसर पर एक विशेष गैलरी सजाई गई है, जिसमें राजेंद्र कुमार जी के विचारों और कृतित्व को प्रदर्शित किया गया है। यह गैलरी उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है और उनके योगदान को रेखांकित करती है। इसके अतिरिक्त, उनकी एक रिकॉर्डिंग, जिसमें वे आगरा में बातचीत कर रहे थे, और उनका एक प्रिय फिल्मी गीत, जिसे वे होली के अवसर पर गाते थे, भी इस सभा में दिखाया जाएगा। (हालांकि समय की बाध्यता के कारण ऐसा हो नहीं पाया।) उन्होंने ये भी बताया कि सभा के अंत में भोजन की व्यवस्था है।
इसके बाद प्रणय कृष्ण के आग्रह पर, प्रोफेसर सदानंद शाही ने राजेंद्र कुमार की स्मृति में अपनी बात रखी। शाही जी ने राजेंद्र कुमार को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जिनकी स्मृति में शामिल होना स्वयं को सार्थक बनाना है। उन्होंने बताया कि पिछले 1 दिसंबर को इलाहाबाद में होने के बावजूद वे राजेंद्र जी से मिल नहीं पाए थे, जिसकी खबर मिलने पर उन्हें गहरा अफसोस हुआ।
शाही जी ने राजेंद्र कुमार से अपनी पहली मुलाकात 1997-98 के आसपास लाल बहादुर वर्मा के निर्देशन में एक नाटक के दौरान को याद किया, जहाँ राजेंद्र जी ने एक नेता की भूमिका निभाई थी। उस समय से ही उनकी आत्मीयता का सिलसिला शुरू हुआ, जो राजेंद्र जी की विनम्रता और सहजता के कारण और भी गहरा होता चला गया। शाही जी को राजेंद्र जी का विद्यार्थी या सहकर्मी होने का सौभाग्य तो नहीं मिला, लेकिन उनकी सहजता ने उन्हें इस तरह आत्मीयता के बंधन में बांध लिया था कि कभी लगा ही नहीं कि वे उनके अध्यापक या मार्गदर्शक नहीं हैं। राजेंद्र जी ने 'साखी' पत्रिका के लिए भी लिखा और अपनी पत्रिका में भी उनके लेख छापे। शाही जी ने बताया कि राजेंद्र जी ने उनसे सरहपा पर एक लेख लिखवाने के लिए कई बार फोन किया, और अपनी दृढ़ता से उन्हें लिखने के लिए मना लिया।
राजेंद्र जी की अस्वस्थता के बावजूद, उन्होंने कौशांबी संवाद में भाग लिया, जहाँ उन्होंने पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता की। इस अवसर पर उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि हमें बाहर तो बुद्ध को खोजना ही है, लेकिन अपने भीतर के बुद्ध की भी तलाश करनी होगी। यह बात केवल कहने के लिए नहीं थी, बल्कि उनके लेखन और कविताओं में भी इसकी अनुभूति होती है।
शाही जी ने राजेंद्र जी के दो कविता संग्रहों का उल्लेख किया: 'हर कोशिश एक बगावत है' और 'उदासी का ध्रुपद'। 'उदासी का ध्रुपद' में एक कविता 'निस्पृह स्पृहा' का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे राजेंद्र जी ने एक गिलहरी के माध्यम से बुद्ध के दर्शन में निहित निस्पृहता को दर्शाया है। उनके पहले संग्रह में व्यक्तियों पर कई कविताएं हैं, जिनमें बहादुर शाह जफर से संवाद भी शामिल है। इस कविता में राजेंद्र जी ने जफर के प्रसिद्ध शेर को उलटते हुए कहा कि दफन होने के लिए तो पूरा मुल्क है, लेकिन जिंदा जीवन जीने के लिए एक इंच भी जमीन मयस्सर नहीं है। इस तरह राजेंद्र जी अपने समय और समाज के सच को अपनी कविताओं में व्यक्त करते थे।
राजेंद्र जी की कविताएं हमारे समय में दिखाई पड़ने वाली उदासी का एक प्रतिवाद रचती हैं। उनकी कविताओं में शब्दों के अर्थ के साथ एक नया बर्ताव दिखाई पड़ता है। उनके संग्रह की पहली कविता 'अर्थ कितना है?' में वे पूछते हैं कि “शब्द को कितना अर्थ चाहिए, इतना कि हम कहें पानी और बुझ जाए प्यास, या इतना...।” यह दर्शाता है कि राजेंद्र कुमार केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि एक गहरे विचारक भी थे, जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन और समाज के गूढ़ सत्यों को उजागर किया।
इसके बाद रणेन्द्र जी ने श्रद्धांजलि वक्तव्य में राजेन्द्र जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान को जिस मार्मिकता से प्रस्तुत किया, वह हमें एक ऐसे मनीषी की याद दिलाता है जिसने अपने जीवन और लेखन से समाज को एक नई दिशा दी। राजेन्द्र कुमार की सबसे विशिष्ट पहचान उनकी सादगी और सच्चाई थी। रणेन्द्र जी के शब्दों में, "इतना बड़ा व्यक्ति भी इतना सादा और इतना सहज हो सकता है।" यह गुण ही था जो उन्हें एक सम्मोहन की तरह प्रवाहित करता था, और सभी को अपनी ओर आकर्षित करता था। उनकी वैचारिक निष्ठा मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति गहरी थी, फिर भी उनकी सामाजिकता और व्यावहारिकता ऐसी थी कि उन्हें गांधीवादी विचारों के प्रकाशनों का संपादन करने में कोई हिचक नहीं होती थी। यह लचीलापन उनके आभा मंडल को और भी विस्तार देता था, उन्हें एक ऐसे बौद्धिक के रूप में स्थापित करता था जो संकीर्ण विचारधाराओं की सीमाओं से परे था। एक कवि, आलोचक, शिक्षक और नाट्यकर्मी के रूप में राजेन्द्र कुमार का योगदान अतुलनीय है। उनकी कविता यात्रा स्कूल के दिनों से ही शुरू हो गई थी। आपात काल के दौरान, जब अधिकांश लोग भयभीत थे, उनकी कविताएं लगातार मुखर रहीं। "उस नकाबपोश की शक्ल का जो पर्दा हमने अपनी नंगी खिड़की पर टांगा था, अब वहां नहीं है और शहर के चेहरे पर" जैसी पंक्तियाँ उनकी निर्भीकता का प्रमाण हैं। 1957 में 1857 की पहली आजादी की वर्षगांठ पर एक अंतर-विद्यालय प्रतियोगिता में उनकी कविता ने प्रथम स्थान प्राप्त किया था, और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के हाथों सम्मानित किया गया था। यह क्षण उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जिसे उन्होंने अपने संस्मरणों में इतनी सजीवता से वर्णित किया है कि पाठक की आँखें भी छलछला आती हैं।
आलोचना के क्षेत्र में भी राजेन्द्र कुमार की दृष्टि मौलिक और क्रांतिकारी थी। उन्होंने आलोचक को एक सहृदय और प्रबुद्ध पाठक की तरह रचना के पास जाने की वकालत की। उनका मानना था कि "विदेशी साहित्यशास्त्रियों के उद्धरण और मूर्ख आलोचकों के जूठन को बटोरना आलोचना कर्म नहीं है।" उन्होंने हिंदी आलोचना के इतिहास को कबीर की कविताओं में देखा, जहाँ आलोचना का जन्म स्वयं कवि की दृष्टि से होता है। उनकी यह स्थापना कि आलोचना की सामाजिकता का स्रोत कबीर के यहाँ भी देखा जा सकता है, आधुनिक आलोचना के लिए एक नई दिशा थी। उन्होंने उन आलोचकों की भी परोक्ष आलोचना की जिन्होंने अपने आभा मंडल को प्रलोभनकारी सम्मोहक मुद्रा से गढ़ा था, और यह भ्रम पाले हुए थे कि इतिहास में वही रचनाकार आएंगे जिनका नाम उनकी सूची में होगा।
रणेन्द्र जी ने राजेन्द्र कुमार की विरासत के विकास के लिए इतिहास, दर्शन, भाषाशास्त्र, राजनीति और समाजशास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता पर बल दिया। यह दर्शाता है कि राजेन्द्र कुमार की बौद्धिक यात्रा को व्यापक और गहन बताते हुए रणेन्द्र जी ने राजेन्द्र कुमार जी की कविता के हवाले से कहा, "यह बात नहीं कि मैं जीवन से ऊब गया हूं। बात यह है कि मैं जीवन में इतना डूब गया हूं कि मौत मुझे सतह पर होने तक नहीं रोक सकती।" यह पंक्तियाँ राजेन्द्र कुमार के जीवन दर्शन का सार हैं – जीवन के प्रति उनकी अदम्य आस्था और मृत्यु को भी एक निरंतरता के रूप में देखने की उनकी आदिवासी परंपरा से प्रेरित दृष्टि। उनके अनुसार, मृत्यु के बाद कोई स्वर्ग या नर्क नहीं होता, बल्कि पुरखा हमारे बीच ही, हमारे गृह देवता के रूप में निवास करते हैं। राजेन्द्र कुमार हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सादगी, सच्चाई, वैचारिक गहराई और साहित्यिक योगदान हमें हमेशा प्रेरित करते रहेंगे। वे एक ऐसे पुरखे हैं जिन्हें हम महसूस कर सकते हैं, और जिनके विचार हमें निरंतर आलोकित करते रहेंगे।
