अकिन्वाड़े ओलुबोले शोयिंका की कुछ कविताएँ

 

शोयिंका


पश्चिमी दुनिया की इस बात के लिए प्रायः तारीफ की जाती है कि वे स्वतन्त्रता और समानता में विश्वास रखते हैं। लेकिन यह अधूरा सच है। रंग और नस्ल के आधार पर वे खुद को औरों से श्रेष्ठ समझते हैं। सभी अश्वेत उनके लिए काले हैं और काले होने की वजह से असभ्य हैं। इन असभ्य लोगों को कभी सभ्य बनाने का ठेका इन सभ्य लोगों ने ही लिया था और इनके लिए एक टर्म गढ़ा 'व्हाईट्स मैन बर्डन'। खुद को सभ्य कहने वाले इन यूरोपीय लोगों ने अपने उपनिवेशों की  खुली लूटपाट की। अफ्रीका इन औपनिवेशिक देशों की लूटपाट का खुला स्थल बन गया। 

अश्वेत अफ्रीका की परंपरा, संस्कृति और धार्मिक विश्वास में युगों-युगों से रचे-बसे मिथकों की काव्यात्मकता और उनकी नई रचनात्मक सम्भावनाओं को शोयिंका ने ही पहली बार पहचाना। प्राचीन यूनानी मिथकों की आधुनिक यूरोपीय व्याख्या से प्रेरित हो उन्होंने योरूबा देवमाला की सर्वथा नई दृष्टि से देखा। सोयिंका की रचनाएं, "संस्कृति और नागरिकता", नागरिकता और संस्कृति के मुद्दों की पड़ताल करती है और यह बताती है कि कला के कार्यों को किसी देश या संस्कृति के लिए कैसे प्रासंगिक कहा जा सकता है और वे राष्ट्रीय या सांस्कृतिक पहचान को आकार देने में कैसे योगदान दे सकते हैं। आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं ओलुबोले शोयिंका के परिचय के साथ साथ उन की कुछ कविताएं। कविताओं का अनुवाद और प्रस्तुतिकरण वरिष्ठ कवि विनोद दास का है।



अफ़्रीकी कवि 

अकिन्वाड़े ओलुबोले शोयिंका 

          

परिचय और कविताओं का हिन्दी अनुवाद : विनोद दास 



अकिन्वाड़े ओलुबोले शोयिंका का काव्य संसार जटिल और पेचीदा है। इनकी दुनिया में इतनी हलचल, आवाजाही, मनोभाव और नाटकीय मुद्राएँ हैं कि कोई पाठक आश्चर्य से भर सकता है। इनका जन्म नाइज़ीरिया के ओगुन राज्य स्थित अव्योकुटा में 13 जुलाई 1934 को हुआ था। शोयिंका के पिता एनीओला गिरजाघर में पादरी और शिक्षक थे। माँ आयोडेले दुकान चलाती थीं। यही नहीं, माँ महिला मुक्ति आंदोलन में सक्रिय थीं। ईसाई परिवार में जन्म लेने के बावजूद शोयिंका पश्चिमी नाइज़ीरिया की योरुबा जनजाति की संस्कृति से गहरा लगाव रखते थे। युवावस्था में शोयिंका ने ईसाई धर्म छोड़ कर प्रकृति धर्म अपना लिया था। योरूबा के देवता “योगुन” माने जाते हैं। शोयिंका का बचपन इबादान नगर के पास पहाड़ियों से घिरे प्रकृति की गोद में बीता। अपने बचपन की स्मृतियों को शोयिंका ने अपनी आत्मकथा 'ऐक : द इयर्स ऑफ़ चाइल्डहुड' में बेहद मार्मिकता से दर्ज़ किया है। 


शोयिंका की शुरुआती पढ़ाई ऐक अव्योकुटा में हुई। फिर कॉलेज के लिए इबादान गए जहाँ वह कविताएँ लिखने लगे। इनकी पहली कविता “थन्डर टू स्टॉर्म” विश्वविद्यालय की पत्रिका में छपी थी। 


