यादवेन्द्र का आलेख 'देखने में सिर्फ़ वस्तु नहीं शामिल होती'


यादवेन्द्र 


देखना मनुष्य द्वारा बरती जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। देखने से हम कई चीजें अनुभूत करते हैं और उसे अपनी बातों या रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के देखने का तरीका ही वासनमय हो तो क्या किया जा सकता है। खासकर स्त्री के सन्दर्भ में परंपरागत सोच आज भी दकियानूसी बनी हुई है। स्त्री की कोई भी तस्वीर देख कर सस्ती सी टिप्पणी कर देना ऐसे लोगों के लिए आज आम है। ऐसे लोगों के लिए राजा रवि वर्मा की पेंटिंग अनावृत स्त्री को समझ पाना उनके समझ के बाहर की बात है। जिसके दिल दिमाग में वासना ही भरी हुई हो वह स्त्री सौंदर्य, स्त्री वस्त्रों या साज सिंगार के बारे में क्या सोचेगा या क्या बात करेगा? मधुसूदन आनन्द की कहानी 'देखना' के बहाने यादवेन्द्र जी ने अपने आलेख में इसी पहलू पर कुछ गम्भीर विमर्श प्रस्तुत किया है।

आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण रचना को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। कतिपय कारणों से पिछले महीने हम यह कॉलम प्रस्तुत नहीं कर पाए थे। इस बार भी हम रविवार की जगह सोमवार को प्रस्तुत कर रहे हैं। कॉलम के अंतर्गत यह सत्रहवीं प्रस्तुति है। तो आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं यादवेन्द्र का आलेख ''देखने में सिर्फ़ वस्तु नहीं शामिल होती"।


जिन्दगी एक कहानी है : 17

'देखने में सिर्फ़ वस्तु नहीं शामिल होती'


यादवेन्द्र 


हम जब देखते हैं तो सिर्फ़ किसी एक चीज को नहीं देखते बल्कि हम हमेशा चीजों को उसके साथ अपने आप से जोड़ कर  देखते हैं। 

जॉन बर्गर 


खासतौर पर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हम शुरू से यह पढ़ते आए हैं कि कोई अंतरिक्ष यान बिल्कुल टेक्स्टबुक प्रिसीज़न के साथ प्रक्षेपित किया गया....। यानि एक एक चरण वैसा ही जैसा किताबों की परिभाषा में लिखा है, बिल्कुल सटीक और विचलन रहित।


उसी तरह से मैंने जब से मधुसूदन आनंद की छोटी सी कहानी 'देखना' पढ़ी है तब से मेरे मन में इसको ले कर यही बात आती रही कि टेक्स्टबुक प्रिसीज़न वाली किसी कहानी का उदाहरण देना हो तो मैं फ़ौरन इस कहानी को ही चुनूंगा। यह संयोग की बात है कि पिछले दिनों स्वभावतः आत्मप्रचार से दूर रहने वाले मधुसूदन जी हमें असमय छोड़ गए। उनके अनूठे रचना संसार को याद करते हुए आज साथियों के साथ उनकी इस कहानी पर बात कर रहा हूँ जो संभावना प्रकाशन, हापुड़ से छपे कथा संकलन 'कब्रिस्तान में कोयल' में शामिल है।


मधुसूदन आनन्द

 

