भरत प्रसाद का उपन्यास 'कालकलौटी'
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| भरत प्रसाद |
जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। इसीलिए प्रकृति जीवन को अपनी तरफ आकर्षित करती रहती है। जीवन भी इस प्रकृति की तरफ स्वाभाविक रूप से झुकता है। पेड़ पौधे, पशु पक्षियां, कीड़े मकोड़े पृथिवी की जैविक समृद्धि में अनमोल रत्न की तरह हैं। इनके बिना पृथिवी और पृथिवी पर के जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। रचनाकारों की रचनाओं में यह प्रकृति अनायास ही आती है। क्योंकि इसके बिना रचनाओं में रवानी नहीं आ पाती। अलग बात है कि विकास के नाम पर आजकल प्रकृति पर ही लगातार प्रहार किया जा रहा है। वन दिन ब दिन सिकुड़ते जा रहे हैं। हम प्रकृति की खूबसूरती को निहारने की बजाए दिन रात मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। अपने आस पास के न तो पेड़ पौधों को पहचानते हैं, न ही पशु पक्षियों को। एक अजनबीयत हम सब पर लगातार हावी होती जा रही है। हालत यह है कि अपने ही घर परिवार में अब हम अजनबी नजर आने लगे हैं। इससे भयावह और भला क्या हो सकता है। भरत प्रसाद इन दिनों एक उपन्यास 'कालकलौटी' लिख रहे हैं। पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के दूसरे रविवार को 'कालकलौटी' उपन्यास को धारावाहिक रूप में प्रस्तुत करेंगे। तो आइए आज के दिन पहली बार पर हम पढ़ते हैं इस उपन्यास की पहली कड़ी।
उपन्यास
'कालकलौटी'
भरत प्रसाद
धरती मैया का सांवला आंचल
पौ अभी फटी नहीं है, धरती माता अभी अधनिंदिया में अंगड़ाई ले रही। सन्नाटों के फासलों में चुपचाप सोए हुए दरख्त भोर की राह ताक रहे हैं। जिन पक्षियों की उड़ान से दिन हरा-भरा लगता, रात के अतल में न जाने कहाँ समा गया है। जरा कुछ देर बाद खेतों की ओर से आती पुरवा बयार चित्त पर बह चलेगी। कुछ देर बाद गौशाला से बछड़ों की होंकार उठेगी। अभी तो भोर का नीला आकाश रात के आगे अपना रंग बेच कर निस्तेज पड़ा हुआ है। सांवली, उर्वर मिट्टी का अनगढ़ आंचल। जिधर नजर फेरो – वैरागियों जैसे अधेड़ वृक्षों के उदास सिलसिले नजर आते हैं। होगा सूरज पूरी दुनिया के लिए लाल, मगर हमारा सूरज तो गांवों के माथे पर उगता है और सीवान के धुंधलके में अस्त होता है। कहने को तो ऋतुएं तीन हैं – मगर यहाँ की दिशाओं में हर दिन नई ऋतु की दस्तक होती है, हर दिन नई उमंग की महक उठती है, हर शाम नये कल की कल्पना जन्म लेती है, हर रात बीतते हुए जीवन की टीस जगाती है। इस मटिहा अंचल में सैकड़ों अनमोल वृक्षों के नाम हैं, परंतु लोगों की निगाहों में गुमनाम। हजारों पक्षी भोर से चढ़ती रात तक दृश्यमान होते हैं, परंतु हमारे लिए वे उतने ही अजनबी हैं, जैसे रोज-रोज मिलते लोग। न जाने कितने दुख पुकार लगाते हैं – मगर हमारे कानों को न सुनने की आदत पड़ गई है। आंसू सिर्फ़ आंखों से नहीं गिरते, चीख केवल मुंह से नहीं निकलती, चोटें सिर्फ शरीर पर नहीं लगतीं। कौन कहेगा कि नेह की भूख-प्यास केवल आदमियों को ही नहीं लगती। पैरों तले की मिट्टी को भी हमारी हथेलियों का दुलार चाहिए। रेंगते हुए कीड़ों को हमारी पलकों का प्यार चाहिए। गिरते हुए पत्तों को हमारे हृदय का अश्रु चाहिए। और चाहिए बेनाम रह गए घसिहा फूलों को हमारे होठों की प्रार्थना। धरती कभी बंजर नहीं होती, जंगल कभी वीरान नहीं रहते, जानवरों की मनुष्यता की अपनी पटकथा है – अनकही, अनसुनी, अनजानी किंतु व्याख्या से ऊपर।
