शैलेंद्र चौहान की कविताएं
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| शैलेन्द्र चौहान |
शैलेंद्र चौहान की कविताएं
मैने देखा, किनारा अदृश्य था
पानी किसी का पक्ष नहीं लेता
वह केवल बार-बार
एक ही देह से
उसकी ज़िद का उच्चारण करवाता है।
हाथ जल में नहीं चलते
वे अदृश्य भविष्य की ओर फेंके गए
दो प्रश्नचिह्न हैं।
पैर उत्तर नहीं देते
बस डूबने की भाषा को
थोड़ा-टालते रहते हैं।
किनारा हर बार थोड़ा और
अपनी जगह बदल लेता है
पीछे लहरों के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता
न परिश्रम, न प्रमाण, न ताली।
फिर भी
पानी की स्मृति में एक ताप
धीरे-धीरे जमा होता रहता है
शायद जीवन, शायद साहित्य, शायद मनुष्य।
इनमें से कोई भी
किनारे तक पहुँचने का दूसरा नाम नहीं
बल्कि उस जल में
अपनी गति बचाए रखने की कला है
जो हर क्षण तुम्हें अपने जैसा स्थिर
कर देना चाहता है।
जल का दूसरा अर्थ
मैंने जल में उतर कर जाना
जल केवल जल नहीं था
वह मेरे चारों ओर धीरे-धीरे अपना अर्थ भरता रहा
मैं तैर नहीं रहा था
अपने ही भार से बार-बार ऊपर आने की एक पुरानी स्मृति
दोहरा रहा था
डूबना अचानक नहीं आता
वह पहले हाथों की भाषा बदलता है, फिर आँखों की
फिर विश्वास की
छटपटाहट देह की नहीं होती
वह उस शब्द की होती है
जो अभी लिखा जाना चाहता है
बहुत देर बाद मैंने देखा
किनारा कहीं नहीं गया था
अदृश्य मेरी दृष्टि हुई थी
तब से मैं जल को
हर बार एक नए अर्थ में पढ़ता हूँ
और हर बार थोड़ा-सा डूब जाता हूँ।
अनकहा
न होता जल
तो शायद डूबने का अर्थ भी किसी शब्दकोश में
अधूरा रह जाता
न होती गहराई
तो कौन जानता कि छटपटाहट साँस की नहीं
अर्थ की भी होती है
जल ने ही सिखाया
ऊपर दिखाई देना बचा रहना नहीं होता
और नीचे चले जाना हमेशा हार जाना नहीं
कई बार
सबसे अधिक जीवित वही होता है
जो अपनी अंतिम साँस से पहले एक और हाथ बढ़ाता है
अदृश्य की ओर
जल हर बार लौटा देता है एक दूसरी देह
भीगी हुई, थकी हुई, लेकिन अपने भ्रमों से कुछ हल्की
शायद इसीलिए
मैं हर कविता में थोड़ा-सा जल छोड़ देता हूँ
ताकि जो उसे पढ़े
वह केवल पढ़े नहीं
एक क्षण के लिए
अपनी ही किसी अनकही गहराई में उतर जाए।
मौन
अनकहा जो भी है
वह
मौन नहीं
वह
शब्दों के बीच
बची हुई
वह नमी है
जिसे
भाषा
बार-बार
छिपा लेती है
जो कहा गया
वह अक्सर
समय के साथ
अर्थ बदल देता है
जो नहीं कहा गया
वही
भीतर
धीरे-धीरे
मनुष्य बनता रहता है
अनकहा
किसी उत्तर का
अभाव नहीं
वह
प्रश्न का
सबसे धैर्यवान रूप है
वह
जल की तरह
दिखता कम है,
घेरता अधिक है
वह
अँधेरे की तरह
डराता नहीं,
आँखों को
नई दृष्टि देता है
शायद
हर कविता
कहे हुए से नहीं
अनकहे के
उस छोटे-से प्रदेश से
जन्म लेती है
जहाँ
शब्द
पहली बार
अपने अर्थ से
अलग हो कर
साँस लेना सीखते हैं।
वेग यह बलहीन नहीं!
बदलता मैं...
