आशीष कुमार का आलेख मकतब-ए-इश्क का दस्तूर निराला देखा'।

 

अमिताभ बच्चन

 

अमिताभ बच्चन जीते जी भारतीय सिनेमा की किंवदंती बन चुके हैं। अमिताभ अब सत्तर के दशक में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन उनके अभिनय के इतने शेड्स हैं जिसे ले कर तमाम बातें की जाती हैं। उनमें प्रयोग का साहस है। 'निःशब्द' और 'चीनी कम' दो ऐसी फिल्में हैं जो अलग अलग कथानक के साथ प्रस्तुत की गई हैं। अभिनय के नज़रिए से इन दोनों फिल्मों में अमिताभ शिखर पर हैं। फ़िल्म आलोचक आशीष कुमार ने इन फिल्मों को केन्द्र में रख कर एक आलेख लिखा है 'मकतब--इश्क का दस्तूर निराला देखा' आशीष के लेखन में एक गंभीरता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। आज अमिताभ का जन्मदिन है। अमिताभ को जन्मदिन की बधाई देते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं आशीष कुमार का आलेख मकतब--इश्क का दस्तूर निराला देखा'

 

 

मकतब--इश्क़ का दस्तूर निराला देखा...!*

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(सिनेमा में प्रौढ़ प्रेम का आवेग और अवसान वाया निःशब्द और चीनी कम)

 

 

 

                                                                         

आशीष कुमार *

 

 

 

 ये भी क्या खूब प्रश्न है कि प्रेम में डूबे हुए पुरुष का चेहरा कैसा होता है? क्या स्त्री और पुरुष के प्रेम में अंतर होता है? क्या प्रेम का पुरुष अर्थ भी होता है? प्रेम जिसे कहते हैं, वह आखिर है क्या? प्रेम के रंग भी अनूठे होते हैं। प्रेम हवा में टंगा हुआ शब्द मात्र नहीं है। प्रेम की फितरत अलहदा होती है। प्रेम ख़ामोशी की आवाज़ है, स्थिरता में हरकत है और फतह में भी शिकस्त है। कहते हैं, पुरुष पैसे के पीछे पागल होता है और स्त्री प्रेम के लिए। प्रेम की यह दास्तान पुरखों से ले कर आज तक बदस्तूर जारी है। प्रेम की तमाम शास्त्रीय परिभाषाओं के बरअक्स यह निहायत निजी और गोपनीय प्रसंग है। इसके खतरे हैं और दुश्वारियां भी। प्रेम को लेकर वर्जनाएं, हदबंदियां और नैतिकताएं समाज द्वारा तय किए जाते हैं। समाज के बनाए गए तथाकथित खांचे में प्रेम के स्वरूप भी भिन्न है। समाज के नज़र में प्रेम की वैध-अवैध, नैतिक-अनैतिक व्याख्याएं होती है। प्रेम जिस्मानी भी होता है और ग़ैर जिस्मानी भी। प्रेम उम्र के फासलों को देख कर नहीं होता। लाइफ इन मेट्रो फिल्म में नफीसा अली कहती है - 'प्यार कभी बता कर तो नहीं आता, सालों से गिना जाता है, सिंदूर से पहचाना जाता है। इसकी पहचान है, उसकी खुशबू दिलचस्प है कि साहित्य से लेकर सिनेमा तक इसके विभिन्न रूप देखने को मिलते है। दो अलग-अलग कहानियां और फैले हुए प्रेम का विस्तार मुझे अपनी तरफ खींच रहा है। यहां प्रेम का मसला थोड़ा अजीब है, गंभीर है। अमिताभ बच्चन अभिनीत 'निःशब्द' और 'चीनी कम' प्रेम की अनूठी कथा के कारण विलक्षण फ़िल्मे हैं। 'निःशब्द' के निर्देशक राम गोपाल वर्मा और 'चीनी कम' के आर. बाल्की हैं। प्रेम के अदभुत प्रयोग के कारण ये दोनों फ़िल्मे भारतीय सिनेमा में अहम स्थान रखती हैं। इन फिल्मों के मार्फ़त हम सिनेमा की दुनिया में प्रेम के बदलते हुए स्वरूप, अन्तर्द्वन्द और पीढ़ी अंतराल से उपजे जीवन मूल्यों को बखूबी देख सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि हिंदी सिनेमा में ये अभिनव प्रयोग थे, इससे पहले भी दूसरा आदमी, अनोखा रिश्ता, लीला, लम्हें और जागर्स पार्क जैसे फिल्मों में अधेड़ प्रेमी किरदार देखने को मिलते हैं। 'निःशब्द' और 'चीनी कम' में कमोबेश समस्याएं लगभग एक तरह की हैं लेकिन उनका ट्रीटमेंट अलग है। 