नीम भोर की लकलक रोशनी, आकाश की चटक नीलिमा और धरती मैया के आंचल तले बल खा कर जुग-जुग से बहती अमृतधारा, जिसे गंवई कंठ राप्ती नदी उचारता है। गांव-जवार को पता है – राप्ती मैया का लता-पता। ऊपर उत्तर में बसे नेपाल की निचाट, बीहड़, अगम कंदराओं से निकलती है। न जाने कितने दरख्तों के शरीर में प्राण सींचती, चट्टानी पत्थरों की मैल धोती, ऊसर को उपजाऊ, उपजाऊ को बलुहट पाटों में बदलती, अगम काल से बह रही है। पाट की ऊंचाई छूते इलाकों में उजाड़ गांवों के सिलसिले आबाद हैं। राप्ती मनौतियों में बसी है, सपाट दिलों में धंसी है। इसकी लहरों में हजारों बसते-मिटते गांवों की गुमनाम गाथा समाई है। राप्ती अपनी हर करवट पर हर साल जमीन लील जाती है। तुम सुख-चैन छीन लो, फिर भी मेरी हो। पराजित करती रहो, मगर तुमसे भाग कर जाएँ कहाँ? तुम हमारी मेहनत पर बार-बार पानी फेरती रहो – तुम्हारे आगे हमारे हाथ हमेशा जुड़े रहेंगे। तुम बोलती नहीं – पर क्या हम सुनते नहीं? तुम बाहर बहती हो, पर कौन कहे कि तुम हमारी नसों में बजती होती हो। तुम एक नदी कहाँ हो मैय्या! तुम सिर्फ पानी की धारा कहां हो? कितने जानवरों के प्यासे कंठों का अमृत हो, कितने पक्षियों के हुलास का कलख, कितने मल्लाहों का पेट भरने वाली माया। राप्ती! कौन कहता है – तुम बस जीवनदायिनी सदानीरा हो। पत्तियां अपने दरख्त की छाया में छिप कर तुम्हारी जय-जय गाती हैं। सूरज तुम्हारे बहाने अपनी आभा की घोषणा करता है। चारों दिशाएँ घुल-मिल कर कहीं गुम हो जाती हैं – जब तुम्हारे सुदूर विस्तार में आर-पार अंधकार का सन्नाटा झरता है।
राप्ती मैया का विकराल रूप किसने नहीं देखा है? अपने ही पाटों को अपने पेट में समा लेती। लगती ही नहीं यह वही नदी है – जिसकी धारा निहार कर मन लुटा-पुटा रह जाता है, जिनके छिछले तल में उतर कर हाथ जोड़ने को मन मचलता है, जिसका अंजुरी भर पानी सिर्फ मुँह को ही नहीं, दिलों की कालिख को भी धोने लगता है। कठिन महीना सावन-भादो। मानो कि आसमान समुद्र भर का पानी सीधे उठा कर धरती पर उड़ेल दिया हो। विचित्र माया बरखा रानी की। टूट-टूट कर दिन-रात बरसती है – नेपाल की अगम ऊंचाइयों पर और धरती जलाजल होती है – हमारे गांव-गिरांव की ओर। क्या तो कहावत है – ‘मार कहीं और पड़ती है – दर्द कहीं और उठता है।’ पता है? आज की हमारी राप्ती श्री कृष्ण के युग से न जाने कितना पूर्व की है। तबके जुग में इसका नाम था – वारवत्ता, नहीं-नहीं ‘वारवत्या’ – बोलने में जीभ जरा लड़बड़ा गई। गौतम बुद्ध जब अपनी अंतिम यात्रा पर चले – तो शरीर त्यागने के पहले हिरण्यवती नाम के दरिया में स्नान–ध्यान किया था। जानते हैं न हिरणवती नदी? का? नहीं जानते? तो सुनिए! इ हिरणवती, वही हिरण्यवती इरावती की एक शाखा है। बहुत पुराने समय में राप्ती का ही नाम इरावती या कि अचिरावती था। और सुनिए! जब बुद्ध ने अपना सर्वस्व जीवन समर्पित कर शरीर भी इसी माटी को सौंप दिया, तब मल्ल राजा और उनके अश्रुधारी प्रजाजनों ने फिर हिरनवती नदी को पार कर मुकुट चैत्य के नीचे महात्मा बुद्ध की चिता सजाई थी। साल भर में मैया के कई रूप, कई अंदाज, कई तेवर, कई चाल। दहकती लू के महीनों में सिकुड़-मिकुड़ कर एक बहती रेखा रह जाती है – मानो शरीर का सारा खून निचुड़ गया हो। जाड़े-पाले के मौसम में कुहासे की चादर तान कर अपने यौवन के शर्म में सोई हुई जिसे चाहने के बावजूद जरा भी छूने की हिम्मत नहीं पड़ती। और बारिश की ऋतु में राप्ती माता का हाल पूछिए ही मत। अपने बेलगाम तेवर से किसको हाल-बेहाल नहीं कर देती?
