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हेमन्त शर्मा का आलेख 'भए प्रगट कृपाला'

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  वो हेमन्त शर्मा भारतीय संस्कृति में राम की व्याप्ति जन जन तक है। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। शासक होने के बावजूद वे जन का ख्याल रखते हैं। पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए वे राजगद्दी का परित्याग कर वन चले जाते हैं। भारत ही नहीं कई अन्य भाषाओं में भी राम कथा मिलती है। राम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ था। आज राम नवमी यानी कि राम का जन्मदिन है। पहली बार के पाठकों को राम नवमी की बधाई देते हुए हम पहली बार पर आज प्रस्तुत कर रहे हैं  हेमन्त शर्मा का आलेख 'भए प्रगट कृपाला'। 'भए प्रगट कृपाला' हेमन्त शर्मा  ‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी’ यह राम के जन्म पर बाबा तुलसीदास लिखते हैं। सब हर्षित हैं। पुलकित हैं। मगन हैं। चकाचौंध हैं। पर बालक राम की लीला और तेजस्विता कौशल्या को रास नहीं आ रही है। वे कहती हैं,  “तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसु लीला अति प्रियसीला  यह सुख परम अनूपा”। हे पुत्र! यह रूप छोड़ कर मेरे लिए प्रिय बाल-लीला करो। यह सुख परम अनुपम है। यह सुन कर देवताओं के स्वामी सुजान राम ने बालक हो कर रोना शुरू किया। वे मनुष्य शरीर में आए. उ...

यादवेन्द्र का आलेख 'सारी बकरियाँ एकदम से कहाँ चली गईं?'

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  यादवेन्द्र  समूचे ब्रह्मांड में हमारी यह पृथिवी जीवन से पूरी तरह आप्लावित है। यहां तरह तरह का चित्र विचित्र जीवन भरा पड़ा है। जीवन का यह वैविध्य इतना व्यापक है कि कुछ से तो हम आज भी अपरिचित हैं। जीवन की यही खूबसूरती है। हम इसे जैव विविधता के नाम से जानते पहचानते हैं। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हम कुछ इस तरह शामिल हुए कि अरसे से साथी रहे पशु पक्षियों को खोते चले गए। मारीशस का डोडो पक्षी इसका उदाहरण है। गिद्ध हमारे देखते देखते लुप्तप्राय हो गए। गौरैया जिनसे हमारी हर सुबह कभी गुलजार हुआ करती थी, दूभर होने लगी है। बैल अब बीते दिनों की बात हो गए। जो भेड़ बकरियां हमारे गांवों के दृश्य को अलग रंग प्रदान करते थे, अब कम दिखने लगे हैं। चिन्ता की बात तो यह है कि केवल जीवन से ही नहीं हमारे साहित्य और संस्कृति से भी अब ये गुम होने लगे हैं। मोबाइल के रील्स कल्चर ने हमें इस कदर व्यस्त कर दिया है कि हम अपने आस पास को ही जान समझ नहीं पाते। आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण रच...

स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख 'कहाँ रहती है कवि की कविता'

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  विनोद कुमार शुक्ल  एक सवाल अक्सर उठता है कि कविता रहती कहां है जिसे कवि उठा कर अपनी कविताओं में दर्ज कर लेता है। किसी कवि के लिए यह सवाल जितना आसान होता है उतना ही परेशान करने वाला भी होता है। गंभीरता से देखा जाए तो यह समूची सृष्टि ही कविता की तरह है। सृष्टि में अपनी यह पृथिवी एक भाषा की तरह है तो पृथिवी पर जीवन एक शिल्प की तरह। यानी कि हमारे चारो तरफ कविता ही कविता है। बस जरूरत होती है उस सूक्ष्म दृष्टि की जो उसे महसूस कर कविता में दर्ज करे। विनोद कुमार शुक्ल ऐसे ही कवि हैं जिनकी कविता में उनके आस पास की आहटें करीने से दर्ज हैं। जहां तक आरोपों की बात है दुनिया का कोई भी कवि इससे मुक्त नहीं। आरोपमुक्त होना एक ऐसा छद्म है जिसे तमाम लोग ओढ़े रहते हैं। हमें यह तो मानना ही होगा कि यह दुनिया, यह जीवन बहुत बड़ा है। और हर कवि की अपनी सीमाएं होती हैं। विनोद कुमार शुक्ल के पुरस्कार मिलने पर तमाम बातें कुछ लोगों द्वारा उठाई गई हैं। ऐसे लोगों को उनकी कविताएं गौर से देखनी चाहिए जिसमें छत्तीसगढ़ का जीवन भरा पड़ा है। कविताओं की पंक्तियों और उनकी पंक्तियों के बीच दर्ज उस संघर्ष को पढ़ना चा...

