संजीव जैन का आलेख 'द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध एक अंतर्दृष्टि'

 

 


 

दुनिया को बदलने में विचारकों की एक बड़ी भूमिका रही है। कार्ल मार्क्स उन  महानतम विचारकों में से एक है जिनके दर्शन ने इस दुनिया की तस्वीर को बदल कर रख दिया। मार्क्स ने द्वंद्वात्मकता को केन्द्र में रखते हुए चिंतन मनन किया और अपने विचार दुनिया के सामने रखे। आज कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है। इस महान विचारक को याद करते हुए हम पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं संजीव जैन का आलेख 'द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध एक अंतर्दृष्टि'। इस आलेख को हमने धागा व्हाट्सएप ग्रुप से साभार लिया है।

 

 

 

आज कार्ल मार्क्स की जयंती है अतः हम आज उनके सबसे अधिक क्रांतिकारी सिद्धांत या अवधारणा को समझने का प्रयास करेंगे। मार्क्स ने जिस टूल का उपयोग अपने संपूर्ण लेखन में किया है वह द्वंद्वात्मकता। यह क्या है? और कैसे यह एक वैश्विक सिद्धांत है? यह जानने की मेरी एक कोशिश के रूप में यह लेख लिखा गया है। यह कोई अंतिम विश्लेषण नहीं है। यह इस सिद्धांत को समझने का एक प्रयास है। द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध के अनेक और आयाम भी हो सकते हैं।

संजीव जैन

 

 

 'द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध एक अंतर्दृष्टि'

 

 

संजीव जैन


 

द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध क्या है? और यह कैसे एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है जीवन की वास्तविकता को समझने की? मार्क्स ने पूंजीवाद के सारतत्व को खोलने के लिए इसी विधि का एक औजार के रूप में प्रयोग किया है। वे द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध से ही पूंजीवाद को उसकी अंतर्निहित वास्तविकता में समझ सके और इसी तकनीक के माध्यम से वे इसके सारतत्व की व्याख्या कर सके। 

 

   

'द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध' एक वैश्विक नियम है, जिससे विश्व फंक्शन करता है, गति करता है, विकास करता है, बदलता है। यह द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध प्राकृतिक विश्व में भी उसी तरह काम करता है जैसे मानव समाज और उसकी उत्पादन की प्रक्रिया में और उत्पादन के संबंधों में। मनुष्य की सोचने की प्रक्रिया और भौतिक विश्व में प्रवेश करने की सिद्धांतिकी भी इस नियम से संचालित होती है। द्वंद्वियों के बीच एकात्मकता का नियम जिसे द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध का नियम कहा जाता है सब जगह काम करता है।

   

 


 

हमें न केवल मार्क्स के पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के विश्लेषण को समझने के लिए बल्कि जीवन के सार तत्व को समझने के लिए इस 'द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध' को समझना आवश्यक है। इसकी ठीक ठीक परिभाषा के लिए मैं पाओला ओलमान के शब्दों को उद्धृत करना चाहूंगा। वे अपनी पुस्तक भूमंडलीय पूंजीवाद के विरुद्ध आलोचनात्मक शिक्षा के अध्याय दो में इसे इन शब्दों में परिभाषित करती हैं - "यह उन दो द्वंद्वियों (या विरोधी तत्वों) के मेल से बनी एकात्मक अन्विति है, जो अपने वर्तमान अस्तित्वगत स्वरूप में और अपनी ऐतिहासिक भूमिका में उस परिपथ से बाहर कभी संभव नहीं हो सकते थे जिस परिपथ से वे संबंधित हैं। इसके अलावा प्रत्येक द्वंद्वी की आंतरिक प्रकृति और इसका विकास दूसरे द्वंद्वी के साथ उसके संबंध से निर्मित और निर्धारित होते हैं।"

   

 

ओलमान के द्वारा दी गई यह परिभाषा पूर्णतः मार्क्स के लेखन से निकाली गई है। द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध और सामान्य अंतर्विरोध में अंतर करना होगा। यह फर्क चूंकि इनके मूलभूत चरित्र को उजागर करता है इसलिए इसे समझ लेना चाहिए। 

   

 