सवा पांच ग्राम से जरा नीचे के वजन की न जाने कितनी फुदुक्की चिड़ियाँ। हिलक-हिलक कर हौले बहती धारा को पंखों से छू कर बेदिशा ही लेती हैं। कभी पानी पर उतर कर लहरों का झूला-झूलतीं, कभी हारी-बाजी में मीता की विकल गुहार लगातीं तट पर बैठी हुई हैं – टिं-टिं-टिं, टिट्, टिट्, टिट्। कहीं किसी अदृश्य दिशा से प्रश्न झरता है – कुहू, कुहू, कुहू। खग जाने खग ही की भाषा। इंसानों में इतनी सामर्थ्य कहां? जब आदमी अपनी ही भाषा बोलने वालों को नहीं समझ पाता, तो चिरई-चुरुंग, जंतु-जानवर को क्या समझ पाएगा? राप्ती के आर-पार जाते राहगीरों को देख कर नदिहा पक्षियों की बोली बदल जाती है। रोज-रोज नहाने के लिए सनकी हुई भैसों को देख कर टिहकारी की उमंग उठने लगती है – पीठ पर बैठ कर सवारी गांठने का चांस जो मिलेगा। भैसें हैं कि पानी से न निकलने की कसम खा ली है – चिड़िया खुश, खांटी गद्गद्। कई-कई को मुफ्त में इस पार से उस पार सैर करने का मौका मिलता है – फिर आनंद क्यों न गूंजे क्षितिज में – कि ही कहा, किक्का, का, का, का।
राप्ती का बलुहट पाट, बालू में मोती खिलते हैं। सूरज की रोशनी छिटक-छिटक जाती है – बालू के नन्हें कणों से टकरा कर। है किसी की सामर्थ्य जो हवा और लहरों की जुगलबंदी की तान अपने कंठ में छेड़ सके? है कोई दरिया दिल, जिसका दिल किसी दरिया को छू कर दरिया-दरिया हो जाय? है कोई औघड़ साधक जो नीले आकाश और चौरस धरती के बीच अगम काल से बहती नदी को साध सके? है कोई नर्तक, जो लहरों की अठखेलियां निरख-निरख कर नाचे बेहिसाब, बच्चों की तरह? किनारे शांत, मौन, सिर झुकाए खड़े, दूर-दूरांतर क्षितिज की निचाइयों तक उतरा आकाश, राप्ती में रीढ़ की तरह भीतर फैली धरती – सब आपस में घुल-मिल कर ऐसी पुकार लगाते हैं – जिसे सुनने के लिए दो कान निहायत असमर्थ हैं।
नद्दी मैया की छोटी बहिन को जानते हैं न? का? नहीं जानते? अरे वही झिलमिल-झिलमिल मोतिहा पानी। फरक बस इतना कि नदी कहीं कभी किसी के लिए रुकती नहीं। अपने लिए भी नहीं सुस्ताती और झील जनम से ले कर मौत तक एक ही जगह जमी रहती है। निचहट धरती पर अपना आंचल पसार कर झलक मारती हुई सोती-जागती है। इधर, यहाँ, इस तरफ पुरबिया अंचल को खूब पाला-पोसा, नमदार बनाया है – मोती झील ने। इसी का एक और मुखसुख नाम है – बखिरा झील। रौनक भांप कर ही अंदाजा लगता है – राप्ती की बहन होगी। रंग एक, लहर एक, तरंगें एक जैसी, माटी की रग-रग सींचने का स्वभाव एक जैसा। तकरीबन 12 किलोमीटर की धरती को अमृत जल से मस्त करती हुई। बूढ़े-बुजुर्गों के कंठ में इस झील की कथा बसी है, जिसका लब्बोलुआब यही कि पहले यहाँ नगर जीवित था। गड़हा, गुड़ही का कहीं अता-पता नहीं था। इसी बीच नगर का दुर्भाग्य समझ लीजिए कि झूठ, फरेब, बेइमानी का बोलबाला हो गया, धोखा देना व्यापारियों का धर्म हो चला। जिसे देखो वही सिधवा मनई को लूटने में डूबा हुआ था। दिन में धोखा देने में जो कोर-कसर बाकी रहती, वह रात में पूरी होती। बेईमानी