फिर शोयिंका इंग्लैंड के लीड्स विश्वविद्यालय की छात्रवृति पर वहाँ पढ़ने चले गए। यहाँ उन्होंने एशिया की संस्कृति और साहित्य का गहरा अध्ययन किया। 1973 में उन्होंने अपनी डॉक्टरेट पूरी की। यहाँ प्रवास के दौरान उन्होंने अमेरिका, यूरोप की नाट्य परम्परा को जानने-समझने की कोशिश की। यहीं नहीं, इंग्लैंड प्रवास के छह सालों के दौरान लंदन के रॉयल कोर्ट थिएटर में नाट्य वाचन का काम भी किया। एकांकी नाटक और नाटक भी लिखे। 1959 में अफ़्रीकी नाटकों का अध्ययन करने के लिए वह नाइजीरिया लौट आये। फिर 1965 से लागोस विश्वविद्यालय में अँग्रेज़ी पढ़ाने लगे। इसके पहले 1964 में शोयिंका के पाँच नाटकों का संकलन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित हो चुका था जिसके कारण उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी थी। 1967 में उनका कविता संग्रह “इन्दारे एंड अदर पोयम्स के प्रकाशन से उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ी। अमेरिका प्रवास में अभिनेता नाटककार ओ.सी डेविस के साथ मिलकर कई योजनाओं पर काम करने के दौरान नाइजेरिया में गृहयुद्ध की खबर पा कर वह वापस देश लौट आए। 


वियाफ्रा के अलगाव को ले कर नाइजीरियाई गृहयुद्ध की हिंसा से अपने देश को बचाने के लिए उन्होंने बहुत कोशिश किया। युद्ध विराम की उनकी अपील के बावजूद बियाफ्रा विद्रोहियों के साथ साज़िश करने के आरोप में 17 अगस्त 1967 को शोयिंका को गिरफ़्तार कर लिया गया। 22 महीने वह कैद में रहे। कारागार के अपने यातना भरे अनुभवों को अपनी आत्मकथा “द मैन डाइड” में उन्होंने व्यक्त किया है। शटिल इन द क्रीपट” में संकलित कविताओं में कारागार स्थित उनके मनोभावों और यातनाओं का चित्रण मिलता है। जेल में रहते हुए उन्होंने टॉइलेट पेपर पर लिख कर अपनी कविताओं को बचाया। “जीवित समाधि” और “फूल मेरी धरती के लिए” सरीखी कविता जेल कर्मचारियों की नज़र बचा कर बाहर प्रकाशित की गयीं। उनकी सम्मानपूर्वक रिहाई के लिए विश्व के नामचीन साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने आवाज़ उठायी। अश्वेत अफ्रीका के जटिल समाज की राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का परिचय उनकी कविताओं में मिलता है। कहना न होगा कि परम्परा और औद्योगीकरण के द्वन्द्व उनकी कविता का मूल स्वर है। 


कृषि पर निर्भर जीवन को प्रकृति की गोद में रहते हुए आदिम जीवन रस को बचाने के लिए जिस तरह परम्परागत संस्कृति को संघर्ष करना पड़ रहा था, किस तरह लोक संस्कृति से जुड़े अनुष्ठानों पर इनका प्रभाव पड़ रहा था,इसे शोयिंका ने अपनी कविता में प्राचीन मिथकों और टटके बिम्बों के माध्यम से रूपायित किया है। कहना न होगा कि अफ्रीका की परम्परा, संस्कृति और धार्मिक विश्वासों को खासतौर से योरुबा देवमाला को उन्होंने अपनी कविता में नई दृष्टि से रचा है। दरअसल यूनानी मिथकों की आधुनिक यूरोपीय व्याख्या से प्रेरित होकर उन्होंने योरूबा देवमाला को नयी दृष्टि से जाँचा-परखा। बचपन में शोयिंका अपने यहाँ के देवता ओगुन से डरते थे। उन्हें पिशाच समझते थे। लेकिन थोड़ा बड़े होने पर उन्हें लगा कि ओगुन तो उनकी रक्षा करने वाले देवता हैं।  





