अमरकान्त की कालजयी कहानियाँ




बलराज पाण्डेय


हिन्दी में नई कहानी (सन् 1950-1960) के अधिकतर कथाकार मध्य वर्ग से आये थे। उन्होंने अपने और अपने आस-पास के मध्यवर्गीय जीवन को जिस रूप में देखा था, उसी को अपनी कहानियों में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया था। इनमें बहुत-से ऐसे कथाकार थे जो गाँवों से आये थे। फणीश्वर नाथ रेणु, मार्कण्डेय, शिवप्रसाद सिंह, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी की कहानियों में गाँव के जीवन्त चित्र देखे जा सकते हैं। कुछ ऐसे भी कथाकार थे जो छोटे शहरों की जिन्दगी को अपनी कहानियों में जगह दे रहे थे। इन्होंने भी गाँव में समय बिताया था। गाँव का परिवेश इनकी यादों में ताजा था। इनकी कहानियों में प्रयुक्त ग्राम जीवन के शब्दों से इनकी पहचान की जा सकती है। अमरकांत ऐसे ही कथाकार हैं, जिन्होंने रहने के लिए तो इलाहाबाद शहर चुना था, लेकिन उनकी कहानियों में किसी-न-किसी रूप में गाँव झलक मारता है। मुख्य रूप से वे शहरी मध्य वर्ग के कथाकार हैं- उस शहरी मध्य वर्ग के, जो अभाव में जिन्दगी जी रहा है। आजादी मिलने के बाद भी उसे भविष्य के लिए कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है। अमरकान्त की बहुचर्चित कहानी 'दोपहर का भोजन' ऐसी ही परिस्थिति को आधार बना कर लिखी गयी है।




'दोपहर का भोजन' में बाबू चन्द्रिका प्रसाद का एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार है, जिसमें तीन बेटों के साथ खुद पति-पत्नी सहित कुल पाँच सदस्य हैं। चन्द्रिका प्रसाद की क्लर्की की नौकरी छूट गयी है, बड़ा बेटा नौकरी के लिए प्रयास कर रहा है, मँझला पढ़ रहा है और छोटा तो अभी छोटा ही है। चन्द्रिका प्रसाद प्रतिदिन शाम के वक्त काम की तलाश में कहीं-न कहीं जाते हैं। घर में दोपहर के भोजन पर सभी दिखाई देते हैं- वह भी एक साथ नहीं, अलग-अलग।




मेरी समझ से 'दोपहर का भोजन' कहानी की केन्द्रीय पात्र है सिद्धेश्वरी। कहानी की शुरूआत भी उसी से होती है। उसका पेट खाली है और जिसे रोटी से भरना चाहिए उसे वह पानी से भरती है। खाली पेट पानी पीने पर पानी 'लगता' है। सिद्धेश्वरी को भी पानी लगा और वह गश खा कर गिर पड़ी। इसका मतलब यह कि एक-दो 'जून' से उसे भरपेट खाना न मिला होगा। इस प्रकार यह कहानी भूख की समस्या से शुरू होती है। इस समस्या का हृदयविदारक रूप तब सामने आता है, जब लेखक सिद्धेश्वरी के सबसे छोटे बेटे प्रमोद का चित्र प्रस्तुत करता है- अधटूटे खटोले पर पड़ा नंग-धड़ंग लड़का, गले और छाती की साफ दिखतीं हड्डियाँ, बासी ककड़ियों की तरह सूखे और बेजान पड़े हाथ-पैर, हँड़िया की तरह फूला हुआ पेट और उसके खुले मुख पर भिनभिनातीं अनगिनत मक्खियाँ। स्पष्ट है कि लड़के की यह स्थिति भरपेट भोजन न मिलने के कारण हुई है। अन्न के अभाव में वह एक ऐसे रोग की चपेट में है जो जानलेवा हो सकता है, क्योंकि सबके लिए भरपेट भोजन की व्यवस्था करना उसके वश के बाहर है। घनघोर अभाव की स्थिति में जी रही क्या आजादी के बाद की यही हमारी भावी पीढ़ी की दुर्दशा होगी। अमरकांत इस चित्रण से भविष्य के प्रति चिन्ता प्रकट करते हैं।




असह्य अभाव के बावजूद सिद्धेश्वरी अपने पति और बेटों से रसोई घर की असलियत छिपाना चाहती है। कम रोटियां होने के बावजूद वह कसम देकर सबको एक रोटी अधिक खिला कर संतुष्ट करना चाहती है। वह अपने परिवार को अपनी झूठी बातों से बहला कर एक आत्मीय वातावरण निर्मित करना चाहती है, हालांकि थोड़ी अधिक रोटी देने की जिद पर बेटा रामचन्द्र उस पर बिगड़ जाता है। ऊपर ऊपर  देखने पर तो लगता है कि रामचंद्र अपनी मां पर गुस्सा कर रहा है लेकिन वास्तव में यह गुस्सा उस व्यवस्था पर है, जिसमें उसकी योग्यता के अनुसार उसे काम नहीं मिल रहा है। मन में आया वह गुस्सा किसी ना किसी पर तो उतरेगा ही और गुस्सा उतारनेक लिए मां से उपयुक्त पत्र परिवार में दूसरा कौन हो सकता है सिद्धेश्वरी रामचंद्र के गुस्से का कोई जवाब नहीं देती है। इससे स्पष्ट है कि अमरकांत स्त्री और पुरुष के मनोविज्ञान की कितनी गहरी समझ रखते हैं। 




