पल्लवी की कविताएँ

 

पल्लवी



परिचय 

नाम – डॉ पल्लवी 

पिता का नाम – श्री जयराम 

शिक्षा – एम. ए. (हिंदी साहित्य), पीएच. डी. (पूर्वाचल विश्वविद्यालय से )



गालियां दुनिया की प्रायः हर भाषा में पाई जाती है। जहां एक तरफ अपने वर्चस्व को प्रदर्शित करने की शब्दावली बन जाता है वहीं दूसरी तरफ कमजोर लोगों के लिए यह प्रतिरोध व्यक्त करने का अपना एक तरीका है जिसके जरिए वे अपनी हिकारत को व्यक्त कर सकते हैं। मन ही मन गाली देने से भला उन्हें कौन रोक सकता है। स्त्रियों को इस अपमान को कहीं अधिक झेलना पड़ता है। इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि दुनिया की अधिकांश गालियां स्त्रीसूचक ही हैं। अपनी एक कविता में आक्रोश व्यक्त करते हुए कवयित्री पल्लवी लिखती हैं  : 'मैं काव्य का नहीं/ गाली का सृजन करना चाहती हूँ/ जब मनुष्य से कम चिन्हित होना/ अपमान लगे।/ उस गाली का/ मैं भजन करना चाहती हूँ।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं पल्लवी की कविताएं।



पल्लवी की पाँच कविताएँ 


मेरा पता 


मुझसे मिलने के लिए 

कभी फ़ोन नहीं करना 

मैं जहाँ से गुज़री 

वापस लौटी ही नहीं 

इसलिए साथी राह नहीं देखना 

चिट्ठी-पत्री  सब बेकार क्योंकि 

मेरा ऐसा कोई पता नहीं।


मुझे देखना 

सुनना 

या मिलना हो 

तो किसी संघर्षरत स्त्री के 

आत्म-सीकरों में 

सहज मिल जाऊँगी 

महसूस करती उसके 

दोहरे संघर्ष को।


मेरा पता किसी किशोरी के 

प्रेम-पत्र लिखते हुए 

प्रेमी के प्रति 

कोमलतम भाव में है।


पुरुष-प्रेम से बहुत पहले 

कर गयी हूँ कूच 

क्योंकि दावेदारी पसंद हूँ 

अतिक्रमण-वादी नही 

इसलिए तुमको 

पत्र प्राप्तकर्ता के पास न मिलूंगी।


प्रेमी से हुई प्रेमिका की उम्मीदों में 

मैं पालथी मारे बैठी हूँ।


प्रेमी की अरुचि और पति की वितृष्णा से 

चोट खायी हर स्त्री के 

व्यर्थता-बोध से भरे मन में 

मैं उदास मिल जाऊँगी।


व्याकुल मन को जीत कर 

इच्छाशक्ति से नव निर्माण के लिए 

सब तोड़ती हुई स्त्री के पास मेरा 

सार्वकालिक ठिकाना है।


क्योंकि मुझे प्रेम लोक में 

रहने की आदत है 

प्रेम निर्माण है 

सबसे बड़ी क्रान्ति है 

हर क्रान्ति, सृजन 

ध्वंस से ही करती है।


पहले वो तोड़ता है 

सामाजिक–व्यवस्था को 

शास्त्रानुमोदन को 

अपने निज चयन का 

ऐलान किया करता है।


इसलिए दुनिया के ऐलानियों में 

मुझे, मेरा आत्म-संगीत मिलता है।


क्योंकि चुनाव ही 

जीवन का भाष्य कर 

नये अर्थ देता है।



व्याकुल वसुंधरा 


भौतिकी का मत है – 

जहाँ से प्रकाश आयेगा 

वहीँ से आएगी ऊष्मा; 

प्रकाश और ऊष्मा अन्योन्याश्र हैं।


लेकिन मैं सोचती हूँ – 

पृथ्वी क्यों बार- बार 

मुँह फेर लेती है सूर्य से 

आख़िर, 

प्रकाश तो उसको भी चाहिए।


संभवतः भौतिकी का यह 

पदार्थवादी नियम 

चंचल वसुंधरा को 

स्वीकार नहीं।


वो चाहती है, प्रेम।

बार - बार आती है 

चंद्रमा के पास 

शीतलता की तलाश में। 

 