सुनील कुमार शर्मा की बाल कविताएं

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  सुनील कुमार शर्मा आमतौर पर बच्चों की  कविताएं जितनी सहज दिखती हैं उतनी होती नहीं। बच्चों के लिए कविताएं लिखना सामान्यतया आसान नहीं होता। इसके लिए जरूरत होती है ऐसे कथ्य की जो बच्चों के मन को भा जाए। इसके लिए जरूरत होती है ऐसे शिल्प की जो मस्तिष्क पर टंकित हो जाए। और बच्चों के मन मस्तिष्क को समझ पाना उतना आसान कहां होता है। लेकिन कवि जो कल्पना में रवि तक पहुंच जाते हैं यह कठिन काम भी अपने हुनर से आसान बना डालते हैं। सुनील कुमार शर्मा एक जाने पहचाने कवि तो हैं ही, उन्होंने कुछ बाल कविताएं भी लिखी हैं। ये सहज तो हैं ही, इनका शिल्प भी बेहतरीन है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  सुनील कुमार शर्मा की बाल कविताएं। सुनील कुमार शर्मा की बाल कविताएं अगर मैं जादूगर होता तो  अगर मैं जादूगर होता तो  बादल रंगों से भर देता  छड़ी घुमा कर एक मिनट में  सूरज को ठंडा कर देता  नदी उड़ाता आसमान में  बर्फ़ गिराता मैं रेतों पर  बारिश करवा देता कुल्फी   चॉकलेट की भी खेतों पर  डांस करा देता पेड़ों से  फूलों से मैं गीत सुनात...

खालिद जावेद के उपन्यास पर पवन करण की समीक्षा

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किताबें इस मायने में महत्त्वपूर्ण होती हैं कि यह पाठक के मन मस्तिष्क को मथ कर रख देती हैं और उसकी दृष्टि और जीवन को बदल कर रख देती हैं। कई किताबों का प्रभाव तो हमारे मानस पर लम्बे समय तक बना रहता है। खालिद जावेद का उपन्यास 'नेमत खाना' हाल ही में हिन्दी में अनुदित हो कर प्रकाशित हुआ है। इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास को पढ़ते हुए कवि पवन करण लिखते हैं ' क्या आपको पता है कि आपके जीवन की सबसे नजदीकी, साफ और जरूरी जगहों पर कितनी गंदगी सांसे ले रही है। नहीं, तो हिम्मत जुटाइये और अपने भीतर के इस बजबजाते-बुलबुलाते कीचड़ बन कर ठहरे, सिकुड़ते-फैलते और लगातार सड़ते हुए उस पानी से मिलिए, जिसे आप खुद ही अपने भीतर बनाये रखते हैं। 'नेमत ख़ाना' पढ़े बिना खुद के इस रूप से मिल पाना संभव नहीं।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं खालिद जावेद के उपन्यास  'नेमत ख़ाना' पर पवन करण की समीक्षा। जीवन का रुदन भी नहीं, बस दृष्टि है ' नेमत ख़ाना' पवन करण  हर नींद एक कब्र है यह और बात है कि इसके पहिए बार-बार दलदल में फंस जाते हैं और सफर टल जाता है- खालिद जावेद का उर्दू से हिंदी में अनु...