यतीश कुमार का संस्मरण "और कितने करीब"।

 

यतीश कुमार

 

 

ज़िन्दगी अपने आप में एक महाकाव्य या कह लीजिए उपन्यास होती है। हर ज़िन्दगी एक जैसी लगती हुई भी बिल्कुल अलग। अल्हड़पन और अपनी असाधारणता से भरी हुई। रचनाकार इस मायने में विशिष्ट होता है कि वह जीवन की घटनाओं को तरतीबवार शब्दबद्ध कर संस्मरण में ढाल देता है। कवि यतीश कुमार के पास भी अपने जीवन की ढेर सारी ऐसी कहानियाँ हैं जो दरअसल एक समय में हकीकत बन कर गुजरी थी। जीवन का हर पल जैसे रोमांच से भरा हुआ और कुछ कुछ नया कर गुजरने की भावना ने यतीश को कई बार मौत का एक तरह से साक्षात्कार सा करा दिया। यतीश कुमार के इस संस्मरण में वह प्रवहमानता है जिसमें एक पाठक जब गोता लगाता है तो भीग कर ही वापस आता है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं यतीश कुमार का संस्मरण "और कितने करीब"

 

 

"और कितने क़रीब !"

 

 

यतीश कुमार

 

 

रह-रह कर वो मुझे बुलाती है, बोसे लेती है और फिर आलिंगन का वादा दे कर लौट जाती है। वो संभावना मात्र नहीं परम सत्य है फिर यह आँख मिचौली क्यों ? मेरी परीक्षा ली जा रही है या फिर मुझे किसी खास उद्देश्य से अनुभव करवाया जा रहा है ! अनुभव वो भी अंतिम सत्य के साथ संस्पर्श का ! क्या ही संयोग है कि राजेन्द्र यादव जी का लिखा लगभग आत्मकथ्यमुड़- मुड़के देखता हूँका अंश जो दुर्घटनाओं में भी बचा रहता हैपढ़ते-पढ़ते अपना अधूरा लिखा संस्मरण पूरा करने की टेर भीतर से उठी और उसे फिर नए सिरे से लिखने बैठ गया

 

 

बात की शुरुआत उस समय से करते हैं जब मैं : साल का था। माधोपुर, मुंगेर मेरा ननिहाल और उन दिनों ननिहाल मतलब खुशियों की नगरी। लगभग हर पर्व में सारे भाई-बहन इकट्ठा हो जाते। संयुक्त परिवार, नाना जी तीन भाई थे, उन सबके बेटों-बेटियों के बच्चे, कुल मिला कर हम 24-25 बच्चे और उनमें मेरी बड़ी बहन और बड़े भाई भी। रात और दिन में फर्क हो सकता है पर बिताए लम्हों में नहीं। खूब धमाचौकड़ी! समय पुरज़ोर अंगड़ाई लेता और हमें वक्त का पता ही नहीं चलता।  बेकापुर में परिवार का सोना-चाँदी का व्यापार था। हम लोगों को जब भी समोसा या रसगुल्ला खाना होता तो हम शाम को दुकान पर चले जाते। यह जैसे परंपरा सी थी कि शाम को जाने से समोसा मिलेगा ही मिलेगा। कभी-कभी रबड़ी भी मिलती थी या मुंगेर का सबसे प्रसिद्ध सोहन पापड़ी। स्वाद का असर ऐसा है कि आज इतने साल के बाद भी लिखते समय मुँह में पानी रहा है

 

 

दीपावली के दिन दुकान पर पूजा होती, नए बही-खाते की शुरुआत, व्यापारियों के लिए नव वर्ष होता है हम सभी बच्चे वहीं दुकान पर पूजा के बाद कुछ पटाखे वगैरह छोड़ते और फिर बाकी पटाखे लौट कर घर पर छोड़ते।

 

 

एक बार की बात है, छः साल का मैं वहीं दुकान पर फुलझड़ी घुमा रहा था और घुमाते-घुमाते मेरा हाथ अपने आप ही सामने की बजाय खुद की ओर घूमने लगा। बाकी का काम मेरी नायलॉन वाली टी-शर्ट का था सो एक साथ लहलहाने को तैयार, पर बड़े नाना की नतिनी, मिन्नी दी ने आग को जैसे ही मेरे बदन को छूते देखा त्वरित गति से पास में रखा बाल्टी भर पानी मेरे ऊपर उड़ेल दिया। मुझे तो पता भी नहीं चला कि पल भर में क्या से क्या हुआ और क्या होने से टल गया मैं गोलू-मोलू मासूम कद्दू-सा मुँह लिए सबको बस ताक रहा था

 

 

