अमित कुमार सिंह का संस्मरण 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'

 

अमित कुमार सिंह 



पिता पुत्र का सम्बन्ध दुनिया का सबसे खूबसूरत सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध की खुशबू बिल्कुल अपनी अलग तरह की और बिलकुल अपना अलग अंदाज लिए होती है। जब तक पिता होते हैं तब तक पुत्र अपने को उस वृक्ष की घनी छांव में महसूस करता है जो हमेशा बेहतर ही करता रहता है। लेकिन एक दिन जब पिता अतीत हो जाते हैं पुत्र की दुनिया पूरी तरह सूनी हो जाती है। सब कुछ वीराना और खाली खाली लगने लगता है। उसे पहली बार महसूस होता है कि वह वाकई अकेला हो गया है। पिता के न होने से जो जगह रिक्त होती है उसे दुनिया का  कोई  सम्बन्ध और शब्द आजीवन भर नहीं पता।यानी वह जगह हमेशा के लिए रिक्त ही छूट जाती है। अमित कुमार सिंह हाल में ही दुःख के इस दौर से गुजरे हैं। अपनी अकथनीय अनुभूतियों को उन्होंने संस्मरणबद्ध करने की कोशिश की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अमित कुमार सिंह का संस्मरण 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'।



'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'


अमित कुमार सिंह



गहन दुःख में अंततः मौन ही शेष बचता है।


एक दिन पूर्व हुई पिता की मृत्यु से मानसिक स्तर पर अभी भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ता जैसी स्थिति थी।परंपरानुसार सारे कर्मकांड और प्रक्रियाएं करते जाने के बावजूद, मन इस दुःख को शायद स्वीकार नहीं कर पा रहा था। चिता जलाने के बाद रीति के मुताबिक़ गंगा स्नान और तर्पण की एक प्रक्रिया होती है। इसमें वही लोग भाग लेते हैं, जिनके पिता जीवित नहीं हैं। तर्पण के लिए गंगा तट पर इस पंक्ति में मेरे अलावा बड़े भाई, दो चाचा और उम्र में मुझसे छोटे तीन चचेरे भाई थे। जनवरी की उस ठंड में गंगा में डुबकी लगाने के बाद इस पंक्ति में खड़े स्वजनों को मैंने देखा, जिनके पिता इस दुनिया में नहीं थे। एक झटके जैसा महसूस हुआ कि मैंने क्या खो दिया। अपने उन चचेरे भाइयों के वे चेहरे आज मुझे पहली बार दिखे, जिनके पिता नहीं थे। जो मुझसे उम्र में कई साल छोटे थे। अपने पिता के न होने के बाद, इन भाइयों का लगाव और सम्मान हमारे पिता के प्रति हमसे तनिक भी कम नहीं था। गांव पर रहे लंबे वर्षों तक वे इन भाइयों के लिए पिता जैसे ही रहे। बहुत बंधन न भी रहा हो तो मौके बे मौके वही उनके अभिभावक की भूमिका में रहे। मेरे भीतर एक साथ उन सबके पिताओं के न होने का दुःख भर आया। मैंने उन लोगों को याद करने की कोशिश की, जिनके पिता जीवित नहीं हैं। उनके दुःख, उनकी पीड़ा को इससे पहले उसी सघनता से न समझ पाने का गिल्ट मेरे भीतर उभरा। मन में असंख्य पिताओं की मृत्यु का दर्द और उनकी अनुपस्थिति से उपजा अभाव जैसे एक साथ कचोट पैदा कर गया। ऐसे मौकों पर दुःख का अभिव्यक्त हो जाना अत्यंत सहज स्वाभाविक है। पर, उन भाइयों के दृढ़ चेहरों ने या उन्हें अपने पिता की याद न हो आए इस भय ने या दुनियादारी ने, पता नहीं क्यों,भीतर एक चीत्कार होने के बावजूद मेरे आंसू नहीं निकलने दिए।


