कँवल भारती का आलेख 'नौटंकी और सांग'
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| कंवल भारती |
नौटंकी उत्तर भारत की ख्यात नाट्य परम्परा है। पूर्व-आधुनिक भारत के किसान समाज में रची-बसी यह नाट्यकला जीवंत नृत्य, ढोल की थाप और बुलंद गायन से शुरू होती है। नगाड़े की थाप इसे अलग अर्थ प्रदान करती है। यह नाट्य परम्परा अपने आप में इस अर्थ में मौलिक है कि यह भारतीय जनजीवन में प्रचलित धार्मिक महाकाव्यों रामायण और महाभारत से इतर समकालीन जीवन और उसकी विडम्बना पर केन्द्रित होती है। इनकी कथाएँ अक्सर नाटकीय प्रेम प्रसंग में फंसी नायिकाओं के जीवन पर केंद्रित होती हैं। कैथरीन हैनसेन की नौटंकी पर एक महत्त्वपूर्ण किताब है 'ग्राउंड्स फॉर प्ले'। अपनी इस किताब में कैथरीन हैनसेन ने अपने शोध के आधार पर नौटंकी प्रदर्शन के विभिन्न तत्वों - संगीत, नृत्य, कविता, लोकप्रिय कथाएँ और लिखित ग्रंथों का वर्णन किया है। वे इस कला विधा के सामाजिक इतिहास का पता लगाती हैं और नौटंकी कथाओं में अर्थों के खेल का अन्वेषण करती हैं, विशेष रूप से उन तरीकों पर ध्यान केंद्रित करती हैं जिनसे राजनीतिक सत्ता, सामुदायिक पहचान और लैंगिक असमानता जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे इन कथाओं में प्रस्तुत किए जाते हैं। एक समय था जब नौटंकी कलाकारों की बहुत मांग थी, लेकिन अब इस कला के अस्तित्व के ऊपर भी खतरे मंडराने लगे हैं। कंवल भारती ने अपने आलेख 'नौटंकी और सांग' में कैथरीन हैनसेन की किताब के बहाने नौटंकी पर महत्त्वपूर्ण बात रखी है। कंवल भारती का विश्लेषण अपने आप में अलग और महत्त्वपूर्ण होता है। आज उनका जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की मुबारकबाद देते हुए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं उनका आलेख। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कँवल भारती का आलेख 'नौटंकी और सांग'।
'नौटंकी और सांग'
कँवल भारती
पिछले दिनों नौटंकी पर एक किताब पढ़ने को मिली : कैथरीन हैनसेन की ‘ग्राउंड फॉर प्ले’। 1992 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस से प्रकाशित यह उत्तर भारत के नौटंकी थिएटर के इतिहास पर बेजोड़ किताब है। इस किताब की शुरुआत मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शे’र से होती है, जिसमें वह कहते हैं कि यह दुनिया बच्चों का एक तमाशा है, जो रोज़ मेरे सामने होता है—
बाज़ीच-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे
यह शायद उसी अध्यात्मिक धारणा का भावानुवाद है कि संसार एक रंगमंच है, जहाँ हम सब अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाते हैं। बहरहाल, इस किताब में कानपुर की प्रसिद्ध नौटंकी अभिनेत्री गुलाब बाई और लखनऊ की नौटंकी अभिनेत्री मलिका बेगम के दो दुर्लभ साक्षात्कारों के साथ-साथ, जो नवभारत टाइम्स और धर्मयुग में छपे थे, नौटंकी का सांग और संगीत की धारा में विकास और इस धारा के कानपुरी तथा हाथरसी परम्परा के कवियों का भी उल्लेख किया गया है, जिनसे आज की पीढ़ी शायद ही परिचित है।