सामान्य अंतर्विरोध किसी व्यक्ति के अपने विचारों और व्यवहारों में निहित होते हैं। ये ऐसे अंतर्विरोध होते हैं जो उस व्यक्ति के अपने ही विचारों और व्यवहारों के बीच असंगति के रूप में, अतार्किकता के रूप में पड़े रहते हैं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति की चेतना में दो विरोधी विचार, या एक विचार और उसके व्यवहार में अंतर्विरोध के रूप में विद्यमान रहते हैं। उस व्यक्ति के अलग अलग समय पर विरोधी विचार होते हैं उनके बीच कोई सुसंगति या तार्किकता नहीं होती। जैसे  अनेक लेखक अपने लेखन और जीवन की वास्तविकता के बीच कोई संगति नहीं बना पाते हैं। वे एक समय और जगह जहां वे सम्मानजनक स्थिति में होते हैं या जनता के बीच होते हैं, वे बहुत आदर्शपूर्ण या जनवादी विचारों को व्यक्त करते दिखते हैं और जब वे निजी समय और स्थितियों में होते हैं तो उनके विचार और व्यवहार ठीक उससे विरोधी होते हैं। यह असंगति उनके जीवन में निहित अंतर्विरोधों के कारण होती है और वे कभी नहीं समझ पाते कि वे दर असल क्या हैं। यही नेताओं और धार्मिक गुरुओं के जीवन में स्पष्ट रूप से दिखने वाले अंतर्विरोध हैं। 

   

 

इसका अर्थ है कि अंतर्विरोध एक व्यक्ति के अंदर-बाहर के जीवन में निहित होते हैं, परंतु द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध मार्क्स के अनुसार हमारे भौतिक जीवन की वास्तविकता में अवस्थित होते हैं। दूसरे शब्दों में हमारे भौतिक विश्व के सामाजिक संबंधों में विद्यमान होते हैं। फर्क यह हुआ कि जहां अंतर्विरोध एक व्यक्ति के विचार और व्यवहार में असंगति और विसंगति के रूप में होते हैं। वहीं द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध भौतिक जीवन के ठोस और वास्तविक सामाजिक संबंधों के बीच विद्यमान होते हैं।

  


 

 

सामान्य अंतर्विरोध के लिए किसी द्वंद्वी या विरोधी की ऐसी संबंधात्मक उपस्थिति की जरूरत नहीं है जिसके साथ उसकी एकात्मक अन्विति की जरुरत हो, जिसके बिना वह विचार और विचार, विचार और व्यवहार में असंगति या विरोध को पैदा कर सके। मतलब द्वंद्वी के साथ संबंध के बिना उस तरह का अंतर्विरोध संभव ही न हो। सामान्य अंतर्विरोध एक संबंधात्मक विरोधी के बिना भी संभव है, परंतु द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधों के लिए एक द्वंद्वी का होना और उससे संबंधों की अन्विति होना भी जरूरी है और वह परिपथ यानि प्रक्रिया भी जरूरी है जिसमें दोनों द्वंद्वी एक संबंधात्मक संरचना में बंधते हैं। यह परिपथ ही वह बिंदु है जहां द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध अवस्थित होते हैं। 

     

 

 

सामान्य अंतर्विरोध व्यक्ति की आंतरिक प्रकृति को नहीं बनाते बल्कि आंतरिक प्रकृति की असंगति और अतार्किकता के परिणाम होते हैं। जबकि द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध दोनों द्वंद्वियों की आंतरिक प्रकृति का विकास करते हैं। यह आंतरिक प्रकृति का निर्माण दूसरे द्वंद्वी से उसके संबंधों की प्रकृति से होता है। दूसरे द्वंद्वी के साथ संबंधों की प्रकृति से ही प्रत्येक द्वंद्वी की आंतरिक प्रकृति निर्धारित होती है। 

       

 

 

द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध के लिए दो द्वंद्वियों का होना जरूरी है। दोनों द्वंद्वियों को एक संबंधात्मक परिपथ में बंधा होना जरूरी है और दोनों द्वंद्वियों का वर्तमान अस्तित्वगत स्वरूप, मतलब जिस रूप में वे अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं वह एक ऐतिहासिक भूमिका में एक प्रक्रियात्मक परिपथ से निर्मित होता है न कि जन्म, जाति से। यह एक अनिवार्य समझ है द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधों के संबंध में। 

 

 