इस कहानी का किशोर वाचक इब्ने सफ़ी, ओम प्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत की जासूसी किताबों की रोमांचकारी दुनिया में गहरे डूबा हुआ है जिसके निम्न मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार में संयोगवश दूर के रिश्तेदार राजा भाई साहब का पदार्पण होता है जो अपने पिता की मृत्यु के बाद आ कर उसके घर में रहते हैं और आगे की पढ़ाई करते हैं। बाद के वर्षों में वे आते-जाते रहते हैं और जीवन को दिशा देने की जद्दोजहद में बीच बीच में ओझल भी हो जाते हैं। नौकरी लग जाने पर एक दिन प्रकट होते हैं और अपने सामानों का एक बक्सा उसके घर छोड़ जाते हैं जिसमें रखी किताबें वाचक को अनायास ही एक नई दुनिया में ले जाती हैं। इस खज़ाने की मार्फ़त वाचक जासूसी दुनिया के भंवर से निकल कर प्रेमचंद, जैनेन्द्र, गोर्की जैसे लेखकों से परिचित होता है। लेकिन जब उसके सामने अचानक बक्से में से राजा रवि वर्मा प्रकट होते हैं - उनके ऊपर लिखी एक अधफटी किताब के रास्ते उनकी अनूठी कला दुनिया का दरवाजा खुलता है तो वह हतप्रभ रह जाता है। उत्तर भारत के निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में जब गीता प्रेस की किताबों और कल्याण जैसी पत्रिकाओं से अनिवार्यतः सद्गुण, शील और संस्कार निर्मित होते थे तब राजा रवि वर्मा के स्त्रियों (देवियों के साथ साथ अप्सराओं) के काले सफेद चित्र वाचक के लिए अनूठे और जादुई आकर्षण और ललक का सबब बनने लगे। यह माया ऐसी बढ़ी कि आधी अधूरी किताब को सहेजना संभालना जरूरी लगा - और उसमें भी तिलोत्तमा का चित्र तो किशोर मन पर जैसे ग़ज़ब ढा रहा था।


राजा रवि वर्मा


तिलोत्तमा का सौंदर्य देख कर मैं मुग्ध था। साड़ी नीचे ढलकी हुई और स्तन खुले हुए। एक हाथ से साड़ी थामे हुए। गले में मोतियों की माला और आभूषण। हाथ में कंगन और चूड़ियाँ। कानों में कुंडल। खुले बाल। दूसरा हाथ ऊपर को उठा हुआ। कामुक छवि लेकिन सौम्य चेहरा।" 


"राजा रवि वर्मा के काले सफेद चित्र मायावी लगते थे लेकिन यह भी लगता था जैसे इस जीती जागती दुनिया के राग विराग से, प्रेम और सौंदर्य से कोई न कोई हाड़ मांस का अपरिभाषित रिश्ता उनका जरूर है।"


वाचक इस चित्र के अलौकिक सौंदर्य में खोया हुआ बैठा था कि पिता ने देख लिया - फिर एक झन्नाटेदार तमाचा गाल पर।



यद्यपि वाचक के लिए यह चित्र अलौकिक सुंदरता से इतना भरा हुआ था कि मायावी लगता था लेकिन यह भी लगता था जैसे इस जीती जागती दुनिया के राग विराग से, प्रेम और सौंदर्य से कोई न कोई हाड़ मांस का अपरिभाषित रिश्ता उनका जरूर है।


कल्याण के चित्रों को देख कर दिव्यता का अनुभव होता था, वैसा अनुभव इस पौराणिक चरित्र के चित्र को देख कर न तो होना था और न हुआ। मगर तब भी यह चित्र वासना तो पैदा नहीं ही करता था।


"स्तन खुले हैं यह भाव भी अश्लीलता पैदा नहीं करता था। इसके विपरीत वह सौंदर्य बोध के एक आयाम से ही साक्षात्कार कराता था। मैं शपथपूर्वक आज भी यह घोषणा करता हूँ कि तब इस चित्र ने मुझ में कोई वासना पैदा नहीं की। आज सौंदर्य वासनामय जरूर हो उठा है लेकिन तब वह निर्दोष था।"


पिता द्वारा देखी तिलोत्तमा के चित्र की अश्लीलता किशोर वाचक को उस ढंग से नहीं दिखती जैसे पिता को दिखती है। वह उनका दैहिक या शाब्दिक प्रतिकार नहीं करता पर कहानी कहते हुए तर्कों के माध्यम से उनके दृष्टि दोष को एक एक उदाहरण दे कर खंडित करता चलता है।