यहाँ यह समझना जरूरी है कि उपनिवेश बनने के बाद अफ्रीका में इस्लाम और ईसाई धर्म पहुँचा। इसके पहले अफ़्रीका के मूल निवासी प्रकृति की पूजा करते थे। इसे प्रकृति धर्म कहा जाता था। ऐतिहासिक कारणों के फलस्वरूप बड़ी संख्या में अश्वेतों ने इस्लाम-ईसाई धर्म अपना लिया था। हालाँकि अपने आदिम धर्म की और लौटने के लिए अफ्रीका में जो सांस्कृतिक आन्दोलन चल रहा था, शोयिंका उसके साथ थे। लेकिन शोयिंका सेनेगल के बड़े लेखक लियोपोल्ड सेदार सेंघर के नेतृत्व में चल रहे नीग्रो श्रेष्ठता के आन्दोलन का विरोध भी कर रहे थे। शोयिंका ने अफ़्रीकी परम्पराओं और संस्कृतियों के आन्तरिक विरोधाभासों और इनकी सामाजिक प्रवृतियों को रेखांकित करते हुए उनकी तर्कसंगत व्याख्या की। वह इस बात को शिद्दत से समझते थे कि साहित्य को प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ किस तरह इस्तेमाल कर सकती हैं। शोयिंका इस प्रवृति से बचने के लिए हमेशा लोगों को सावधान करते रहे। अपने महत्त्वपूर्ण निबन्ध “आत्ममुग्धता के बाद” में ऐसी प्रतिक्रियावादी प्रवृतियों को उन्होंने सशक्त ढंग से आलोचना की है।  


मृत्यु और जीवन का संघर्ष, अन्याय, अत्याचार, दमन और शोषण का प्रतिकार शोयिंका  कविताओं का प्रतिपाद्य रहा है। उनकी कविता में करुणा और अवसाद की एक पतली लहर मौजूद रहती है। इसका कारण उनके देश के वातावरण में व्याप्त घृणा, हिंसा और भय का व्याप्त होना था। इसे अश्वेत अपनी आत्मा पर झेलते थे। शोयिंका औपनिवेशिक समाज में एक अश्वेत की पीड़ा को अपनी कविता के जरिए अत्यन्त ईमानदारी से स्वर देते रहे। यहाँ यह रेखांकित करना जरूरी है कि शोयिंका की कविताओं का स्वर पराजय का नहीं है। उनकी कविता विनम्र है लेकिन दृढ़। अफ्रीका कविता में लय का बड़ा महत्त्व है। शोयिंका की कविता इसकी अपवाद नहीं है। 


शोयिंका ने केवल कविताएँ ही नहीं लिखीं, उन्होंने नाटक, उपन्यास, संस्मरण और निबन्ध भी लिखे। उनके गद्य में काव्यात्मकता का पुट मिलता है। दि लायन एंड दि ज्वेल, दि स्ट्रॉंग ब्रीड, दि स्वॉम्प डरवेलर्स, दि रोड दि ट्राइल्स ऑफ ब्रदर ज़ेरो, कांगीस हार्वेस्ट मैड्मैन एण्ड स्पेशलिस्ट शोयिंका के महत्त्वपूर्ण नाटक हैं। इन्होंने दि इंटेरप्रेटर्स, सीजन ऑफ एनोमी नामक दो उपन्यास भी लिखे हैं। शोयिंका के कविता संकलन शटल इन दि क्रिप्ट, इन्डारे एंड अदर पोयम्स, पोयम्स फ्रॉम प्रिजन, ओगुन एबिबिमान आदि उनकी कृतियाँ अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं। 


