श्री प्रकाश मिश्र का संस्मरण 'स्मृतियों में बसा नगर : बनारस'
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| श्रीप्रकाश मिश्र |
'स्मृतियों में बसा नगर : बनारस'
श्रीप्रकाश मिश्र
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| चन्द्र कला त्रिपाठी |
प्रसंग : एक
बनारस के साहित्यिक माहौल को परिचित कराने में ब्रह्मा शंकर पांडेय और वशिष्ठ मुनि ओझा की महती भूमिका थी। मैंने वहां की महिला रचनाकारों के बारे में जिज्ञासा रखी। पांडेय जी से ही पता चला कि कविता के क्षेत्र में चन्द्रकला त्रिपाठी और आलोचना के क्षेत्र में रामकली सर्राफ काफी संभावनापूर्ण हैं। दोनों से पांडेय जी का अच्छा संपर्क था और उनके लेखन पर वे जनवादी लेखक संघ में गोष्ठी रखना चाहते थे। पर हो नहीं पा रही थी। अंततः वशिष्ठ मुनि ओझा ने चन्द्रकला त्रिपाठी की कविताओं पर एक गोष्ठी अपने घर पर रखी। वे अपने पति वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी और पुत्र जो बालक ही था, के साथ वहां आईं। जितनी सादगी से उन्होंने अपने व्यक्तित्व को सुरुचिपूर्ण ढंग से रखा था, उतनी ही सादगी और सुरुचि भरी कविताएं भी सुनाईं। उसका गहरा असर मेरे मन पर पड़ा। वैसे मैं भी अभी रास्ते की तलाश में था, इसलिए उस पर कुछ कह नहीं सकता था, पर इतना आकर्षित जरूर हुआ था कि मैं यदि किसी महिला रचनाकार को अपनी पत्रिका "उन्नयन" में "जिनसे उम्मीद है" के अंतर्गत प्रकाशित करूंगा, तो पहली कवयित्री वही होंगी। और हुआ भी वैसा ही। बद्रीनारायण के बाद हमने उन्हीं को छापा। वह अंक भी कुछ ऐसा बना कि उसका प्रचार "हिंदी कविता : चंद्रकांत देवताले से चन्द्रकला त्रिपाठी तक" के रूप में चर्चित हुआ। गोष्ठियों में मिलते-जुलते रहने से कुछ ऐसी आत्मीयता बढ़ी कि घर भी आना - जाना होने लगा। यहां तक कि कुछ जरूरी पुस्तकों की तलाश में इलाहाबाद भी आईं। बाद में जगदीश गुप्त ने कवियित्रियों की एक त्रयी निकालने की योजना बनाई और उसकी जिम्मेदारी मुझे दी तो मैंने उनका नाम सबसे ऊपर रखा। पर पता नहीं क्या हुआ कि वह योजना धरी की धरी रह गयी।
रामकली सर्राफ से परिचय चंद्रबली सिंह के यहां हुआ। उन दिनों वे समकालीन हिंदी कविता पर एक पुस्तक तैयार कर रहीं थीं। उसकी सामग्री जुटाने के लिए वे मेरे घर इलाहाबाद भी आईं और कुछ पुस्तकों को ले गयीं। तमाम जगहों से उन्होंने कविताओं को चुना अपनी व्याख्या के लिए। उनमें मेरी, ब्रह्मशंकर पांडेय और अशोक पाठक की कविताएं भी थीं। उन्होंने उसकी व्याख्या भी लिखी। उनकी पांडुलिपि पर चंद्रबली सिंह के घर पर दो चार गोष्ठियां भी हुईं। पर जब पुस्तक छप कर आई तो हमारा हिस्सा गायब था। सफाई के तौर पर उन्होने कहा कि प्रकाशक ने पुस्तक को छोटा करने के लिए कहा, इसलिए कुछ अंश निकालना पड़ा। बाद में अशोक पाठक को पता चला कि वह अंश चंद्रबली सिंह ने निकलवाया था, यह कह कर कि ये कहां के कवि हैं? ये क्या राजेश जोशी, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल वगैरह के पंजरे बैठ सकते हैं? बात तो सही थी। मुझे बुरा नहीं लगा। उसका हमारे संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा। पर पांडेय जी जैसे बुजुर्ग और अच्छे कवि का हटाया जाना खला। खला अशोक पाठक को भी और उन्होंने साप्ताहिक गोष्ठियों के आयोजन में उत्साह दिखाना कम कर दिया। अक्सर स्वयं काफी देर से उपस्थित होते थे। चंद्रबली सिंह के घर पर होने वाली गोष्ठी एक निर्जीव औपचारिकता में बदल गयी।
इस घटना का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि वशिष्ठ मुनि ओझा ने बनारस के कवियों को ले कर एक संकलन निकालने के लिए आगे बढ़े। प्रेरणा उन्हें उन्नयन के इलाहाबाद अंक से मिली। फिर देहरादून में अवधेश कुमार ने "घाटी में वृक्ष" नाम से देहरादून के कवियों का संकलन निकाला था। एक संकलन कलकत्ता के कवियों का भी निकला था। ठीक से याद नहीं आ रहा है, उसका संपादन शायद स्वदेश भारती ने किया था। संकलन निकला "कल, आज और कल" के नाम से। उसका विमोचन नामवर सिंह ने किया था। अपने वक्तव्य में उन्होंने शूकर और सुअर के फर्क को उजागर किया था, क्योंकि ओझा जी ने भूमिका में दोनों शब्दों का प्रयोग आलोचना वृत्ति के लिए किया था। बात परिहास की थी। नामवर जी को मैं एक गंभीर आदमी के रूप में जानता था। वे इतने मजे से चुटकी ले सकते हैं, इसका आभास पहली बार हुआ। उस संकलन में मेरी जो कविताएं छपी थीं उनको अच्छे से नोटिस में लिया गया। पुस्तक की समीक्षा आज में लिखते हुए मोहन लाल तिवारी ने अच्छे से हाईलाइट किया था, जिससे मेरा मनोबल बढ़ा।
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| भानु शंकर मेहता |
प्रसंग : दो
'उन्नयन' बनारस से छपने लगा था। छापने वाले थे कमल मौर्य। नेपाली साहित्य छापने पर उनका एकाधिकार था। उनसे परिचय कराया था नेपाली कांग्रेस के कृष्ण प्रसाद भट्टराई ने। हमने गुजराती कविता का एक अंक निकालने का मन बनाया। अतिथि संपादक बनाया सूरत के पुष्कर राय जोशी और जामनगर के कमल पुजारी को। उन्होंने नये कवियों को ले कर अच्छा अंक बनाया। पर वह काफी छोटा था। वशिष्ठ मुनि ओझा को पता चला तो बताया कि यहीं बनारस के रहने वाले भानुशंकर मेहता गुजराती कविता के बहुत जानकार हैं और अनुवाद करते रहते हैं। एक दिन हम उनसे मिलने गये। वे एक पैथालोजी चलाते थे। आजमगढ़ के किन्हीं गांवों में उनके पुरुखों की कभी जमींदारी थी। घुसते ही वशिष्ठ मुनि ओझा से कहा कि रोग की बात हो तो तुरन्त, दीगर कोई काम हो तो शाम को पैथालोजी बंद होने के बाद। मुझसे परिचय भी नहीं हो पाया और हम उलटे पांव लौट आए। हमें बुरा नहीं लगा। अच्छा ही लगा यह जान कर कि कोई अपने काम के प्रति इतना लगाव रखे है। फिर उनसे कई बार मुलाकात हुई। अपने अनुवादों की कोई दो सौ पृष्ठों की पांडुलिपि हमें थमा दी। उसे पढ़ा तो बहुत अराजकता पाया। तमाम उमा शंकर जोशी के पहले के भी रचनाकारों की रचनाओं का अनुवाद था। हमें समसामयिक को छाटने में दिक्कत हो रही थी। उन्हें बताया तो अगले इतवार को बारह बजे के बाद घर पर आने को कहा। मैं ब्रह्मा शंकर पांडेय और वशिष्ठ मुनि ओझा के साथ उनके कंपाउंड में घुसा तो आलीशान घर देखते ही रह गया। वे जैसे इंतजार कर रहे थे। हम तुरंत काम में लग गये। जून का महीना था और प्रचंड गर्मी पड़ रही थी। पर पानी का कोई जुगाड़ नहीं हो रहा था। जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो मांगने पर एक- एक गिलास पानी आया हम तीनों के लिए। बोलते-बोलते मेरे मुंह में झाग भर गया था। पहली जरूरत कुल्ला करने की थी। पर कुल्ला कर लेता तो पीने के लिए नहीं बचता। इसलिए पीया ही। चार-साढ़े चार बजे हम अपने काम से निवृत्त हुए और फौरन बाहर भागे। महमूरगंज की एक चाय की दुकान पर पहले छक कर पानी पीया, फिर चाय वगैरह। लोगों से सुनता रहता था कि गुजराती बड़े कंजूस और आत्मकेंद्रित होते हैं। भानु शंकर जी उसके माकूल उदाहरण लगे। पर जब गुजरात गया तो यह भ्रम टूट गया। वहां जाते ही एक गिलास पानी से स्वागत होता है। लोग बड़ी अच्छी खातिरदारी करते हैं। भानु शंकर जी भी ऐसे नहीं थे। चंदा तुरंत देते थे।
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| कुशवाहा कांत |
प्रसंग : तीन
उन्नयन का वह अंक निकालने का एक लाभ यह हुआ कि मेरा परिचय ब्रह्मदेव 'मधुर' से हो गया। पत्रिका का कवर बनना था। उसके लिए मुद्रक कमल नाथ मौर्य मुझे ब्रह्मदेव 'मधुर' के पास ले गये। भेलूपुर में उनका छोटा सा दवाखाना था, चित्र बनाना शगल। उनको गोष्ठियों में यहां-वहां देखा जरूर था, पर बात नहीं हुई थी। उन्होंने बड़े मनोयोग से गरवा करती स्त्रियों का चित्र बनाया जो उन्नयन आठ के कवर के रूप में छपा। मधुर जी बड़े मिलनसार आदमी थे। रचनाकारों से बहुत आत्मीयता रखते थे। उनके तमाम किस्से उनसे सुनने को मिले, विशेषकर पल्प लेखक कुशवाहा कांत के बारे में। उनके कई उपन्यास विद्यार्थी जीवन में पढ़ा था और लाल रेखा और जंजीर की स्मृतियां बरकरार थीं। वे एकमात्र लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों का नाम ले कर उनकी मजम्मत की थी। बड़े बड़े रचनाकारों को पढ़ा, पर इतनी स्पष्ट भर्त्सना कहीं अन्यत्र पढ़ने को नहीं मिली। पता नहीं क्यों इन उपन्यासों को पल्प ही माना गया, जबकि आंका जाता तो साहित्य के मूल्य पर भी खरे उतरते। मुझे लगता था कि उनकी हत्या स्पष्टवादिता के लिए हुई होगी। पर मधुर जी से बात कर के लगा कि वह प्रेम-प्रसंग के नाते था और वह प्रेमिका मधुर जी की बहन लगती थी। बातें उन्होंने विस्तार से बताई थीं, जिन्हें यहां लिखने का मन नहीं हो रहा है। बार बार मिलते-जुलते रहने से उनका दवाखाना भी शाम को मेरे बैठने का अड्डा बन गया, जहां सप्ताह में एक बार जरूर जाता था, जब तक बनारस रहा।
