राहुल राजेश के कविता संग्रह पर कुलदीप शर्मा की समीक्षा 'कितनी जरूरी है मुस्कान!'
राहुल राजेश हमारे समय के चर्चित कवि हैं। उनके पास कविता के सघन बिम्ब हैं जो और कवियों से अलग हैं। कम से कम शब्दों में बातों को कह जाना ही कवि की कारीगरी होती है। कुलदीप शर्मा उनके बारे में लिखते हैं 'अपनी कविताओं में राहुल कहे से ज्यादा अनकहा छोड़ देते हैं। कविता में इस तरह से अनकहा छोड़ देने की कला कविता को ऐसी ताकत देती है कि अनकहा जो छूट जाता है, वह कहे से ज्यादा मुखर हो उठता है। इस छूट गये के कारण ही कविता की वीथिका में नये अर्थ की खोज की शुरुआत होती है। यहीं से कविता का पाठक के साथ एक संवेदनात्मक रिश्ता बनता है। पाठक के लिए यह रिश्ता बेहद खास होता है, आत्मीयता से लबालब।' राहुल राजेश का तीसरा कविता संग्रह 'मुस्कान क्षण भर' हाल ही में प्रकाशित हुआ है। कवि को संग्रह की बधाई एवम शुभकामनाएं। कुलदीप शर्मा ने इस संग्रह पर समीक्षा लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राहुल राजेश के कविता संग्रह 'मुस्कान क्षण भर' पर कुलदीप शर्मा की समीक्षा 'कितनी जरूरी है मुस्कान!'
समीक्षा
'कितनी जरूरी है मुस्कान!'
('मुस्कान क्षण भर' पर बात)
कुलदीप शर्मा
राहुल राजेश, समकालीन हिंदी कविता में एक सुपरिचित और चर्चित नाम हैं। कविता के साथ-साथ इनका अनुवाद, आलोचना और निबन्ध आदि में भी बराबर का हस्तक्षेप है। इनके चार प्रकाशित कविता संग्रहों में 'मुस्कान क्षण भर' तीसरा कविता संग्रह है।
राहुल राजेश की कविता पर कुछ कहना इसलिए जरूरी है क्योंकि अपनी कविताओं में वे कहे से ज्यादा अनकहा छोड़ देते हैं। कविता में इस तरह से अनकहा छोड़ देने की कला कविता को ऐसी ताकत देती है कि अनकहा जो छूट जाता है, वह कहे से ज्यादा मुखर हो उठता है। इस छूट गये के कारण ही कविता की वीथिका में नये अर्थ की खोज की शुरुआत होती है। यहीं से कविता का पाठक के साथ एक संवेदनात्मक रिश्ता बनता है। पाठक के लिए यह रिश्ता बेहद खास होता है, आत्मीयता से लबालब। ऐसा क्या होता है कविता में कि आदमी उसे पढ़ते-पढ़ते अपने भीतर की यात्रा में उतरता चला जाए? दूसरा एक कारण यह भी है कि समकालीनों के रचनाकर्म पर बात करना आजकल चलन से बाहर हो गया है, सो इस जड़जाम को तोड़ना चाहता हूँ।
राहुल राजेश की कविता आपको यकीनन आपके अपने भीतर की यात्रा में सहयात्री बना कर चलती है। अपने पाठकीय अनुभव में वह आपको भीतर की यात्रा की शुरुआत करने में मदद करती है। सिर्फ मदद नहीं करती, आपको आपके भीतर उड़ेल देती है पूरा का पूरा। जहाँ आपके पास उस यात्रा पर उतरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता... यह उनकी कविता की ताकत है जो सहज ढंग से आपको वह सब दिखाती है जो आपकी दृष्टि से अमूमन छूट जाता है।