कभी दिखाई नहीं दिया।
बदलती रहीं मेरी परछाइयाँ,
मेरी आवाज़, मेरे शब्दों का ताप
मैं हर बार वही कहलाया जो पहले था
जबकि
भीतर एक नदी अपना रास्ता चुपचाप बदल चुकी थी।
मैंने विचार नहीं बदले
मैंने उनके भीतर उतरने की गहराई बदली
मैंने दुनिया नहीं छोड़ी
मैंने उसे देखने की अपनी आँख धीरे-धीरे बदल ली।
अब
जो मैं हूँ वह कल वाला मैं नहीं
और जो कल होऊँगा
शायद आज का सबसे बड़ा अस्वीकार वही होगा।
मनुष्य एक ही देह में बार-बार जन्म लेता है
बदलता वही है जो
अपने भीतर बचे हुए अपरिचित से
मिलने का साहस नहीं छोड़ता।
जीवन की आंतरिक लय
कोशिका से जीवन तक
एक अदृश्य कंपन था
जिसने सबसे पहले
अंधेरे जल में
एक कोशिका का स्वप्न देखा।
फिर
उसने अपने भीतर
एक नाभिक रखा
जैसे कोई माँ
घर के सबसे सुरक्षित कोने में
भविष्य की धड़कन रख देती है।
गुणसूत्र
समय की तहों में रखे हुए
वंश के पत्र हैं
जिन पर
किसी पुरखे की मुस्कान
किसी शिशु की आँखें
किसी अनजाने दुःख की छाया
अब भी लिखी हुई है।
डीएनए
सिर्फ़ रसायन नहीं
जीवन का वह धीमा संगीत है
जिसकी दोहरी लय पर
अरबों वर्षों से
पृथ्वी साँस ले रही है।
चार छोटे-से अक्षर
ए, टी, जी और सी
मिल कर लिखते हैं
पहाड़ों की दृढ़ता
नदियों की तरलता
पक्षियों की उड़ान
और मनुष्य के भीतर
करुणा की पहली भाषा।
जीन
भाग्य नहीं
संभावना के बीज हैं
वे आदेश कम
आमंत्रण अधिक हैं
कि जीवन
हर पीढ़ी में
अपने को फिर से रचे।
और तब समझ में आता है
हम केवल शरीर नहीं
अरबों कोशिकाओं का
एक साझा विश्वास हैं;
एक ऐसी आंतरिक लय
जो जन्म से पहले शुरू होती है,
मृत्यु के बाद भी
संतानों, स्मृतियों
और पृथ्वी की हरियाली में
धीरे-धीरे गूँजती रहती है।
हमारे भीतर
अब भी
पहली कोशिका की वह नन्हीं-सी आशा
धड़क रही है
कि जीवन
हर बार
अपने सबसे सूक्ष्म बिंदु से
फिर एक विशाल ब्रह्मांड रचेगा।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
संपर्क :
34/242, सेक्टर-3,
प्रतापनगर, जयपुर-302033
मोबाइल . 7838897877
परिचय
शैलेंद्र चौहान (जन्म : 8 फ़रवरी 1954) समकालीन हिंदी के महत्वपूर्ण कवि, कथाकार, आलोचक, स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यिक संपादक हैं। पिछले लगभग पाँच दशकों से वे हिंदी साहित्य में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता, जनपक्षधर दृष्टि और सृजनात्मक हस्तक्षेप के कारण विशिष्ट पहचान रखते हैं। कविता, कहानी, आलोचना, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत तथा सामाजिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक और राजनीतिक विषयों पर उनका लेखन समान रूप से उल्लेखनीय है। उनकी रचनाओं में लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय और मानवीय सरोकारों का सशक्त समन्वय दिखाई देता है।
मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने बी. ई. (इलेक्ट्रिकल) की उपाधि अर्जित की। विद्यार्थी जीवन से ही लेखन आरंभ करने वाले शैलेंद्र चौहान ने साहित्य को केवल सृजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप और वैचारिक प्रतिरोध का उपकरण बनाया।
उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं—नौ रुपये बीस पैसे के लिए (1983), श्वेतपत्र (2002), कितने प्रकाश वर्ष (2003), ईश्वर की चौखट पर (2004), सीने में फाँस की तरह (2023) तथा चयनित कविताएँ (2023)। कहानी-संग्रह नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) और गंगा से कावेरी (2023), संस्मरणात्मक उपन्यास पांव ज़मीन पर (2010), आलोचना-पुस्तक कविता का जनपक्ष (2020) तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतिकारी (2023) उनकी बहुआयामी रचनात्मकता के प्रमाण हैं। क्यूबा-यात्रा पर आधारित उनके संस्मरण भी विशेष रूप से चर्चित रहे हैं।
शैलेंद्र चौहान लंबे समय से अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका ‘धरती’ का संपादन कर रहे हैं। इस पत्रिका के त्रिलोचन, समकालीन कविता, ग़ज़ल, शील, शलभ श्रीराम सिंह, कश्मीर, पत्रकारिता, किसान एवं कृषि-कर्म, वैज्ञानिक चेतना, भारतीय समाज, कथेतर गद्य और आलोचना-केंद्रित विशेषांक हिंदी की गंभीर साहित्यिक बहसों में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
रचनाकार, आलोचक और संपादक—तीनों भूमिकाओं में सक्रिय शैलेंद्र चौहान समकालीन हिंदी साहित्य के उन महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं जिन्होंने साहित्य को समाज, लोकतंत्र और मनुष्य की गरिमा के पक्ष में निरंतर सक्रिय रखा है। वे वर्तमान में जयपुर (राजस्थान) में निवास करते हैं तथा स्वतंत्र लेखन और पत्रकारिता में निरंतर संलग्न हैं।



शानदार सृजन
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