यादवेंद्र का आलेख ‘कविता की काया को देखना’

 

बुद्धदेव दासगुप्ता

 

बुद्धदेव दासगुप्ता : स्मृतिशेष


मशहूर फिल्म निर्माता, कवि और प्रोफेसर बुद्धदेव दास गुप्ता का विगत 10 जून 2021 को 77 वर्ष की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया। 

 

वर्ष 1944 में स्वतंत्रता से पूर्व भारत के पुरुलिया जिले के एक गांव में जन्मे दासगुप्त बंगाल के जंगल महल क्षेत्र की लाल मिट्टी को नहीं भूल पाए जो बाद में उनकी कई फिल्मों की पृष्ठभूमि बन गई।

 

दास गुप्ता के पिता तारकान्त दासगुप्ता रेलवे में एक डॉक्टर थे। जब वह सिर्फ 12 साल के थे, तब कोलकाता चले गए, लेकिन पुरुलिया और बीरभूम जिलों ने उनकी कई फिल्मों की पृष्ठभूमि के रूप में काम किया।

 

कलकत्ता फिल्म सोसाइटी में सदस्य के तौर पर नामांकन के बाद वह 1970 के दशक में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरे। उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म 'दूरात्वा' 1978 में बनाई थी और एक कवि-संगीतकार-निर्देशक के तौर पर अपनी छाप छोड़ी थी। उससे पहले, उन्होंने लघु फिल्म 'समायर काचे' बनाई थी। उनके निर्देशन में बनीं प्रख्यात फिल्मों में 'नीम अन्नपूर्णा', 'गृहजुद्ध', 'बाघ बहादुर', 'तहादेर कथा', 'चाराचर', 'लाल दर्जा', 'उत्तरा', 'स्वपनेर दिन', 'कालपुरुष' और 'जनाला' शामिल है. उन्होंने 'अंधी गली' और 'अनवर का अजब किस्सा' जैसी हिंदी फिल्मों का भी निर्देशन किया।


उन्होंने फिल्म निर्माण के अपने सफर की शुरुआत उस समय किया जब न सिर्फ बंगाल, बल्कि भारतीय सिनेमा के दो महान फिल्मकार सत्यजीत रे और मृणाल सेन अपनी रचनात्मकता के शीर्ष पर थे। मगर अपनी शैली के दम-खम पर वे जल्द ही उनकी विशाल छाया से निकल आए। उनकी फिल्मों में गीतात्मकता और उनकी सामाजिक चिंताओं के साथ हास्य भी होता था।

 

गृहजुद्ध, बाघ बहादुर जैसी फिल्म बनाने वाले दासगुप्ता ने फिल्मी दुनिया में अपना करियर बनाने के लिए अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी थी। दासगुप्ता ने राज्यसभा टीवी को गुफ्तगू के लिए दिए साक्षात्कार में कहा था, “जब मैंने अपने पिता से कहा कि मैं पुणे फिल्म संस्थान जाना चाहता हूं, तो उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया। यह मेरे लिए दर्दनाक था लेकिन मुझे अर्थशास्त्र से भी प्यार था। मैंने अर्थशास्त्र पढ़ाया लेकिन एक समय ऐसा आया जब मैंने फैसला किया कि मैं इसे जारी नहीं रख सकता क्योंकि मुझे फिल्में बनानी हैं।

 

वह कभी एक फिल्मकर के तौर पर प्रशिक्षित नहीं हुए, उनके पास कल्पना थी और एक कवि की गीतात्मकता थी और इसे सिनेमा में बदलने का हुनर था। यह उनके चार दशक लंबे करियर में दिखा जिसमें उनकी फिल्में मानवता की जटिल परतों और समाज के साथ व्यक्ति के संबंधों का पता लगाती दिखती थी।

 

