आशीष सिंह का आलेख 'बेहतर दुनिया के भविष्य स्वप्नों के कथाकार रमेश उपाध्याय'

 

रमेश उपाध्याय

 

प्रख्यात आलोचक, कहानीकार और सम्पादक रमेश उपाध्याय के न होने की खबर पर यकीन करना अब भी मुश्किल हो रहा है रमेश जी से बात करना हमेशा एक युग से बात करना होता था वे सहजता की प्रतिमूर्ति थेकथन जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका निकालकर उन्होंने लघु पत्रिका आंदोलन को एक नयी दिशा देने का कार्य किया। उनका यकीन विज्ञान पर था। कहानी हो या आलोचना, अनुवाद हो या सम्पादन, सभी माध्यमो के जरिये धर्म के ढोंग और अंधविश्वास से वे आजीवन संघर्ष करते रहे। हमने जब भी अनहद में लिखने के लिये अनुरोध किया उन्होने मना नहीं किया पहली बार को भी रमेश जी का स्नेह बराबर मिलता रहा रमेश जी को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं युवा आलोचक आशीष सिंह का आलेख 'बेहतर दुनिया के भविष्य स्वप्नों के कथाकार रमेश उपाध्याय  

 

 

'बेहतर दुनिया के भविष्य स्वप्नों के कथाकार रमेश उपाध्याय' 

 

आशीष सिंह

 

 

 

'कोरोना की वैश्विक महामारी से होने वाले नुकसान तो असंख्य हैं, जिनमें सबसे बड़ा होगा करोड़ों लोगों का बेमौत मारा जाना, लेकिन कुछ फायदे भी नजर आ रहे हैं, जिनमें सबसे बड़ा यह है कि इसके अनुभव से दुनिया कुछ अधिक यथार्थवादी होने जा रही है। इसके अनुभव से एक सबक तो यह मिलने वाला है कि ऐसे संकटों का सामना धार्मिक आस्था और सांप्रदायिक राजनीति से नहीं, वैज्ञानिक ज्ञान और सच्ची जनतांत्रिक राजनीति से ही किया जा सकता है। दूसरा सबक यह है कि ऐसे संकटों से निपटने के लिए लोगों में अंधविश्वासों की जगह वैज्ञानिक चेतना फैलाना निहायत जरूरी है। तीसरा यह कि आर्थिक असमानता और सामाजिक भेदभाव बढ़ाने वाली व्यवस्था की जगह ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो समतावादी और मानवतावादी हो। 

 

   

हालांकि दुनिया ये सबक बहुत जल्दी और आसानी से नहीं सीखेगी और जब तक सीखेगी, बहुत ज्यादा नुकसान हो चुका होगा, फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि सीखेगी और बेहतर दुनिया बनेगी।

 

                       

 -- कथाकार रमेश उपाध्याय                   

 (फेसबुक वाल पर 15 अक्टूबर, 2020)

 

कथाकार, संपादक, कथा-आलोचक व अनुवादक रमेश उपाध्याय जी  हिन्दी जनमानस की चेतना का  स्तरोन्नयन करने में आजीवन कटिबद्ध रहे। ऊपर दर्ज फेसबुक डायरी कथा पत्रिका 'परिकथा' जनवरी-फरवरी, 2021, के अंक में प्रकाशित हुई थी। आज ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए एक तरफ रमेश उपाध्याय जी के सरोकार हमसे मुखातिब हैं और दूसरी तरफ मौजूदा पूंजीवादी तंत्र की अराजकता है, जिस के चलते इन पंकि्तयों के लेखक को भी असमय अपनी जान गंवानी पड़ी।  पिछले साल कोरोना व उसके चलते बिना तैयारी के देशबंदी का जो फरमान हुकूमत ने जारी किया था, उनने कितनी जाने ली, कितने परिवार तबाही की मंजिल पर पहुंच गये, उसका शायद ही ठीक-ठाक मूल्यांकन कभी हो सके। आज फिर यह महामारी अपनी दुगुनी ताकत के साथ हमलावर है और व्यवस्था के खैरख्वाह लगभग हतप्रभ से हैं... । क्या यह आपदा हमारी मानवीय ताकत की परीक्षा ले रही या अब तक चले आये शासन तंत्र की पोलपट्टी खोल रही है। ऐसे कई सवाल भी जेहन में उभरने लगते हैं ऐसे में फेसबुक डायरी के उपरोक्त हिस्से पर नजर पड़ते ही मन कहता है कि नाउम्मीदी के बीच उम्मीद की चिंगारी तलाशने की जरुरत है। लेखक रमेश उपाध्याय भले ही भौतिक रूप में हमारे बीच आज नहीं हैं लेकिन उनकी लेखनी से उभरे ऐसे तमाम हर्फ  आज के कठिन समय में भी उम्मीद की चिंगारी जगाते  मिलते हैं।

 

 

     