 

 


 

आइए, पहले 'निःशब्द' को देखते हैं। नायक विजय (अमिताभ बच्चन) चौंसठ साल का है। बकौल प्रेमचन्द, 'मर्द साठे पर पाठे होते हैं बेटी ऋतु (श्रद्धा आर्या) की सहेली जिया (ज़िया खान) छुट्टियां मनाने उसके साथ घर आई है। जिया एक आज़ाद ख्याल लड़की है। वह जिंदगी को अपने बनाए उसूलों पर जीना पसंद करती है। उसे समाज के बनाए परम्परागत, जड़ और ठस्स नियमों पर चलना रास नहीं आता। जिया परिपक्व नहीं है। शोख है, बेपरवाह है। उसकी परवरिश विदेश में हुई है, जिससे उसके व्यवहार में खुलापन है। यह वैचारिक आज़ादी उसे खास बनाती है और दूसरो से अलगाती भी है। उसके पहनावे, बातचीत और बर्ताव में यह साफ देखने को मिलता है। विजय, मुन्नार में टी-स्टेट का मालिक है और शौकिया फोटोग्राफी भी करता है। शुरुआत में विजय जिया को अपनी बेटी की सहेली के रूप में ही देखता है। उसकी शरारतों और हरकतों को ज्यादा तरजीह नहीं देता है। जिया का अल्हड़पन, बचकाना रवैया विजय के भीतर बंद मनुष्यता को जगाने लगती है। सोए हुए भावों का विस्फोट प्रेम के रूप में होता है और विजय को जिया से प्यार हो जाता है। हालांकि, इसकी परिणति बड़ी त्रासद होती है। सवाल उठता है कि क्या ऐसा प्रेम समाज को स्वीकार होगा? क्या इसे विवाहेत्तर प्रेम के खांचे में डाल देना उचित होगा? बेशक! समाज के तयशुदा चौखटों में ऐसा प्रेम फिट नहीं आएगा, तो ऐसे प्रेमी-प्रेमिकाओं की नियति क्या होगी? समाज और सिनेमा ऐसे प्रश्नों से निरंतर जूझता रहा है।

 

 

 

विश्व-सिनेमा में भी अधिकतर फ़िल्मे किसी किसी बहाने प्रेम की खोज करती हैं। यदि प्रेम सस्पेंस, थ्रिलर, फैंटेसी या रहस्य-कथा में तब्दील हो जाए तो? अविश्वास, संशय, प्रतिशोध, हिंसा और आक्रोश सब कुछ नष्ट कर देते हैं और हाथ आती है उदासी, अकेलापन और मृत्यु। अपने उपन्यास 'इलेवन मिनट्स' में पाओलो कोयलो कहते हैं, 'अकेलापन सबसे भयानक यंत्रणा है निःशब्द में विजय का प्रेम अकेलेपन की पीड़ा से नहीं उपजा है। यहां प्रेम के आकर्षण और विसर्जन की वजह जिया की मासूमियत, कमनीयता और वाचालता है। इनके प्रेम के आगाज़ का कारण अपनी रुचियों की समानता भी है। विजय को वाइल्ड फोटोग्राफी में रुचि है। जिया फोटोग्राफी सीखने का इसरार करती है। जिया के अपने भी शौक जिंदा है। वह कविताएं लिखती है। फिल्म में इनके बीच पलते प्रेम का विकास जिया को चाय बागान घुमाने से होता है। चूंकि ऐन वक्त पर ऋतु को चोट लगने के कारण विजय और जिया को अकेले जाना पड़ता है। इनका प्रेम वहीं से खिलता और खुलता है। परदे पर केरल के मुन्नार की खूबसूरती मन मोह लेती है। चारों तरफ छाई हुई हरियाली, झरने और खामोशी देख कर ऐसा भला कौन होगा जिसका मन डोल जाए? तिस पर जिया का विजय से यह पूछना कि क्या आपके और पत्नी के बीच प्रेम बचा हुआ है?