इसके बाद लखनऊ से आए श्री कौशल किशोर जी ने अपने विचार साझा किये। उन्होंने कहा- 16 जनवरी 2026 का दिन बहुत ही दुखद था, जब राजेन्द्र जी के निधन की खबर मिली। एक दिन पहले ही अंशुमन कुशवाहा ने बताया था कि उनकी हालत गंभीर है। उसी दिन वीरेंद्र यादव के निधन की भी खबर मिली, जिससे जीवन की क्षणभंगुरता का एहसास हुआ। हम लोग विनोद कुमार शुक्ल, ज्ञान रंजन, नासिर भाई जैसे कई साथियों के आघात से अभी उबर ही रहे थे कि यह दुखद खबर मिली।
कौशल किशोर जी ने बताया कि राजेन्द्र जी ने 1963 के आसपास कविता लेखन शुरू किया, जब निराला और मुक्तिबोध का दौर था। "हर कोशिश है एक बगावत" में वे मुक्तिबोध के विचारों का विस्तार देखते हैं, जिसमें जीने के संघर्ष और बदलाव की आकांक्षा है। राजेन्द्र जी मानते थे कि हर कोशिश को बगावत, बदलाव और एक बेहतर समाज बनाने की दिशा में ले जाना चाहिए। वे सृजन, विचार और संगठन के साथ-साथ मनुष्यता को भी महत्व देते थे। ऐसे समय में, राजेन्द्र जी जैसे व्यक्ति का होना एक चुनौती है, जो संघर्षों से जुड़ कर और मनुष्यता की पुकार वाली हर जगह जा कर खुद को समर्पित कर देते थे। राजेन्द्र कुमार जी का जाना हम सबके लिए एक बड़ी क्षति है।
जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक प्रो. रविभूषण जी ने राजेन्द्र कुमार को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि - ऐसे दौर में जब 'महंगा जीवन, तुच्छ विचार' का बोलबाला है, राजेन्द्र कुमार 'सादा जीवन, उच्च विचार' के जीवंत उदाहरण थे। उनकी मनुष्यता, सज्जनता, आत्मीयता, संवेदनशीलता और विवेकशीलता का संगम उन्हें अद्वितीय बनाता था। प्रो. रविभूषण जी ने इस बात पर जोर दिया कि आध्यात्मिक जगत और कवियों-सहृदय पाठकों के बीच भी इतनी अधिक मात्रा में ये गुण शायद ही किसी में देखने को मिलते हैं। वे नैतिक, लोकतांत्रिक और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। संवादहीनता के इस दौर में संवाद के सबसे बड़े पक्षधर थे।
प्रो. रविभूषण जी ने बताया कि राजेंद्र कुमार में लोगों को अपना बना लेने की अद्भुत क्षमता थी। ऐसे समय में जब हम अपनों को भी पराया बनाने में देर नहीं लगाते, उनकी यह विशेषता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे सहज निष्ठा के प्रतीक थे, निष्कलुष और निरभिमानी थे। प्रतिष्ठा, प्रचार, निजी आकांक्षाओं से वे कोसों दूर थे। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हमेशा प्रो. रविभूषण जी तक पहुंचती थीं, और प्रो. रविभूषण जी की पुस्तकें भी उन तक। लेकिन उन्होंने कभी अपनी रचनाओं पर बात नहीं की।
राजेंद्र कुमार की गहरी मनुष्यता और आत्मीयता ही वह सबसे बड़ी बात थी जो प्रो. रविभूषण जी को उनके प्रति आकर्षित करती थी। इस अनात्मीय समय में, राजेंद्र जी का अपनापन एक अनमोल उपहार था। उनके लिए 'सहज, निस्वार्थ, निश्चल, निश्चिंत' जैसे शब्द शायद ही पर्याप्त हों। उनकी चिंता हमेशा समय और समाज के प्रति थी। 'परिवर्तन और बदलाव' उनके मुख्य शब्द थे। प्रो. रविभूषण जी ने कभी उन्हें गुस्साते हुए नहीं देखा, जबकि वे खुद कभी-कभी गुस्सा हो जाते थे। राजेंद्र जी के चेहरे पर एक ऐसी आभा थी, जो उनके अंतःस्थल से निकलती थी।
प्रो. रविभूषण जी का मानना है कि हम राजेंद्र जी से कम से कम मनुष्य होना तो जरूर सीखें। वे सही अर्थों में इंसान थे। उनकी कविताओं और आलोचनाओं पर काफी कुछ लिखा गया है, दो-दो पत्रिकाओं (प्रयागपथ , सृजन सरोकार),के केंद्रित अंक भी आए हैं। लेकिन उनकी जीवन-दृष्टि, साहित्य-दृष्टि, समाज-दृष्टि, मूल्य-दृष्टि, नैतिक-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि और आलोचना-दृष्टि को मिलाकर देखें तो इसे 'राजेंद्र दृष्टि' कहा जा सकता है। यह राजेंद्र दृष्टि क्या है, इसे समझने के लिए उनके प्रत्येक वक्तव्य को गंभीरता से हृदयंगम करना होगा।
उन्होंने 'यथार्थ' के समतुल्य 'कथार्थ' जैसे पद को निर्मित किया, जिस पर हिंदी के किसी कहानीकार या कथा आलोचक ने शायद ही इतनी गंभीरता और विस्तार से विचार किया हो। उनकी आलोचना में स्वनिर्मित पारिभाषिक शब्दों की संख्या 10-20 से कम नहीं होगी। उन्होंने यथार्थ को महत्व दिया, लेकिन कथार्थ को उससे भी अधिक। विचारधारा का उन पर कोई आतंक नहीं था। प्रतिबद्धता के बावजूद वे आक्रांत नहीं थे। उनका खुलापन अद्भुत था, जो माओवाद की एक शाखा के खुलेपन के साथ मनुष्यवाद का विकास भी करता है।
राजेंद्र जी में एक 'साबुत दिल' था, एक साहसी दिल और प्रखर मस्तिष्क था। उनका विविध आलोचनात्मक विवेक अद्भुत था। हिंदी आलोचना में संवेदनशीलता, विचारशीलता और विवेकशीलता का ऐसा संगम किसी एक आलोचक में दुर्लभ है। प्रो. रविभूषण जी ने कहा कि राजेंद्र जी की देन बहुत अधिक है, और उनसे हमें और अधिक मनुष्य होना सीखना चाहिए। वे संवादी थे, विवादी नहीं। इस संवादहीन समय में, यह एक महत्वपूर्ण सीख है। उनकी बाहें बहुत फैली हुई थीं, वे सारा आकाश अपनी बाहों में समेट लेना चाहते थे। उनकी खुली वाणी, खुली निगाहें और खुली दृष्टि थी। वे सबको सुनते थे, विवेक चालित थे, लेकिन संवेदना उनके केंद्र में थी। इस संवेदनहीन और विवेक विहीन समय में, राजेंद्र जी हमें संवेदनशील और विवेकवान होने का मार्ग दिखाते हैं।
प्रो. रविभूषण जी ने एक दिली ख्वाहिश व्यक्त की कि इलाहाबाद में एक 'राजेंद्र कुमार व्याख्यान माला' प्रत्येक वर्ष होनी चाहिए। उनकी अधूरी चीजें प्रकाशित होनी चाहिए, ताकि हम उस महान व्यक्तित्व को गहराई से समझ सकें, जो अपने बारे में नहीं सोचता था और कहीं से भी स्वनिष्ठ नहीं था। यह दुर्लभ गुण है। राजेंद्र जी उनके अत्यंत आत्मीय मित्र थे।
राजेंद्र कुमार में कहीं निराशा नहीं थी। कैंसर से ग्रस्त होने के बावजूद वे अंत तक लड़ते रहे। उनकी लड़ाई मुखर नहीं थी, घोषणा करके लड़ने वाले नहीं थे, लेकिन वे प्रतिबद्ध थे, संघर्षरत थे। शब्दों का कितना माकूल और समुचित उपयोग करना चाहिए, यह राजेंद्र जी हमें बताते थे। प्रो. रविभूषण जी ने कहा कि राजेंद्र जी की मृत्यु उनकी निजी क्षति है, जिसे वे उनके लेखन को गंभीरता से देखते हुए भरने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी याद को अपने भीतर भरकर, फिर से जीवंत होने के लिए वे यहां आए हैं। राजेंद्र कुमार एक ऐसे प्रकाश स्तंभ थे, जिनकी रोशनी हमें हमेशा राह दिखाती रहेगी।
उत्तराखंड के कवि शंभु दत्त पांडे 'शैलेय' जी ने कहा - मैं सीधे तौर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र नहीं रहा, न ही राजेंद्र जी से मेरा परिचय किसी पारंपरिक माध्यम से हुआ। हमारी पहली मुलाकात मेरी एक कविता के माध्यम से हुई, जो 'अभिप्राय' पत्रिका में छपी थी। उन्होंने मेरे भेजे गए पत्र में मेरी ही कविता की दो पंक्तियाँ उद्धृत की थीं: "पेड़ खड़े हैं, क्योंकि जमीन में गड़े हैं।" यहीं से हमारे संवाद का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे गहराता गया और एक पारिवारिक संबंध में बदल गया।