हैनसन के मुताबिक़, लोक थिएटर को ‘नौटंकी’ नाम पंजाब प्रांत में मुल्तान की एक राजकुमारी के नाम पर पड़ा, जिसका नाम ही नौटंकी या नौतन्फी था। नौ का मतलब है "नौ" और टैंक, चांदी की मुद्रा का एक माप जो लगभग चार ग्राम के बराबर होता है। इस प्रकार नौतम्फी या नौटंकी वह सुन्दरी है, जिसका वजन केवल 36 ग्राम था। ये नौटंकी मुल्तान की राजकुमारी थी, जो फूलों की तरह चमकती थी, परी जैसी थी, और जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। कहा जाता है कि वह पंजाब के एक नौजवान फूल सिंह की प्रेमिका थी, जो भूप सिंह का छोटा भाई था। उसकी कहानी आज भी सुनाई जाती है। लेकिन सच यह है कि वह फूल सिंह की प्रेमिका नहीं थी, बल्कि फूल सिंह उसे चाहता था, और उसे अपनी तदबीर से जीत कर लाया था। यह कहानी सच है या मिथक, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं मिलता। पर, नौटंकी राजकुमारी और फूल सिंह की प्रेम कहानी पर अनेकों क़िस्से देश भर में प्रचलित हैं। हरियाणा के प्रसिद्ध सांग लेखक-कवि लखमी चंद का पहला सांग नौटंकी नाम से ही है। सांग में फूल सिंह की भाभी उसे ताने दे कर घर से निकाल देती है कि ज्यादा सुघड़ औरत चाहिए तो जा नौटंकी को ब्याह के ला। जवाब में लखमी चंद के सांग में फूल सिंह कहता है—
बैरण ने ताह दिया धमका कै मनै तेरी सी आवै।
नौटंकी नै ब्याह के ल्यादे जब जी में जी आवै।।
कितना दुःख दे दिया डाण नै इसी उमर याणी नै।
धक्के दे कै घर तै ताह दिया उस मानस खाणी नै।
ताना मार दिया देवर कै उस भाभी मरज्याणी नै।
जै नहीं बोलणा आवै तै आपनी बंद राखै बाणी नै।
जै जगत बिलोवै पाणी नै तै फेर कित तैं घी आवै।।
नौटंकी राजकुमारी की कहानी भारतीय लोक में इतनी रची-बसी है कि शायद ही कोई प्रान्त और कोई भाषा हो, जिसमें यह लोकप्रिय न हो। प्रांत के हिसाब से राजकुमारी का नाम कुछ भी हो सकता है, कहीं वह शहजादी भी हो सकती है। फूल सिंह भी अनेक नामों से आ सकता है। मैंने स्वयं अपने बचपन में यह कहानी अपने दादा के मुख से सुनी थी, उसमें राजकुमारी नहीं, शहजादी थी।
कैथरीन हैनसन का कहना है कि 1951 से पहले किसी शब्दकोश में नौटंकी शब्द नहीं मिलता। केवल "लोक-नृत्य” या “ग्राम-नाटक" शब्द मिलता है। संपूर्ण हिन्दी शब्द सागर (1968) के दसों खंडों में नौटंकी का उल्लेख नहीं है। रामचंद्र वर्मा के प्रामाणिक हिन्दी कोश (द्वितीय संस्करण, 1951) में पहली बार इसकी परिभाषा मिलती है: "ब्रज क्षेत्र में होने वाला एक प्रकार का प्रसिद्ध नाटक, जिसमें नगाड़े के साथ अभिनय और चौबोलों (चौपाई नहीं) का गायन किया जाता है।" सबसे विस्तृत उल्लेख मानक हिंदी कोष (1964) के पांचवें संस्करण में मिलता है। उसके अनुसार, "आम लोगों के बीच खेला जाने वाला यह एक प्रकार का लोकनाट्य है, जिसका कथानक आम तौर पर रोमांटिक या मार्शल होता है, और जिसके संवाद पद्य में प्रश्न-उत्तर के रूप में होते हैं। इसमें संगीत की प्रधानता होती है और चौबोलों को ढोल या नगाड़ों के साथ एक विशेष लय में गाया जाता है।" इन परिभाषाओं के देर से आने की क्या वजह हो सकती है? हैनसन लिखते हैं कि इसकी वजह यही हो सकती है कि शब्दकोश-लेखकों के लिए यह लोक कला महत्वहीन रही होगी।
नौटंकी की खासियत यह थी कि वह प्रेम-कहानियों पर आधारित होती थी। उसमें वीर-रस की कथाएं शामिल नहीं की जा सकती थीं। ऐसा माना जाता है कि वीर-रस की कथाओं के लिए आल्हा छंद अस्तित्व में आया। हालाँकि आल्हा का पहला कवि जगनिक को माना जाता है, पर हिंदी में लोक-काव्य में आल्हा छंद मटरू लाल अत्तार ने लिखा। आल्हा-ऊदल की 52 लड़ाइयों की कहानियां मटरू लाल अत्तार ने 52 खंडों में लिखीं। मैं समझता हूँ कि लोक काव्य में यह सबसे बड़ा महाकाव्य है। लेकिन सांग या सांगीत शैली में सभी ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक कथाओं को शामिल किया गया। इस शैली में डाकू सुल्ताना, ध्रुव भक्त, राजा हरिश्चंद्र और तारामती, राजा भरथरी, पूरणमल, रामायण, महाभारत, हीर-रांझे के आख्यान मंच पर खेले गए।