मार्क्स के द्वंद्वात्मक चिंतन का यह एक आधारभूत तत्व है जिसके बिना मार्क्स को समझना न मुमकिन है। इसे समझने में हमें ध्यान रखना होगा कि वे दो द्वंद्वियों यानि विरोधी तत्वों के बीच एकात्मक अन्विति की बात करते हैं। यह एकात्मक अन्विति सहयोगात्मक भी हो सकती है और संघर्षात्मक भी। द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध विश्व की संबंधात्मक यानि एक दूसरे से गुंथे हुए होने की अवधारणा प्रस्तुत करता है। यह संकल्पना यह भी बताती है कि हम जो एक द्वंद्वी के रूप में अस्तित्ववान हैं, तो हमारे अस्तित्व की चेतनापरक और भौतिक परिणतियां इस द्वंद्वात्मक संबंधों की गत्यात्मकता के साथ प्रकट होती हैं। 

   

 


 

इस दृष्टि से विश्व को देखने और समझने से हम एक नये तरह की वैश्विक चेतना से समृद्ध होते हैं। यह ऐसी चेतना है जो 'दूसरे के अस्तित्व और उस अस्तित्व का हमारे प्रतिपक्ष के रूप में होने से ही पैदा होती है। इसे ही पाओलो फ्रेरे इस तरह कहते हैं कि - "तुम्हारे हुए बिना मेरा होना नहीं हो सकता और तुम्हारे सोचे बिना मैं सोच नहीं सकता।" यह द्वंद्वात्मक चिंतन का वह सूत्र है जो विश्व को नये तरह से परिभाषित करता है। यह एक तरह से नये विश्व को रचना है। फ्रेरे यह भी कहते हैं कि शब्द को पढ़ना मतलब विश्व को पढ़ना है। एक नये शब्द की रचना का मतलब नये विश्व की रचना करना है। मार्क्स ने 'द्वंद्वात्मक चिंतन' या 'द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध' की नये सिरे से अवधारणा प्रस्तुत कर के नये तरह से विश्व को पढ़ने और समझने की संकल्पना प्रस्तुत की है।

   

 

 

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि हमारे चेतनागत और भौतिक अस्तित्व की सभी दशाएं हमारे विश्व से द्वंद्वात्मक संबंधों में प्रवेश करने से प्रकट होती हैं। जब तक हम द्वंद्वात्मक संबंधों की ऐतिहासिक भूमिका के परिपथ में प्रविष्ट नहीं होते हैं तब तक हमारे अस्तित्व का कोई भी रूप प्रकट नहीं होता है।

     

 

 

द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधों की स्थिति में दोनों प्रतिद्वंद्वी दो विरोधी संबंधों में बंधे होते हैं। इनमें से एक सकारात्मक होता है और एक नकारात्मक। सकारात्मक पक्ष इन संबंधों को बनाए रखना चाहता है और वह इसके लिए प्रयत्नशील और सहयोगात्मक रुख रखता है। चूंकि इस द्वंद्वात्मक संबंध में जो सकारात्मक पक्ष होता है वह संबंध के बने रहने में लाभ की स्थिति में होता है। अर्थात इस संबंध के बने रहने में सकारात्मक पक्ष को ही लाभ होता है इसलिए वह इस संबंध को बनाये रखने में सहयोगात्मक रुख रखता है। इसे हम आगे श्रम-पूंजी संबंध के दौरान समझेंगे।

 

 

 

इस द्वंद्वात्मक संबंध में दूसरा पक्ष नकारात्मक होता है। नकारात्मक पक्ष या द्वंद्वी इस द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध के संबंध में शोषित स्थिति में होता है यानि कि वह हमेशा अपने अस्तित्व की नकारात्मक स्थिति में जीता है इसलिए वह इस संबंध के निषेध का यानि उन्मूलन करने का प्रयास करता है। 

   

 

 

इस द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधी संबंधों की एक खास बात यह भी है कि इस संबंध में रहते हुए कोई भी द्वंद्वी अपनी स्थिति या भौतिक दशाओं में मूलभूत बदलाव नहीं कर सकता है, क्योंकि जो एक पक्ष है वह जो है और जिस तरह वह विकास या गति करता है वह सब दूसरे के होने से हैजैसा वह है, वैसे होने पर निर्भर करता है। इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि जो द्वंद्वी इस संबंध में नकारात्मक स्थिति में है उसके लिए यह संबंध उसके अपने अस्तित्व के लिए निगेटिव या शत्रुतापूर्ण होता है। इसलिए वह अपनी निगेटिव स्थिति से मुक्त होने के लिए इस संबंध को ही उन्मूलित करने की कोशिश करता है।