राजेंद्र जी की सबसे अनूठी विशेषता यह थी कि वे केवल लिखने-पढ़ने तक सीमित नहीं थे, बल्कि समाज में सीधी भागीदारी में विश्वास रखते थे। वे अक्सर कहते थे कि साहित्यकार को समाज से जुड़ा होना चाहिए। मैं स्वयं श्रमिक जीवन में रहा हूँ, फैक्ट्रियों में काम किया है, और मैंने राजेंद्र जी में यह गुण देखा कि वे जहाँ भी जाते थे, वहाँ के लोगों से संवाद स्थापित करने की प्रबल इच्छा रखते थे। चाहे वे रोगी हों, श्रमिक हों, या हमारे साथी कार्यकर्ता, वे हर किसी से उनके स्तर पर संवाद करते थे। हम सब आश्चर्यचकित होते थे कि एक इतना बड़ा कवि, इतना बड़ा बौद्धिक व्यक्ति, इतनी सहजता से कैसे घुलमिल सकता है। साहित्य जगत में जहाँ अक्सर रचनाओं के प्रकाशन और समीक्षाओं की चिंता रहती है, वहीं राजेंद्र जी की चिंताएं हमेशा सरोकारों से जुड़ी होती थीं। हमारे जैसे छोटे शहरों से आए लोगों के लिए यह एक बड़ी बात थी कि एक बड़ा आदमी हमारे बीच हमारे बराबर का होकर चलता है।
शंभु दत्त पांडे जी ने एक संस्मरण साझा करते हुए बताया है कि - एक बार हम नागार्जुन जी से मिलने काशीपुर गए थे। लौटते समय मौसम खराब हो गया और हमें बस नहीं मिली। मैं ट्रकों में चढ़ने का आदी था, तो राजेंद्र जी ने कहा, "मैं तुम्हारे कंधे देखना चाहता हूँ, कितने मजबूत हैं।" मैंने उन्हें उठाया और ट्रक में चढ़ा दिया। लेकिन वह ट्रक भी आधे रास्ते तक ही गया। रात भर हम एक टूटे-फूटे ढाबे में रुके, जहाँ राजेंद्र जी ने मुझे 'ऋण- गुणा- ऋण' संग्रह की तमाम कविताएं सुनाईं और नागार्जुन सहित कई कवियों पर बातें समझाईं। अगली सुबह, जब मेरा मजदूर आंदोलन में प्रदर्शन था, तो उन्होंने कहा, "मैं उसका भागीदार बनना चाहूंगा।" और वे हमारे बीच ऐसे घुलमिल गए, जैसे वे भी वहीं के हों।
राजेंद्र जी ने मेरे व्यक्तिगत सरोकारों को भी एक नई दृष्टि दी और मेरा हौसला बढ़ाया। उनकी एक कविता मुझे बार-बार याद आती है: "कोई पिसे, कहीं पिसे, हम खत्म न होंगे। रंग पिसेंगे, महक बनेंगे, महक पिसेगी, स्वाद बनेंगे, अगर पीसने वाला कोई हाथ कहीं से नियम गढ़ेगा, हम हरदम अपवाद बनेंगे।" यह अपवाद बनने की बात ही समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी।
कथाकार अनीता गोपेश ने राजेंद्र कुमार को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने बताया कि राजेंद्र जी के जाने से एक बड़ा शून्य पैदा हुआ है। वे हमेशा लोगों से मिलते थे और उनके घर का दरवाज़ा सबके लिए खुला रहता था। राजेंद्र जी ने सबको ऐसा महसूस कराया कि वे उनके सबसे करीब हैं।
अनीता जी ने कहा कि राजेंद्र कुमार एक कवि, गीतकार, आलोचक और शिक्षक थे। वे अनीता जी के पिता के शिष्य थे, लेकिन खुद को उनका 'गुरु दोस्त' कहते थे। जब अनीता जी के बड़े भाई का निधन हुआ, तो राजेंद्र जी ने उन्हें यह कहकर सांत्वना दी कि वे उनके भाई प्रभात की जगह नहीं ले सकते, लेकिन वे खुद को प्रभात की तरह मानते हैं।
अनीता जी ने बताया कि कोविड के दौरान भी राजेंद्र जी ने फोन करके उनका हाल पूछा, जबकि वे खुद अस्पताल में थे। राजेंद्र जी ने अपने परिवार और दोस्तों से कहा कि वे एक-दूसरे से जुड़े रहें। उन्होंने जाने से पहले अपने परिवार को बताया कि कुछ शिष्य उनके बेटों की तरह थे और उन्होंने अपनी शादी के कार्ड पर उनके नाम भी दिए थे।
अनीता जी ने राजेंद्र जी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जो साहित्य, रिश्तों और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध थे। उन्होंने कहा कि राजेंद्र जी जैसा दूसरा व्यक्ति मिलना मुश्किल है। उनके जाने से साहित्य और शहर सूना हो गया है। अनीता जी ने कहा कि वे राजेंद्र जी को बहुत याद करेंगी और उनका अभाव हमेशा खलेगा।
प्रो. संतोष भदौरिया ने राजेंद्र कुमार जी को याद करते हुए कहा कि उनके जीवन के 25 साल राजेंद्र जी के अभिभावकत्व में बीते हैं। राजेंद्र जी ने उन्हें मनुष्य बने रहने में बहुत मदद की। उन्होंने कहा कि राजेंद्र जी के साथ तीन मुख्य बातें याद हैं, पहली कल बुर्गी, दाभोलकर और गौरी लंकेश की हत्या के विरोध में निकला मार्च, जिसमें राजेंद्र जी सक्रिय थे।दूसरी साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी आंदोलन, जिसमें राजेंद्र जी ने सक्रिय भूमिका निभाई। और तीसरी घटना हिंदुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर सरकार के अनुचित निर्णय के विरोध में हुई थी, जिसमें राजेंद्र जी ने लेखक संगठनों का नेतृत्व किया था और यह लड़ाई लखनऊ तक गई थी।
राजेंद्र जी एक शिक्षक के रूप में भी बहुत प्रभावशाली थे। उनके विद्यार्थियों का दायरा बहुत व्यापक था। वे सहज, सरल और मानवीय थे, ऐसे समय में भी जब मनुष्य बने रहना कठिन है। उनके घर में कोई औपचारिकता नहीं थी; छात्र कभी भी उनसे मिल सकते थे। वे आयोजनों के लिए हमेशा सहज रूप से सहमत हो जाते थे और सलाह देते थे। हिंदी विभाग ने उनके सम्मान में एक व्याख्यानमाला आयोजित करने का प्रस्ताव किया।
राजेंद्र जी जितने सरल थे उतने ही प्रतिबद्ध भी थे। वे विचारों के अतिवाद में विश्वास नहीं रखते थे और रूढ़ियों को तोड़ते थे। अपनी बीमारी के दौरान भी वे बहुत सक्रिय थे, फोन पर लोगों से बात करते थे और अपनी किताबें प्रकाशनार्थ तैयार करा रहे थे, जो हमारे लिए एक बड़ी धरोहर हैं। और उम्मीद है कि शीघ्र ही प्रकाशित होंगी।
राजेंद्र जी हमेशा युवा पीढ़ी से संवाद बनाए रखते थे और संवाद के लिए कहीं भी चले जाते थे। इलाहाबाद में यह संवादशीलता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने उर्दू भाषियों के साथ भी अपने संबंध बनाए रखे थे। राजेंद्र जी सबको साथ लेकर चलना चाहते थे, विशेषकर उन लोगों को जो संघर्षशील और प्रतिरोधी थे। उन्हें याद करने का यही सबसे सही तरीका है कि हम हर साल उन्हें इसी तरह याद करें।
हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्ष लालसा यादव ने राजेंद्र कुमार जी को याद करते हुए कहा - वे छात्रों से भी उतना ही लगाव रखते थे जितना किसी बड़े व्यक्ति से। जब वे अध्यक्ष बने, तो उन्होंने संकोच के साथ कुर्सी संभाली और कहा कि वे इसके अधिकारी नहीं हैं। लालसा यादव ने राजेंद्र कुमार जी के एक और गुण का जिक्र किया कि वे अपनी पत्नी की सेवा स्वयं करते थे, जो आजकल के पुरुषों में कम देखने को मिलता है।
इसके बाद कवयित्री संध्या नवोदिता ने राजेंद्र कुमार को श्रद्धांजलि देते हुए कहा -हम सबके आदरणीय और प्रिय राजेंद्र कुमार सर आज यहाँ स्मृति सभा में साकार हो गए। सभी लोग उनको याद कर रहे हैं। अंजुमन में इस समय हर तरफ राजेंद्र कुमार सर मौजूद हैं। उन्होंने सर के जाने पर लिखी अपनी एक कविता भी सुनाई जिसकी अंतिम पंक्तियां थीं -"आप मुझे अलविदा कहो/इसके पहले मैं आपको कहता हूँ/मैं जाता हूँ/मुझे अपनी आँखों की कोर में आँसू की तरह रख लेना/अपने खयाल की रौशनी में याद करना/मैं उदासी का ध्रुपद हूँ/गूँजता रहूँगा यहीं आपकी इसी धरती पर"
इसके बाद 'कोरस' के अंकुर जी ने वामिक जौनपुरी की रचना "यकीन से काम लो, वहमो गुमां से कुछ नहीं होता.." की शानदार प्रस्तुति दी।
इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रणय कृष्ण ने श्रद्धांजलि देने के लिए उनके प्रिय शिष्यों में से एक और इलाहाबाद के प्राचीन नागरिक तथा उत्तराखंड के वर्तमान नागरिक (हंसी करते हुए मजाक में कहा) धीरेंद्र तिवारी जी को आवाज दी। धीरेंद्र जी ने बताया - राजेंद्र कुमार के साथ मेरी मुलाकातें एक ज़ेन गुरु और शिष्य के समान थीं। वे मुझे अवलोकन करना सिखाते थे और मुझे यथार्थ की गहराई तक ले जाते थे। हम एक पर्दे को देखते थे और उसके एक-एक धागे, उसकी बनावट, उसके पार झाँकते हुए, उसके अस्तित्व पर चर्चा करते थे। यह पर्दा है या नहीं? ऐसी चर्चाएँ हमें दर्शन की गहराइयों में ले जाती थीं।
