सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'आदर्श वाक्यों की गिरफ्त से बाहर'

 




आदर्श किसे शोभा नहीं देता। लेकिन सच कहा जाए तो आदर्श सिर्फ शोभा की वस्तु होता है। व्यावहारिक जीवन से उसका कोई लेना देना नहीं होता। दुनिया का कोई भी धर्म हो या जाति सब आदर्शों की ही बात करते हैं। दुनिया का कौन सा धर्म कहता है कि किसी की हत्या करो, चोरी करो, असम्मान करो, भ्रष्टाचारी बनो, लेकिन हर धर्म में होता यही है। उस धर्म के समर्थक वही कार्य करते हैं जिसकी प्रायः मनाही होती है। इस तरह आदर्श केवल मुखौटा बन जाता है जिसकी आड़ में लोग जाने क्या क्या किया करते हैं। आलोचक सेवाराम त्रिपाठी ने इन आदर्शों की एक समालोचनात्मक पड़ताल की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सेवाराम त्रिपाठी का आलेख 'आदर्श वाक्यों की गिरफ्त से बाहर'।



'आदर्श वाक्यों की गिरफ्त से बाहर'


सेवाराम त्रिपाठी 


आदर्श वाक्य केवल आदर्श वाक्य होते हैं। वे झुनझुने की तरह बज रहे हैं अनंत  वर्षो से। वे खूंटियों में टंगे सुसज्जित कपड़ों की तरह होते हैं। उससे खूंटे की और कपड़ों की शोभा बढ़ती है। आदर्श वाक्यों और सुभाषितों को बड़ी संजीदगी से गाया बजाया जाता है। पूरा देश और समाज आदर्शो के साथ कनेक्ट हो कर भी डिसकनेक्ट है। इनका द्वंद्वात्मक रिश्ता लगभग ख़त्म हो गया है। आदर्श कहीं जा रहे हैं और यथार्थ कहीं और जा रहा है। आदर्शों की खिचड़ी बहुत  पकाई जाती है लेकिन उसे कोई जल्दी न खाता है और न उसके लिए कोई उत्कंठा है।आदर्शो को शास्त्रों, पुराणों और नीति वाक्यों की दुनिया में काफ़ी जगह है और यहीं उनकी रहाइश  भी है। संत-महात्माओं, धर्माचार्यों और ऐसे ही महान लोग उसे अपने सीने में चिपकाए हुए जी रहे हैं। वे अपनी असलियत को इनसे ढंक लिया करते हैं। वे शताब्दियों से छटा बिखेरने में मशगूल हैं। लेकिन उनके व्यवहारशास्त्र को सांप  सूंघ गया है। वे टकसाल में सिक्कों की तरह खनखना रहे हैं बिना किसी वजूद के। उनके चौखटे हत्यारे, तस्कर, तड़ीपार, अत्याचारियों और तथाकथित सूरमाओं, संत- महात्माओं के बड़े काम के हैं। इन्हीं से उनकी दुनिया जगमगाती है। वे  इन्हीं में सोते जागते हैं।इन्हीं के सहारे वे अपनी धाक जमाते हैं और साख के दुमछल्ले छोड़ते हैं। हमारा समाज इन्हें वर्षो से ओढ़ बिछा रहा है और  इनके रहस्यों को जानते हुए भी पर्याप्त मात्रा में मगन है। उसे आश्रमों में पल रहा धोखे का संसार नहीं दिख रहा है और न वहां की कारगुजारियां। राजनीतिक स्थितियों और माहौल में उनकी आवाज़ को दबाया जाता है और उसके अस्तित्व की परिकल्पना तक नहीं की जा सकती। वहां थोक में पलटी मारने के अनेक रंग हैं। वहां की कारगुजारियां और पलटी लीला से देश अघाया हुआ है। वहां किसी को अनाज की रक्षा के लिए इस्तेमाल किए जा रहे गोफनों में भरे पत्थर भी नहीं दिखाई दे रहे। इसे ही कहते हैं देखते हुए भी न देखना। अब तो आदर्शों की अवहेलना के तमाम मंज़र हमारे सामने हैं।


  