पिछले पंद्रह सालों में, नौकरी में आने के बाद जब भी गांव गया, आने और जाने के बीच हमेशा एक भागदौड़ ही रही। घर के कई ज़रूरी ग़ैर ज़रूरी काम भी अगली बार गांव आने के भरोसे टाले जाते रहे। यह पहली बार था, जब तकरीबन पंद्रह दिन गांव पर रहा। इन पंद्रह वर्षों में सबसे ज़्यादा स्थिर, बग़ैर किसी भागदौड़ के। इस दौरान कुछ बातें बेहद गहराई से महसूस हुईं। यह समझ में आया कि पिछले सालों में टाले जाने वाले काम भागदौड़ की वज़ह से नहीं, पिता के होने के साहस से टाले जाते रहे। यह कचोट उठी कि इस घर में पिता के न रहने पर रहना, किस क़दर अपने ही घर में अजनबियत से भर जाने जैसा है। यह टीस उठती रही कि पिता के रहते हुए ऐसा स्थिरता भरा समय निकालने के बारे में क्यों नहीं सोचा। इस दौरान जब हर तीसरी बात किसी से पूछने की ज़रूरत पड़ रही है और आँखें पिता को ढूंढ़ रही हैं, वे नहीं हैं। अपने अब तक के जीवन में मैंने खुद को इस तरह लाचार कभी नहीं पाया। इतना विवश कि किसी से इस पीड़ा को कह भी न सकूं। इन कठिन दिनों में परिवार के सारे सदस्य एक साथ गांव पर रहे, शायद एक साथ होते हुए भी अलग-अलग। सबके अपने दुःख थे, गहन दुःख। सबकी अपनी स्मृति थी पिता के साथ। बहन को देखता हूं, अब वह छोटी नहीं रही। परछाईं की तरह लगी रह कर मां को संभालना और मां की ही तरह खड़ी रहकर दुनियादारी को संभालना। अपने दुःख को पीछे रख, यह साहस बनाए रखना ऐसे वक्त में कठिन होता है। लेकिन, पनियाई आंखों में दृढ़ता का भाव लिए वह बराबर खड़ी दिखती है। हम लोगों में छोटी होने के कारण वह पिता की लाड़ली बिटिया रही है। बचपन में उसे दुलारते हुए वे अक्सर कहा करते कि यह भगवान से मांगी हुई है। इस वक्त उसके दुःख का अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है, जब वह घर को घर की तरह नहीं, मायके की तरह देख रही होगी। पिता के जाने और मां के अकेले रह जाने के दोहरे दुःख (आशंका) से ग्रस्त मन। एक साथ वर्तमान और भविष्य की पारिवारिक स्थितियों को तौलता हुआ एक बेटी का मन। 


पिता के न रहने से घर का सूनापन बहुत बढ़ गया है। घर की हर बात में उनकी उपस्थिति है, उनके न होने की एक टीस भी। मुख्य सड़क से ही घर का लोहे का बड़ा सा चौड़ा गेट लगा हुआ है। भीतर बड़ी सी खाली जगह के बाद घर का बैठका शुरू होता है। मुखाग्नि देने के बाद पहने जाने वाली सफेद धोती वाली लुंगी और बनियान में, भाई को घर के बैठके में टहलते हुए देखता हूं। लुंगी पहनने के अभ्यस्त नहीं हैं, शायद इस वजह से धीरे-धीरे चलते हैं। उन्हें देखते हुए उसी बैठके में धीरे-धीरे टहलते हुए या आते जाते हुए पिता याद आने लगते हैं। जैसे पिता ही टहल रहे हों।भाई और पिता का चेहरा यूं भी मिलता जुलता है, दोनों एक दूसरे में मिल जाते हैं, धुंधली आकृति बन जाती है। आधे पिता की, आधी भाई की। ऐसा संभवतः आँखें डबडबा जाने से हो गया है। 