उनके पास जा कर मैंने जाना कि गांधी मार्क्स से भी अधिक जटिल थे। मार्क्स एक बौद्धिक व्यक्ति थे, लेकिन गांधी के विचार कहीं अधिक सूक्ष्म थे। सार्त्र ने एक बार कहा था, "क्या कोई और भी बुद्धिजीवी होता है?" यह दर्शाता है कि बौद्धिक जगत में भी कितनी अस्पष्टता थी। राजेंद्र कुमार हमें कक्षा में अस्पष्टता (ambiguity) पढ़ाते थे। उस समय मुझे लगता था कि वे हमें भटका रहे हैं, लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि यथार्थ की जटिलताओं को समझने के लिए अस्पष्टता को समझना आवश्यक है। यथार्थ को सीधे-सीधे नहीं समझा जा सकता, बल्कि उसकी जटिलताओं को अस्पष्टता के माध्यम से ही पकड़ा जा सकता है।
उनकी अवलोकन क्षमता केवल ज़ेन गुरु तक सीमित नहीं थी; वे एक सक्रिय चेतना से भरे हुए थे जो हमें चीजों को बदलने की दिशा में ले जाती थी। उन्होंने प्रतिबद्धता के बावजूद एक ऐसी आलोचना विकसित की जो पोस्टमॉडर्निज़्म के संघर्षों के भीतर भी प्रासंगिक थी। वे पोस्टमॉडर्निज़्म को किनारे रख कर नहीं पढ़ते थे। उनकी प्रतिबद्धता का अर्थ यह नहीं था कि वे किसी पूर्व-निर्धारित विचार को अपनी रचनाओं का उदाहरण बनाते थे। यदि विचार पहले से तय है और हम अपनी रचनाओं को उसका उदाहरण बनाते हैं, तो यह 'रीतिबद्ध काव्य' जैसा हो जाता है। वे इससे कहीं आगे थे।
उन्होंने अनुभव के आग्रह को आलोचना में सबसे पहले साही के माध्यम से प्रस्तुत किया। साही को पढ़ने के कारण अनुभव की पड़ताल और विवेक से उसकी छानबीन संभव हुई। उन्होंने प्रतिबद्धता को एक आरोपित विचार के बजाय रचना में उत्पन्न विचार के रूप में रखा। मुक्तिबोध की तरह, वे भी 'पाठ के विवेक' जैसी शब्दावली का उपयोग करते थे। हिंदी के बड़े नामों में से, मैं केवल दो व्यक्तियों को जानता हूँ जो मुक्तिबोध के निकट थे: राजेन्द्र कुमार और राजेश्वर सक्सेना। मैंने राजेश्वर सक्सेना से कहा था कि वे मुझे अपना 'सजल उर शिष्य' बनाएँ, और मैं राजेन्द्र कुमार जी का 'सजल उर शिष्य' बना रहा।
उन्होंने अज्ञेय के यहाँ होने वाले अनुभव के निजीकरण के प्रयास को तोड़ा। उन्होंने अनुभव को विवेक से परिमार्जित किया और रचना की स्वायत्तता को बनाए रखा, उसे वैधानिक कठोरता से तिलांजलि देने के बजाय।
राजेन्द्र कुमार ने परंपरा से संवाद किया और आज के सवालों से टकरा कर एक नई परंपरा का निर्माण किया। वे परंपरा को बोझ की तरह नहीं देखते थे, बल्कि एक ऐसी परंपरा का निर्माण करते थे जिसमें बोझ और मुक्ति दोनों शामिल थे। उन्होंने आलोचना में असहमति की रक्षा की और भाषा को संवाद का माध्यम बनाया। उनकी आलोचना निर्णय नहीं, बल्कि संवाद थी। वे नामवर सिंह जैसे संस्थापनावादी आलोचक नहीं थे, बल्कि एक संवादधर्मी आलोचक थे, जिनके पास संवाद के लिए आवश्यक लोकतांत्रिक चेतना थी।
मैंने उन्हें अपने समकालीनों से रिश्ता बनाते हुए देखा, लेकिन वे निर्द्वंद्वात्मक भौतिकवादी नहीं थे। वे सही मायने में द्वंद्वात्मक भौतिकवादी थे। हम लोगों ने मान लिया था कि मार्क्स ने द्वंद्वात्मक पद्धति को पूरी तरह से समाहित कर लिया था, लेकिन राजेंद्र कुमार ने दिखाया कि समकालीन उत्तर-आधुनिकता से उसके टकराव के बावजूद द्वंद्वात्मकता की ज़मीन बची हुई है। उन्होंने मार्क्सवाद को एक स्थापित मूल्य की तरह कभी नहीं लिया, बल्कि एक प्रक्रिया के तौर पर देखा।
आप मुक्तिबोध की कविताओं में 'ऋण का स्क्वायर' या 'ऋण गुणा ऋण' जैसे वैज्ञानिक शब्दावली देखेंगे। यह 'ऋण गुणा ऋण' और कुछ नहीं, बल्कि विरोध का विरोध है, निषेध का निषेध है, और फिर एक सकारात्मक स्थिति को प्राप्त करना है, क्योंकि 'ऋण गुणा ऋण धन' होता है। जो लोग प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कहे जाते हैं और मुक्तिबोध जैसे लोगों पर आरोप लगाते हैं कि वे मार्क्सवाद से अस्तित्ववाद में चले गए, वे यह नहीं समझते कि राजेंद्र कुमार जैसे लोग द्वंद्वात्मक पद्धति को बचा कर वास्तव में मार्क्सवाद की रक्षा कर रहे थे।
मुझे एक जगह बहुत आश्चर्य हुआ जब उन्होंने प्रसाद का ज़िक्र किया और लघु मानव के बारे में चल रही बहस में लघु और महत् को रखा। प्रसाद लिखते हैं कि जो लघु है,वह महत् है।इससे पहले हिंदी में एक वाक्य कहा गया था, 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह', जो छायावाद को कहा गया। जब हम विज्ञान पढ़ते हैं, तो मुझे लगता है कि क्लासिकल फिजिक्स के खिलाफ जो क्वांटम भौतिकी आई, वह भी स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह था। लेकिन प्रसाद वहाँ स्थूल को यथार्थ और महत् को आदर्श मान रहे हैं, और सूक्ष्म को यथार्थ मान रहे हैं। वे इस पूरी बहस को उलट देते हैं। यदि प्रसाद को भी इस बहस में लाया जाए, तो हिंदी में ऐसी कई बहसें पड़ी हैं जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता।
उन्होंने अपने समय के दबाव को महसूस करते हुए भी, समय से बाहर रह कर, यानी अपनी अंतःक्रिया करते हुए भी समय के दबाव में न आकर, परंपरा का निर्माण किया। बहुत से कवियों ने दबाव में आ कर चीजें लिखीं, लेकिन राजेन्द्र कुमार ने ऐसा नहीं किया। राजेन्द्र कुमार एक ऐसे असाधारण गुरु और चिंतक थे जिन्होंने मुझे जीवन और साहित्य को देखने का एक नया दृष्टिकोण दिया।
इसके बाद राजेन्द्र कुमार के मित्र वरिष्ठ चिंतक नरेश सहगल ने कहा - “दो बातें करना चाहूँगा। यह पुस्तक (भरे पांडाल को दिखाते हुए) राजेन्द्र जी ने मुझे सन 1970 में दी थी। "ऋण गुणा ऋण"। गणित की भाषा में ऋण जब ऋण से गुणा करता है, तो धन बन जाता है। आज इस संकुल को देख कर मुझे लगता है कि आपने बहुत ही जीवन में राजेंद्र जी के अंदर जो ऋण और ऋण था, उसका गुणा करके यह धन बना दिया।”
इसके बाद उन्होंने इसी संग्रह से एक कविता की कुछ पंक्तियां पढ़ी -
"... मैं जीवन से ऊब गया हूँ।
बात यह है कि मैं जीवन में इतना डूब गया हूँ
कि मौत मुझे सतह पर नहीं पा सकती
हाँ, उसे मिल सकते हैं मेरी उखड़ी हुई साँसों के बुलबुले,
जो हैं इतने ज्यादा चुलबुले
कि इन गहराइयों में भी मुझसे लड़ कर
भावों में पड़ कर जा ही धमकते हैं सीने पर
फटक के निसंदेह मौत आ सकती है,
पर मुझे वक्त तथास्तु नहीं पा सकती।
और इसीलिए राजेन्द्र कुमार जिंदा हैं। हमारे और आपके दिलों में, साहित्य के दिलों में इसीलिए जिंदा हैं क्योंकि वो सतह पर नहीं, कहीं बहुत गहरे हैं।
स्मृति सभा के अध्यक्ष और उर्दू के वरिष्ठ आलोचक प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि उनके राजेन्द्र जी के साथ कई दशकों के संबंध हैं, जब वे 70 के दशक में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में आए थे। उस समय हिंदी डिपार्टमेंट में राजेंद्र जी, सत्य प्रकाश मिश्र, दूधनाथ सिंह और मालती तिवारी जैसे युवा लेक्चरर थे।
फातमी साहब ने राजेन्द्र जी को अपना गुरु माना, जबकि राजेन्द्र जी उन्हें दोस्त और भाई मानते थे। राजेन्द्र जी ने कहा कि उनका फातमी से वही रिश्ता है जो हिंदी का उर्दू से है। फातमी को यह सुन कर खुशी हुई क्योंकि इलाहाबाद में हिंदी साहित्यकारों की उर्दू में भी गहरी पकड़ रही है, जैसे उपेंद्र नाथ अश्क, अमृत राय, बलवंत सिंह, शमशेर बहादुर सिंह और राम कुमार वर्मा। राजेन्द्र जी इस परंपरा की आखिरी कड़ी थे, जो हिंदी और उर्दू दोनों अच्छी तरह जानते थे, लेकिन कभी उर्दू का प्रदर्शन नहीं करते थे। वे अक्सर प्रोफेसर अकील रिज़वी से शब्दों और शेरों के अर्थ पूछते थे, और मीर, ग़ालिब, फ़िराक, फैज़ जैसे शायर उनके प्रिय विषय थे।
एक बार गुवाहाटी में मीर तक़ी मीर के सेमिनार में राजेन्द्र जी ने खालिस उर्दू में ऐसी तकरीर की कि उर्दू वाले भी हैरान रह गए। उनकी कविताएं भी सरल थीं, जो उनकी सहजता और शराफत को दर्शाती थीं।