"क्या गाय को दूहता देख कर हममें वासना का संचार होने लगता है? मुझे तो तब चिड़ियों के संभोग से भी कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।जैसे सब प्राकृतिक खेल हो।


मैं जोर देकर दोहराना चाहता हूँ कि वह चित्र निश्चय ही सुंदर था और पहली नजर में सुंदरता ही सामने आती थी।"


नागा साधु/ दिगंबर साधुओं को देख कर हम आँख नहीं मींच लेते। 

अनावृत्त को देख कर सब कामग्रस्त ही हो जाएं, जरूरी नहीं। 

स्त्री को देख कर जब वासना ही उपजनी है तो मां, बहन, बेटी घर में सुरक्षित कैसे रह सकती हैं?


हम अपने आस पास समाज और परिवार में स्त्रियों को अक्सर प्रेम, मोह, क्रोध, हर्ष, विषाद, हारी बीमारी में अनावृत्त हुआ देखते हैं तो हम आगे बढ़ कर उसे ढंकते हैं, कामग्रस्त हो उसका उपभोग नहीं करने लगते।


दरअसल समय और परिस्थितियों के साथ हमारे देखने का नजरिया हमारा सौंदर्य बोध भी बदल जाता है।


बात आगे बढ़ते बढ़ते उसके पिता के व्यक्तिगत आचरण तक पहुंच जाती है:


पिता भले ही सद्गुण और ईश्वरीय उन्मुखता का उपदेश झाड़ते रहते हैं लेकिन अपने व्यवहार में कामुकतावश हर साल बच्चे भी पैदा करते हैं। 


कहानी के अंत में वाचक कहता है कि राजा रवि वर्मा के चित्रों के जरिए राजा भाई साहब ने अनजाने ही मुझे देखना सिखाया। वे आज दुनिया में नहीं हैं लेकिन मैं उनकी आँखों से दुनिया और सौंदर्य को देख रहा हूँ। 



कला विशेषज्ञ रूपिका चावला के अनुसार राजा रवि वर्मा भारत के पहले कलाकार थे जिन्होंने हिंदू देवी देवताओं के अलौकिक बिंबों को विशिष्टता के पायदान से उतार कर मानवीय धरातल पर रखा और आम जन के बीच स्वीकार्य और सुलभ प्राप्य बनाया।


इस दृष्टि से उनका काम न सिर्फ़ ऐतिहासिक है बल्कि युगांतरकारी भी है। उन्होंने कुछ संभ्रांत लोगों को सुलभ देवी देवताओं को सर्व सुलभ बनाया। प्रेस में छाप कर जाति धर्म अमीरी गरीबी की सीमा रेखा लाँघ कर कैलेंडर रूप में घर घर पहुँचाया। जब अछूतों का मंदिर में प्रवेश वर्जित था तब भी उनके चित्र सुलभ हुए। चित्रों के माध्यम से मंदिर की कैद से भगवान को मुक्त किया। इतना ही नहीं जब हम हिंदी भाषी विंध्याचल के नीचे के भारत से अनजान थे, उनकी स्त्रियों को काली कलूटी और थुलथुल कहते हुए  कमतर मानते थे तब राजा रवि वर्मा ने उनमें मोहक सौंदर्य, रूप और लावण्य भर दिया, सम्मान के साथ हमसे परिचित करवाया। साड़ियों को प्रमुख भारतीय परिधान के तौर पर प्रतिष्ठित करने वालों में राजा रवि वर्मा अग्रणी थे।


देखने की विभिन्न श्रेणीबद्ध परतों और पूर्वाग्रहों की बात करें तो मुझे दशकों पुरानी एक घटना याद आती है।