एक बेहतर दुनिया का सपना संजोए इस साहित्यिक हस्ती को व्यवस्था के कुप्रबंधन ने गला घोंटा है और उन जैसे तमाम लोग भी हमसे छीन लिए जा रहें हैं। इस समय मानो एक किसिम का अघोषित युद्ध चल रहा है और हम अपने में सिकुड़ते जाने की ओर ढकेले जा रहे हैं। मौजूदा  सदी का  भयानक उथलपुथल भरा मंजर ही नहीं बल्कि हमारे मनोजगत को गहरे तक प्रभावित करनेवाला समय भी है यह। किनके कितने लोग   असमय छीन लिए गये और कितने छीने जा रहे हैं और हम विवश हैं, इससे ज्यादा पीड़ादायक और क्या होगा! इस समय जिस तरह की अफरातफरी, अराजकता का माहौल व्याप्त हो उनसे यह जाहिर कर दिया है कि लूट औ मुनाफे पर टिकी हुकूमत अपने अवाम की सुरक्षा कर पाने में कितनी 'कारगर' है! अब तक दर्जनों सृजनशील व्यक्तित्व, हजारों की संख्या में आम अवाम अकाल काल के गाल में समा गये हैं। कहने को तो यह मौतें वैश्विक महामारी से हुईं हैं लेकिन इसके पीछे मौजूद अव्यवस्था, लालफीताशाही व दिखावटी तंत्र कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। आज जब हम रमेश उपाध्याय जी को याद कर रहे हैं तो अनायास तमाम वे चेहरे भी हमारी आँखों के सामने खड़े हो जा रहे हैं जो रमेश जी की कहानियों से निकल कर समाज में शिरकत कर रहे हैं। भोपाल गैस कांड में हुई अपार जनहानि पर लिखी उनकी कहानी "त्रासदी ...माई फुट" उस घटना को महज दुर्घटना नहीं मानती बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई हत्या मानती है। आज भी कोरोना की महामारी में हो रही मौतों के पीछे जिम्मेदारी शक्तियों की शिनाख्त करने की जरूरत है। खैर!

       


 

रमेश उपाध्याय एक जनवादी कथाकार थे। साठोत्तरी पीढ़ी के कथाकारों में से एक थे। जब हम 'साठोत्तरी पीढ़ी' पद का प्रयोग करते हैं तो हमारे सामने अनायास बहुप्रचलित चार कथाकारों ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, रवींद्र कालिया, दूध नाथ सिंह के नाम सामने आ जाते हैं। एक नयी भाषा भंगिमा व पुरानेपन से  अलग होने की कोशिश करते इन कहानीकारों ने मध्यवर्गीय जीवन में आ रहे बदलाव, ऊहापोह को बखूबी दर्ज कियालेकिन वैयक्तिक अनुभूति व प्रामाणिक अनुभूति जैसे शाब्दिक नारों के बीच साठोत्तरी पीढ़ी के बाद कुछ युवा कथाकार कहानी को आम जनजीवन की ओर ले जाने की कोशिश करते मिलते हैं, जिनमें संघर्षशील मजदूर वर्ग, निम्न मध्यवर्गीय जिंदगी की जद्दोजहद व शहरी व कस्बाई जीवन से ज्यादा तलछट के बाशिंदों की गाथा कहने के लिए आगे आ रहे थे। जिनकी अपनी दुश्वारियां हैं, जिंदगी की चुनौतियाँ हैं। इस कोशिश में लगे युवा कथाकारों में  रमेश उपाध्याय, मधुकर सिंह, जितेंद्र भाटिया, इसराइल, इब्राहिम शरीफ, कामता नाथ आदि नये उभरते रचनाकार थे, जो अपने को महज साठोत्तरी का विस्तार कहे जाने से संतुष्ट नहीं थे। उस समय व्यक्तिगत अनुभूति या ठेठ यथार्थ को "प्रामाणिक अनुभूतिकहते हुए  कहानी के  शिल्प में प्रस्तुत होती रचनाओं के वस्तु-बोध  प्रविधि को  ये कहानीकार अपर्याप्त व संकुचित दायरे की प्रस्तुति मानते थे। इन नये कथाकारों ने अपनी पुरानी पीढ़ी से 'प्लाट' और पृष्ठभूमि का नाता भले भी जोड़े रखा हो लेकिन अनुभूति की वैयक्तिकता को सामाजिक अनुभूति, चेतना की जमीन पर परखने की कोशिश करते मिलते हैं। कमोबेश अपनी रचनात्मक  असंतुष्टि को एक मंच देने के लिए, अपने सामाजिक दायित्व को रचनात्मक स्वरूप में ढालने की कोशिश को चिन्हांकित करने के लिए ही वे  'समांतर कहानी' जैसे एक आंदोलन की जरूरत भी महसूस करते हैं, जबकि इससे पहले हिंदी कथा जगत ढेरों आंदोलन उभरे और निष्प्राणता को प्राप्त हुए। असल सवाल था अपनी अभिव्यक्ति की दिशा को चिन्हांकित करने कराने की कोशिश .. 'समांतर कहानी ' ..

