अकीरा कुरोसावा की "ड्रीम्स" फिल्म के खंड "पनचक्कियों वाला गांव" का कथानक : लेखन और प्रस्तुतीकरण यादवेन्द्र

 

अकीरा कुरोसावा

 

दुनिया के महानतम फिल्मकारों में से एक जापान के अकीरा कुरोसावा (1910 - 1998) की आखिरी फिल्मों में से एक महत्वपूर्ण फिल्म है 1990 की  "ड्रीम्स"। दुर्भाग्य से उसे जापान में बहुत पसंद नहीं किया गया लेकिन अनेक फिल्म समीक्षकों का यह मानना है कि कलात्मक रूप से वह कुरोसावा की श्रेष्ठ फिल्म है। उन्होंने अपनी फिल्मों में हमेशा सामाजिक संदर्भों को उठाया है लेकिन "ड्रीम्स" उनकी सर्वाधिक निजी फिल्म मानी जाती है।

 

इस फिल्म में आठ ऐसे सपनों का बेहद कलात्मक चित्रण है जो कुरोसावा को निजी तौर पर भावनात्मक रूप से बतौर जापानी नागरिक उद्वेलित करते रहे - और इनके मनुष्यता के व्यापक संदर्भ में गहरे मायने रहे हैं।

 

इनमें से एक खंड है "पनचक्कियों वाला गांव" जो प्रकृति के साथ अत्यंत सकारात्मक सामंजस्य बनाए रखने की वकालत करता है। भले ही यह जापानी फ़िल्म हो पर इसके सरोकार वैश्विक सरोकार हैं और इनकी अनुगूंज हमें भारतीय परिवेश में भी बराबर की विह्वलता के साथ सुनाई देगी।

 

आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं अकीरा कुरोसावा की "ड्रीम्स" फिल्म के खंड "पनचक्कियों वाला गांव" का कथानक। इसका लेखन और प्रस्तुतीकरण किया है यादवेन्द्र जी ने।     



 

 

पनचक्कियों वाला गाँव

 

अकीरा कुरोसावा 

 

प्रस्तुतीकरण : यादवेन्द्र  

 

 

"नमस्ते", बच्चों ने अकीरा को देख कर कहा।

"अच्छे रहो बच्चों", मुस्कुराते हुए अकीरा ने जवाब दिया।

हर बच्चे ने क्यारियों से फूल लिए और नदी के किनारे के पत्थर पर रख दिए।

अकीरा गाँव की तरफ जाने लगते हैं, रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखता है जो पनचक्कियों को दुरुस्त करने में जुटा हुआ है।

 


 

"नमस्ते", अकीरा ने कहा पर कोई जवाब नहीं मिला।

"नमस्ते", अकीरा ने अपनी आवाज ऊँची करते हुए कहा।

"अच्छे रहो", बूढ़े ने जवाब दिया।

"इस गाँव का नाम क्या है?, अकीरा ने जानना चाहा।

"इस गाँव का कोई नाम नहीं... हम बस इसे गाँव कहते हैं.... हाँ, कुछ लोग इसे पनचक्की वाला गाँव कहते हैं।

"क्या गाँव के सभी लोग यहीं रहते हैं", अकीरा ने जानना चाहा।

"नहीं, वे यहाँ  नहीं रहते।"

"यहाँ  गाँव में बिजली नहीं है?", अकीरा की जिज्ञासा थी।

"हमें उसकी जरूरत ही नहीं है... लोग बाग इतनी सुविधाओं के आदी हो जाते हैं कि उन्हें लगने लगता है कि उन सुविधाओं के साथ ही रहना बेहतर है.... ऐसा भी होता है कि लोग वे चीजें भी छोड़ देते हैं, उन्हें अपने से अलग कर देते हैं जो वास्तव में उनके भले के लिए हैं... अच्छी है।"

"मैं बिजली के बारे में पूछ रहा हूँ ", अकीरा ने कहा।

 "मोमबत्तियाँ  और अलसी  का तेल हमारे पास पर्याप्त है"

"रात को तो बहुत अंधेरा होता है", अकीरा ने कहा।

 "पर रात होती ही अंधेरे के लिए है.... अब यह बताओ कि रातें दिन की तरह उजाले से भरी क्यों होनी चाहिए?...  रात में इतना अंधेरा न हो कि सितारे चमकते हुए दिखाई दें तो वैसी  रात मुझे कतई पसंद नहीं"

 

 


 

 

"आपके गाँव में धान होता है?", अकीरा ने पूछा, "लेकिन मुझे कहीं भी ट्रैक्टर नहीं दिखाई दिया। आखिर खेती करते कैसे हैं?"

