रवि रंजन का आलेख 'स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता का समाजशास्त्र'
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| स्वप्निल श्रीवास्तव |
किसी भी दृश्य, घटना, परिस्थिति या व्यक्तित्व से संवेदनात्मक रूप से जुड़ कर ही कवि अपनी कविता का सृजन करता है। ये संवेदनाएं निजी अनुभूति होते हुए भी सार्वजनीन होती हैं। कविता तभी सही अर्थों में अपना अभिप्राय प्राप्त कर पाती है जब वह व्यापक सरोकारों से जुड़ती है। स्वप्निल श्रीवास्तव हमारे समय के ऐसे ही उम्दा कवि हैं जिनकी कविताओं के सरोकार व्यापक हैं। उनकी कविताएं भाषा का कोई जाल जंजाल नहीं रचतीं बल्कि एकदम सहज प्रवाह और सरल भाषा में वह कह डालती हैं जिसे कवि कहना चाहता है। आज का समय उत्तर आधुनिक (Post Modernism) से भी आगे उत्तर सत्य (Post Truth) का समय है। प्रतिबद्धताएं ही नहीं अवधारणाओं पर भी अब सवाल उठाए जाने लगे हैं। ऐसे समय के प्रवाह के दौर में भी स्वप्निल जी लोक से न केवल जुड़े हुए हैं बल्कि उसकी दिक्कतों और परिस्थितियों को वर्तमान के आलोक में देखें हैं। प्रख्यात विचारक रवि रंजन लिखते हैं 'आज के तथाकथित उत्तर-आधुनिक समय में जब इस लोक परंपरा के विघटन की प्रक्रिया तेज़ हुई है, स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता लोक को एक अवशेष (residue) की तरह नहीं, बल्कि एक सक्रिय सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ग्रहण करती है। यह लोक उनके यहाँ अतीत के नॉस्टेल्जिया में सीमित नहीं रहता, बल्कि वर्तमान की सामाजिक–राजनीतिक चुनौतियों से टकराते हुए नए अर्थ अर्जित करता है।' रवि रंजन ने स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं की गहन समाजशास्त्रीय पड़ताल करते हुए एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि रंजन का आलेख 'स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता का समाजशास्त्र'।
'स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता का समाजशास्त्र'
रवि रंजन
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में स्वप्निल श्रीवास्तव की उपस्थिति को केवल एक सक्रिय कवि की उपस्थिति के रूप में नहीं, बल्कि लोक-संवेदना और आधुनिक चेतना के बीच एक रचनात्मक सेतु के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। ऐसे समय में जब समकालीन कविता का बड़ा हिस्सा शहरी अनुभव, आत्मसंवेदी जटिलताओं और वैचारिक अमूर्तन की ओर अधिक झुक गया है, स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता लोक को एक जीवित सांस्कृतिक संरचना के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करती है। उनकी रचनात्मकता इस बुनियादी मान्यता से संचालित है कि लोक तत्त्व को न तो कृत्रिम रूप से कविता में आरोपित किया जा सकता है और न ही उसे किसी वैचारिक एजेंडे का उपकरण बनाया जा सकता है; वह केवल वहीं तक संभव है जहाँ तक कवि का जीवन स्वयं लोकानुभव से निर्मित हो।
आनन्द केंटिश कुमार स्वामी ने लिखा है कि “हम लोकगीतों के ‘संरक्षण’ की चाहे जितनी बातें करते रहें, सच यह है कि हमारी जीवन-शैली ठीक उसी समय एक लोकगायक के अस्तित्व को लील रही होती है। हम अपने संग्रहालयों की शान में भले ही क़सीदे पढ़ते रहें, सच्चाई यह है कि वहाँ वही सबूत रखे होते हैं जिनकी वजह से एक सम्पूर्ण जीवन-शैली अपने अस्तित्व से बहिष्कृत कर दी जाती है।”
जाहिर है कि लोक कथाएँ, लोक गीत और लोक कविताएँ किसी एक ऐतिहासिक क्षण की उपज नहीं होतीं, बल्कि वे सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक अनुभव की दीर्घ परंपरा से निर्मित होती हैं। आज के तथाकथित उत्तर-आधुनिक समय में जब इस लोक परंपरा के विघटन की प्रक्रिया तेज़ हुई है, स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता लोक को एक अवशेष (residue) की तरह नहीं, बल्कि एक सक्रिय सांस्कृतिक शक्ति के रूप में ग्रहण करती है। यह लोक उनके यहाँ अतीत के नॉस्टेल्जिया में सीमित नहीं रहता, बल्कि वर्तमान की सामाजिक–राजनीतिक चुनौतियों से टकराते हुए नए अर्थ अर्जित करता है।
उनका पहला काव्य-संग्रह ‘ईश्वर एक लाठी है’ (1982) लोक और सत्ता, आस्था और हिंसा, तथा साधारण जन और संस्थागत शक्ति के द्वंद्व को उद्घाटित करता है। इसके बाद ‘ताख पर दियासलाई’ (1992) में यह लोक-संवेदना और अधिक सूक्ष्म रूप ग्रहण करती है, जहाँ अल्प अनुभवों और साधारण वस्तुओं के माध्यम से व्यापक सामाजिक संरचनाओं की आलोचना संभव होती है। ‘मुझे दूसरी पृथ्वी चाहिए’ (2004) में लोकानुभव वैश्विक मानवीय संकटों—पर्यावरण, विस्थापन और अस्तित्व—से जुड़ कर एक विस्तृत नैतिक विमर्श का रूप ले लेता है। ‘ज़िंदगी का मुक़दमा’ (2010) और ‘जब तक है जीवन’ (2014) तक आते-आते उनकी कविता में लोक जीवन न्याय, उत्तरदायित्व और प्रतिरोध के सवालों से गहराई से जुड़ जाता है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता का लोक किसी “शुद्ध” या “स्थिर” सांस्कृतिक इकाई के रूप में उपस्थित नहीं होता, बल्कि वह ऐतिहासिक, सामाजिक और वैचारिक प्रक्रियाओं से निर्मित एक गतिशील संरचना हुआ करता है। यहाँ लोक अनुभव काव्यात्मक प्रतिबद्धता (poetic commitment) में रूपांतरित हो जाता है। वे लोक के नाम पर यथास्थिति का समर्थन करने के बजाय उसमें परिवर्तन की संभावनाओं की तलाश करते हैं—यही उनकी कविता को आलोचनात्मक बनाता है और उसे सामाजिक हस्तक्षेप की संभावनाओं से लैस करता है।
कविता के साथ-साथ गद्य में भी उनकी लोक-संवेदना समान रूप से सक्रिय है। उनके कहानी-संग्रह ‘एक पवित्र नगर की दास्तान’ और ‘स्तूप और महावत’ में लोक, इतिहास और स्मृति के जटिल अंतर्संबंधों की पड़ताल की गयी है। ये रचनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि लोक केवल ग्रामीण या परंपरागत जीवन तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म और इतिहास से टकराने वाला एक आलोचनात्मक क्षेत्र भी है। उनका संस्मरण ‘जैसा मैंने जीवन देखा’ आत्मकथात्मक होते हुए भी निजी अनुभव को सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों से जोड़ता है, जिससे वह एक जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ग्रहण कर लेता है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की रचनात्मकता को साहित्यिक जगत में व्यापक मान्यता प्राप्त हुई है। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, फ़िराक़ सम्मान और केदार सम्मान जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया गया है। इसके अतिरिक्त रूस के अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान से सम्मानित किया जाना इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि उनकी कविता की संवेदना केवल भाषाई या राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सार्वभौमिक मानवीय अनुभव से संवाद स्थापित करने की क्षमता रखती है। ये पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि उनकी काव्य-दृष्टि और रचनात्मक हस्तक्षेप की साहित्यिक स्वीकृति हैं।
भाषा के स्तर पर स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता किसी अलंकारिक चमत्कार या बौद्धिक दुरूहता पर निर्भर नहीं करती। दिनकर के शब्दों में कहें तो ‘सच्चाई की पहचान कि पानी साफ़ रहे’ को उदाहृत करती उनकी भाषा की सरलता दरअसल एक अर्जित सादगी है, जो लोकभाषा, जीवनानुभव और नैतिक विवेक के गहरे संयोग से उत्पन्न होती है। यह सरलता पाठक को कविता से अलग नहीं करती, बल्कि उसे कविता के भीतर प्रवेश करने का अवसर देती है। इस प्रकार उनकी कविता संप्रेषणीय होते हुए भी वैचारिक रूप से सघन बनी रहती है।
वस्तुत: स्वप्निल श्रीवास्तव समकालीन हिंदी कविता में उस काव्य-परंपरा के प्रतिनिधि कवि हैं जो लोक से कट कर आधुनिक होने के भ्रम में नहीं पड़ती, बल्कि लोक के भीतर रह कर आधुनिकता की आलोचना करती है। उनकी कविता यह सिद्ध करती है कि लोक तत्त्व न केवल सौंदर्य का स्रोत है, बल्कि वह सामाजिक आलोचना, नैतिक हस्तक्षेप और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की एक प्रभावशाली शक्ति भी हो सकता है।
इस आलेख में साहित्य के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की पद्धति का उपयोग करते हुए नमूने के तौर पर उनकी कुछ ऊपर से सहज-सरल प्रतीत होने वाली, पर गहन संरचना में पैठने पर बेहद गंभीर कविताओं की पाठ-केन्द्रित अर्थ-मीमांसा एवं मूल्यांकन प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है :
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| 1982 |
(एक)
कोई किसी को इस
डर से नहीं बुलाता
कि कहीं वह आ न जाये
न बुलाने के बहाने इतने
स्वाभाविक बनाये जाते हैं
कि आदमी आने से इनकार
कर दे
न मिलने-जुलने के इतने
पुख्ता इंतज़ाम किये जाते हैं
कि मिलने को कोई गुंजाइश
नहीं बचती
आप किसी शहर में जायें और
कोई मित्र मिल जाय तो
घर न जाने के इतनी संजीदा
वजहें गिनाई जाती हैं कि
सारा किस्सा खत्म हो जाता है
हम सब मिल कर ऐसा समाज
बना रहे हैं जिसमें मुलाक़ातों की
जगहें कम होती जा रही हैं।
स्वप्निल श्रीवास्तव
