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कँवल भारती का आलेख 'संविधान, संविधानवाद और आंबेडकर'

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  कँवल भारती विगत 27 मार्च 2025 को इलाहाबाद में दलित आलोचक  कँवल भारती द्वारा  सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण  व्याख्यान  दिया गया। व्याख्यान का विषय था  "संविधान, संविधानवाद और डा. आंबेडकर"। इन तीनों बिंदुओं की तह में जाते हुए भारती जी ने उस लोकतन्त्र की चर्चा की जो संविधान का मूल उद्देश्य है। संविधानवाद सैद्धांतिकी का आधार बनाता है और अंबेडकर संविधान के उन पहलुओं की चर्चा करते हैं जिससे एक भेदभाव रहित समाज की स्थापना की जा सके।  कँवल भारती इस व्याख्यान में बताते हैं कि ' संविधान और संविधानवाद के बीच एक महीन सी नहीं, मोटी सी लकीर है। संविधान समाज का निर्माण नहीं करता। वह समाज को न नैतिक समाज बनाता है, और न अनैतिक। वह सिर्फ समाज को नियंत्रित करता है। लेकिन संविधानवाद में किसी ख़ास तरह के समाज का निर्माण करने की भावना निहित होती है। इसलिए अच्छे या बुरे संविधान का निर्माण करने के लिए जो चीज़ प्रेरित करती है, वह निस्संदेह संविधानवाद है। यह एक संवैधानिक धारणा, दर्शन या वैचारिकी का नाम है।' तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं...

अमित कुमार सिंह का संस्मरण 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'

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  अमित कुमार सिंह  पिता पुत्र का सम्बन्ध दुनिया का सबसे खूबसूरत सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध की खुशबू बिल्कुल अपनी अलग तरह की और बिलकुल अपना अलग अंदाज लिए होती है। जब तक पिता होते हैं तब तक पुत्र अपने को उस वृक्ष की घनी छांव में महसूस करता है जो हमेशा बेहतर ही करता रहता है।  लेकिन एक दिन जब पिता अतीत हो जाते हैं पुत्र की दुनिया पूरी तरह सूनी हो जाती है। सब कुछ वीराना और खाली खाली लगने लगता है। उसे पहली बार महसूस होता है कि वह वाकई अकेला हो गया है। पिता के न होने से जो जगह रिक्त होती है उसे दुनिया का  कोई  सम्बन्ध और शब्द आजीवन भर नहीं पता।यानी वह जगह हमेशा के लिए रिक्त ही छूट जाती है।  अमित कुमार सिंह हाल में ही दुःख के इस दौर से गुजरे हैं। अपनी अकथनीय अनुभूतियों को उन्होंने संस्मरणबद्ध करने की कोशिश की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अमित कुमार सिंह का संस्मरण 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर'। 'मन का उदास कोना और पिता की तस्वीर' अमित कुमार सिंह गहन दुःख में अंततः मौन ही शेष बचता है। एक दिन पूर्व हुई पिता की मृत्यु से मानसिक स्तर पर अभी भी कि...

हेमन्त शर्मा का आलेख 'गले लगा कर कहो ईद है, मुबारक हो'

  'गले लगा कर कहो ईद है, मुबारक हो' हेमन्त शर्मा ख़ुशी एक शाश्वत भाव है। मानवता का जो मूल बिन्दु है, वो ख़ुशी ही है। ख़ुश होना, ख़ुश करना, ख़ुशी देना. त्योहार, पर्व, दान, अभिवादन, सहायता, सृजन सब इसी के इर्द-गिर्द हैं। ऐसी ही ख़ुशी की एक सामूहिक पहचान का पर्व है ईद। ईद यानी गले मिलें, दान करें, ख़ुशियाँ बाँटें, भेद से निकलें, अन्तर से निकलें, अलगाव से निकलें, दूसरा होने की पहचान से निकलें, शिकवों-शिकायतों से निकलें, बीती ख़राब स्मृतियों से निकलें और गले मिलें. दुआ दें, इज़्ज़त दें, मिठास दें। ईद और ख़ुशी तो एकदम एक से हैं। यह अनायास ही नहीं है कि लोग ख़ुशियों को ईद से जोड़ते हैं। मसलन, आपने लोगों को कहते सुना होगा कि बस बेटा अच्छे नम्बरों से पास हो जाए तो हमारी ईद हो जाए। शायरों ने कहा है- हमारा यार मिल जाए, हमारी ईद हो जाए। ऐसा ही एक शेर देखें- ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम। रस्म-ए-दुनिया भी है मौक़ा भी है दस्तूर भी है।।  चाँद वही है। उसी की गति से ईद भी तय होती है और करवाचौथ भी। फिर काहे का रगड़ा। ईद न केवल इबादत और शुक्राने का दिन है, बल्कि भाईचारे, मोहब्बत और ख़ुशिय...

