राजकिशोर राजन की कविताएँ


राजकिशोर राजन 


अक्षर और शब्द होते हुए वाक्य की यात्रा हमें भाषा की बारीकियों से अवगत कराती है। शब्द किसी भी भाषा की रीढ़ होते हैं जिनके प्रायः अलग-अलग मतलब होते हैं। हिन्दी में तो एक ही शब्द के कई कई पर्याय होते हैं हालांकि उनके प्रयोग के सन्दर्भ अलग-अलग ही होते हैं। एक ही शब्द को हर जगह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा भी होता है कि एक ही शब्द अलग-अलग भाषाओं में प्रयुक्त किया जाता है लेकिन उनके अभिप्राय अलग-अलग होते हैं। प्रजापति एक ऐसा ही शब्द है। हिन्दू धर्म में आमतौर पर यह शब्द ब्रह्मा के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें परम्परा के अनुसार सृष्टि का निर्माता माना जाता है। आजकल इस शब्द को कुम्हार लोग अपने जातिगत नाम के लिए प्रयुक्त करते हैं। वे भी तो निर्माण ही करते हैं। मिट्टी को सुन्दर बर्तनों के रूप में गढ़ डालते हैं। अपने विकास क्रम में मनुष्य ने सबसे पहले मिट्टी के बर्तनों को ही इस्तेमाल करना सीखा था। इक्कीसवीं सदी में भी आज हम मिट्टी के बर्तन प्रयुक्त करते हैं। धार्मिक कार्यों में आज भी मिट्टी के बर्तनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। बांग्ला में प्रजापति शब्द महिलाओं और तितलियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन दोनों का निर्माण में अहम योगदान है। भाषा भले ही अलग हो लेकिन शब्द का अर्थ सन्दर्भ सामान्य तौर पर कुछ अपवादों को छोड़ कर हिन्दी और बांग्ला में एक जैसा ही है। कवि राजकिशोर राजन अपनी कविता 'अर्थ' में इस प्रजापति शब्द को ले कर लिखते हैं : "मैं एक बांग्ला फिल्म देख रहा था/ जिसमें एक माँ अपने जवान बेटे को समझा रही थी/ स्त्रियाँ प्रजापति होती हैं/ तुम इस तरह पत्थर की तरह कठोर रहोगे तो/ नहीं निभा पाओगे इस जन्म में अपनी ही पत्नी का साथ/ मुझे पता नहीं बांग्ला भाषा में तितली को क्यों कहा जाता है प्रजापति/ हमारी हिंदी में तो इसका मतलब आमतौर पर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से है/ एक भाषा का शब्द दूसरी भाषा में कितना बदल जाता है/ परंतु फिल्म में उस माँ की कही बात/ किसी भी भाषा में बोली जाए/ उसका अर्थ एक–सा रहता है।" कवि भी तो रचयिता ही होता है। राजन समय के सरोकारों को अपनी कविता में बखूबी प्रयुक्त करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजकिशोर राजन की कविताएँ।


राजकिशोर राजन की कविताएँ 



भगदड़ में छूटी हुई चप्पलें


भगदड़ में छूटी हुई चप्पलें

कैसी होती हैं अभागिन

उन चप्पलों से पूछे कोई!


किसी बच्चे की मासूम, तुतलाती चप्पल

किसी तरूणी की मोहक, चमचमाती चप्पल

किसी बूढ़े की थकी, उदास चप्पल

सबकी अपनी कथा सबकी अपनी व्यथा

सभी को अपने पैर की तलाश

मगर मिलता है कौन, भगदड़ के बाद

निरीह, मूक, लाचार ये चप्पलें, कभी मिल नहीं पातीं

अपनी ही जोड़ीदार चप्पलों से


बेसहारा इन चप्पलों में अब नहीं होगी कभी पाँलिस

न पोंछा ही जायेगा कभी कपड़े या ब्रश से

न उन्हें नसीब होगी किसी की चौखट

और न किसी का पैर 


बेकाम, बेवजह की इन चप्पलों को 

सड़ना और गलना ही होगा किसी सड़क किनारे

कूड़ा बन किसी कूड़े के ढेर में

मरना ही होगा


माताएं रोएंगी पुत्र के लिए

पुत्र, पिता के लिए

प्रेमिकाएं, प्रेमियों के लिए

और पत्नियाँ, पतियों के लिए


पर कोई नहीं रोयेगा

भगदड़ में छूटी हुई इन चप्पलों के लिए।



अर्धरात्रि में विलाप


चिहुँक उठता है अर्धरात्रि में मिरदंगिया

पूछता है सुन रे मोहना कान पाथ कर सुन

कहीं से रह–रह फूट रही

कलेजे को चीर देने वाली रुदन की आवाज


क्यों रे मोहना!