ताकि रुक सके घासों में 

ओस की बूँदें;

सूर्य-श्रापित उल्लू को 

दिखे अपना जगत,

गा सकें माँएँ लोरियाँ।

थके पथिक को भी 

विश्राम मिल सके। 


ये सब 

शीतलता में ही संभव है। 

ताप से कहां उठा है संगीत?


जिन लोगों ने प्रेम को 

गर्माहट से परिभाषित किया 

वो अवश्य ठन्डे प्रदेश के 

निवासी रहे होंगे।


नहीं तो परम स्वतंत्रता देने वाले 

रामानंद को 

हजारी क्यों कहते आकाश-धर्मा 

सूर्य-धर्मा भी कह सकते थे।


दरअसल सूर्य 

अपने प्रकाश का मोल लेता है 

कभी पसीने,

कभी पैरों में आए 

छालों के रूप में 

और मोल लेने वाले 

नहीं कर सकते प्रेम।


ऊष्मा अंततः 

विनाशक होती है 

कभी-कभी सूर्य ऊष्मा लिए 

भ्रमर्थ मेघावृत होता है।


कबीर और तुलसी 

एक साथ सूर्य की गर्मी में नहीं 

आकाश की 

मुक्त शीतलता में ही हो सकते हैं।


चंद्रमा प्रकाश पाता है, लोक से 

उसमें है दंभ नहीं 

कोई दुराग्रह छू नहीं गया है 

ऐसा ही आदमी होता है 

शीतल।


होती है सम्भावना 

आकाश–धर्मा होने की।


इसीलिए पृथ्वी 

कोलाहल से मुक्त 

खाली समय पाते ही 

चन्द्रमा के पास 

चुपचाप चली आती है 

शांति,

कोमलता,

शीतलता और 

प्रेम की तलाश में।







अपलक प्रतीक्षा 


तुम्हें तो फिर भी आना चाहिए था 

नदी को पूरी तरह 

कोई भी बांध 

रोक ही नहीं सकता।

 

भला बरसात 

किसी के रोके रूकती है?