     

 

यहीं से वर्ग संघर्ष की स्थिति एक अनिवार्यता धारण कर लेती है। सकारात्मक पक्ष इस संबंध को बनाए रखने का प्रयास करता है और नकारात्मक पक्ष इसके उन्मूलन का प्रयास करता है। परिणामस्वरूप दोनों वर्गों के बीच संघर्ष की स्थिति बनना इस द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध की अंतिम परिणति बनती है। इसके बीच बहुत सारी स्थितियां बनती हैं। सकारात्मक पक्ष कानून, सेना, पुलिस, गुंडागर्दी, दादागिरी इत्यादि अनेक तरह के हिंसात्मक तरीके अपनाता है इस संबंध को उन्मूलित न होने देने के लिए।

   

 

 

इस द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध के संबंध को श्रम और पूंजी के द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध के रूप में समझने का प्रयास करते हैं और मार्क्स के संदर्भ में यही वह पहला द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध है जो पूंजीवादी व्यवस्था में आरंभ से अंत तक अंतर्निहित है। पूंजीवादी विचारधारा के सिद्धांतकार पूंजीवाद के द्वंद्वियों को परस्पर संबंधित या एकान्विति के तौर पर नहीं समझते हैं बल्कि वे उन द्वंद्वियों को  द्वैतपूर्ण द्वंद्वियों या विरोधी तत्वों के रूप में समझते हैं। इस तरह विचार को एक द्वैतवादी या विभाजित चारित्रिक रूप तैयार हो जाता है, क्योंकि विचारधारात्मक चिंतन खंड-खंड विचार करता है। वह दोनों द्वंद्वियों को अलग अलग स्वतंत्र और अपने में पूर्ण इकाई की तरह विचार करता है। यही कारण है कि पूंजीवादी विचारधारा पूंजीवाद के वास्तविक सारतत्व या अंतर्य को ढंक देती है। क्योंकि श्रम और पूंजी द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध के संबंध में बंधे एक दूसरे के पूरक द्वंद्वी हैं न कि दो स्वतंत्र सारतत्व। पूंजी का सारतत्व 'मुनाफा' श्रम के शोषण के बिना संभव नहीं है। जब तक श्रम अतिरिक्त मूल्य पैदा नहीं करेगा तब तक पूंजीवाद का अस्तित्व, गति और प्रक्रिया संभव नहीं है। पूंजीवादी विचारधारा इस सार-तत्व को तिरोहित कर देती है। जबकि मार्क्स का द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद दोनों द्वंद्वियों को एक संबंधात्मक व्यवस्था में एक दूसरे के लिए अनिवार्य तत्व के रूप में देखता है। इसलिए वह पूंजीवाद के सार-तत्व शोषण को उद्घाटित करने में सफल हो सके हैं।

 

 

 

द्वंद्वात्मक तर्क अपने सबसे सामान्य स्थिति में चीजों की गति का नियम है। इस विश्व में हर चीज अपनी स्वयं एक पहचान रखती है। उसकी स्वयं यह पहचान उसका अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में न होने में है। मतलब '' एक ही समय में ' +' है और वह ठीक उसी समय में '-' भी है। मतलब '' 'अ नहीं' भी है। एक की पहचान अपने द्वंद्वी के रूप 'नहीं होना' भी होती है। जैसे 'श्रम' श्रम है भी और श्रम पूंजी नहीं है। उसकी पहचान पूंजी के नहीं होने में है और पूंजी की पहचान उसके श्रम रूप नहीं होने में है। परंतु पूंजी का पूंजी होना कौन निर्धारित करता है? स्वयं पूंजी यह निर्धारित नहीं कर सकती की वह पूंजी है। श्रम का शोषण यह निर्धारित करता है कि जो श्रम से शोषित किया गया है वह पूंजी है। कोई भी चीज निरपेक्ष रूप से अकेली और स्थिर नहीं हो सकती। उसका होना दूसरे रूप में न होने से ही पहचाना जाता है। यह जो 'न होना' है यही एक अंतर्विरोध है, जिससे 'होने' की अन्विति भी है और संघर्ष भी है।

     

 

 