नैतिकता और आदर्शों को किताबों और पाठ्यक्रमों में रख देने से उनकी हैसियत नहीं बदल सकती और न ही किसी तरह बढ़ सकती। और न  उन्हें बड़ा कर सकती। ये हाथी के दांत हैं खाने के और, दिखाने के और हैं। कहा कुछ जा रहा है किया कुछ जा रहा है। इसी का राम रगड़ा चल रहा है। आदर्शों के तरीके उनके कट ऑउट चमकाने के साधन हैं राहगीर बनने के नहीं। राहगीर बनने के लिए कलेजा मजबूत होना चाहिए। गप्प लगाने से छातियों के अनुपात नहीं बढ़ा करते। आदर्श को कोई रद्दी के भाव लेने को तैयार नहीं है। झूठ का ही, चोखा धंधा और माल चाहते हैं लोग। हमारे वास्तविक जीवन में समाए न जाने कितने दुःख हैं जिनका अभी तक बाल बांका नहीं हो सका। केवल गारंटियों की पालकियां सजती संवरती रहीं। जो केवल और केवल भ्रम पाल सकती हैं शताब्दियां। इसके बरक्स संगीत में वो ताकत है, वो ऊर्जा और फोर्स है कि वह हमारे  अंतर्मन के तारों को छेड़ देता हैं। हमारे भीतरी संसार को विस्तारित करता है।वह केवल दुखों भर को नहीं छूता। हमारे जीवन के बहुविधि आयामों में शामिल हो कर हमें ढाढस बंधाया करता है और घोषणा करता है कि सब कुछ ठीक होगा। उसका यह आत्मीय आश्वासन हमें गमों से उबारने में हमेशा मददगार साबित हुआ है। दुखों के अथाह सागर में उसका छलछलाता प्रेम और राहत की कुछ बूंदे सचमुच  एक बहुत बड़ा आश्वासन भी है और एक विशेष प्रकार की थेरैपी भी। हमारे साहित्य संस्कृति और कलाओं में इसके तमाम उन्मान बिखरे हुए हैं। सहेज लो जितना सहेज सकते हो। निश्चय ही यह एक नायाब दुनिया है। अहमद फ़राज़ की  ग़ज़ल के शेरों में  भी हमें इसे  ढूंढना चाहिए.” 


रंजिश ही सही दिल ही दुखाने  के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम ना  सही फिर भी कभी तो

रस्म-ओ-रह-ए दुनिया ही निभाने के लिए आ

..इक उम्र से हूं लज्ज़त-ए-गिरिया से भी मरहूम

ऐ राहत-ए-जां मुझको रुलाने के लिए आ” 

 

इनको आत्मीयता से खुलूस से अपने को समर्पित कर के ही पाया जा सकता है। ये ही तो हमारी सामाजिक पूजाएं, अर्चनाएं और हमारी स्पृहायें हैं। कुछ लोगों को आदर्श वाक्यों और उसमें लिपटे कर्मकांडों पर रहना आनंद देता है। क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं होते। इसी में उनका जीवन दिपदिपाता रहता है। आदर्श वाक्य नशे में डूबे हुए होते हैं। कुछ करें या नहीं, वे महान तो दिखते ही हैं। इन्हीं आप्त वाक्यों उपदेशों में उनकी ज़िंदगी बीतती है। हरिशंकर परसाई ने बताया है कि - "हमारे कई नशे हैं, भ्रम का नशा, संप्रदाय का, जाति का, और सबसे बड़ा नशा अपने को पवित्र मानने का।” हमारी सामाजिक व्यवस्था पवित्रता के इन दौरों में सरपट भागती हुई देखी जा सकती है।





   

हम मानते हैं कि जीवन में आदर्शो की बड़ी क़ीमत होती है लेकिन उनको व्यवहार और आचरण की खराद से हो कर गुजरना पड़ता है।आजकल तो झूठ ही आदर्श की कोटि में घुस आए हैं। वहीं हर प्रकार के भंडाफोड़ कर रहे हैं। ज़ाहिर है कि जो चुपचाप तमाशबीन की तरह ज़िंदगी के यथार्थ को अनदेखा करते हैं। उनकी कहीं भी कोई मुकम्मल जगह नहीं हो सकती। शायद निदा फ़ाज़ली ने फरमाया है - 


“कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले

ये ऐसी आग है जिसमें धुआं नहीं मिलता”


एक सच का हम सामना नहीं करना चाहते। कितनी गठरियां ढोते चले जा रहे हैं। झूठ और मात्र आदर्श के सहारे ज़िंदगी नहीं चला करती। रूपम मिश्र का काव्यांश पढ़ें -