बहरहाल यह शायद उसकी अनसुनी दस्तक थी जो यूँ ही आकर गुज़र गयी या यूँ कहिए कि एक टहल्ला मार गयी। शायद अनजाने उसकी सरसराहट आती रही हो पर उस समय मेरी उमर ऐसी तरंगों को पकड़ने के क़ाबिल नहीं थी। शायद उसे बेख़ौफ़ी बिल्कुल नापसंद है इसलिए रह-रह कर संदेश भेजती रहती है पर हम इतने मशग़ूल-मसरूफ़  रहते हैं अपने आबो-दाने में कि अदीठ हिदायतों की तौहीन करते रहते हैं और इस तरह इशारों का बिंदु अपने चरम की ओर खिसकता रहता है।

 

 

ऐसा ही हुआ जब अगली दीपावली में मैंने अपने हाथ में ही अनार फोड़ लिया और पूरी की पूरी हथेली लगभग जल गयी, जिसके दाग हथेली पर और ज़ेहन में सिहरन आज भी हैं। मुझे लगा कुछ तो सिग्नल है जिसे मैं पकड़ नहीं पा रहा हूँ। माधोपुर, मुंगेर में दुर्गापूजा बहुत धूम-धाम से मनायी जाती है और हमारा परिवार आयोजकों के समूह का अगुआ रहा है। दशहरा में वैसा आनंद अब मुमकिन नहीं  और अब यह सदा के लिए टीस भरा अफसोस भी है। हमारे लिए वे दस दिन मस्ती का चरम हुआ करता था। हम मेला घूमते, झूला झूलते, कँचे खेलते और खूब मस्ती करते। उन दिनों नौ दिनों तक सीने पर कलश लिए सोए आदमी को देखकर आश्चर्य नहीं होता था क्योंकि, सुध नहीं थी पर अब सोचता हूँ कि बिना खाये-पिये लगातार नौ दिन अपने सीने पर कलश स्थापित किए कोई कैसे रह सकता है! ध्यान, योग, विश्वास, और आस्था का संतुलित मिश्रण से ही सम्भव है यह।

 

 

सबसे ज़्यादा आनंद भसान के समय आता था वैसे तो हर टाली का अपना नंबर बंधा हुआ था पर अंदर से  क्रम तोड़ने की इच्छा सबकी रहती, सबसे पहले बड़ी दुर्गा उठती थीं फिर बाकी सब। हमारा नंबर छत्तीसवां था।

 

 

माधोपुर से घाट तक हम टाली को ठेलते हुए लाउडस्पीकर पर खूब नाचते-झूमते हुए जाते और फिर टाली पर ही थक कर बैठ जाते। लौटते समय जब माँ दुर्गा की प्रतिमा विसर्जित हो चुकी होती तो टाली पहले के बनिस्बत हल्की हो जाती और उसकी गति और भी तेज़। सभी को घर पहुँचने की जल्दी जो रहती। हम बच्चे कभी टाली ठेलते, कभी बैठते और कभी उसी पर लेट भी जाते। इसी बैठने, ठेलने और लेटने के क्रम में एक बार जाने कैसे मुझे झटका लगा और मेरा पैर टाली के चक्के के नीचे गया और लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि किसी ने मुझे तेजी से टाली से दूर खींच लिया। दरअसल मेरी लड़खड़ाहट टाली के चक्के की ओर हुई थी कि किसी अनजान सहारे ने मुझे बचा लिया। क्यूँकि अगर मैं उस ओर गिरता तो चक्का मेरे सिर के ऊपर से निकल जाता और फिर क्या होता यह भगवान ही जानता है। उस समय मेरी उम्र यही ग्यारह-बारह बरस के बीच की रही होगी।

 

 

इस बार बस उसके दस्तक की बस आहट भर हुई थी! उसने मुझे रह-रह कर टटोलने की कोशिश की, समझाने की भी शायद पर मेरी स्थिति ऐसी थी कि पात्र अगर उल्टा पड़ा हो तो सारा पानी टघर जाए।

 


               

 

ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं से भरा बचपन रमना रोड, पटना पहुँच गया। एक बहुत ही छोटे से घर में, जो पहले माले पर था, हम चार लोग रहते थे। माँ-पिता नौकरी पर जाते, हम दो भाई-बहन घर में मस्ती करते। घर में हम दोनों का अकेले होना शैतानियों को दावत देने जैसा था। हम कुछ कुछ करके एक-दूसरे को मूर्ख बनाते रहते और इसमें कोई शक नहीं कि मैं एक नंबर का बेवकूफ हुआ करता था और मेरी दीदी सबसे स्मार्ट। उस जमाने में इलेक्ट्रॉनिक नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक कॉल बेल हुआ करती थी। उस घर में जो कॉल बेल लगी थी वह गुलाबी मछली के आकार की बनी हुई थी। एक दिन दीदी ने मुझसे कहा, अगर मैं इस गुलाबी मछली को छू दूँगा तो सुपरमैन बन जाऊँगा, उसने इतने नाटकीय आत्म विश्वास से यह बात कही कि मुझे लगा मैंने इसे छुआ और ये लो सुपरमैन उड़ चला।