मार्क्स श्रम और पूंजी के बीच जो द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध को उपस्थित पाते हैं वह इनके बीच का ऐसा संबंध है जो दोनों के जैसे वे हैं उनको वैसा होने को निर्धारित करता है। श्रम और पूंजी के इस द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधी परिपथ के बिना न पूंजी पूंजी हो सकती है और न श्रम एक पण्य के रूप में पहचान बनाने वाली श्रमशक्ति। इन दोनों का इस रूप में होना इनके बीच का यही द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध का संबंध निर्धारित और नियंत्रित करता है। इनमें से पूंजी एक सकारात्मक पक्ष है और श्रम एक नकारात्मक पक्ष है। चूंकि पूंजी का पूंजी होना उसके विशिष्ट अस्तित्व के लिए जरूरी है और उसका इस रूप में निरंतर होते रहने के लिए श्रम-शक्ति का शोषण की अवस्था में होना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए पूंजी इस द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधी संबंध को बनाए रखने की कोशिश करती है इसलिए वह सकारात्मक पक्ष है और श्रम-शक्ति इस संबंध में हमेशा शोषित रहती है इसलिए वह इस संबंध को नकार करने के लिए यानि उन्मूलित करने के लिए प्रयत्नशील रहती है इसलिए श्रम नकारात्मक पक्ष है। ये दोनों पक्ष अपने इस रूप में एक दूसरे के साथ ही हो सकते हैं।

     


 

 

दरअसल गति का द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध का नियम हमें बताता है कि इस विश्व में जितनी भी चीजें हैं, चाहे वे भौतिक रूप में हों, विचार या चेतना के रूप में हों या अवधारणा और संकल्पनाओं के रूप में या होने की प्रक्रिया में हैं, वे सब एक दूसरे के साथ संवाद करती हुई हैं, गत्यात्मक रूप में हैं और निरंतर बदलने की प्रक्रिया में हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि यह विश्व जो हमारे सामने प्रत्यक्ष है और जिस विश्व में हम अपनी भौतिक मौजूदगी महसूस करते हैं वह कोई अलग अलग चीजों या निरपेक्ष विचारों या बिल्कुल स्वतंत्र असंबद्ध अवधारणाओं का समूह नहीं है।

   

 

 

यह विश्व गत्यात्मक, सभी वस्तुओं का दूसरी सभी वस्तुओं से एक संवादात्मक रूप में बदलते रहने वाले रूपों और प्रक्रियाओं का समुच्चय है। इस विश्व में चीजें निरपेक्ष पहचान नहीं रखतीं, बल्कि वे दूसरों के साथ एक संबंधात्मक रूप से ही अपनी पहचान और अस्तित्व को कायम रखती हैं। 

   

 

 

मार्क्स के द्वंद्वात्मक चिंतन का यह गति का सार्वभौमिक और सार्वकालिक नियम है जो विश्व को विकासशील और संबंधों की जटिल द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधों से परिपूर्ण संरचना के रूप में देखता है। द्वंद्वी के साथ संघर्ष के बिना गति संभव नहीं है। हर चीज अपने प्रतिवादी के होने और उसके साथ यूनिटी और स्ट्रगल के संबंध में होती है तभी वह गति करती है।

   

 

 

चीजों को अपने वास्तविक संदर्भ से काट कर देखना या कहना उनका अमूर्तीकरण करना है। द्वंद्वात्मक चिंतन से रहित वैचारिकी चीजों को ठोस वास्तविक संभावनाओं से अलग करके उसको अमूर्त बनाती रही है। मार्क्स ने चीजों को उनके भौतिक संबंधों के भीतर देखा और उनके गति और परिवर्तन के नियम प्रतिपादित किए। यह नियम ही द्वंद्वियों की आंतरिक अन्विति और संघर्ष का नियम है। चीजों को उनका संदर्भ ही ठोस और मूर्त बनाता है। 'मनुष्य' बिना किसी सामाजिक संबंधों के संदर्भ के एक अमूर्त और तरल अवधारणा के रूप में है। जब यही मनुष्य सामाजिक संबंधों के संदर्भ में आता है तो वह सिर्फ मनुष्य नहीं रहता वह पिता, बेटा, पति, नागरिक, अधिकारी, इत्यादि किसी भी तरह की ठोस वास्तविक संभावनाओं के साथ प्रस्तुत होता है। यह ठोस भौतिक सामाजिक संदर्भ भी है जो चीजों को वास्तविक पहचान और अर्थ देते हैं। इन ठोस और वास्तविक भौतिक सामाजिक संबंधों के भीतर जो भी प्रवेश करता है वह अपना प्रतिपक्ष या द्वंद्वी अवश्य रखता है, यह द्वंद्वी ही वह वास्तविक संदर्भ है जिसके साथ अन्विति और संघर्षों के दौरान वह गति करता है, विकसित और परिवर्तित होता है।