अपने पति और बेटों को प्रसन्न रखने के लिए सिद्धेश्वरी ऐसी-ऐसी बातें  गढ़ती है, जिससे लगे कि परिवार के सदस्य एक दूसरे की कितनी चिंता करते हैं या एक दूसरे का कितना ख्याल रखते हैं। अभाव की स्थिति में, जबकि पारिवारिक सद्भाव हमेशा खतरे में रहता है, सिद्धेश्वरी भरसक उसे बचाने की कोशिश में रहती है। रामचंद्र का यह पूछना कि 'प्रमोद खा चुका' यह सिद्ध करता है कि बड़ा भाई छोटे की कितनी चिंता करता है, क्योंकि एक दिन पहले रेवड़ी के लिए डेढ़ घंटे तक उसका रोना बड़े को याद है। उस याद में एक अपराध - बोध छिपा हुआ है कि वह अपने छोटे भाई के लिए एक छोटी सी रेवड़ी भी देने की स्थिति में नहीं है।




'दोपहर का भोजन' कहानी का अन्तिम हिस्सा बहुत मार्मिक है। घर में कोई सिद्धेश्वरी से नहीं पूछता कि उसने कुछ खाया या नहीं। हमारी पारिवारिक व्यवस्था इस प्रकार से पुरुष प्रधान बना दी गई है कि उसमें स्त्री घर के सभी पुरुष सदस्यों को खिलाने के बाद ही खाएगी। पुरुष सदस्य इस से बेफिक्र रहते हैं कि स्त्रियों के लिए रसोई में भरपेट भोजन बचा है या नहीं। इस कहानी में तो एक ही स्त्री है। न पति मुंशी चंद्रिका प्रसाद न ही बेटे चिन्ता करते हैं कि सिद्धेश्वरी के लिए खाना है या नहीं। वैसे, सभी अभाव की स्थिति से वाकिफ हैं, क्योंकि दो रोटियां खाने के बाद कोई अतिरिक्त यानी तीसरी रोटी नहीं लेना चाहता। थाली में रोटी और दाल की जो मात्रा बताई गई है, उससे स्पष्ट है कि न ज्यादा रोटियां हैं न दाल। यह 'दोपहर का भोजन' तो है, लेकिन भरपेट नहीं है। फिर, सिद्धेश्वरी के लिए तो एक ही रोटी बची है। कहानी में संवेदना उत्कृष्ट रूप में तब महसूस होती है, जब रोटी खाने से पहले सिद्धेश्वरी की नजर खटोले पर सो रहे छोटे बेटे पर पड़ती है। वह रोटी का आधा टुकड़ा बच्चे के लिए रख आधी रोटी से ही अपने को सन्तुष्ट रखने के लिए विवश है। यहां सिद्धेश्वरी के प्रति करुणा अपने चरम पर है। वह अपना 'पेट काट कर' परिवार का पेट भरने क  कोशिश करती है और वह जानतीहैकी वह इसमें सफल नहीं है क्योंकि सबके लिए भर पेट भोजन की व्यवस्था व्यवस्था करना उसके बस के बाहर है।




'दोपहर का भोजन' कहानी में अमरकान्त ने जिस वातावरण की सृष्टि की है, वह बहुत प्रभावशाली है। कहानी में हम एक अजीब किस्म का सन्नाटा महसूस करते हैं, जो अभाव और निराशा से उत्पन्न है। निराशाजनित उस सन्नाटे को तोड़ने की भरसक कोशिश करती है सिद्धेश्वरी, लेकिन मेरी समझ से वह तोड़ नहीं पाती। सन्नाटा मानो अपना हाथ-पाँव तोड़ कर उसके घर में स्थायी रूप से डेरा जमा लिया है।