 

   

यह पद तत्कालीन मुख्यधारा के सिनेमा के बरक्स आम अवाम की आवाज को सिनेमाई परदे पर उतारती फिल्मों के लिए प्रचलन में आ चुका था। हालांकि समांतर कहानी आंदोलन के मुख्य प्रणेता कमलेश्वर को बताया जाता है, लेकिन इसके पीछे रमेश उपाध्याय जैसे कथाकारों का अहम योगदान था। जबकि आगे चलकर कुछ वैचारिक असहमतियों के चलते वे इस आंदोलन से अलग हो कर इसमें मौजूद अराजनीतिक किसिम का स्टैंडसेठाश्रयी आधार पर निकलने वाली 'सारिका' के हित में आंदोलन का उपयोग  आदि कुछ ऐसे सवाल आगे चल कर सामने आये, कालान्तर में  रमेश उपाध्याय   इस आंदोलन अलग हो गये।  इस आंदोलन की पृष्ठभूमि  की चर्चा करते हुए वे "इब्राहिम शरीफ : स्वतंत्र लेखन की चाह का एक दु:स्वप्न"  नामक संस्मरणात्मक आलेख में  सन् 1970 के बाद आये साहित्यिक आंदोलनों व तत्कालीन व्यक्तिगत-सामाजिक चुनौतियों की एक संक्षिप्त तस्वीर दिखाने की कोशिश की है। 

       

 

रमेश जी की रचनात्मक यात्रा तमाम पड़ावों से हो कर गुजरी है। 1 मार्च, 1942 को जिला एटा में जन्मे रमेश रमेश चंद्र शर्मा उर्फ रमेश उपाध्याय की साहित्यिक अभिरुचि बचपन से ही विकसित होने लगी थी। पारिवारिक परिवेश व आगे चल कर जीवन के वैविध्यपूर्ण चुनौतियों ने ही  साहित्यिक दर्पण में  अपने देखने-दिखाने की  प्रेरणा दी होगी ।  उनकी  आत्मकथा "मेरा मुझमें कुछ  नहीं"  का  यह हिस्सा देखने लायक है

   

 

‘‘1960 के अप्रैल महीने की एक सुहावनी सुबह है। अजमेर के रेलवे स्टेशन पर अठारह साल का एक लड़का गाड़ी से उतरता है। शर्ट-पैंट और चप्पलें पहने हुए। साथ में सिर्फ एक झोला है, जिसमें उसके एक जोड़ी कपड़े हैं और कुछ कागज। लड़का स्टेशन से बाहर आता है। सामने ही घंटाघर है, जिसकी घड़ी में लगभग साढ़े आठ बजे हैं। वहीं कुछ हलवाइयों, चाय वालों, पनवाड़ियों आदि की दुकानें हैं। लड़का जबसे यात्रा पर निकला है, उसने कुछ नहीं खाया है। उसे जोर की भूख लगी है। वह सिर्फ दस रुपये ले कर चला था, जिनमें से रेल का टिकट और सिगरेट का पैकेट खरीदने के बाद अब उसकी जेब में इतने ही पैसे बचे हैं कि वह नाश्ता कर सके और सिगरेट खरीद सके। जो होगा, देखा जायेगा के भाव से सिर झटक कर लड़का आगे बढ़ता है। सड़क पार कर के एक हलवाई की दुकान पर पहुँचता है। दुकान के सामने पड़ी बेंच पर बैठ कर मजे से नाश्ता करता है। पनवाड़ी से सिगरेट खरीदता है और बिलकुल खाली जेब हो जाता है।

 

