मनोज शर्मा द्वारा की गई समीक्षा 'समय के साख़ी : विशेषांक पर एक टिप्पणी'




आज के समय में खुल कर खुद को अभिव्यक्त कर पाना एक दूभर सी बात है। खासकर बात जब कवियों की हो, तो यह मुश्किल और बढ़ जाती है। हर व्यक्ति की अपनी सीमा होती है इस आप्त वचन को स्वीकार करते हुए भी जो सीमाओं को तोड़ने का साहस करता है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। मनोज शर्मा खुद एक कवि हैं और उन्होंने समय के साखी के विशेषांक को अपने नजरिए से देखने की एक महत्त्वपूर्ण कोशिश की है। कई जगह उनका बेबाकपन अचंभित करता है। बहरहाल उनकी समीक्षा से आप असहमत भी हों तो उसे इसलिए पढ़िए कि अपनी असहमतियां किस तरह मजबूती के साथ दर्ज कराई जा सकती हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनोज शर्मा द्वारा की गई समीक्षा 'समय के साख़ी : विशेषांक पर एक टिप्पणी'



समय के साख़ी : विशेषांक पर एक टिप्पणी



मनोज शर्मा



हिन्दी कविता की दुनिया में साहित्यिक पत्रिकाओं के विशेषांक आते रहते हैं। आमतौर पर यह विशेष कवियों तक सीमित रहते हैं। मगर कई बार महत्वपूर्ण अंक भी देखने में आते हैं। आरती जी के संपादन में निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका; 'समय के साखी' का युवा कविता (इक्कसवीं सदी के कवि) विशेषांक आया है। यह अलग-अलग राज्यों के लगभग चालीस कवियों को प्रकाश में लाने का अच्छा है, इनमें से कुछ कवि पहले ही एक लौ लेकर चल रहे हैं। वे इस प्रकाश की अतिरिक्त उपलब्धि कहे जा सकते हैं। 



इस संकलन के संपादक 'राजेश जोशी' हैं। हालांकि, उनका संपादकीय, कामचलाऊ है, मगर कवियों के चयन और कवियों से लिखवाए गए उनके आत्मकथ्य ने संपादकीय दृष्टि को स्पष्ट कर दिया है और एक स्थान पर उनकी,' गणेश नारायण देवी' द्वारा दी गयी एक स्थापना को रेखांकित करना महत्त्वपूर्ण है, कि, आर्टीफिशियल मेमोरी का इंसानी स्मृति पर प्रभाव पड़ा है। प्राकृतिक स्मृति खत्म हो रही है। आज प्राकृतिक स्मृति के खत्म होने की चिंता भी नहीं दिख रही। अंक चार खण्ड में विभाजित है। 



खण्ड : 1


पहले खण्ड में, अनुज लुगुन का आत्मकथ्य स्पष्ट करता है कि वे आदिवासी समस्या को उभारेंगे। हालांकि उन्होंने और विषयों पर भी कविता दी। 'पत्थलगड़ी', बढ़िया कविता है।


कमल जीत चौधरी का तो पाठक हूँ ही। वे मेरे प्रिय कवि हैं। उनका आत्मकथ्य भी बेहद ज़रूरी है। उन्होंने जो स्थापनाएं दी हैं, उन पर बात होनी चाहिए। जैसे वे कहते हैं कि ' हमारा रास्ता आम नहीं है। लेकिन यह आम लोगों के हक में जाता है।' उनकी सभी कविताएँ बेहतरीन हैं। इस पर कभी अलग से बात करूँगा। 


अनुपम सिंह का स्वर हटकर है, इसलिए प्रभावित करता है, किंतु प्रिया वर्मा, स्त्री- स्वर के साथ बहुत कमाल हैं। जब वे कहती हैं, 


'वहां किताबें हैं पर प्रश्न नहीं

भूख है पर उदर नहीं है 

उदरस्थ करने की लालसा है...' 