   

 

 

यह नियम सभी चीजों पर यथावत लागू होता है। वे चाहे विचार हों, अवधारणाएं हों, प्रक्रिया और प्रणालियां हों, व्यवस्था और सत्ता हो। प्रतिद्वंद्वी के साथ अन्विति और संघर्ष खुद एक द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध की स्थिति है। अन्विति का होना संघर्ष के होने के साथ ही सिद्ध होता है। अन्विति नहीं है तो संघर्ष कैसा? संघर्ष है तो अन्विति है। अन्विति और संघर्ष एक द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध की स्थिति में ही रह सकते हैं। अंतर्विरोध इसलिए कि 'अन्विति है' और 'अन्विति नहीं है' यह अंतर्विरोधी स्थिति है जो संघर्ष की उपस्थिति में ही बनी रह सकती है। यदि संघर्ष नहीं होगा तो न 'अन्वित है' यह सिद्ध होगा और न 'अन्विति नहीं है' यह सिद्ध होगा। 'अन्विति है' यह सकारात्मक पक्ष है और 'अन्विति नहीं है' यह नकारात्मक पक्ष है। इस नकार का निषेध दोनों के बीच संघर्ष में दिखाई देता है। इसे हमें गणतीय फार्मूले में इस तरह रख सकते हैं 'A' और 'Not A'  इन दोनों स्थितियों का एक साथ होना द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध का होना है। 'A'  A है और 'B' B है और 'A' B नहीं है यह द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध नहीं है। यह सामान्य अंतर्विरोध है। इसमें अस्तित्व और अनस्तित्व की दशायें एक ही तत्व में नहीं है। इसलिए वह 'A' मात्र अकेला 'है'। यह एक रिलेशनशिप में नहीं है। द्वंद्वात्मक चिंतन में विश्व संबंधात्मक संरचना है जो संवाद की प्रक्रिया में गति करती है और विकसित होता है या निरंतर बदलता है।

   

 

 

पराभौतिकी के अंतर्गत चेतना और पदार्थ को अलग अलग स्वतंत्र इकाई माना गया है। इसीलिए वे एक पूर्ण सत्य की तरह विश्व में निरपेक्ष तौर पर अस्तित्व वाले हैं। इस विचार में एवसल्यूट ट्रूथ एक जड़ इकाई है। उसमें विकास और परिवर्तन की कोई संभावना नहीं है। परंतु द्वंद्वात्मकता के नियम में मार्क्स ने चेतना और पदार्थ को एक अन्योन्याश्रित संबंधों की प्रक्रिया में गतिशील होते दिखाया है। यह दो विरोधी तत्व एक दूसरे के होने से ही अपना अस्तित्व धारण करते हैं। इसलिए इनके बीच द्वंद्वात्मक संबंधों का रिश्ता है। इनके बीच निरंतर संवाद और संघर्ष होता है। इस संवाद और संघर्षों की प्रक्रिया में ही दोनों विकसित और परिवर्तित होते हैं। 

     

 

 

यह परिवर्तन ऐतिहासिक भौतिकवाद और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नियमों से व्याख्यायित किया जाता है। इस तरह मार्क्स का सबसे महत्वपूर्ण टूल द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधों को समझना है। इसे मार्क्स के राजनीतिक अर्थशास्त्र के संपूर्ण विश्लेषण में और उनके दर्शन संबंधी पूरे विवेचन में हम पसरा हुआ पाते हैं। यही वह मूल तत्व था जिसके कारण वे पूंजीवाद के अंतर्य या सार तत्त्व को सर्वाधिक सटीक और प्रामाणिक विवेचन और विश्लेषण करने में सक्षम हो सके।

     

 

 

मार्क्स को टुकड़ों-टुकड़ों में और किसी खास घटना के संदर्भ में उनके संपूर्ण द्वंद्वात्मक विवेचन से काट कर नहीं देखना और पढ़ना चाहिए। वे ऐतिहासिक युग के एक विशेष काल खंड की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का विवेचन संपूर्ण ऐतिहासिक काल के दौरान कर रहे थे।

 

 


 

संजीव जैन

भोपाल

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुँवर नारायण की कविताएँ

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'।