"हमें उनकी जरूरत ही नहीं पड़ती", पनचक्की पर अपना काम करते करते बूढ़े आदमी ने जवाब दिया,

"हमारे पास पास बैल हैं, घोड़े हैं।"

"ईंधन के लिए क्या इस्तेमाल करते हैं आप लोग?", अकीरा ने पूछा।

"लकड़ी... पर जलाने के लिए लकड़ी पेड़ से काटते नहीं बल्कि इतनी लकड़ी हर रोज सूख कर  नीचे गिर जाती है कि हमारा काम उनसे चल जाता है।" 

"यदि आप लोग लकड़ी से चारकोल बना लें तो कुछ पेड़ों से ही आपको इतनी ऊर्जा मिल सकती है जितनी इस पूरे जंगल की लकड़ी से मिलेगी।"

"बात सही कह रहे हो... हम गोबर का भी जलावन के लिए इस्तेमाल करते हैं... कुदरती ढ़ंग से जीने का यही रास्ता है। लोग यह आज भूल ही गए हैं कि उनकी अलग से कोई हैसियत नहीं है, वे कुदरत के ही भाग हैं। यही कारण है कि वे उन चीजों को नष्ट कर डालते हैं जिन पर उनका जीवन निर्भर रहता है। वे हरदम इस मुगालते में रहते हैं कि उन्हें कुदरत से बेहतर चीजें बनाने का हुनर हासिल है – खासतौर पर वैज्ञानिकों को ऐसा भ्रम है। वे तेज तर्रार हो सकते हैं पर कुदरत के दिल के बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम। उनकी बनाई हुई हर चीज शुरू में आकर्षित करती है पर अंततः लोगों को दुखी ही करती है... फिर भी अपने आविष्कारों को ले कर वे ढिंढोरा पीटते रहते हैं। पर उससे कि खराब बात यह है के वैज्ञानिक तो वैज्ञानिक, आम इंसान भी इसी झांसे में आ जाता है। वे वैज्ञानिकों को ऐसे देखते हैं जैसे उनके हाथ में अलादीन का चिराग है जिससे वे कोई चमत्कार कर देंगे। यही कारण है कि वे उनकी पूजा  करने लगते हैं। उन्हें इसका जरा भी इल्म नहीं कि ऐसा करके वे और कुछ नहीं कर रहे हैं बल्कि कुदरत  की जड़ें खोद रहे हैं। उन्हें सामने यह दिखाई ही नहीं देता कि एक बार कुदरत का नाश कर देने से वे अपने विनाश को भी न्योता  दे रहे हैं। इंसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है साफ हवा और साफ पानी ... और इनके लिए पेड़ पौधे और हरियाली एकदम जरूरी हैं। आज सब कुछ गंदा किया जा रहा है और यह गंदगी ऐसी है जो कभी जाने वाली नहीं। हवा गंदी हो गई, पानी गंदा हो गया... यहाँ  तक कि इंसान का दिल भी गंदा हो गया।", बूढ़ा धीरे धीरे पर धाराप्रवाह बोलता गया। 

 

 


 

"यहाँ  आते हुए मैंने देखा कि कुछ बच्चे क्यारियों से फूल तोड़ कर पुल के पास एक बड़े से पत्थर के ऊपर रख रहे हैं", अकीरा ने पूछा : "ऐसा क्यों कर रहे थे  बच्चे?"

