ममता जयंत का आलेख 'मौत बदन को आती है रुह का जलवा रहता है'
![]() |
| नासिर अहमद सिकन्दर |
अभी साल 2025 विदा ही होने वाला था, अभी हम नासिर भाई के साथ आगे की योजनाएं ही बना रहे थे कि अचानक 31 दिसम्बर 2025 को उनके न होने की खबर ने हमें स्तब्ध कर दिया। खबर पर यकीन नहीं हुआ तो हमने कवि बसन्त त्रिपाठी को फोन मिलाया। मन में कहीं यह बात थी कि बसन्त भाई कह दें कि 'भाई अफवाहों पर ध्यान मत दीजिए'। लेकिन उन्होंने भी बुझे मन से बताया कि यह खबर सही है। हमने पहली बार के लिए एक योजना बनाई थी जिसके लिए नासिर भाई ने प्रतिबद्धता के साथ काम किया। 'वाचन पुनर्वाचन' कॉलम के लिए नासिर भाई ने 15 बिल्कुल युवा कवियों की कविताओं को अपनी मानीखेज टिप्पणी के साथ प्रस्तुत किया था। इस शृंखला के अन्तर्गत उन्होंने प्रज्वल चतुर्वेदी, पूजा कुमारी, सबिता एकांशी, केतन यादव, प्रियंका यादव, पूर्णिमा साहू, आशुतोष प्रसिद्ध, हर्षिता त्रिपाठी, सात्विक श्रीवास्तव, शिवम चौबे, विकास गोंड, कीर्ति बंसल, आदित्य पाण्डेय विनोद मिश्र और प्रदीप्त प्रीत की कविताएं प्रस्तुत की थीं। इस शृंखला की पंद्रहवीं और अन्तिम कड़ी अप्रैल 2025 में प्रकाशित हुई थी। इस तरह का काम वे पहले भी कर चुके थे। दैनिक नवभारत में छत्तीसगढ़ के युवा कवियों की कविताओं पर आधारित स्तंभ ‘अभी बिल्कुल अभी’ के उन्होंने संपादन के लिए वे काफी चर्चित हुए थे। इसके अलावा उन्होंने देशबंधु सहित कई दैनिक समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्ठों का भी संपादन किया था और भास्कर चौधरी तथा रजत कृष्ण जैसी बेहतरीन काव्य-प्रतिभाओं को सामने लाया था। साक्षात्कारों पर केन्द्रित श्रृंखला ‘आमने सामने’ के संपादन के लिए भी वे काफी चर्चित हुए थे। नासिर अहमद सिकन्दर का निधन पहली बार के लिए अपूरणीय क्षति है। हम अपने साथी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ममता जयंत का आलेख 'मौत बदन को आती है रुह का जलवा रहता है'।
श्रद्धांजलि आलेख
'मौत बदन को आती है रुह का जलवा रहता है'
ममता जयंत
विदा ले रहे साल में साहित्य जगत को समृद्ध करने वाले कई रचनाकार हमसे दूर चले गए या कहना चाहिए भौतिक रूप से जुदा हो गए। 12 नवम्बर को कथाकार ‘अवधेश प्रीत’ और 23 दिसम्बर को वरिष्ठ साहित्यकार ‘विनोद कुमार शुक्ल’ सहित कई अन्य मित्र इस बरस दुनिया से विदा हो गए। जिनके शोक से अभी हम उबर भी न पाए थे कि साल की इस ढलती बेला में सुप्रसिद्ध कवि ‘नासिर अहमद सिकन्दर’ के जाने की खबर आ गई। यह अप्रत्याशित खबर यूँ बंदूक की गोली तरह आई कि कहीं धंस कर रह गई। पल भर को यक़ीन ही नहीं हुआ पर नियति के इस सच को झुठलाया भी नहीं जा सकता इसलिए बिना शोर किए इस खामोशी को स्वीकारना ही है। यक़ीनन हिन्दी साहित्य जगत के लिए यह बड़ी क्षति है, एक ऐसी क्षति जिसे दुनिया के दूसरे संसाधनों से नहीं भरा जा सकता। चूंकि भावों और अभावों की जो दुनिया वेदना-संवेदनाओं से बनती है उसमें साधन-संसाधनों की कोई जगह नहीं होती।