अपनी वैधानिक एवं भाषिक संरचना या निर्मिति में सहज-सरल प्रतीत होती स्वप्निल श्रीवास्तव के इस असाधारण कविता की अन्तर्वस्तु हमारे समय का बहुत बड़ा मनो-सामाजिक संकट है। यह कविता समकालीन भारतीय समाज में मानवीय संबंधों के बदलते स्वरूप पर एक शांत लेकिन गहरी टिप्पणी है। कवि किसी असाधारण घटना या निजी पीड़ा का वर्णन नहीं करता, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहार में रच-बस चुकी उस मानसिकता और सामाजिक व्यवहार को सामने लाता है, जिसमें मनुष्य की आपस में दूरी, औपचारिकता और एक-दूसरे से भेंट-मुलाक़ात को टालना सामान्य हो गया है, जिसकी ओर बहुत पहले इंगित करते हुए मुज़फ्फरपुर निवासी तथा नई कविता और नवगीत के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रसिद्ध कविवर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने 'उजली कसौटी' कविता संग्रह में 'आदमी धुएं के हैं' कविता लिखी है. स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता वर्तमान संकट को सभ्यता के संकट के रूप में रेखांकित करने के दौरान इल्ज़ामतराशी से बचती हुई इसे सामूहिक स्वीकारोक्ति का स्वर देती है, जिसमें ‘कोई’ अंततः ‘हम सब’ में बदल जाता है। यही सहजता इस कविता को गहरी सामाजिक अर्थवत्ता प्रदान करती है।
एमिल दुर्खाइम के समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के आलोक में देखें तो यह कविता आधुनिक समाज में सामाजिक एकजुटता के क्षरण की स्थिति को प्रकट करती है। दुर्खिम के अनुसार समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि नैतिक संबंधों की एक संरचना है। जब ये संबंध कमजोर पड़ते हैं, तब समाज 'एनॉमी' (Anomie) की स्थिति में पहुँचने के लिए अभिशप्त हो जाता है, जहाँ सामाजिक व्यवहार तो जारी रहता है, पर उसके पीछे का नैतिक सत्त्व समाप्त हो जाता है।
इस कविता में लोगों का एक-दूसरे को न बुलाना, आपस में न मिलना और मिलने की संभावनाओं को पहले ही निष्फल कर देना इसी एनॉमिक अवस्था के लक्षण हैं। यहाँ लोग सामाजिक नियमों का उल्लंघन नहीं कर रहे, बल्कि उन्हीं नियमों और बहानों के सहारे संबंधों से बच रहे हैं। यह स्थिति सामाजिक विघटन ही नहीं, बल्कि सामाजिकता के अंत का दुष्परिणाम है।
दुर्खिम की दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि आधुनिक समाज में व्यक्ति की भूमिकाएँ बढ़ती जाती हैं, लेकिन भावनात्मक लगाव घटता जाता है। कविता में मित्र का मिल जाना एक स्वाभाविक मानवीय प्रसंग है, लेकिन उसे तुरंत औपचारिक कारणों से टाल दिया जाना अमानवीय व्यवहार है। यह बताता है कि सामाजिक जीवन अब भूमिका-आधारित और समय-संचालित हो गया है, जहाँ आकस्मिक मानवीय संपर्क असुविधा में बदल जाता है।
यदि मनोविश्लेषण की ओर बढ़ें, तो फ्रायड के सिद्धांत इस व्यवहार को दमन और रक्षा-तंत्र के रूप में समझने में मदद करते हैं। मिलना-जुलना, बातचीत और आत्मीयता मानवीय इच्छाएँ हैं, लेकिन आधुनिक सामाजिक ढाँचा इन्हें अव्यावहारिक या अनावश्यक घोषित करता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति इन इच्छाओं को दबा देता है। कविता में यह दमन सीधे इंकार के रूप में नहीं आता, बल्कि बहानों के रूप में सामने आता है। यह तर्कसंगतीकरण की प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने ही व्यवहार को सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनाता है। उसे डर इस बात का नहीं है कि कोई आएगा, बल्कि इस बात का है कि आने पर भावनात्मक और व्यवहारिक उत्तरदायित्व निभाना पड़ेगा।
इस बिंदु पर लाकां का मनोविश्लेषण कविता को और गहराई देता है। लाकां के अनुसार आधुनिक मनुष्य एक हद तक एक 'विभाजित स्व'(split personality) में बदल गया है, जो अपनी इच्छा और सामाजिक प्रतीकात्मक व्यवस्था के बीच फँसा हुआ है। कविता में ‘बुलाना’ और ‘न बुलाना’ केवल व्यवहार नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक क्रियाएँ हैं। व्यक्ति दूसरे को नहीं, बल्कि दूसरे की अपेक्षा, उसकी उपस्थिति और उसके द्वारा उत्पन्न भावनात्मक दबाव से डरता है। लाकां के सिद्धांत की रोशनी में यह डर ‘दूसरे’ का डर है, जो व्यक्ति की सुव्यवस्थित, नियंत्रित दुनिया में हस्तक्षेप कर सकता है।
कविता में आज के तथाकथित उत्तर-आधुनिक मनुष्य का बार-बार दिखाई देने वाला योजनाबद्ध व्यवहार इस बात का संकेत है कि सामाजिक जीवन अब अत्यधिक प्रतीकात्मक होता चला जा रहा है। भेंट-मुलाक़ात अब सहज अनुभव के बजाय एक ऐसी घटना बन गयी है, जिसके लिए मानसिक तैयारी, समय और ऊर्जा चाहिए। लाकां के अनुसार जब प्रतीकात्मक व्यवस्था ज़रूरत से ज़्यादा हावी हो जाती है, तब समाज में वास्तविक अनुभव के लिए जगह कम होती जाती है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ इसी वास्तविक अनुभव के लुप्त होने की ओर इशारा करती हैं। कवि बगैर इत्तला दिए चुपचाप हमें सावधान करता प्रतीत हो रहा है कि मुलाक़ातों की जगहें केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी हैं, जो धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं।
इस कविता के मनो-सामाजिकी की पड़ताल करते हुए यह स्पष्ट होता है कि यह केवल व्यक्तिगत अकेलेपन की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि सामूहिक रूप से गढ़ी जा रही समाज के स्वस्थ विकास के लिए घातक सामाजिक संरचना की आलोचना है। यहाँ अकेलापन थोपा हुआ नहीं है; यह चुना हुआ, व्यवस्थित और तर्कसंगत बनाया गया अकेलापन है। स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता इसी विडंबना को उजागर करती है कि हम सब मिल कर ऐसा समाज रच रहे हैं, जहाँ मनुष्य से बचने के लिए मनुष्य ही सबसे मजबूत बहाना बन गया है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता इसी विषय पर बहुत पहले रची गई टी. एस. एलियट की कविता 'द लव सॉन्ग ऑफ़ जे. अल्फ़्रेड प्रुफ़्रॉक' की याद दिलाती है। दोनों रचनाएँ आधुनिक समाज में मानवीय संबंधों के क्षरण, संवादहीनता और योजनाबद्ध दूरी को अलग-अलग सांस्कृतिक संदर्भों में लेकिन आश्चर्यजनक समानता के साथ व्यक्त करती हैं।
कहना न होगा कि भारत समेत तमाम विकासशील देशों में सभ्यता का जो संकट आज मंडरा रहा है वह पश्चिम में बहुत पहले घटित हो चुका है।
एलियट की कविता का नायक प्रुफ़्रॉक लोगों के बीच रहते हुए भी उनसे मिलने, बोलने और संबंध बनाने में असमर्थ है। वह बार-बार स्वयं से पूछता है कि क्या उसे “डिस्टर्ब द यूनिवर्स” करना चाहिए, यानी क्या उसे किसी मुलाक़ात, किसी संवाद या किसी भावनात्मक पहल की हिम्मत करनी चाहिए। स्वप्निल की कविता में भी यही भय दिखाई देता है, लेकिन वहाँ यह भय किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यहाँ पूरा समाज ही इस मानसिकता को अपनाए हुए है। प्रुफ़्रॉक अकेला है, स्वप्निल की कविता में अकेलापन सामूहिक है। एलियट के यहाँ दूरी का कारण भीतर का संकोच, आत्म-संदेह और अस्तित्वगत असुरक्षा है। प्रुफ़्रॉक डरता है कि लोग क्या कहेंगे, कैसे देखेंगे, कैसे परखेंगे।
स्वप्निल जी की कविता में यह डर और अधिक व्यावहारिक और सामाजिक रूप ले लेता है। यहाँ लोग इसलिए नहीं मिलते कि कहीं मिलना पड़ न जाए, कहीं समय देना न पड़ जाए, कहीं संबंध निभाने की जिम्मेदारी न आ जाए।
एलियट के पात्र मानसिक द्वंद्व में फँसे हैं, जबकि स्वप्निल श्रीवास्तव हमारे जिस भारतीय समाज के एक बड़े कवि हैं, उसने उस द्वंद्व को सामाजिक आदत में बदल दिया है।
दोनों रचनाओं में परिवेश का महत्त्व भी ध्यान देने योग्य है। एलियट की कविता में ड्रॉइंग रूम, चाय की मेज़, गलियाँ और कमरे हैं, जहाँ लोग मौजूद हैं लेकिन संवाद अनुपस्थित है। स्वप्निल जी की कविता में शहर है, मित्र है, घर है, लेकिन मुलाक़ात की जगह नहीं बची है। दोनों ही रचनाएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि आधुनिक सभ्यता में भौतिक निकटता भावनात्मक निकटता की गारंटी नहीं रही।
मनो-सामाजिक दृष्टि से देखें तो एलियट का प्रुफ़्रॉक लाकां के 'विभाजित स्व' का प्रतिनिधि है, जो अपनी इच्छा और सामाजिक प्रतीकात्मक व्यवस्था के बीच फँसा हुआ है। स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता उसी विभाजन को सामूहिक स्तर पर दिखाती है। यहाँ हर व्यक्ति भीतर कहीं जुड़ना चाहता है, लेकिन सामाजिक ढाँचा और जीवन-शैली उस इच्छा को लगातार टालने और दबाने के लिए प्रेरित करती है। फर्क यह है कि एलियट की कविता उस पीड़ा को भीतर से महसूस कराती है, जबकि स्वप्निल की कविता उसे सामाजिक व्यवहार के रूप में सामने रखती है।
एक और महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि एलियट की कविता में एक प्रकार का आत्म-बोध और दुख की स्वीकृति है। प्रुफ़्रॉक जानता है कि वह चुक रहा है, वह बोल नहीं पा रहा और समय बीतता जा रहा है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में यह आत्म-बोध लगभग अनुपस्थित है। यहाँ लोग दुखी होने के बजाय व्यवस्थित हैं। वे बहाने बनाते हैं, इंतज़ाम करते हैं और इस व्यवस्था को सामान्य मान लेते हैं। लोगों का इतनी मोटी चमड़ी वाला (Thick skinned) या संवेदनहीन हो जाना इस कविता की सबसे बड़ी सामाजिक चिंता है।
इस प्रकार स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में एलियट रचित समाज से भिन्न और बहुत बाद के भारतीय समाज का संकट पुनर्रचित है। एलियट उस व्यक्ति की त्रासदी दिखाते हैं जो संबंध चाहता है लेकिन कर नहीं पाता, जबकि स्वप्निल उस समाज की त्रासदी दिखाते हैं जो संबंध से बचने की कला में निपुण हो चुका है। दोनों रचनाएँ मिलकर यह स्पष्ट करती हैं कि आधुनिक सभ्यता में अकेलापन अब केवल निजी अनुभव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संरचना बन चुका है।
प्रसंगवश टी. एस. एलियट की "The Love Song of J. Alfred Prufrock" कविता का विद्वान-आलोचकों द्वारा एक सर्वाधिक उद्धृत और विषय की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंश देखा जा सकता है:
“There will be time, there will be time
To prepare a face to meet the faces that you meet;
There will be time to murder and create,
And time for all the works and days of hands
That lift and drop a question on your plate;
Time for you and time for me,
And time yet for a hundred indecisions,
And for a hundred visions and revisions,
Before the taking of a toast and tea.”