फातमी साहब ने बताया कि अकील और फारूकी साहब के जाने के बाद राजेन्द्र जी अक्सर उन्हें शब्दों के अर्थ के लिए फोन करते थे। एक बार उन्होंने ग़ालिब के शेर "आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसा होना" पर आदमी और इंसान का फर्क पूछा। फातमी ने बताया कि आदमी वह है जो आदम की नस्ल से है, लेकिन इंसान वह है जो सभ्य और शरीफ हो जाता है।
एक बार उन्होंने घर और मकान का फर्क पूछा। फातमी ने समझाया कि मकान केवल एक इमारत है, जबकि घर वह होता है जहां रहने के बाद दीवारों से मोहब्बत हो जाती है।
राजेन्द्र जी उर्दू के कल्चर और जुबान से गहरे वाकिफ थे। फातमी ने कहा कि लिपि जानना एक बात है, लेकिन साहित्य जानना दूसरी। पहले हिंदी और उर्दू विभाग के शिक्षक एक-दूसरे के यहां पढ़ाने जाते थे, लेकिन अब यह सिलसिला टूट गया है।
फातमी ने कहा कि इलाहाबाद भाषाओं और तहज़ीबों का संगम है। हिंदी और उर्दू दोनों की अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। राजेन्द्र जी, जो विज्ञान पृष्ठभूमि से थे, उर्दू साहित्य पर गहरी पकड़ रखते थे। उनके मंटो, प्रेमचंद जैसे विषयों पर व्याख्यान अद्भुत होते थे। प्रो. फातमी ने सलाह दी कि हिंदी के कवियों को भी उर्दू शायरी और साहित्य जानना चाहिए, जैसे राजेन्द्र कुमार जी जानते थे।
राजेन्द्र जी हिंदी और उर्दू के बीच एक पुल थे। वे घंटों फातमी जी के साथ बैठते थे, अक्सर बातों में इतने खो जाते थे कि चाय पिलाना भूल जाते थे। उनके बेटे बाहर रहते थे, इसलिए वे खुद चाय बनाकर लाते थे। वे फातमी के घर ईद पर और फातमी उनके घर होली पर जाते थे।
आखिरी बार जब वे ईद पर आए, तो एक साधारण सी शर्ट और हवाई चप्पल पहने थे। उनकी सादगी ऐसी थी कि वे हमेशा साहित्य में जीते थे। आखिरी बार जब वे फातमी से मिले, तब उन्हें कैंसर हो चुका था और वे मुश्किल से बोल पा रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी बीमारी के बारे में बताया। फातमी को लगा कि मौत का सामना करने वाला यह आदमी कितना बहादुर है। मौत से पहले आखिरी बार जब फातमी उनसे मिलने गए, तो वे बोल नहीं पा रहे थे, केवल इशारों से बैठने को कहा। फातमी को यह समझ नहीं आया कि इतना नेक इंसान ऐसी मुसीबतों से कैसे चला गया। उन्होंने वामिक जौनपुरी का शेर पढ़ा:
"थे पास जब तो कयामत का लुत्फ़ आता था,
हुए जो दूर तो यादों का हश्र बरपा है।"
इसके बाद वरिष्ठ कवि अजामिल जी ने कहा कि बहुत से लोगों ने राजेन्द्र कुमार के बारे में अच्छी बातें कहीं, जिनसे उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कहा किसी रचनाकार या साहित्यकार को याद करने का सबसे अच्छा तरीका उसकी रचनाओं का पाठ करना है, जैसा मराठी में होता है। इसके बाद उन्होंने भी राजेन्द्र कुमार की एक कविता का पाठ किया, जिसका शीर्षक था "मुख्य काम भगवान की भक्ति है"।
राजेन्द्र जी के ज्येष्ठ सुपुत्र प्रियम अंकित ने पिता को याद करते हुए कहा कि उनके पिता केवल एक "मजबूत किले" नहीं थे, बल्कि एक "संसद" की तरह थे, जहाँ हमेशा प्रेम और सद्भावना का बहुमत रहा। उन्होंने कबीर का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पिता की सादगी और सरलता को किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता।
राजेन्द्र जी एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन उन्होंने मौत से हार नहीं मानी और हमेशा जीवन के प्रति एक मजबूत इच्छा शक्ति दिखाई। उन्होंने कहा कि उनके पिता ने मौत को भी प्यार का बहाना बताया। अंकित ने बताया कि उनके पिता आगरा से इलाहाबाद आए थे, क्योंकि वे इस शहर से बहुत प्यार करते थे और यहां उन्हें बहुत प्यार मिला। बीमारी के बावजूद, उन्होंने अपनी अंतिम साँस तक तीन किताबों का मटेरियल तैयार किया, ताकि उनका ज्ञान लोगों तक पहुँच सके। प्रियम अंकित ने कहा कि इस थाती में उनके पिता हमेशा जीवित रहेंगे।
कामरेड अविनाश मिश्रा ने बताया कि उन्होंने उनका साहित्य पढ़ा नहीं है, पर उनके एक्टिविज्म पार्ट से परिचित हैं। किसान आंदोलन में वे हमारे साथ थे और उन्होंने जोरदार शब्दों में आंदोलन को संबोधित किया। इससे ट्रेड यूनियन और किसान संगठनों के लोग ऊर्जावान महसूस कर रहे थे। प्रोफेसर कलबुर्गी के निधन के बाद इलाहाबाद में निकले जुलूस में भी वे हरी शर्ट पहने सबसे आगे थे। जी एन साईं बाबा की हत्या के बाद जब श्रद्धांजलि सभा का कोई स्थान नहीं मिला, तो एक छोटी सी घुड़शाला में कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें राजेन्द्र जी दो-तीन टेम्पो बदल कर वहां पहुंचे और जोरदार शब्दों में संबोधित किया।
साहित्यकार होने के साथ-साथ उनका एक्टिविस्ट होना हमें प्रेमचंद की याद दिलाता है। अगर साहित्य जनता और श्रमिकों के संघर्षों में नहीं है, तो वह निरर्थक है। मैंने उन्हें पढ़ा नहीं, पर सुना बहुत है। प्रेमचंद और निराला पर उनके वक्तव्यों से बेहतर मैंने कुछ नहीं सुना।
वरिष्ठ साहित्यकार सुधांशु मालवीय जी ने राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए कहा कि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, पर मन ये मानने को तैयार नहीं। उन्होंने 1984 में राजेन्द्र जी से मुलाकात की जब 'सम्मुख' नामक साहित्यिक सांस्कृतिक मंच स्थापित हो रहा था। हिमांशु रंजन, विनोद कुमार तिवारी, हरिश्चंद्र अग्रवाल जैसे लोगों के साथ मिलकर एक नए संगठन की ज़रूरत महसूस हुई थी।
लगभग 40 साल के अपने साथ के सफर में, मालवीय जी ने राजेन्द्र जी को तन, मन, धन से समर्पित देखा, खासकर 'सम्मुख' की स्थापना और संचालन में। उनकी यह कृतज्ञता आज भी है। राजेन्द्र जी 'सम्मुख' के संस्थापक सदस्य थे और उन्होंने अपने लेखों, कविताओं और विचारों से इसे आगे बढ़ाया। उनका मुख्य सरोकार साहित्य को विस्तार देना और शहर में साहित्यिक वातावरण बनाना था।
मालवीय जी के घर राजेन्द्र जी का आना एक उत्सव जैसा होता था, और उनके आने का मतलब था दो-तीन घंटे एक नई दुनिया में खो जाना। मालवीय जी ने देखा कि राजेन्द्र जी अपने चिंतन और विचारों में कितने खरे थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी सामान्य वातावरण से हट कर एक स्टैंड लेना, जिसे वैचारिक प्रतिबद्धता और प्रतिरोध कहा जा सकता है।
राजेन्द्र जी ने अपने रचना कर्म, कविताओं और समीक्षाओं में इसका बखूबी इस्तेमाल किया। मालवीय जी ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे साहित्य की आज के समय में बहुत ज़रूरत है, जब लोग अपना पक्ष लेने से कतराते हैं। उन्होंने याद किया कि कुछ साल पहले जब मंदिर का मुद्दा चल रहा था और लोग अखबारों में लिखने के लिए कतार में थे, तब राजेन्द्र कुमार को भी लिखने का अवसर मिला था।
मालवीय जी का मानना है कि राजेन्द्र जी की याद में यह स्मृति सभा उचित है। उन्होंने बताया कि राजेंद्र जी एक समीक्षक और मनुष्य के तौर पर बहुत सकारात्मक थे। उनके शिष्यों और अनुयायियों की अच्छी संख्या आज भी इलाहाबाद में है। राजेन्द्र जी ने अपने साहित्य और शिष्यों के माध्यम से इलाहाबाद में एक ऐसी विरासत छोड़ी है, जिस पर आगे चर्चा होनी चाहिए।
मालवीय जी ने कहा कि अगर हम सचमुच राजेन्द्र जी को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो हमें आज के इस मुश्किल दौर में उनकी प्रतिरोध की परंपरा को जीवित रखना होगा और इलाहाबाद के साहित्य जगत में इसे मजबूत करना होगा। यही उनके लिए सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी।