इस कहानी में यदि कुछ उदात्त है, तो वह है पाँच सदस्यों वाले परिवार की आत्मीयता। यदि एक अपवाद को छोड़ दिया जाय, तो सिद्धेश्वरी जिस प्रकार का आत्मीय वातावरण निर्मित करती है या करना चाहती है, वह कहानी का स्वीकारात्मक पक्ष है। अभाव की स्थिति से संघर्ष तो परिवार का हर सदस्य कर रहा है, लेकिन उससे सर्वाधिक प्रभावित है सिद्धेश्वरी। उसके आँचल में पेट भरने वाला दूध तो नहीं है, आँखों में पानी जरूर है, जो हर वक्त गिरता रहता है- आँसू के रूप में। हाँ, उसके आँचल में स्नेह का दूध जरूर है, जिससे वह पूरे परिवार को प्रसन्न रखने की कोशिश करती है। भारतीयता प्रेमी कह सकते हैं कि सिद्धेश्वरी भारतीय स्त्री की प्रतीक है, लेकिन अमरकांत उसे इस रूप में प्रस्तुत करना नहीं चाहते। उसकी सहनशीलता को भी वे 'फोकस' करना नहीं चाहते। उनका एकमात्र उद्देश्य है निम्नमध्यवर्गीय भारतीय जीवन की अभावग्रस्त जिन्दगी का यथार्थ प्रस्तुत करना और इसमें वे सफल हैं।




'दोपहर का भोजन' कहानी के शिल्प की सबसे बड़ी विशेषता है सहजता। कहानी में लेखक जैसे स्थिति को ज्यों का त्यों हमारे सामने रख देता है। भाषा संबंधी कोई कलाकारी भी कहानी में नहीं दिखती है। कहानी में 'कथानक का ह्रास' स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है, जो नयी कहानी की एक विशेषता के रूप में चिह्नित किया गया था मुझो ऐसा लगता है कि कहानी का हर पात्र अभाव को असत्य से ढकना चाहता है। दोपहर के भोजन में पेट किसी का नहीं भरता, लेकिन पेट भरने का अभिनय लगभग सभी पात्र करते हैं। कहानी में अमरकांत सायास ही भय की सृष्टि करते हैं। बड़े बेटे का घर में आना, बिना कुछ बोले चौकी पर लेटना और उसकी नाक के पास भयभीत माँ का हाथ ले जाना हमें चौंकाता है। कहानी में एक अपराध बोध भी है, जो मुंशी चन्द्रिका प्रसाद के व्यक्तित्व में दिखता है, लेकिन इन सभी स्थितियों के लिए अमरकान्त किसी पात्र को जिम्मेदार नहीं मानते। अमरकान्त का मानना है कि हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं, उसमें हर निम्नमध्य वर्ग के व्यक्ति की यही नियति है।




'जिंदगी और जोंक' अमरकांत की एक अद्वितीय रचना है। इस कहानी का मुख्य पात्र तो 'रजुआ' है, जो निम्न वर्ग से आता है, लेकिन मध्यवर्ग के षडयंत्री स्वभाव का विस्तृत वर्णन इस कहानी में मिलता है। भौगोलिक दृष्टि से देखें तो इस कहानी के केन्द्र में है बलिया शहर-सन् 1952 का बलिया शहर सन् 1952 में बलिया नाम भर का शहर रहा होगा। शहर कहलाने के लिए जो जरूरी सुविधाएँ होनी चाहिए, वे आज भी नहीं हैं, जैसे ड्रेनेज की सुविधा। सिर पर मैला ढोने की प्रथा बीसवीं शताब्दी के अंतिम दिनों तक वहाँ बनी रही। ऐसे ही बलिया शहर में किसी रामपुर गाँव से आये हुए रजुआ की कहानी उसकी बेतहाशा पिटाई से शुरू होती है। आरोप यह है कि उसने शिवनाथ बाबू के घर से साड़ी चुरा ली है।




अमरकांत ने यहां लोगों की हिंसक प्रवृत्ति का बड़ा दिल दहला देने वाला वर्णन किया है। मोहल्ले भर के लोग उसकी जम कर पिटाई करते हैं। इधर-उधर से जो भी आता है रजुआ की पीठ पर दो चार लात जमा देता है। वह बार-बार चिल्लाता है - 'मैं बरई हूं, मैं बरई हूं' लेकिन किसी के मन में दया नहीं आती। अंततः साड़ी शिवनाथ बाबू के घर में ही मिल जाती है लेकिन उनके मन में रजुआ की पिटाई को ले कर जरा भी अपराध बोध नहीं है। लेखक ने शिवनाथ बाबू के क्रूर चरित्र की पहचान उन्हीं के मुख से कहे हुए इन वाक्यों से कराई है कि 'नीच और नींबू को दबाने से ही रस निकलता है', चोर-सियार मार खाते ही रहते हैं।' यह सवर्ण मध्य वर्ग के स्वभाव में ही है कि खुद को निर्दोष सिद्ध करने के लिए वह इस प्रकार के सूत्र वाक्य गढ़ लेता है। 