(अभी समय है, बहुत समय है
उन चेहरों से मिलने के लिए एक चेहरा तैयार करने का
जिनसे तुम्हें मिलना है;
मार डालने का भी समय है, रचने का भी समय है,
हाथों के उन सभी कामों और दिनों के लिए समय है
जो तुम्हारी थाली में सवाल उठा कर फिर रख देते हैं;
तुम्हारे लिए भी समय है, मेरे लिए भी समय है,
और सौ असमंजसों के लिए भी अभी समय है,
सौ कल्पनाओं और सौ संशोधनों के लिए भी,
चाय और टोस्ट लेने से पहले)
यह अंश इसलिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहीं एलियट आधुनिक मनुष्य की उस मानसिक स्थिति को रेखांकित करते हैं, जिसमें वह निरंतर टालता रहता है। “अभी समय है” कह कर वह हर मुलाक़ात, हर निर्णय और हर भावनात्मक पहल को भविष्य में सरकाता रहता है। यही प्रवृत्ति स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में सामाजिक स्तर पर दिखाई देती है, जहाँ लोग कोई न कोई बहाना बना कर मिलना-जुलना स्थगित कर देते हैं।
एलियट की इस कविता की एक पंक्ति आधुनिक जीवन की सबसे मार्मिक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों में गिनी जाती है:
“I have measured out my life with coffee spoons.” (मैंने अपने जीवन को कॉफ़ी के छोटे-छोटे चम्मचों से नाप लिया है।)
कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस एक पंक्ति में पूरा आधुनिक जीवन समाया हुआ है। जीवन यहाँ किसी बड़े उद्देश्य, गहरे अनुभव या निर्णायक क्षणों से नहीं मापा जा रहा, बल्कि रोज़मर्रा की नीरस, दोहरावपूर्ण और लगभग यांत्रिक आदतों से मापा जा रहा है। कॉफ़ी का चम्मच सुविधा, औपचारिकता और समय काटने के प्रतीक की तरह आता है—ऐसा समय जिसमें बातचीत है, लोग हैं, लेकिन सार्थक संवाद या आत्मीयता नहीं है।
यही भाव स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में सामाजिक स्तर पर फैलता हुआ दिखाई देता है। वहाँ भी जीवन बड़े संबंधों या मुलाक़ातों से नहीं, बल्कि बहानों, इंतज़ामों और टालने की रणनीतियों से मापा जा रहा है। फिर से कहना ज़रूरी है कि एलियट का प्रुफ़्रॉक अपने अकेलेपन को भीतर महसूस करता है, जबकि स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता उस अकेलेपन को सामूहिक आदत में बदलते हुए दिखाती है। इस प्रकार यह एक पंक्ति ऐतिहासिक विकास की दो अवधियों और दो भिन्न देशों में रची जाने के बावजूद दोनों रचनाओं के बीच एक गहरा भावनात्मक और वैचारिक सेतु निर्मित करती प्रतीत होती है।
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| 1992 |
(दो)
कोई चीज इतनी सुंदर हो
कि हम उसे इस डर से नहीं छूते
कि वह कलुषित हो जाएगी
और हम पाप के भागीदार हो जाएंगे
छूने का काम तो आंखें भी
कर सकती है, उससे किसी संक्रमण
का डर नही होता
चांद सितारों, पर्वतमालाओं और बादलों
को हम आंखों से छूते हैं और तृप्त
हो जाते हैं
कभी कभी आंखें हाथों से भी
ज्यादा कमाल करती हैं
वे हाथों से आगे की चींजों को
छू लेती हैं
सोचिए तो
दूर की चींजें समीप की चींजों
से ज्यादा नजदीक होती हैं
स्वप्निल श्रीवास्तव
स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता न केवल सौन्दर्य की अनुभूति का आख्यान है, बल्कि यह एक सामाजिक, नैतिक और दार्शनिक विमर्श भी प्रस्तुत करती है। कविता की मूल अंतर्वस्तु इस तथ्य पर केन्द्रित है कि सौन्दर्य किसी वस्तु या दृश्य का मात्र भौतिक अनुभव नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच संवेदनात्मक, नैतिक और सहजीवी सम्बन्ध का प्रतीक है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि जो कुछ भी मनुष्य के लिए सुंदर है, वह केवल देखने या छूने से अनुभव किया जाता है, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व और संवेदनात्मक सहभागिता के माध्यम से जीवन में गहराई प्राप्त करता है।
गौरतलब है कि इस कविता की अन्तर्पाठीयता उसके सामाजिक संदर्भ से गहरी जुड़ी हुई है। आज के मीडिया युग में अपराध, हिंसा और भय के निरंतर समाचार मानव चेतना में संवेदनात्मक दूरी उत्पन्न करते हैं। जैसे-जैसे हम हिंसक और बीभत्स समाचारों के लगातार संपर्क में आते हैं, हमारी नैतिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया सुन्न पड़ने लगती है। यही परिस्थिति स्वप्निल की कविता की पृष्ठभूमि में दृष्टिगोचर होती है। कविता का यह स्पष्ट संदेश है कि सौन्दर्य और संवेदनशीलता का अनुभव भय और कलुषित होने के डर से बाधित नहीं होना चाहिए। “छूने का काम तो आँखें भी कर सकती हैं” जैसी पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि अनुभव केवल कर्मेद्रियों तक सीमित नहीं, बल्कि दृष्टि संवेदनात्मक और नैतिक स्पर्श का माध्यम भी बन सकती है। आँखें यहाँ केवल देखने का साधन नहीं, बल्कि एक ‘भावनात्मक और नैतिक माध्यम’ बन जाती हैं, जो बिना अधिकार जताए सौन्दर्य को आत्मसात करती हैं।
सौन्दर्य की सामंती अवधारणा के विभिन्न उदाहरण वाल्मीकि, व्यास, भवभूति से ले कर अनेक संस्कृत साहित्य के ग्रंथों में भरे पड़े हैं। कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ में पार्वती के प्रसंग में कहा गया है कि सौन्दर्य वही है, जिसे प्रिय द्वारा सराहे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो -
“प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता”।
यहाँ सौन्दर्य किसी व्यक्ति या सत्ता की स्वीकृति पर निर्भर है और कहने की ज़रूरत नहीं कि यहाँ सन्दर्भ पितृसत्ता का है। सामंती सौन्दर्यबोध में वस्तु की सुंदरता तभी सार्थक मानी जाती है जब वह किसी प्राधिकार या शास्त्रोक्त मान्यता द्वारा स्वीकृत हो। जाहिर है कि स्वप्निल की कविता इस दृष्टिकोण का प्रतिरोध करती है। उनकी कविता में सौन्दर्य की स्वतंत्र सत्ता है, वह किसी की स्वीकृति का मोहताज नहीं, बल्कि उसकी उपस्थिति मात्र में ही पूर्णता है। छूने या केवल देखने का अनुभव इसे नष्ट या कलुषित नहीं करते, बल्कि उसे मानवीय और नैतिक दृष्टि से पूर्ण बनाते हैं।
हिन्दी साहित्य में जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की पंक्ति—
“उज्ज्वल वरदान चेतना का,
सौन्दर्य उसे सब कहते हैं”
सौन्दर्य को चेतना और आत्मबोध से जोड़ती है। स्वप्निल की कविता इसी दृष्टि को और समकालीन और व्यापक बनाती है। उनके यहाँ चेतना का सौन्दर्य न केवल आत्मिक है, बल्कि ‘सह-अस्तित्वमूलक’ है। यह मनुष्य के साथ-साथ वन्य प्रकृति, थलचर, नभचर और जलचर के जीवन को सहज बनाए रखने में सहायक है। कवि के इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि सौन्दर्य उपभोग, स्वामित्व या अधिकार का विषय नहीं, बल्कि संवेदनात्मक तादात्म्य और नैतिक सहभागिता का संकेतक है।
प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कांफ्रेंस (1936) में प्रेमचन्द ने रचनाकारों से सौन्दर्य की कसौटी बदलने का आह्वान किया था। उनके अनुसार सौन्दर्य केवल अभिजात वर्ग की रुचि या विलासिता का विषय नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष, श्रम और मानवीय पीड़ा से उत्पन्न होता है। स्वप्निल की कविता इसी परंपरा में खड़ी है। कविता में ‘कलुषित हो जाने’ का डर सामाजिक और धार्मिक संरचनाओं द्वारा सौन्दर्य को निषिद्ध या अपवित्र घोषित करने का प्रतीक है। कवि इस बद्धमूल धारणा को तोड़ता है और दिखाता है कि सौन्दर्य अपनी उपस्थिति मात्र में स्वतंत्र है।
कार्ल मार्क्स का कथन है कि “पूँजीवादी समाज में वस्तुएँ निर्माता पर हावी हो जाती हैं।” सौन्दर्य के पूँजीवादी वस्तुकरण (reification) की आलोचना करते हुए वाल्टर बेंजामिन ने लिखा है कि यांत्रिक पुनरुत्पादन के युग में कला अपनी आभा खो देती है। (“The work of art in the age of mechanical reproduction loses its aura”)
स्वप्निल जी की कविता में इस वस्तुकरण का प्रतिरोध स्पष्ट है। यहाँ सौन्दर्य वस्तुकरण के दायरे से बाहर है। विवेच्य कविता में अंतर्ध्वनि यह छिपी है कि चाँद, सितारे, पर्वत और बादल ऐसे सौन्दर्य हैं जिन्हें खरीदा या जिन पर किसी का अधिकार नहीं हो सकता। इस दृष्टि से यह कविता सौन्दर्य को उपभोग, स्वामित्व या बाजार के लाभ के दायरे से मुक्त करती है।
इमैनुएल कांट ने लिखा है कि सौन्दर्य वह है, जो बिना किसी स्वार्थ के आनंद देता है। (“Beauty is that which pleases without interest”)
यह कथन स्वप्निल की कविता के सौन्दर्यबोध की अवधारणा को पुष्ट करता है, क्योंकि कवि की दृष्टि में सौन्दर्य न तो अधिकार चाहता है, न लाभ, न भय और न कलुषित होने की आशंका पैदा करता है।
के. सी. डे कहते हैं कि सौन्दर्य कोई वस्तु नहीं, बल्कि देखने वाले और देखी जाने वाली वस्तु के बीच का सम्बन्ध है। (“Beauty is not an object but a relation between the observer and the observed”) यह दृष्टि स्वप्निल की कविता में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहाँ आँखें हाथों से अधिक सक्षम हैं, क्योंकि वे सौन्दर्य से सम्बन्ध बनाती हैं, न कि अधिकार।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सौन्दर्य का प्रयोग मानव चेतना की निर्मलता और आंतरिक शुद्धि के लिए किया गया है। वाल्मीकि रामायण के एक श्लोक में राम के आतंरिक एवं बाह्य सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनका मुख-मंडल चंद्रमा की किरण सा सुंदर ,अत्यंत प्रियदर्शी और सुंदरता और उदारता जैसे गुणों से इतना पूर्ण है कि वह स्त्रियों ही नहीं, अन्य पुरुषों की दृष्टि तथा चित्त को भी मोह लेने में समर्थ है :
चन्द्रकान्ताननं रामं अतिव प्रियदर्शनम् ।
रूपौदार्यगुणैः पुंसां दृष्टिचित्तापहारिणम् ॥
भक्ति काव्य में ईश्वर के रूप-सौन्दर्य का वर्णन केवल दृश्य आनंद नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि का माध्यम है:
“लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥”
रवींद्रनाथ टैगोर ने भी स्वीकार किया है कि सौन्दर्य जीवन की अभिव्यक्ति का सबसे शुद्ध रूप है। (“Beauty is the purest form of the manifestation of life”)
स्वप्निल की कविता इसी जीवंत सौन्दर्य-मूल्य को लौकिक धरातल पर पुनर्स्थापित करती है। यहाँ सौन्दर्य केवल देखने के लिए नहीं है, बल्कि जीवन के साथ सहभागिता, सहजीविता और नैतिक जुड़ाव का माध्यम है। विवेच्य कविता की संरचना मुक्तछंद वाली और भाषा सरल, कथनात्मक और प्रवाहमयी है। किसी अलंकारिक अतिशयोक्ति से बचते हुए इसमें काव्यानुभूति के सम्प्रेषण पर बल है। छोटे-छोटे वाक्य रचनानुभव और चिंतन को सहजता से जोड़ते हैं। कविता में आयी “कभी-कभी आँखें हाथों से भी ज़्यादा कमाल करती हैं” जैसी पंक्तियाँ अनुभव को दार्शनिक और संवेदनात्मक दोनों स्तरों पर खोलती हैं। इसी प्रकार स्वप्निल रचित “दूर की चीज़ें समीप की चीज़ों से ज़्यादा नज़दीक होती हैं”—जैसी पंक्ति केवल भौतिक दूरी का नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और नैतिक निकटता का संकेत है। इससे गुज़रते हुए महाकवि जायसी की याद न आए, यह मुमकिन नहीं :
कवि बियास रस कंवला पूरी। दूरहिं नियर नियर भा दूरी॥
नियरहीं दूरि फूल संग काँटा। दूरि जो नियरे जस गुड़ चांटा॥
अन्तर्पाठीयता के दृष्टिकोण से देखें तो कविता और उसका सामाजिक संदर्भ घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। मीडिया, उपभोक्तावाद और नैतिक पतन उपजी संवेदनात्मक दूरी को कविता पाटती है। अपराध, हिंसा और भय के लगातार समाचार मानव चेतना में दरार और संवेदनात्मक कुंठा पैदा करते हैं। कविता इन सामाजिक विसंगतियों के बीच सौन्दर्य के अनुभव और नैतिक प्रतिमान का माध्यम बनती है। कविता का अभिप्राय स्पष्ट है— सौन्दर्य वह नहीं है, जिससे भय उत्पन्न हो, बल्कि वह है, जो निकटता को संभव होने दे। पाठक को यह अनुभव कराने के लिए कविता का प्रभाव इतना गहन है कि वह अपने सौन्दर्यबोध और जीवन दृष्टि पर पुनर्विचार करने के लिए विवश होता है।
कुल मिला कर स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता सौन्दर्य की सामंती स्वीकृति, पूँजीवादी वस्तुकरण, परंपरागत आध्यात्मिक अवधारणाओं और सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध खड़ी है। यह कविता न केवल सौन्दर्य का वर्णन करती है, बल्कि उसे ‘मानवीय, नैतिक और सहजीवी मूल्य’ के रूप में प्रस्तुत करती है। कविता की अन्तर्वस्तु, संरचना, अभिप्राय और प्रभाव पाठक को सौन्दर्य और जीवन के बीच गहन दार्शनिक संवाद की ओर ले जाते हैं।
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| 2004 |
(तीन)
वे जहां भी जाते थे
झुक जाते थे