ऐसे ही एक मित्र नागर साहब बने जो ठठेरी बाजार वाली गली से दुर्गा घाट जाने वाली गली के बीच एक हवेलीनुमा घर में रहते थे, मेरे आवास के पास ही। कहानीकार के संपादक कमल गुप्त ने बताया था कि वे गुजराती साहित्य पर लेख लिखते हैं। मैं बलराम उपाध्याय के साथ मिला तो पाया कि वे हाथीदांत पर बहुत बढ़िया नक्काशी करते हैं। जो लेख उन्होंने लिखा वह तो मुझे नहीं भाया और उन्नयन में नहीं छपा (उस अंक की समीक्षा के रूप में थोड़े हेर-फेर के साथ लक्ष्मी शंकर व्यास ने आज में छपवाया), पर उपहारस्वरूप हाथीदांत की उन्होंने छोटी सी एक कृति दी जो कहीं मेरे सामानों में है।
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| ज्ञानेन्द्रपति |
प्रसंग : चार
तीसरी महिला रचनाकार मुझे पुष्पा अवस्थी के रूप में मिलीं। वे बसंत कालेज राजघाट में पढाती थीं, कहानीकार में संपादकीय सहयोग करती थीं, कविताएं लिखती थीं। उनकी कुछ कविताएं इधर-उधर पत्रिकाओं में देखी थी। उनसे मिलवाया मेरे सहयोगी गिरीश नारायण त्रिपाठी ने। वे दूर के रिश्ते में उनकी बहन लगती थीं। बाद में उन्होंने प्रसिद्ध कवि ज्ञानेंद्रपति से विवाह कर लिया। ज्ञानेंद्रपति तब बिहार में जेलर थे। नौकरी छोड़कर वे बनारस में बस गये। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने गंगा तट को ले कर ढेर सारी कविताएं लिखीं, जिससे उनकी माकूल पहचान बनी, बड़ी ख्याति मिली। पर पुष्पा जी का लिखना और छपना कम हो गया। वह सिलसिला पुनः तब आरंभ हुआ जब वे विदेश पढ़ाने चली गयीं। अभी उन पर केंद्रित गुफ्तगू (इलाहाबाद) का अंक निकला है।
मेरा परिचय ज्ञानेंद्रपति से उन्हीं के माध्यम से तभी हुआ। वे कभी-कभी चंद्रबली सिंह के यहां होने वाली गोष्ठियों में आते थे। कम बोलते थे, पर जो बोलते थे, वह बड़ा सारगर्भित होता था। मैं उनके घर कभी-कभी जाता था और साहित्य पर खूब बातें होती थीं। वे लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं को पढ़ते थे और वहां छपी रचनाओं पर स्पष्ट विचार रखते थे और यथाप्रसंग व्यक्त भी करते थे। वे बनारस के साहित्यिक समाज से बहुत घुल नहीं पाये। मैं बनारस से चले जाने के बाद भी उनसे कभी -कभी मिलने जाता था वहां आने पर। कई बार देवरिया के अरुणेश नीरन से उनके यहां मुलाकात होती थी और खूब बातें होती थीं। वे कभी-कभी विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के साथ दस्तावेज की छपाई के लिए भी आते थे। तब मैं ब्रह्मा शंकर पांडेय और अशोक पाठक के साथ विश्वनाथ जी से भी मिलता था। अरुणेश जी ज्ञानेंद्रपति की कविताओं को बहुत महत्त्व देते थे। जाते-जाते उनका नाम कुशीनगर से दिए जाने वाले अज्ञेय सम्मान के लिए तय कर गये।
कई बार वहां ओम निश्चल भी मिले। वे वहां बैंक में मुलाजिम थे। वे ज्ञानेंद्रपति को निराला के बाद सबसे बड़ा कवि मानते थे। उन दिनों ज्ञानेंद्र पति ने लंबी दाढ़ी रख लिया था, जो विरड़ होने के बावजूद निराला की दाढ़ी से मिलती थी। तो निराला से साम्य वे दाढ़ी के आधार पर देखते थे कि कविता के आधार पर, कह नहीं सकता। कहते तो यही थे कि वे अपना सारा आलोचना कर्म ज्ञानेंद्रपति पर ही केंद्रित करेंगे। तब मैं सोचता था कि निराला को रामबिलास शर्मा मिले, ज्ञानेंद्रपति को निश्चल। पर दिल्ली चले जाने के बाद कभी ज्ञानेंद्रपति का नाम लेते नहीं सुना।
सेवानिवृत्ति के बाद बनारस जाने पर मैं कुछेक बार ज्ञानेंद्रपति से मिलने गया। गौर किया कि वे अब उतनी गर्मजोशी से नहीं मिलते। अक्सर कहते कि शाम को स्टेशन के पुल पर मिलें या गंगा तट पर। वहां वे भीड़ की गतिविधियों का निरीक्षण और आकलन करते हैं, जिससे उन्हें अपनी कविता की सामाग्री मिलती है। पर मेरी आदत है, मैं लोगों से, विशेष कर रचनाकारों से उनके घर पर मिलता हूं। बाहर मिलने पर उतनी आत्मीयता का बोध नहीं होता, जिसकी तलाश में मैं निरंतर रहता हूं। ज्ञानेंद्रपति के बरजने का कारण मैं उनके देर से उठने की आदत या फिर अकेले रहने का झंझट मानता था। बाद में पता चला कि उन्हें लगता है लोग उनसे पहले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय या मुक्ता से मिल कर आते हैं, जो पास ही रहते हैं, इसलिए उनको एकल महत्व नहीं देते। मैंने दो-एक बार ऐसा किया भी था, जब पांडेय जी बहुत बीमार थे। आगे मैंने सावधान रहने को सोचा। पर कई वर्षों से उनसे मिलने जा नहीं पाया।
ज्ञानेंद्रपति को लगता है कि बनारस उन्हें वह महत्व नहीं दे पाता है, जिसके वे हकदार हैं। बात भी कुछ सही है। वे ऐसे रचनाकार हैं, जिन्हें पहल सम्मान और साहित्य अकादमी दोनों मिला है। उनकी कविताएं यथार्थ की जबरदस्त नमूना है। पर वहां के अकादमिक और रचनाकार दोनों उनसे कतरा कर रहे। इससे उनका अकेलापन बढ़ जाता होगा। यही अनुभूति इलाहाबाद में अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा को भी हुई। वे इतने आहत हुए कि इलाहाबाद छोड़ कर चले गये। अब देहरादून और मसूरी के बीच एक बड़े सुरम्य स्थान पर रहते हैं। मिलते हैं तो इलाहाबाद छोड़ने का दर्द छलक उठता है। ज्ञानेंद्रपति ने बनारस नहीं छोड़ा है, यह बड़ी बात है।
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| केशव शरण |
प्रसंग : पांच
केशव शरण से पहला परिचय कब हुआ याद नहीं, शायद चंद्रबली सिंह के यहां हुआ हो। पर जो याद आ रहा है वह यह कि एक दिन दफ्तर से मैं सीधे उनके दफ्तर गया। वे मुख्य पोस्ट आफिस में थे। उन दिनों वे स्पीड पोस्ट विभाग में थे। उन्होंने दोपहर बाद वहां से छुट्टी लिया और हम पास के ही सिनेमाघर में पिक्चर देखने गये। नाम था "द लास्ट इंपरर"। वह चीन के अंतिम बादशाह के जीवन पर आधारित थी और बहुत अच्छे ढंग से फिल्माई गई थी।
वे तब कविताएं लिखते थे और पहला संकलन "तालाब के पानी में लड़की" आ गया था। उसे मैंने काशी विद्यापीठ के सामने अवस्थित पान की दुकान पर देखा था। उस दुकान को चलाने वाले स्वयं ग़ज़ल लिखते थे और लोगों के कई शे'रों का पोस्टर बना कर दुकान में टांगें थे। उनका नाम याद नहीं आ रहा है। पुस्तक की छपाई ठीक नहीं हुई थी और नाम भी किसी और के संकलन से कुछ मिलता था, इसलिए उन्होंने उसे डिस्ओन कर दिया और कविताओं को धीरे धीरे अन्य संकलनों में खिसका दिया।
केशव शरण हाइकू और ग़ज़ल भी लिखते थे और धीरे-धीरे उस क्षेत्र में अच्छा नाम कमाया। जिस दिन पांडेय जी या पाठक जी साथ नहीं होते थे, यदि वे मिल जाते थे तो हम लोग खूब पैदल घूमते थे। उसी में उनके मित्र राजेंद्र राजन से परिचय हुआ। वे जरी का काम करते थे और पीतल के तारों के बारे में बहुत अच्छी जानकारी रखते थे। बाद में वे प्रसिद्ध समाजवादी नेता किसन पटनायक के साथ हो गये। उनसे साथ छूटा तो वे जनसत्ता के संपादकीय विभाग में चले गये। अब शायद दिल्ली में रहते हैं। बनारस जाने के बाद उनसे फिर मुलाकात नहीं हुई।
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| डा. बच्चन सिंह |
प्रसंग : छः
डा. बच्चन सिंह से मिलने उनके घर गया। वे रथयात्रा पर स्थित मेरे दफ्तर के पास ही निराला नगर में रहते थे। बहुत पहले मैंने उनकी पुस्तक निराला पढ़ी थी। दूधनाथ सिंह ने "निराला : आत्महंता" की चर्चा करने पर बताया था कि निराला पर पहली बार व्यवस्थित पुस्तक बच्चन सिंह ने लिखा था, वह भी बहुत कम उम्र में। मुझे लगता था कि रामबिलास शर्मा ने लिखा था। कम उम्र क बात पर दूधनाथ सिंह ने यह भी बताया था कि स्वयं उनकी पुस्तक एम. ए. के लिए बनाए नोट्स हैं। मैं दूधनाथ सिंह की प्रतिभा का कायल था, क्यों कि आज भी मेरी निगाह में निराला पर वह सर्वोत्तम पुस्तक है।
तीजहर का समय था और बच्चन सिंह बरामदे से सटे खुले ऊंचे चबूतरे पर कुर्सी डाल कर बैठे थे अकेले चाय पीते हुए। नमस्कार कर मैंने अपना परिचय देना आरंभ किया तो उन्होंने कहा कि वे मुझे जानते हैं और अच्छी तरह से जानते हैं। मैं चौंका। उन्होंने बताया कि रामचंद्र शुक्ल वाले जन्म शदि समारोह में मुझे दूधनाथ सिंह को अड़सा में डालते देखा था। फौरन मेरे मन में आया कि दूधनाथ सिंह ने जरूर साहित्य के सिंह समाज में मेरे बारे में वैसे ही भर दिया होगा जैसे इलाहाबाद में दुष्प्रचार करते रहते हैं। पर उन्होंने कहा कि उन्होंने 'उन्नयन' देखा है और वह बहुत अच्छी पत्रिका है। नयी कविता के बाद वही इलाहाबाद से कविता के क्षेत्र में झंडा गाड़ रही है। मेरी आशंका दूर हुई। तभी उन्होंने कहा कि आपकी रेपुटेशन बहुत अच्छी है। मुझे ख्याल आया कि मेरे बारे में तब प्रमोद सहाय ने बताया होगा। उनको मैं 'जिनसे उम्मीद है 'के तहत पहले कवि के रूप में छाप चुका था। वे इनके दामाद हैं। पत्रिका भी उन्होंने ही दी होगी।