 

 

 

"अच्छा, तो तुम उसके बारे में बात कर रहे हो? बहुत पहले की बात है, एक बीमार यात्री ने पुल से गुजरते हुए दम तोड़ दिया था। गाँव के लोगों ने उसे देखा और वहीं  पुल के पास उसकी कब्र बना दी... उसके ऊपर उन्होंने एक  बड़ी सी चट्टान रख दी और वे उसके ऊपर सम्मानस्वरूप फूल रखने लगे। देखते-देखते यह गाँव की एक परिपाटी बन गई कि उधर से गुजरते हुए हर कोई उस चट्टान पर फूल रखने लगा। ऐसा सिर्फ बच्चे नहीं करते हैं, गाँव के सभी लोग जब पुल से गुजरते हैं तो उस स्थान पर फूल जरूर रखते हैं हालाँकि ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं कि ऐसा क्यों कर रहे हैं।"

 

 


 

 

"आज गाँव में कोई खास उत्सव है क्या?", अकीरा ने थोड़ी दूर से आती हुई गाने बजाने की आवाज सुन कर पूछा।

 

 

 

"नहीं, ऐसा कोई उत्सव नहीं है...  यह एक शव यात्रा  है। तुम्हें कुछ अजीब लग रहा है क्या? देखो शव यात्रा में शामिल सभी लोग खुश हैं। बहुत अच्छी बात है कि आप जीवन भर कड़ी मेहनत करें, लंबे समय तक जिंदा रहें और उसके बाद जब आँखें मूँदे तो लोग आपका शुक्रिया कहें। इस गाँव में हमने कोई भी मंदिर नहीं बनाया, कोई पुजारी नहीं है... सभी गाँव वाले मिल कर अर्थी  उठाते हैं और उस पहाड़ी पर ले जाकर दफना देते हैं। जब कोई जवान या बच्चा असमय मर जाए तब जाहिर है हम बहुत दुखी होते हैं - इस तरह के हादसे  पर  कोई खुश कैसे हो सकता है। लेकिन यह गाँव की खुशकिस्मती है कि हम कुदरती ढ़ंग से जीते हुए लंबी उम्र पाते हैं, यहाँ  जो भी मरता है पकी हुई उम्र में मरता है। यह जो अर्थी जा रही है यह 99 साल की स्त्री की अर्थी है। देखो माफ करना, मुझे भी शव यात्रा में शामिल होना है। मेरा यकीन करो, यह स्त्री जो आज मरी है वह मेरा पहला प्यार थी पर बदकिस्मती से उसने मेरा दिल तोड़ दिया और किसी दूसरे की हो गई.... हा हा हा हा", बूढ़े ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। 

बूढ़े की बात सुन कर अकीरा देर तक मुस्कुराते रहे।

 

 


 

"अच्छा, यह बताइए आप कितने साल के हैं?",  अकीरा ने पूछा।

"103 साल का.... अच्छा खासा जीवन जी लिया, अब विदा होने का समय आ गया। कई लोग कहते हैं कि जीवन मुश्किलों से भरा  होता है लेकिन मुझे लगता है कि यह सब बकवास है, वास्तव में जिंदा रहना एक बहुत खुशनुमा एहसास है। इसमें बहुत रोमांच है।"

 

 

 

कहते हुए बूढ़ा अपने हाथ में एक वाद्य और कुछ फूल ले कर शव यात्रा में शामिल हो जाता है .... और गाता बजाता हुआ सबसे आगे चलने लगता है।

 

 

अकीरा मृत्यु का यह उत्सव मन्त्र मुग्ध भाव से देखता रहता है .... और कुछ फूल तोड़ कर पुल पास की उस चट्टान पर रख देता है।   

 

 

(इस पोस्ट में प्रयुक्त सभी चित्र गूगल इमेज से साभार लिए गए हैं।)  

 

 

  



 

सम्पर्क


मोबाइल 

9411100294

 

टिप्पणियाँ

  1. शानदार प्रस्तुति के लिए यादवेन्द्र जी को बधाइयाँ

    जवाब देंहटाएं
  2. जितनी सुंदर फिल्म उतनी ही बेहतर समीक्षा

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुँवर नारायण की कविताएँ

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'।