उपन्यासकार मेवा राम ने प्रो. राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए बताया कि वह उनके छात्र नहीं थे, लेकिन जब मेवा राम बिना बताए उनके घर जाते थे, तो भी वह उनसे बहुत अच्छे से मिलते थे। पिछले साल जब मेवा राम का उपन्यास 'टीपू सुल्तान' आया, तो राजेन्द्र कुमार अंदर से बीमार लग रहे थे उसके बावजूद उन्होंने उस पर एक पूरा भाषण दिया था और उन्होंने बीमारी का जिक्र तक नहीं किया।
इसके बाद लखनऊ से आईं रूबी सिंह ने प्रो. राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए कहा कि वे उनके लिए प्रेरणास्रोत थे। उन्होंने राजेन्द्र सर से अपने छात्र जीवन के जुड़ाव को याद किया, खासकर "राम की शक्ति पूजा" जैसी गहन कविताओं की उनकी सहज व्याख्या को। रूबी ने बताया कि कैसे सर ने "राम की शक्ति पूजा" की पंक्तियों को जीवन के हर क्षण से जोड़ा। उन्होंने कविता की पंक्तियों, जैसे "है अमानिशा... केवल जलती मशाल" का उल्लेख किया, जिसे सर चेतना के रूप में समझाते थे। रूबी के अनुसार, सर की शिक्षा से हमें जीवन के अंधकार में चेतना की मशाल जलाए रखने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने सर की सरलता, सहजता और प्रेम की प्रशंसा की, जो समय के साथ और भी बढ़ती गई। रूबी ने बताया कि 20 साल बाद भी सर की आवाज़ और उनके व्याख्यान उन्हें याद हैं। उन्होंने इस स्मृति कार्यक्रम के आयोजन के लिए आयोजकों को धन्यवाद दिया और कहा कि राजेन्द्र सर सदैव स्मृतियों के रूप में हमारे दिलों में अमर रहेंगे।
इसके बाद, कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रो. प्रणय कृष्ण ने वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी जी का संदेश पढ़ा। स्वास्थ्य कारणों से वे सभा में उपस्थित नहीं हो पाए। उन्होंने वाट्सएप के माध्यम से यह संदेश प्रेषित किया जिसमें उन्होंने कहा कि "इन्हें मिल कर याद करना अत्यंत प्रासंगिक है। वे एक सम्यक बुद्धिजीवी, विचारवान, संवेदनशील कवि, आलोचक और अध्यापक थे। उनकी पैनी दृष्टि, कुशाग्र बुद्धि और सटीक अभिव्यक्ति, सम्यक जीवन जीने की एक समृद्ध गाथा थी।"
'सबद' की संयोजक सुनीता साह ने राजेन्द्र सर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि हम लोग राजेन्द्र सर को अलग-अलग तरीके से याद कर रहे हैं। राजेन्द्र सर उनके लिए एक सबक थे। साह ने कहा कि राजेन्द्र सर को 83 साल का बूढ़ा नहीं समझना चाहिए, वे एक नौजवान थे। राजेन्द्र सर को गंभीर बीमारी थी, लेकिन उन्होंने कभी किसी को एहसास नहीं होने दिया। वे अपनी बीमारी के बावजूद सक्रिय थे। मौत से कुछ दिन पहले तक वे बिस्तर पर थे, लेकिन दिमाग से सक्रिय थे। वे अपनी बात दूसरों से लिखवाते थे। वे मौत से डरे नहीं। उन्होंने कहा कि हमें सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर बात करनी चाहिए। राजेन्द्र सर चाहते थे कि बच्चे सिर्फ साहित्य और कविता कहानी ही नहीं, बल्कि समाज में चल रही चीजों को भी समझें। अगर हम राजेन्द्र सर को सही मायने में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम सिर्फ इंटेलेक्चुअल ही न हों, बल्कि एक्टिविस्ट भी हों। राजेन्द्र सर एक एक्टिविस्ट थे। उन्होंने कहा था कि 'सबद' जैसी छोटी जगह को छोटा मत समझना। इसे विस्तारित करना होगा। इस ख्वाहिश को हम सबको मिल कर पूरा करना होगा। हम सब लोग अपने-अपने तरीके से इस चीज को पूरा करेंगे।
इसके बाद वरिष्ठ आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह का संदेश मृत्युंजय ने पढ़ा जिसमें विजय बहादुर जी ने लिखा था कि "मेरे मित्र और अजातशत्रु हिंदी आचार्य, कवि और आलोचक राजेन्द्र कुमार जी का अवसान मुझे निजी तौर पर गहरे सदमे में डाल गया है। इधर कुछ एक दिनों से वे जिस असाध्य रोग से जूझ रहे थे, वह कितना यातनामय था, इसका अनुमान भर किया जा सकता है। प्रयागराज शहर और विश्वविद्यालय का बौद्धिक परिसर उनकी अमलिन और निर्दोष मुस्कान से हृदय मुदित रहा करता था। उनका विषय बोध, उसे प्रकट करने वाली उनकी वस्तु पर गंभीर चिंतना और संप्रेषण कला में ऐसी प्रभावोत्पादकता थी कि श्रोताओं में एक नई प्रकार की जागरूकता जन्म ले लिया करती थी और कक्षा के छात्र अपनी जिज्ञासाओं का संतोषप्रद समाधान पा लिया करते थे।समकालीन साहित्य को लेकर उनकी समझ जिस गहरी पैठ का प्रमाण दिया करती थी, वह उनकी विशिष्ट संवेदनशीलता और सहृदयता के सहयोग से विकसित हुई थी। अकारण नहीं कि वे युवतर पीढ़ी के कवियों और लेखकों के बीच भी सम्मान और आदर के साथ देखे जाते थे। एक कवि के रूप में अपने समकालीन समय और जीवन को ले कर उनकी सहजता और भाव प्रवणता जिस काव्य भाषा में प्रकट होती थी, वह हमें भीतर ही आंदोलित कर डालती थी। कवियों और कई काव्य आंदोलनों के जन्मदाता शहर प्रयाग के नागरिक के रूप में वे न केवल अपनी वैचारिक बल्कि भावात्मक उपस्थिति रेखांकित कर हमें ऐसी यादों की थाती सौंप गए हैं, जिन्हें हम शायद ही कभी भुला पाएँ। मृत्यु तो किसी के प्रति कभी कोई रियायत नहीं बरतती और इतनी यातना के साथ उसे उसके प्रियजनों से छीन लेना भी कोई कम क्रूरता भी नहीं है। निजी तौर पर मेरे लिए अब वह शहर आधा अधूरा रह गया है। मेरा विनम्र नमन!"
इस अवसर पर राजेन्द्र कुमार की बड़ी पुत्रवधू ऋचा निगम ने अपने ससुर को याद किया। वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बाहर उनसे मिलीं, तब वह हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। राजेन्द्र सर ने उन्हें उनकी निडरता के लिए पसंद किया। वह महिलाओं के विकास के समर्थक थे और उन्होंने सिखाया कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए। उनका सभी से गहरा और आत्मीय रिश्ता था। वह लोगों के दिलों को छूते थे और उन्हें गढ़ने का प्रयास करते थे। वह घंटों तक दूसरों से बात करते और उनसे सीखते थे, भले ही उन्हें बुखार हो। वह एक रंगकर्मी भी थे और जीवन के रंगकर्म में अपने अभिनय को प्रभावशाली बनाने का प्रयास करते थे।
उन्होंने कभी अपनी बहुओं से घर के काम की उम्मीद नहीं की। वह अपनी बीमार पत्नी का बहुत ख्याल रखते थे, उनके लिए खाना बनाते थे और उनका दिल खुश रखने की कोशिश करते थे। सीमा आज़ाद भी राजेन्द्र कुमार को एक साहित्यकार से बढ़ कर एक बेहतरीन इंसान मानती हैं। उनसे बहुत से लोग अपनी समस्याएँ साझा करते थे। 2010 में, जब सीमा को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया, तो राजेन्द्र जी ने पुलिस की धमकियों का साहस से सामना किया और उनके समर्थन में खड़े रहे। दो साल पहले, जब प्रोफेसर जी एन साईं बाबा और गोपाल नायडू की मृत्यु हुई, तो शहर के बुद्धिजीवी श्रद्धांजलि सभा आयोजित करने से डर रहे थे। लेकिन राजेन्द्र जी पैदल चल कर कार्यक्रम में पहुंचे और सबके हौसले बढ़ाए। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि जी एन साईं बाबा ने हमें मरने की कला सिखाई। राजेन्द्र जी ने हमें मरने की कला सिखाई। उन्होंने अपनी आत्मीयता और ज्ञान के माध्यम से दूसरों को समृद्ध किया। वह समाज के लिए ही नहीं, अपने निजी जीवन में भी बहुत स्थिर थे। उनका प्यार और त्याग अतुलनीय था। उम्मीद है कि वे सबके दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।
इस भावभीनी श्रद्धांजलि के बाद प्रणय कृष्ण ने महुआ को गीत गाने के लिए आवाज दी।
