शैलेन्द्र चौहान की कविताएं


शैलेन्द्र चौहान 

माना जाता है कि लोकतन्त्र का उद्देश्य है जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए'। इसे अभी तक की सबसे बेहतर शासन पद्धति माना जाता है। लेकिन शासक की उस मानसिकता का क्या किया जा सकता है जो गद्दी पाते ही अपने को राजा ही समझने लगता है। लोकतन्त्र अपने उद्देश्यों को पाने में प्रायः असफल रहा है। भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं लगाया जा सका। नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, दलालों ने देश को जम कर लूटा है। जातिवाद टूटने की बजाए कहीं और मजबूत हुआ है। धर्म का वर्चस्व और बढ़ा है। समानता की बात कागज पर ही सिमट कर रह गई है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पाने के लिए लोगों को भटकना पड़ता है। इस लोकतन्त्र में लोक ही गायब हो गया है। तन्त्र और शक्तिशाली हुआ है। कवि शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं : "लोकतंत्र/ धीरे-धीरे/ लोक से दूर/ भोग के करीब पहुँच गया/ जहाँ सेवा का स्थान/ सुविधा ने ले लिया/ और आदर्शों की जगह/आरामकुर्सियों ने/ निराश हताश लोक ने भी/ यह सत्य स्वीकार लिया"। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलेन्द्र चौहान की कविताएं।



शैलेन्द्र चौहान की कविताएं 


धमकी देने वाला अज़ब-ग़ज़ब दोस्त


वह आदमी

दुनिया के बीचों बीच खड़ा था

छाती फुलाए, बाल सँवारे

और बार-बार कहता था

कि वह इस दुनिया का

सबसे बड़ा दोस्त है


जब कहीं

गोली चलती

बारूद की गंध उठती

वह मंच पर आ कर

घोषणा कर देता

सीज़फायर मैंने करवाया है


लोग सोचते

अजीब बात है

आग कहीं और लगती है

और बुझाने का श्रेय

कोई और ले जाता है


दुनिया सुनती है

कुछ मुस्करा कर

कुछ सिर खुजला कर

क्योंकि उसी आदमी की जेब में

धमकियों की एक लंबी सूची होती है

किसी के लिए टैरिफ

किसी के लिए प्रतिबंध, कब्जा

और किसी के लिए ट्रुथ पर

एक नया ट्वीट


अजब दोस्ती है भाई तुम्हारी

गले लगाते हो

तो लगता है

जैसे कोई बीमा एजेंट

पॉलिसी के साथ

तलवार भी बेच रहा हो


तुम्हारी मेज़ पर रखी

कॉफी भी कभी-कभी

युद्ध का नक्शा बन जाती है,

और ट्वीट

तोप के गोले की तरह उड़ते हैं

दुनिया की खिड़कियों पर


वह अक्सर कहता है

“मैं सबका भला चाहता हूँ,

बस सबको मेरी बात माननी होगी”


वह पहले

धमकी की माचिस दिखाता है,

फिर पानी की बाल्टी ले कर

नायक बन जाता है


लोग समझते हैं

यह दोस्ती नहीं

एक तमाशा है

पर बेबस हैं वे


मंच पर खड़ा वह आदमी

हर बार घोषणा करता है

कि वही सबसे अच्‍छा दोस्त है

और वही

सबसे बड़ा शांति-दूत भी

सब जोर जोर से

ताली बजाने लगते हैं



लोकतंत्र


था जनता की आँखों में चमकता

एक सपना

जहाँ सत्ता

सेवार्थ होगी

और कुर्सी

जनविश्वास की चौकी


पर धीरे-धीरे

बदल गया अब

सपनों की वह चौकी

सुविधाओं का सिंहासन बन गई

जनप्रतिनिधि

जन के नहीं

अपने सुख के प्रतिनिधि हो गए


वेतन, भत्ते, बंगले, मलाई

लालबत्तियों, काफ़िलों और

सत्ता की हनक

के बीच

लोक कहीं खो गया


संसद में

बहस कम

व्यवस्थाएँ अधिक होने लगीं

किसका भत्ता बढ़े

किसका बंगला बड़ा हो

किसकी सुरक्षा और कड़ी हो

सारे जोड़ तोड़, तिकड़म

चिंता बस एक

कैसे बनी रहे यह कुर्सी

लंबे समय तक


बाहर

लंबी कतारों में खड़ी जनता

सोचती रही

क्या यही वह सपना था

जिसके लिए

उसने उँगली दबाई थी?