इतनी मार खाने और लोगों द्वारा अपमानित होने के बावजूद रजुआ के चरित्र की यह दृढ़ता ही कही जाएगी कि वह मोहल्ला नहीं छोड़ता। मोहल्ले की औरतें जैसे जानवरों को कुछ न कुछ खिला देती हैं, उसी तरह रजुआ को भी खाने के लिए कुछ न कुछ दे देती हैं। लोगों के छोटे-मोटे काम कर देने और अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वह मोहल्ले से इतना परच गया है कि किसी न किसी के ओसारे या दालान में बैठने-सोने भर के लिए उसे जगह मिल जाती है। वास्तव में लोगों के मन में उसके प्रति लगाव है उसके काम से। शहरी खाता-पीता वर्ग बहुत आलसी होता है। उसे कामचोर भी कह सकते हैं। नौकर चाकर से घर का काम कराना वह अपनी शान समझता है और फिर बिना कोई तय मजदूरी दिए उसे मुफ्त में नौकर मिल जाए तो फिर क्या कहना। रजुआ मोहल्ले भर का ऐसा ही नौकर था। सभी उसके मालिक थे। शिवनाथ बाबू इतने काइयां हैं कि यह भी उनसे न देखा गया और जिस रजुआ की पिटाई का आरोपी उनका परिवार था, उसी रजुआ को अपने घर में उन्होंने नौकर रख लिया, क्योंकि रजुआ को नौकर रखने में उनका एक रुपया भी खर्च नहीं था, बस भरपेट भोजन और बदले में जी भर खटाना। 




मध्य वर्ग के लोगों की यह प्रवृत्ति होती है कि सभी एक दूसरे से जलते हैं लेकिन यह जलन सीधे-सच्चे लोगों को लखाई नहीं देती। एक विदेशी विद्वान ने इसे 'रिप्रेसिव टॉलरेंस' कहा है यानी 'दमनकारी सहिष्णुता'। इसमें ऊपर-ऊपर से तो लोग मृदु बने रहते हैं लेकिन चुपचाप एक दूसरे से घृणा करते रहते हैं। यह व्याख्या नामवर सिंह की है। कहानी में शिवनाथ बाबू के प्रति लोगों के मन में यही भावना काम करती है। शिवनाथ बाबू का स्वभाव भी ऐसा ही है।  'जिंदगी और जोंक' कहानी में मोहल्ले के लोगों की ईर्ष्या और जलन का शिकार रजुआ होता है। उसे कभी थप्पड़ लगता है तो कभी दिन भर खटाया जाता है। आदमी आदमी के प्रति, खासकर घरेलू नौकरों के प्रति कितना क्रूर हो सकता है, इसका बड़ा दर्दनाक चित्र कहानी में प्रस्तुत किया गया है। यह मानवीय व्यवहार का ही परिणाम है कि किसी घर में नौकर ज्यादा दिन नहीं टिकते। किसी का गुलाम बन कर रहने की अपेक्षा रिक्शा चला कर या मिल में काम कर जीवन यापन करना वे बेहतर समझते हैं। इस प्रकार स्वतन्त्र रह कर कमाने-खाने की बलवती इच्छा मजदूर वर्ग के मन में भी जगने लगी है।




कहानी में रजुआ का समाजीकरण इस रूप में होता है कि मुहल्ले का हर आदमी जरूरत पड़ने पर उससे कोई-न-कोई काम करवा लेता है और बदले में अपनी इच्छा के अनुसार उसे कुछ दे देता। वह चाहता है कि लोग उससे काम लें, उससे हँसी-मजाक करें। मुहल्ले में मार खाने, अपमानित होने के बावजूद वहीं रहना, लोगों का काम करना, निम्न जाति की स्त्रियों के साथ भौजी का रिश्ता जोड़ना या दूसरे प्रकार के मजाक करना जैसी उसकी हरकतों से प्रतीत होता है कि वह जिन्दगी का मजा लेने लगा है। इस प्रकार जिन्दगी से जुड़ने की बलवती इच्छा यानी जिजीविषा इस कहानी के केन्द्र में है। आज इस जिजीविषा को जिन्दा रखने की महती आवश्यकता है। क्योंकि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था ऐसी विकट परिस्थिति पैदा कर रही है कि लोग छोटी-छोटी समस्याओं से ऊब कर या घबरा कर या तो मर रह हैं या मार रहे हैं। मरने-मारने की पनपने वाली प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए रजुआ अपने वर्ग के साथ ही दूसरे वर्ग के लोगों के लिए भी एक आदर्श प्रस्तुत करता है। शायद यह गाँधीवादी आदर्श है, जिसके प्रति लेखक के मन में एक विशेष प्रकार का मोह है। कहानी में एक ऐसा स्थल है भी जहाँ रजुआ कहता है- "इनखिलाफ जिन्दाबाद, महात्मा गान्ही की जै।" इससे स्पष्ट है कि महात्मा गाँधी का प्रभाव उनकी हत्या और आजादी मिलने के बाद के वर्षों में भी किस प्रकार जन-जन में व्याप्त था। अमरकान्त इस कहानी में गाँधी जी को ले कर एक मिथ भी गढ़ते हैं और वह भी रजुआ के माध्यम से, जो अब रज्जू भगत कहलाने लगा है। गाँधी जी के बारे में किसी के एक सवाल के जवाब में वह कहता है कि सरकार ने जब महात्मा जी को जेल में डाला तो एक दिन "सभी सिपाही प्यादा के होते हुए भी वे जेल से छूट कर बाहर आ जाते हैं और सबकी आँखों पर पट्टी बंधी रह जाती है। ऐसे ही वे जब सात समुंदर पार कर देहली पहुँचते हैं और सरकार उन पर गोली चलाती है तो गोली गान्ही महात्मा की छाती पर लग कर सौ टुकड़े हो जाती है और गान्ही महात्मा आसमान में उड़ कर गायब हो जाते हैं।"