 

 

जिया का पूरे रास्ते दिल्लगी करना, मसलन जोर से चिल्लाना और गाहे-बगाहे आलिंगन और चुम्बन करना, कहीं कहीं उन दोनों के बीच पसरे हुए गहरे प्रेम को मुखर करता है। दूसरी तरफ गर नायक पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि उसके दाम्पत्य से प्रेम रीत गया है। क्या एक लंबे वफ्के के बाद प्रेम हमारे जीवन से निचुड जाता है या मर्द का मन हर बार नया मांगता है? ये सवाल नए तो नहीं है लेकिन निःशब्द देखते हुए अवचेतन में उभरते जरुर हैं। प्रेम विजय भी करता है, बस फ़र्क यही है कि वह प्रदर्शित नहीं करता। कहते हैं कि इश्क़ और मुश्क छिपाए नहीं छिपते! तो एक दिन जिया और विजय की बातचीत ऋतु सुन लेती है और फिर वही हश्र! जिसकी कल्पना मात्र से ही रुह कांप जाती है। यानी बिखराव, टूटन और संबंधों में दरकन। कुछ जगते सवाल भी कि, क्या बेटी भविष्य में पिता को अभिभावक के रुप में स्वीकार कर पाएगी? क्या पत्नी अपने शौहर को उसी तरह प्रेम कर पाएगी? क्या उनके दाम्पत्य का घरौंदा सुरक्षित रह पाएगा?

 

 

उसी वक़्त फ़िल्म में अमृता (रेवती) के भाई श्रीधर (नासिर) का प्रवेश होता है। श्रीधर विजय का साला कम दोस्त ज्यादा है। विजय से उसके दोस्ताना संबंध है। वह इन सारे  प्रसंगों का चश्मदीद गवाह बनता है। अब बात पूछताछ तक बढ़ती है। जिया को घर से निकलने का हुक्म जारी किया जाता है। विजय खामोश है। वह नज़रे नहीं मिला पाता। उसने गुनाह किया है। समाज की पाबंदियों को तोड़ा है। वह पति है, पिता है, प्रेमी नहीं है। क्योंकि वह अधेड़ प्रेमी समाज की मान्यताओं को तोड़ता हुआ 'वर्जित फल' चखने की ख्वाहिश करता है। यही है नि:शब्द। स्पीचलेस

 


 