गीत के बाद बनारस से आए डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने राजेंद्र कुमार को याद करते हुए कहा कि वे हिंदी के उत्कृष्ट प्रोफेसर, आलोचक और संपादक थे। वे इलाहाबाद की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को सहेजने वाले विरल व्यक्तित्व के धनी थे। डॉ. कुशवाहा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र न होते हुए भी, राम स्वरूप चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान के दौरान राजेन्द्र कुमार जी से मिले उन्होंने अगाध स्नेह को हमेशा संजो कर रखा है। उन्होंने बताया कि राजेन्द्र कुमार जैसे लोग अब कम बचे हैं, जो इलाहाबाद की सामासिक संस्कृति को बनाए रखते थे। 2016 में, राम स्वरूप चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान की शुरुआत करते समय, राजेन्द्र सर से उनकी घनिष्ठता नहीं थी, पर पहली मुलाकात के बाद से राजेन्द्र सर ने इस आयोजन का बहुत ख्याल रखा। अंत में, महेंद्र कुशवाहा ने राजेन्द्र सर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान इस बात से होती है कि उसके न होने पर कितने लोग उसे याद करते हैं। इस स्मृति सभा में इतनी बड़ी संख्या में लोगों का इकट्ठा होना दर्शाता है कि राजेन्द्र सर कितने लोगों के दिलों में राज करते थे और कितने लोगों के आदर्श थे। उन्होंने इलाहाबाद शहर का भी आभार व्यक्त किया कि उन्होंने इतने बड़े स्तर पर सर को याद किया।
प्रोफेसर मैनेजर पांडे की सुपुत्री, प्रोफेसर रेखा पांडे जी ने कहा - राजेन्द्र जी को याद करते हुए, सब अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी थी उनकी इंसानियत, जिसने सबको उनसे जोड़ रखा था। आज वितरित की गई बुकलेट में कुछ पंक्तियां हैं, "यह दुनिया तुम्हारी किताबों की अलमारी नहीं, कि इतनी आसानी से इसे व्यवस्थित किया जा सके।" राजेन्द्र जी में बेतरतीबी को भी तरतीब में लाने की कला थी, जिसने उन्हें सब लोगों से जोड़ा। हबीब जौनपुरी ने कहा है,
"करना जो मोहब्बत का इकरार समझ लेना,
एक बार नहीं उसको सौ बार समझ लेना।"
वे जिससे एक बार मिलते थे, उसमें सौ बार मिलने की चाह जगा देते थे। हम सब उनका परिवार हैं, और हम उनकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे। इलाहाबाद के बारे में सब कह रहे हैं, मैं भी बी ए से यहां आ रही हूं। यह पहली सभा है जहां वे हमारे चारों ओर उपस्थित हो कर भी साक्षात् नहीं हैं।
राजेन्द्र कुमार जी की छोटी पुत्रवधू रश्मि श्रीवास्तव ने अपने ससुर को याद करते हुए बताया कि शादी के समय मन में जो सामान्य विचार थे कि ससुराल कैसा होगा, वे निराधार साबित हुए। उनके ससुराल वालों ने, खासकर पापा जी और मम्मी जी ने, कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह किसी दूसरे घर में आई हैं, बल्कि ऐसा लगा कि वह अपने ही घर से दूसरे घर में आई हैं। पापा जी ने उसे अपने घर जैसा ही रहने को कहा। उन्होंने उनके स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखा; एक बार जब वह बीमार थीं, तो उन्होंने खुद खाना बनाया और उन्हें आराम करने दिया। रश्मि ने इसे एक लड़की के लिए बड़ी बात बताया कि उसे ऐसा परिवार और ऐसे सास-ससुर मिले। उन्होंने कहा कि उन्होंने पापा जी के साथ हर पल जिया है। उन्होंने पापा जी की एक कविता सुनाई, जो उन्होंने कोविड के दौरान अस्पताल में लिखी थी। कविता का शीर्षक था "उम्मीद एक ज़िद्दी बच्ची की तरह है"
बी. एच. यू. के अध्यापक युवा आलोचक डॉ. विंध्याचल यादव बताया कि राजेन्द्र सर उनपर अतिरिक्त स्नेह बरसाते थे क्योंकि उनकी मौसी का नाम विंध्यवासिनी और मेरा नाम विंध्याचल था। डॉ. विंध्याचल यादव ने कहा कि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से राजेन्द्र सर के अधीन पीएच.डी. पूरी नहीं की, लेकिन वे उनके गुरु बने रहे। उन्हें गर्व है कि उन्हें हमेशा राजेन्द्र सर का शिष्य माना जाता है। उन्होंने राजेन्द्र कुमार की प्रसिद्ध आलोचनात्मक पंक्ति का उल्लेख किया: "निराला छायावाद के रूपायन के ही नहीं, रूपांतरण के भी कवि हैं।" डॉ. यादव ने कहा कि राजेंद्र कुमार ने कई पीढ़ियों को रूपांतरित किया है। उन्होंने यह भी बताया कि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में वे और उनके साथी महेंद्र प्रसाद कुशवाहा और रवि शंकर सोनकर बीएचयू में राजेंद्र कुमार स्मृति व्याख्यानमाला आयोजित करेंगे।
डॉ. विंध्याचल यादव ने राजेंद्र सर की एक अलग बात बताई कि उन्हें ऐसे बच्चे पसंद नहीं थे जो बाहर मार खा कर घर में रोते हुए आते थे। वे चाहते थे कि बच्चे संघर्ष करना सीखें। उन्होंने राजेन्द्र सर से सीखा कि सिद्धांतों से जिंदगी को समझने की बजाय, जिंदगी के संघर्षों और अनुभवों से सिद्धांतों की ओर जाना चाहिए। राजेंद्र सर जनवादी और प्रगतिशील होते हुए भी वैचारिक स्तरों पर उदार थे, क्योंकि वे जिंदगी को खांचों में बांट कर नहीं देखते थे। डॉ. यादव ने राजेंद्र कुमार की स्मृति को प्रणाम किया और इस तरह के आयोजन के लिए सभी का आभार व्यक्त किया।
इसके बाद वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक ने राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए कहा कि वे एक युग थे। आगरा में 'समानांतरनामा' बादल सरकार विशेषांक के विमोचन में वे राजेन्द्र जी के साथ थे। भौमिक जी उन्हें अपने नाटक 'जिन्ना' में जिन्ना की भूमिका देना चाहते थे, जिसके लिए वे बाद में तैयार हो गए थे। आगे की योजनाओं के बारे में बताया कि अब वे बसंत त्रिपाठी के साथ मिल कर राजेन्द्र जी की कविताओं का मंचन करेंगे, जो उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय से आईं उमा गुप्ता ने राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए कहा कि वे उनकी कक्षाओं का हिस्सा नहीं रहीं, न ही इलाहाबाद से औपचारिक रूप से जुड़ी थीं। उन्होंने राजेंद्र सर को पहले कॉमरेड के रूप में जाना और फिर वे उनके शिक्षक बन गए। यह आज भी एक रहस्य है। जीवन, राजनीति और अकादमिक जगत के कई प्रश्नों पर जब भी उन्हें किसी मार्गदर्शन की आवश्यकता होती थी, तो रामजी भाई, राजेन्द्र सर और प्रणय जी ने हमेशा रास्ता दिखाया। उन्होंने राजेन्द्र सर से विनम्रता और दृढ़ता सीखी और उसे अपने व्यावहारिक जीवन का हिस्सा बनाने की कोशिश की है। इस कठिन दौर में, राजेन्द्र सर ने अपनी वैचारिक स्पष्टता को प्रतिबद्धता के साथ निभाया। दिल्ली विश्वविद्यालय में और पूरे देश में उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति में, जहाँ ज्यादातर शिक्षक भय के वातावरण में रहते हैं या छोटे से प्रमोशन और लाभ के लिए जद्दोजहद करते हैं, राजेन्द्र सर ने मुखरता और निडरता के साथ एक ऐसे शिक्षक का आदर्श प्रस्तुत किया है। यह मिसाल आने वाली पीढ़ियों और उनके जैसे शिक्षकों के लिए ऊर्जा का काम करेगी। उनकी अनुपस्थिति में, उनकी कविताएँ, आलोचनाएँ और यह मिसाल कि एक शिक्षक को पहले जागरूक नागरिक का कर्तव्य निभाना होता है, तभी वह अपनी कक्षाओं और लेखन के साथ न्याय कर सकता है, मार्गदर्शक रहेंगी। उमा गुप्ता ने इस मंच से राजेन्द्र सर को सलाम, आभार और कृतज्ञता अर्पित की।
'समकालीन जनमत' के संपादक राम जी राय ने राजेन्द्र कुमार की स्मृति सभा में बताया कि राजेन्द्र जी के साथ उनकी लंबी और गहरी यादें हैं। उन्होंने राजेन्द्र जी के अंतिम दिनों के प्रभाव पर बात की। उन्होंने बताया कि राजेन्द्र जी मृत्यु को ले कर सहज थे और उससे मिलने जाने की बात करते थे, जैसे उन्हें उससे इश्क हो गया हो। उनके कहे शेर का गद्य रूपांतरण -
"मौत इंतजार कर रही है
शायद हसीन भी हो
तो क्यों ना सज-संवर के
उससे मिलने चला जाए?"