यह एक ज़रूरी सवाल है।


अरबाज़ खान ने मुस्लिम समाज को बुना, उचित है, पर वे बेहतर डिक्शन में उतर सकते थे।



विश्वासी एक्का, देवेश पथ सारिया, सोहन लाल कमज़ोर हैं। रजनी अनुरागी और संध्या कुलकर्णी मेहनत करें तो यादगार कविताएँ लिख सकती हैं।



पहले खण्ड पर बसन्त त्रिपाठी ने लिखा, चूंकि वे अभ्यस्त हैं, तो लिख दिया। एकाध जगह ऐसा लगा कि वे कविता- आलोचना के लिए अपने औज़ार स्पष्ट करेंगे, लेकिन आगे बढ़ गए।



खण्ड : दो


जब समय जटिल से और जटिल होता जा रहा हो, तो उसे कविता में दर्ज़ करना चुनौतीपूर्ण और ज़ोखिम भरा हो जाता है। इधर काव्यालोचना भी या तो चुप्पी साधने या फिर सहमति तक सीमित हो कर रह जा रही है। जब कविता की अर्थ - छायाओं को खोला नहीं जा रहा हो तो कविता भी बस आत्ममुग्धता भर रह जाती है। रूसी कवि, 'युवगेनी' ने एक जगह कहा है कि सच्चे अर्थों में तभी तक कविता जीवित रहती है जब वह कवि के भीतरी अंधेरे में धड़कती है। अतः यह स्वांत सुखाय व्यवसाय कतई नहीं।



इस खण्ड की पहली कवि अनुराधा सिंह, अपने आत्मकथ्य से ही ध्यान खींचती हैं। जब वे एक जगह कहती हैं कि, 'जैसे बच्चा रोने की भाषा में संवाद कर पाता है, मुझे कविता से इतर किसी भाषा में अपना मन खोलना नहीं आता। 'शांति नायर' ने उनकी कविताओं को ले कर उचित स्थापना दी है कि, 'शाश्वत की चिंताओं के सामयिक रूप अनुराधा सिंह की कविताओं में स्पष्ट हुए हैं।' "लड़की का एकांत" में कवि ने इस भाव को अपनी तरह से दोहराया है कि हमारा समाज ही नहीं घर-परिवार तक औरत को मनुष्य नहीं, महज़ औरत बना कर उसे सतत लाचारगी में धकेल रहे हैं। "क्या सोचती होगी धरती" भी अपने कहन के साथ इस दोहन से भरे काल की प्रासंगिकता उभरती है।



श्रुति कुशवाहा अपनी पहली ही कविता 'अंधेरा' से ध्यान बांध लेती हैं। इस कविता के विन्यास में वे समय व समाज का गुंफन रचती हुई, मुझे 'स्त्री उपेक्षिता' की प्रसिद्ध दार्शनिक लेखिका 'सिमोन द  बोउवार'  के निकट ले जाती है (स्त्री पैदा नहीं होती उसे बनाया जाता है)। इस कविता का ईडियम ही स्त्री के जीवट व विडम्बना को अपनी तरह से रच दे रहा है। इसी क्रम में उनकी 'चुटकले' कविता को लिया जा सकता है। 


"दो औरतें खामोश बैठी थीं

इस पर ठठाकर हँस पड़ते हैं आदमी"।



वीरेंद्र भाटिया, जमुना बीनी, प्रतिभा गोटीवाले, आत्मारंजन ने मुझे प्रभावित नहीं किया। नेहल शाह का आत्मकथ्य बढ़िया है पर कविताएँ कमज़ोर हैं। निदा नवाज़ को रेहटरिक का प्रयोग ध्यान से करना चाहिए। कहना न होगा 'महमूद दरवेश' के अंतस में भी सन्त्रास सुलगता रहा है, जो शायद कश्मीर की दहक से भी बड़ा था और है। कश्मीर का दर्द हमारा सांझा है। ज़रूरी कविता आवर्तन से ऊपर उठने की मांग भी करती है।



नीलोत्पल, हमारे ज़रूरी कवि हैं। अपने आत्मकथ्य में वे कहते भी है,  'कविता एक किस्म की खोज है।...कविता एक सतत चलने वाली यात्रा है। इक्कीसवीं सदी की कविता इसी निरंतर चल रही यात्रा का हिस्सा है। 'उनकी " पानी का धर्म", "तुम तितलियों की मानिंद हवा रचो", "सवाल यह है" प्रभावी कविताएँ हैं। इनके शीर्षक ही बोलते हैं, खोलते हैं।