 

 

और हुआ भी कुछ वैसा ही। मैंने कॉल बेल की घण्टी के बीच अपनी उँगली घुसेड़ दी और फिर मैं तो नहीं उड़ा मेरे होश उड़ गए। कान से धुआँ निकलना किसे कहते हैं उस दिन अच्छी तरह समझ में गया। आज भी बचपन की उस घटना का ज़िक्र हल्की हँसी के साथ सिहरन लिए हुए आता है।

 

 

उस दिन वो दस्तक, घंटी बजा के चली गयी थी! उस घंटी की गूंज रह-रह कर बजती पर जैसे सड़क किनारे के मकान वाले हॉर्न और घंटी को नजरअंदाज करने के आदी हो जाते हैं, मुझे भी यह सामान्य लगने लगा।

 

 

पटना से माँ का ट्रांसफर लखीसराय हो गया और हम अस्पताल के पीछे एक हॉल में कपड़ों की दीवार के खोले बना कर रहने लगे। बड़े भाई सैनिक स्कूल में पढ़ते थे और छुट्टियों में जब घर आते थे तो हम सब उनकी सारी ख्वाहिशों को पूरा करने में जुट जाते। इस बार भाई की जिद के कारण खस्ताहाली  के बावजूद माँ ने महंगा टेपरिकॉर्डर दिलवा दिया। इसका असर यूँ हुआ कि माँ जब भी अस्पताल जातीं, हम तीनों टेप रिकॉर्डर में ही लगे रहते। खूब गाने सुनते, कभी उसके रील समेटते, कभी टूटे रील जोड़ते। इस काम के लिए रेनॉल्ड का पेन बड़े काम की चीज थी उन दिनों। उसी से हम कैसेट का रील समेटते और अगर रील भीतर ही फंस जाता तब हम पूरे रील को निकाल कर फिर से उसे रोल करते। कैसेट को पेन से यूँ घुमाया जाता मानो सुदर्शन चक्र हो हमारे हाथों में।

 

 

माँ को जल्द ही समझ में गया कि अब पढ़ाई को तिलांजलि दी जाने वाली है और गानों के दिखाए सपनों की उड़ानें अपनी सीमाएँ लाँघ रही हैं। हमें ज़मीन पर लाने के लिए वो टेपरिकॉर्डर के तार बक्से में बंद कर जातीं। बेचैनी में अब हमारा हाल उस चरसी की तरह हो गया था जिससे गाँजा छीन लिया गया हो

 

 

बड़े भाई बोर्डिंग वापस जा चुके थे, दीदी और हम अब नए जुगाड़ में लग गए कि टेपरिकॉर्डर को फिर से कैसे  चलाया जाए। मैंने एक बेवकूफी भरे जुगाड़ पर काम करना शुरू कर दिया। बाहर जो बल्ब टंगा था उसके तार निकाल लिए और उसी से पावर कनेक्शन जोड़ने की कोशिश करने लगा, चूँकि उसका एडाप्टर और पिन अलग होता है इसलिए टेपरिकॉर्डर को भीतर से खोल कर सीधा तार जोड़ दिया। टेपरिकॉर्डर फिर भी नहीं चला तो मुझे लगा कहीं कनेक्शन का लफड़ा है या कुछ छूट रहा है। यही सोच कर, बिना यह जाने कि तार का दूसरा छोर अभी भी बोर्ड से जुड़ा हुआ हैमैंने अपने दाँत से तार को छिलने की कोशिश की और अगले ही पल मेरे पूरे शरीर में जोरदार बिजली कौंधी और मैं लगभग हवा में उछाल दिया गया। बिजली का झटका इतना तेज था कि दाँत बहुत देर तक कटकटाते रहे, लगा खून जम गया है, कानों में सनसनी दिन भर बनी रही। माँ लौटीं तो मेरे मुँह में सूजन देख रो पड़ीं। रोते-रोते मेरी पूरी तरह से सिकाई भी हुई सो अलग।

 

 

मौत ने इस बार बस मुँह बिचकाया था! इसके बावजूद ज़िंदगी की गति ऐसे इशारों को क़बूल करने के लिए तैयार नहीं थी। यौवन की ओर बढ़ता कदम किसी बंदिश को कहाँ स्वीकारता है। स्वच्छंदता उस समय अपने चरम पर थी। 

              

 