मूर्तियों के सामने झुकना
उन्हें विरासत में मिला था
उन्होंने इस परंपरा का विस्तार
किया और राजदरबार में भी
झुकने लगे
झुकना उनके लिए व्यायाम नहीं
अश्लीलता भी थी
बहुत सी चीजें बेपर्द हो
जाती थीं
कुछ भी गोपन नही रह
जाता था
पीठ के पठार के नीचे के
हिस्से दिखाई देते थे
इस कवायद में उन्हें वह सब
कुछ मिला जिसकी उन्होंने
कामना की थी
दिन रात झुकते झुकते
उनके घुटनों और रीढ़ की
हड्डियों में दर्द रहने लगा
राजवैद्य ने बताया कि यह दर्द
झुकने का नतीजा है
खड़ा होना भी सीखो
वे असमंजस में हैं कि झुके रहने से
जो कुछ मिला है
वह खड़े होने से गायब न
हो जाय।
मनुष्य का झुकने या तन कर खड़े होने को उसके नैतिक विवेक का परिचायक बताते हुए कवि स्वप्निल श्रीवास्तव रचित यह कविता हमारे समय-समाज में व्याप्त अवसरवाद और समझौतापरस्ती को प्रश्नांकित करती है। इस महत्त्वपूर्ण कविता का अंतःपाठीय आलोचनात्मक अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में ‘झुकना’ समकालीन भारतीय समाज के नैतिक संकट की एक तीव्र, व्यंग्यात्मक और रूपकात्मक अभिव्यक्ति है। यह कविता किसी एक व्यक्ति या परिस्थिति की कथा नहीं, बल्कि उस सामूहिक मानसिकता का दस्तावेज़ है जिसमें स्वाभिमान, आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता धीरे-धीरे अवसरवाद, समझौतापरस्ती और सत्ता-समीपता के आगे झुकती चली जाती है। कविता का केंद्रीय रूपक—‘झुकना’—एक साधारण शारीरिक क्रिया से निकल कर सामाजिक आचरण, नैतिक चुनाव और सार्वजनिक जीवन की प्रवृत्ति का संकेतक बन जाता है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह कविता उस प्रक्रिया को उद्घाटित करती है जिसमें व्यक्ति स्वाभिमान, नैतिक साहस और आत्मसम्मान का त्याग कर लाभ-लोभ के व्याकरण से परिचालित हो कर सुरक्षा और स्वीकृति के बदले आत्म-विसर्जन को जीवन की रणनीति बना लेता है।
एमिल दुर्खीम के अनोमी (anomie) सिद्धांत के आलोक में देखें तो यह कविता उस नैतिक शून्य की ओर संकेत करती है जहाँ परंपरागत मूल्य अपना नियामक बल खो देते हैं। कविता में ‘मूर्तियों के सामने झुकना’ एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में आता है, किंतु जब वही झुकना ‘राजदरबार’ तक विस्तृत हो जाता है, तब वह धार्मिक-सांस्कृतिक आस्था से फिसल कर सत्ता-केन्द्रित अवसरवाद में बदल जाता है। दुर्खीम के अनुसार, जब समाज में साझा नैतिक मानदंड कमजोर पड़ते हैं, तब व्यक्ति लाभ और हानि के तात्कालिक गणित से संचालित होने लगता है। कविता का पात्र इसी अनौमी की स्थिति में है—उसे पता है कि ‘खड़ा होना’ नैतिक रूप से सही है, पर उसे भय है कि इससे अर्जित सुविधाएँ नष्ट हो जाएँगी।
मैक्स वेबर के सत्ता और वैधता (authority and legitimacy) के सिद्धांत के संदर्भ में यह कविता करिश्माई और परंपरागत सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण की आलोचना करती है। ‘राजदरबार में झुकना’ उस सामाजिक मनोवृत्ति का संकेत है जिसमें सत्ता को प्रश्न करने के बजाय उसे देह से स्वीकार किया जाता है। वेबर के अनुसार, जब सत्ता आलोचनात्मक विवेक के बिना स्वीकार की जाती है, तब वह नैतिक अधीनता को जन्म देती है। कविता में झुकना ‘व्यायाम’ नहीं बल्कि ‘अश्लीलता’ बन जाता है—यह शब्द चयन इस बात को रेखांकित करता है कि सत्ता के सामने आत्म-नग्नता, आत्म-गोपन के अंत और आत्मसम्मान के विघटन की प्रक्रिया कितनी अपमानजनक है।
पियरे बोरदियो की प्रतीकात्मक हिंसा (symbolic violence) की अवधारणा भी इस कविता को समझने में सहायक है। झुकने की यह ‘कवायद’ बाहरी बल से नहीं, बल्कि आंतरिकीकृत सामाजिक अपेक्षाओं से संचालित है। पात्र स्वयं झुकता है, स्वयं लाभ पाता है और स्वयं ही शारीरिक-नैतिक पीड़ा भोगता है। सत्ता यहाँ दमनकारी कम और आकर्षक अधिक है—वह पुरस्कार देती है, सुविधाएँ देती है, और बदले में रीढ़ की हड्डी को धीरे-धीरे निष्क्रिय कर देती है। घुटनों और रीढ़ का दर्द केवल शारीरिक नहीं, बल्कि नैतिक अपंगता का संकेत है।
मिशेल फूको के शरीर और सत्ता (power over the body) के विचारों के अनुसार सत्ता व्यक्ति के शरीर को अनुशासित करती है। कविता में झुकता हुआ शरीर सत्ता के अनुशासन का दृश्य रूप है। शरीर की यह मुद्रा अंततः व्यक्ति की चेतना में उतर जाती है, जहाँ ‘खड़ा होना’ एक जोखिम भरा, लगभग असंभव विकल्प प्रतीत होने लगता है। राजवैद्य का ‘खड़ा होना भी सीखो’ कहना समाज के बौद्धिक वर्ग या नैतिक विवेक का प्रतीक है, पर उसकी सलाह सत्ता-लाभ की आदत के सामने कमजोर पड़ जाती है।
आलोचनात्मक रूप से यह कविता हमारे समय के मध्यवर्गीय और अभिजन सार्वजनिक जीवन की मानसिकता पर गहरी चोट करती है। यहाँ नैतिकता किसी आंतरिक मूल्य के रूप में नहीं, बल्कि एक विनिमेय वस्तु के रूप में उपस्थित है—जिसे सुविधाओं के बदले छोड़ा जा सकता है। कविता का अंतिम असमंजस—‘कि खड़े होने से सब कुछ गायब न हो जाए’—भारतीय सार्वजनिक जीवन की सामूहिक दुविधा है। यह दुविधा ही नैतिक पतन की सबसे बड़ी त्रासदी है, क्योंकि यहाँ गलत और सही का अंतर स्पष्ट होते हुए भी साहस का अभाव है। इस प्रकार स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय समाज का समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है। यह कविता बताती है कि जब झुकना जीवन-रणनीति बन जाए और खड़ा होना जोखिम, तब समाज धीरे-धीरे ऐसे नागरिक पैदा करता है जिनके पास मेरुदण्ड के सिवाय सब कुछ होता है।
कविता की शुरुआत “मूर्तियों के सामने झुकना / उन्हें विरासत में मिला था” जैसी पंक्तियों से होती है। यहाँ झुकना सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक विनय के रूप में स्वीकार्य है। किंतु जैसे ही यही झुकना “राजदरबार” तक पहुँचता है, उसका नैतिक अर्थ पूरी तरह बदल जाता है। अब यह झुकना आस्था नहीं, बल्कि सत्ता-सामने आत्मसमर्पण है। कविता का व्यंग्य यहीं से तीखा हो जाता है—झुकना अब ‘व्यायाम’ नहीं, बल्कि ‘अश्लीलता’ है, क्योंकि इसमें व्यक्ति का आत्मसम्मान निर्वस्त्र हो जाता है। सत्ता के सामने झुकते हुए “बहुत सी चीज़ें बेपर्दा हो जाती हैं” — यह पंक्ति बताती है कि अवसरवाद व्यक्ति के भीतर के गोपन, संकोच और नैतिक मर्यादा को समाप्त कर देता है।
यह भाव सीधे-सीधे भर्तृहरि की नीतिकाव्य-परंपरा से संवाद करता है। ‘नीतिशतकम्’ का एक श्लोक बहुत प्रसिद्ध है —
न नीचसेवां कुर्वीत वृत्तिहेतोरपि क्वचित्।
आकाशमिव पङ्केन न लिप्यन्ते महान्तः॥
(महान व्यक्ति आजीविका के लिए भी नीचों की सेवा नहीं करते; जैसे आकाश कीचड़ से लिप्त नहीं होता)
भर्तृहरि के यहाँ ‘नीच सेवा’ वही है जो स्वप्निल की कविता में ‘राजदरबार में झुकना’ है। दोनों ही स्थितियों में लाभ, सुरक्षा और सुविधा मिलती है, किंतु उसकी कीमत आत्मसम्मान के क्षरण के रूप में चुकानी पड़ती है। स्वप्निल की कविता यह दिखाती है कि यह झुकना धीरे-धीरे एक स्थायी जीवन-शैली बन जाता है—दिन-रात झुकते रहने से घुटनों और रीढ़ में दर्द होने लगता है। यह दर्द केवल शारीरिक नहीं, बल्कि नैतिक है। कविता की वैधानिक संरचना में निर्णायक मोड़ तब आता है जब ‘राजवैद्य’ सलाह देता है—“खड़ा होना भी सीखो।” यह वाक्य समकालीन समाज में बौद्धिक विवेक, नैतिक चेतना और आलोचनात्मक बुद्धि का प्रतीक है। किंतु कविता का पात्र असमंजस में है कि यदि वह खड़ा हुआ, तो झुक कर जो कुछ पाया है, वह कहीं खो न जाए। यही असमंजस आधुनिक सार्वजनिक जीवन का केन्द्रीय प्रश्न है। इस बिंदु पर चाणक्य नीति का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है—
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
(कुल के लिए एक को छोड़ा जा सकता है, ग्राम के लिए कुल, जनपद के लिए ग्राम; पर आत्मा के लिए पूरी पृथ्वी भी छोड़ी जा सकती है।)
चाणक्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि आत्मा—अर्थात् स्वाभिमान और नैतिक अस्मिता—सबसे ऊपर है। स्वप्निल की कविता का पात्र इसी निर्णय से डरता है। वह जानता है कि खड़ा होना नैतिक रूप से सही है, पर सत्ता-संरक्षित लाभों के खोने का भय उसे लगातार झुकाए रखता है। यह भय ही नैतिक पतन का वास्तविक कारण है।
इस कविता को यदि राजेश जोशी की ‘झुकना’ कविता के साथ पढ़ा जाए, तो ‘झुकने’ के अर्थ का एक दूसरा, सकारात्मक पक्ष सामने आता है। राजेश जोशी लिखते हैं—
“झुकता हूँ
जैसे शब्दों को पढ़ने के लिए आँखें झुकती हैं
ताक़त और अधीनता की भाषा से बाहर भी होते हैं
शब्दों और क्रियाओं के कई अर्थ”
गौरतलब है कि यहाँ झुकना सत्ता के सामने आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि जीवन, श्रम और भाषा के प्रति विनय है। राजेश जोशी उसी भेद को स्पष्ट करते हैं जो भारतीय शास्त्रीय परंपरा में विनय (humility) और दासता (servility) के बीच का भेद के रूप में भी मिलता है। कालिदास के ‘रघुवंशम्’ में सत्ता का आदर्श इसी विनय और शील पर आधारित है—
त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम्।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम्॥
(रघुवंशी राजा धन त्याग के लिए, वाणी सत्य के लिए, विजय यश के लिए और शासन प्रजा के हित के लिए करते हैं)
यहाँ सत्ता स्वयं नैतिक ऊँचाई पर खड़ी है; इसलिए किसी को उसके सामने अपमानजनक ढंग से झुकने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह कालिदास की राजनैतिक से ज्यादा नैतिक कल्पना है, जिसका पूर्ण विलोम स्वप्निल की कविता में दिखने वाला ‘राजदरबार’ है, जो प्रकारांतर से हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में पनप रही आज की दरबारी संस्कृति है जिसमें चापलूसों के पौ बारह होते हैं और स्वाभिमानी व्यक्ति धकिया कर किनारे कर दिया जाता है।
अंग्रेज़ी साहित्य में यही विमर्श शेक्सपीयर के ‘किंग लियर’ (‘King Lear’) में तीखे रूप में सामने आता है। केन्ट की पंक्तियाँ—
“Think’st thou that duty shall have dread to speak
When power to flattery bows?”
बताती हैं कि जब सत्ता स्वयं चापलूसी के आगे झुक जाती है, तब सत्य बोलने का साहस समाप्त हो जाता है। यह वही स्थिति है जिसे स्वप्निल की कविता चित्रित करती है—जहाँ झुकना सामान्यीकृत हो चुका है और खड़ा होना जोखिम बन गया है।
इसी प्रकार ‘पैराडाइज़ लॉस्ट’ में जॉन मिल्टन का कथन —
“Better to reign in Hell, than serve in Heaven.”
भी इसी नैतिक आग्रह को पुष्ट करता है। यहाँ ‘सेवा’ (serve) वह झुकना है जो आत्मसम्मान की कीमत पर किया जाए। यह पंक्ति स्वप्निल की कविता में निहित उस मौन प्रश्न को वाणी देती है कि क्या सुविधा और सुरक्षा के बदले नैतिक दासता स्वीकार कर ली जाए?
इसके नितांत विपरीत, टी. एस. एलियट की पंक्ति—
“The only wisdom we can hope to acquire
Is the wisdom of humility.”
राजेश जोशी की कविता के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। यह विनय सत्ता के सामने नहीं, बल्कि सत्य, शब्द और ज्ञान के सामने है। इस प्रकार अंग्रेज़ी साहित्य भी उसी द्वैत को रेखांकित करता है जो स्वप्निल श्रीवास्तव और राजेश जोशी की कविताओं के बीच है।
समग्र रूप से देखें तो स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता हमारे समय की नैतिक संरचना पर एक गहरी समाजशास्त्रीय टिप्पणी है। यह कविता दिखाती है कि जब झुकना रणनीति बन जाए और खड़ा होना ख़तरा, तब समाज में ऐसे नागरिक पैदा होते हैं जिन्हें सिवाय आत्मसम्मान के सब कुछ मिलता है। भर्तृहरि, चाणक्य और कालिदास की परंपरा इस कविता को ऐतिहासिक गहराई देती है, जबकि शेक्सपीयर, मिल्टन और एलियट इसे वैश्विक नैतिक विमर्श से जोड़ते हैं। कुल मिला कर समस्या झुकने में नहीं, बल्कि ‘किसके सामने, क्यों और किस कीमत पर झुकने’ में है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता इसी प्रश्न को हमारे सामने सबसे असहज, लेकिन सबसे ज़रूरी रूप में रखती है—और यही उसकी समकालीन प्रासंगिकता और नैतिक शक्ति है।
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| 2010 |
(चार)
जिस दिन मुझे हत्या का समाचार
नहीं मिलता, उस दिन मैं विकल
रहता हूँ
जिस दिन हत्यारों के जीवन कथा
का पाठ नही करता तो लगता है कि
आज मैंने प्रार्थना नहीं की है
जिस दिन गुनहगारों की बाइज्जत
रिहाई की खबर नहीं मिलती
मुझे उस रात नींद नहीं आती
मुझे रोज चाहिए इस तरह के
हिंसक और बीभत्स समाचार
ताकि प्रसन्न रहे मेरी आत्मा
इससे जीवन में बना रहता है
स्वाद
क्या आप भी मेरी तरह इन आदतों
के गुलाम हो गए हैं?