मेरी समझ में इस कथा गढ़न का भी एक निहितार्थ है। शायद लेखक यह मन्तव्य स्थापित करना चाहता है कि गाँधी जी की देह को भले ही गोली मार दी जाय, लेकिन अपने सिद्धान्त और व्यवहार से जो आदर्श उन्होंने स्थापित किया है, उसे नहीं मिटाया जा सकता क्योंकि उनके आदर्श भारत की जनता के हृदय में स्थान बना चुके हैं। लेखक का मन्तव्य आज की तारीख में इसलिए ज्यादा प्रासंगिक है, क्योंकि गाँधी जी के विचारों को व्यर्थ सिद्ध करने के सुनियोजित प्रयास बड़े पैमाने पर देखने में आ रहे हैं।




इसी तरह का एक मिथक बजरंगबली और ताड़का का है, जब बजरंगबली ताड़का के कान से मच्छर बन कर निकल आते हैं, हालाँकि राम कथा में सुरसा है, ताड़का नहीं। ताड़का का प्रसंग दूसरा है। तो रज्जू भगत बजरंगबली और गांधी जी को अपना नायक मानते हैं, जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में कभी हार नहीं मानी थी। रज्जू भगत को जीने की ताकत इन्हीं नायकों से मिलती है।




'जिन्दगी और जोंक' कहानी का बड़ा दारुण प्रसंग है एक पगली स्त्री का, जिसकी उम्र अभी तीस साल ही है। बलिया रेलवे स्टेशन पर या चौक में या दूसरी जगहों में लावारिस घूमते हुए उसे लोग देखते हैं, कुछ लफंगे उसे चिढ़ाते हैं, ईंट-पत्थर फेंकते हैं, लेकिन रजुआ को मिलती है वह नंगी स्थिति में-राजकीय रेलवे पुलिस चौकी पर। रजुआ उससे पूछता है 'क्या है पागल राम, भात खाओगी?' और पुलिस वाले उसे डांट कर भगा देते हैं। यहां लेखक ने पुलिस की नियत पर संदेह करने का पर्याप्त मौका दिया है लेकिन रजुआ का उसे भात खाने के लिए पूछना, उसकी गहरी मानवीय संवेदना का परिचायक है। कहने का मतलब कि जिस सहानुभूति और संवेदना को उम्मीद हम तथाकथित सभ्य और पढ़े-लिखे लोगों से करते हैं, वहां हमें निराशा मिलती है और एक अनपढ़ तथा असभ्य कहा जाने वाला व्यक्ति अपनी मानवीय संवेदना से हमें प्रभावित कर लेता है। कहानी में रजुआ उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है। उसको खिलाने के लिए बाजार से कुछ खाद्य पदार्थ लाता है। यानी समाज ने जिसे पागल बना दिया है, लोगों ने उस पर ईंट पत्थर फेंके हैं, उसे रजुआ ने अपना कर एक नई जिंदगी देने का प्रयास किया है। क्या हम उसके इस प्रयास के महत्व को नजरअंदाज कर सकते हैं? अमरकांत ने यहां लोगों की यौन कुंठा तथा कामवासना की ओर भी संकेत किया है, जब पगली औरत के साथ रह रहे रजुवा को लोग मारपीट कर भगा देते हैं और अपनी वासना को तृप्त करते हैं। यह हमारे समाज की सच्चाई है जिसे लेखक ने बड़े प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई रेलवे स्टेशनों पर लावारिस या पगली स्त्रियां दिखाई पड़ती हैं जो नरक की जिंदगी की रही हैं। यह सरकार और समाज की जिम्मेदारी है कि उन्हें मनुष्य समझ कर एक सामान्य जीवन जीने का अवसर दे।