उसके बाद उनके पास अक्सर आना जाना होने लगा। सेवानिवृत्तक आदमी थे। साहित्य पर अच्छे लोगों से बात करने का मन करता होगा। छात्र तो अक्सर ही आते जाते थे , पर उनके स्तर के लोग कम ही। उन दिनों मैं लूकाच को पढ़ रहा था। उनकी भी जिज्ञासा बड़ी गहरी थी। पर पुस्तकें नहीं मिलती थीं। मैंने लुकाच की सारी पुस्तकें रूपा एंड संस इलाहाबाद के माध्यम से मंगाया था। उन्होंने मांगा तो एक-एक कर उन्हें देता गया। पढ़ने में वे काफी पटु थे। जल्दी ही उन्होंने कई लेख लिखे। दो तो नवभारत टाइम्स में ही छपे। अच्छी चर्चा हुई।
हम लोग अक्सर ही साहित्य पर बहस करते थे। पर अक्सर ही शब्दों के अर्थ पर गड़बड़ा जाते थे। वे उसका एक अर्थ लगाते थे, मैं दूसरा। तब उन्होंने कहा कि शब्दों का अर्थ निश्चित होना चाहिए तभी बहस हो सकती है। मैंने कहा कि रेमण्ड विलियम्स ने ऐसा किया है। बच्चन सिंह ने कहा कि वे भी ऐसा करते हैं। परिणामस्वरूप 'हिंदी आलोचना के बीज शब्द" नाम से उनकी पुस्तक आई।
ऐसी ही बातचीत के दौरान मैंने कहा कि आज साहित्य को देखने के तीन कोण हैं, एक रेमण्ड विलियम्स का, दूसरा अल्थूसर का, तीसरा का। बच्चन सिंह ने पहले का "थिअरी आफ लिटरेचर" पढ़ा। फिर अल्थूसर को। सारी पुस्तकें मैंने ही थीं। उसके आधार पर उन्होंने कुछ लिखने का मन बनाया। लिखा कि नहीं ख्याल नहीं। जो ख्याल है वह यह कि किसी बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि आप इतने जानकार हैं। तब आप चंद्रबली सिंह के यहां क्यों जाते हैं। मैं चकित रह गया। पूछा, "क्यों"?" वहां आप की मति कुंद हो जाएगी"। "भला कैसे?" "वे कोई बात खुल कर करते? रोज वही बात बड़े ऊबाऊ ढंग से दुहराते हैं।" बात कुछ हद तक सही थी। पर ऐसा वे मोहन लाल तिवारी के बारे में भी कह चुके थे। मैंने सोचा कि वे दोनों जनवादी लेखक संघ से हैं। बच्चन सिंह प्रगतिशील लेखक संघ के स्थानीय अध्यक्ष हैं, इसलिए संगठन की प्रतिद्वंद्विता के कारण ऐसा कर रहे होंगे। उससे मुझे क्या लेना-देना! प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियां नहीं के बराबर होती थी, और उसमें बच्चन सिंह भूल कर भी नहीं बुलाते थे। जनवादी लेखक संघ की हर गोष्ठी में मुझे चंद्रबली सिंह बुलाते थे और मेरे विचारों को काफी महत्व देते थे।
मैं चौंका तब जब यही बात उन्होंने विद्या निवास मिश्र के बारे में कही। ऊपर से जोड़ा कि उनकी सोहबत में आप पोंगा हो जाएंगे। मुझसे रहा नहीं गया। स्पष्ट कहा, "अलावा बल्देव उपाध्याय के बराबर का एक विद्वान ऐसा बता दीजिए जो उनके पजरे बैठ सकता हो, मैं उन्हें छोड़ देता हूं। आपके सबसे बड़े विद्वान नामवर सिंह भी उनका पांव छूते हैं, और इसलिए नहीं कि वे ब्राह्मण हैं, इसलिए कि वे उनकी विद्वता का सम्मान करते हैं।"
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| सुरेंद्र प्रताप सिंह |
प्रसंग : सात
डॉ. बच्चन सिंह के बड़े बेटे डा. सुरेंद्र सिंह काशी विद्यापीठ में पढ़ाते थे। बड़े ही सुदर्शन और सौम्य। आरंभ में उनसे बात कम ही हो पाती थी, यद्यपि कि वे लगभग हम-उम्र थे। उन्हें लगता था कि मेरी मित्रता उनके पिता से है, इसलिए उसका लेहाज करते हुए थोड़ा दूर रहना चाहिए। वे समाजवादी थे और उस सर्किल के लोगों से स्थानीय स्तर पर उनका अच्छा संबंध था। बाद में वे धीरे-धीरे खुलते गये तो अपने संपर्क के कुछ लोगों से परिचय कराया। उनमें सबसे महत्वपूर्ण थे दीपक मलिक। वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे। मार्क्सवादी थे। अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र का अच्छा ज्ञान रखते थे। उनके व्यावहारिक पक्ष में उनकी रुचि गहरी थी। रहते भी वे मेरे दफ्तर के पास ही थे। विवाह नहीं किया था। इसलिए जब चाहे तब मिला जा सकता था। उनसे बातें अक्सर होती थीं। एक दिन उन्होंने पूछा कि मुझसे आप वे बातें नहीं करते, जो आप के दफ्तर वाले हमेशा करते हैं। मैंने पूछा कि क्या बातें। उन्होंने बताया कि वे बातें जो दफ्तर के काम की होती हैं। मैंने स्पष्ट कहा कि मुझे उनमें रुचि नहीं है और मैं आपके पास बौद्धिक खूराक के लिए ही आता हूं। जब तक मैं बनारस रहा हमारे बीच बातें खूब होती थीं। पर वह अंतरंगता न हो पाई जो मित्रों के बीच होती है। उनसे अन्तिम मुलाकात वर्धा के विश्वविद्यालय में हुई थी। उन्होंने वहां कई व्याख्यान दिया था। बनारस जाने पर उन्हें खोजा खोजा पर उन्होंने पुराना मकान छोड़ दिया है और नये मकान का ठीक-ठीक पता मैं नहीं लगा पाया। सुना है इधर वे उम्र के नाते कुछ अस्वस्थ रहते हैं।
सुरेंद्र सिंह ने भी विवाह नहीं किया है। वे अपना सारा समय लिखने-पढने और मित्रों के साथ बातचीत करने में लगाते थे। सन् सत्तासी या अठ्ठासी में उनका कविता संग्रह "काली लड़की" आया था। उसका आवरण मेरे मित्र प्रमोद सहाय ने बनाया था। उस पर एक टिप्पणी मैंने लिखी थी, जो इलाहाबाद के अमृत प्रभात में छपा था। दो तीन वर्ष पहले उनका एक उपन्यास भी लोक भारती प्रकाशन से आया है। पर अभी मैं पढ़ नहीं पाया हूं। जय शंकर प्रसाद पर जब बनारस के जनवादी लेखक संघ ने आयोजन किया और मुझे उन पर बोलने के लिए बुलाया तो वे उसकी व्यवस्था में बड़े सक्रिय रहे और मुझे हर तरह से प्रोत्साहित किया।
सुरेन्द्र जी का कई दूतावासों में अच्छा परिचय था। वहां वे लोगों से मिलने जाते रहते थे। एक बार वे दिल्ली आए तो संयोग से मैं भी दिल्ली में था। वे अपने एक समाजवादी मित्र, जिनका नाम शायद झारखंडी था और गोरखपुर के रहने वाले थे, के साथ ग्रीन पार्क आए जहां मैं रुका हुआ था। हमने खूब बातें की और खूब दिल्ली घूमा। सुरेन्द्र जी से अभी भी यदा-कदा मुलाकात हो जाती है। कुछ साल पहले जब वे मार्कंडेय की स्मृति समारोह में इलाहाबाद आए थे (सुरेन्द्र जी गांव मार्कंडेय के गांव के पास ही है) तो रचनाकार रविनंदन सिंह के यहां बड़ी-लंबी आत्मीय बातचित हुई थी। जब मुझे विद्याश्री न्यास का सम्मान दिया गया तो वे पूरे समय उपस्थित रहे और खूब प्रसन्न रहे।
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| केदार नाथ सिंह |
प्रसंग : आठ
डॉ. केदार नाथ सिंह से मेरा परिचय डॉ. बच्चन सिंह के यहां ही हुआ। वैसे डॉ. केदार नाथ सिंह मुझे एक वर्ष फर्स्ट इयर (१९६०-६१) में सेंट एंड्रयूज कालेज, गोरखपुर में पढ़ा चुके थे, जब वे किसी के छुट्टी पर चले जाने पर एक वर्ष के लिए नियुक्त हुए थे। तीसरा सप्तक के कवि के रूप में उनकी अच्छी ख्याति थी। देखने में भी सुदर्शन थे। इसलिए छात्र उनमें बड़ी श्रद्धा रखते थे। वे कविता पढ़ाते थे और ठीक से पढ़ाते थे। हमारी पाठ्य-पुस्तक का नाम 'चयनिका' था। परमानंद श्रीवास्तव भी वहीं पढ़ाते थे। पर हम लोगों को अलावा कोर्स के साहित्य का ज्ञान उनसे नहीं हुआ। वह अंग्रेजी के अध्यापक नाफिस हसन से हुआ।
उस वर्ष की एक घटना विशेष रूप से याद है। केदारनाथ नाथ सिंह ने प्रिपरेशन लीव से पहले एक बहुत बढ़िया कवि सम्मेलन कालेज में करवाया था। संचालन परमानंद श्रीवास्तव ने किया था। उसमें तमाम कवि बाहर से आए थे। उनका नाम आज याद नहीं आ रहा है, सिवाय गीतकार देवेंद्र बंगाली के, वह भी उनकी सुनाई इन पंक्तियों के नाते :
एक पेड़ लगाया है चांदनी का आंगने
फूले तो आ जाना एक फूल आंगने
केदार नाथ सिंह ने जो कविताएं सुनाया था, उसका भाव था कि पिता ने एक गाछ द्वार पर लगाया है, मां ने तुलसी का विरवा आंगने, मैं अपना गुलाब कहां रोपूं उसके लिए पूरी दुनिया में भटक रहा हूं।