बड़े भाई पर आरंभ से ही पिता का अगाध स्नेह और विश्वास रहा। भाई हमेशा इस विश्वास पर खरे भी उतरे। उनके प्रति पिता के इस विश्वास को मैंने अक्सर उनकी बातों, उनके गर्व और विभिन्न अवसरों पर उनकी खुशियों में अभिव्यक्त होते हुए देखा है। मुझे याद नहीं कि पिता ने कभी उनके प्रति कोई नाराज़गी ज़ाहिर की हो। अपने प्रति कही अच्छी बातें कहीं और अधिक टीस पैदा करती हैं, जब वह प्रिय व्यक्ति हमारे बीच न रहा हो। ये तो पिता ही थे। इन पंद्रह दिनों में भाई के चेहरे पर वह पीड़ा दिखती रही। एक ऐसा बिछोह, जिसकी पूर्ति संभव नहीं होती। वे रहते तो यह बात कह लेता या वे रहते तो उनके लिए यह कर देता, जैसी भावनाएं अफ़सोस के रूप में मन को बेचैन किए रहती हैं। भाई की चुप्पी उनके दुःख की गहराई का पता देती है। गहरा दुःख व्यक्ति को नितांत अकेला कर देता है। घर का बड़ा होने के नाते अब उन्हें जिस भूमिका का निर्वाह करना है, वह पिता के न होने को क्षण भर भी भूलने नहीं देगा। यह पीड़ा उन्हें सहनी ही पड़ेगी और यह अनचाही भूमिका पिता की अनुपस्थिति में निभानी ही होगी।


सामाजिक तौर पर पिता की छवि हमेशा एक मिलनसार, अन्य लोगों के प्रति स्नेही और ईमानदार व्यक्ति की रही। गांव पर किसी के सामने जब वे हमारी तारीफ़ किया करते, मैं प्रायः झेंप जाता। लेकिन, आसपास व गांव के अन्य लोगों में अपने या भाई के प्रति स्नेह देख कर, पिता की प्रतिष्ठित सामाजिक छवि को ले कर गर्व मिश्रित प्रसन्नता का भाव उभर आता। इधर के खाली समय में ऐसा लगता, जैसे वह गौरव भाव छीन गया है।





सबसे अधिक चुप्पी और लाचारी मां के सामने जाने पर होती। इस परिस्थिति में उसे कैसे दिलासा दी जाए, इसका उपाय किसी तरह न सूझता। रोज़ सुबह साढ़े पांच छह बजे के आस-पास घंटे आध घंटे के लिए मां के पास बैठते। पचास पचपन सालों के पिता के साथ के एक झटके में छूट जाने पर कोई दिलासा काम नहीं आती। एक बात की याद उसके पास बैठते ही रोज़ हो आती, जिससे आज भी पीछा नहीं छूट पाया है। दाह संस्कार के बाद जब घाट से वापसी का समय हुआ, किसी ने सिंदूर वाला वह बड़ा सा डब्बा, "सिन्होरा" हाथ में देते हुए, गंगा में बहाने के लिए इशारा किया। मां के सिंदूर को गंगा में बहाते हुए मेरे मन में कैसे भाव थे, कहना बहुत मुश्किल है। जब भी किसी काम से मां के पास जाने की ज़रूरत होती, वह बात याद हो आती। जैसे कोई दोष लग गया हो। उसका सामना करने का मन नहीं होता। ऐसे कई दुःख थे, जिन्हें इस परिस्थिति में घर के किसी और सदस्य को बताना, उसकी पीड़ा को और बढ़ाना था। मां के दुःख के आगे तो खैर हमारा दुःख कहीं ठहरता ही नहीं था। 