मैं राहुल राजेश से कभी मिला नहीं पर हम कविता के माध्यम से एक-दूसरे को बहुत पहले से जानते हैं। हाल ही के कुछ दिन छोड़ दें तो कभी हमारी फोन पर भी बात नहीं हुई। पर कविता के माध्यम से हुआ संवाद कहीं अधिक गहरा और सार्थक होता है। राहुल राजेश का कविता संग्रह 'मुस्कान क्षण भर' मैंने अमेजन से मंगवाया था। क्यूंकि कविता का मैं एक भुक्खड़ पाठक हूँ, सो पहली एक-दो बैठक में पूरा संग्रह पढ़ने की मेरी कोशिश न सिर्फ अधूरी रही बल्कि कविता पढ़ते-पढ़ते यह एहसास हुआ कि ये कविताएँ पठन में एक ठहराव और कई बार दुहराव की मांग करती हैं।
मेरा मानना है कि कविता में उतरने के लिए आप जिस पायदान का प्रयोग करते हैं, उसे जला डालिए और भूल जाइए! क्योंकि वहाँ से लौटना नहीं होता! कविता वहाँ आपकी अनुभूति का एक अनिवार्य हिस्सा बन जाती है। एक अच्छी कविता यह भी सुनिश्चित करती है कि इस यात्रा में एक उजाला हमेशा आपके साथ बना रहे। वह भटकन के विरोध में ही नहीं रहती, आपको लगातार सही रास्तों का संकेत भी देती चलती है। और यह सब एक सहजता के साथ घटता है।
राहुल राजेश की कविताओं को पढ़ने से पहले इस संग्रह में आपको कुछ संकेतक मिलेंगे। 'कवि के नोट्स' के रूप में। कवि ने अपने वक्तव्य को चार अलग-अलग शीर्षकों में बाँधा है। पहला है- 'कविता के तटबंध नहीं होते।' दूसरा है- 'कविता की मुक्ति कहाँ?' तीसरा फिर एक प्रश्न के रूप में है- 'आप किसके लिए लिखते हैं?' और चौथा है- 'कविता से क्रांति नहीं, अंतः क्रांति आती है'। ये नोट्स जहाँ एक ओर कविता को ले कर कुछ जरूरी सवाल उठाते हैं, वहीं कवि अपने कवि कर्म के मंतव्यों को भी स्पष्ट करता चलता है। ये नोट्स आपकी पाठकीय यात्रा को आसान भी करते हैं और आपको सचेत भी करते हैं। जब वे कहते हैं कि जन-जवार से ले कर खर-पतवार तक सब कुछ कविता का पथ्य है, कविता के लिए अपथ्य कुछ भी नहीं तो आशंकाओं का धुंधलका बहुत हद तक छंट जाता है। उनका यह पूरा वक्तव्य पढ़ते वक्त कविता के प्रति राहुल राजेश की समझ और दृष्टि स्पष्ट होती है। हालाँकि यह उनका मंतव्य है, स्पष्टीकरण नहीं।
राहुल राजेश का यह मानना है कि कविता में संवेदना और सादगी सहजता से पगी हो तो कविता मन को छू लेती है। सही है। कविता के विषय कवि नहीं चुन सकता बल्कि विषय कवि को चुनते हैं। मसलन युद्ध, संघर्ष या उथल-पुथल के समय कविता में फूलों, तितलियों, झरनों के बिम्ब नहीं उभरेंगे। कविता की सीमाएँ और उनका उल्लंघन भी इसी बात से तय होता है कि कवि अपने आस पास की दुनिया को किस दृष्टि से देख रहा है अथवा देख भी रहा है या नहीं! न देख पाना तो कवि के सामर्थ्य पर नहीं, उसके होने पर ही सवाल खड़े करेगा! कवि के पास प्रायः न देखने का विकल्प नहीं होता। संवेदना के स्तर पर वह आम आदमी से ज्यादा सेंसिटिव होता है। अपनी धरती अपने परिवेश से उदासीन रह पाना कवि के बस का नहीं होता।