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लेकिन मैं उस समय एक नौजवान लड़का था, जिसके सामने जिंदा रहने, कमाने-खाने, अपने परिवार का सहारा बनने और अपना भविष्य बनाने के लिए काम करने के साथ-साथ अपने दम पर अपनी पढ़ाई जारी रखने की इतनी सारी समस्याएँ थीं कि मुझे इस दिशा में निश्चित हो कर आगे बढ़ने की सुविधा और फुर्सत ही नहीं थी। फिर, वह मेरी प्रेम करने और अपने भविष्य के स्वप्न देखने की उम्र थी। लेकिन मेरे मन में कहीं गहराई तक यह बात पैठ चुकी थी कि मुझे अच्छा मनुष्य तो बनना है, पर ईश्वर के बिना ही जीना है। भाग्य और भगवान के भरोसे बैठे रहने के बजाय अपना भविष्य अपने हाथों बनाना है। इससे एक तरफ मुझमें आत्मविश्वास पैदा हुआ, दूसरी तरफ रूढ़ियों और अंधविश्वासों से बचे रहने की दृढ़ता पैदा हुई और तीसरी तरफ एक प्रकार की वैज्ञानिक मानसिकता के साथ सृजनशील कल्पनाएँ करने और उन्हें कागज पर उतारने की इच्छा पैदा हुई। शायद इन्हीं सब चीजों ने मुझे एक प्रकार का सदाचारी, विद्रोही, दुस्साहसी, स्वप्नदर्शी और लेखक बनाया।’’  अजमेर में अपने जीवन की शुरुआती चुनौती का सामना करते हुए ही एक कम्पोजीटर, प्रूफरीडर से होते हुए पढ़ते-लिखते, पत्रकारिता और अध्यापन के पेशे तक पहुंचते हुए वे आम आदमी की जद्दोजहद को कभी भूले नहीं और यही वह चीज जिसने उन्हें जनपक्षधर लेखक ही नहीं एक सजग विचार सम्पन्न व्यक्तित्व का धनी बनाया। सन् 1962 में रमेश उपाध्याय जी की पहली कहानी प्रकाशित हुई। लखनऊ से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका 'उत्कर्ष के कहानी विशेषांक (अगस्त 1966) में उनकी कहानी "सौन्दर्य बोध" को यशपाल जी ने प्रमुखता से छापा।  यशपाल जी के विशेष संपादन में निकलने इस विशेषांक को सन् साठ के बाद हिन्दी कथा जगत में उतरी युवा पीढ़ी अपने नये अनुभव व प्लाटटेक्निक को पिछले से सीखते हुए कुछ अलहदा प्रयास करने की कोशिश कर रही थी। तीन खंडो में प्रकाशित 'उत्कर्ष' के इस पहले ही खंड में रमेश उपाध्याय के साथ कामता नाथ, पानू खोलिया, से. रा. यात्री, परेश, ममता कालिया, योगेश गुप्त, प्रदीप पंत जैसे महत्वपूर्ण युवा  कथाकार शामिल थे जिनने आगे चल कर हिन्दी कथाजगत को बेहतरीन रचनाओं से समृद्ध किया। इस दौर चल रही बहसों के बारे में हम ऊपर बात कर ही चुके हैं। रमेश उपाध्याय जी का पहला कथा संकलन 'जमी हुई झील' सन् 1969 में प्रकाशित हुई और पहला उपन्यास 'चक्रबद्ध' सन् 1967 में प्रकाशित हुई।   कहानियों में उन्होंने लोक कथा शैली, यथार्थ को फैंटेसी के रूप में और बहुपरतीय यथार्थ को कहानी कौशल में दर्ज करने की बेहतरीन कथा रूपों की बानगी उनके कथा लेखन का शानदार लक्षण है। हर कहानी अपने नये रूप व कलेवर के साथ उनके यहाँ प्रकट होती मिलती है। वह चाहे लोक कथा शैली में लिखी गयी कहानी प्रजा का तंत्र' हो या यथार्थ को भेदती फंतासी की शक्ल में प्रस्तुत होती कहानी 'दूसरा दरवाजा हो।

 

 


 

रमेश उपाध्याय जी की कहानी प्रविधि, सरंचना औ गठन में एक अलग रंग लिए मिलती है। वे परम्परागत ढंग से कहानी को किसी घटना या त्वरित प्रवाह में आ कर दर्ज की गयी सूचनाओं की प्रस्तुति के रूप में नहीं शुरू करते हैं। उसकी शुरुआत होते ही आप को सूचित कर दिया जाता है कि आप एक कहानी पढ़ रहे हैं। एक कहानी में किसी जीवन को बताया जा रहा है। उसकी पृष्ठभूमि, परिवेश औ विगत अतीत से जुड़ी गांठे भी पहले ही दर्ज होती मिलती हैं यानी कहानी के जरिए लेखक अपने समय ,समाज या बदलते जीवन मूल्यों का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन प्रस्तुत कर रहा होता है। जैसे 'दूसरा दरवाजा' नामक कहानी का शिल्प भले ही एक फंतासीनुमा कलेवर लिए हुए हो लेकिन जिस तरह से' अपने परिवेश, जीवन स्थितियों से असंतुष्ट व्यक्ति को अपने निज के दायरे से बाहरी जीवन स्थितियों से जोड़ने की कोशिश की गयी वह प्रविधि न सिर्फ रोचक बल्कि एक तरह से सभ्यता समीक्षा करती भी मिलती है। यथार्थ की प्रस्तुति का यह ढंग जादूई यथार्थवादी ढंग लिए मिलता है। जो दिख रहा है वह हूबहू सच तो नहीं है लेकिन सच तो इसी जैसा ही है। हम "डाक्यूड्रामा" को ही लें। जिसमें वैज्ञानिक अरुण राय की अपने पेशे के प्रति, देश के प्रति अटूट निष्ठा, पृष्ठभूमि के तौर पर सोवियत संघ के विघटन के समय बदलती दुनिया और उसी के साथ उनकी पत्नी-बच्चों की उनसे अतिरिक्त आकाँक्षाओं का अतृप्त अच्छा खासा स्पेस जो उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर असहज करता रहता है। इस पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए वे कहानी शुरू करते हैं। व्योमकेश राय व मिताली घोष जैसे युवाओं की जो मल्टीमीडिया ताने-बाने में सफलता पाने के लिए रिश्तों की नयी परिभाषाएं बनाते दिखते हैं। यह कहानी ग्लोबलाइजेशन के दौर में जनमें नये मूल्यों की कहानी है। कला की दुनिया में मौजूद बाजारू मानसिकता किस तरह से कला की मूलभूत भावनाओं का महज उपयोगी मूल्य बना देने में प्रयासरत है। यह कहानी इस वास्तविकता को  बेहतरीन ढ़ंग से सामने लाती है। वैज्ञानिक अरुन राय की सादगी भरी जिंदगी में मौजूद कमजोरियों को आज की पीढ़ी एक डाक्यूमेंट्री बना कर भुना लेना चाहती है। मिताली घोष से जब व्योमकेश राय अपने पिता अरुन राय पर फिल्म बनाने को कहता है तो किसी आदर्श, या वैज्ञानिक प्रयोगों में उनके कमिटमेंट को दर्शाने के लिए नहीं बल्कि अरुन राय की व्यक्तिगत जिंदगी में मौजूद फांकों को सनसनीखेज ढंग से परोसने-बेचने की सोच लिए हुए है। वह मिताली घोष से कहता है कि - "महान लोगों की महानताएँ ही सामने आती हैं, मिताली! उनकी क्षुद्रताएँ छिपी रहती हैं। चंद्रमा के धब्बे तो सबको दिखाई देते हैं, यह बात कितने लोग जानते हैं कि महान तपस्वी सूर्य में भी धब्बे हैं - सनस्पाट्स?" कहते-कहते व्योमकेश उछल पड़ता है "लो, तुम्हारी फिल्म का शीर्षक भी सूझ गया!" 