कवि ‘नासिर अहमद सिकन्दर' एक जनप्रतिबद्ध रचनाकार हैं हिन्दी उर्दू के मेल को समझने और तरजीह देने वाले महत्वपूर्ण लेखक। यदि आज वे हमारे बीच होते तो आने वाले साल में 15 जून 2026 को हम उनका 65वां जन्मदिन मनाने की तैयारी में होते। लेकिन अफ़सोस कि सोमवार 29 दिसम्बर की सुबह कुछ दिनों से अस्वस्थ रहने के बाद वे दैहिक रूप से इस दुनिया छोड़ गए। भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत रह कर उन्होंने वहाँ जीवन का लम्बा वक्त बिताया और साथ ही हिन्दी कविता को अपना अमूल्य योगदान दिया। उनकी प्रमुख कृतियों में- 'जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में', 'खोलती है खिड़की', 'इस वक्त मेरा कहा', 'भूलवश और जान-बूझ कर, 'अच्छा आदमी होता है अच्छा' और उनकी चयनित कविताओं का संकलन शामिल है। चयनित कविताओं के इस संकलन का सम्पादन और चयन कवि ‘सुधीर सक्सेना’ ने किया है। इसके अलावा दो आलोचनात्मक पुस्तकें - 'बचपन का बाइस्कोप' और 'प्रगतिशीलता की पैरवी' भी शामिल हैं। उन्होंने प्रसिद्ध लेखकों के कुछ साक्षात्कार भी दर्ज़ किए हैं। वे साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन हस्ताक्षर’ के केदार नाथ अग्रवाल व चन्द्रकांत देवताले पर केन्द्रित अंकों का संपादन भी करते रहे। इन्हीं अंकों के जरिए उन्हें एक कुशल संपादक के रूप में पहचान मिली। विज्ञान और गणित में रूचि रखने वाले कवि नासिर ने हिन्दी जगत को ऐसी कविताएँ दीं जो अपने जन-सरोकारों के लिए जानी जाती रहेंगी। इन कविताओं से उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत में जो पहचान बनाई वह उल्लेखनीय और अविस्मरणीय है। उन्हें उनकी प्रसिद्ध काव्य कृति ‘जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में’ के लिए ‘केदारनाथ अग्रवाल सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इसके अलावा एक ‘सूत्र सम्मान’ भी उनके नाम रहा।
नासिर अपने दर्द को कविता में उतारने का हुनर बखूबी जानते थे। उनकी कविताओं में स्त्रियों की दशा, दिन-ब-दिन बढ़ते आर्थिक संकट और सामाजिक, राजनीतिक दबाव की हलचल साफ़ नज़र आती है। इसके अलावा आम जन के मनुष्य मन को भी उन्होंने बखूबी उकेरा है। इसकी एक झलक उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह ‘भूलवश और जान-बूझ कर’ की शीर्षक कविता में देखी जा सकती है-
कुछ चीजें छूटती हमसे भूलवश
कुछ छोड़ते जान-बूझ कर
छाता, स्वेटर, रूमाल, चश्मा, किताब, चाबियाँ,
कंघी, पैन और भी कई चीजें छूटती भूलवश
माचिस की खाली डिब्बी
पैकैट सिगरेट खाली
या आज का ही अख़बार आदि छोड़ते हम जान-बूझकर
समय-सारणी देखे बग़ैर
ट्रेन छूटती भूलवश
और ठसाठस भरी बस देख कर
छोड़ते ही हम उसे जान-बूझ कर
इस तरह
जीवन जीते हुए उसकी प्रक्रिया से बाहर
काव्य प्रक्रिया में
समय छूटता भूलवश
एक नवोदित कवि से