बुद्धदेव दासगुप्‍ता को फिल्मों में बेहतरीन काम के लिए कई बार पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्होंने 5 बार अपनी फिल्‍मों के लिए नेशनल अवॉर्ड जीता। उन्‍होंने कई बेहतरीन फिल्‍में बनाईं, जिनमें बाग बहादुर (1989), ‘चराचर (1994), लाल दरजा (1997), मोंडो मेयर उपाख्यान (2002) और कालपुरुष (2005) जैसी फिल्‍मों ने दर्शकों के दिल और दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी। सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार- उत्तरा (2000) और स्वप्नेर दिन (2005) मिला जबकि बंगाली में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार- दूरत्व (1978), फेरा (1987) और तहदार कथा (1993) मिला। सर्वश्रेष्ठ कला/सांस्कृतिक फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार- ए पेंटर ऑफ एलक्वेंट साइलेंस: गणेश पाइन (1998) और सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार- फेरा (1987) के लिए दिया गया

 

बुद्धदेव दासगुप्‍ता एक मशहूर कवि भी थे। उनकी कई कविताएं भी प्रकाशित हुईं, जिनमें सूटकेस, हिमजोग, गोविर अराले, कॉफिन किम्‍बा आदि प्रमुख हैं। उनकी आखिरी फिल्म 'उरोजहाज' के हर फ्रेम में उनकी विशिष्टता एवं कविता की झलक थी। बुद्धदेव दासगुप्‍ता को नमन करते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं यादवेंद्र का आलेख कविता की काया को देखना 

 

 

 

कविता की काया को देखना

 

 

यादवेन्द्र

 

 

रबीन्द्र नाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ के अवसर पर मनमोहन सिंह की सरकार के कहने पर 2013 में अनेक राष्ट्रीय  अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त बांग्ला फ़िल्मकार बुद्धदेब दासगुप्ता ने एन. एफ़. डी. सी. की आर्थिक मदद से हिंदी में  फ़िल्म  "त्रयोदशी" बनाई थी जो गुरुदेव की तेरह कविताओं पर आधारित है। वैसे यह कविता केंद्रित तेरह स्वतंत्र लघु फिल्मों का खूबसूरत गुलदस्ता है।

 

 

किसी कवि की कविताओं पर फ़िल्में बनाना आसान नहीं है पर बुद्धदेब दासगुप्ता ने यह  साहसिक प्रयोगशीलता एक चुनौती के तौर पर स्वीकार कर हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया। फिल्म के पहले भाग में बंशी, कृष्णकली, मुक्ति और फाँकी शीर्षक की चार कवितायेँ हैं।  कविताओं के चयन के बारे में बुद्धदेब दासगुप्ता का कहना है कि जब संस्कृति मंत्रालय ने गुरुदेव की कृतियों पर फ़िल्में बनाने का प्रस्ताव रखा तो मैंने कविताओं पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही क्योंकि उनकी कहानियों और उपन्यास पर ढेरों फ़िल्में बनी और चर्चित प्रशंसित हो चुकी हैं। 

 

 


 

फिल्म निर्देशक बुद्धदेब दासगुप्ता जो स्वयं बांग्ला के महत्वपूर्ण कवि भी हैं, ने गुरुदेव की अलग-अलग भावों की  तेरह कवितायेँ चुनी और उन पर अलग-अलग फिल्में बनाईं जो पाठकों को एक अनजानी अनदेखी दुनिया में ले जाती हैं क्योंकि उनमें शब्द नहीं छवियाँ महत्वपूर्ण हैं ...."जब कवि की ये छवियाँ मेरी फिल्माई गयी छवियों के साथ मिश्रित होंगी तो सबसे अलग नयी छवियाँ निर्मित होंगी.... मैंने यह ध्यान रखा  है कि छवियों और भावों की मोनोटोनी न हो बल्कि फ़िल्म विभिन्न छवियों का उत्सव बन सके।", वे कहते हैं - वे शुरू में इस प्रस्ताव पर असमंजस में थे पर काफ़ी सोच विचार के बाद फ़िल्म बनाने को तैयार हो गये। 

  


दी स्टेशन फिल्म का एक दृश्य


यू ट्यूब पर इस फ़िल्म का एक अंश  "दी स्टेशन" (इस्टीशन शीर्षक कविता पर आधारित) के नाम से उपलब्ध है। इस फिल्म में गाड़ी छूट जाने के चलते रात भर एक सुनसान रेलवे स्टेशन पर सारी रात गुजारने को मजबूर एक यात्री की मुलाकात अलग-अलग असामान्य लोगों से होती है जिनका जीवन उसी स्टेशन पर निर्भर है... इनके साथ होने वाले अनुभव आंख खोलने वाले हैं। फिल्म देखते हुए मुझ जैसे दर्शक को लगातार यह लगता रहता है कि यदि गाड़ी न छूटती तो आसानी से उपलब्ध न होने वाले ये अनूठे तजुर्बे कतई न होते।

