नीतेश व्यास की कविताएं
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| नीतेश व्यास |
प्रेम मनुष्यता का बीज तत्त्व है। यह बाह्य नहीं बल्कि हृदय की आंतरिक भावना से सहज ही उत्पन्न होता है। प्रेम में कोई बनावट नहीं होती। प्रेम मनुष्य को दूसरे के प्रति इस कदर अनुरक्त कर देता है कि उसके साथ जन्म जन्मांतर तक जीने की लालसा उत्पन्न कर देता है। जहाँ यह प्रेम है वहीं जीवन का उजाला है। यह जीवन ही तो है जिसने इस पृथ्वी को सजा संवार कर बहुरंगी बना दिया है। गुलाब भले ही एक पुष्प है लेकिन यह प्रेम का प्रतीक बन गया है। पुष्प ही क्या मनुष्य ने प्रेम के देवी देवता तक को परिकल्पित कर लिया। कबीर ने तो यहाँ तक कह दिया 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय'। आध्यात्मिक परम्परा में तो हर भक्त खुद को ईश्वर की प्रेमिका परिकल्पित कर लेता है। प्रेमी प्रेमिका प्रेम के इस सहज भाव के वशीभूत हो कर ही हमेशा हमेशा के लिए एक दूसरे के हो जाते हैं। ईसाई परंपरा में यह मान्यता है कि सन्त वैलेंटाइन नाम के कई संत हुए जिन्हें शहादत देनी पड़ी। यह शहादत मनुष्यता के लिए थी। कहा जाता है कि आज यानी 14 फरवरी को ही वैलेंटाइन नाम के एक संत ने दुनिया को निश्छल प्रेम का उपहार दिया। वेलेंटाइन दिवस के अवसर पर आज हम पहली बार पर नीतेश व्यास की कुछ प्रेम कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं।
नीतेश व्यास की कविताएं
हस्त-पटल ज्यूं खिलता पाटल
हजारों वर्षों से
खिल रहे हैं गुलाब
हर समय में रहे हैं गुलाब से
खिले-खुले लोग
सबसे प्रिय और प्रशंसित फूल, रोमवासियों को बड़े प्रिय थे गुलाब
जैसे अंगूर की शराब
सर्दियों में गुलाब उगाने के लिये बनवाये थे उन्होंने ग्रीन हाउस
कहते हैं ग्रीक में
प्रेमी युगल
देवी एफ्रोडाइट और देवता एडोनिस के
आंसुओं ओर रक्त से पैदा हुए थे गुलाब
प्रेम और जुनून के प्रतीक
रोमन कथाओं में गुलाब को
प्रेम की देवी वीनस तथा
फूलों और वसन्त की देवी फ्लोरा से जोड़ा गया
तो सनातन मान्यतानुसार भी गुलाब को बताया ब्रह्मा का प्रिय पुष्प
कामदेव और रति का क्रीडा-कुसुम
कभी नारायण ने किया था
लक्ष्मी का श्रृंगार
गुलाब की पत्तियों से,
पुरातन ऋतु का
आदि-पुष्प है रोज़
रोज ही है रोज़ डे
जब प्रेम भरा हृदय
करता है किसी को याद
वही क्षण
हो जाता गुलाब
प्रणय निवेदन
तोते के पेट के समान कोमल
कमल-पत्र पर
अपने नखाग्र से लिखा गया
प्रणय-निवेदन
कि काम तुम्हें दिन-रात तपाता होगा
लेकिन मेरे अंगों को तो जलाता है
मैं तुम्हारे हृदय को नहीं जानती
कौन जान पाया ठीक-ठीक
अपने प्रियतम के हृदय को?