1980 में जब मैं रुड़की नया-नया गया था तो इतवार को अजंता टॉकीज में सुबह के शो में कोई न कोई अंग्रेजी (कभी कभार मलयालम) फिल्म चलती थी और उसको ले कर आम धारणा यह थी कि नंगेपन और अश्लीलता से भरी फ़िल्में होती हैं। यदि उस फिल्म के समय हॉल के आस पास कोई दिख गया तो यह मान लिया जाता था कि वह घटिया और कुरुचिपूर्ण मानसिकता वाला इंसान है। किसी छोटे शहर में समाज में पहचाने जाना बहुत आसान है दिल्ली मुंबई या कोलकाता जैसे शहर के तुलना में। जब मैं पहली बार वहाँ नौकरी करने गया था तो दो-तीन फिल्में मैंने भी लोगों की नज़रें बचा के वहाँ देखी थीं। उनमें से एक अमेरिकी फिल्म "द ब्लू लगून" थी इसके बारे में किसी दोस्त ने खूब रस ले कर मुझे बताया था।


जब मैंने यह फिल्म देखी तो मुझे इतनी सुंदर और इतनी काव्यात्मक लगी कि मैं इसका दीवाना हो गया। फिर मैंने दिल्ली के किसी अच्छे हॉल में वह फिल्म दोबारा देखी और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि आसानी से मिल जाए तो मैं यह फिल्म फिर से खुशी खुशी देखना चाहूंगा।



हेनरी स्टैकपूल के इसी नाम के 2008 में छपे अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित यह फ़िल्म अंग्रेजी में और कुछ अन्य भाषाओं में पहले और बाद में भी बनी लेकिन 1980 के रैंडल क्लीज़र के निर्देशन में बनी हॉलीवुड की फ़िल्म ने दुनिया भर में खूब धूम मचाई थी।


फ़िल्म के विज्ञापन में दिया परिचय यह है:

यह सहज प्राकृतिक प्रेम की संवेदनशील कथा है। दो बच्चे (एक लड़का, एक लड़की) जहाज क्षतिग्रस्त हो जाने पर लहरों के सहारे किनारे लग कर एक द्वीप पर फंस जाते हैं। यहाँ प्रकृति उनके प्रति दयावान है। नीले पारदर्शी जलराशि वाले लगून में और जंगल में जीवन यापन के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। जब वे इस तरह सहज भाव से रहते हुए बड़े होते हैं तो उनके बीच आकर्षण जन्म लेता है, फिर प्यार पनपता है। देखते ही देखते यह प्यार समुद्र जैसा ही सहज और शक्तिशाली रूप धारण कर लेता है।


चार-पांच साल के बाद उमेश मेहरा की फिल्म "तेरी बॉहों में" आई और यह प्रचारित किया गया कि वह 'द ब्लू लगून' का हिंदी रीमेक है लेकिन उसके बारे में सुन और पढ़ कर मुझे वह देखने का मन बिल्कुल नहीं हुआ। उसके बारे में पढ़ सुन कर मालूम हो गया कि हिंदी फिल्मकार ने 'द ब्लू लगून' का बाहरी आवरण लिया, उसकी आत्मा और सौंदर्यबोध से उसका कुछ लेना देना नहीं।


यह सारी बात कहते सुनते मुझे अनायास फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के ये शब्द याद आते हैं-


वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है।


यहाँ प्रसंगवश यह बता देना चाहता हूँ कि हिंदी में संभवतः सबसे पहली किताब प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार राजा रवि वर्मा शीर्षक से श्री शंकर जोशी ने 1911 में लिखी, बनस्थली प्रेस से छपी यह किताब डिजिटल रूप में उपलब्ध है।



(यादवेन्द्र सीएसआईआर-सीबीआरआई, रूड़की में पूर्व मुख्य वैज्ञानिक रह चुके हैं।)



सम्पर्क 


72, आदित्य नगर कॉलोनी,

जगदेव पथ, बेली रोड,

पटना - 800014


मोबाइल - +91 9411100294

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