एक बहुत अच्छी बात राहुल अपने नोट्स में कहते हैं कि कविता का तब बहुत नुकसान होता है, जब हम उसे एक हदबंदी से निकाल कर दूसरी हदबंदी में डाल देते हैं। हालांकि प्रतिस्थापन की यह क्रिया कई बार हमें आन्दोलन जैसा आभास या स्वाद देती है, पर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। यह मुक्ति नहीं है, केवल कैदखाने बदलने की कवायद है। और इसीलिए राहुल स्वयं को किसी तरह के वाद या कट्टरवाद से मुक्त रखना चाहते हैं। कविता का किसी भी वाद या विवाद से मुक्त रहना अच्छी बात है। पर यह विषय ऐसा है कि यह अलग से लम्बी बहस की मांग करता है। अस्तु।
कविता मूलतः परिवर्तनकामी प्रवृतियों और विचारों की संवाहक होती है। विश्व की सभी बड़ी क्रांतियों, आंदोलनों और राजनैतिक सत्तापलट में कविता ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राहुल राजेश का मानना है कि कविता से किसी भी प्रकार का परिवर्तन बाहर नहीं, अपने ही भीतर घटता है। जाहिर है कि उनसे सहमत न होने के लिए मेरे पास एक से ज्यादा कारण हैं। वे एक बहुत सुविधाजनक स्थापना में कविता को एक राजनैतिक नारा होने से बचा ले जाते हैं। पर अंतःक्रांति भी तो क्रान्ति ही है ना यह अंतः क्रांति कवि तक सीमित नहीं रहती, यह हर हाल पाठक तक जाती है और पाठक उसी क्रांति की एक कड़ी बन कर सामने आता है। राहुल कहते हैं कि कविता अंततः अपने परिमार्जन और अपने अंतःकरण के शुद्धिकरण और समृद्धिकरण के लिए ही है। मैं कहना चाहता हूँ कि यह भी कविता की एक दूसरी हदबंदी है। यह कविता को सायास किसी अव्यवस्था या अन्याय के खिलाफ अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ने का बहाना है। खैर, हर आदमी में कुछ वैचारिक हदबंदियाँ रहती हैं, जिन्हें सृजन के खेत में मेड़ की तरह मान्यता मिलनी चाहिए। यह खेत का क्षेत्रफल सुनिश्चित करती है।
बहरहाल, कविता अपना काम करती है। राहुल राजेश खुद भी यह मानते हैं-
"अभी-अभी कुछ कविताएँ पढ़कर उठा हूँ
और कुछ और मनुष्यता से भर गया हूँ
बच्चों को चूमने और पत्नी को गले लगाने की
बेचैनी बढ़ गयी है
दुनिया जीने के लिए कुछ और बेहतर हो गयी है।"
(अभी-अभी/ पृ.27)
तो देखिये कि यह काम करती है कविता। यह दुनिया को बेहतर बनाने, जीने के काबिल बनाने का जरूरी उपकरण अगर है तो यह काम कविता को सहज ढंग से करने दीजिये ना। वे लोग जो कविता नहीं पढ़ते या कविता से सीधा राबता नहीं रखते, अन्याय और अत्याचार तो उन्हें भी घेर लेते हैं। आप किसी व्यवस्था-बदलाव के पक्षधर हो या न हो, अपने भीतर और बाहर कवि अपनी चीजों, स्थितियों और विचारों को निरंतर एक बेहतर सिस्टम देता हुआ चलता है। शब्दों में ही सही, चीजों को और स्थितियों को ठीक करने की जद्दोजेहद वहाँ भी रहती है। यह उसके भीतर निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है। इसे मैं क्रांति की शुरुआत कहता हूँ। आजकल एक दूसरी तरह के फैशन में है कि इस शब्द को तड़ीपार कर दिया जाए! जो लोग क्रांति को एक दकियानूसी शब्द मानते हैं, उनके भीतर-बाहर भी क्रांति घटित होती है।
'डर झूठ का जनक है
साहस सत्य का पिता
विडम्बना तो देखिये-
झूठ पूरे साहस के साथ
अड़ा रहता है आखिर तक
और सच आखिर तक आते-आते
बदल जाता है एक झूठ में
डर के मारे!"