पिरिमकुल कादिरोव के उपन्यास बाबर पर कृष्ण कल्पित की समीक्षा 'इस बाबर को आप नहीं जानते'

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  पिरिमकुल कादिरोव इतिहास अतीत की बात करता है। अतीत की खूबियों और खामियों में हम चाह कर भी कोई सुधार नहीं कर सकते। आज इतिहास पर वही लोग ज्यादा बातें करते हैं जिन्होंने इतिहास को कभी पढ़ा ही नहीं। सुनी सुनाई बातों से इतिहास नहीं बनता। इतिहास के साथ दिक्कत यह है कि सबूतों के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ता। और अतीत के सबूत कुछ इस तरह के हैं जिन्हें समूल मिटाया भी नहीं जा सकता। इतिहास को हम तभी बेहतर समझ सकते हैं जब हम उस काल खण्ड में जा कर तथ्यों को समझने की कोशिश करें। भारतीय इतिहास में बाबर एक ऐसा ही ऐतिहासिक व्यक्तित्व है जिसको ले कर आज तमाम उल्टी सीधी बातें की जा रही हैं। रूसी उपन्यासकार पिरिमकुल कादिरोव के उपन्यास बाबर से हमें पता चलता है कि 'बाबर खुद आक्रांता नहीं था बल्कि वह तो आक्रांताओं का सताया हुआ एक भगोड़ा था जो हिंदुस्तान को जीतने की नीयत से नहीं बल्कि शरण पाने के लिए यहां आया था।' अगर हम इस बात को मान भी लें कि बाबर आक्रांता था तब भी हकीकत तो यही है कि दिल्ली फतह करने के बाद वह इस हिन्दुस्तान का ही हो कर रह गया। कभी वापस अपने मुल्क फरगना नहीं लौटा। उसने अपनी जो आत्मकथ...

सुशील कुमार का आलेख "काव्य परंपरा का 'अवाँ-गार्द'.. ?"

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  गीत चतुर्वेदी  समकालीन कवियों में जिन कवियों की चर्चा सर्वाधिक होती है उनमें कवि गीत चतुर्वेदी का नाम अग्रणी है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि उनके पास अपनी एक आकर्षक भाषा है। अपने बिंबों के इस्तेमाल के दम पर गीत अक्सर अपने पाठकों को चकित कर देते हैं। लेकिन हिन्दी आलोचना की दिक्कत यह है कि वह अरुण कमल, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल से आगे अब तक बढ़ ही नहीं पाई है। गीत चतुर्वेदी की चर्चा भले ही वैश्विक स्तर पर हुई हो, हिन्दी में उनकी कवित्व का मूल्यांकन अब तक नहीं हो पाया है। कवि आलोचक सुशील कुमार अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं। सुशील ने गीत चतुर्वेदी की कविता का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। आइए आज पहली बार हम पढ़ते हैं सुशील कुमार का आलेख "काव्य परंपरा का 'अवाँ-गार्द'.. ?" "काव्य परंपरा का 'अवाँ-गार्द'.. ?" (गीत चतुर्वेदी की कविता) सुशील कुमार  जिस हिंदी लेखक को कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान, वाग्धारा नवरत्न सम्मान तथा गल्प के लिए कृष्ण प्रताप कथा सम्मान, शैलेश मटियानी कथा सम्मान, कृष्ण बलदेव वै...