कहीं कोई नदी रो रही है क्या

कहीं कोई पहाड़ रो रहा है क्या

कहीं कोई जंगल रो रहा है क्या

या कहीं ऐसा तो नहीं कि धरती के कंठ से ही फूट रही यह आवाज

कहीं टेढ़का पोखर तो नहीं रो रहा

या कहीं रो रहा है बुढ़वा बरगद जो ठूंठ का ठूंठ शायद अनगिन बरस से 


थर-थर कांप रहा मोहना

इसलिए नहीं कि उसे रोने की आवाज सुनाई पड़ रही 

बल्कि उसे कोई आवाज सुनाई क्यों नहीं पड़ रही 

पिछले पहर उसे सुनाई पड़ी थी किसी औरत के रोने  की आवाज

किसी पुरातन संगीत की तरह 

परंतु वह तो धरती का आदिम संगीत है जैसे कि दादी अक्सर कहती थी 

वैसे गाँव के पुराने लोग बताते थे धरती जब करवट बदलती है तो

इसी तरह की आवाज निकलती है झींगुर के आवाज के साथ

एकाकार हो कर


सहसा गमगीन हो उठता है मोहना, मृदंगिया के कान में फुसफुसाता है

अब तुम नींद में लुढ़क जाओ उतान हो कर 

कल मेला में घूम–घूम तुम्हें बजाना है मृदंग कभी एक, कभी दो टँगड़ी पर 


पेट के लिए जबरदस्ती ही सही अब निफिकीर हो सो जाओ 

निशाचर की तरह रात भर जागते रहना ठीक नहीं

इस दुनिया में क्या तुम ही पैदा हुए हो यह पता लगाने के लिए कि

रात्रि के समय पोखर रो रहा है कि पहाड़

नदी रो रही है कि  जंगल

तुम्हें अभी भी पता नहीं रतजगा आदमी दिन में नशेड़ी और लथेर लगता है

जबकि इस दुनिया में भीख मांगने के लिए भी धरना पड़ता भेस 


मृदंगिया को नींद आ गई है।


(रेणु की कहानी रसप्रिया को पढ़ते हुए)



आँख का पानी


बिन पानी सब सुन कहने वाले

हमारे पुरखे कवि अब्दुल रहीम खानखाना जी

आप होते तो बताते

इतनी जल्दी हमारी आँखों का पानी कहाँ गया


क्या नदियों, तालाबों, कुएं इन सभी से

आँखों के पानी का कोई नाता है!

क्या उस वक्त भी बाज दफा यही हालत थी

तभी तो आप बार–बार चेतावनी दे रहे थे

पानी के सूख जाने से अस्तित्व खो देता आदमी


खैर जाने दीजिए उस वक्त के बारे में

आज तो उस पानी का कोई नामलेवा ही नहीं

जैसे कि हमारी दुनिया में उसका वजूद कभी था ही नहीं

कोई चोरी करते पकड़ा जाता तो उलटा अपना कॉलर का बटन खोल लेता

कोई किसी को गिरते देखता तो उसका चेहरा खिल जाता

किसी के फटे कपड़े को देखता तो गुमान से पसर जाता

किसी के रुदन–चीत्कार पर कोई रफी साहब के सदाबहार हिंदी गाने सुनता

किसी के घर में आग लगा कोई लोगों को कोई लड्डू बांटता

इस दुनिया में लगभग तीन भाग पानी है

उसी तरह आदमी में लगभग तीन भाग पानी है

इस बात पर अब भरोसा नहीं होता कविवर

अगर सब जगह इतना पानी है तो फिर आँखों के पानी के साथ

ऐसी अनहोनी कैसे हो गई


वैसे में कविवर आप तो गोस्वामी तुलसीदास के मित्र भी थे

थे सिपहसालार और लडाके भी खूब थे

और भी बहुत कुछ रहे होंगे जिसे मैं जानता नहीं

जैसे कि दुनिया की बहुत सारी चीजों को नहीं जानता

लेकिन मेरे पुरखे कवि परम आदरणीय अब्दुल रहीम खानखाना  जी

कभी एक दो दोहा तो लिख दिए होते

कि इस पानी वाली बात में कितनी सच्चाई है?