(झूठा सच/पृ.28)
झूठ में यह साहस तभी आता है, जब सच की सुरक्षा-व्यवस्था में नैतिक चूक होती है। यह चूक बहुधा कविता में भी होती है। सुखद है कि राहुल राजेश अपने कवि कर्म में इस संभावित चूक के प्रति बहुत सचेत हैं। इनकी कविता में एक डिसआर्मिंग ओनेस्टी है जो चालाकियों का समर्पण कराती है।
"कवि को अपने उज्ज्वल भविष्य और सुयश का
समुचित प्रबंध अवश्य कर लेना चाहिए
उसे अपना एक जीवनीकार रख लेना चाहिए
जो उसके जीवन के हर प्रसंग को नजदीक से नोट करे।"
(कवि को/पृ.44-45)
उसे एक छायाकार, इतिहासकार, विज्ञापनकार, रुपांतरकार, टिप्पणीकार, रख लेना चाहिए क्योंकि केवल कविता लिख कर वह कहीं नहीं पहुँच सकता। कविता के कहीं न पहुँच सकने की पीड़ा से त्रस्त कवि कौन-कौन से हथकंडे अपनाता है, राहुल राजेश उसकी नंगी यशलिप्सा जग जाहिर करते हैं, जुगाड़ कवियों को नसीहत देते हुए। बिलकुल हल्के कॉमिक स्वरों में भी यह कविता आज के अधिकतर कवियों पर कसैला तंज है।
दरअसल 'मुस्कान क्षण भर' लेने के पीछे राहुल राजेश की फोटोग्राफर पर लिखी गयी उनकी बीस छोटी-छोटी कविताएँ हैं जो कई वर्ष पहले मैंने 'नया ज्ञानोदय' में पढ़ी थीं। मैंने राहुल से फोन पर पूछा था कि ये कविताएँ उनके किस संग्रह में हैं। सो 'मुस्कान क्षण भर' मंगवा ली। किताब पढ़ते-पढ़ते उनकी अनेक कविताओं में मुझे समकालीन हिंदी कविता के बने-बनाए ढर्रों से अलग इतना कुछ पढ़ने को मिला कि मैंने इस किताब पर अलग से यह छोटी-सी टीप लिखने का मन बनाया जिसका जिक्र मैंने पहले किया है। इस संग्रह की 95 के करीब कविताओं में से 'फोटोग्राफर' के अलावा भी अधिकांश कविताओं की महक पाठक के नथुनों में फड़कने वाली है। छोटी कविताएँ सिर्फ आयतन में छोटी है, प्रभाव में देर तक रहने वाली चुभन छोड़ती हैं। ज्यों नाविक के तीर!
"सिर्फ चीते की चाल पर मुग्ध होना
घोंघे की मन्थरता की बेकद्री है
जितनी तेज चाल जिसकी
जितनी ऊँची छलांग जिसकी
उतनी अधिक खुराक उसकी
उतना खूंखार वह!"
(बेकद्री/पृ.20)
या फिर-
इस अरण्य में
जिसने भी मिथ्या की शरण ली
उसे अभयदान मिला
इस अरण्य में
जिसने भी सत्य का संधान किया
वह छला गया मारा गया
इस अरण्य में
सुना है, देवताओं का वास है।"
(इस अरण्य में पृ. 107)
जिस अरण्य की बात राहुल कर रहे हैं, वह शहरों, बस्तियों, गाँवाँ तक पैर पसार चुका है। इस जंगल में रहते-रहते मनुष्य या तो पशु हो जाता है या देवता। मनुष्य नहीं रहता।
झुकना महज़ एक क्रिया नहीं है। यह अपने निहितार्थों में मनुष्य का चरित्र उजागर करता है-
"न झुकना
गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध नहीं है
फलदार होकर झुकना और बात है
फल की इच्छा में
झुक जाना और बात"
(झुकना/पृ.147)
आज के इस घोर बाजारू समय में लोग ज्यादा से ज्यादा स्मार्ट होते जा रहे हैं। हर चीज का, हर काम का, हर रिश्ते का अपना एक गणित है, जो सरल नहीं रहा है। हम पहले कैल्कुलेट करते हैं कि कितना क्या किया जाए और किसके लिए किया जाए कि हम औसतन एक सफल व्यक्ति के फ्रेम में फिट हो सकें। ये जीने की आधुनिक शर्ते हैं, पर इस जीवन के बीच में से एक मानवीय तत्व है जो विलुप्त होता जा रहा है। राहुल राजेश की कविता 'जरूरत' बड़े साफ और लगभग सपाट शब्दों में इस विडम्बना को रेखांकित करती है-