लोकतंत्र

धीरे-धीरे

लोक से दूर

भोग के करीब पहुँच गया

जहाँ सेवा का स्थान

सुविधा ने ले लिया

और आदर्शों की जगह

आरामकुर्सियों ने

निराश हताश लोक ने भी

यह सत्य स्वीकार लिया


संविधान की आत्मा अब

कोने में बैठ कर

धीरे-धीरे फुसफुसाती है

“यह लोकतंत्र नहीं

भोगतंत्र का स्वर्णयुग है”






धर्म, सत्ता और मनुष्य


धर्म

आरंभ में

सिर्फ एक प्रश्न था

रात के आकाश में

टिमटिमाते तारों को देख कर

मनुष्य ने पूछा था

मैं कौन हूँ?


उस प्रश्न की नमी से

जन्मे थे देवता

मंदिर, मंत्र

और प्रार्थनाएँ

धीरे-धीरे

उस प्रश्न पर

सत्ता की मुहर लग गई


राजमहलों ने कहा

ईश्वर हमारा संरक्षक है

और ईश्वर

राजमहल के भीतर

कैद कर दिया गया

मंदिरों के शिखरों पर

ध्वज

सत्ताओं के संकेतक बने

लहराने लगे


धर्म

कभी

मनुष्य के भीतर

एक शांत नदी था

अब

नारों का कोहराम बन गया


किसी दूर अतीत से

हँसते हुए लौटे

चार्वाक

उन्होंने कहा

देखो पृथ्वी को

यहाँ का अन्न, यहाँ की धूप

यही तुम्हारा सत्य है

आकाश की कल्पनाओं से पहले

धरती को पहचानो


बोधि वृक्ष की छाया में

गौतम बुद्ध

शांति से बोले

दुःख को समझो

करुणा को जानो,

सत्ता की सीढ़ियों से नहीं

मन की शांति से

मुक्ति मिलती है


सदियों बाद

एक विचारक

पुस्तकों के बीच बैठा

कह रहा था

धर्म

कभी-कभी

थके हुए मनुष्यों की

एक मीठी नींद है

वह पूछ रहा था

क्या तुम्हारा स्वर्ग

धरती के अन्याय को

ढँकने का परदा तो नहीं?


फिर

किसी नदी किनारे

एक संत गा उठा

मंदिर ढूँढे, मस्जिद ढूँढे

ढूँढा जग सारा,

सत्य कहीं बाहर नहीं

वह मन के भीतर धारा

वह आवाज थी

कबीर की

जो कह रहे थे

कि धर्म

किसी सत्ता का झंडा नहीं

मनुष्य की करुणा है


आज

जब दुनिया के चौक-चौराहों पर

धर्म के नाम पर उन्माद है

हिंसक नारे और दीवारें खड़ी हैं

अंदर आवाज

उठती है

धर्म

यदि मनुष्य को

मनुष्य से दूर करे

तो वह धर्म नहीं

सत्ता

यदि ईश्वर के नाम पर

मनुष्य को झुकाए

तो वह आस्था नहीं


समय के विशाल सन्नाटे में

फिर वही प्रश्न लौटता है

क्या मनुष्य से बड़ा

कोई धर्म हो सकता है?