कानपुर की मशहूर नौटंकी कलाकर गुलाब बाई का एक साक्षात्कार 1979 में नवभारत टाइम्स में छपा था, जिसमे वह अपने बारे में बताती हैं, “यह मेरे पचास साल के त्याग का नतीजा है। मेरे पिता एक गरीब किसान थे। उन्होंने ही मुझे 1929 में त्रिमोहन लाई की कंपनी में शामिल करवाया था। उस समय मेरी उम्र सिर्फ़ ग्यारह साल थी। त्रिमोहन जी के मार्गदर्शन में मैंने कंपनी में लगभग बीस साल काम किया। शुरुआत में मुझे लगभग 50 रुपये महीने मिलते थे, जो बाद में बढ़कर 2,000 रुपये हो गए।” किन्तु बाद में उन्होंने त्रिमोहन की कम्पनी छोड़ कर अपनी अलग कम्पनी बना ली थी। इसके बारे में उन्होंने बताया कि उनका यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण था। “मेरी बहन बालकनी से गिर गई थी और गंभीर रूप से घायल हो गई थी। त्रिमोहन जी से उसके इलाज के लिए पैसे मांगे। उन्होंने मुझे "कल फिर आना" कह कर टाल दिया। मैंने उनसे कई बार कहा कि उसकी हालत बिगड़ रही है, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी। इसलिए मैंने कंपनी छोड़ दी। बाद में मैं अपनी बहनों पान कुंवारी, नीलम, सुरैया और चंचला कुमारी के साथ मिल गई और हमने एक अलग कंपनी बनाई। हमने वेशभूषा और प्रॉप्स (रंगमंच की सामग्री) वगैरह का प्रबंध किया और शादी-ब्याह की पार्टियों में बजाना शुरू किया। दर्शकों ने हमारी तारीफ की। इस तरह, हमने अपनी लगन और दूसरों के आशीर्वाद से शुरुआत की।” यह पूछने पर कि अब तक उन्होंने कितने प्रदर्शन किए, गुलाब बाई ने कहा, “यह बताना मुश्किल है कि मैंने कितने प्रदर्शन किए हैं। लेकिन 1942 तक मैंने लगभग बीस हज़ार प्रदर्शन किए होंगे।”
फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी कहानी "तीसरी कसम" में जिस मथुरा मोहन नौटंकी कंपनी का जिक्र किया है, वह नाम “त्रिमोहन कम्पनी” से काफी मिलता-जुलता है।
लखनऊ की नौटंकी अभिनेत्री मलिका बेगम ने अपने साक्षात्कार में कहा, “पहले बड़े-बड़े अधिकारी हमें रोज बुलाते थे। वे नौटंकी कंपनी के प्रबंधकों को बुलाते थे और उन्हें जरूरी इंतजाम करने को कहते थे। फिर सभी बड़े अधिकारी, उनकी पत्नियाँ, सभी श्रेष्ठ सज्जन, सभी तरह के लोग आते थे।... जनता नौटंकी की बहुत शौकीन थी। जब भी कोई कार्यक्रम खत्म होता और हम बस या ट्रेन से निकल रहे होते, तो सभी छात्र, नेता वगैरह गुलदस्ते ले कर आते और हमें विदाई देते। इतना सम्मान, मैं आपको क्या बताऊँ?... जब हम मंच पर होते थे, तो घर पर एक लाश पड़ी हो सकती थी, लेकिन जब हम मंच पर जाते थे, तो हम सोचते थे कि अगर हम लैला का किरदार निभा रहे हैं, तो हम लैला हैं; अगर हम शिरीन का किरदार निभा रहे हैं, तो हम शिरीन हैं। हम अपनी रोजमर्रा की वास्तविकता को भूल जाते थे, चाहे हम जो भी हों।” यह पूछने पर कि आपकी कंपनी में कितने लोग थे, मलिका बेगम ने बताया, “उस समय, मज़दूरों को मिला कर, अस्सी लोग थे। यह कंपनी के आकार पर निर्भर करता था। अगर कंपनी छोटी थी, तो पंद्रह, बीस, पच्चीस आदमी; अगर बड़ी होती, तो अस्सी या सौ, मज़दूरों को मिला कर। हर बड़ी कंपनी में चार मैनेजर होते थे।” उस समय आप कितना कमाते थे? यह पूछने पर मलिका बेगम ने बताया, “कभी 2,500 रुपये महीना, कभी 2,000 रूपये।”
नौटंकी में काम करने वाले अन्य कलाकरों सहित, मंडली प्रबंधक का भी एक दिलचस्प साक्षात्कार उन्हीं दिनों ‘धर्मयुग’ में छपा था। उनसे पूछा गया था, “कभी आप यहाँ होते हैं, कभी आप वहाँ होते हैं। आपको यह सब घूमना कैसा लगता है?”