क्या आपके भीतर भी नरभक्षियों
के गुण पैदा होने लगे है?
यदि हाँ तो मेरी तरह आपका भी
डी एन ए गड़बड़ है।
स्वप्निल श्रीवास्तव
स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता समकालीन हिन्दी कविता में अपराध, मीडिया और पाठकीय चेतना के सम्बन्ध को समझने के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पाठ प्रस्तुत करती है। यह कविता अपराध को न तो केवल सामाजिक विकृति के रूप में देखती है और न ही मात्र नैतिक पतन के रूप में; बल्कि वह उसे एक ऐसी ‘संवेदनात्मक आदत’ के रूप में चिन्हित करती है, जो आधुनिक समाज में मीडिया के माध्यम से निरन्तर पोषित होती है। इस कविता की अर्थवत्ता केवल इसके कथ्य में नहीं, बल्कि इसकी संरचना, इसकी आत्मस्वीकृतिमूलक वाणी और इसके अन्तर्पाठीय सम्बन्धों में निहित है।
अपराध के समाजशास्त्र में विकसित आधुनिक सिद्धान्त इस कविता को पढ़ने की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। ‘सामाजिक विघटन सिद्धान्त’ (Social Disorganisation Theory) यह मानता है कि जब समुदाय, पड़ोस और सामाजिक संस्थाएँ कमजोर पड़ जाती हैं, तब अपराध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिणाम बन जाता है। ‘तनाव सिद्धान्त’ (Strain Theory) यह बताता है कि समाज जिन आकांक्षाओं और सफलताओं को आदर्श बना कर प्रस्तुत करता है, जब वे वैध साधनों से सुलभ नहीं होतीं, तब अपराध एक वैकल्पिक मार्ग के रूप में उभरता है। ‘सामाजिक अधिगम सिद्धान्त’ (Social Learning Theory) यह स्पष्ट करता है कि अपराध व्यवहार सीखा जाता है—और आधुनिक समय में यह सीख मुख्यतः मीडिया के माध्यम से होती है। वहीं ‘लेबलिंग सिद्धान्त’ (Labelling Theory) यह रेखांकित करता है कि समाज और मीडिया द्वारा किसी व्यक्ति को ‘अपराधी’ के रूप में निरन्तर चिह्नित किया जाना उसकी पहचान को स्थायी रूप से उसी दिशा में ढाल देता है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता इन सिद्धान्तों को सैद्धान्तिक भाषा में नहीं, बल्कि ‘अनुभव की भाषा’ में व्यक्त करती है। कविता का वक्ता स्वीकार करता है कि यदि उसे हत्या का समाचार नहीं मिलता, तो वह विकल हो जाता है। यह स्वीकारोक्ति अपराध को आकस्मिक घटना से उठा कर दैनिक जीवन की आवश्यकता में बदल देती है। यहाँ अपराध का समाचार वही भूमिका निभाने लगता है, जो किसी समय धार्मिक या नैतिक अनुष्ठान निभाते थे।
इस बिन्दु पर कविता की संरचना विशेष रूप से विचारणीय है। पूरी कविता “जिस दिन…” से आरम्भ होने वाले वाक्यों की शृंखला में रची गई है। यह संरचना किसी विचार के क्रमिक विकास की नहीं, बल्कि ‘आदत की पुनरावृत्ति’ की संरचना है। यह पुनरावृत्ति मीडिया-उपभोग की उसी दिनचर्या का रूपक है, जिसमें पाठक या दर्शक हर दिन एक नई हिंसक खबर की अपेक्षा करता है। कविता का रूप स्वयं उस मानसिक लय की नकल करता है, जिसकी वह आलोचना करती है।
कविता की दूसरी प्रमुख संरचनात्मक विशेषता उसका आत्मस्वीकृतिमूलक स्वर है। वक्ता न तो स्वयं को नैतिक रूप से श्रेष्ठ सिद्ध करता है और न ही समाज को बाहर से फटकारता है। वह कहता है कि उसे हिंसक और बीभत्स समाचार चाहिए ताकि उसकी आत्मा प्रसन्न रह सके। यह आत्मस्वीकृति कविता को उपदेशात्मक होने से बचाती हई उसे आत्मालोचन में बदल देती है,ताकि समाज की बीमार होती जा रही मनोरचना उजागर हो सके। दूसरे शब्दों में , संरचना के स्तर पर यह रणनीति कविता को और अधिक भयावह बना देती है, क्योंकि यहाँ अपराध के विरुद्ध प्रतिरोध नहीं, बल्कि उसकी अनुपस्थिति से उत्पन्न बेचैनी व्यक्त की जा रही है।
यहीं मीडिया कविता की अन्तर्पाठीय संरचना का अनिवार्य घटक बन जाता है। विवेच्य कविता में “हत्यारों की जीवन कथा का पाठ” जैसी पंक्ति इस बात की ओर संकेत करती है कि आधुनिक मीडिया अपराध को सूचना नहीं, बल्कि ‘दिलचस्प कथा’ में बदल देता है। अपराधी एक चरित्र बन जाता है और उसका जीवन एक निरन्तर पढ़े या देखे जाने योग्य पाठ। यह स्थिति ‘सेज़ारे बेक्कारिया’ (Cesare Beccaria) की विश्वविख्यात कृति ‘अपराध और दण्ड’ (On Crimes and Punishments) की उस चेतावनी को स्मरणीय बनाती है, जिसमें वे कहते हैं कि “अपराध को रोकने के लिए दण्डित करने से अधिक आवश्यक है उन्हें उत्पन्न होने से रोकना।” (It is better to prevent crimes than to punish them.)
स्वप्निल की कविता दिखाती है कि आधुनिक समाज इस चेतावनी की अनदेखी करते हुए कितनी दूर आ चुका है। यहाँ अपराध को रोकने की नहीं, बल्कि उसे देखने और पढ़ने की आदत विकसित हो चुकी है। इस दृष्टि से कविता का गहरा अन्तर्पाठीय सम्बन्ध ‘रघुवीर सहाय’ की सुप्रसिद्ध ‘रामदास’ कविता से बनता है। ‘रामदास’ में हत्या सार्वजनिक स्थल पर होती है और समाज तमाशबीन बना रहता है। स्वप्निल की कविता में वही तमाशबीन समाज एक कदम और आगे बढ़ चुका है—अब वह अपराध के न होने पर बेचैन हो जाता है। कहना न होगा कि यह समाज का अमानवीकरण है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
अंग्रेज़ी कविता में इसी दर्शक-संवेदना का अत्यन्त सशक्त चित्रण ‘डब्ल्यू. एच. ऑडन’ (W. H. Auden) की कविता ‘अकिलीस की ढाल’ (The Shield of Achilles) में मिलता है। ऑडन लिखते हैं—
They waited for a sign,
The mass and majesty of this world
(वे किसी संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे—
इस संसार की भीड़ और उसकी तथाकथित गरिमा को देखने के लिए।)
यहाँ प्रतीक्षा स्वयं एक नैतिक स्थिति है—हिंसा के घटित होने की प्रतीक्षा। ऑडन की इन कविता पंक्तियों से आगे बढ़ कर स्वप्निल की कविता में यह प्रतीक्षा निर्भरता में बदल जाती है। इसी प्रकार ‘रॉबर्ट ब्राउनिंग’ (Robert Browning) की कविता ‘पॉर्फीरिया का प्रेमी’ (Porphyria’s Lover) हत्या के अपराध को निजी भावनात्मक तृप्ति से जोड़ती है। नैरेटर कहता है—
That moment she was mine, mine, fair,
Perfectly pure and good.
(उस क्षण वह पूरी तरह मेरी थी—
पूर्णतः शुद्ध, निर्दोष और मेरी।)
ब्राउनिंग की कविता में अपराध वस्तुत: सौन्दर्य और प्रेम के आवरण में छिप जाता है। स्वप्निल की कविता में यही प्रक्रिया सामाजिक स्तर पर घटित होती है, जहाँ अपराध सामूहिक अवचेतन की तृप्ति का साधन बन जाता है।
यह अन्तर्पाठीय संवाद ‘कार्ल मार्क्स’ (Karl Marx) द्वारा ‘यूजीन सू’ (Eugène Sue) के उपन्यास ‘पेरिस रहस्य’ (The Mysteries of Paris) पर किए गए विश्लेषण से और गहरा हो जाता है। मार्क्स ने दिखाया था कि अपराध-कथाएँ नैतिकता का दावा करते हुए भी अपराध के प्रति आकर्षण को बढ़ाती हैं। स्वप्निल की कविता इस आकर्षण को विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि संवेदना के स्तर पर पकड़ती है।
स्वप्निल जी की इस कविता में अन्तिम कथन—“यदि हाँ तो मेरी तरह आपका भी डी. एन. ए. गड़बड़ है”—संरचनात्मक और वैचारिक, दोनों स्तरों पर निर्णायक है। यह जैविक रूपक संकेत देता है कि सांस्कृतिक विकृति को हम किस हद तक प्राकृतिक मान लेने लगे हैं। मीडिया द्वारा निरन्तर पोषित अपराध-संस्कृति संवेदना की बनावट तक को विकृत कर देती है। यह ‘न्यू नार्मल’ है, जिसके तहत अपराध होते देखने, अपराध कथा पढ़ने या अपराध विषयक समाचार या विवरण जानने-सुनने के लिए बेचैन लोगों को बीमार के बजाय अपराध के प्रति सजग बताया जाता है और मध्यवर्गीय परिवारों में प्रेमचन्द, यशपाल, दिनकर, बच्चन सरीखे बहुत हद तक सीधे समझ में आ जाने वाले रचनाकारों के साहित्य को सोने के पहले पढ़ने के बजाय टेलीविज़न या मोबाइल पर ‘क्राइम पेट्रोल’ या ‘सनसनी’ देखने को ग़लत नहीं मानता।
कुल मिला कर स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता अन्तर्पाठीयता के माध्यम से अपराध, मीडिया और आधुनिक समाज के सम्बन्ध को उजागर करती है। यह कविता अपराधियों से अधिक उस दर्शक-मानसिकता को प्रश्नांकित करती है, जो अपराध को देखने-सुनने की आदी हो चुकी है। यही कारण है कि यह कविता केवल अपने कथ्य से नहीं, बल्कि अपने रूप, अपनी संरचना और अपने अन्तर्पाठीय संवादों से हमारे समय की नैतिक स्थिति पर एक गहरी टिप्पणी बन जाती है।
(पाँच)
बारिश में फूल
जो फूल कभी नहीं खिलते थे
वे बारिश के दिनों में
खिलते थे
कुछ तितलियाँ थीं जो
उनके खिलने का इंतजार
करती थीं
वे तितलियाँ बारिश के दिनों में
दिखाई देती थीं
बाकी दिनों में वे कहाँ
रहती थी इसकी कोई
सूचना मेरे पास नही थी
कुछ लोग बताते थे कि वे
पर्वतों के पार रहती हैं
और बादलों के साथ आ
जाती थीं और उनके साथ
चली जाती थीं
ऐसे बारिश के दिनों में
पानी नही रस बरसते थे
और खूब भीगती थीं
तितलियाँ
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता ‘बारिश में फूल’ स्मृति और सौन्दर्य के उस नाजुक सम्बन्ध को रेखांकित करती है, जिसमें अतीत कोई स्थिर इतिहास नहीं, बल्कि संवेदना में लगातार पुनःघटित होने वाला अनुभव बन जाता है। यह कविता किसी प्रत्यक्ष सामाजिक संघर्ष या राजनीतिक तनाव को नहीं रचती, बल्कि एक ऐसे अभाव की ओर संकेत करती है, जो आधुनिक मनुष्य के अनुभव-जगत का स्थायी हिस्सा बन चुका है। बारिश में खिलने वाले फूल और उनके साथ लौटती तितलियाँ वस्तुतः प्रकृति के दृश्य भर नहीं हैं; वे उस खोई हुई लय की स्मृति हैं, जिसमें मनुष्य, प्रकृति और समय एक-दूसरे से अलग नहीं थे।
कविता में तितलियाँ केवल जैविक उपस्थिति नहीं हैं, बल्कि वे स्मृति की वह आकृति हैं, जो समय के नियमित प्रवाह से बाहर प्रकट होती हैं। कवि को यह ज्ञात नहीं कि वे तितलियाँ बाकी दिनों में कहाँ रहती थीं; यह अज्ञान ही स्मृति की केन्द्रीय शर्त है। स्मृति हमेशा अपूर्ण होती है, उसमें रिक्तियाँ होती हैं, और वही रिक्तियाँ उसे सौन्दर्यात्मक बनाती हैं। यह वही बिन्दु है जहाँ स्मृति और सौन्दर्यशास्त्र एक-दूसरे में घुलने-मिलने लगते हैं।