ढोंग के ढूह


लोग धर्म की बातें करते हैं

पर भीतर सत्ता की भूख छिपी होती है

भोग की अदम्य लालसा

नैतिकता का झंडा उठाते हैं

पर मन के अंधेरे कोनों में

लाभ, लोभ और अहंकार पलते हैं


ढोंग का सबसे बड़ा गुण यह है

कि वह बहुत सज-धज कर आता है

उसके पास लच्छेदार भाषा होती है

शास्त्रों के उद्धरण होते हैं और

भीड़ को प्रभावित करने की कला


सचाई,

इसके विपरीत

अक्सर चुप रहती है

उसे मंच नहीं चाहिए न कोई आवरण

वह किसी मंदिर, मंच या मठ की मोहताज नहीं

वह मनुष्य के भीतर एक

शीतल रोशनी है



गलगोटिया : एक नमूना


गलगोटिया तो बस

एक छोटा-सा नमूना है

हमारी सोच का

इस देश में

शिक्षा के कारोबार का

एक विराट साम्राज्य है


विश्वविद्यालय यहाँ

विद्या के मंदिर नहीं

चमकदार शोरूम हैं

जहाँ ज्ञान नहीं

डिग्रियाँ पैकेटों में

सजा कर रखी जाती हैं


द्वार पर टंगे हैं

चमकते होर्डिंग

“भविष्य बनाइए”

“विश्वस्तरीय शिक्षा पाइए”

और भीतर

भविष्य नहीं

किस्तों का हिसाब लिखा जाता है

ब्लैकबोर्ड पर


सत्ता के गलियारों से

सीधे जुड़े हैं इनके तार

कुलपति के कक्ष में

कभी नेता आते हैं

कभी उद्योगपति

और कभी

नई डील के दस्तावेज़


शिक्षा यहाँ

मुनाफ़े का एक विशद व्यापार है

जहाँ फीस

नदी की तरह बहती है

और ज्ञान

रेगिस्तान की तरह

सूखा पड़ा रहता है


गलगोटिया में जो हुआ

वह कोई आश्चर्य नहीं

यह तो उस बीमारी की

बस हल्की-सी झलक है

जो पूरे शरीर में

फैल चुकी है


हर शहर में उग रहे हैं

नए-नए विश्वविद्यालय

जैसे बरसात में

कुकुरमुत्ते उगते हैं

नाम रवायती,

भवन भव्य

और भीतर

पाठ्यक्रम से ज़्यादा

मुनाफ़े की किताब पढ़ाई जाती है


मंचों पर गूंजते हैं भाषण

“भारत ज्ञान की भूमि है”

“हम विश्वगुरु बनेंगे”


ज्ञान

किसी कोने में दुबका है

शर्म से सिर झुकाए

और बाज़ार

उसके कंधे पर बैठकर

तालियाँ बजा रहा है

रोज़गार की बात

बेमानी है


गलगोटिया तो बस

एक छोटा-सा नमूना है

असली कहानी तो

उस खेल की है

जहाँ अब

सब कुछ

धड़ल्ले से बिक रहा है

चौतरफा

अद्भुत विकास का नज़ारा है


अर्थव्यवस्था चौथे से तीसरे नंबर पर

पहुंच चुकी है



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


संपर्क : 


34/242, सेक्‍टर-3, 

प्रतापनगर, जयपुर -302033


मोबाइल : 7838897877

टिप्पणियाँ

  1. आज के समय और सन्दर्भ पर अच्छी कवितायेँ हैं।

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  2. जनकवि शैलेंद्र चौहान की कविताओं ने जनमानस में हमेशा ही अपनी जगह बनाई है। संवेदनशीलता उनकी खास पहचान है।

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  3. शैलेन्द्र जी की कविताओं में विचार और आज का समय उपस्थित है. उनसे उनकी कविताएं सुनी है और ये कविताएं पढ़ रहा हूँ
    स्वप्निल श्रीवास्तव

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  4. कविता में समकालीन विषयों के मर्म को ढालने का साहस विरल रचनाकारों का होता है। यह साहस कवि शैलेन्द्र चौहान में भरपूर है। उनकी कविताएँ दृष्टि व संवेदना से भरपूर हैं।

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