प्रार्थना है प्रणय-निवेदन
पत्र-निवेदन धरे रह जाते पांव तले ही
प्रार्थना प्रकट कर देती
प्रियतम को
तत्क्षण
मिठास एक बीज है
जैसे सुगन्ध
घोल देते सांसों में सुवास
चाॅकलेट घोलती
मुंह में मिठास
जीभ पर रखते ही
पिघलती
लिपटी रहती लेप-सी देर तक
प्रेम की अनेक परतों-सी
खुलती-खिलती
खुद को समो देती तुम में
इसे मत समझना उसका मिटना
यह तो देना है स्वयं को
पर याद रखना
सिर्फ फरवरी में ही नहीं घुलती उसकी मिठास
उसे याद कर
जेठ की भरी दुपहरी में भी
खा लो या खिला दो
गुड़ की छोटी-सी डली
देखना
फिर से खिल जाएगी
आत्मा की मुरझाई कली
टेढ़े-मेढ़े रास्ते और टेडी
शान्ति का नोबेल चाहने वाले
अशान्त राष्ट्राध्यक्ष के समकक्ष
प्रेम और करुणा की साकार मूरत
बहुत पहले
जिसने कर दिया था
असहाय भालू को मारने से इन्कार
तभी से टेडी बना प्रेम और अपनेपन का उपहार
भोला-भाला गुदगुदा-सा प्यारा खिलौना
बचपन, जवानी या बुढ़ापा
किसी से लिपट कर चुपचाप सो रहता
नर्म और गुदगुदा, नहीं करता कभी शिकायत
किसी से मोटा होने की
सभी का एकान्तिक साथी
सुनता हर बात बिना शिकायत
खाते-पीते घर की कोई लड़की
शर्माती है
अपनी सीक सरिखी सहेलियों के बीच
तो टेडी बियर उसकी शर्म को
मुस्कराहट में बदल
लाल स्कॉर्फ-सा लपेट लेता गले में
निर्जीव होते समय में
ऐसे बैठता कमरे के कोने में
कि उसके भरोसे छोड़े जा सकते हैं
पुराने प्रेम-पत्र
जिनके पते खा चुकी है स्लिम-ट्रिम होने की अदमृय आकांक्षा
विश्वास, उत्साह ओर प्रेमिल प्रतीक के रूप में
किसी को भी, कोई भी दे सकता यह उपहार
कि खिलखिला जाए उदासी भरा
किसी का संसार
आलिंगन
नहीं है मात्र बांहों का बन्धन
वह तो छूना है
दो आत्माओं का,
उन भावनाओं को
जिनको कहने में बरसों लगा देती है जुबान
फिर भी नहीं कर पाती पूरा-पूरा बयान
अनगिनत भावनाओं का
अलिखित अनुबन्ध है
आलिंगन
जैसे असंख्य पंछियों से खिल जाए उन्मुक्त गगन
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए
प्रेमियों को चुम्बन के इतिहास में
कोई रुचि नहीं
वह असाध्य गणितीय प्रमेय भी नहीं
कि जिसे हल किये बिना नहीं मिलेगा नोबेल
चिड़िया चोंच में चोंच डाल कर खिलाती अपने बच्चे को
ठीक वैसे ही जैसे
प्रागैतिहासिक माताएं अपने बच्चों को,
वह तो कभी मातृत्व है
कभी नेह की मोहर जिसे लगा दिया जाता ललाट पर,
मीठी चाॅकलेट कभी नन्हें-मुन्ने गुदगुदे गालों के लिए,
कभी प्रमत्त भ्रमरवत् आतुर प्रियतम द्वारा
मुखकमल के अधरपान की व्याकुलता बनता
तो कभी प्रेमिका की हथेली के पृष्ठ भाग पर
सजता हथफूल-सा
चुम्बन मिठास का पर्याय हो कर भी
भाव-समुद्र मे तैरती
मल्लाह-विहीन अविचल नौकाओं से
रोज़ ही बचाते दिखते
मनुष्यता का नमक
चमक-दमक के मारो!
मात्र कामुकता मत खोजना
चुम्बनों में
मनुष्यता के लोहे को खिंचने वाला अजेय चुम्बकत्व है मीठा मीठा बोसा
छ:दिन लगा के उसने सारा जहां बनाया
पहले खिलता
फिर होता निवेदन
तब घुलती मिठास
गुदगुदाती उपहार की मनुहार
कस कर बांहों में जकड़ती
चूमने प्रियतम को
कर छ: चक्रों को पार
है सन्त वैलेंटाइन का द्वार
जिन्होंने निश्छल प्रेम को दिया नूतन संसार
संत ही मिलाते हैं
प्रेमियों को प्रियतम से
देश
काल
या कोई भी परिस्थिति
संतों ने समझी है
प्रेमियों की स्थिति
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
सम्पर्क
मोबाइल : 09829831299



बहुत सुंदर कविताएं। नितेश भाई को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।
जवाब देंहटाएंगुलाब,आलिंगन, चुंबन आदि दिवसों के बहाने प्रेम का एक पूरा दर्शन कवि ने इन कविताओं में उतार दिया है।बहुत प्यारी और खूबसूरत कविताएं।
जवाब देंहटाएंBahut hi sunder tariko se prem saptah ka varnan
जवाब देंहटाएंपाश्चात्य संस्कृति के आयातित सप्ताह को पौराणिक परिदृश्य तथा भारतीय संदर्भ को कवि ने अपनी दृष्टि और अनुभव द्वारा पाठक को स्व से मिलाने वाली इंद्रधनुषीय कविताओं का प्रेमल उपहार दिया है ।
जवाब देंहटाएंप्रशंसनीय एवं सार्थक रचनाएं ।