"स्थूल देहों के भार से दबी कमजोर देहों के लिए लड़ो

टोने-टोटके के लिए जान लेने वाले विक्षिप्त समाज से लड़ो 

ये प्रेम करने वाली नई नस्लो उठो

हमारी लड़ाई बेहद कठिन है क्योंकि हमें 

घृणाओँ से बिन घृणा के लड़ना है

तुम लड़ो, तुम्हें लड़ना ही होगा क्योंकि

एक आत्मघाती समाज सब कुछ नष्ट करने की ज़िद पर है”


अंततोगत्वा हमें इस वास्तविकता का सामना करना ही होगा। कोई विकल्प नहीं है। नशा जुमलों और गारंटियों का भी बेजा है। गारंटियों में जीता समाज अपनी रूह से और अपने दुखों से मुक्ति नहीं पा सकता।






ज़ाहिर है कि आदर्श निरंतर पराजित हो रहे हैं और उसी के समानांतर एक विशाल प्रवचन उद्योग विकसित हुआ है। वहां आश्वासन हैं और गारंटी स्कीम में संसाधन और सुविधाओं के पहाड़े खड़े किए जा रहे हैं। झूठ का गड़ासा उनकी गर्दन जिबह कर रहा है। सत्य और आदर्श की पसली तोड़ी जा चुकी है। झूठ का लफंगपना सबको तहस-नहस कर रहा है।आदर्श वाक्यों से हमारे पवित्र ग्रंथ भरे पड़े हैं और वे बेचारे केवल दुहाइयां देने के और बमकने के ही काम आ रहे  हैं। वे लूट के हिस्से में शामिल हो कर न जाने क्या-क्या भर लिया करते हैं। इन्हीं आदर्श वाक्यों, उपदेशों की मुनादी और उत्फुल्ल घोषणाओं के बीच हमारे जीवन के अथाह दुःख हमें दिन-रात पलीता लगा रहे हैं।और दूसरी ओर स्त्रियों के सम्मान की दुहाईयों के बरक्स  बलात्कारी झुंड की शक्ल में अपने लंगोट फींच रहे हैं। लहूलुहान कर रहे हैं मर्यादाओं को।एक असहाय पिता अपने ही बच्चे की उपेक्षा और व्यवहार से न जाने कब से रो-रो कर हलाकान है। जुल्मों की टकसालें  आदर्शों, आप्त संबोधनों में खुख्ख हो रही है। वे मूल्यों, लक्ष्यों को लपेट-लपेट कर धुन रहे हैं। क्या किसी ने आदर्श और आदर्श वाक्यों की, उपदेशों की चीख सुनी है। प्रवचनों की असलियत पहचानी है। जबकि लोग जानते हैं लेकिन परंपरा को कैसे छोड़ दें। उसी प्रकार किसी आदमी के मरने के बाद जिस तरह मृत्यु भोज आयोजित हो रहे हैं। वो हमारी सामाजिक प्रक्रियाओं को मुंह चिढ़ा रहे हैं। उन आदर्शों और मूल्यों का कत्ल होते जाना देखना भी एक रौरव नरक से किसी भी सूरत में कम नहीं है लेकिन हम बर्दाश्त मुद्रा में सबका भंडारण किए जा रहे हैं।



देश बहुत बड़ा है। कभी आज़ादी कत्ल होती है और कभी जनतंत्र। संविधान का कत्लेआम तो रोज़-रोज़ की घटना है। इधर सत्य उनके हत्थे चढ़ गया है। आदर्शवाद और उसका बघारना अब आम चीज़ हो गई है। परसाई जी ने सच कहा है - "हमारे देश में  आसान काम आदर्शवाद बघारना है और फिर घटिया से घटिया उपयोगितावादी की तरह व्यवहार करना है। कई सदियों से हमारे देश के आदमी की प्रवृत्ति बनाई गई है अपने को आदर्शवादी घोषित करने की, त्यागी घोषित करने की। पैसा जोड़ना त्याग की घोषणा के साथ ही शुरू होता है।”



आदर्श वाक्यों, उपदेशों और आप्त प्रवचनों की दुनिया से बाहर निकल कर, गारंटियों के महा मायाजाल से बाहर आ कर हमें एक असली दुनिया के समुद्र की मानिंद के दुखों से मुठभेड़ करनी होगी। अन्यथा हम डूबते ही चले जाएंगे। जबरन कहना पड़ रहा है जैसा कि ज़िगर  मुरादाबादी ने कहा है-


"ये इश्क नहीं आँसा इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है”



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



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