अभिषेक अंशु ने इस खंड में मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया। अपने आत्मकथ्य में वे स्पष्ट करते है, 'किसी भी कवि की कविता एकाएक प्रकट नहीं होती। उसकी जड़ें भाषाई एवं सांस्कृतिक परंपरा में, अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के अवदानों में छुपी होती है। वे, राजनीति के शोषण और दमन की बात कहते हैं। वे मानते हैं कि रचनाकार का कर्तव्य दमित मनुष्यता की आवाज़ बने, अकेले पड़ गए मनुष्य का हाथ थामे।



उनकी प्रथम कविता, 'दृश्य', महत्त्वपूर्ण कविता है। यह कविता अपने अर्थ-विस्तार में जाकर संकेत देती है कि आस्वादन करना और पूरे  समर्पण के साथ श्रम करते हुए उन्नति में साथ देना अलग है।' (शांति नायर)


उनकी 'दृश्य' कविता, मन को गहरे से छूती है। यह विषय ही कमाल है। 'चश्मा', अलग से अपने शिल्प-विधान में कहती हुई, लकीर दर्ज़ करती कविता है।


उनकी इस अंक की बेहद आवश्यक कविता है, 'शाहीन बाग में धरना देती औरतें'।



'उन सब औरतों में एक गुण सामान्य था

वे डरती बहुत थीं...

मगर अभी जब वे धरने पर हैं

मैं देखकर हैरान हूँ और ख़ुश हूँ

घर की देहरी लांघ कर वे निकल आयी हैं

चौक-चौराहों, सड़कों पर.. '



शांति नायर ने कविताओं पर अच्छा-अच्छा लिखा है। किसी कवि के आत्मकथ्य पर कुछ नहीं कहा।



खण्ड : तीन


इस खण्ड की कविताओं पर मशहूर आलोचक 'अनिल त्रिपाठी' ने आलोचकीय टिप्पणी लिखी है। इसमें  बस सभी अच्छा ही लिखा गया है और आश्चर्य यह भी हुआ कि अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस खंड के कवियों पर मुझसे लिखवाने की इच्छा अतिथि संपादक 'राजेश जोशी' ने की। किसी अन्य खंड के आलोचक ने ऐसा ज़िक्र नहीं किया। निस्संदेह अतिथि संपादक/संपादक के कहने पर ही आप कोई ऐसा काम करते हैं।



बहरहाल, पहले कवि 'अच्युतानंद  मिश्र' हैं, जो आलोचक भी हैं और उन्हें "भारतभूषण अग्रवाल सम्मान" भी मिला है। उनके आत्मकथ्य ने प्रभावित किया। यहाँ वे एक जगह मानते हैं, "कोई पीढ़ी जब क्रमभंग रचती है तो उसके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भाषा और संवेदना के तौर पर दरपेश आती है।" ऐसा वे युवा-पीढ़ी को सम्बोधित करते कह रहे हैं, जिसका निर्माण संचार-क्रांति के युग में हुआ है। वे और भी कई स्थापनाएँ देते हैं, जैसे, "कविता की दुनिया वस्तुओं की चमकदार दुनिया का प्रतिलोम रचती है।" निजी रूप में, मैं उनके इन तर्कों से सहमत हूँ। उन्होंने 'गति अ- गति' जैसी विविधअर्थी कविता दी है और मनुष्य के नियत को अनियत बनाने के जो कठिन प्रश्न हैं, उन्हें खोलने के कौतुक से भरी कविता 'समय के मोड़ पर' रची है। 'जाल, मछलियां और औरतें' बड़ी कविता है। इस कविता पर अनिल त्रिपाठी ने भी लिखा है कि समूची कविता भूख की जिस ज़मीन पर रची जाती है, वहाँ वह अपनी प्रक्रिया में अर्थगत प्रकर्ष के कई स्तरों को छूती है।