बाकी 


हम तीन जने थे जो रात्रि के अंतिम प्रहर 

अपने–अपने गंतव्य स्टेशनों पर उतरने से चूक गए थे 

सभी की आँखें खुली पर तब तक ट्रेन सीटी बजाते आगे बढ़ गई थी 

ढोली स्टेशन पर उस रात हम एक दूसरे से मिल अफसोस कर रहे थे 

और मुस्कुरा भी रहे थे कि एक हम ही नहीं लापरवाह दूसरे भी हैं 


एक ने कहा, पता नहीं मुझे आधी रात के बाद ही क्यों नींद आती है

मैं हमेशा परेशान रहा यह सोच कर कि नींद को मुझसे दुश्मनी क्यों है   

दूसरे ने कहा मोबाईल में लगाया अलार्म हर बार मुझे धोखा देता है 

पर आदमी किसी न किसी पर तो भरोसा कर के सफर में चलता है

मैंने कहा मेरे साथ तो यह अक्सर होता है 

उतरना रहता है किसी स्टेशन पर 

और रात में उतरना पड़ता किसी दूसरे स्टेशन पर 

इस पर हम तीनों ने जोरदार कहकहे लगाए कि रात्रि को भी भ्रम होने लगा होगा 

यह सुबह है या शाम 


एक दूसरे से हाथ मिला हम विदा हो रहे थे 

चलते–चलते एक ने कहा 

बहुत संभल कर यात्रा करते तो यह रात कहाँ मिलती जो खिलखिला रही ताजे फूल की तरह 

बहुत दिनों बाद पेट भर हंसा हूँ इस निर्जन प्लेटफॉर्म पर 

दूसरे ने कहा चलो दो–चार स्टेशन ही गाड़ी पार की थी 

थोड़ा-बहुत गड़बड़ न हो तो फिर जीने का मजा क्या है

नाक की सीध में जीवन भर  चलना भला कोई जिंदगी है  

मैंने कहा दोस्त, तुम जैसे लोगों से मिल मुझे लगता है 

इस बेहद चालाक दुनिया में हमारी भी जगह है 

अभी भी लापरवाही और बचपना है मुझमें बाकी 

और बाकी है तो अब बाकी ही रहेगी

जब तक जिंदगी बाकी है।


अर्थ


क्या स्त्रियाँ प्रजापति होती हैं?

अगर किसी ने प्रजापति को चुटकियों में पकड़ने की ठानी है तो

वह कोई महामूर्ख होगा या सयाना बहुत

क्योंकि उसे तनिक भी कस कर पकड़ा

तो उसका घायल होना तय

या हो सकती उसकी इहलीला समाप्त

बस उसके रंग तुम्हारी उंगलियों पर छूट जाएंगे

जैसे आत्मा पर बोझ बन कोई रह जाता है पाप

शायद इसीलिए उसे पकड़ने की जिद बच्चे करते हैं बड़े नहीं


मैं एक बांग्ला फिल्म देख रहा था

जिसमें एक माँ अपने जवान बेटे को समझा रही थी

स्त्रियाँ प्रजापति होती हैं

तुम इस तरह पत्थर की तरह कठोर रहोगे तो

नहीं निभा पाओगे इस जन्म में अपनी ही पत्नी का साथ


मुझे पता नहीं बांग्ला भाषा में तितली को क्यों कहा जाता है प्रजापति

हमारी हिंदी में तो इसका मतलब आमतौर पर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से है