की सनक इस कदर चढ़ी कि बनिया, व्यापारी सेई अर्थात् नपौना को उलट कर अनाज नापने लगे। जरा आप ही दिमाग लगाइए – पेड़ की जड़ों को सींचने की जगह उसमें मट्ठा डालेंगे तो क्या होगा? आशीर्वाद, दुआ या कि श्राप केवल इंसान का ही नहीं लगता, पहाड़, पालो, पत्थर, पानी, अन्न और जानवर-पशु भी भीतर-भीतर से दुआएँ देते और श्राप बाँटते हैं। आप, हम सबको लगता है – हमारी छिपी करतूतों को कोई नहीं देखता, मगर गांठ बांध लो बबुआ! भूलना मत – तुम्हारे मन से उठी तरंगों की खबर फिजाओं को लग जाती है। तुम्हारी चाल-कुचाल की आहट धरती को मिल जाती है। आखिर बखिरा के बेईमान सौदागरों को अपने किए का अबूझ दंड धरती मैया और आकाश ने मिल कर दिया। मारे शरम और ग्लानि के धंसती चली गई और देखते-देखते चंद सालों के भीतर गुलजार एक नगर मोती झील के आगोश में समा गया।
बज्र ठंडा, नमदार, निचला ढलुआ पाट, जिसे तट कहिए, किनारा बूझिए या कि अरार। मोती झील का पानी चोरी-चोरी ऊपर चढ़ता है, गिलहा धरती छिप-छिप कर झील में गायब होती है। एक तट से यही कोई दस कट्ठा और दूसरे तट से भी तकरीबन आठ-दस कट्ठा झील के अंदर ऐन बीचों-बीच एक आदिम सभ्यता रची-बसी है। आदमियों की आहट से दूर, नजरों की नजर से छिप कर, पकड़ से बाहर और समझ से ऊपर। इस सभ्यता का अपना रंग है, रौनक है, उत्सव और संगीत है। आजादी तो ऐसी कि हवाएं भी ईर्ष्या करती हैं, खुशहाली इस कदर कि हरियाली भी बौनी पड़ जाती है। तो यह है – कुल 21 किलोमीटर के जलमय फैलाव में हनखन बजती हजारों पक्षियों की सभ्यता। कौन जाने ये किस देश, किस दिशा, किस जंगल और ताल-तलैया से उठकर आते हैं – इधर मोती झील का मोती पीने। सुना है – बगल के परदेस – तिब्बत, चीन और यूरोपहा देशों से उड़कर यहाँ चले आते हैं। साइबेरिया इलाका कुछ वक्त के लिए निर्ध्वनि हो जाता है – इनके बेहिसाब पलायन के कारण। सौ, पांच सौ, एक हजार नहीं, पाँच हजार किलोमीटर की हवाई यात्रा पार कर इस सभ्यता के नागरिक बनते हैं। अंदाजन 113 उड़नछू प्रजातियाँ जलमय रहती हैं यहाँ। अचरज यह कि इन पक्षियों में से अधिकांश अहिंसक होते हैं – पक्के गांधीवादी, शुद्ध शाकाहारी। आस-पड़ोस के देशहा, कछारी पक्षियों के साथ शादी-बियाह कर ये सभी हिंदुस्तानियत के रंग-ढंग में ढल चुके हैं। लालसर, कोचार्ड, सूरखाल, हिवीसिल, गोजू, सवल, पिण्टेल इन विदेशी पक्षियों के पंचप्रधान हैं। जल-युद्ध से ले कर प्रेम-युद्ध का फैसला इन सरपंचों के द्वारा ही होता है। यहाँ, अपने देशहर पक्षी, मिसाल के लिए – कैया, राईटर (लेखक नहीं), वाटरहेन, कारमोरेन्ट, टिटिहरी, बगुला, सारस, हदहद, सुर्खाब, चील, बड़का गरुड़, नीलसर, जलकौआ, अंजन, फुग्गी, लालगोई इन परदेशिहा पक्षियों से खूब लड़ा-लड़ी, उड़ा-उड़ी, भिड़ा-भिड़ी का प्रेमिल कम्पटीशन करते हैं। किसने सुना है इनको आपस में अपना सुख-दुख बतियाते? किसने देखा है – इन्हें एक-दूसरे की चोट चाटते-चूमते? किसने पहचाना है – इनके पंखों के नीचे टभकती हुई पीड़ा?