क्रमवार ढंग से आगे बढ़ने की जगह, मैं पहले इस खण्ड की महिला-कवियों पर कुछ कहना चाहूंगा। इस खण्ड के दस कवियों में से पांच महिला-कवि हैं। इनमें कुछ हद तक वंदना चौबे ने प्रभावित किया। अर्चना लार्क के आत्मकथ्य की शुरुआत ज़रूरी लगी। कविता कर्मकार औसत हैं और नेहा नरूका व सपना भट्ट की कविताएँ मेरे निकट ही नहीं पहुँची। स्त्री-मन के अंतर्विरोधों को चलताऊ स्त्रीवादी नज़रिए से हटकर उभारना ज़रूरी है। कविता व्याख्या नहीं है और न ही वस्तु-स्थिति का सरलीकरण। यहाँ बुनियादी विरोधाभासों में उतरना, गतिशील यथार्थ को पकड़ना, स्वप्नभंग होने के कारणों की तलाश करते हुए संभावनाएं तलाशना आवश्यक है। संचार -क्रांति के मौजूदा दौर में जब हम तेज़ी से 'कृत्रिम बौद्धिकता' की ओर बढ़ रहे हों तो सच के निष्पादन के नए से नए ढंग ढूँढ़ने होंगे। कथित विकास की लाख घोषणाओं के बावजूद हमारे समाज में महिलाओं की बेबस स्थिति किसी से छिपी नहीं। अतः उसी चलंत भाषा में रटे रटाए मुहावरे संग उनकी हज़ारों-हज़ार समस्याओं को कविता में रेखांकित करना, वैसा ज़रूरी असर नहीं छोड़ता, जैसे कि ज़रूरत है। तो अपने औज़ारों को लेकर गम्भीरता से मनन करना लाज़िमी है। नोबेल विजेता प्रसिद्ध पोलिश कवि 'विस्लावा शिम्बोर्स्का' ऐसे ही शोरगुल से भरे समय की कवि हैं, जो विशालकाय प्रश्नों के सामने महज़ कुछ पंक्तियों में उत्तर देती मिलतीं हैं। वे प्रत्येक प्रकार के असंतुलन के बरक्स यकीन की लौ जलाती हैं। वे इसी वस्तुजगत में व्याप्त जीवन के महीन किंतु बड़े सच भाषा में सजीव करतीं हैं। वंदना चौबे इस खण्ड की अच्छी कवि हैं। वे अपने आत्मकथ्य में ही कहती हैं, 'मेरे लिए कविता वह प्रक्रिया रही है, जिसने थोपी हुई सख्ती और भावना को तोड़ दिया।... पहली बार महसूस हुआ कि आमजन और समाज के भीतर ही एकांत का हल है और एकांत के भीतर समूह गाता है।' इसीलिए उन्होंने 'तुम्हारी देह की मैंने खेती की है', 'पत्थर पानी में नहीं घुलता' जैसी असरदार व 'युद्ध' जैसी बेहद ज़रूरी कविता दी है। उनकी चर्चित रही कविता 'बनिहार थे तुम' की ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं:



तुम्हारे पास मिट्टी की अकथ कथाएं थीं

बर्तन बनाने की कला में

सानी और पानी का सबसे आदिम अनुपात था

भूख और युद्ध के दिनों में गांव के दक्खिन में फेंक दिए गए 

मृत मवेशियों की पसलियां निकाल कर

तलवार की तरह तान लेने वाला जीव.....



'फ़िरोज़ खान' का स्वर अलग है। उनका स्मृतियों का आत्मकथ्य प्रभावी है। 'सगनौटी' कविता की पहली ही पंक्ति बांधती है। अंत तक आते-आते यह कविता एक अलग मुहावरा प्रस्तुत करती है। 



'हाथ में सगनौटी लिए रात के तीसरे पहर

घर की देहरी पर बैठी है प्रेमिका

जागती प्रेमिका को देख कर

रास्ते सो नहीं पाते

रास्तों को नींद नहीं आती।' 



'गौरव पाण्डेय' ने "समकालीन हिंदी कविता की लोक चेतना" जैसे प्रासंगिक विषय पर शोध किया है। उनका आत्मकथ्य भी उचित लगा। 'प्रतीक्षा' कविता में वह प्रकृति और समय का गुंफन बुनते हैं। 'प्रतीक्षा समय के माथे पर खिला कोई जंगली फूल है/जिसकी महक उम्मीद की तरह बेचैन करती है...' 'गाँव से निकले लोग' भी अच्छी कविता है।