एक भाषा का शब्द दूसरी भाषा में कितना बदल जाता है

परंतु फिल्म में उस माँ की कही बात 

किसी भी भाषा में बोली जाए

उसका अर्थ एक–सा रहता है।



बाजार से लौटते हुए


बाजार जाते वक्त हमेशा की तरह पत्नी ने एक पर्ची पकड़ाई 

जिसमें आड़े-तिरछे अक्षरों में लिखा था 

आलू पाँच किलो, प्याज अढ़ाई किलो, लहसुन एक पाव 

फिर उसमें अदरक, मसालों आदि के नाम थे 

और मात्रा का उल्लेख भी 


मैंने आलू चार किलो, प्याज दो किलो और इसी तरह हर चीज में बचत की 

क्योंकि अभी भी महीने के आठ दिन शेष थे 


बाजार की नजर में मैं एक उतरा हुआ आदमी था 

उसके दायें-बाएं कई चक्कर लगाया 

परंतु उसे नजर नहीं आया। 



साइकिल चलाने के दिनों में प्रेम


एक ने  प्रेम में पड़

हैन्डल छोड़ साइकिल चलाई 


दूसरे ने बारिश के दिनों में 

साइकिल को कंधे पर लाद 

प्रेमिका को खत पहुंचाई 


तीसरे ने प्रेम धोखा है 

साइकिल के पीछे लिखवाई 


मैंने कई–कई बार साइकिल से साइकिल टकराई। 




सड़क किनारे दुकान लगाए एक रफूगर को रफ़ू करते देख कर


मैंने उस कम उम्र लड़के से पूछा 

क्या कमाल का रफ़ू किया तुमने कि कोई लाल बुझक्कड़ भी धोखा खा जाए 

पता नहीं चलता इस पतलून का कभी रफ़ू भी हुआ है 

जब तक कि कोई इसे उल्टा-पुलटा कर देखे नहीं गौर से  

कि किस बारीकी से इसी रंग का कपड़ा अंदर से जोड़-जाड़ दिया गया 

वैसे भी आज किसे फुरसत किसी के कपड़े को देखे ध्यान से

जिस जमाने में आदमी, आदमी को नहीं देखता भर मुंह 


वह चुप था और उसकी आँखें एक दूसरी पतलून में रफ़ू जाँचने में लगी थीं 

कभी वह रंग मिला रहा था कभी सिलाई 

उसने कहा यही मेरा काम है आज से नहीं हमेशा से 

बाकी आप भाषा में इसे जैसा कहें वो आप समझें उससे मेरा क्या काम 


उसने उलझन में डाल दिया था मुझे 

मैं कोई रफूगर नहीं बस कुछ बोल देता कुछ लिख लेता हूँ 

फिर तनिक सोचते बोला 

तुम्हारा और मेरा काम मिलता–जुलता है 

और यहाँ तुम और मैं ही क्यों!

आज ऐसा कौन है जो रफ़ूगर नहीं है 

अच्छा है यह दुनिया रफ़ूगरों के भरोसे चल रही है  


रफूगर पहली बार मेरी तरफ गौर से देखा और मुस्कुरा दिया 

जैसे उस्ताद नौसिखिये को रफ़ू करते देखता है ।   


धमेख  स्तूप पर सुग्गा


लोहे के लटकते सिक्कड़ पर बैठ बोल रहा है सुग्गा

उधर धीरे-धीरे घिर रही है रात

रोज की तरह पर्यटकों से मुक्त हो रहा है दिन भर हलकान रहा यह स्थल

जैसे दुनिया का मेला अब खत्म हो रहा

न बुद्ध यहाँ न पंचवर्गीय भिक्षु, कोई नहीं जो ठहरेगा रात्रि में यहाँ

स्तूप पुनश्च रोज की तरह उतर जाएगा गहरे ध्यान में

क्षण को साधते पूर्ण होश में


कुछ चीवर धारी रह जाएंगे

बुद्ध धम्म को मानने वाले

धम्म से जुड़ी पुस्तकों को रटने वाले

अपने जीवन को उसी में निःशेष करने वाले

शिलापट्ट पर लिखा स्तूप का इतिहास

रात भर अपने को बाँचेगा फिर –फिर


अब नहीं बची किसी में बुद्ध बनने की चाह 

क्या यही बोल रहा है सुग्गा

लौट रहा हूँ सोचते सारनाथ से।



कस्बे के साप्ताहिक बाजार में अमरूद बेचती एक औरत के लिए


एक- आधा किलो अमरूद सुबह से शाम तक बड़ी मुश्किल से बेंच

बाकी अमरूदों को ले घर लौट रही मन मारकर औरत

कौन खरीदेगा उन्हें जिनमें न रंगत न सुगंध न ताजगी

पीले ,मुरझाए औंधे मुंह पड़े बासी अमरूदों को


इन दिनों ग्राहक सिर्फ सामान नहीं खरीदता वह खरीदता है रंगत

वह खरीदता है ताजगी वह खरीदता है सुगंध

उस औरत को कैसे पता होगा

इन तमाम गुणों को बनिया ही जानता है

उसी का बाजार,उसी का बोलबाला उसी का यह समय

उसी के पास मिट्टी को सोना बना बेचने की कला

उस औरत का अफसोस धुआँ की तरह हवा में उड़ता रहता है


सचमुच यह कितनी आश्चर्यजनक बात है

दुनिया में विश्वगुरु बनने वाले वाले देश में

जो उपजाता है मिट्टी में फसल काटता है खर-पतवार

और एक दिन मिट्टी में मिल जाता है

वह हर जगह से लौट रहा

चाहे दिल्ली हो या पटना


स्वतंत्र भारत की इस कथा को मैं

बताना चाहता हूँ उस औरत को

कि तुम्हारे दुख में सारे उपजाने वालों  का दुख शामिल है

तुम अकेली नहीं हो इस समय

यहाँ अब उसी के पास दाल

जो दलाल है

और मिट्टी से जुड़ा आदमी सब कुछ बन सकता है

मगर दलाल नहीं

यही है हमारे समय की व्यथा कथा है।



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क


मोबाइल : 7250042924

टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छी कविताएँ। इन्हें प्रस्तुत करने हेतु पहलीबार का धन्यवाद ।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी कविताएं हैं राजकिशोर राजन मिट्टी से उपजे कवि हैं प्रस्तुत सभी कविताओं में आप इस जीवन को छू सकते हैं अद्भुत लोक राग की अनगढ़ लेकिन जीवंत कविताओं के लिए बधाई राजकिशोर जी 🥀🍀 विजय सिंह,बंद टाकीज़ के सामने, जगदलपुर

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

कुँवर नारायण की कविताएँ