और एक पुरस्कृत कवि
समय छोड़ता जान-बूझ कर।
यहाँ कविता के मर्म में दो तरह की चीजें समाहित हैं जिनका होना न होना हमारे जीवन को दोनों तरीके से प्रभावित करता है। यह शौक और जरूरतों का मसला भी हो सकता है। गोया हम कौन सी चीज छोड़ते और कौन सी भूल जाते हैं। भूलने-छूटने का यह अन्तर ही कवि की दृष्टि को विस्तार देता है। यह क्रम उम्र भर हम सबके साथ चलता रहता है। जैसे छुट गए वे हमसे छोड़ कर अपनी कविताएँ। उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता भाषा, विचार और शैली के साथ संवेदनाओं की गहनता है। यही वजह है कि हम उन्हें उनके विदा वक्त पर याद करते हुए महसूस कर पा रहे हैं कि इस दुनिया को संवेदनाओं से सँवारने में हमारे शब्द-साधकों की कितनी बड़ी भूमिका रही है।
एक कवि के रूप में उन्होंने छत्तीसगढ़ के साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है। इसे उनकी खासियत ही कहा जाएगा कि अदबी दुनिया में आने वाले नये लोगों के लिए उनके दिल में एक मुलामियत हमेशा रही। वे नये रचनाकारों को नित नया करने और अनवरत आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे। इतना ही नहीं वे उनके संघर्ष में शामिल होकर उन्हें पहचान दिलाने की हर संभव कोशिश भी करते रहे। उनके इस प्रयास ने न सिर्फ़ उनके दिलों में जगह बनाई बल्कि अपने दम पर उन्हें अपनी ज़मीं, अपना आकाश तलाशने का हौसला भी दिया। जिसके लिए साहित्य जगत में उनकी उपस्थिति हमेशा कायम रहेगी।
कवि नासिर अहमद उन लेखकों में हैं जिनके सरोकार सिर्फ़ हिन्दी कविता या साहित्य जगत तक ही सीमित नहीं हैं वे सिनेमा जगत के उन फिल्मी गीतों से भी इत्तेफाक रखते हैं जिनमें जीवन के फलसफे को इस तरह दर्शाया गया है कि जहाँ नैराश्य भरा जीवन भी आशावादी हो उठता है। यह वे यादगार गीत हैं जो आज भी उतने ही गाए-गुनगुनाए जाते हैं जितने अपने दौर में जीवंत रहे। फिल्मी गीतों पर लिखा उनका आलेख ‘फिल्मी गीतों का काव्यात्मक स्वरूप’ इसका खुलासा करता है। यह लेख हर उस दौर के गीतों की दास्ताँ कहता है जिसकी पहचान उसके गीतों में छिपी है। फिर चाहे वे ‘प्यासा’ के लिए लिखे गए ‘साहिर’ के ‘ये महलों में तख़्तों ये ताजों की दुनिया’ जैसे प्रगतिवादी सामाजिक चेतना के स्वर हों या मुग़्ले आजम के लिए लिखे गए ‘शकील’ के- ‘प्यार किया तो डरना क्या’ जैसे रूढ़िवादी समाज को चुनौती देते विद्रोही प्रवृत्ति के गीत या फिर ज़िन्दगी की रवानगी लिए ‘शैलेन्द्र’ के ‘जिस देश में गंगा बहती है’ फिल्म के “होठों पे सच्चाई रहती है” जैसे राष्ट्र गौरव के समृद्धि भरे गीत हों। नासिर हिन्दी कविता की तरह इन गीतों को भी साहित्यिक दृष्टि से देखने के साथ इनकी प्रवृत्ति के आधार पर भी इन्हें अलग करते हैं।