पिता के श्राद्ध तक निभाई जाने वाली रीतियों में भरसक खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करता। पर, कोई न कोई ऐसी बात आ जाती, जहां पिता से पूछने की ज़रूरत होती। इस रिक्तता की पूर्ति न हो पाने की बेचैनी बराबर बनी रहती। इस बीच लोगों, रिश्तेदारों और अन्यान्य परिचितों के आने का क्रम बना रहा। पिता के साथ की साझी स्मृतियों से वे लोग हमें दिलासा और सीख देते। कुछ ऐसे व्यक्तियों से भी संपर्क हुआ, जो पिता की नौकरी के दौरान उनके साथी रहे और जिनसे हमारा कोई सीधा परिचय न था। पिता के बड़े सामाजिक दायरे के बारे में हमें मालूम था। पर, ऐसे लोगों के आने जाने से मुझे यह बराबर महसूस होता रहा कि लोगों से उनके संबंध, स्नेह के स्तर पर कहीं न कहीं विशिष्टता लिए हुए हैं। पिता की मृत्यु की ख़बर सुन कर हर दिन कोई न कोई आता रहा। इसी बीच किसी रोज़ एक ऐसे रिश्तेदार आए, जिन्हें हम नहीं पहचान पा रहे थे। बहुत शर्म और संकोच के साथ अपने एक अन्य संबंधी से मैने उनका परिचय पूछवाया। केवल मां उन्हें जानती थी। अपने निजी संपर्कों का एक बड़ा दायरा, मुझे अचानक बहुत छोटा लगने लगा। आने वाले समय में इन संबंधों की पूंजी को बचाए रखने का सबक तत्क्षण मिल गया।अन्यथा,अपनी सामाजिकता का थोड़ा बहुत गुमान तो मन में अब तक चला ही आता था। 


गांव घर के जीवन से जुड़ाव होने के बावजूद धीरे धीरे एक गैप निरंतर बढ़ता गया है। पिता की मृत्यु के कारण वहां बीतने वाले समय ने बहुत सारी चीजों पर सोचने के लिए बाध्य किया। दाह संस्कार से ले कर श्राद्ध के भोज तक, सैकड़ों कर्मकांडो से गुजरना हुआ। चिता की लकड़ी सजाते डोम से ले कर सेजदान की प्रक्रिया पूरी कराते पुरोहित तक, मृतात्मा के नाम पर भयभीत करने वाले इतने तरह के कार्य व्यापार हैं कि मन ऊब जाए। पर जब वे नहीं रहे, उनका मान रखने के लिए कहिए या मां को किसी बात की कमी न लगे, इसका ध्यान रखने के लिए या फिर सामाजिकता के लिहाज़ से ही सही, परंपरानुसार सब कुछ हुआ। पिता जब तक थे, ऐसी रीतियों परंपराओं के विरोध को ले कर उनसे ख़ूब बहस हुआ करती। इसके पीछे उनका प्रेमपूर्ण और मित्रवत व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण था। हमें उनसे किसी भी बारे में बात करने में संकोच, झिझक या भय जैसा नहीं रहा। मुझे याद है, जब किसी एक सामान्य किस्म के मुद्दे पर मेरे लिए गए निर्णय से वे बहुत खुश हुए थे। मैंने उनकी खुशी देख कर कहा कि आपसे कई मुद्दों पर असहमत होने के बावजूद मैं पाता हूं कि उम्र बढ़ने के साथ, मैं आप जैसा होता जा रहा हूं। पिता ख़ूब ज़ोर से हंसते और कहते : यह सब तुम्हारे अनुभव की सीख है, समय सबको सिखाता है। 