बाद के वर्षों में केदार नाथ सिंह को उदय प्रताप कालेज, पडरौना में गुलाब शाही ले आए। वे इंटर सेक्शन के प्रिंसिपल थे, पर कालेज में उनकी खूब चलती थी। केदार जी की नियुक्ति डिग्री सेक्शन में हुई थी। यद्यपि कि पडरौना मेरे गांव के पास था, और मैं वहां आता-जाता भी खूब था, पर कभी मिला नहीं। उनको अंतिम बार गोरखपुर में ही देखा था संभवतः 1966 में जब वहां विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष केशरी नारायण शुक्ल ने एक बढ़िया कवि सम्मेलन आयोजित किया था। उसमें इलाहाबाद से विजय देव नारायण साही और फैजाबाद से कुंवर नारायण भी आए थे। केदार नाथ सिंह ने जो कविता सुनाई थी, उसकी पंक्ति थी "दस हजार साइकिलों ने अपनी रफ़्तार तेज कर ली है लाल आंखों वाले जानवर से आगे निकल जाने के लिए।" इसमें लाल आंखों वाला जानवर सूर्य का बिंब-प्रतीक था। केदार जी ने तो अपनी छपी कविता में इसे बाद में हटा दिया था, पर मेरे लिए इतना लुभावना था कि मैंने इसे अपनी एक कविता में इस्तेमाल किया। इस पर उपन्यासकार केशव प्रसाद मिश्र ने यह कह कर आपत्ति की थी कि सूरज हमारे लिए देवता है, आप जानवर कह कर उसकी गरिमा गिरा रहे हैं। पर कवि शिवकुटी लाल वर्मा ने कहा था कि अद्भुत बिम्ब है। यदि आप हटाते हैं, तो मुझे प्रयोग करने की इजाजत दीजिए। दूध नाथ सिंह ने सुना तो मुस्करा कर कहा कि रचनाकार को लिखने से पहले यह जानना चाहिए कि क्या नहीं लिखना चाहिए - ऐसा महादेवी वर्मा कहती हैं।
डॉ. बच्चन सिंह के यहां केदार जी से जब मेरी मुलाकात हुई तो उन्हें पिछला कुछ भी याद नहीं था। इसलिए हमारा संबंध नये सिरे से आरंभ हुआ। वह अच्छा ही था। उनका बच्चन सिंह के यहां आने का कारण यह था कि उनकी छोटी बेटी की शादी बच्चन सिंह के छोटे बेटे से हुई थी, जो पत्रकार थे। वह शादी रामचंद्र शुक्ल पर हुए आयोजन के दौरान तय हुई थी। उसमें नामवर सिंह की मुख्य भूमिका थी। केदार जी की बड़ी बेटी की शादी नामवर सिंह के बेटे से हुई थी। इसी संबंध के चलते नामवर सिंह केदार जी को पडरौना से दिल्ली ले गये थे। वहां जा कर केदार जी कविता में छा गये थे।
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| जगदीश गुप्त |
प्रसंग : नौ
जगदीश गुप्त ने दो त्रयियों और कविता पर लिखी कविताएं जुटाने का काम मुझे सौंपा था। उस सिलसिले में मुझे बार-बार उनसे मिलना होता था और हम कविता पर बात करते रहते थे। इसी तरह की बात लक्ष्मी कांत वर्मा से भी होती रहती थी। दोनों ने उन बातों को लिख डालने का सुझाव दिया। धीरे धीरे मैंने लिख भी डाला। वह एक तरह से नौवें दशक की कविता का विश्लेषण था। वह जगदीश गुप्त को इतना अच्छा लगा कि उसे हिंदुस्तानी अकादमी से छापने का मन बनाया और पांडुलिपि संस्था के सचिव रामजी पांडेय को दे देने को कहा। पांडेय जी ने स्वागत किया। पर साथ ही कमेंट किया कि अरे! आप तो सीधे अध्यक्ष के पास पहुंच गये। इसी से समझ गया कि पांडुलिपि का हस्र क्या होने वाला है। जितने भी तरह का अड़ंगा वे डाल सकते थे, डाला। पुस्तक "यह जो आ यहां है हरा" अंततः विश्वविद्यालय प्रकाशन, बनारस से दो साल बाद छपी। और मदन सोनी की पुस्तक "कविता का व्योम : व्योम की कविता" के साथ ही चर्चित हुई।
खैर, उस पुस्तकाकार आलेख के बारे में बच्चन सिंह को पता चला तो उन्होंने पढ़ा। उनका विचार पूछा तो कहा कि एक गोष्ठी आयोजित करते हैं, उसमें कई अन्य लोगों के विचारों का भी पता चल जायेगा। दरअसल जयशंकर प्रसाद वाले लेख पर एक गोष्ठी चंद्रबली सिंह जनवादी लेखक संघ में करा चुके थे और उसकी अच्छी चर्चा हुई थी। बच्चन सिंह उसी को प्रगतिशील लेखक संघ में कंपनशेट कर रहे थे। गोष्ठी में मुश्किल से पांच सात लोग आऐ। वे मेरे लिए अनजाने थे। सभी संभवतः छात्र ही थे। उन्होंने लेख पर बात करने के बजाय अपनी-अपनी बात कही। अच्छा ही लगा यह जान कर कि आज कविता कैसी लिखी जा रही है और वह पाठकों में ग्रहण कैसे की जा रही है।
मैं एक लेख कविता के बारे में और तैयार करना चाह रहा था। वह कुछ सैद्धांतिक होना था। उसकी सामाग्री जुटाते वक्त आलोचना और पहल पत्रिकाओं के खास अंकों का पता चला जिसमें मेरे काम की बातें थीं। वे अंक बच्चन सिंह के पास थे। उन्होंने खोज कर देने की बात कही। पर दिया नहीं। एक दिन स्पष्ट कह दिया कि पता नहीं आप उन अंकों को वापस करेंगे कि नहीं। खो-खवा दिये तो सब नष्ट हो जाएगा। लगना तो मुझे बुरा चाहिए था, पर उतना नहीं लगा। उनका ऐसा अनुभव रहा होगा। पर सुरेंद्र सिंह को बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपने पिता से साफ-साफ कहा कि जो व्यक्ति कीमती और दुर्लभ पुस्तकों को बेहिचक आपको दे देता है उसे आपने देने से मना कर दिया, यह अच्छा नहीं किया।
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| नामवर सिंह |
प्रसंग : दस
डॉ. बच्चन सिंह का सत्तरवां (संभवतः) जन्मदिन उनके मित्रों और शिष्यों ने बड़े धूमधाम से मनाया। विश्वविद्यालय में दो दिन तक उन पर केंद्रित कार्यक्रम हुआ। उनके व्यक्तित्व, अध्यापन और लेखन की विस्तृत चर्चा हुई। समापन नामवर सिंह को करना था। उस जमाने में बिना नामवर सिंह के आयोजन हल्का माना जाता था। वे मंच पर आये काफी बातें की। अंत में बच्चन सिंह के आलोचना कर्म का समाहार करते हुए कहा कि वह कुल मिला कर कर एक अध्यापक को जैसा आलोचक होना चाहिए, उतना ही रहा, और उसमें उत्तम रहा। दरअसल ये हमेशा पुलुईं सींचते रहेगा, जबकि फल जड़ सींचने से आता है। वही उन्होंने नहीं किया। कुछ लोग सन्न रह गये, कुछ लोग उनकी बेबाकी पर खुश रहे। मुझसे बातचीत करते हुए डॉ. शुकदेव सिंह ने कहा कि दोनों के अपनी-अपनी ग्रंथियां हैं। बच्चन सिंह को लगता है कि वे उपकुलपति रहे हैं (तब उपकुलपति ही कहा जाता था), इसलिए नामवर सिंह से अधिक महत्व मिलना चाहिए, पर विद्वता के कारण नामवर को ही मिलता है। नामवर जी को लगता है कि वे द्वारचार के हाथी बन कर रह गये हैं। वास्तविक सत्ता दूसरों के हाथ में फिसल कर चली जाती है।
बच्चन सिंह से आखरी मुलाकात उनके अंतिम समय में हुई। इसकी खबर मुझे ब्रह्मा शंकर पांडेय से मिली। उनको लकवा मार गया था। मैं इलाहाबाद से बनारस आया और पांडेय जी के साथ उनके घर गया। काफी गहमागहमी थी। लोगों की भीड़ थी, पर मिलने नहीं दिया जा रहा था। मिलने वालों से उनके आराम में खलल पड़ रही थी। डाक्टर आए। उनका परीक्षण कर चले गए। हम भी चलने के लिए तैयार हुए। पर सुरेंद्र सिंह ने रोका। कहा आप लोग घर के आदमी हैं। आपके आने के बताने पर बड़ा खुश हुए हैं। बिस्तर ठीक किया जा रहा है। कुछ देर बात वे भीतर ले गये। बच्चन सिंह शरीर से चाहे जितना अशक्त हों मन से टनाटन थे। तमाम बातें हुईं। मैं नहीं चाहता था कि वे देर तक बात कर थक जांय। पर मैं जब भी उठता था, वे रोक लेते थे। तमाम पुराने प्रसंगों को दुहराते हुए उन्होंने कहा कि आप दोनों इतना करीब रहे, पर कुछ कर नहीं पाया। ईश्वर से प्रार्थना करिए कि मैं ठीक हो जाऊं। अब कुछ करूंगा। मैंने कहा कि आप ठीक हो जायं, यही बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। चलने लगा तो जिस तरह से हमारी आंखें मिलीं उससे लगा कि यह अन्तिम मुलाकात है। वही हुआ भी। रास्ते में पांडेय जी ने कहा, ये हमसे अपने स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करा रहे हैं और उसके लिए लालच दे रहे हैं कि ठीक हो जाने पर हमारे लिए कुछ करेंगे। जब करने लायक थे तब लोगों से यही कहते रहते थे कि साहित्य के क्षेत्र में यूं ही बौढियाते रहते हैं। पांडेय जी से ही खबर मिली कि वे नहीं रहे। मैं उनके अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच पाया।
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| अब्दुल बिस्मिल्लाह |
प्रसंग : ग्यारह |
जगदीश गुप्त ने आगे की त्रयियों को बनाने के लिए पीछे की त्रयियों को दिया था। उन्हीं के एक में अजामिल, अब्दुल बिस्मिल्लाह और राजकुमार कुंभज की कविताएं थीं। मुझे अब्दुल बिस्मिल्लाह की कविताएं काफी अच्छी लगी थीं। आगे भी कई पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें पढ़ा था। वे तब कोयला बाजार में रहते थे और एक इंटर कालेज में पढ़ाते थे। उनका आवास मेरे आवास से ज्यादे दूर नहीं था। तो भी मेरा बनारस में रहते दो साल बीत गया था, किंतु मैं उनसे मिल नहीं पाया था। एक इतवार पैदल ही पता पूछते उनके घर गया। वे बरामदे में कुर्सी-मेज लगा कर बैठे बच्चा खेला रहे थे। मैंने अपना परिचय दिया, उसमें रचनाकार वाला परिचय नहीं था। वे जितनी गर्मजोशी से मिले, उतना ही चौंके भी। आने का सबब पूछा और हर तरह का सहयोग करने की बात कही। तब मैंने अपना लेखकीय परिचय दिया। उन्होंने कहा कि न तो उन्होंने मेरा नाम सुना है, न ही कुछ पढ़ा है। मैंने कहा कि इसीलिए तो मैं एक वरिष्ठ अग्रज के पास आया हूं कि कुछ सीख सकूं। तभी कोई उनके पास आया एक कपड़ा दिखाने के लिए कि कैसा है। उन्होंने उसे गौर से देखा और कहा कि अच्छा है। ताना बाना दोनों अच्छा है, गझिन है मजबूत है। एक सेंटीमीटर में पंद्रह-पंद्रह धागे हैं। उनकी इस सूक्ष्म दृष्टि का मैं कायल हो गया। मैं उत्तर-पूर्व में रह चुका था। वहां की हर लड़की कपड़ा बुनती थी, उसे मैं गौर से देखता भी था, फिर भी कपड़े की अच्छाई के इस पक्ष से वाकिफ नहीं था। इसी सूक्ष्म अन्वेषण के कारण आगे उन्होंने "भीनी-भीनी बिनी चदरिया" जैसा शानदार उपन्यास लिखा। धीरे-धीरे हम लोग खुलते गये और घंटों बात करते रहे।