जवाब मास्टर सुरखी, नौटंकी अभिनेता और मंडली प्रबंधक ने दिया था, “मत पूछिए, श्रीमान, यह एक जिप्सी का जीवन है। आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कैसा होगा। ट्रक पर सभी टेंट लोड करना, यात्रा करना, किसी नई जगह पर कुआँ खोदना, पानी पीना। साइट का फैसला करना, फिर टेंट लगाना। लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। अब सारा बोझ मेरे कंधों पर है। जब मैं बाबू खान की कंपनी में मजदूर के रूप में काम करता था, तो मुझे कभी किसी चीज़ की चिंता नहीं होती थी। उन दिनों मैं दिखावा करता था और माँग करता था। अब मुझे अपने कलाकारों की सारी शान-शौकत सहनी पड़ती है। अब सारी जिम्मेदारी मेरी ही होती है। यह बहुत बड़ी परेशानी है, सर, इस कंपनी को चलाना। इसके अलावा, मुझे पुलिस, बॉस और शहरों में गुंडों से डराने-धमकाने और वसूली का सामना करना पड़ता है। उन्हें शो दिखाने के लिए मुफ्त पास दिलवाओ। और सबसे भारी टैक्स नौटंकी कंपनियों पर पड़ता है। यह सर्कस या ड्रामा कंपनियों से वसूले जाने वाले टैक्स से कहीं ज़्यादा है। कभी-कभी हम तूफ़ान में फँस जाते हैं और सारा सामान बर्बाद हो जाता है। रामपुर प्रदर्शनी में एक रात बहुत तेज़ बारिश हुई। पूछो ही मत! सारे टेंट उखड़ गए, सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया। हॉल में पानी भर गया। हज़ारों परेशानियाँ हैं, लेकिन हम उनके बारे में कैसे रो सकते हैं?”
नथाराम शर्मा ‘गौड़’ द्वारा रचित सांग ‘सुल्ताना डाकू’ के एक अंश से इस लेख को समाप्त किया जाता है। 'सुल्ताना डाकू' की नौटंकी इसी नाम के उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले में हुए एक वास्तविक डाकू की कहानी पर आधारित है। नौटंकी में पात्र आपस में कविता में बातें करते हैं। गाने में सारंगी, तबले, हारमोनियम और नगाड़े जैसे वाद्य इस्तेमाल होते हैं। 'सुल्ताना डाकू' नौटंकी में सुल्ताना अपनी प्रेमिका को समझाता है कि वह ग़रीबों की सहायता करने के लिए पैदा हुआ है और इसीलिए वह अमीरों को लूटता है। उसकी प्रेमिका नील कँवल कहती है कि उसे सुल्ताना की वीरता पर नाज़ है। यह संवाद बहरेतबील छंद में है, जिसमें रूहेलखंड की कुछ खड़ी बोली मिलती है-
सुल्ताना
प्यारी कंगाल किस को समझती है तू?
कोई मुझ सा दबंगर न रश्क-ए-कमर
जब हो ख़्वाहिश मुझे लाऊँ दम-भर में तब
क्योंकि मेरी दौलत जमा है अमीरों के घर
नील कँवल
आफ़रीन, आफ़रीन, उस ख़ुदा के लिए
जिसने ऐसे बहादुर बनाए हो तुम
मेरी क़िस्मत को भी आफ़रीन, आफ़रीन
जिस से सरताज मेरे कहाए हो तुम
सुल्ताना
पा के ज़र जो न ख़ैरात कौड़ी करे
उन का दुश्मन ख़ुदा ने बनाया हूँ मैं
जिन ग़रीबों का ग़मख़्वार कोई नहीं
उन का ग़मख़्वार पैदा हो आया हूँ मैं




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