 


 

 

और जिन सनस्पाट्स की बात कहते हुए एक धांसू आइडिया की फिल्म वह बनाना चाहता है उसके पीछे के तथ्यों की ठोस जानकारी नहीं है बस अपनी माँ से सुनी हुई प्रतिक्रियामूलक अभिव्यक्ति ही एकमात्र "तथ्य" हैं उसके लिए। तो यह आज की सफलताओं औ उन्नति के शिखरों पर चढ़ते जाने की पीढ़ी की एक तस्वीर। यह कहानी बड़ी  कुशलता से सामान्य से लगते चरित्रों के जरिए अपने समय के बदलते 'सच' उन्हें परखने देखने के बदलते माध्यमों को, इस तकनीकी में मिलती संवेदनहीनता को सामने लाती है। संचार साधनों की बहुतायत भरी आज के  बाजारवादी समय को सामने लाती बहुचर्चित कहानी डाक्यूड्रामा' है। 

 

 

 

रमेश उपाध्याय की कहानियों के पात्र  कभी भी एक रेखीय चरित्र लिए नहीं मिलते, नकारात्मक कहे जाने वाले  चरित्रों में भी  मौजूद सकारात्मक तत्व को उभार कर जीवन की वास्तविक तस्वीर उभारना उनके कथाकार मन  की खास सीफत रही है। सन् 1977 में लिखी गयी कहानी "माटीमिली'' विधवा रधिया की कहानी ही नहीं कहती बल्कि पवित्रता, नैतिकता का बाना ओढ़े उन तमाम ग्रामीण चरित्रों की वास्तविक तस्वीर भी दिखाती है। रधिया एक तथाकथित चरित्रहीन विधवा है। लेकिन जीवन के प्रति जिस उत्कृष्ट मनोभाव को उसके जरिए लेखक ने सामने रखा है वह गौरतलब है। अपनी रचनाओं पर वे लम्बे समय तक काम करते रहते थे उसके बाद ही उसे प्रकाशित करते थे। 'माटीमिली' कहानी के बारे में  एक साक्षात्कार में  वे बताते हैं कि माटीमिली' कहानी कम से कम मैंने  11 बार लिखी होगी और 11 साल में लिखी है। इसकी प्रेरणा मेरे गाँव की स्त्री थी। वो बदचलन मानी जाती थी लेकिन वो इतनी सुंदर थी और मुझे इतनी अच्छी लगती थी कि मैं जब उसके घर जाता था, उसके बच्चों के साथ खेलता था तो मुझे बहुत अच्छा लगता था। उसका घर इतना साफ सुथरा रहता था कि एक पवित्रता का अहसास कराता था। मुझे यह भी अच्छा लगता था कि एक अकेली विधवा अपने बच्चों को पाल रही है। वह अक्सर मेरे माँ के पास आती थी और अपने सारे दुखड़े माँ को सुनाती थी। माँ की थोड़ी सहानुभूति उसके साथ रहती थी; इसलिए वो माँ को अपनी सारी बातें बताती थी और मैं उन बातों को सुना करता था। तभी से उसके प्रति एक तरह का सम्मान मेरे मन में पैदा हुआ। हालांकि वो बदनाम थी, फिर भी मेरे मन में उसके प्रति एक पवित्र भाव सा बना रहता था। मैने उसकी कहानी कई बार लिखी। कहानी में हर बार वो एक बदचलन औरत रूप में सामने आती थी, लेकिन लिखने के बाद लगता था कि यह ठीक नहीं है। मेरे मन में उसके प्रति जो भावनाएं हैं, कहानी उनसे मेल नहीं खाती। तब धीरे थीरे समझ में आया और बाद में आपने देखा कि कहानी में वही चरित्र आया जो मेरे मन में था।" (युवा कथाकार सत्येंद्र श्री वास्तव को दिये एक साक्षात्कार में।)