 

दी स्टेशन फिल्म का एक दृश्य

 

गुरुदेव की बेहद प्रसिद्ध कविता "मुक्ति" पर आधारित फ़िल्म भी मुझे यू ट्यूब पर देखने को मिली। यह कविता व्यक्ति निरपेक्ष है पर बुद्धदेव दासगुप्ता ने एक युवा स्त्री (शीना चौहान ने भावपूर्ण अभिनय किया है) की भावनाओं के माध्यम से मध्यवर्गीय परिवार के बाहरी व्यापार और स्त्री के मन के अंदर उठती भावनाओं को सादगी पर असरदार ढंग से उठाया है। 

 

         मुक्ति फिल्म का एक दृश्य


बिन पूछे शादी करने की तैयारी करते माँ पिता हर बात में जोर दे कर उससे पूछते हैं – अच्छा लगा? एक बार भी उसका जवाब नहीं मिलता पर इससे क्या हुआ - मान ही लिया जाना है कि ''हाँ, अच्छा लगा।''  

 

          मुक्ति फिल्म का एक दृश्य


शादी के बाद उदासी और खालीपन के चलते जब वह बिस्तर पकड़ लेती है तो आहत पति उस से बड़े सख़्त लहजे में पूछता है कि कपड़े लत्ते, गहने, घर सब कुछ दिया ..... पुरी तक घुमा लाया, फिर भी जब देखो तुम्हारे चेहरे पे मुर्दनी छायी रहती है – और क्या चाहिए तुम्हें? धीरे से उसके मुँह से निकलता है - प्यार। मुझे लगता है यह भारतीय मध्य वर्ग के जीवन का की वर्ड (प्रतिनिधि शब्द) है।

 

 


 

इस फिल्म में निर्देशक ने कविगुरु रबीन्द्र नाथ ठाकुर की एक बड़ी दिलचस्प कविता "फाँकी" का चयन भी किया है जिसमें बीनू नामक बीमार स्त्री की सरलता और उसके पति का चालाकी  से उसको फाँकी (झाँसा) देते रहना दर्शाया गया है। लंबी बीमारी से निजात पाने के लिए बीनू को भरे पूरे ससुराल से हवा पानी बदलने को बाहर भेजा जाता है तो वह  इस आज़ादी का खूब आनंद लेती है। रास्ते में बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर छह घंटे रुकना पड़ता है - एक दीनहीन स्त्री बीनू को अकेला पा कर पास आ कर अपनी गरीबी का दुखड़ा रोती  है और बेटी की शादी के लिए पच्चीस रुपए माँगती है। बीनू धर्म और गरीबों की मदद को ध्यान में रख कर अपने पति से उसकी मदद करने को कहती है। वह उसका मन रखने के लिए उस स्त्री को पैसे देने के बहाने कमरे से बाहर ले जाता है और डाँट फटकार कर दो रुपए दे कर भगा देता है। पर बीनू बीमारी से उबर नहीं पाती है और प्राण त्याग देती है। उसका पति यह सोच सोच कर ग्लानि से भर जाता है कि उसने अपनी प्रिय पत्नी के साथ कुछ रुपयों की खातिर फाँकी मारी यानि धोखा किया – पश्चात्ताप के लिए पति फिर बिलासपुर जाता है पर उस रुक्मिणी नामक भिखारन का पता नहीं चलता। पति को यही लगता रहता है कि पत्नी की जान शायद बच जाती यदि वह पच्चीस रुपए रुक्मिणी को दे देता ... और उसके ऊपर बीनू के पच्चीस रुपए अब भी बकाया हैं।

 

 

 


 

 

सम्पर्क


मोबाइल  9411100294

 

 

टिप्पणियाँ

  1. '' त्रियोदशी " की तीन कविता फिल्मों की चित्रात्मक विवरण के लिए यादवेन्द्र जी हार्दिक साधुवाद । एक बड़े फिल्मकार के अंतरंग से परिचय हुआ ।

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