"वे उतने ही विनम्र हैं, जितने की जरूरत है
वे उतने ही ईमानदार है, जितने की जरूरत है
वे उतने ही क्रांतिकारी है, जितने की जरूरत है
वे उतने ही उदास है, जितने की जरूरत है
वे उतने ही खिलाफ है, जितने की जरूरत है
वे उतने ही कवि हैं, जितने की जरूरत है।"
(जरूरत/पृ. 115)
यानी कुछ भी होना, होने से इतर किसी और उद्देश्य की पूर्ति के लिए है। कितना भयावह है इस तरह से कुछ भी होना। (मुझे लग रहा है कि यह जो मैं लिख रहा हूँ, मुझे इसकी ज़रूरत का कुछ अता-पता ही नहीं है, सो यह बेमानी है)
"पेट भरने की जगह
पेटी भरने की भूख ने
लूट ली खेतों की इज्ज़त
XXX
गाँव के हाट से उठ कर
बाज़ार के कोठे में अपनी नुमाइश
करने वाले किसानों के कोठे में
अब धान के पुश्तैनी बीजों की
आदिम किलकारी नहीं सुनाई देती।"
(अकारथ पृ. 110)
राहुल राजेश का अनुभव संसार विस्तृत है। ज्यादातर शहरी जीवन की चुनौतियाँ, विसंगतियाँ, दुःख और संकीर्णताएँ उनकी कविताई के सामने आते हैं, पर गाँव-देहात की खेत-मिट्टी और वहाँ की कठिनतर होती जा रही जिंदगी भी उनके रडार में रहती है।
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राहुल राजेश |
भारतीय मनीषा में एक अवधारणा है कि दुःख वास्तव में सुख सापेक्षिक स्थिति है। यह हमारी एषणाओं का अवांछित प्रतिफलन है। इसे अयथार्थ जीवन दशा माना जाता है। इसके मूल में यही मान्यता रही होगी कि गीता के या बौद्ध धर्म के अनुसार, इच्छाओं के आवेग से दुःख उत्पन्न होता है और इच्छाओं की अनुपस्थिति निष्काम कर्म द्वारा संभव है। चलिए, यही मान लेते हैं। पर प्राकृतिक आपदाओं, जाति वर्ण व्यवस्था, सदियों से मानस में गुंथी अभावजनित कुंठाएँ, प्रवंचनाएँ- एक संवेदनशील कवि उनका क्या करे? उसके सामने जो त्रासद स्थितियाँ हैं. पीड़ा है, अनाचार है, शोषण और उत्पीड़न है, उसका कोई कवि क्या करे?
"जैसे बात के अंदर बात है वैसे ही जात के अंदर जात है
बड़ों के भीतर भी कोई छोटा है छोटों के भीतर भी कोई बड़ा है
हर कोई एक दूसरे की राह रोके खड़ा है
जात धर्म के चक्कर में मूल धरम करम की किसे पड़ी है
देह तो लकड़ी है
पर हमारी बुद्धि भी बज्जर हुई पड़ी है।"
(देह तो लकड़ी है, पृ.99)
शिल्प की दृष्टि से संग्रह की कुछ कविताएँ ऐसी हैं जिनमें यथार्य अपने भरे-पूरे कद और खुरदुरेपन के साथ उभर कर आया है। कथन का नयापन चौकाता भी है और सहलाता भी है। हिंदी कविता के समकाल में ऐसा जादू बहुत से नये कवियों के यहाँ देखने को मिलता है किन्तु इसमें नकल के विपरीत अभिव्यक्ति की एक ईमानदार जिद्द दिखती है। दृष्टि और काव्य समझ की एक नायाब परम्परा, जिसे मुक्तिबोध के बाद अनेक कवियों ने जिम्मेदारी और श्रम से निभाया है। इस श्रेणी में मैं राहुल राजेश की 'समय की इबारतें', 'मुस्कान क्षण भर', 'दरवाजे (दस कविताएँ) और 'फोटोग्राफर' (बीस कविताएँ), 'स्वाद' (तीन कविताएँ) आदि कविताओं को शामिल करता हूँ। हालाँकि प्रतीकों और बिम्बों की ऐसी सहज सघनता कुछ अन्य कविताओं में भी देखने को मिलती है।