आठवीं कक्षा में गया ही था मैं, हमारे घर के चारों ओर ढ़ेर सारे तालाब थे जो पानीफल से लबालब भरे रहते। इतने खूबसूरत और स्वादिष्ट कमलगट्टे की फली और पानीफल। स्कूल से कई बार जल्दी छुट्टी हो जाती या कई बार हम भाग लेते। गर्मी के दिनों में इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता कि आप पानी में दोनों हाथ-पैर फैलाये उलटे मुँह तैरते रहें और फल-फली खाते रहें। हालाँकि, पोखर मालिक की नज़र से बचना भी एक कला थी, जैसे देखा सट नीचे गोता। वहीं उल्टा तैरता घड़ा घण्टों छुपने का बेहतरीन जुगाड़ भी था जिसके सहारे पानी में कई घण्टे बिताए जा सकते थे। पर जिस दिन उसकी दस्तक होती है आपकी सारी चालाकियाँ काफूर हो जाती हैं और सारा विश्वास धरा का धरा रह जाता है। मस्ती-मस्ती में गोता लगाते ही पैर पानीफल के जाले में फंस गया। ज़्यादा पैर-हाथ चलाने से हाथ में सहारे की शक्ल लिए कमल की डंठी आयी, जो शरीर के साथ ही नीचे हो जाती है। इससे दहशत और बढ़ गई। अचानक दिमाग शून्य और साँस गुम। अंधेरा घोर और पानी छाती में भरने लगा। लगा जैसे इस बार उसने दस्तक के साथ भीतर प्रवेश कर गले पर क़ब्ज़ा कर लिया है !

 

 

साँस की आख़री घूँट बची थी कि तभी किसी ने मेरे बालों को मजबूत बाजू से खींचा और अँधेरे में ही चार थप्पड़ गाल पर जड़ दिए। वो पहरेदार बाबा ही थे जिससे बचे फिरते हम अपने आप को तुर्रम ख़ान समझते थे। आज उन्होंने ही जान बचाई थी। एक बार फिर वो काली जादूगरनी मेरे सामने से सरसराते हुए गुज़र गयी! इस बात का असर काफ़ी दिनों तक रहा स्मृति बढ़ते समय के साथ अपनी परिमिति घटाती रहती है और फिर याद करते ही या यथार्थ की धूप पड़ते ही अचानक केंचुए सा फैल जाती है

               

 

अबकी बार तो वह मुझसे मिलने कई सालों तक नहीं आयी और मुझे लगने लगा बला टली, एक बड़ा अपशकुन था जो कट गया। दसवीं पास कर पटना साइंस कॉलेज में दाखिला ले, वहीं रामानुजन होस्टल में रह रहा था। पास में ही गंगा नदी बहती थी। पानीफल वाली पिछली घटना के बाद पानी से एक अजीब सा डर लगने लगा था मुझे, क्योंकि पुरानी यादें अपनी आयात कम कर रही थी, ख़त्म नहीं। 

 


              

वहाँ होस्टल में हम चार रूममेट हमेशा एक साथ रहते, बाक़ी सभी से बिल्कुल अलग, बिल्कुल जुदा। हमें कुछ हट कर काम करने का एक अलहदा जुनून सवार रहता और इसी क्रम में  एक दिन जोश में हम चारों ने एक साथ बाल मुंडवा लिया। हम रोज़ घण्टों खूब वर्जिश करते। मेस वाले निहायत खराब खाना के लिए मेस के ठेकेदार से लड़ लेते और दो-दो महीने चूड़ा-दही पर ही काट देते। हम चारों स्काउट वाली टोपी को तिरछी कर के पहनते और साइकिल से एक साथ सिनेमा जाते। कभी साथ तो कभी एक दूसरे से छुप कर भी सिनेमा जाया जाता और एक बार तो हद ही हो गई। रुख़सार की फ़िल्म लगी थी "याद रखेगी दुनिया" अमित कुमार के गाने थे। रुख़सार की मासूमियत का जादू हम सभी पर एक सा तारी था और मुझे उसमें अपनी प्रेमिका की झलक दिख रही थी। वैसे तो इस उम्र में हर कोई हर हीरोइन की अदायगी में अपनी प्रेमिका को ही देखता है पर रुख़सार की अदायगी और शक्ल बहुत मिलती थी उससे।

               

 

फ़िल्म, परीक्षा के ठीक पहले रिलीज हुई थी और हम चारों ने क़सम खाई कि परीक्षा खत्म होने से पहले कोई भी फिल्म नहीं देखेगा। हम चारों परीक्षा के दिनों में 15-16 घण्टों तक पढ़ लेते थे पर सिनेमा हमारी कमजोर नब्ज बन गयी थी। 

                 

 

शनिवार की सुबह ही मैंने बहाना बनाया कि मुझे अपने चाचा जी से मिलने जाना है और रात का खाना खा कर ही आऊँगा, जबकि दूसरी तरफ़ मन में मैंने यह तय कर लिया था कि आज नाईट शो देखे बिना नहीं लौटूँगा। 9 बजे से