निचाट, धूमिल अंचल में जाड़ा माई दबे पांव ऐसे आती हैं, जैसे गरीब-गुरबा के घर में हारी-बेमारी। इंग्लिश में अक्टूबर और देहाती बोली में आश्विन-कातिक का महीना – यही वह सुहानी बेला है, जब विदेशिहा पक्षियों का मेला लगना शुरू होता है, फिर तो पूछिए मत, विरह के मौन में तैरते, विदेशिहा पक्षियों के आने की खबर दूसरे देशज पक्षियों को देते हैं – आ-आ-आ, आवं, आवं, आवं, आवं.....। उधर परदेसी पक्षी इस आवभगत का जवाब अपनी खुशी से देते हैं – टीं, टीं, टीं, टिही, टिही, टिही, टिट्, टिट्, टिट्। मोती झील की काया पर सांझ की चादर पसरना झीनी चादर फैला कर चांदनी रात का झनकना इन प्रेमातुर पक्षियों को खूब पता है। संध्या जब अपनी माया फैलाती और रात का राजा जब अपनी शीतल, शांत, स्निग्ध, मक्खनी आभा के साथ दिशाओं में रहस्य भरता है – तब ये पक्षी जो दिन भर के खेलमखेल से पस्त हो गए हैं, - अपने पंखों के आगोश में चले जाते हैं। कातिक की भोर, धरती अभी अर्द्ध निद्रा में है। उत्तर-पूरब के श्यामल कोने से लकलक गोला उठा, पक्षियों की आंखों में जान आ गई, फिर चारों पहर के लिए वही तैर-वैर, वही खोजा-खोजी, वही पेट-पूजा, वही कचक बुलाहट। ये परदेसी पक्षी बस चार माह के मेहमान होते हैं – मोती झील में। सर्दी का मौसम चढ़ते ही इनके सिर फिर परवाना चढ़ता है, अपना वतन, अपनी जन्मभूमि, अपनी नदियाँ। फिर क्या? पूरे आठ महीने के लिए तन्हाई की बेचैनी दबाए उड़ चलते हैं – सीमाओं के उस पार, हमारे देखने की सारी ताकत निचोड़ लेते हुए, फिर लौटने की उम्मीद जगा कर। कैसे कहूँ कि बिछुड़ते वक्त पक्षी हूबहू इंसानों की तरह रोते नहीं, कैसे कहूँ कि फिर मिलने की कसम नहीं खाते, कैसे मान लूँ कि रूठने पर एक दूसरे को मनाते नहीं। हमारी भाषा जैसी अर्थवान इन पक्षियों की बोली है, हमारे श्रम जितनी अद्वितीय इन पक्षियों की उड़ान है। इनका भी दिल हमारी तरह किसी और पक्षी की याद में धड़कता है।
क्रमशः...
सम्पर्क
मोबाइल : 9077646022







हमारे जीवन की साहित्यिक यात्रा में यह किसी सुखद घटना से बढ़कर है।पहली बार
जवाब देंहटाएंअपनी किसी रचना का धारावाहिक प्रकाशन हो रहा है।सहृदय अवाक् हूँ, यह अनमोल योगदान चित्त पर अमिट हो गया।
भरत प्रसाद
बहुत अच्छा लिखा है। अनुभूतिगम्य।जैसा हमने प्रकृति और जीवन को बचपन और युवाकाल में महसूस किया है। शानदार और सहज- सरस भाषा शैली और वर्णनकला। हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
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