"कड़क धूप के बीच
अचानक बरस गयी झमाझम बारिश
आसमान का यकायक प्रकट हो गया पश्चाताप है।"
आसमान का पश्चाताप, सरकारी ऑतों का अतिसार, पतलून में लगा पैबंद, गरीबी के आंगन में खिला बनफूल आदि कुछ ऐसे प्रतीक हैं जिनसे राहुल राजेश की कविता की जमीन की थाह ली जा सकती है। इसी कविता में आगे वे कहते हैं-
"बच्चों की निर्मल हँसी
प्रेम की गर्मीली मुस्कान है
नदियों का संगम दरअसल नदियों का चुम्बन है
डेल्टा समुद्र से आलिंगन
नदियों के जीवन में वैराग्य की कोई जगह नहीं।
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सुख के दिनों में दुःख के दिनों को
भूल जाना दुखों के प्रति अकृतज्ञ होना है
केवल और केवल सुख की आकांक्षा करना
मनुष्य की सबसे बड़ी दरिद्रता है।"
(समय की इबारतें, पृ.62-63)
'मुस्कान क्षण भर' से पुस्तक का शीर्षक लिया गया है। क्षण भर की मुस्कान क्षणिक बिलकुल नहीं है। यह भीतर कहीं निसर्ग से उपजी खुशी को व्यक्त करने के लिए चेहरे पर अनायास आ गयी मुस्कान का बाहर की प्रकृति के उल्लास के साथ सम्वाद है। इस मुस्कान को बचाए रखना ही स्वयं को बचाए रखना है-
'तिर गयी है चेहरे पर
खुद ब खुद एक भीनी मुस्कान
अपनी ही मुस्कान पर
पुनः मुस्कुरा दिया हूँ मैं!"
(पृ.64-65)
अपनी ही मुस्कान पर रीझना, फिर से उस पर मुस्कुराना, हवाओं को चूमना, छूना त्वचा से या आँखों की बंद पुतलियों से यह सब कवि का एकान्तिक अनुभव है। इसे शब्द देना या कोई ध्वनि देना सरल नहीं है।
'फोटोग्राफर' (बीस कविताएँ) इन्हीं म्यूजिकल ध्वनियों का एक कन्सर्ट है। फोटोग्राफर जैसे विषय पर मुझे याद नहीं पड़ता, मैंने इससे पहले हिंदी या किसी अन्य आषा में भी कोई कविता पढ़ी हो। फोटोग्राफर आपको कैमरे की आँख से देखता है पर आप जब फोटोग्राफर को इन कविताओं में से देखते हैं तो एक जादू होता है। आप एक मैचिंग दृष्टि के साथ उसे देख पाते हैं जो वन टू थ्री स्माइल बोल कर आपकी मुस्कान को एक क्षण में स्थिर करके ऐतिहासिक बना देने का हुनर रखता है।
"रंगों का रंगमंच है
उसकी आँखें
रंगों की कारीगरी उसकी आँखों में
सबसे अधिक दिखती है
श्वेत श्याम के रंग उसकी आँखों में
सबसे अधिक खिलते हैं।"
एक फोटोग्राफर के यहाँ प्रकाश के जो अर्थ हैं, वे तब तक समझ में नहीं आते, जब तक आप उसके अंधेरे को देखने की क्षमता नहीं रखते।
"जानता नहीं हो भले वह
कैसे गमन करता है प्रकाश
क्या होती है प्रकाश की गति
किसे कहते है तरंगदैर्ध्य
और कितनी होती है
किस रंग की फ्रीक्वेंसी
प्रकाश उसके लिए
भौतिकी का अध्याय नहीं
उसकी आँखों की व्यायामशाला है।"
फोटोग्राफर को छायाकार इसलिए कहते हैं कि-
वह किरणों की कूची से
चित्र बनाता है
प्रकाश की छैनी से
नक्काशी करता है
छाया की कलम से कविता रचता है!"