अपना सच बस इतना है कि उनसे कोई बहुत पुराना राब्ता नहीं था उन्हें कुछ साल पहले साहित्यिक ब्लॉग ‘पहली-बार’ के जरिए ही जाना। उसके बाद साहित्यिक संवाद बना रहा। उनसे जब भी बात होती मन एक नयी ऊर्जा, नयी ऊष्मा से भर जाता और कुछ न कुछ सीखने को मिलता। मित्र संतोष चतुर्वेदी द्वारा संचालित किए जाने वाले इस ब्लॉग में पहली बार कविता भेजने की सलाहियत भी उन्हीं से मिली। आज दिल जहाँ उनके असमय जाने से अफ़सोस में है वहीं उस सोहबत के लिए शुक्रगुजार भी जो आश्वस्त करती रही अपने रचनाकर्म के प्रति। गो कि मायूस मन को कभी अकेला नहीं पड़ने दिया। अपने शब्दों और संकेतों से आस-पास होने का एहसास वे कराते रहे। यदा-कदा होती बातचीत में उन्हें इतना जरूर जाना कि दिन-ब-दिन बढ़ती आक्रामकता और जाति धर्म के झगड़े उन्हें परेशान करते और इस निराशा को वे कभी दबे, कभी खुले शब्दों में जाहिर भी करते रहे। अग्रज कथाकार ‘मनोज रूपड़ा’ ने उन पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि “बढ़ती हुई भयानक साम्प्रदायिकता ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था।' इसी के साथ वे मंजूर एहतेशाम को भी याद करते हुए लिखते हैं- “मृत्यु से पहले मंजूर एहतेशाम की भी यही मनोदशा थी।” इस वक्तव्य से पता चलता है कि आज आम जन के लिए दौर की इस भयावह स्थिति से जूझ पाना किस कदर मुश्किल हो गया है। उनकी इस निराशा को देखते हुए कह सकते हैं एक संजीदा कवि का यूँ असमय चले जाना उनके तनाव की कोई वजह हो सकती है या कि बढ़ती साम्प्रदायिकता का असर। बेशक आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उस रुह का जलवा कायम है और रहेगा जिसे मौत आती ही नहीं, मौत तो सिर्फ बदन को आती है। इस गाढ़े होते जाड़े में प्रिय कवि को आखिरी सलाम! बने रहेंगे वे अपने शब्दों और संवादों के साथ हमारी स्मृतियों में सदा-सदा।
![]() |
| ममता जयंत |



ममता जी ने नासिर अहमद सिकंदर के व्यक्तित्व और उनके कवि रूप को बड़ी शिद्दत से याद किया है। रजत कृष्ण और मुझ जैसों के लिए नासिर भैया का कद और भी ऊँचा है। नासिर भैया ही थे जिन्होंने हमारे शुरुआती दौर (1993-94) में अपने साहित्यिक कॉलम 'अभी बिल्कुल अभी' में विशेष टिप्पणी के साथ रविवारीय अखबार का पूरा पृष्ठ हमें दिया था—ऐसी उदारता आज के दौर में दुर्लभ है।
जवाब देंहटाएंविगत तीन दशकों से अधिक समय तक नासिर भैया अपनी कविताओं, विविध विषयों पर आलोचनात्मक लेखों और देश के कोने-कोने में आयोजित कार्यक्रमों में दिए गए वक्तव्यों के माध्यम से लगातार अपने समय की विसंगतियां दर्ज करते रहे। इस वक्त नासिर भैया की एक कविता याद आ रही है:
अव्वल तो ज़रूरी है / आदमी होना
नहीं हो सकते / तो पेड़ हो जाइए / ज़मीन हो जाइए / बादल हो जाइए / भूखे का भोजन हो जाइए / प्यासे का पानी हो जाइए / किसी का घर हो जाइए।
अलविदा नासिर भैया!
विनम्र श्रद्धांजलि! 🙏
— भास्कर चौधुरी"
नासिर अहमद साहब जैसी शख्सियत का हमसे दूर चले जाना वह नुकसान है जो कभी पूरा नहीं हो सकता। उनके साहित्य पर रोशनी डालने के.लिये ममता जी को भी सलाम।
जवाब देंहटाएं