इस खण्ड का महत्त्वपूर्ण स्वर हैं, 'हेमंत देवलेकर'। उनके आत्मकथ्य की शुरुआत देखें : 'मेरा यकीन है कि कविता से बदलाव संभव है और यह बदलाव सबसे पहले स्वयं सर्जक में घटित होता है। सृजन के पहले क्षण अनुभूति के रूप में उसे एक नई दृष्टि मिलती है। हर चेतन के प्रति एक रागात्मक रिश्ता कायम होता है। दूसरा बदलाव पाठकों में होता है जब किसी कविता से उनको आंतरिक शक्ति मिलती है। संवेदना भीतर की करुणा को जगा देती है ..... प्रकृति और समाज को कुछ देना यह हर नागरिक का कर्त्तव्य है। यह  देना  एक बहुत महत्त्वपूर्ण मूल्य है। उनकी पहली ही कविता 'कामाख्या देवी', मिथक के बहाने स्त्री के यौन-शोषण को मुखर करती अंतस में उतरती जाती है। 'प्रूफ रीडर' तो अद्भुत है। ऐसे विषय कितने आवश्यक हैं। इस कविता ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। 



'इस मूल्यविहीन होते समाज में

अगर मैं चिल्लाता हूँ

कि भाषा भी एक नैतिक मूल्य है

... किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता!'  


'धूल' भी बहुत अलग तरह की कविता है। एक नए मुहावरे को लेकर आए हेमंत हिंदी-कविता में अपनी लकीर छोड़ेंगे। 'मानस भारद्वाज' कमज़ोर कवि हैं।



खण्ड : चार


"कला इस हद तक कमोडिटी बन चुकी है कि कोई कविता लिखता है तो इसलिए कि उसे उसके बदले में कुछ हासिल करना है या और कुछ नहीं तो अपने अहम को तुष्ट करना है।" 

- केरलिन फोरशे, अमेरिकी कवि (संदर्भ : खिड़की के पास कवि)



हालांकि, उन्होंने यह बात अपने सामाजिक परिप्रेक्ष्य को ले कर कही, किंतु यह मौजूदा सार्वभौमिक सत्य है। इसी के मद्देनज़र 'समय के साखी' का भी मूल्यांकन होना चाहिए। कम से कम किसी भी खण्ड के अंत में, उन कवियों पर मिलते आलेख में ऐसा कुछ मिला नहीं। खण्ड चार के दस कवियों पर डा. प्रियदर्शिनी का आलेख भी वस्तुतः ऐसी स्थापनाओं को ले कर है, जो मौलिक नहीं संदर्भ आधारित है और उन पुस्तकों की सूची अंत में उन्होंने दर्ज़ भी की है। हमें इस दौर की कविता पर आलोचकीय मत देते हुए अकादमिक एप्रोच से बचना होगा। उनकी अपनी बात में कहीं-कहीं इन कविताओं में स्मृतियां, गंवई- भाषा, विद्रूपताएं, स्त्री-देह को ढूँढ़ने के यत्न हैं, जिन्हें पूरी तरह खोला नहीं ही गया है।



बहरहाल, खण्ड के पहले कवि विहाग वैभव हैं। विहाग ने हिन्दी -कविता की धारा में निस्संदेह नया जोड़ा है और शिद्दत व चेतना से जोड़ा है। आत्मकथ्य की पहली ही उक्ति है: 'हिन्दी- कविता अब बहुवचन संज्ञा है।' यह लकीर खींच देने जैसी बात, आपको बांध लेती है तथा कविता की संपूर्ण परम्परा को पुनः निहारती है। यहीं आगे बढ़ वे एक जगह कहते हैं, 'कविता कोई जज नहीं है, कविता निर्णय नहीं दे सकती। कविता सिर्फ़ वकालत कर सकती है। वह अपने पक्ष में इतिहास और परम्परा से भी सबूत एकत्रित कर सकती है और कह सकती है कि - प्रेम की इच्छा पुरातन है और इससे किसी तरह की सामाजिक विसंगति पैदा नहीं होगी, यह देखिए मनुष्य का मनुष्य के साथ बराबरी का व्यवहार हमें एक सुन्दर दुनिया का स्वप्न देता है; यह देखिए प्रकृति को हमें बचाना नहीं है। बस उसे नष्ट नहीं करना है और यह सब बहुत आसान है।' वह अंततः यह भी कह जाते हैं कि 'हिन्दी कविता-आलोचना के टूल्स इन कविताओं के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।'