 

 

राष्ट्रीय राजमार्ग, शेष इतिहास, अर्थतंत्र और अन्य कहानियां आदि कथा संकलनों के साथ चक्रबद्ध, दण्डद्वीप, स्वप्नजीवीहरे फूल की खुशबू उनके उल्लेखनीय उपन्यासों के नाम हैं 

 

 

 

रमेश जी ने न सिर्फ एक कहानीकार, उपन्यासकार, अनुवादक थे बल्कि लघुपत्रिका आंदोलन के अग्रणी सिपाही  भी थे। व्यवसायिक पत्रिकाओं में मौजूद कीमियागिरी व अराजनीतिक दृष्टिकोण अक्सर जनमानस की चेतना को धुंध से भर देता है इसके बरक्स सामाजिक आंदोलन और  पाठकों की सामाजिक चेतना का स्तरोन्नयन करते हुए बेहतर समाज की लड़ाई लड़ी जा सकती है। इसमें कम पूंजी लेकिन बड़े उद्देश्य के साथ निकलने वाली पत्रिकाओं की अहम भूमिका होती है यह बात उनके लिए बिल्कुल स्पष्ट थी। इसीलिए उन्होंने सन् 1980 के जुलाई-अगस्त में 'कथन' पत्रिका की शुरुआत की। इस पत्रिका के प्रवेशांक से ही ही इसके तेवर व समृद्ध सामग्री सुचिंतित  पाठकों को अपनी तरफ खींचती है। 'कथन' पत्रिका का मोटो भी अपने में निहित रचनात्मक दृष्टि का उद्घोष करती मिलती है यानी 'कथन' यथार्थवादी सृजन और समीक्षा की पत्रिका। 'कथन' के पहले अंक में ही भीष्म साहनी, रमेश बत्तरा, सुरेश कांटक, जैसे कहानीकार, नागार्जुन जैसे जनपक्षधर कवियों को प्रकाशित किया गया था। उस अंक में प्रकाशित नागार्जुन की कविता 'नदियाँ बदला ले ही लेंगी' की यह पंक्तियाँ उस समय की  बौद्धिक-सांस्कृतिक स्थिति को साफ साफ प्रश्नांकित करती मिलती हैं –

 

"क्रांति पास है

क्रांति दूर है

बुद्धू तुझको क्या दिखता है 

आ तेरे को सैर कराऊँ

घर में घुस कर क्या लिखता है।" 

 

पहले अंक से ही एक परिचर्चा का स्तम्भ शुरू किया गया था जिसका शीर्षक था "वर्तमान  भारतीय समाज साहित्यकारों से क्या चाहता है।" 

 

 

'कथन' पत्रिका के शुरूआती पंद्रह अंकों तक संपादक की जगह पर रमेश उपाध्याय, राजकुमार शर्मा का नाम प्रकाशित होता रहा और बीस अंकों तक निकलकर 'अक्टूबर-दिसंबर, 1983' में यह स्थगित हो गयी। करीब  पन्द्रह साल के एक लम्बे अवकाश के  बाद 'कथन' का 21वाँ अंक 'एक नयी शुरूआत' के रूप में जनवरी-मार्च, 1999 से  पुनः प्रकाशित होना शुरू हुआ। सम्पादकीय 'नयी शुरुआत' में वे लिखते हैं कि - "पंद्रह वर्षों के बाद 'कथन' का प्रकाशन फिर शुरू हो रहा है। इसके पुराने पाठक 1980 से 1983 तक निकले इसके बीस अंकों को भूले नहीं होंगे। उन चार वर्षों में निरंतर नियत समय पर निकलने वाली इस पत्रिका ने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जो स्थान बनाया था, वह भी उनके ध्यान में होगा। साहित्य, संस्कृति, कला, विज्ञान और समाज विज्ञान के क्षेत्रों से संबंधित बड़े से बड़े  और नये से नये लेखकों का सहयोग 'कथन' को मिला था।" पहले अंक से लेकर 'कथन' के आगे के अंकों में पत्रिका की पीठ पर दर्ज प्रेमचंद की प्रस्तुत इबारत ध्येय वाक्य की तरह से दर्ज मिलती रही है। वह इबारत यह कहती है - "अगर हमारा अंतस प्रेम की ज्योति से प्रकाशित हो और सेवा का आदर्श हमारे सामने हो तो ऐसी कोई कठिनाई नहीं जिस पर हम विजय न प्राप्त कर सकें।" इस तरह से कथन न सिर्फ एक साहित्यिक पत्रिका थी बल्कि सामाजिक सरोकार लिए हुए एक आंदोलनधर्मी पत्रिका रही है। एक तरह से यह रमेश उपाध्याय जी के संपादकीय दृष्टि व समझ की झांकी भी है। 'कथन' न सिर्फ कहानियों के लिए बल्कि देश-दुनिया में आ रहे सामाजिक-राजनीतिक सांस्कृतिक बदलावों से हिन्दी जनमानस को परिचित कराने वाली उत्कृष्ट पत्रिकाओं में से एक रही है। "आज के सवाल” शृंखला व साक्षात्कार स्तम्भ में प्रस्तुत सामग्री सामाजिक विचारकों, वैज्ञानिकों, संस्कृतिकर्मियों व समाज को बेहतर बनाने में लगी बौद्धिक जगत की उपस्थिति 'कथन' को महज साहित्यिक पत्रिका तक सिमट कर निकलने वाली पत्रिका नहीं रहने देती। हिन्दी जगत को  विचार सम्पन्न बनाना  व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करना  रमेश उपाध्याय के लिए अपने सम्पूर्ण लेखन का ही ध्येय रहा है। यही चीज उन्हें तमाम दूसरे मसिजीवी मनुष्यों से अलग करती है। वह चाहे जनता का नया साहित्य, कला की जरुरत, उत्पीड़तों का शिक्षा शास्त्र जैसे अनुवाद कर्म हो या जनवादी आंदोलन के कार्यवृत्त को साहित्यिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करती कृति "जनवादी कहानी पृष्ठभूमि से पुनर्विचार तक' की प्रस्तुति हो या एक खास शिल्प मुक्तिबोध की कविताओं से संवाद करती कृति  "मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नदृष्टा" हो। 