इमैनुएल कांट ने सौन्दर्य को उपयोगिता और संकल्पना से मुक्त अनुभव माना था। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘क्रिटिक ऑफ़ जजमेंट’ (Critique of Judgment) में लिखा है कि सौन्दर्य वह है जो बिना किसी उद्देश्य के आनंद प्रदान करे। इसका भावार्थ यह है कि सौन्दर्य किसी व्यावहारिक लाभ से नहीं, बल्कि संवेदनात्मक तृप्ति से जुड़ा होता है (That is beautiful which gives pleasure without concept). ‘बारिश में फूल’ की तितलियाँ इसी निरुद्देश्य सौन्दर्य का उदाहरण हैं। उनका कोई कार्य नहीं बताया गया है; वे केवल भीगती हैं, रस में डूबी रहती हैं। उनका होना ही उनका अर्थ है। स्मृति में लौटकर यह निरुद्देश्य सौन्दर्य और गहरा हो जाता है, क्योंकि अब वह प्रत्यक्ष अनुभव नहीं, बल्कि अनुभूत अनुभव बन जाता है।
वाल्टर बेंजामिन ने स्मृति को इतिहास की रैखिक समझ से मुक्त करते हुए उसे छवि और झिलमिलाहट के रूप में देखा। वे अपनी पुस्तक ‘Illuminations’ में कहते हैं कि स्मृति अतीत को वैसे नहीं लौटाती जैसे वह था, बल्कि उसे वर्तमान की रोशनी में अचानक प्रकट करती है। इसका भावार्थ यह है कि स्मृति अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसका वर्तमान में चमक उठना है (Memory is not an instrument for exploring the past but its theatre.) । स्वप्निल जी की कविता में तितलियाँ इसी बेंजामिनीय स्मृति-छवि की तरह आती-जाती हैं। वे पर्वतों के पार से आती हैं, बादलों के साथ लौट जाती हैं और उनके बीच जो क्षण है, वही स्मृति का सौन्दर्य बन जाता है। यहाँ अतीत कोई स्थायी भूमि नहीं, बल्कि एक क्षणिक दृश्य है।
मॉरिस हाल्बवाख़्स ने ‘ऑन कलेक्टिव मेमोरी’ (“On Collective Memory’) में स्मृति को सामाजिक संरचना के भीतर रखकर समझाया है । उनके अनुसार स्मृति व्यक्तिगत नहीं होती; वह हमेशा किसी न किसी सामाजिक ढाँचे में आकार लेती है। इसका भावार्थ यह है कि हम वही याद रखते हैं, जिसे समाज हमें याद रखने की भाषा और ढाँचा देता है। उनके शब्दों में स्मृति एक सामूहिक प्रकार्य है। (‘Memory is a collective function’)। स्वप्निल की कविता में तितलियों के बारे में जो ‘कुछ लोग बताते थे’ जैसी पंक्ति आती है, वह स्मृति के इसी सामाजिक आयाम को उद्घाटित करती है। कवि की स्मृति अकेली नहीं है; वह सुनी हुई बातों, लोक-कथाओं और सामूहिक कल्पना से बुनी गई है। तितलियाँ यहाँ व्यक्तिगत अनुभव से अधिक सामूहिक कल्पना का रूप ले लेती हैं।
स्मृति के इस सौन्दर्यशास्त्र को यदि अंग्रेज़ी काव्य–परम्परा से जोड़ा जाए, तो विलियम वर्ड्सवर्थ की कविता ‘Tintern Abbey’ विशेष रूप से याद की जा सकती है। ‘लिरिकल बैलेड्स’ की प्रस्तावना में वर्ड्सवर्थ कहते हैं कि प्रकृति की स्मृति मनुष्य के नैतिक और भावनात्मक जीवन को गहराई देती है। इसका भावार्थ यह है कि अतीत की प्राकृतिक स्मृतियाँ वर्तमान जीवन को संवेदना प्रदान करती हैं । (‘Emotion recollected in tranquillity’) स्वप्निल की कविता भी उसी ‘प्रशांति ’(tranquility) में लौटती हुई स्मृति का उदाहरण है, जहाँ बारिश अब केवल मौसम नहीं, बल्कि रस बन जाती है।
टी. एस. एलियट की ‘Four Quartets’ में स्मृति और समय का सम्बन्ध और जटिल रूप ले लेता है। एलियट के अनुसार अतीत और वर्तमान एक-दूसरे से अलग नहीं हैं; वे निरंतर संवाद में रहते हैं। इसका भावार्थ यह है कि समय की वास्तविक समझ स्मृति के बिना संभव नहीं। (‘Time present and time past are both perhaps present in time future’). ‘बारिश में फूल’ की तितलियाँ इसी काल-विषयक जटिलता का संकेत देती हैं। तितलियाँ अतीत की हैं, लेकिन कविता में वे वर्तमान में भीग रही हैं।।
इस प्रकार स्मृति के सौन्दर्यशास्त्र के तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता केवल व्यक्तिगत नॉस्टैल्जिया नहीं है। यह उस आधुनिक अनुभव की कविता है, जहाँ प्रकृति अब सहज उपस्थिति नहीं, बल्कि स्मृति के माध्यम से ही उपलब्ध होती है। तितलियाँ यहाँ केवल कीट नहीं, बल्कि उस संसार की याद हैं जहाँ बारिश में पानी नहीं, रस बरसता था। यह रस वस्तुत: स्मृति का रस है, सौन्दर्य का रस है और उस खोई हुई सामूहिक संवेदना का रस है, जिसकी कमी एक ओर कवि को सालती है,तो दूसरी ओर सहृदय पाठक के भीतर सत्वोद्रेक उत्पन्न कर के रस निष्पत्ति की प्रक्रिया को अंजाम देती है।
सबसे ख़ास बात यह है कि स्मृति यहाँ शोक नहीं बनती, बल्कि एक सौन्दर्यात्मक प्रतिरोध में बदल जाती है। वह यह नहीं कहती कि पुराना संसार लौट आएगा, लेकिन वह यह ज़रूर कहती है कि उसे याद रखा जा सकता है। और यही स्मृति का सबसे गहरा सौन्दर्य है।दूसरे शब्दों में स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता स्मृति के सौन्दर्यशास्त्र का एक ऐसा सूक्ष्म पाठ रचती है जिसमें अतीत केवल बीत चुका समय नहीं, बल्कि वर्तमान में अनुपस्थित सौन्दर्य की एक पीड़ादायक चेतना बनकर उभरता है। यहाँ स्मृति किसी व्यक्तिगत नॉस्टेल्जिया तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक अनुभव, सामूहिक कल्पना और प्रकृति से टूटते हुए सम्बन्ध का सांस्कृतिक दस्तावेज़ बन जाती है। तितलियाँ, फूल और बारिश—ये तीनों मिलकर स्मृति के उस सौन्दर्यलोक का निर्माण करते हैं, जिसकी अनुपस्थिति कवि को आज के समय में खटकती है।
कविता में यह कथन कि
“जो फूल कभी नहीं खिलते थे
वे बारिश के दिनों में
खिलते थे”
स्मृति के चयनात्मक स्वभाव की ओर संकेत करता है। स्मृति हमेशा असाधारण को याद रखती है, सामान्य को नहीं। वाल्टर बेंजामिन के अनुसार स्मृति वह उपकरण नहीं है जो अतीत को ज्यों का त्यों लौटा दे, बल्कि वह अतीत को वर्तमान की रोशनी में पुनर्गठित करती है। बेंजामिन का भावार्थ यह है कि स्मृति इतिहास को निरंतरता के रूप में नहीं, बल्कि चमकते हुए क्षणों के रूप में पकड़ती है (‘Memory is not an instrument for surveying the past but its theatre,’- ‘Illuminations’)। स्वप्निल जी की कविता में फूलों का खिलना ऐसा ही एक चमकता हुआ क्षण है, जो पूरे बचपन या अतीत का प्रतिनिधि बन जाता है।
तितलियाँ इस कविता में केवल प्राकृतिक प्राणी नहीं हैं, बल्कि स्मृति की उड़ती हुई इकाइयाँ हैं। वे आती हैं, दिखती हैं, फिर गायब हो जाती हैं। कवि को यह नहीं पता कि वे बाकी दिनों में कहाँ रहती हैं। यह अज्ञान स्मृति की अपूर्णता का बोध है। मॉरिस हाल्बवाख़्स ने स्मृति को व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के भीतर निर्मित बताया है। उनका भावार्थ यह है कि व्यक्ति अकेले स्मरण नहीं करता, वह हमेशा किसी सामाजिक ढाँचे के भीतर स्मरण करता है ( “Individual memory is a part or an aspect of collective memory”- ‘On Collective Memory’)। कविता में तितलियों के बारे में “कुछ लोग बताते थे” जैसी पंक्ति इस सामूहिक स्मृति की ओर संकेत करती है, जहाँ व्यक्तिगत अनुभव लोक-कथाओं, सुनी-सुनाई बातों और सामाजिक कल्पना से जुड़ जाता है।
यहाँ स्मृति का सौन्दर्य इस तथ्य में निहित है कि वह अधूरी है। तितलियों के पर्वतों के पार रहने की बात एक मिथकीय कल्पना है, जो स्मृति को यथार्थ से उठाकर काव्यात्मक बनाती है। बेंजामिन के अनुसार स्मृति का सौन्दर्य उसकी अस्पष्टता में है, क्योंकि वही उसे वस्तुनिष्ठ इतिहास से अलग करती है। उनका कहना है कि सच्ची स्मृति सूचना नहीं देती, अनुभव देती है (“The value of information does not survive the moment in which it was new”- ‘The Storyteller’.) स्वप्निल की कविता में भी तितलियों की सूचना नहीं, बल्कि उनका अनुभव बचा हुआ है।
“ऐसे बारिश के दिनों में
पानी नहीं रस बरसते थे”—
यह पंक्ति स्मृति के सौन्दर्यशास्त्र का केन्द्रीय बिन्दु है। यहाँ वर्षा जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावात्मक अनुभव बन जाती है। यह वही क्षण है जहाँ स्मृति प्रकृति को पुनः जादुई बना देती है। हाल्बवाख़्स के अनुसार स्मृति वर्तमान की आवश्यकताओं के अनुसार अतीत को पुनर्गठित करती है। उनका तात्पर्य यह है कि हम अतीत को वैसे नहीं याद करते जैसे वह था, बल्कि वैसे याद करते हैं जैसे आज हमें उसकी ज़रूरत है ( “The past is not preserved but reconstructed on the basis of the present”.)। याद रहे कि आज के शुष्क और उपयोगितावादी समय में ‘रस’ की स्मृति एक प्रतिरोध बन जाती है।
इस कविता में स्मृति का सौन्दर्य एक प्रकार की कमी से जन्म लेता है। तितलियाँ अब नहीं दिखतीं, फूल अब नहीं खिलते, बारिश अब केवल पानी बन गई है। यही अभाव कविता को भावनात्मक गहराई देता है। इस संदर्भ में अंग्रेज़ी कविता में विलियम वर्ड्सवर्थ की प्रसिद्ध रचना ‘I Wandered Lonely as a Cloud’ स्मरणीय है, जहाँ कवि डैफोडिल्स की स्मृति को जीवन भर की आन्तरिक पूँजी के रूप में देखता है। वर्ड्सवर्थ का भाव यह है कि स्मृति में संग्रहित प्राकृतिक सौन्दर्य एकान्त और उदासी के क्षणों में आत्मा को पुनर्जीवित करता है (“They flash upon that inward eye / Which is the bliss of solitude”)। स्वप्निल की कविता में भी तितलियाँ ऐसा ही एक अंतर्दृष्टि (‘inward eye’) बन जाती हैं।
स्मृति के सौन्दर्यशास्त्र को तुलनात्मक स्तर पर देखें तो बेंजामिन और हाल्बवाख़्स दोनों स्मृति को स्थिर नहीं मानते, पर उनके दृष्टिकोण भिन्न हैं। बेंजामिन के यहाँ स्मृति टूटे हुए समय के विरुद्ध एक झटका है, जबकि हाल्बवाख़्स के यहाँ वह सामाजिक ढाँचों द्वारा निर्देशित पुनर्निर्माण है। स्वप्निल की कविता इन दोनों के बीच स्थित दिखाई देती है। तितलियाँ एक ओर निजी अनुभव की चमक हैं, दूसरी ओर सामूहिक कल्पना की उपज। इसीलिए यह कविता न तो केवल आत्मकथात्मक है, न ही केवल लोक-स्मृति; बल्कि दोनों का संवेदनशील संगम है।
कुल मिलाकर स्वप्निल श्रीवास्तव रचित ‘बारिश में फूल’ स्मृति के सौन्दर्यशास्त्र की वह कविता है जहाँ प्रकृति अतीत का माध्यम बनती है और अतीत वर्तमान की आलोचना का उपकरण। तितलियाँ यहाँ केवल याद नहीं की जातीं, बल्कि उनकी अनुपस्थिति के माध्यम से वर्तमान की शुष्कता को उजागर किया गया है। बेंजामिन की भाषा में कहें तो यह कविता अतीत की एक ऐसी छवि को पकड़ती है जो संकट के क्षण में चमक उठती है। हाल्बवाख़्स की दृष्टि से देखें तो यह कविता सामूहिक अनुभव की उस दरार को दिखाती है, जहाँ स्मृति अभी बची हुई है, पर उसका सामाजिक आधार कमजोर पड़ता जा रहा है। यही इस कविता का सौन्दर्य भी है और उसका समाजशास्त्रीय महत्व भी।
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| 2022 |
