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बसन्त पर नज़ीर अकबराबादी की नज्में

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नज़ीर अकबराबादी  ‘नज़ीर’ अकबराबादी ने जीवन का बड़ा सूक्ष्म अध्ययन किया था। साधारण घटना को भी वे असाधारण तरीके से बयान करते थे। वे ऐसे विषय पर भी शायरी कर देते थे जिस पर किसी अन्य शायर का ध्यान भी नहीं जाता था। उन्होंने अपनी शायरी में जन-संस्कृति का, जिसमें हिन्दू संस्कृति का दिग्दर्शन कराया है और हिन्दी के शब्दों से परहेज़ नहीं किया है। उनकी शैली सीधी असर डालने वाली है और अलंकारों से मुक्त है। शायद इसीलिए वे बहुत लोकप्रिय भी हुए। 'मुहम्मद फ़ारुक' के घर 1735 ई. में जन्में वली मुहम्मद' ने ही आगे चलकर ‘नज़ीर’ तख़ल्लुस से शायरी की और 'अकबराबाद' में रहने के कारण नज़ीर अकबराबादी के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की। सौ वर्ष की उम्र में सन 1830 में ‘नज़ीर’ का निधन हो गया। लम्बी उम्र के बावजूद ‘नज़ीर’ को अंतिम क्षणों तक कवि के रूप में ख्याति न मिली। उनके मरने के लगभग सत्तर वर्ष बाद तक भी आलोचकगण उन्हें एक प्रमुख कवि के रूप में मानने से इनकार करते रहे। बीसवीं शताब्दी में लिखे उर्दू साहित्य के कुछ प्रमुख इतिहासों- 'अब्दुल हई' कृत ‘गुले रअ़ना’ और 'अब्दुस्सलाम नदवी' क...

कल्पना मनोरमा का आलेख 'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'

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  कल्पना मनोरमा स्त्री मुक्ति का सवाल आज एक अहम सवाल है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री मुक्ति का अगर विरोध नहीं किया तो उसमें कोई रुचि भी नहीं दिखाई। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जकड़न कुछ इस तरह बनी रही कि स्त्री को उससे निकलने के लिए सोचने में ही शताब्दियों लग गए। आज बदले हुए समय की स्त्री अपनी मुक्ति के लिए सजग और सचेत है। लेकिन सवाल फिर वही है कि मुक्ति का वास्तविक मतलब क्या है? यह उच्छृंखल होना तो कतई नहीं है। कवयित्री कल्पना मनोरमा स्त्री मुक्ति के इन सवालों से टकराते हुए लिखती हैं 'मुक्ति देह के त्याग में नहीं, चेतना के विस्तार में है। वह बाहर से मुक्त दिखने में नहीं, भीतर से निर्भय होने में है। जब स्त्री अपने निर्णयों की ज़िम्मेदारी बिना संकोच के स्वयं उठाने लगेगी, जब वह दूसरों की आँखों से खुद को देखना बंद कर सकेगी और अपने अंत:प्रकाश में स्वयं को निहार सकेगी, तब वह किसी से मुक्त कहलाने की मुहताज नहीं रहेगी, वह स्वतः मुक्त हो जाएगी।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा का आलेख 'मुक्ति कोई अलंकार नहीं'। 'मुक्ति कोई अलंका...

यश मालवीय के गजल संग्रह पर अनामिका सिंह की समीक्षा

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कोई भी रचना समकालीन समकालीन यथार्थ को किसी न किसी तरह अभिव्यक्त करती है। यह समकालीनता ही उस रचना को सार्वभौमिकता प्रदान करती है। नवगीतकार यश मालवीय अपने गीतों और गजलों में लोक समस्याओं को करीने से उठाते हैं और अभिव्यक्त करते हैं। हाल ही में यश मालवीय का एक गजल संग्रह 'अनमने राम' प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा लिखी है युवा गजलकार अनामिका सिंह ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यश मालवीय के गजल संग्रह पर अनामिका सिंह की समीक्षा। ' अनमने राम : दर्द वही अपना, जो दर्द है अवाम का' अनामिका सिंह  18 जुलाई 1962 को यश मालवीय ने लब्धप्रतिष्ठ कवि उमाकान्त मालवीय जी के पुत्र के रूप में जन्म लिया।  गीत संसार में उमाकान्त मालवीय जी ने  जो प्रसिद्धि और स्थान पाया था, उस विरासत को यश मालवीय ने जितनी  शिद्दत से सहेजा, सँवारा, दुलारा वह  दुर्लभ है। उनके लगभग दर्जन भर नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। गीत उनके लिए साँस लेने जैसा है। शायद ही कोई विषय छूटा हो जिस पर उन्होंने गीत न लिखा हो। जीवन के हर पल को उन्होंने गीत में दर्ज़ किया है। लगभग उन्होंने हर विधा को समृद्ध किया, पर...