अमरकांत ने कहानी में कुछ लोक विश्वासों की भी चर्चा की है। उनमें एक है शनिचरी देवी का प्रकोप। जाति की डोमिन शनिचरी को एक डोम ने पीट कर मार डाला था। कुछ ही दिनों बाद वह चेचक से मर गया। लोगों ने शनिचरी माता का चबूतरा बनवाया और पूजने लगे। शनिचरी के बारे में लेखक का कहना है कि वह ताड़का की तरह लंबी तगड़ी और लड़ने में उस्ताद थी। वह किसी से भी नहीं डरती थी और नित्य ही किसी न किसी से मोर्चा लेती थी। वह रोज जल चढ़ाता है कि जिस बरन की बहू ने उसकी मेहनत की कमाई के दस रुपए हड़प लिए हैं उसको देवी जरूर दंड देगी। हालांकि ऐसा कुछ होता नहीं है। यहां लेखक ने एक तरफ बरन की बहू की बेईमानी की ओर इशारा किया है जो हमारे समाज में प्रायः देखी जाती है तो दूसरी ओर निम्न वर्ग और वर्ण की शनिचरी देवी की प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया है, जो पुरुष वर्चस्व को चुनौती देती है। कहानी में 


उसकी उपमा तड़का से दी गई है जो मेरी समझ से उचित प्रतीत नहीं होता। वैसे वास्तविकता यह है कि बलिया शहर में एक मंदिर है जो 'शनिचरी का मंदिर' नाम से जाना जाता है, लेकिन है या शिव मंदिर, जिसे 'बलिया की नगरवधू' शनिचरी देवी ने बनवाया था। उसने अपने पैसे से शहर के एक नामी पी जी कॉलेज में एक हाल भी बनवाया था। इस तरह के कई लोक हित के कार्य उसने किए थे। 





'जिंदगी और जोंक' कहानी का अंतिम हिस्सा बड़ा भयावह है। मोहल्ले में लोगों के घर काम करते मनगढ़ंत कथा कहते और किसी का दिया उल्टा सीधा खाते-पीते रजुआ लोगों के मजाक या मनोरंजन का पात्र बनते अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहा था कि उसे हैजा हो गया। कहानी में इसका बड़ा वीभत्स चित्र खिंचा मिलता है। ऐसी स्थिति में कोई उसे अपने घर जगह नहीं देता है। हर घर से वह दुरदुराया जाता है। हमारे समाज की यह भी अमानवीय सोच कही जायेगी कि जब तक वह स्वस्थ है, लोग मनमाना काम लेते हैं और जैसे वह बीमार पड़ता है, लोग उससे पिंड छुड़ा लेते हैं। उसे शरण मिलती भी है तो एक खंडहर में। सूचना पा कर अस्पताल के दो मेहतर उसे गाड़ी में लाद कर ले जाते हैं और वह स्वस्थ हो कर फिर उसी खंडहर को अपना ठिकाना बनाता है। उसे खुजली भी होती है, लेकिन वह जिन्दगी से हार नहीं मानता। कहानी में सबसे दिलचस्प प्रसंग है- रजुआ का अपने गाँव अपनी मृत्यु की खबर भिजवाने का। अमरकान्त इस लोक-विश्वास का कहानी में सफल प्रयोग करते हैं कि यदि सिर पर कौआ बैठ जाय तो आदमी की मृत्यु हो जाती है, लेकिन यदि उसकी मृत्यु की झूठी खबर उसके घर पहुँचा दी जाय और उसके नाम पर किसी भी आँख से आँसू गिर जायें, तो मृत्यु की संभावना खत्म हो जाती है। रजुआ एक लड़के के द्वारा अपने गाँव रामपुर भजन राम बरई के नाम पोस्टकार्ड भिजवाता है कि "गोपाल मर गया।' कहानी के अंत में जब वह पत्र लेखक के सामने आ कर अपनी कथित मृत्यु का भेद खोलता है, तब पता चलता है कि दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों प्रकार के ताप सहते हुए भी जिन्दगी को जीने की कितनी बलवती इच्छा उसके मन में स्थायी रूप से समाई हुई है। वह दूसरा पोस्टकार्ड लिखवाता है, यह कहते हुए कि अब लिखिए कि गोपाल मरा नहीं है, वह जिन्दा है। घोर संकट या विपत्ति में जब लोगों के मुँह से अक्सर निकल जाता है कि 'मर जाते तो अच्छा होता', कहानी में रजुआ के मुंह से मरने की बात कभी नहीं सुनाई देती। वह कई प्रकार की मुश्किलों से भरी जिन्दगी को जीना चाहता है। आज जब कि लोग छोटी-छोटी परेशानियों से घबरा कर जिन्दगी से पलायन कर रहे हैं, रजुआ की जीने की आकांक्षा हमें संकटों से संघर्ष करने की सीख देती है। अमरकान्त ने कहानी के अन्त में ठीक ही लिखा है कि "मौत की भीषण छाया उसके मुख पर नाच रही थी और वह जिन्दगी से जोंक की तरह चिमटा था, लेकिन जोंक वह था या जिन्दगी? वह जिन्दगी का खून चूस रहा था या जिन्दगी उसका? मैं तय नहीं कर पाया।"