(छह)
क्या तुम्हें याद है हरी कमीज
जिसे पहनने के बाद तुम मुझे
हरा तोता कहती थी
तुम कहती थी
चलो उड़ चलें जंगल की ओर
इस शहर में हरियाली नहीं
बची हुई है
सच तो यह है
नही बचा है हरा रंग
आततायियों ने हमसे चुरा लिया है
हरा रंग
नदिया भूरी हो गयी हैं
और जंगल धूसर
आदमी इतना बदरंग हो गया है कि
किसी रंग से नहीं हो सकती है
उसकी तुलना
अच्छा है हम तोतों की जमात में
शामिल हो जाएँ
और धान के खेतों के ऊपर
उड़ें
अपनी रिहाइश के लिए सबसे हरे
पेड़ का चुनाव करे
वैसे तोते कहाँ बचे हुए हैं
उन्हें बेच रहे हैं बहेलिए
उन चित्रकारों का शुक्रिया
जिनकी पेंटिंग में बचा हुआ है
हरा रंग
स्वप्निल श्रीवास्तव की यह कविता पहली दृष्टि में स्मृति और रंग की एक निजी बातचीत जैसी लगती है, पर जैसे-जैसे पाठ आगे बढ़ता है, यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल प्रेम या अतीत की कोमल यादों की कविता नहीं है, बल्कि समकालीन सभ्यता द्वारा प्रकृति, रंग और जीवन के लगभग अपहरण की एक गहन सांस्कृतिक शिकायत है। ‘हरी कमीज़’, ‘हरा तोता’, ‘धान के खेत’, ‘सबसे हरा पेड़’—ये सभी बिम्ब केवल दृश्य सौन्दर्य के उपकरण नहीं हैं, बल्कि वे उस जीवन-तत्त्व के संकेतक हैं जिसे आधुनिक सत्ता, बाज़ार और पूँजीवादी हिंसक विकास ने क्रमशः नष्ट किया है।
इको-क्रिटिसिज़्म के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह कविता प्रकृति की उपस्थिति से अधिक उसके अभाव की कविता है। चेरिल ग्लॉटफेल्टी ‘The Ecocriticism Reader’ पुस्तक में इको-क्रिटिसिज़्म को परिभाषित करते हुए कहती हैं कि साहित्य और भौतिक पर्यावरण के बीच सम्बन्धों का अध्ययन ही इसका मूल है। उनका भावार्थ यह है कि साहित्य यह बताता है कि मनुष्य अपने पर्यावरण को कैसे देखता, गढ़ता और नष्ट करता है (Ecocriticism is the study of the relationship between literature and the physical environment’). इस कविता में पर्यावरण कोई पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि मुख्य पीड़ा है। ‘इस शहर में हरियाली नहीं बची हुई है’ कहना केवल शहरीकरण की शिकायत नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत असफलता का बयान है जहाँ विकास ने जीवन के मूल रंगों को ही निगल लिया है।
हरा रंग यहाँ केवल दृश्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक प्रतीक है। सांस्कृति के समाजशास्त्र के सन्दर्भ में ‘Distinction’ पुस्तक में पियरे बोरदियू का यह विचार महत्त्वपूर्ण हो उठता है कि स्वाद, प्रतीक और सौन्दर्य के मानदण्ड सामाजिक संरचनाओं से निर्मित होते हैं। उनका भावार्थ यह है कि हम जो सुंदर मानते हैं, वह भी सत्ता और इतिहास से गढ़ा गया होता है (Taste classifies, and it classifies the classifier’). कविता में हरे रंग का लुप्त हो जाना दरअसल उस सांस्कृतिक स्वाद का लुप्त हो जाना है, जिसमें प्रकृति जीवन का केन्द्र थी। जब कवि कहता है कि “नही बचा है हरा रंग”, तो यह कथन केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शून्यता की घोषणा है।
‘आततायियों ने हमसे चुरा लिया है हरा रंग’ पंक्ति इको-क्रिटिकल विमर्श को राजनीतिक दिशा देती है। यहाँ ‘आततायी’ कोई अमूर्त शक्ति नहीं, बल्कि वे संस्थाएँ, नीतियाँ और बाज़ार की शक्तियाँ हैं जिन्होंने प्रकृति को संसाधन और मनुष्य को उपभोक्ता में बदल दिया। रेमंड विलियम्स ने ‘की वर्ड्स’ (‘Keywords’) में संस्कृति को जीवन की सम्पूर्ण प्रक्रिया मानते हुए कहा था कि प्रकृति और संस्कृति का द्वैत आधुनिक पूँजीवादी समाज की रचना है। उनका तात्पर्य यह है कि प्रकृति को बाहर की वस्तु मानना ही उसके विनाश की पहली शर्त है (Nature is perhaps the most complex word in the language’). विवेच्य कविता में प्रकृति का लोप उसी द्वैत का परिणाम है।
तोते का बिम्ब विशेष रूप से सांस्कृति के समाजशास्त्र और इको-क्रिटिसिज़्म के संगम पर खड़ा है। तोता यहाँ स्वतंत्रता, हरियाली और सामूहिक जीवन का प्रतीक है। पर
“वैसे तोते कहाँ बचे हुए हैं
उन्हें बेच रहे हैं बहेलिए”
—यह पंक्ति प्रकृति के बाज़ारीकरण की चरम स्थिति को उद्घाटित करती है। कार्ल पोलान्यी ने बाज़ारू समाज की आलोचना करते हुए कहा था कि जब प्रकृति को भी वस्तु बना दिया जाता है, तब समाज आत्मघाती हो जाता है। उनका भावार्थ यह है कि भूमि, श्रम और जीवन को बाज़ार के हवाले करना सभ्यता का संकट है (‘To allow the market mechanism to be the sole director of the fate of human beings and their natural environment would result in the demolition of society’ – ‘The Great Transformation’). विवेच्य कविता में तोतों का बिकना इसी विघटन का काव्यात्मक रूपक है।
यह कविता सांस्कृतिक स्मृति की भी कविता है। “क्या तुम्हें याद है” से आरम्भ होना इसे निजी स्मृति से जोड़ता है, पर यह स्मृति धीरे-धीरे सामूहिक स्मृति में बदल जाती है। मॉरिस हाल्बवाख़्स ने ‘On Collective Memory’ में कहा था कि व्यक्तिगत स्मृति भी सामाजिक ढाँचों के भीतर ही आकार लेती है। उनका भावार्थ यह है कि हम अकेले याद नहीं करते, बल्कि समाज के साथ याद करते हैं (Individual memory is a part or an aspect of group memory’). यहाँ हरी कमीज़ और तोते की स्मृति एक ऐसे समाज की स्मृति है जहाँ प्रकृति अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी।
वाल्टर बेंजामिन के विचारों के आलोक में इस कविता पर नज़र डालने पर इसमें और गहराई के दर्शन होते हैं। बेंजामिन ने ‘Theses on the Philosophy of History’ पुस्तक में आधुनिकता को स्मृति के विनाश की प्रक्रिया कहा था। उनका भावार्थ यह है कि प्रगति के नाम पर जो कुछ आगे बढ़ता है, वह अक्सर अतीत के मलबे पर खड़ा होता है (‘There is no document of civilization which is not at the same time a document of barbarism’). इस कविता में शहर, धूसर जंगल और भूरी नदियाँ उसी ‘प्रगति’ के दस्तावेज़ हैं, जिनके पीछे स्मृति और सौन्दर्य का विनाश छिपा है।
अन्तिम पंक्तियों में चित्रकारों का उल्लेख अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। “उन चित्रकारों का शुक्रिया / जिनकी पेंटिंग में बचा हुआ है हरा रंग”—यह कला की प्रतिरोधक भूमिका की ओर संकेत है। जब वास्तविक दुनिया से रंग ग़ायब हो जाते हैं, तब कला उन्हें स्मृति और कल्पना में बचाए रखती है। थियोडोर अडोर्नो ने ‘Aesthetic Theory’ पुस्तक में कहा है कि कला का सामाजिक कार्य यही है कि वह समाज के असत्य को उजागर करे। उनका तात्पर्य यह है कि कला अपने अस्तित्व से ही आलोचना बन जाती है (Art is the negative knowledge of the actual world’). इस कविता में चित्रकला और कविता दोनों उसी नकारात्मक ज्ञान का वहन करती हैं।
यह कविता इको-क्रिटिसिज़्म के स्तर पर प्रकृति के विनाश की साक्षी प्रतीत होती है और सांस्कृति के समाजशास्त्र के स्तर पर उस सांस्कृतिक चेतना की, जिसमें प्रकृति जीवन का केन्द्र थी। हरा रंग, तोता, जंगल, नदी—ये सभी केवल प्राकृतिक तत्त्व नहीं, बल्कि सामाजिक अर्थों से भरे हुए सांस्कृतिक प्रतीक हैं। कविता यह दिखाती है कि जब प्रकृति नष्ट होती है, तो केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि भाषा, स्मृति, प्रेम और सौन्दर्य भी नष्ट होते हैं।
कुल मिला कर यह कविता एक नैतिक आग्रह बन जाती है कि यदि वास्तविक दुनिया में हरा रंग नहीं बचा, तो कम से कम कला, स्मृति और कविता में उसे बचाए रखा जाए। यही इको-क्रिटिसिज़्म और सांस्कृति के समाजशास्त्र के संयुक्त फ्रेम में इस कविता का सबसे गहरा और सबसे मानवीय अर्थ है।
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| 2022 |
(सात)
अपने शहर के दुख से
घबड़ा कर जब मैं दूसरे
शहर में गया तो वहाँ
अपने शहर से ज्यादा
दुख थे
हम अपने शहर में
छिपा लेते थे
अपने दुख
लेकिन इस शहर में
अपने दुख छिपाने का
रिवाज नही था
लोगो के चेहरों पर
उतर आता था दुख
मैनें सोचा
मुझे अपने शहर में
लौट जाना चाहिए
वहाँ ऐसे लोग तो थे ही
जो कंधो पर हाथ रख कर
ढाढ़स बंधाते हुए कहते थे
बहुत दिनों तक नहीं
रहते है दुख
जब उनकी मियाद खत्म हो
जायेगी, वे चले जायेंगे
सब जानते थे कि हम
सुख से तो बच सकते हैं
लेकिन दुख से बचना
कठिन होता है
दुख से बचने के लिए
मैंने उस पर हँसने की
तरकीब खोज ली थी
मैं दुख पर तब तक
हँसता था जब तक कि
भर नही आती थी
आँख
स्वप्निल जी की यह कविता आधुनिक मनुष्य के दुख के सामाजिक व्यवहार, उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति और उससे निपटने की सांस्कृतिक तरकीबों का एक सूक्ष्म दस्तावेज़ है। कवि की एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा वस्तुतः भौगोलिक कम और समाजशास्त्रीय अधिक है। यह यात्रा दो अलग-अलग सामाजिक संस्कृतियों के बीच की दूरी को उजागर करती है—एक ऐसी संस्कृति, जहाँ दुख को छिपाना सामाजिक शिष्टाचार है और दूसरी, जहाँ दुख चेहरों पर उतर आता है और उसे छिपाने का कोई रिवाज नहीं। यहाँ दुख केवल निजी अनुभूति नहीं रह जाता, बल्कि एक सामाजिक तथ्य बन जाता है।
एमिल दुर्खीम ने ‘द रूल्स ऑफ़ सोशियोलॉजिकल मेथड’ (‘The Rules of Sociological Method’) पुस्तक में सामाजिक तथ्यों को व्यक्ति से बाहरी और उस पर बाध्यकारी शक्तियों के रूप में परिभाषित किया था। उनका आशय यह था कि समाज कुछ भावनात्मक और नैतिक ढाँचों को सामान्य और अनिवार्य बना देता है, जिन्हें व्यक्ति अनायास अपनाता है और दुख, हँसी, शोक जैसी भावनाएँ भी सामाजिक रूप से संगठित होती हैं। उनके शब्दों में समाज व्यक्ति की भावनाओं तक को नियंत्रित करता है। (Social facts are ways of acting, thinking and feeling, external to the individual, and endowed with a power of coercion)। कविता में दुख को छिपाने या न छिपाने की परंपरा इसी सामाजिक तथ्य का रूप है। पहले शहर में दुख को छिपाने की आदत है। यह आदत केवल व्यक्तिगत संकोच नहीं, बल्कि सामूहिक अनुशासन का परिणाम है। एर्विंग गॉफमैन ने ‘द प्रेजेंटेशन ऑफ़ सेल्फ इन एवरीडे लाइफ’(‘The Presentation of Self in Everyday Life’) पुस्तक में सामाजिक जीवन को रंगमंच की संज्ञा दी है , जहाँ व्यक्ति ‘फ्रंट स्टेज’ और ‘बैक स्टेज’ व्यवहार करता है। उनका तात्पर्य यह है कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति अपनी भावनाओं को नियंत्रित करता है ताकि सामाजिक अपेक्षाओं का उल्लंघन न हो (‘In everyday life, individuals perform roles for an audience.’)। कविता का पहला शहर इसी फ्रंट स्टेज संस्कृति का प्रतीक है, जहाँ दुख को छिपा कर निभाया जाता है।