उनकी पहली ही कविता, 'सपने की मुश्किल' बेहतरीन कविता है। वे स्वप्न और यथार्थ के मिलन के अनूठे कवि हैं। वे लगभग हाशिए पर खड़े हो, सांस लेकर आगे बढ़ जाते हैं। 'तत्व - संवाद' कविता से वह अपनी कविता - भाषा की बुनियादी पहचान का बखूबी परिचय देते हैं।और कह देते हैं, "एक दिन सभी खलनायक मारे जाएंगे..." उनकी चर्चित व ज़रूरी कविता है, 'ईश्वर को किसान होना चाहिए'।



'वह जेल में/ महल में/युद्ध में

जैसे बार-बार

लेता है अवतार /वैसे ही उसे

अबकी खेत में लेना चाहिए अवतार ...


***


"मुझे यकीन है--ईश्वर महाजन का दिया परचा

किसी दिव्य ज्ञान के स्रोत की तरह नहीं पढ़ेगा

वह उसे पढ़ कर उदास हो जाएगा ..."



निशांत, न तो आत्मकथ्य में, न ही कविताओं में मुझे प्रासंगिक लगे। अरुणाभ सौरभ ने आत्मकथ्य में, हालांकि , 'ग्लोबल हस्तक्षेप में लोकल को बचाना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है।' कहा, किंतु उनकी कविताओं में यह शिद्दत एक अलग भाषा होने के बावजूद उस तरह से मुखर नहीं हुई है। फिर भी, 'लौह गीत' एक ज़रूरी कविता है, जिसे पढ़ा जाना चाहिए।



रूपम मिश्र का आत्मकथ्य बस नाम का है। उनकी पहली कविता 'उनके न्याय', यथार्थ में होते हुए भी एक अलग फैंटेसी का निर्माण करती है। जहां प्रेम हाशिए से उतर अन्तस् में स्वतःआ जाता है। 'हम चाहते तो' बढ़िया कविता है। ज्योति रीता अपने आत्मकथ्य के दूसरे पैरा में आती, कविता को मन बदलाव की वस्तु से आगे बढ़ा कर, कविता में आग की बात करते हुए, कविता से बंजर धरती में नमी लाने, पाठक के ख़ून में गर्मी भरने, जैसी सोच के साथ वस्तुतः जीवन के महत्त्व से दूर कर दिए गए अधिकांश (कुछ नहीं) लोगों के जीवन में बदलाव लाने की बात करती हैं और अंततः कहती हैं, 'लेखक सेलिब्रिटी नहीं कार्यकर्ता होता है।' उनकी सभी कविताओं में केवल, 'यह देश हमारा है' ही उचित लगी।



पार्वती तिर्की ने आदिवासी समाज की बात ज़िम्मेदारी से उठायी है। वे अपने आत्मकथ्य में आदिवासी कविता पर प्रासंगिक बात उदाहरण सहित करती हैं। उनकी प्रासंगिक कविता 'नकदौना' इसका जीवंत उदाहरण है। भाषा, (कुडुखर, चेप पुईयीं, नकदौना आसा, पुई चे चे) को कवि ने सनातन आदिवासी परिवेश में शिद्दत और ज़िम्मेदारी से सामने लाया है।



सौम्य मालवीय, एक अलग तरह का राजनैतिक-स्वर है, जो यकसां मुखर है और पंक्तियों के बीच भी धड़कता है। उनका आत्मकथ्य पढ़ा जाना चाहिए। 'तिरंगायन' कविता के भीतर विविध अर्थछवियाँ ध्वनित होती हैं, जो चेतना से टकराती हैं।



'उतना ही नकली, जितना असली था

नेहरू जी की अचकन का गुलाब

चरर-मरर चरखे औ खद्दर का ख्वाब..."