यह सब कुछ कहने करने से भी मन किसी भार से या उस दुःख से कहां मुक्त हो पाता है। जो खालीपन जीवन में आया, वह सारे दायित्व निभा देने के बाद भी जस का तस बचा रह गया। एक एक कर के हम सब अपने अपने रास्ते, अपने ठिकानों को लौट गए हैं। चलने से पहले पिता की एक सुंदर और मुस्कुराती तस्वीर उसी बैठके से लगी कोठरी में टांग आए हैं। यह वही कोठरी है, जो अब तक पिता के खैनी बनाते हाथों के ठोंकी जाने वाली आवाज़ से गूंजा करती थी और भीतर आंगन में मां को उनके बाहर बैठे होने का पता मिलता रहता था। तब भी पिता ही घर को देखते थे, अब भी शायद पिता ही घर को देखते हैं। यह तस्वीर देख कर पिता के अंतिम दिनों की बालसुलभ मुस्कान याद हो आती है। क्षण भर को मन खुश हो जाता है, फिर तत्क्षण उदासी घेर लेती है। स्वास्थ्य के बिगड़ने बनने के बीच, कुछ महीने पहले वे एक गीत गा रहे थे। मोबाइल में  रिकॉर्ड उनकी वे पंक्तियां ही सहारा बन कर रह गईं हैं :


"कौन कहता है कभी काली घटा छाई नहीं

राम औ घनश्याम पर क्या है विपद आई नहीं

याद है बन बन भटकना, जानकी रघुबीर का

बस नहीं चलता यहां, इंसान की तदबीर का.."


उनके इस गाए हुए को सुनता हूं, गाता हूं, गुनता हूं, देर तक रोता हूं, चुप हो जाता हूं। गहन दुःख में अंततः मौन ही शेष रहता है। सपने में पिता की वह मुस्कुराती तस्वीर दिखाई पड़ती है, जो बैठके की कोठरी में लगी हुई है। सपने में ही गांव पहुंच जाता हूं। तस्वीर पर धूल जमी हुई है। साफ़ करने के लिए तस्वीर उतारना चाहता हूं। पर, तस्वीर के पीछे चिड़िया ने घोंसला लगा लिया है। बिना उतारे ही हल्के हाथों से धूल साफ करता हूं। पिता के चेहरे को जैसे सहलाना चाहता हूं। तस्वीर के पीछे से चिड़िया फड़फड़ा कर उड़ती है। घबराहट में मेरी नींद खुल जाती है और सपना......! 


दिनेश कुशवाह की पिता से जुड़ी कविता की एक पंक्ति मन में चलने लगती है :


" विश्वास नहीं होता कि बप्पा सपना हो गए!"


#amit-kumar-singh-ka-sansmaran-man-ka-udas-kona-aur-pita-ki-tasweer



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)



सम्पर्क 

अमित कुमार सिंह

मोबाइल : 9407655400

टिप्पणियाँ

  1. भावपूर्ण। इससे सबको गुजरना है, यह भी सत्य है। दुःख के साथ यह खराब बात है, परम्पराओं का लम्बा और कठिन होना, यह बहूत तोड़ता है।
    संसार कठिनतम होता जा रहा है, कम उम्र में बच्चे बिना पिताओं के होते जा रहे हैं... संसार में दुख के अलावा कुछ न बचा अब...
    - पीयूष कुमार

    जवाब देंहटाएं
  2. मार्मिक आप अपने-आप को भाग्यशाली मान सकते है पिता का स्नेह और दुलार आप लम्बे समय तक अनुभव किए; कईयों के हिस्से मे केवल यादें होती है पिता का साया असमय ही छिन जाये वैसे लोगों के दु:ख को महसूस करके अपने को देख ।

    जवाब देंहटाएं
  3. बेहद दुःखद और मार्मिक चित्रण। फिर भी आप सौभाग्यशाली है कि आपके पास पिता की स्मृतियों की एक लम्बी श्रृंखला है। मेरे पास स्मृतियों के नाम पर केवल और केवल पिता की एक तस्वीर के सिवा और कुछ नहीं है।
    आपकी अभिव्यक्ति पिता के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि है।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही मार्मिक रचना। पढ़कर अपने पिता की याद हो आई

    जवाब देंहटाएं
  5. अंततः इस गोलार्ध के अंतिम छोर में मैने पाया एक ठिठुरती हुई मुस्कुराहट

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

हर्षिता त्रिपाठी की कविताएं