बाद में सिलसिला कुछ ऐसा बना कि जब भी मौका मिलता और लगता कि वे खाली होंगे मैं उनके पास चला जाता और साहित्य संबंधी तमाम बातें होतीं। मैंने पाया कि वे शहर में होने वाले आयोजनों में नहीं जाते। वे प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य थे। उसकी गोष्ठियों में भी नहीं दिखाई देते थे। पूछने पर बताया कि वहां जाना समय बर्बाद करना है। बहुत कम सार्थक बातें वहां सुनने को मिलती हैं। और यदि उनसे बहुत जुडुगां, तो लिखूंगा-पढूगां कब। पर आप को जाते रहना चाहिए। नये आदमी हैं। जितना वहां सीख पाएंगे, उतना दूसरी जगह से नहीं हो पाएगा। यह सीख मेरे बड़े काम की थी। पर मैंने पाया कि जब नामवर सिंह आते हैं, तब वे जरूर जाते हैं। इसका भविष्य में बड़ा सुखद परिणाम भी हुआ। कुछ वर्षों बाद वे जामिया मिल्लिया दिल्ली में नियुक्त हो गये। बढ़िया लेखन के साथ बढ़िया कैरियर भी पा गये।
बनारस छोड़ने के बाद मेरी उनसे मुलाकात अहमदाबाद में हुई। बैंक के एक कार्यक्रम में कई साहित्यकार आए थे उनमें से मंगलेश डबराल और अब्दुल बिस्मिल्लाह को कहानीकार सूरज प्रकाश अपने घर ले आये। सूरज प्रकाश रचना वत्सल आदमी हैं। रचनाकारों का बहुत सम्मान करते हैं और अधिक से अधिक लोगों से व्यक्तिगत संपर्क बना कर रखते हैं। कितने ही रचनाकारों से मेरा परिचय उनके आवास पर हुआ है। हमारे साथ शैलेश पंडित और राजेंद्र जोशी भी थे। वह अद्भुत रात थी। हम लोगों ने मिल कर खाना बनाया। कुछ रसरंजन भी हुआ। फिर फ्री स्टाइल गप्प आरंभ हुआ। मंगलेश डबराल थोड़ा हकलाते थे। पर उसका अद्भुत उपयोग कर राग पहाड़ी में कई गीत सुनाए। उससे भी अधिक चकित करने वाली बात यह थी कि बिस्मिल्लाह ने बताया कि कुरान की लय बिरहा की है जो चरवाहों का गीत होता है। उन्होंने कई आयतों को उसी लय में गा कर सुनाया। मेरे लिए यह बिल्कुल नयी दुनिया थी। सूरज प्रकाश ने उस पूरे प्रकरण को रिकार्ड किया था। शायद वह अभी भी उनके पास होगा।
प्रसंग : बारह
नामवर सिंह का सत्तरवां (संभवतः) जन्मदिन बनारस में उनके मित्रों, शिष्यों और चाहने वालों ने बड़ी धूमधाम से मनाया। अनुज काशी नाथ सिंह तो थे ही। उसमें मुझे और अब्दुल बिस्मिल्लाह को भी बुलाया गया। उन्हें खान-पान की व्यवस्था में भी शायद कुछ भूमिका दी गयी थी। आयोजन बड़ा भव्य था। बातें खूब ढंग से हुईं। उसके बाद भोजन की व्यवस्था थी, बाहर से आये सभी लोगों के लिए और कुछ चुने हुए स्थानीय लोगों के लिए। पर मौका आने पर तमाम लोग घुस कर बैठ गये और दूसरे लोग घुसते चले गये। जब खाना परोसा जाने लगा तो अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अनिरुद्ध प्रसाद त्रिपाठी की ओर इशारा करते हुए कहा कि आपको तो आमंत्रित किया नहीं गया था, कैसे बैठे हैं, उठिए। फिर कहा कि जिन्हें आमंत्रित नहीं किया गया है वे लोग उठ जाएं और बाद में बैठे। यह बात सुन कर सुरेन्द्र श्रीवास्तव उठ गये। संभवतः भोजन के लिए उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया था। बिस्मिल्लाह ने फिर अनिरुद्ध त्रिपाठी की ओर इशारा किया। इस पर त्रिपाठी के साथ अशोक पाठक भी उठ गये, फिर ब्रह्मा शंकर पांडेय। उन्हें यह एक रचनाकार का तिरस्कार लगा था। उनके पीछे मैं भी उठ खड़ा हुआ, फिर दो-तीन और लोग। हम सब को यह तिरस्कार अच्छा नहीं लगा था। शुकदेव सिंह ने मेरा कंधा दबाया कि आप बैठिए। मैं नहीं बैठा और सबके साथ बाहर आ गया। हमें यही लगा कि कुछ गलत लोग बैठ भी गये थे तो उन्हें इस तरह से नहीं उठाना चाहिए था और नाम ले कर तो कत्तई नहीं ।
अब्दुल बिस्मिल्लाह से पुनः मुलाकात तब हुई जब मेरी भांजी लावनी जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पत्रकारिता पढ़ने गयी। उनका बेटा भी उसके साथ पढ़ रहा था। पूरे साल उन्होंने अभिभावक की भूमिका निभाई। मेरा परिचय अशोक चक्रधर और असगर वजाहत जैसे रचनाकारों से कराई। पर उस तरह से मिल-बैठ कर बात नहीं हो पाई, जो बनारस में होती थी।
अंतिम मुलाकात कोई तीन साल पहले इलाहाबाद में ही हुई। राजकमल प्रकाशन ने यहां लगे पुस्तक मेले में विक्रय प्रमोट करने के लिए एक गोष्ठी में उन्हें बुला रखा था। यह एक नया व्यापार प्रचलन विकसित हो रहा है कि रचनाकार लोग किताब बिकवाने में संलग्न किये जा रहे हैं। एकाधिकार की ऐसी दौड़ चल पड़ी है कि स्थानीय पुस्तक विक्रेताओं को बाजार से बाहर ही कर दिया जा रहा है। खैर जब मैंने सुना कि वे आए हुए हैं तो मैं उनसे मिलने उनके होटल गया। वह काफी हाउस के बगल में ही है। वे बाहर ही मिल गये। इतने ठंडेपन से मिले कि लगा ही नहीं कि वे मुझे पहचानते भी हैं। हो सकता है कि वे कुछ जल्दी में हों। पर ऐसी भी क्या जल्दी कि कुछ जरूरी औपचारिकताएं भी न निभाई जा सकें!
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| बालकृष्ण शर्मा नवीन |
प्रसंग : तेरह
सुरेन्द्र श्रीवास्तव की पुराने कवि के रूप में चर्चा मैं मित्रों से अक्सर सुनता रहता था, पर मुलाकात नहीं हो पाई थी। उनकी कविताएं कभी हंस में छपती थीं और नोटिस में ली जाती थीं। लहुराबीर चौराहे से उत्तर जा कर सड़क से जो गली पूरब की ओर फूटती थी उसी में रहते थे। हम लहुराबीर चौराहे पर ही चाफी या काय का सेवन लगभग रोज करते थे और साहित्य पर गरजते-बरसते रहते थे पर कभी जा नहीं पाये। एक शाम अशोक पाठक ने कृपा की और हम उनके घर पहुंच गये। प्रथमदृष्टया ही लगा कि उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है और शायद इसीलिए अपने साथ के लोगों से कुछ कट कर रहते थे। उम्र का भी तकाजा था। मिले बहुत प्रेम से और पुराने जमाने की खूब बात की। एक अद्भुत बात यह कही कि हिंदी कविता में आधुनिकता लाने वाले पहले व्यक्ति बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' थे। यह बात मैं पहले विद्या निवास मिश्र से सुन चुका था, पर बहुत आश्वस्त नहीं था। इसका एक कारण यह था कि हमने नवीन को पढ़ा नहीं था, इसलिए बात थोड़ी अटपटी लगती थी और अज्ञेय के प्रभा-मंडल से बाहर नहीं निकल पाते थे। उन्होंने नवीन के दो बहुत महत्वपूर्ण बातें बताईं। एक तो यह कि वे खंडवा से पहली संसद के लिए सांसद चुने गये थे। जवाहर लाल नेहरू उनका बड़ा सम्मान करते थे। कहा कि स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बन कर हिंदी की सेवा करिए। नवीन ने कहा कि मंत्री बनूं या नहीं, हिंदी की सेवा तो करता ही रहूंगा, जैसा कि अब तक करता रहा हूं। पर यह अच्छा नहीं लग रहा है कि हिंदी का काम कोई राजमंत्री करे। और यह मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मेरी ख्वाहिश कैबिनेट मंत्री बनने की है। नेहरू ने हिंदी के लिए स्वतंत्र रूप से कैबिनेट के स्तर का मंत्री नहीं रखा और वह शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय के अधीन चली गयी और उसकी दुर्गति राजनैतिक हाथों में बढती गयी। सुरेन्द्र जी का कहना था कि नवीन को पद स्वीकार कर लेना चाहिए था, उससे हिंदी का बहुत भला होता। दूसरी बात यह बताई कि नवीन जी नाम साहित्य अकादमी सम्मान के लिए तय हो गया था और अन-आफिसियली भवानी प्रसाद मिश्र ने बता भी दिया था, जो संस्था के सचिव थे। दोनों मैथलीशरण गुप्त के यहां। गये। उन दिनों उनके अनुज सियाराम शरण गुप्त की काव्य पुस्तक आई थी जो बड़ी चर्चा में थी और साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए उपयुक्त मानी जा रही थी। भवानी प्रसाद मिश्र को देखते ही उन्होंने पूछा। वे बात को टाल गये। मैथली शरण गुप्त की इच्छा जान कर वे संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष कृपलानी के पास गये और सम्मान सियाराम शरण गुप्त को दे देने की बात कही। कृपलानी ने समझाया कि फैसला पलटा नहीं जा सकता और नवीन के कहने से वह सम्मान किसी और को नहीं दिया जा सकता। उसके लिए एक निश्चित प्रक्रिया है। नवीन नहीं माने और उस वर्ष वह सम्मान नहीं दिया जा सका। इस बात को बाद में विद्यानिवास मिश्र ने भी हमें बताया। वह क्या जमाना था और कितने शानदार लोग थे। आज तो सम्मान/ पुरस्कार की घोषणा होते ही थू-थू मच जाता है। हम कितने बौने होते जा रहे हैं! इसी बौनेपन के कारण सरकार डंडा करती चली जा रही है।