हजारों रास्ते होते हैं 

प्रकाश के आने के लिए 

भाव चाह कर 

भंगिमाएँ रोक नहीं पाते।


फिर तुमको झिझक कैसी 

जबकि पता है, तुम बच्चे की 

बहु-प्रतीक्षित रेलगाड़ी हो।


कितनी दस्तकें होती हैं 

मेरे दरवाजे पर 

फोन भी कई बार बजता है 

देखती हूँ, बात करती हूँ 

लौट आती हूँ 

वापस।


सोचती हूँ – 

छापेखाने में 

कितनी किताबें छपती होंगी 

कितनी किताबें लिखी जाती हैं 

दुनिया भर में 

मेरी दुनिया भी 

पूरी सृजनात्मक है 

लेकिन अभिव्यक्ति रुकी है 

तुम्हारी प्रतीक्षा में।


आओ दक्ष के यहाँ 

शिव की तरह 

नदी, कविता, किताब 

या किसी बच्चे की कल्पना बन कर 

सब नियमों को ध्वस्त करते हुए 

सृजन की नयी परिभाषा लिखो 

तुम्हारे आने की 

अपलक प्रतीक्षा है।



यथा–रूप 


सबको याद हैं, प्रेम कविताएं 

प्रेम पर आधारित उपन्यास 

संभवतः सबसे ज्यादा पढ़े गए 

आज कल फिल्मों में 

प्रेम का बड़ा चलन है। 


धर्म बेचना हो किसी पंडे को

या फिर करवाना हो 

विज्ञापन किसी उत्पाद का 

सब कामों में प्रेम का 

सहारा लिया जाता है। 


बहुत खर्च होता है प्रेम 

इस महंगाई में। 


इसीलिए सबके दिल रीते हुए हैं 

रिश्तों से गायब हो गया 

बाजारीकरण होने से। 


मुक्ति फिर भी संभव है।

हम भाग सकते हैं 

इस बाजार से दूर 

कहीं किसी पर्वत या नदी के पास 

जहां फल, फूल, पत्ते मिलें 

समुद्र खुद दे दे मछलियां 

बिना मोल के। 


लेकिन हमारी पूरी ताकत 

पड़ी बेड़ियों की सुरक्षा में व्यय हो रही है। 


तभी कहीं सरगम नहीं 

कोई काव्य जीवंत नहीं 

सब चित्र यांत्रिक और 

सब आशिक स्मृति में खोए हैं।


स्मृति बन जाना प्रेम की 

नियति होती जा रही है। 


जो प्रकृति को स्वीकार नहीं 

उसे यह चक्र 

स्वतः बाहर फेंक देता है। 

विलुप्त हो गए 

जिनकी उपस्थिति यहां 

प्रासंगिक नहीं।


जो कुछ अवांछनीय है 

टिक ही नहीं सकता यहां। 


यदि संशोधन इतना अनिवार्य होता

अब तक लागू हो चुका होता 

तुम पर

अनुकूलन का सिद्धांत। 


तुम्हें तुम्हारी

खुदरंगी निखार रही है 

इसका सीधा मतलब है 

प्रकृति ने तुम्हें, सहर्ष स्वीकारा है;

पूरी जीवंतता से। 


तुम्हें तलाश करनी चाहिए उसकी 

जो तुम्हें स्वीकार करे

प्रकृति की तरह 

तुम्हारी संपूर्णता में। 


यथावत,

यथारूप;

प्रकृति - स्वरूप। 


तुम स्वागत करना उसका 

जो तुम्हारे जीवन में 

बारिश कर दे प्रेम की

व्यापार, बाजार, प्रचार से परे।





गाली 


जब – जब बौखलायेगा अहंकार 

वर्गीय चेतना विवश होगी 

तानाशाही को 

अंकुश भान 

सत्ता को चुनौती और 

मिथ्या अक्षुण्णता को 

भंगुरता के बोध से 

कस दिया जायेगा 

तब-तब उछाली जाएँगी गालियाँ।


दरअसल गाली;

कुंठा, अक्खड़ता, मूर्खता 

और परंपरा की लाश से भरा हुआ 

पान का बीड़ा है। 

सच कहा था किसी ने 

गाली शब्दहीन होने की पीड़ा है।


गाली कभी-कभी 

अस्मिता का संघर्ष है 

विद्रोही गुलामों के मालिक का 

डूबता हुआ दर्प है।


मैं काव्य का नहीं

गाली का सृजन करना चाहती हूँ

जब मनुष्य से कम चिन्हित होना 

अपमान लगे।

उस गाली का 

मैं भजन करना चाहती हूँ। 

मैं प्रतीक्षा में हूँ उस दिन के 

जब हिन्दू,

मुस्लिम,

सिख, 

नाम से हुआ संबोधन गाली लगे। 

सबका अपमान हो 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, मौलवी या खान के 

संबोधन से। 

सब भेद ध्वस्त हों 

बने गाली के नव-संशोधित संस्करण 

उस गाली से आसक्ति 

और

थोपी मर्यादा से विरक्ति चाहती हूँ। 

मैं गाली को 

गाली बनाना चाहती हूँ।



सम्पर्क 

पता – दोहरीघाट, 

जिला- मऊ, 

उत्तर प्रदेश 

पिन कोड - 275303

 

ई मेल : drpallavi.dohrighat@gmail.com 


टिप्पणियाँ

  1. प्रेमिल भावनायें जीवन-संघर्ष की आँच में तपकर तीखी हो गई हैं । इन कविताओं में जीवन का सच बखूबी अभिव्यक्त हो रहा है । कवयित्री की चिन्ता वैयक्तिक भी हो सकती है लेकिन अपने प्रभाव में यह पूरे समाज की चिंता है ।

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