कुमार मंगलम का आत्मकथ्य उचित नहीं है। कविताएँ भी प्रभावी नहीं हैं। आरती का आत्मकथ्य ठीक लगा। उन्होंने औसतन लंबी कविताबएँ लिखी हैं, जिनमें वे आख्यान रचती हैं।



2000 के बाद की युवा कविता पर बातचीत में, संजीव कौशल ने वरिष्ठ कवियों, विजय कुमार, सविता सिंह, कुमार अंबुज, असंगघोष और इस अंक के अतिथि-संपादक राजेश जोशी से बातचीत की है। राजेश जी इस अंक की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए, दरहक़ीक़त इस कालखंड की कविताओं के बहाने से (कि सब कुछ समेट न सके, कि हरेक अंक की सीमा होती है, वगैरह) जिस प्रस्थान-बिंदु की बात उठाते हैं, वहाँ स्वयं चुपचाप खिसक लेते हैं। सविता सिंह सोशल मीडिया पर छाए उलझे और बड़े प्रश्न को 'फ्यूजन ऑफ राइटिंग' कहती हैं और अस्मिता विमर्श की बात भी उठाती हैं।



विजय कुमार जी ने कुछ बेहद ज़रूरी बातें की हैं। वे कहते हैं कि जो सब्जेक्टिविटी व्यक्ति के भीतर होती थी, जहाँ वह अपने स्पेस को निर्मित करता था और बाहर की पूरी व्यवस्था के सामने खड़ा रहता था, उस चेतना को कहीं न कहीं पूरी तरह कुचल दिया गया है। यदि किसी कलाकार के भीतर चेतना को ही नहीं बचने रहने दिया जाएगा, निर्णय-अनिर्णय की क्षमता को ही खत्म कर दिया जाएगा, सामने के संकटों को ही अगर कोई स्पेस नहीं मिलेगा तो आप कला क्या रचेंगे?... यथार्थ एक जटिल, बहुस्तरीय संरचना है। यथार्थ केवल सूचना प्रधान नहीं हो सकता।...चीज़ें हमारे समय में एक साथ जुड़ती भी हैं और टूटती भी हैं। हमें उन्हें री-डिस्कवरी भी करना होता है।... बौद्धिक विमर्श की एक धारा होती थी कविता के भीतर और कविता के बाहर भी। कविता के भीतर से मेरा आशय यह नहीं है कि आप कोई बैद्धिक जागरण पैदा कीजिए। वह होती थी सूक्ष्मता और बहु-स्तरीयता, वह कहीं कम हुई है। ...अनुभूति का ताप आज हमारे लिए एक तरह की चुनौती के रूप में सामने आ रहा है।... वे यह भी मानते हैं कि दलित स्त्री स्त्री होने के नाते व दलित होने के नाते स्थितियों को दोहरा भोगती हैं...आज की कविता को देख कर लगता है कि भाषा के स्तर पर और अभिव्यक्ति के ढांचे के स्तर पर बहुत सारे लोग एक ही कविता लिख रहे हैं।... कविता लिखने की प्रक्रिया में जो आत्मजगत होता था, आज वह कहीं नहीं है। कविता कुल मिला कर एक निबन्ध का रूप ले लेती है। यथार्थ के बहुत सारे अवधारणात्मक रूप कविता लिखने से पहले ही कवि के दिमाग में बन चुके होते हैं। 



कुमार अंबुज ने स्पष्टतः कहा है कि कवि और कविता की भूमिका बहुत अलग नहीं हो सकती। मेरे अनुसार इसे अंडरलाइन करना चाहिए। वे यह भी मानते हैं कि स्त्री यदि सिर्फ देह को सामने रखकर विमर्श करना चाहती है तो यह केवल भटकाव में ले जाएगा। असंग घोष, मुख्यत: दलितों द्वारा स्वयं अपनी बात कहने व 2000 के बाद से दलित कवियों द्वारा यह कहना कि क्या करना है और हम क्या चाहते हैं। उनकी यह बात दरअसल एक बड़ा प्रस्थान-बिंदु है। वे यह भी मानते हैं कि मार्क्सवादी दर्शन को भारतीय परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन की बात पर सोचना चाहिए। मुझे लगता है कि इस बातचीत में ही अंक में दर्ज़ युवा कवियों पर भी बात होती तो बेहतर रहता। बहरहाल सीमाएं होंगी। मुझे भी अपनी बात विस्तार से व किंचित अतिरिक्त धैर्य से करनी चाहिए थी, किंतु इसमें बहुत समय ख़र्च होता व तब तक यह अंक पुराना पड़ जाता तो महज पाठकीय प्रतिक्रिया तक ही सीमित रहा।





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