सुरेन्द्र जी के यहां ही एक अद्भुत व्यक्तित्व से मुलाकात हुई। वे थे गणेश प्रसाद सिंह मानव। वे अनोखे व्यक्तित्व के धनी थे। बचपन में वे गांव से भाग कर आये थे। सस्ते ढाबों में बर्तन धोया था और पढ़ा था। बाद में छंदोबद्ध कविता लिखने लगे थे। अब आये दिन अपने यहां गोष्ठियां करते थे और अपने पैसे से छापे अपनी कविताओं का संकलन लोगों को देते थे। पाठक जी उनका बहुत सम्मान करते थे और उनकी गोष्ठियों में मुझे ले जाते थे। वहां विविध प्रकार के लोगों से मेरी मुलाकात होती थी, बहुत अच्छा लगता था।
सुरेन्द्र श्रीवास्तव से चंद्रबली सिंह की बिल्कुल नहीं पटती थी। एक बार अपनी पत्रिका में अशोक पाठक ने उनकी कविताएं छाप दीं तो जसम की घरेलू गोष्ठी में उन्हें सबसे सामने डांट दिया। कुछ लोगों ने शिकायत की थी पाठक जी हमारी कविताएं दाब कर रखते हैं और अनाप-शनाप रचनाएं छापते रहते हैं। उत्तर में पाठक जी ने कहा था कि लोग सारा कूड़ा कूड़ेदान में फेंकने के बजाय मुझे थमाते हैं तो भला आप ही बताइए उन्हें छापूं कि कूड़ेदान में डालूं। चंद्रबली सिंह के पास कोई उत्तर नहीं था।
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| त्रिलोचन |
प्रसंग : चौदह
सुरेन्द्र श्रीवास्तव ने ही खबर दिया कि त्रिलोचन शास्त्री बनारस आ रहे हैं। त्रिलोचन जी उन दिनों अशोक बाजपेई के सौजन्य से सागर विश्वविद्यालय की एक पीठ पर चढ़े हुए थे, जो संभवतः निराला की थी। खबर फैलते देरी न लगी। जिस ट्रेन से वे आए उस ट्रेन के समय ब्रह्मा शंकर पांडेय और अशोक पाठक मुझे भी लेकर साथ चले। वहां त्रिलोचन जी के पुत्र मौजूद थे जो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में मुलाजिम थे और त्रिलोचन जी को उन्हीं के साथ रहना था। मेरा उनसे औपचारिक परिचय वहीं पर हुआ। दूसरे दिन दोपहर वे गोदौलिया पर आए। ब्रह्मा शंकर पांडेय वहां पर पहले से मौजूद थे। मैं भी पहुंचा। थोड़ी देर बात करने के बाद हम वहीं गली में अवस्थित एक रेस्तरां में गये और कुछ दक्षिण भारतीय व्यंजन का मजा लिया। मैंने गौर किया कि त्रिलोचन जी खाना बड़े चाव से पूरा स्वाद ले कर बहुत धीरे धीरे खाते हैं। वहां से पैदल ही हम विवेकानंदनगर चंद्रबली सिंह के घर गये। वे लोग आपसी बातचीत में खो गये। फिर उनकी रचनाओं पर गोष्ठी तय की गयी अगले इतवार को।
इस बीच पांडेय और पाठक के साथ साथ मेरी उनकी कई मुलाकातें हुईं। वे शब्दों के उच्चारण पर बहुत ध्यान देते थे। बोलते वक्त वे स्वयं इतना सावधान नहीं रहते थे, पर दूसरों को मौका मिलने पर सिखाते रहते थे। एक बार मुझसे विवाद भी हो गया टामस मान को ले कर। वे कहते थे कि जर्मन भाषा में एन दो बार आए तो ए का उच्चारण ऐ होता है। मैं कह रहा था कि आ होता है। यद्यपि मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डिप्लोमा के लिए जर्मन भाषा की कुछ पढ़ाई की थी, पर त्रिलोचन जी मेरी बात स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। मैंने उनकी बात मान ली। तबसे मैं भ्रमित हूं कि टामस मान सही है कि टामस मैन। इसी तरह वे कविता पर भी बहुत सूक्ष्म निगाह रखते थे। पहले वे प्रयुक्त शब्दों का बहुआयाम उद्घाटित करते थे, फिर उन्हें जोड़ कर अर्थ का रसास्वादन करते थे, प्रसंग के अनुसार उनकी पूर्वा बिठा कर। उनका यह ढंग मेरे बहुत काम का लगा।
मैंने सुन रखा था कि त्रिलोचन जी निरंतर डायरी लिखते हैं। उसका कुछ अंश वशिष्ठ मुनि ओझा और मोहन लाल तिवारी ने पढ़ रखा था। उसमें साहित्य से जुड़ी बातें बहुत कम और दिन भर का लेखा-जोखा अधिक होता था। यहां तक कि कितने बजे उठे, कितना खाना खाया, खाने में क्या-क्या शामिल था, कौन सी दवा ली, पान में क्या मिलाया, वगैरह। इसके बारे में पूछा तो वे हल्के से हंसे। फिर कहा कि बीमारी से बड़ा डर लगता है। लंबा विवरण इसलिए लिख कर रखता हूं कि डाक्टर को उसकी जड़ तक पहुंचने में सुविधा हो और मुझे जल्दी ठीक कर दे।
निर्धारित तिथि को चंद्रबली सिंह के आवास पर गोष्ठी हुई। गणमान्य लोगों में ठाकुर प्रसाद सिंह, कमल गुप्त, राजशेखर, मेयार सनेही जैसे उनके आत्मीय शामिल थे। त्रिलोचन जी ने अपने कुछ सानेट और कविताएं सुनाईं। उन पर बातचीत के दौरान लोगों ने उनकी कविताओं पर कम उनके साथ अपने ता'लुक्कात की बड़ी चर्चा की। ठाकुर प्रसाद सिंह और कमल गुप्त ने तो अपने उपकारों की फेहरिस्त ही खोल दी। शास्त्री जी सुनते सुनते ऊब गये तो मेरे कान में कहने लगे, "सब झूठ है। इस शहर में मेरे चार-पांच ही लोग हैं और वे कुछ नहीं बोल रहे हैं। मैं वशिष्ठ मुनि ओझा को जानता हूं, जिन्होंने अखबार की मेरी पिद्दी सी नौकरी जाने कितनी बार बचाई है। ब्रह्मा शंकर पांडेय को जानता हूं जो रात-बिरात, ठांव-कुठाव कहीं भी मिलते तो सबसे पहले यही कहते कि चलिए कुछ खा लीजिए। वे जानते थे कि मैं भूखा हूं। अशोक पाठक को जानता हूं। वे मेरा चेहरा देख कर समझ जाते कि मुझे पैसा चाहिए। अक्सर उनकी जेब में जितना होता चुपचाप धीरे से मुझे थमा देते।" कहते-कहते उनकी आंखें कुछ नम हो आईं। मैं उनके भूखे होने की कई किस्से सुन चुका था। ब्रह्मा शंकर पांडेय ने बताया था कि एक दिन दोपहर अपनी पत्नी से त्रिलोचन ने कहा कि खाना बनाओ। पत्नी ने कहा कि सिर्फ थोड़ी सी दाल है। शास्त्री ने कहा कि उसे चढाओ, मैं चावल या आटा ले कर आता हूं। वे दूसरे दिन घर लौटे। पत्नी ने वह दाल थाली में परोस कर सामने रख दिया। उससे दुर्गंध उठ रही थी। शास्त्री जी ने कहा - मैंने सोचा था कि मेरी अनुपस्थिति में तुमने वह दाल खा लिया होगा, कुछ तो क्षुधा तृप्ति हुई होगी। मैं बाहर निकलता हूं तो कोई न कोई कुछ खिला देता है। तुम तो घर में ही रहती हो। पत्नी ने कहा - 'तुम्हें खिलाए बिना कैसे खाती।' अभाव में इतना प्यार!... अकल्पनीय है!!
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| चन्द्रकांत देवताले |
प्रसंग : पंद्रह
त्रिलोचन जी जब तक बनारस रहे, लगभग प्रतिदिन उनसे मुलाकात होती रही। बड़ी सरलता से समझा समझा कर वे कविता पर बात करते थे। बनारस में बिताए दिनों की चर्चा तो होती ही थी, संपर्क में आए तमाम लोगों की बातें भी उनमें शामिल होतीं। उन्हें इस बात का दुःख सालता था कि बनारस अब छूट गया है, फिर वह अपना घर नहीं बन पाएगा। जाने कहां कहां भटकना पड़ेगा आगे की जिंदगी में। ब्रह्मा शंकर पांडेय, अशोक पाठक और वशिष्ठ मुनि ओझा उन्हें निरंतर ढाढस बंधाते कि बनारस छूटा नहीं है, सागर में अपने दिन पूरा कर बस यहीं आ जाइए। हम लोग हैं। आखिर वह दिन आ गया जिस दिन उन्हें बनारस से चला जाना था। उस दिन हम लोगों ने उन्हें लहुराबीर चौराहे पर स्थित पूरब तरफ जो मिठाई की दुकान है, वहां खूब रसगुल्ला खिलाया। फिर स्टेशन आए। वे बड़े प्रसन्नचित्त थे और अपने बारे में तमाम मजाक सुनाये। उन दिनों वे दाढ़ी रखते थे। बताया कि उसके नाते कुछ लोग उन्हें सरदार समझते हैं और त्रिलोचन नहीं, त्रिलोक सिंह कहते हैं। कहकर वे खूब हंसे कि वे भी लोगों को भ्रमित कर सकते हैं। गाड़ी आई और वे हमसे विदा हो गये।
उस साल उन्होंने सागर में कवि सम्मेलन आयोजित किया। उसमें भाग लेने के लिए बनारस से ब्रह्मा शंकर पांडेय और अशोक पाठक को और इलाहाबाद के नाम पर मुझे बुलाया। सागर में कवि गोविंद द्विवेदी मेरे पूर्व परिचित थे। उन्होंने मुझे घर पर साथ रहने के लिए कहा। पर मैं सबके साथ रहना चाहता था। उनके साथ ही रहा। वहां त्रिलोचन जी के व्यक्तित्व का एक और पक्ष देखने कोई मिला। उस आयोजन के लिए जो धन अग्रिम के रूप में मिलना चाहिए था, वह बाबुओं की कृपा से नहीं मिला। आमंत्रित रचनाकारों को राशि दी जानी थी। इससे वे थोड़ा विचलित हुए। पर मर्यादा रखने के लिए जो पैसे उनके बैंक के खाते में था, उसे निकाल लिया और बांट दिया। इसे पांच -सात लोगों के अलावा कोई जान भी न पाया।
शास्त्री जी से अंतिम मुलाकात भोपाल में हुई। भारत भवन ने एशिया कविता का आयोजन किया था। उसमें मैं भी गया था, शास्त्री जी भी गये थे। उस अवसर पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपने आवास पर दावत दे रखा था। सभी लोग गाड़ियों पर लद-फद कर जा रहे थे। त्रिलोचन जी भागे भागे मेरे पास आए और कहा कि मैं आपके साथ चलूंगा। मैं सोचता था कि वे वरिष्ठ रचनाकाऱों, विशेष कर शिवमंगल सिंह सुमन जैसे लोगों के साथ जाएंगे। मैंने यह बात कही तो उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर पर उन्हें कोई नहीं पूछता। सबको अपनी अपनी पड़ी होती है। अशोक बाजपेई ने मुझे एक गाड़ी दे रखी थी। उसका उपयोग मैं शिवकुटी लाल वर्मा और चंद्रकांत देवताले के साथ करता था। हमने शास्त्री जी को भी शामिल कर लिया।