शोयिंका ने “चिंदाबा” पत्रिका का सम्पादन भी किया। इसके अलावा अश्वेत अफ़्रीकी कविताओं को उन्होंने ”पोयम्स ऑफ़ ब्लैक अफ्रीका” नाम से सम्पादित किया जिससे रंगभेद से जूझती दुनिया से विश्व जगत के पाठकों का परिचय हुआ। शोयिंका को विश्व की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं ने उनकी रचनाधर्मिता के लिए सम्मानित किया। ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर की मानद उपाधि मिली। जर्मन गणराज्य के अकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड लेटर्स के सदस्य रहे। 1986 में साहित्य के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।


उन्होंने लिखा है कि लिखने का आंतरिक दबाव न होता तो वह वर्ष में केवल चंद कविताएँ रचते, छोटी सी खेती करते और बचे हुए समय में अफ़्रीकी कला मूर्तियों की खोज में लगाते।  कहने की ज़रूरत नहीं कि एक सच्चा कवि ही इस तरह सोच सकता है। 





अकिन्वाड़े ओलुबोले शोयिंका की कुछ कविताएँ 



टेलीफ़ोन पर बातचीत 


वाज़िब किराया 

मामूली इलाका 

मकान मालिकन ने हलफ़िया कहा

कि वह इस इमारत में नहीं रहती 

अब बस मुझे अपना बारे में इकबाल करना ही बाकी रह गया था 

आगाह करते हुए मैंने उनसे कहा

“मैडम आने-जाने में समय बर्बाद करना मुझे नापसन्द है

मैं पहले बता दूँ कि मैं अफ्रीकी हूँ.”

खिंच गयी ख़ामोशी 

आभिजात्य ख़ामोशी के बोझ से टूट गयी बात की लड़ी

फिर लिपस्टिक रंगी आवाज़ के साथ  

सुनहरी लम्बी सिगरेटदानी से सिगरेट निकालने की चीं-चीं सुनायी दी 

लगा कि मैं ग़लत फँस गया 

“कितना काला है रंग

हाँ ! मैंने ग़लत नहीं सुना था

“तुम हलके काले हो या गहरे? एक बटन फिर दूसरा बटन 

लुका-छिपी वाली सार्वजनिक बातचीत की सड़ी दुर्गन्ध तिरने लगी 

लाल बूथ, लाल बम्ब और दो तल्ला लाल बस 

काले तारकोल को रगेदती हुई-यह यथार्थ था 

अभद्र ख़ामोशी से शर्मिन्दा  

मुझ आहत अवाक् को सहज करने के लिहाज में 

अपने लफ्ज़ों के जोर में फ़र्क लाते हुए वह बोलीं  

“तुम गहरे काले हो या हल्के?” 

फिर उसने और खुल कर पूछा 

“यानी कि तुम निखालिस चाकलेटी हो दूधिया चाकलेटी?”

उसकी आवाज़ में इलाज़ी जाँच सी तटस्थता थी 

जैसे उसने अपनी आवाज़ तले अपनी शख्शियत दबा दी हो 

फ़ौरन हमारे मन के तारों में तालमेल हो गया 

टोहते हुए मैंने कहा “पश्चिमी अफ्रीकी सीपिया”

ख़याल आया तो दोहराया पासपोर्ट में तो यही दर्ज़ है

ख़ामोश कल्पना की अपनी उड़ान में वह उस रंग का खाका खींच ही रही थी 

कि तभी सचाई से तमतमा गया माउथपीस पर उसका लहज़ा

“वह क्या होता है?” हताश हो कर उसने पूछा

“नहीं जानता क्या होता है यह” 

“समझ लीजिए अंग्रेज़ लड़की के भूरे बाल” 

“मतलब काला। क्यों यही न?” 