इसके विपरीत दूसरा शहर दुख की सार्वजनिकता का शहर है। वहाँ दुख छिपाया नहीं जाता, बल्कि चेहरों पर उतर आता है। यह दृश्य कवि को विचलित करता है, क्योंकि यहाँ दुख निजी नहीं, सामूहिक दृश्य बन चुका है। यह वह बिन्दु है जहाँ दुख का सौन्दर्यशास्त्र सामने आता है। वाल्टर बेंजामिन ने ‘द स्टोरी टेलर’ निबन्ध में आधुनिकता में अनुभव के संकट की चर्चा करते हुए कहा था कि आधुनिक मनुष्य का दुख कथा नहीं बन पाता, वह केवल दृश्य बनकर रह जाता है। उनका मतलब यह है कि आधुनिक जीवन में अनुभव की गहराई नष्ट हो जाती है और वह केवल झटकों में बदल जाता है। (Experience has fallen in value). दूसरे शहर का दुख ऐसा ही अनुभवहीन, अनकहा दुख है।
कवि का अपने शहर लौटने का निर्णय इसीलिए महत्त्वपूर्ण है कि वहाँ दुख को लेकर एक सांस्कृतिक आश्वासन मौजूद है। “बहुत दिनों तक नहीं रहते हैं दुख”—यह वाक्य केवल सांत्वना नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास है। पीटर बर्जर और थॉमस लकमान ने ‘द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ़ रियलिटी’(‘The Social Construction of Reality’) पुस्तक में सामाजिक यथार्थ के निर्माण की चर्चा करते हुए बताया है कि समाज अपने सदस्यों को ऐसे अर्थ के ढाँचे देता है जिनसे जीवन सहनीय बन सके। उनका तात्पर्य है कि यथार्थ सामाजिक रूप से निर्मित होता है । (Reality is socially constructed)। विवेच्य कविता में दुख की ‘मियाद’ इसी सामाजिक निर्माण का हिस्सा है। यहाँ दुख से बचने का एक सौन्दर्यशास्त्रीय उपाय सामने आता है—दुख पर हँसना। यह हँसी सामान्य हास्य नहीं, बल्कि अस्तित्वगत प्रतिरोध है। हेनरी बर्गसां ने हँसी को सामाजिक सुधार की प्रक्रिया बताया था। “Laughter: An Essay on the Meaning of the Comic: में उनका कहना है कि हँसी समाज की कठोरताओं को ढीला करने का काम करती है (Laughter has a social function). स्वप्निल के कवि की हँसी भी दुख की कठोरता को ढीला करने का प्रयास है।
लेकिन यह हँसी अन्ततः आँसू में बदल जाती है। “मैं दुख पर तब तक हँसता था जब तक कि भर नहीं आती थी आँख”—यह पंक्ति सौन्दर्यशास्त्र के करुण रस को आधुनिक संदर्भ में पुनःपरिभाषित करती है। अरस्तू ने करुणा को त्रासदी का मूल भाव माना था। ‘पोएटिक्स’ में वे कहते हैं कि करुणा और भय के माध्यम से शुद्धि होती है (‘Through pity and fear effecting the purification of such emotions’.). विवेच्य कविता में हँसी और आँसू का संलयन उसी करुण शुद्धि का आधुनिक रूप है। यह कविता यह भी बताती है कि दुख से बचा नहीं जा सकता, केवल उसके साथ जीने की तरकीबें खोजी जा सकती हैं। जिग्मुंट बाउमन ने ‘लिक्विड मॉडर्निटी’ पुस्तक में तरल आधुनिकता में असुरक्षा को स्थायी स्थिति बताया है। उनका कहना है कि आधुनिक जीवन में स्थायित्व समाप्त हो चुका है (Uncertainty is the only certainty). इस कविता का दुख इसी तरल असुरक्षा का भावात्मक रूप है।
अन्ततः यह कविता दुख को न तो केवल निजी पीड़ा मानती है, न ही केवल सामाजिक तथ्य। यह उसे एक सौन्दर्यशास्त्रीय अनुभव में रूपांतरित करती है, जहाँ हँसी, सांत्वना, वापसी और आँसू—सब एक साथ उपस्थित हैं। इतना ही नहीं, यह कविता समाजशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र के बीच सेतु बनाती है। दुख यहाँ न तो पूरी तरह दबाया गया है, न ही पूरी तरह प्रदर्शित है ; वह समझा गया है, साझा किया गया है और अन्ततः मानवीय अनुभव की गरिमा में बदल दिया गया है। इस अर्थ में यह कविता आधुनिक हिन्दी कविता में दुख के समाजशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है, जहाँ भावनाएँ केवल अनुभूत नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक और सौन्दर्यशास्त्रीय स्तरों पर विचार से आंदोलित होती हैं।
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| 2024 |
(आठ)
बारिश में नाव
इसके पहले कि बारिश हो
शहर की सड़कें हो जाएँ
जलमग्न
मुझे शहर में आवाजाही के लिए
नाव तैयार कर लेनी चाहिए
नदी मुझसे मिलने मेरे घर
के दरवाज़े पर आ जाय
मुझे उससे जरूर मिल
लेना चाहिए
बारिश में कार और सायकिल
काम नहीं आती
पैदल चलना कठिन काम है
ऐसे में सबसे भरोसेमंद साधन
नाव है
उसे चलाने के लिये ईधन की
ज़रूरत नहीं होती
बस नाविक को हवा के
रुख का ज्ञान और
पतवार चलाने का हुनर
आना चाहिए
इस तरह कोई भी पार कर
सकता है भवसागर
समकालीन हिन्दी कविता में स्वप्निल श्रीवास्तव की रचनाएँ एक ऐसे संवेदनात्मक क्षेत्र का निर्माण करती हैं जहाँ निजी अनुभव, सामाजिक यथार्थ और दार्शनिक विवेक परस्पर घुल-मिल जाते हैं। उनकी कविता ‘बारिश में नाव’ आकार में भले ही संक्षिप्त हो, पर वैचारिक स्तर पर यह आधुनिक शहरी सभ्यता, पर्यावरणीय संकट और मनुष्य-प्रकृति संबंधों के पुनर्विचार का एक सघन पाठ प्रस्तुत करती है। यह कविता केवल ‘बारिश’ या ‘नाव’ का वर्णन नहीं है, बल्कि वह आधुनिकता के विकास-मॉडल, तकनीकी आत्ममुग्धता और प्रकृति-विरोधी शहरी संरचना की आलोचना का सूक्ष्म दस्तावेज़ है।
रेमंड विलियम्स ने ‘कल्चर एंड सोसाइटी’ पुस्तक में संस्कृति को केवल कला या परम्परा नहीं, बल्कि “सम्पूर्ण जीवन-पद्धति” कहा है। (“Culture is ordinary; it is the whole way of life”). इसी दृष्टि से देखें तो ‘बारिश में नाव’ आधुनिक शहरी जीवन-पद्धति के भीतर निहित संकट को उजागर करती है। कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ —
“इसके पहले कि बारिश हो
शहर की सड़कें हो जाएँ जलमग्न”
— भविष्यवाणी नहीं, बल्कि संरचनात्मक चेतावनी हैं। यहाँ बारिश कोई आकस्मिक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक पहले से ज्ञात आपदा है। यह आपदा प्राकृतिक कम और सामाजिक अधिक है। समाजशास्त्रीय रूप से यह उस शहरी नियोजन की विफलता को रेखांकित करती है जो प्रकृति को बाहर रखकर किया गया है।
हेनरी लेफ़ेब्व्र ने ‘द प्रोडक्शन स्पेस’ पुस्तक में आधुनिक शहर को “जीवन के जैविक प्रवाह से कटा हुआ कृत्रिम स्पेस” कहा है । स्वप्निल जी की कविता में शहर इसी कृत्रिमता के कारण बारिश के सामने असहाय दिखाई देता है। सड़कों का जलमग्न होना केवल पानी का भर जाना नहीं, बल्कि उस विकास के मिथक का डूब जाना है जिसने यह मान लिया था कि प्रकृति को अभियांत्रिकी से नियंत्रित किया जा सकता है।
“मुझे शहर में आवाजाही के लिये
नाव तैयार कर लेनी चाहिए”
— यह पंक्ति आधुनिक परिवहन-तंत्र के प्रति एक गहरी विडम्बनात्मक टिप्पणी है। कार, साइकिल और पैदल मार्ग आधुनिकता के प्रतीक हैं, परन्तु संकट की स्थिति में वे निष्क्रिय हो जाते हैं। इसके विपरीत, नाव — जो पारम्परिक, लोक-आधारित और प्रकृति-अनुकूल साधन है — भरोसेमंद बन जाती है। इको-क्रिटिसिज़्म के सन्दर्भ में यह उस विकल्प की ओर संकेत है जिसे आर्ने नेस ने ‘इकोलोजी,कम्युनिटी एंड लाइफ स्टाइल’ पुस्तक में “गहन पारिस्थितिक चेतना” (Deep Ecological Awareness) कहा है (— “A relational, total-field image replaces the man-in-environment image”)। यहाँ मनुष्य पर्यावरण के भीतर स्थित एक इकाई है, उसका स्वामी नहीं।
कविता का सबसे प्रभावशाली बिम्ब है —
“नदी मुझसे मिलने मेरे घर
के दरवाज़े पर आ जाय”।
यह पंक्ति अपने भीतर द्विस्तरीय अर्थ समेटे है। एक ओर यह शहरी बाढ़ की भयावहता का संकेत देती है, दूसरी ओर यह प्रकृति की उस वापसी का रूपक है जिसे आधुनिकता ने विस्थापित कर दिया है। नदी का ‘मिलने आना’ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृति की पुनरावृत्ति है। वॉल्टर बेंजामिन के शब्दों में, इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता (“History breaks into the present as a moment of danger”) नदी का दरवाज़े पर आना इसी ‘ख़तरे के क्षण’ में प्रकृति का हस्तक्षेप है।
यहाँ उल्लेखनीय है कि कवि का स्वर भयग्रस्त नहीं, बल्कि संवादात्मक है — “मुझे उससे जरूर मिल लेना चाहिए”। यह मिलन मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटे संवाद को पुनर्स्थापित करने की आकांक्षा है। इको-क्रिटिकल विमर्श में यह दृष्टि लोरेंस ब्यूएल की अवधारणा से जुड़ती है, जहाँ प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि नैतिक उपस्थिति माना जाता है (“Nature is not merely a framing device but an active presence” –‘The Environmental Imagination’)। स्वप्निल की कविता में नदी एक सक्रिय सत्ता है, जिससे मिलना आवश्यक है।
आधुनिक जीवन-शैली की आलोचना कविता में और स्पष्ट होती है —
“बारिश में कार और सायकिल
काम नही आती”।
कार यहाँ केवल एक वाहन नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी सभ्यता का प्रतीक है — ईंधन-निर्भर, प्रदूषणकारी और संकट में निष्प्रभावी। ज़िग्मुंट बाउमन ने आधुनिकता को ‘तरल’ कहा है, जहाँ स्थायित्व का अभाव होता है।
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| रवि रंजन |
सम्पर्क
मोबाइल : 9000606742










बहुत अच्छा लिखा है रवि रंजन जी ने।
जवाब देंहटाएंवाकई Swapnil Srivastava जी की कविता की जितनी तारीफ़ की जाय कम है। स्वप्निल जी ने कविता की अलग ही शैली विकसित कर ली है जो शायद ही किसी के पास हो।
बहुत अच्छा लिखा है रवि रंजन जी ने।
जवाब देंहटाएंवाकई Swapnil Srivastava जी की कविता की जितनी तारीफ़ की जाय कम है। स्वप्निल जी ने कविता की अलग ही शैली विकसित कर ली है जो शायद ही किसी के पास हो।
स्वपनिल जी के कविकर्म पर बहुत ही बेहतरीन लेख है यह। रविरंजन तक प्रणाम पहुँचे।
जवाब देंहटाएंअत्यंत अंतर्दृष्टिपूर्ण
जवाब देंहटाएंकविवर स्वप्निल श्रीवास्तव के सम्पूर्ण कविकर्म पर एक संपूर्ण आलेख।
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