राजेन्द्र जी ने मृत्यु के खटके में भी अपना काम जारी रखा और अपनी तीन किताबें व्यवस्थित कीं। यह उनकी अद्भुत ताकत थी। राय ने कहा कि राजेन्द्र जी हिंदी-उर्दू की अंतिम कड़ी नहीं हैं, बल्कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस परंपरा को आगे बढ़ाएं और इसे अंतिम न होने दें। राजेन्द्र जी ने यह प्रश्न हमारे सामने रखा है कि इस कड़ी को और आगे ले जाया जाए।
डॉक्टर रामायण राम ने राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए उनके साहित्यिक योगदान और व्यक्तित्व पर चर्चा की। उन्होंने राजेन्द्र कुमार की सरलता और सहजता के साथ-साथ उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर जोर दिया। डॉ. रामायण जी ने इलाहाबाद की एक घटना का उल्लेख किया जहां राजेन्द्र सर ने एक सांप्रदायिक नेता से सम्मान लेने से इनकार कर दिया था, और 'बहुवचन' पत्रिका के संपादकीय का उदाहरण दिया जिसमें उन्होंने अपनी संस्था के प्रमुख के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। उन्होंने बताया कि राजेन्द्र कुमार का जीवन एक लोकतांत्रिक बुद्धिजीवी का आदर्श था, जो पाखंड से मुक्त था। राजेन्द्र कुमार छात्रों से ले कर नौजवानों तक सभी के साथ घुल मिल जाते थे। वह इलाहाबाद में प्रतिरोध के आयोजनों, जुलूसों और सभाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते थे।
डॉ. रामायण राम ने राजेन्द्र कुमार को आधुनिक, लोकतांत्रिक जनवादी बुद्धिजीवी का एक मॉडल बताया और इलाहाबाद के नागरिक समाज में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद में नागरिक समाज बहुत सक्रिय है, जहां विभिन्न विचारधाराओं के लोग मिलकर संघर्ष करते हैं। राजेन्द्र सर इस नागरिक समाज के एक अनिवार्य चेहरे थे, और उनकी अनुपस्थिति में इस चरित्र को बनाए रखना इलाहाबाद के लोगों की जिम्मेदारी है, जो उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
बी. एच. यू. के युवा अध्यापक डॉ. रवि शंकर सोनकर ने राजेंद्र जी को याद करते हुए कहा - बड़े लोगों की खासियत होती है कि वे जिनसे मिलते हैं, उनको अपना बना लेते हैं । राजेन्द्र सर देह से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व से वो हमारे बीच सदैव बने रहेंगे। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इतना व्यापक है जिससे हम प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकते। उनकी वैचारिक तटस्थता इस तरह की है कि हर व्यक्ति अगर उनकी तरह सोचने लगे, तो समाज बदल सकता है। जिस बेबाकी से वो अपनी बातों को कहते थे, वह बहुत ही आकर्षित करने वाला था।
इसके तुरंत बाद प्रो. प्रणय कृष्ण ने राजेन्द्र जी के अत्यंत प्रिय और पुत्रवत शिष्य, जीवन के अंतिम समय तक उनका ख्याल रखने वाले, डॉ. अंशुमान कुशवाहा को आमन्त्रित किया। अंशुमान ने पिता तुल्य गुरु राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए कहा कि उनसे जीवन जीने की कला सीखी जा सकती है। बहुत कठिन समय में भी वह जिंदादिल थे। जब उन्हें आगरा स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया और कैंसर सेंटर के आईसीयू में होश आया, तो उन्होंने वहाँ की अव्यवस्था देखी। मरीजों का ध्यान नहीं रखा जा रहा था, पैसे लिए जा रहे थे, और स्टाफ लापरवाह था। अगले दिन अचानक व्यवस्थाएं ठीक होने लगीं क्योंकि उन्होंने डीएम को अपने ही फोन से कॉल कर दिया था, जबकि वे आईसीयू में थे।
दिल्ली से पधारी पर्यावरणविद् डॉ. सुमन गुप्ता ने राजेंद्र सर के साथ अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि भले ही वह सीधे सर से नहीं जुड़ी थीं, लेकिन उनके पति संतोष कुमार राय उनसे जुड़े थे। डॉ. गुप्ता ने सर की सादगी के दो उदाहरण दिए और बताया कि जब भी राजेन्द्र सर दिल्ली में होते थे, फाइव स्टार होटल मिलने के बावजूद, वह उनके टू बीएचके फ्लैट में रुकते थे, और खाने में उनकी कोई खास मांग नहीं होती थी।
सुरेन्द्र राही जी ने राजेन्द्र कुमार को श्रद्धांजलि देने के बजाय लाल सलाम कहना पसंद किया, क्योंकि उनका मानना था कि श्रद्धांजलि का मतलब यह मान लेना है कि वह अब हमारे बीच नहीं हैं, जबकि राजेन्द्र साहब अपनी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे। उन्होंने राजेन्द्र कुमार के साथ अपने 40 साल के संबंधों और यात्राओं को याद किया, जिसमें इलाहाबाद से सोनवार, लद्दाख और मनाली तक की यात्राएं शामिल थीं। राही जी ने राजेन्द्र ही को एक "मुकम्मल इंसान" बताया, जो सहज, सरल और आत्मीय ढंग से मिलने वाले थे, और अपना-पराया का भेद भूल जाते थे।
राही ने राजेन्द्र जी की एक कविता की पंक्तियों को उद्धृत किया:
"फूल पर लिखते चलूं या लिखने बैठूं चांद पर,
सबसे पहले ध्यान जाता है मेरा इंसान पर।"
यह दर्शाता है कि राजेन्द्र साहब एक ऐसे इंसान थे जो मानवता को सबसे ऊपर रखते थे। राही जी ने राजेन्द्र साहब के एक और उद्धरण के साथ अपनी बात समाप्त की: "यथार्थ कितना भी भयावह हो, स्थितियां कितनी भी जीवन विरोधी हों, मनुष्य के सीने में आती हर सांस का धर्म है कि वो जब तक रहे, जीवन के पक्ष में रहे। कल्पना वो शक्ति है जो इस धर्म का रचनात्मक निर्माण करना सिखाती है।" यह राजेन्द्र साहब के जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
इसके बाद राजेन्द्र कुमार जी की पौत्री यश्या ने अपने दादू की एक कविता "टार्च" का भावपूर्ण पाठ किया। जब वो कविता पढ़ रही थी तो न जाने क्यों मेरे दिमाग में मेरे बाबा की छवि बन रही थी। बाबा मुझे फिर से याद आ रहे थे। मन भारी हो गया था।
युवा कवि केतन यादव ने बस इतना ही कहा कि आप सब की बातों में ही मेरी बातें हैं और इससे ज्यादा वे कुछ बोल न सके। उनका गला भर आया था।
इसके बाद आइसा के अध्यक्ष मनीष कुमार ने राजेन्द्र कुमार को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि हम उनकी वैचारिक विरासत, प्रतिरोध की संस्कृति और छात्र-युवाओं व सोशल एक्टिविस्ट्स को लगातार दी गई प्रेरणा को नमन करते हैं। वर्तमान में जब लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं, संवाद की संस्कृति खत्म की जा रही है और विश्वविद्यालयों के विचारों को नष्ट किया जा रहा है, ऐसे में प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार की वैचारिक विरासत, प्रतिरोध की चेतना और आंदोलनों के प्रति उनकी सजगता को आगे बढ़ाने की प्रेरणा हमें उनके जीवन, व्यक्तित्व, कृतियों और लेखों से मिलती है।हम उनके समता मूलक समाज और अमन पसंद दुनिया के सपने को साकार करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। आइसा की ओर से उन्हें क्रांतिकारी सलाम।
वरिष्ठ कवि हरीश चंद्र पांडे ने राजेन्द्र कुमार को याद करते हुए कहा कि - राजेन्द्र कुमार कानपुर से इलाहाबाद आए थे, जो पूरब के मैनचेस्टर से पूरब के ऑक्सफोर्ड आने जैसा था। उनकी 'लोहा लक्कड़' वाली शब्दावली कानपुर की देन है, जहाँ मजदूरों, मिलों और शायरों से जुड़ी कविताएँ हैं। पांडे जी ने डीएवी कॉलेज, कानपुर से पढ़ाई की, जहाँ राजेन्द्र कुमार भी पढ़े थे। राजेन्द्र कुमार का जीवन साहित्य और श्रम दोनों से बना था। उनका एक मूल शब्द 'धैर्य' था। पांडे जी ने कहा कि राजेन्द्र कुमार ने अपनी कविताओं में तात्कालिकता के बजाय धैर्य का निर्वाह किया। उनकी मृत्यु से लड़ने की इच्छा शक्ति बहुत प्रेरणादायक थी। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में कविता पाठ की यादें साझा कीं। राजेन्द्र कुमार ने मृत्यु के सामने भी जीवन का रस लिया और संघर्ष किया। पांडे जी ने उनकी जीविषा को प्रणाम किया।
अंत में कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रो. प्रणय कृष्ण ने सभी को आने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि - “राजेन्द्र जी की याद बनी रहेगी इस शहर में भी, बाहर भी, हम सबके भीतर भी। इसी बात के साथ आज की स्मृति सभा समाप्त करते हैं।”
इस स्मृति सभा के अवसर पर प्रो. राजेन्द्र कुमार जी के व्यक्तित्व- कृतित्व पर केंद्रित 40 पृष्ठों की ‘लघुता में आकाश’ नामक स्मारिका सभी को वितरित की गयी।
कार्यक्रम में प्रो. कृष्ण मोहन, प्रो. अजय जैतली, प्रो. आशुतोष पार्थेश्वर, डॉ. सूर्य नारायण, डॉ. विवेक निराला, प्रो. बसंत त्रिपाठी, डॉ. वीरेंद्र मीणा, डॉ. जनार्दन, डॉ. गाजुला राजू, प्रो. धनंजय चोपणा, डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्त, असरार गांधी, प्रकाश मालवीय, अंकित पाठक, प्रेम शंकर सिंह, शिवानंद मिश्रा, सुनील ग्रोवर, हितेश कुमार सिंह, रणवीर सिंह चौहान, धारवेंद्र प्रताप त्रिपाठी, श्रीरंग, अनुपम परिहार, अशोक भौमिक, डॉ. सुरभि त्रिपाठी, प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल, डॉ. झरना मालवीय, डॉ. ऋतंभरा मालवीय समेत बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी, संस्कृतिकर्मी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
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| मनीष चौरसिया |
संपर्क
मोबाइल : 9792787475













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