वहीं दूसरी तरफ़ 'चीनी कम' में शादी को ले कर होने वाले कशमकश को पेश किया गया है। हमारे यहां शादी, परिवार और बच्चे एक सिस्टम है, जो अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी लेकिन सबके लिए नही। जबकि प्रेम एक आदिम चाह है। यह कोई व्यवस्था या संस्था नहीं। प्रेम दो लोगों का मसला है, कोई तीसरा जज नहीं कर सकता उसे। ख़ैर, 'चीनी कम' अमिताभ बच्चन, तब्बू और परेश रावल की फिल्म है। इस फिल्म का परिवेश विदेशी है, जबकि मध्यांतर के बाद नायक भारत आता है। बुद्ध देव गुप्ता (अमिताभ बच्चन) चौंसठ वर्षीय खानसामा हैं। लंदन में भारतीय व्यंजन के लिए मशहूर 'स्पाइस 6' रेस्तरां चलाते हैं। अविवाहित हैं। मिजाज़ से मगरूर और खुदपरस्त इंसान हैं। लंदन में अपनी मां (जोहरा सहगल) के साथ रहते हैं। बुद्ध देव का अपना संसार है। इन्हें हर चीज में परफेक्शन चाहिए। स्वाद का जायका इनके जुबान पर रहता है। नीना वर्मा (तब्बू) चौंतीस वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। काम के सिलसिले में लंदन आई हुई हैं। रेस्तरां में बिरयानी के स्वाद को ले कर हुई तकरार से बुद्ध देव से मुलाक़ात होती है और धीरे-धीरे प्रेम में तब्दील हो जाता है। जबकि बुद्ध देव और नीना की फितरत एक-दूसरे के उलट है। प्रेम मिजाज़ देख कर तो होता नहीं। वह उम्र के फासलों को देख कर भी नहीं होता। जहां 'निःशब्द' प्रेम का गंभीर वितान रचती है,वहीं 'चीनी कम' कॉमेडी दिखाती हल्की-फुल्की फिल्म है। दरअसल, यहां भी समस्या की तह में 'एज-डिस्टेंसिंग' का मुआमला है। यहां नायिका अबोध नहीं, मैच्योर है। आत्मनिर्भर है। उसे अपनी मर्ज़ी से पति चुनने की स्वतंत्रता है। वह नायक से प्रेम करती है और उससे ही विवाह करना चाहती है। संबंधों और निजता को ले कर सतर्क भी है। देखा जाय तो सैद्धांतिक तौर पर हिंदुस्तान एक आधुनिक मुल्क है। यहां को आला अदालत 497 को ख़तम कर देती है और स्पष्ट कहती है कि देह उसकी अपनी है, किसी की संपति नहीं। दो लोग सहमति से अगर सेक्सुअल रिलेशन बनाते हैं, तो यह अपराध नहीं होगा

 

 

लेकिन 'चीनी कम' में विवाह को ले कर सख़्त ऐतराज़ नीना के पिता को है। जिसका रोल परेश रावल ने बखूबी निभाया है। गंभीर भूमिकाएं और कॉमेडी के तो वे मास्टर हैं। हंसते-हंसते लोटपोट होना चाहते हैं तो 'हेराफेरी' से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। वे हर बार अपने अभिनय से चकित करते है। यह भी खूब है कि 'चीनी कम' में नायक की उम्र उसके होने वाले ससुर से ज्यादा है। इस हैरतअंगेज स्थिति में क्या पिता अपनी बेटी की शादी करना पसंद करेगा? यही द्वन्द फिल्म का मुख्य विषय है। परदे पर अमिताभ और परेश रावल की केमिस्ट्री देखने लायक है। कुछ सीन तो बेहद जबरदस्त बन गए है। नीना के पिता गांधीवादी है। ऐसे में मुश्किलें बढ़ती है। पहली दिक्कत तो यही होती है कि विवाह के लिए कैसे राज़ी किया जाए? जबकि बुद्ध देव खुद अपनी शादी की बात ले कर दिल्ली आते हैं। नीना के पिता से हाथ मांगते हैं। वे इस रिश्ते को ले कर असमंजस में होते हैं। लोगों के लाख समझाने पर भी राज़ी नहीं होते और अंततः अन्न-जल त्याग कर अनशन पर बैठ जाते हैं। फिर उनको मनाने की कवायदें शुरू होती है और मेलोडिक कॉमेडी के बीच वह शादी के लिए सहमत हो जाते हैं। काफ़ी पढ़े-लिखे लोगों में भी उम्र का अंतर बहुत से सीमा रेखाओं को खड़ा करता है। हम देखते है कि जहां 'निःशब्द ' मे प्रेम का त्रासद अंत होता है वहीं 'चीनी कम' में उम्र का अंतर होते हुए भी सुखद अंजाम होता है। थोड़े से संघर्षों के बाद वहीं समाज साथ रहने की अनुमति प्रदान करता है। हालांकि, एक समाज के तौर पर हिंदुस्तान आज भी एक रूढ़िवादी मुल्क है।

 

 

 