उसके बाद शास्त्री जी से फिर आमने-सामने मुलाकात नहीं हुई। पर खबर मिलती रहती थी। वे जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष बनाए गए, फिर बनाने वालों द्वारा ही निकाले गये। बहू के साथ हरिद्वार जा कर रहे। बुढौती खराब होती गयी। अक्सर सोचा कि एक दिन जा कर मिलूंगा, पर टलता गया। एक दिन खबर मिली कि वे नहीं रहे।
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| छन्नू लाल मिश्र |
प्रसंग : सोलह
छन्नू लाल मिश्र के पास मैं गिरीश नारायण त्रिपाठी के साथ यदा कदा जाने लगा। सुनता रियाज ही था, पर वही बहुत आनन्द देता था। उसकी आवाज बहुत आकर्षक थी और भोजपुरी लोक गीतों का मैं मुरीद था। यथाप्रसंग मैं उनकी प्रशंसा करता था। एक दिन वे कह बैठे, "शास्त्रीय संगीत के बारे में कुछ जानते भी हैं कि यूं ही...। गाते हुए सुन कर सभी अनाड़ी जांघ पर ताल देने लगते हैं।" मैंने साफ कहा कि मैं कुछ नहीं जानता। बस लय और स्वर जहां अच्छा लगता है वहां वाह वाह कहने लगता हूं। मेरे ख्याल से एक स्वाभाविक छंद होता है जो बिना किसी विशेष ज्ञान को सबको भाने लगता है, वही व्यक्ति-विशेष को वास्तविक आनंद देने लगता है। उन्होंने कुछ देर तक मुझे एकटक देखा, फिर कहा ,"मैं कुछ आपको बताऊंगा।" वे गा रहे थे
"केही मोरा अवध उजारल, केही कारण"।
कहा कि यह चैती है। दरअसल इसके तीन भेद होते हैं -चैती, चैता और घाटो। वे तीनों को गा गा कर सुनाते हुए उनका भेद बताने लगे।शब्द वही थे, पर गाने के ढंग पर उनका चित्त, अर्थ और वेदना बदल जाती थी। कहीं वेदना व्यंग्य में बदल जाती थी, कहीं आक्रोश में। नाटकीयता अपना प्रभाव डालती थी। एक बार तो उन्होंने कहा कि भरत मुनि अद्भुत ज्ञानी थे। उन्होंने ऐसा शास्त्र लिखा जो वाचिक से संबंधित सभी विधाओं पर लागू होता है।
एक बार प्रसिद्ध सितारवादक रविशंकर बनारस आए। उनका एक कार्यक्रम पराड़कर भवन में रखा गया। कार्यक्रम नि:शुल्क था, इसलिए खूब भीड़ होने की संभावना थी। मेरी इच्छा उनको सुनने की थी। एक दिन यूं ही यह बात मुंह से निकल गयी। छन्नू मिश्र ने कहा - हां, मुश्किल तो होगी। आप मेरे साथ चलिएगा। निर्धारित तिथि को मैं उनके आवास पर गया साथ चलने के लिए। उनके साथ कई लोग जाने वाले थे। वे भीतर तैयार हो रहे थे और उसमें काफी समय लगा रहे थे। वे निकले तो पूरा शृंगार किये थे। बढ़िया रेशम का कुर्ता, धोती, शाल, चमचमाता जूता। खूशबूदार पान, सेंट, करीने से कढा बाल। मुझे गौर से देखता देख उन्होंने कहा, "हम पब्लिक फीगर हैं। लोग हमें देखते हैं। इसलिए हमें टिपटाप रहना चाहिए। करीने से बढ़िया कपड़ा पहनना चाहिए। न कम बोलना चाहिए, न अधिक। संतुलित व्यवहार करना चाहिए। आप को भी, कवि हैं। मेरा ध्यान उनके बढ़िया कपड़ों पर था। कहां एक जमाना था कि बिना सूट पहने मैं कमरे से बाहर नहीं आता था। पर जब कविता लिखने लगा तो वह छूट गया। सरलता जीवन का अंग बन गया। और कहां यह कलाकार बनाव-शृंगार में जुट गया! पर उनकी बात में बड़ा दम था। प्रभाव प्रथमदृष्टया ही पड़ता है और वह स्थाई होता है।
संकटमोचन में साल में एक बार संगीत का भव्य आयोजन होता था। वीरभद्र मिश्र की ख्याति बड़ी ऊंची थी। परिचय विद्या निवास मिश्र ने कराया था। उस आयोजन में मैं ठाकुर जयदेव सिंह के साथ जाता था। वहां छन्नू लाल मिश्र की उपस्थिति उत्साह से भर देती थी।
एक बार होली के अवसर पर उन्हें अपने घर पर आत्मियों के बीच "होली खेलें दिगम्बर मसाने में" सुना। वह गायन समय के साथ बहुत लोकप्रिय होता गया। इतना कि लोग मणिकर्णिका जा कर वाकई राख से होली खेलने लगे। अब तो पियक्कड़-भंगेड़ी लोग इतना उधम मचाते हैं कि वितृष्णा होने लगती है। लोग पुरानी परंपरा कह कर उनका बचाव करते हैं। तब मैं सोचता हूं कि प्रभावशाली लोगों द्वारा उच्चारित हो कर कुछ शब्द इतने बलशाली हो जाते हैं कि संस्कृति की विरासत बनने लगते हैं।
पिछले कुछ वर्षों से बनारस जाता था तो इच्छा उनसे मिलने की होती थी, पर दीगर व्यस्तताओं के चलते अगली बार के लिए टल जाती थी। वह इतनी टलती गयी कि अब वे रहे ही नहीं। मीरजापुर अपनी बेटी के यहां अंतिम दिन बिताए।
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| दलाई लामा |
प्रसंग : सत्रह
उन दिनों दफ़्तर में मेरा काम अचानक बढ़ गया। नेपाल के साथ हुई भारत की संधि समाप्त होने को थी। वह संधि नये सिरे से होनी थी। उधर नेपाल में जनतांत्रिक शक्तियों का उफान और क्रांतिकारी गतिविधियां एकाएक बढ़ गयी थीं। उनका अपेक्षित प्रभाव आगे के भारत-नेपाल संबंध पर पड़ने वाला था। नेपाली कांग्रेस के गिरिजा प्रसाद कोइराला और सी पी एम एल (झापा ग्रूप) के लोग नेपाल चले गये थे, इसलिए उनसे संपर्क साधना कठिन हो गया था। स्टाफ की बेहद कमी थी और जो थे, वे इस विषय के जानकार कम ही थे। ऐसे में श्यामा चरण पांडेय की उपस्थिति बड़े काम की थी। उन्होंने नेपाल पर बड़ी अच्छी किताब लिखी थी जो विभाग के लिए अनेक समस्याओं की जड़ को जानने के लिए बड़े काम की थी। पोलिटिकल सर्किल में उनकी अच्छी पैठ थी। पूर्व में वे 'सेंट ऑफ शौलमारी' का रहस्य उजागर कर चुके थे। इलाहाबाद से ही अंग्रेजी साहित्य में एम ए किये थे, पूर्व परिचित थे, इसलिए बड़ा सहयोग करते थे।
ऐसे में दलाई लामा का सारनाथ में कालचक्रयान पूजा का आयोजन करना मेरे लिए बहुत तनाव पैदा करने वाला हो गया। देहरादून में यह काम मैं कर चुका था और उस सन्दर्भ में अच्छी ख्याति मिल चुकी थी। दिक्कत यह थी कि दिल्ली में वे अधिकारी बदल गये थे, जो इस विषय को डील करते थे। नये लोगों को हर बात बतानी पड़ती थी। वे यही नहीं जानते थे कि कालचक्रयान होता क्या है। इस पर एक विस्तृत अध्ययन मैंने पहले ही भेजा था। बजाय उसे निकाल कर पढ़ने के वे जब मन में आए छोटी छोटी बातें पूछने लगते थे। इससे समय भी जाया होता था और चिढ़ भी होती थी। ऊपर से एक भी अलग से स्टाफ नहीं था। कोई तिब्बती भाषा भी जानने वाला नहीं था। ऐसे में भला हो तिब्बती अध्ययन संस्थान के सामदुंग रिनपोछे का, जिनके ऊपर आयोजन का पूरा दारोमदार था। वे चौबीसो घंटे मुझसे बात करने के लिए तैयार रहते थे, मेरी नौकरी के कारण नहीं, कवि होने के कारण। बारहवीं सदी के मठाधीश और कवि मिलरेपा की कविताओं का अनुवाद मैंने उनके मुंह से मूल को सुन कर किया था, जिससे वे बड़े प्रसन्न थे। मेरी दिक्कत यह थी कि आयोजन से पहले ही सूचना मिली थी कि हिज हाइनेस को मारने के लिए कम्युनिस्ट चीन से आदमी चल चुका था। बनारस ही नहीं दुनिया भर के तिब्बतियों के बीच उसे लोकेट करना असम्भव काम था। तमाम फजीहतों के बीच मैंने तय किया कि सोने के समय के अलावा मैं निरंतर हिज हाइनेस के पास बना रहूंगा। रिनपोछे ने कहा कि उसके लिए भारत सरकार ने अच्छा खासा ताम-झाम पहले से ही दे रखा है, मुझे इतना परेशान होने की जरूरत क्या है? मैंने नौकरी चली जाने का हवाला दिया तो उन्होंने दलाई लामा के छोटे भाई, जो रिनपोछे थे (नाम भूल रहा हूं) से बात की। उन्होंने ने कहा कि इसमें हर्ज ही क्या है और मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। हमारी पहली ही मुलाकात में ऐसी केमेस्ट्री मिली कि संबंध प्रगाढ़ हो गये। उन्होंने मुझे हिज हाइनेस से अलग से मिलवाया। उनका भी ऐसा स्नेह मिला कि बाद में उनकी सरकार ने मुझे उनकी सुरक्षा के लिए मुझे भारत सरकार से मांग लिया और उसके चीफ नोरबू राम की टीम में रख दिया। इस तरह बनारस छोड़ने की पृष्ठभूमि मेरे लिए बनी। एक और सुखद पक्ष यह था कि महाबोधि सोसायटी के सचिव भदंत रेवत हीनयान पंथ के थे, पर वे निरन्तर दलाई लामा के संपर्क में रहे।
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| ठाकुर प्रसाद सिंह |
प्रसंग : अट्ठारह
विश्वनाथ प्रसाद से मेरा परिचय मत्स्येन्द्र नाथ शुक्ल ने कराया। मत्स्येन्द्र शुक्ल तब उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में उपनिदेशक थे और बनारस स्थित अध्यापकों के शिक्षण संस्थान के निदेशक। हर सोमवार की सुबह वे इलाहाबाद से बनारस जाते थे और शनिवार की शाम लौट आते थे। दोनों ही मौकों पर हमारा साथ होता था और हम ढेर सारी बातें करते थे। उन दिनों वे उच्च रक्तचाप के शिकार हो गये थे और बड़े ही तनाव में रहते थे। इसलिए हम बात करने में बड़ा सावधान रहते थे कि उनकी उत्तेजना न बढ़ जाय।