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"वह आपकी नहीं
प्रकाश की भंगिमाएं देखता है
वह आपकी नहीं
छाया की मुद्राएँ देखता है
एक फोटोग्राफर ही है जो आपके चेहरे के सौन्दर्य को उस तरह से देख सकता है जैसे माँ अपने बच्चे का सौन्दर्य देखती है, बेशक मोह से नहीं, वह आपको अपने हुनर से देखता है-
"एक वही है
जो जानता है ठीक-ठीक
ठीक इस वक्त कितना घनत्व है
छाया का, धूप का
कितनी देर में धूप इतनी पिघल जाएगी
कि उसकी आँखों से हो कर गुजरेगी जो रौशनी
उसमे नहा कर आपका चेहरा
दिखेगा सबसे सुनहरा!"
"एक वही है
जिसकी कामना में होता है
आपका सबसे सुंदर चेहरा
एक वही है
जो चाहता है
आप सबसे सच्ची
सबसे मीठी
सबसे मोहक
सबसे मादक हँसी हँसें।"
"वह सिर्फ प्रकाश का पराक्रम नहीं
अँधेरे की आभा भी देखता है
वह सिर्फ दृश्य नहीं
सिर्फ समय नहीं
इतिहास भी दर्ज करता है।"
इन कविताओं से गुजरते हुए लगातार यह एहसास रहता है कि अपनी बात रखते हुए राहुल राजेश कहीं भी खुद बीच में नहीं आते। कथ्य और विषय के बीच इनका कहीं कोई हस्तक्षेप नहीं रहता। वे काव्य विषय को पूरा मौका देते हैं कि वही मुखर रहे, अपनी बात कहे
"किसी हस्ती से
हाथ मिलाते वक्त
उसकी आँखों की जद में आप
हो न हो
आपकी आँखों की जद में
वह बेतरह होता है!"
जो आपमें फोटोग्राफर देख सकता है, आप नहीं देख सकते। उसके पास एक उपकरण रहता है कैमरे के रूप में, जिसे वह अपनी कला से एक ऐसी आँख में बदल देता है जो सिर्फ सामने के ऑब्जेक्ट को वस्तुनिष्ठ हो कर नहीं देखती, उसके अव्यक्त सौन्दर्य को आवनिष्ठ होकर दृश्य में बदल देती है-
"आपकी आँखें जितनी सजल
आपकी पलके जितनी जहीन
आपके होंठ जितने हसीन
आपके दांत जितने धवल
उसे दिखते हैं
उतने आपको कभी नहीं दिखते
तस्वीर में वह आपकी आँखें नहीं
आपकी आँखों का पानी संजोता है।"
(फोटोग्राफर, पृ. 73-82)
राहुल राजेश में एक सबसे अच्छी बात यह है कि वे कविता के किसी बने-बनाए उब से बात नहीं करते। उन्हें अपने समकाल की प्रवृत्तियों को कविता में बनाए रखने की रत्ती भर परवाह नहीं है। बात कैसे कही जाए कि वह सीधी वहाँ पहुंचे, जहाँ के लिए कही गयी है, यह वे बखूबी जानते हैं। इसलिए वे शब्दों की अनावश्यक कीमियागिरी से भी बचते है, फिजूलखर्ची से भी।
किसी खबर की मौत पर आजकल कोई हंगामा नहीं होता। हंगामा तो दूर की बात है, किसी भी मौत की खबर की कानोकान खबर तक नहीं होती। खबरों की अपनी एक अलग सियासत है। जरूरी खबरे बिना किसी आहट के गुजर जाती हैं या दफन कर दी जाती हैं-
'हर खबर को
दफन हो जाना है
एक न एक दिन
या कहिये कि
दफन कर दिया जाना है
अब पत्थलगड़ी को ही लीजिये
जहाँ सात आदिवासियों के सिर
सरेआम काट दिए गये!