असल में रजुआ का संघर्ष मृत्यु से है, जीवन के लिए। मृत्यु बार-बार उसे परास्त करना चाहती है, लेकिन रजुआ की जिजीविषा से परास्त हो कर वापस लौट जाती है। घोर अभाव की स्थिति में वह अपनी क्षमता भर श्रम करता है और उसी की कमाई खाता है। दूसरे पर बोझ बन कर वह नहीं जीना चाहता।




'जिन्दगी और जोंक' कहानी का नैरेटर 'मैं' है। ऐसा लगता है कि लेखक की आँखों से सारी घटनाएँ देखी हुई हैं। इसे लेखक का अनुभूत सत्य भी कह सकते हैं, क्योंकि हर घटना का जो सूक्ष्म और जीवन्त चित्र कहानी में प्रस्तुत किया गया है, वह सिद्ध करता है कि लेखक उसमें खुद शामिल नहीं। कहानी में स्पष्ट रूप से दो वर्ग हैं-मध्य वर्ग और निम्न वर्ग। निम्न वर्ग में रजुआ और 'पगली' स्त्री है। मध्य वर्ग, जिसमें शिवनाथ बाबू, जमुना लाल, जंगी आदि हैं, सभी रजुआ को खटाते हैं। बहुत संभव है, अधिक खटने और भरपेट खाना न मिलने की वजह से रजुआ की हालत खराब, बार-बार खराब हो जाती है। मध्य वर्ग का केवल 'मैं' है जो रजुआ के प्रति सहानुभूति रखता है। इस 'मैं' को पत्नी का भी सहयोग मिलता है। रजुआ के माध्यम से लेखक कहना चाहता है कि ऐसे 'लगभग लावारिस' लोगों से किसी प्रतिरोध की कल्पना नहीं की जा सकती।




कहानी की भाषा अत्यंत सीधी सच्ची और सब की समझ में आने वाली है। उपमाओं के सटीक प्रयोग हमें आकर्षित करते हैं। लेखक ने कहानी में संवादों का बहुत कम प्रयोग किया है। रजुआ के माध्यम से हमारे मन में उन सभी लोगों के प्रति करुणा का भाव उत्पन्न होता है जिनका कोई माथ मालिक नहीं है ऐसे लोगों की स्थिति में परिवर्तन जरूरी है।




जमा करने भर से कुछ अधिक रुपया जमुना के हाथ पर रख देते हैं। यहाँ लेखक ने शकलदीप बाबू को पछताने का अवसर प्रदान किया है। पुरुष यदि थोड़ा समझदार और संवेदनशील हो तो परिवार की बिगड़ी स्थिति को बना लेने में देर नहीं लगती। मुख्तार साहब को अपनी गलती का एहसास होता है और जो आरोप उन्होंने अपनी पत्नी पर लगाये थे, उन सभी को खुद पर ले लेते हैं और धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। पति द्वारा अपनी गलती स्वीकार करने का जमुना पर असर यह होता है कि वह शकलदीप बाबू के प्रति ज्यादा ही उदार हो जाती है। रुपये-पैसे के अभाव में स्त्री-पुरुष की झुंझलाहट का जिस सफलता के साथ लेखक ने वर्णन किया है, उससे स्पष्ट है कि मध्यवर्गीय परिवार के मनोविज्ञान का उसका कितना गहन अध्ययन है। यहाँ लेखक यह भी बताना चाहता है कि पारिवारिक सम्बन्धों को बनाने-बिगाड़ने में रुपये पैसे की कितनी बड़ी भूमिका होती है।


यह पत्नी जमुना पर अपना सारा गुस्सा उतारने और जमुना के रोने-धोने का ही परिणाम है कि शकलदीप बाबू की बेटे के प्रति नकारात्मक सोच सकारात्मक रूप अख्तियार कर लेती है और बेटे की सुख-सुविधा के लिए यथाशक्ति प्रयास करने लग जाते हैं, जिससे उसकी पढ़ाई में कोई बाधा न हो। वे उसको सिगरेट पीने के लिए भी पैसे देते हैं। लेकिन कहानी में एक दिलचस्प ओर छोटा प्रसंग आता है छोटे बेटे टुनटुन का। वह चोरी-छिपे नारायण के लिए रखे मेवे खा लेता है। इस पर उसके माता-पिता द्वारा उसकी खूब पिटाई होती है। यह प्रसंग तो बहत छोटा है, लेकिन है बड़ा मार्मिक। क्या इसे जमुना और शकलदीप बाबू की क्रूरता कहेंगे या अभावजन्य विवशता? कहने का मतलब कि रुपये-पैसे के अभाव में आदमी कितना अमानवीय हो जाता है कि अपने छोटे-बेटे की मासूमियत का भी उसे ख्याल नहीं रहता।