विश्वनाथ प्रसाद उदय प्रताप डिग्री कालेज में हिंदी पढ़ाते थे और विभागाध्यक्ष थे। उनके नवगीत संबंधी कई लेखों को मैंने पढ़ा था और उनके बारे में अच्छी अवधारणा रखता था। उनसे मिला तो पाया कि वे भी मुझे जानते थे। दरअसल उनके अनुज देवी प्रसाद 'कुंअर' इलाहाबाद के कुलभास्कर आश्रम कृषि इंटर कालेज में हिंदी पढ़ाते थे और कविताएं लिखते थे। उन्होंने 'उन्नयन' का इलाहाबाद कविता अंक निकालने में काफी सहयोग दिया था। उनकी कविताएं छपी थीं। तब से वे उसके अंकों को अपने भाई को देते रहते थे। लिहाजा हमारी केमेस्ट्री अच्छी बैठ गयी और मैं जब भी मत्स्येन्द्र जी के पास जाता था तो उनसे अवश्य मिलता था। कभी कभी हम ब्रह्माशंकर पांडेय के साथ देर तक उदय प्रताप कालेज के प्रांगण में घूमते रहते थे और साहित्य पर लंबी-लंबी बातें करते थे। कभी कभी मेयार सनेही भी साथ होते थे।
एक दिन मोहन लाल तिवारी मुझे प्रकाश चंद्र बेरी के पास ले गये । बेरी का अपना प्रकाशन था। कलकत्ता में वे कई प्रकाशकों के यहां काम कर चुके थे और पुस्तकों की बिक्री के लिए बर्मा तक जाते थे। उस इलाके का प्रचुर अनुभव उनके पास था। मुझे लंबे समय तक वहां रहा जानकर वे बड़े मनोयोग से वहां के संस्मरणों को मुझे सुनते थे। उनका कुछ उपयोग मैंने अपने उपन्यास "जो भुला दिए गए" में किया है। एक दिन उन्होंने प्रस्ताव रखा कि तमाम समकालीन कवियों की कुछ चर्चित कविताओं को ले कर मैं एक संकलन तैयार कर दूं, जिसे वे छापेंगे। मैंने तुरंत काम करना शुरू कर दिया। उस सिलसिले में मैंने ठाकुर प्रसाद सिंह से कविताएं मांगी। कविताएं तो उन्होंने नहीं दी, पर एक दिन वे विश्वनाथ प्रसाद को ले कर बेरी के पास पहुंचे और संपादन का जिम्मा उन्हें दिला दिया। पता नहीं कैसे उनके मन में यह बात बैठ गयी थी कि यदि संपादन मैं करूंगा तो उसमें गीतकारों की उपेक्षा होगी। वे 'गीतकार प्रणीत' संकलन तैयार कराना चाहते थे। इस बीच विश्वनाथ प्रसाद से मेरी कई मुलाकातें हुईं पर इसकी भनक उन्होंने नहीं लगने दी। एक दिन पांडुलिपि ले कर मैं बेरी के पास गया तो उन्होंने कहा कि यह काम अब विश्वनाथ प्रसाद कर रहे हैं। वैसे वे दोनों के संकलनों को छापने के लिए तैयार हैं। मुझे बड़ा क्रोध आया और पांडुलिपि को मैंने फाड़ दिया। उसके बाद मैं न तो कभी ठाकुर प्रसाद सिंह से मिला, न ही विश्वनाथ प्रसाद से, न ही बेरी से। हां इसकी क्षतिपूर्ति के लिए जब कमल गुप्त ने कहानीकार में मेरे उपन्यास "जहां बांस फूलते हैं" के अंश को ले कर पूरा अंक निकाला, तो एक बड़ी शानदार गोष्ठी पराड़कर भवन में शिवप्रसाद सिंह और चंद्रबली सिंह की संयुक्त अध्यक्षता में कराई, जिसमें मुख्य वक्ता राम कीर्ति शुक्ल, प्रो. तंबी, और राम नारायण शुक्ल थे। उस गोष्ठी की खूब चर्चा हुई थी। विश्वनाथ प्रसाद न तो वह संग्रह तैयार कर सके, न छपा। ठाकुर प्रसाद सिंह कितने छोटे आदमी थे, जरूर जाहिर हो गया।
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| केदार मान 'व्यथित' |
प्रसंग : उन्नीस
नेपाली के कवि केदार मान "व्यथित" तीर्थ करने बनारस आए। साथ में पत्नी भी थीं। वे कभी नेपाल सरकार में गृहमंत्री रह चुके थे। अपने पंडा के यहां रुकने के बजाय गोदवलिया पर स्थित "ग्रीन लाज" में रुके। वशिष्ठ मुनि ओझा को पता चला तो मुझे ले कर उनके पास गये। व्यथित जी ने जी भर कर कविताएं सुनाईं। उनकी विशेषता यह थी कि वे कविता पहले नेपाली में सुनाते, फिर तुरंत मुंहजबानी ही उसका हिंदी अनुवाद सुना देते। दोनों भाषाओं पर उनका एक-सा अधिकार चकित कर देने वाला था। कुछ दिन बाद ओझा जी ने उनकी कविताओं पर एक बहुत ही शानदार गोष्ठी लक्सा पर अवस्थित अभिमन्यु लाइब्रेरी में आयोजित की। कोई पचास-साठ श्रोता उसमें पहुंचे। मैं भी बलराम उपाध्याय, तुलसी प्रसाद भट्टराई और नारायण अरियाल के साथ वहां पहुंचा। व्यथित जी का काव्यपाठ यादगार था। लोगों ने खूब सराहा। उत्साहित हो कर ओझा जी ने "काठमांडू-काशी कविता सेतु" की स्थापना की घोषणा की। संक्षेप में उसका नाम 'काकासेतु' रखा। व्यथित जी अध्यक्ष बने, ओझा जी सचिव। तय पाया गया कि साल में दो बार काव्यपाठ आयोजित होगा, एक बनारस में, जिसमें नेपाल से आया कोई कवि नेपाली में कविता सुनाएगा, दूसरा काठमांडू में जिसमें भारत से गया कोई हिंदी का कवि कविताएं सुनाएगा। उन कविताओं को ले कर दोनों भाषा में अनुवाद सहित पुस्तक निकाला जायेगा। पर यह फलीभूत नहीं हो पाया। योजना धरी की धरी रह गयी।
व्यथित जी ने संगम में डुबकी लगाने की योजना बनाई। वे आये तो हरीश चंद्र अग्रवाल के घर पर गोष्ठी जगदीश गुप्त की अध्यक्षता में हुई, जिसमें तमाम युवा कवि उन्हें सुनने आये। व्यथित जी की इच्छा इलाहाबाद के वरिष्ठ रचनाकारों से उनके घर जा कर मिलने की हुई। मैंने उन्हें महादेवी वर्मा, अमरकांत, नरेश मेहता, मार्कंडेय, केशव प्रसाद मिश्र, केशव कालीधर, लक्ष्मी कांत वर्मा, भैरव प्रसाद गुप्त, जगदीश गुप्त, विपिन कुमार अग्रवाल, उपेंद्र नाथ अश्क वगैरह से मिलाया। अमरकांत के यहां अजित पुष्कल भी मिले। उनकी बातों से नीलाभ इतने प्रभावित हुए कि अपनी दुकान पर एक शाम एक छोटी सी गोष्ठी रखी, जिसमें चित्रकार अशोक भौमिक, सत्य प्रकाश मिश्र, मत्स्येंद्र शुक्ल और राम कमल राय भी उपस्थित हुए। कोई दस दिन सिविल लाइंस स्थित टेप्सो होटल में रह कर वे बनारस और वहां से काठमांडू लौट गये। जाते वक्त वे मेरी कुछ कविताएं नेपाली में अनुदित कर किसी पत्रिका में छपवाने के लिए ले गये। मैंने 'उन्नयन' का एक अंक नेपाली कविता पर निकालने का मन बनाया और उसके लिए उन्हें अतिथि संपादक रखा। वह अंक निकल नहीं पाया। मेरी कविताओं का क्या हुआ, मुझे पता नहीं चला। उनसे फिर कभी मुलाकात नहीं हुई।
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| कैफ़ी आज़मी |
प्रसंग : बीस
कैफ़ी आज़मी से मेरी सिर्फ एक मुलाकात रही है और उसके भी निमित्त थे मोहन लाल तिवारी। वे आजमगढ़ जिले में अपने गांव आए हुए थे। मोहनलाल तिवारी को पता लगा कि वे बंबई जाने के लिए बनारस आ रहे हैं तो उन्होंने एक गोष्ठी रख ली रामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थान में कुसुम चतुर्वेदी और उनके पति जो जिला जज रहे थे, उनसे बात कर। बहुत प्रचार का समय नहीं था, फिर भी मुहांमुही बात फैली और शाम को कोई पैंतीस-चालीस आदमी पहुंच गये। मैं भी नज़ीर बनारसी के साथ वहां पहुंचा। चंद्रबली सिंह और कमल गुप्त नहीं आए। एक ही संगठन के होने के बावजूद उन लोगों के बीच एक त्रिभुजाकार तनाव बन गया था, जिसमें फसे ब्रह्माशंकर पांडेय एक संतुलन बनाने के प्रयास में दोहरा हुए जाते थे। खैर वहां बैठने का ठीक से इंतजाम तक नहीं था, पर लोग पालथी मार कर सुनने के लिए जम गये। आजमी ने सुनाया भी जम कर। बीच में उन्हें प्यास लगी। पानी नहीं था। नईम भाग कर पास में ही मकान बना रहे मजदूरों के बीच गये और अल्युमिनियम के एक पिचके लोटे में पानी भर कर लाए। हम लोगों को बहुत खराब लगा। पर आज़मी ने बिना किसी संकोच के चुल्लू लगा कर पानी पीया और कविता सुनाने लगे। अशोक पाठक के मुख से अप्रत्याशित ढंग से निकल गया कि यह सच्चे कम्युनिस्ट का लक्षण है। हम उनकी सादगी पर मर मिटे। अपने अध्यक्षीय संबोधन में नज़ीर बनारसी ने भी कई रचनाएं सुनाईं। बाद में मैंने उन्हें नोट कर 'पहल' पत्रिका में भेजा जहां वे बड़े सम्मान से छपीं। हम कैफ़ी आज़मी की सादगी से बहुत प्रभावित हुए थे और उनसे कुछ बात करने की बड़ी इच्छा थी। पर लोगों ने, विशेष कर युवकों ने उन्हें ऐसे घेर लिया कि उन तक पहुंचना कठिन हो गया। फिर उनसे कभी मुलाकात नहीं हो पाई।
सम्पर्क
मोबाइल : 8005094727




















बहुत सुन्दर साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्मरण हैं, जिनमें श्रीप्रकाश मिश्र जी का वाराणसी प्रवास के नायाब अनुभव हैं। बहुत रोचक और पठनीय लेखन है। मेरे बारे में भी उन्होंने लिखा है। उन्होंने मुझे याद किया, मैं उनके स्नेह का आभारी हूँ। लेकिन मेरे प्रथम काव्य संग्रह का नाम अच्छी तरह स्मृति में न होने से सही नहीं दे पाए हैं। उस संग्रह का नाम "तालाब के पानी में लड़की था"। संग्रह अपने समय में चर्चित भी था और उसने मुझे एक पहचान दिलाई। उसे मैंने डिसओन नहीं किया है। उसकी कविताएँ दूसरे संग्रहों में शामिल नहीं हैं। डॉ. उमेश प्रसाद सिंह द्वारा संपादित मेरी प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह "क़दम-क़दम" में उसकी कई कविताएँ शामिल हैं।
जवाब देंहटाएंलेखक और ब्लागर को मेरी हार्दिक बधाई और आभार!
केशव शरण