 


 

 

एक कथा-आलोचक के रूप में रमेश उपाध्याय को देखने की जरूरत है। पिछले लम्बे समय से भूमण्डलीय यथार्थ व आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद जैसे पदबंधों की रोशनी में कहानी को देखने-समझने की हिमायत करते रहे हैं।

 

 

अच्छी कहानी की अवधारणा पर बात करते हुए कहानीकार रमेश उपाध्याय कथा-आलोचक की भूमिका में उतरते हुए शिल्प, गठन, रूप औ ढंग से ज्यादा कहानी की खूबसूरती को सुने जाने औ सुनाये जाने की बुनियादी अवधारणा को सामने रखते हैं। गर किसी रचना में कथारस नहीं है, उसे पढ़ते हुए पाठक सुनाने को उत्सुक नहीं हो रहा या उसे लिखते हुए कथाकार उनमें मौजूद जीवन संगीत को सुन नहीं पा रहा है, वहाँ चाहे-अनचाहे कथाकार कुछ ऐसी प्रविधियों को, लटके झटके के रूप में अख्तियार करते हुए मिलेगा जिससे पढ़ने वाले उसकी कला कौशल्य की तारीफ करते हुए आगे बढ़ जाएं, ऐसी कहानी चमत्कारिक सौंदर्य तक सिमटी रह जाती है, जबकि किसी कहानी का मूल आत्मा उसे सुने जाने औ कहे जाने की बीच अपनी उपस्थिति दिखाती मिलती है। वे कहते हैं कि "मैं यह मानता हूं कि कहानी मूलतः कहने और सुनने की चीज है। आज कहानी लिखी और पढ़ी जाती है, लेकिन अच्छा कहानीकार कहानी लिखते समय दरअसल उसे सुना ही रहा होता है और अच्छा पाठक कहानी पढ़ते समय उसे सुन ही रहा होता है। जो कहानी केवल पढ़ने के लिए लिखी जाती है और जिसमें पाठक को रिझाने या चौंकाने वाले भाषा और शिल्प के चमत्कार पैदा किए जाते हैं, मेरे विचार से अच्छी कहानी नहीं होती है। अच्छी कहानी लिखी होने पर भी सुनी जाती है और पाठक (श्रोता) उसे पढ़ कर ('सुन कर')  ही नहीं रह जाता, बल्कि वह उसे दूसरों को सुनाना भी चाहता है...." और इसी के साथ वे हिन्दी जगत में मौजूद कहानी सम्बन्धी विविध अवधारणाओं को उद्घाटित करते हुए उनकी सीमाओं को इस आधार पर चिन्हित करते हैं कि क्या वह कहानी अपने समय के पार जा पा रही है या नहीं। उसमें मौजूद जीवन की आँच दूसरी जिन्दगी को कितना प्रभावित कर पा रही है। ऐसे में उनके सामने व उनसे पहले हिन्दी कथा-जगत में चल रहे नाना किसिम के कहानी आन्दोलनों की विषय वस्तु, कथानक, प्रविधि के पीछे गायब होती पठनीयता, प्रयोजनविहीन उपक्रम आ खड़े होते हैं।  उन्होंने इसीलिए किन्ही आंदोलनों, विचारों व सरणियों के एवज में रची गयी रचनाओं की बजाय परम्परागत ढंग से जीवन को प्रस्तुत रचनाओं को एक नये सिरे से देखने का आग्रह निरंतर किया है। जैसे प्रेमचंद को ले कर देखें। हमारे कुछ समालोचकों के लिए प्रेमचंद को आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी लेखक मानते हैं तो कुछ उनके लेखन काल को दो कालखंडों में बांट कर - आदर्शवादी व यथार्थवादी - देखने को प्रश्रय देते हैं जबकि रमेश उपाध्याय लगातार इस तरह के बंटवारे को लगातार एकांगी और लंगड़ी अवधारणा मानते रहे हैं। वे रचना में मौजूद भविष्य स्वप्न को यथार्थ के जरूरी हिस्से के रूप में देखते हैं जबकि नई कहानी आंदोलन या अकहानी  आंदोलनों के कई झंडाबरदार आलोचकों ने 'उन कहानियों को अच्छी बताया 'जिसमें कोई कथानक न हो, जिसका अंत खुला हुआ हो या अंत न हो। प्रेमचंद के लेखन में आदर्श और यथार्थ को अलग-अलग खित्ते में रख कर देखने के बरक्स वे यथार्थ और आदर्श में निहित आपसी रिश्ते को विकसित करते हुए 'होने' और 'होना चाहिए' की  स्थिति तक आगे बढ़ते हुए देखने के हिमायती रहे हैं। इस बात को वे  यथार्थ के गर्भ में कसमसाते भविष्य को  स्पर्श करती कहानियों को रेखांकित करते हुए अपने कथाकार मित्र इसराइल की इन पंक्तियों को प्रमुखता से बार -बार उद्धृत किया है। इसराइल के पहले कहानी संग्रह 'फर्क' (1978) की भूमिका कहती है कि "एक मार्क्सवादी के रूप में मेरे कलाकार ने सीखा है कि सिर्फ वही सच नहीं है, जो सामने है, बल्कि वह भी सच.