“पूरा बिलकुल वैसे जैसा नहीं। 

चेहरे से गहरा भूरा हूँ, लेकिन मैडम बाकी मेरी देह देखें

मेरी हथेलियाँ, मेरे तलुए उजले हैं 

जैसे कि परऑक्साइड से साफ़ किया गया हो 

हाँ! मेरे बैठने के बेहूदे तरीके से रगड़ खा खा कर मेरा चूतड़

जरूर कव्वे सा काला हो गया है” 

यह भाँप कर कि उसके रिसीवर के पटकने की आवाज़ 

मेरे कान में सुनायी देने वाली है 

मैंने चिरौरी की- “एक मिनट मैडम

“क्या आप मुझे खुद देखना नहीं चाहेंगी?”





नागरिक और फ़ौजी 


जहाँ हुई थी गोलियों की बौछार 

वहीं से उठ कर मेरे प्रेत ने ऐलान किया 

“मैं नागरिक हूँ”

इससे न केवल तुम और ज़्यादा डर गए 

बल्कि हैरत से यह सोचने लगे 

कि मौत के इस निष्पक्ष झंझावात में 

मैं कैसे उठ कर इस दुनिया मे आ गया 

और मुझे भी ख्याल आया 

तुम्हारा भी तो इस दुनिया से कोई झगड़ा नहीं है 


तुम अब भी दोनों संसार के लिए अड़े हुए थे

अफ़सोस! तभी मुझे सुनायी दी 

तुम्हारे प्रशिक्षण के दौरान दी गयी हिदायत 

अपने पीछे की धरती जला देना 

पीछे कोई संदिग्ध या तटस्थ चीज न छोड़ना 

छिपने के लिए ज़मीन में खाईं खोदते हुए 

मैं बार-बार अपनी नागरिकता की दुहाई दे रहा था 

उधर तुम्हारे उत्साही साथी गोलियों का उत्सव मनाते हुए 

तुम्हारा भ्रम और बढ़ा रहे थे 

तभी तुमने बन्दूक मुझ पर तान दी 

और मौत मेरी आँखों में आहिस्ता से फड़फड़ाने लगी 

फिर तुम सबकी हालत मेरे सामने साफ़ हो गयी 


मुझे उम्मीद है 

किसी दिन ज़िन्दगी के रोज़गार में 

जाँच करने के इरादे से लम्बे डग भरते हुए 

किसी खंदक में तुम्हारा प्रेत देखूँगा 

जो इशारा करके कहेगा, “मैं फ़ौजी हूँ

तब मुझे कोई दुविधा नहीं होगी 

मैं तुम्हें गोश्त-रोटी खिलाऊँगा 

मटकी भर शराब पिलाऊँगा 

दोनों हाथों से कस कर छाती से लगा लूँगा 

फिर भी मेरा केवल एक सवाल है 

मेरे दोस्त! क्या तुम अब भी नहीं समझे 

यह सब क्या और क्यों है 





सोचता हूँ कि बारिश होती 


सोचता हूँ कि बारिश होती  

ताकि इल्म के बोझ से सूखी जुबान ढीली पड़ जाती 

झुक जाते मुँह के ऊपरी तलवे  


मैंने देखा है 

राख के ढेर से सहसा बादल उठते हैं 

अंतस में उमड़ते भावों के भीतर 

वे एक धूसर गोल छल्ले में मिल जाते हैं 


अरे! अब तो इसे बरसना ही चाहिए 

मन के ये बाड़े 

भर रहे हैं हमारे भीतर गहरी निराशा 

पढ़ा रहे हैं पाठ 

निखालिस दुःख का 


और कैसे यह बरसता है 

हमारी इच्छाओं के पंखों पर उड़ते पारदर्शी उलझाव पर  

क्रूर बपित्समा के दौरान 

दिल चीर देने वाली बुरी लालसाओं पर  


मेरी धरती से जब होता है तुम्हारा अभिसार

बारिश में नरकुल 

गरिमा से झुकने का करते हैं अभ्यास 

लेकिन दूर से लगते हैं 

एकदम तने हुए



विनोद दास




सम्पर्क


मोबाइल : 9867448697

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