यह जन्तर मन्तर पर जमा होने का
सबब थोड़े है?"
(पृ. 152-153)
प्रश्न उठाने वाली खबरें, सत्ता को कटघरे में खड़ी करने वाली खबरें, असहज कर देने वाली खबरें, सरकारों पर दाग लगने वाली खबरे सब की सब ऐसी खबरें हैं जो जल्दबाजी में दफन कर दी जाती हैं।
राहुल राजेश की कविताओं में कलकता अपनी पूरी पुरातनता, सांस्कृतिक ठेलपेल, राजनीति और भदेस भोलेपन के साथ मौजूद है। कलकता चूंकि अब कोलकाता है तो इसमें बंगालीपन की महक थोड़ी ज्यादा हो गयी है। कलकता में एक गड़ियाहाट मार्केट है, मध्यवर्गीय बाजार, कुछ कुछ दिल्ली की चांदनी चौक जैसा। यहाँ कलकता के जनजीवन का स्पंदन महसूस किया जा सकता है। राजेश इस हाट को हमारी आँखों के सामने रख देते हैं। अपने दोस्त अरिंदम के साथ इस हाट को देखने गये राजेश कविता के अंत में कहते हैं-
उस औरत को देख रहे है?
कौन बड़ी-सी बिंदी वाली?
जो खूब सिन्दूर लगाए है।
और खूब चूड़ी पहने हैं?
लगता है अभी अभी शादी हुई है, है न?
देखिये देखिये, अभी उस तरफ गयी
उसके साथ
फिर लौट आई
देखिये देखिये, अभी बस में चढ़ी
और तुरंत उतर गयी
अरे हाँ, कुछ हुआ है क्या?
नहीं, ग्राहक पटा रही है।" (पृ. 104-106)
एक बिलकुल छोटी कविता है 'अब तो'-
"अब तो
बात बात पे
निकलती है रैलियाँ
अब कौन निकालता है प्रभात फेरियाँ?"
(पृ. 49)
पता नहीं, राहुल क्या कहना चाह रहे हैं? कि रैलियाँ नहीं निकलनी चाहिये? सिर्फ प्रभात फेरियाँ निकलें? प्रभात फेरियाँ बिलकुल अहिंसक, निरापद, और भक्ति भाव से भरी भीड़ का गाता-बजाता, शांत लोगों का जलूस है। और रैलियाँ? अपने अधिकारों के लिए निकली भीड़ का मुखर आक्रोश जिसमें बहुधा हिंसा की भी सम्भावना रहती है। इस तरह से देखा जाए तो रैलियाँ हमारे समय का व्यतिक्रम है। किन्हीं भी आदर्श जीवन स्थितियों में जहाँ न शोषण हो, न उत्पीड़न, न अनाचार, न अन्याय, कोई जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करने को बाध्य न हो, ऐसी सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था में प्रभात फेरियाँ ही चाहिये। उस अदृश्य ईश्वर का गुणगान करते हुए समय बीते, प्रेम, सौहार्द, परस्पर सद्भाव यह सब हो तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है। पर यथार्थ में ऐसा कुछ नहीं है। इसीलिए बात बात पर रैलियाँ हैं, प्रभात फेरियाँ नहीं!
इसी संग्रह में कुछ और ऐसी कविताएँ हैं जो जरूरी तौर पर ध्यान की माँग करती हैं, जैसे- 'वह औरत', 'ग्रेटा धनबर्ग', 'नत हूँ मैं, 'झूठे लोगों से भरी पड़ी है दुनिया, 'प्यास' और अन्य कविताएँ। इनमें दरवाजों पर दस कविताओं समेत पूरा संग्रह पाठकीय आह्लाद पैदा करता है। कवि के चौथे कविता संग्रह 'झूठ के विरुद्ध' की भी प्रतीक्षा है। राहुल राजेश को आत्मीय बधाई!!
'मुस्कान क्षण भर' (कविता संग्रह)
सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
पृष्ठ: 176
मूल्य रु. 300/
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कुलदीप शर्मा |
कुलदीप शर्मा,
ऊना, हिमाचल प्रदेश।
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