है, जो कहीं दूर अनागत की कोख में जन्म लेने के लिए कसमसा रहा है। उस अनागत सच तक पहुंचने की प्रक्रिया को तीव्र करने के संघर्ष को समर्पित मेरे कलाकार की चेतना अगर तीसरी आँख की तरह अपने पात्रों में उपस्थित नजर आती हो, तो यह मेरी सफलता है।"  इसराइल के कथन में 'भविष्य के स्वप्न' को कहानीकार रमेश उपाध्याय कथा प्रयोजन, उद्देश्य के रूप में किसी कहानी का आवश्यक अंग मानते रहे हैं। इसीलिए वे बार-बार प्रेमचंद की प्रविधि को पुनर्पाठ व पुनर्परिभाषित करने पर जोर देते रहे हैं। साथ ही प्रगतिशील कहे जाने वाले या कलावादी आलोचकों-लेखकों दोनों की ओर वे एक ही सवाल फेंकते हैं कि मेरे साहित्यिक हमसफरों "प्रेमचंद के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद" को एक बार फिर नये सिरे से समझने की जरूरत है। दरअसल 'प्रेमचंद 'आदर्श' और 'यथार्थ' को परस्पर विरोधी नहीं मानते थे, बल्कि उन्होंने तो 'नग्न यथार्थवाद' (प्रकृतवाद) के विरूद्ध 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' की स्थापना की थी। हालांकि प्रेमचंद की कथायात्रा ही नहीं बल्कि उनकी कथा निर्मिति को व्याख्यायित करने के लिए रमेश जी की यह अवधारणा बहसतलब है, लेकिन इसमें निहित कला की जरूरत वाला पहलू कला को महज मनोरंजन तक समेट देने वाले कलाकारों से अलगा कर उसे जीवन की जरुरतों की जमीन पर ला खड़ी करती है और आज जब चारों तरफ एक नये किसिम की सामाजिक सत्ता - राजनीतिक सत्ता हमारी जिन्दगियों को विदीर्ण कर रही है, कला की जरूरत वाला हिस्सा और भी प्रासंगिक होता जा रहा है। इस मायने में एक कहानीकार के तौर पर ही नहीं एक चिंतक के तौर पर भी रमेश उपाध्याय जैसे लेखक पुरानी पीढ़ी के आधुनिक लेखक थे जो लगातार अपने समय के यथार्थ को देखने, बरतने व बदलने के स्वप्न से जुड़े रहे। जब महज किसी पार्टी, संगठन या समूह के  हित-चिंतन को ही साहित्य में  प्रतिपक्ष की भूमिका दिखाने की कोशिश हो रही हो वैसे में  साहित्य की उपस्थिति ही हर प्रकार के अन्याय, बुराई के विरुद्ध खड़ी शक्ति के रूप में देखने-दिखाने की उनकी सैद्धांतिकी ज्यादा खुलापन लिए और ज्यादा व्यवहारिक दिखती है। आजीवन साहित्यिक कर्म करते हुए रमेश उपाध्याय साहित्यकार के इसी दायित्व का निर्वहन करते मिलते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण लेखक की रचनात्मक उपस्थिति हमें बार-बार अपने रचनात्मक दायित्वों की याददिहानी कराती रहेगी।  'बेहतर दुनिया के भविष्य स्वप्न' को अपनी रचनाओं में  रूपायित करने वाले कथाकार, संपादक औ आलोचक के रूप में रमेश उपाध्याय साहित्यिक हलके में कुछ बेहतर कुछ नया करने के लिए प्रेरित करते रहेंगे ।

 

 

सम्पर्क

 

आशीष सिंह

ई-2/653

सेक्टर-एफ, जानकीपुरम लखनऊ-226021

मो - 08739015727

 

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