अब कुछ बातें दोनों फिल्मों के टेक्सचर पर भी। मुझे 'चीनी कम' का संगीत बहुत पसंद आया जबकि 'निःशब्द' में बैक ग्राउंड म्यूजिक जादू जगाता है। 'निःशब्द' का संगीत विशाल भारद्वाज और अमर मोहिले ने मिल कर तैयार किया है। इसका संगीत फिल्म के भीतर पैबस्त कथा के अनुसार चलता है और आगे आने वाले दृश्य की भूमिका भी बना देता है। 'चीनी कम' का संगीत इलैया राजा ने बनाया है। वे उम्दा संगीत में यथार्थ और कल्पना की फैंटेसी बुनते हैं। इलैया राजा का संगीत सम्मोहित करता है। अभिनय की दृष्टि से 'निःशब्द' और 'चीनी कम' में अमिताभ शिखर पर हैं। जहां एक तरफ वह 'चीनी कम' में पोनी टेल किए आधुनिक शेफ बने नज़र आते हैं वहीं 'निःशब्द' में धीर-गंभीर आत्महंता नायक बने हैं। अमिताभ बच्चन के फिल्मी सफर के विकास को एंग्री यंग मैन से होते हुए प्रौढ़ प्रेमी तक समझा जा सकता है। प्रेम के इतने शेड उन्होंने अपने युवावस्था में भी परदे पर नहीं निभाया जितना अभी कर रहे हैं। तब्बू और जिया खान ने अच्छा अभिनय किया है। तब्बू की संवाद अदायगी और उनीदी आंखों का मै कायल हूं। खासकर उनकी खनकदार आवाज़ का। जिया खान को उस वर्ष के बेस्ट डेब्यू फीमेल फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाजा गया था। जिया दमदार अदाकारा थीं। असमय काल की शिकार हो गई। 'निःशब्द' के बारे में ऐसा भी माना जाता है कि यह 'अमेरिकन ब्यूटी' फिल्म से प्रेरित है। ब्लादिमीर नाकोबोव की 'लोलिता' को भी इसका आधार बताया जाता है। वैसे, अमिताभ बच्चन ने अपने कई इंटरव्यू में 'निःशब्द' को जिंदगी की सबसे बड़ी भूल स्वीकार किया है। राम गोपाल वर्मा प्रयोगशील निर्देशक हैं। उनकी फिल्मों में रंगों के बड़े मायने होते हैं। उनकी नज़र पात्र के भीतर चल रहे मनोदशाओं की तरफ भी होता है। उनकी कई फिल्में इसका उदाहरण हैं। आर. बाल्की की फ़िल्मों के कथ्य आम कहानियों से अलग होते हैं। याद कीजिए, शामिताभ, पा और हालिया प्रदर्शित  पैडमैन। वे मुख्य-धारा और गंभीर सिनेमा के बीच आवा-जाही करने वाले निर्देशकों में है।

 

 

 

बहरहाल! प्रेम के दो अलग-अलग शेड्स दिखाती ये फ़िल्मे प्रौढ़ नायक के मनोविज्ञान को बेहतर ढंग से प्रदर्शित करती हैं। जाहिर है, प्रेम के अपने मानक नहीं होते हैं। नैतिकताओं और अनैतिकताओं की कसौटी से परे भी होता है प्रेम। श्लील और अश्लील की तमाम शास्त्रीय परिभाषाओं से प्रेम हमें मुक्त करता है। प्रेम किसी को पा लेने या पा सकने की स्थिति में उसी एक बिंदु के वृत्त में क्षरित होते चले जाने का नाम नहीं है। स्वयं की मुक्ति का प्रश्न भी प्रेम की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है। निःसंदेह ,'चीनी कम' और 'निःशब्द' प्रेम की बनती हुई एक नई संस्कृति की गाथा सुनाते हैं। 

 

 

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* मकतब - -इश्क़ का दस्तूर निराला देखा

उसको छुट्टी ना मिली,जिसको सबक याद हुआ।     

                                               

  (मीर ताहिर अली रिज़वी)      

                                         


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