कल्पना के आनन्द का भी अपना अलग महत्त्व है। अमरकान्त ने 'डिप्टी कलक्टरी' कहानी में इसका भरपूर उपयोग किया है। बेटा नारायण को जब साक्षात्कार के लिए बुलावा आता है, तो शकलदीप बाबू के साथ ही उनके हित-मित्र भी मान लेते हैं कि नारायण का डिप्टी कलक्टर बनना तय है। शकलदीप बाबू, जिनका कभी पूजा-पाठ में विश्वास नहीं था, बेटे के लिए रोज शिव मन्दिर में पूजा करने जाने लगे थे कि शायद इससे सफलता मिल जाय। हमारा धर्म-भीरु अंधविश्वासी मन संतान के सुखद भविष्य के लिए अपने जीवन का सब कुछ दाँव पर लगा देता है। शकलदीप बाबू को अपने पूजा-पाठ पर भरोसा होने लगा है। कहानी में लेखक ने एक लोक-प्रचलित विश्वास का भी उपयोग किया है कि 'सुबह का देखा सपना सच होता है।' नारायण के डिप्टी कलक्टर होने का सपना शकलदीप बाबू और नारायण की पत्नी निर्मला दोनों देखते हैं और वह भी सुबह-सुबह। अब इतने पर किसको संदेह रह जायेगा कि नारायण बाबू डिप्टी कलक्टर नहीं होंगे? कहानी का वह दृश्य बहुत परेशान करने वाला है, जब शकलदीप बाबू परिचितों से छिप-छिपा कर चलती ट्रेन के समानांतर दौड़ते-हांफते खिड़की से शिवजी का प्रसाद बेटे के हाथ में इस उम्मीद से थमा देते हैं कि इंटरव्यू देने जा रहा वह अबकी बार जरुर सफल होगा। 


शिक्षित समाज यह मान कर चलता है कि जिसका इंटरव्यू 40-45 मिनट तक चलता है उसके चयन की संभावना प्रबल होती है और जो अभ्यर्थी चार-पांच मिनट में ही भगा दिए जाते हैं, इसका मतलब साफ है की खानापूर्ति के लिए बुलाए गए हैं। नारायण बाबू का इंटरव्यू चूंकि 40 -45 मिनट तक चलता है इसलिए शकलदीप बाबू और कुछ अन्य लोगों को उनका चयन सुनिश्चित जान पड़ता है। शकलदीप बाबू का परिवार कार बंगला का ख्वाब देखने लगता है। खुद शकलदीप बाबू निर्मला को डिप्टाइन संज्ञा से विभूषित करते हैं। जमुना डिप्टी साहब की मां बन जाती हैं और पूरे घर का माहौल डिप्टीमय हो जाता है। जो शकलदीप बाबू नारायण को आरामतलब, लापरवाह और सिगरेट फूंकने वाला गैर जिम्मेदार लड़का मानते थे वहीं अब दूसरों के सामने अपने बेटे की तारीफ करते नहीं थकते। 


मध्य वर्ग की एक विशेषता है कि अपनी संतान का गुणगान वह दूसरों के सामने खूब बढ़ा-चढ़ा कर करता है।


में मुर्दनी छायी हुई थी। रसोई घर से धुआँ उठ उठकर सारे घर की साँस को घोट रहा था। कहीं कोई खटर-पटर नहीं हो रही थी। और मालूम होता था कि घर में कोई है ही नहीं। "इस प्रकार कहानी के अन्त में जिस तरह त्रासद सन्नाटे का वर्णन आता है, वह पाठक को मानवीय संवेदना की गहराई में ले जाता है। किसी भी परिवार के लिए इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जिस बेटे से डिप्टी कलक्टर बनने की उम्मीद थी, पिता को उस बेटे के मुख से कान सटाकर आश्वस्त होना पड़ता है कि उसकी साँस चल रही है कि नहीं। यहाँ डर और खुशी, दो परस्पर विरोधी भावों का लेखक ने जिस तरह संयोजन किया है, वह उसकी कलात्मक क्षमता का परिचायक है।


डिप्टी कलक्टरी' कहानी पढ़कर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह सिर्फ शकलदीप बाबू और नारायण की कहानी नहीं है, बल्कि यह समूचे मध्य वर्ग की कहानी है, जो आजाद भारत में आज भी रोजगार की तलाश में परेशान हाल है। हमारे देश में आज आत्महत्या करने वाले युवकों की संख्या बढ़ी है। चाहे मध्य वर्ग हो या निम्नवर्ग, बेरोजगारी की समस्या के सभी शिकार है।। उसके सामने आत्महत्याओं की बाढ़ को रोकना एक बड़ी चुनाती है। सरकारें तो अपने सही-गलत कार्यों के मिथ्या प्रचार में अरबों रुपये खर्च करने में बहादुरी दिखा रही हैं। युवा वर्ग के भविष्य की उन्हें चिन्ता नहीं है।



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