वाचन-पुनर्वाचन -- अजेय की कविताएं
पहली बार पर हमने एक स्तम्भ शुरू किया था 'वाचन-पुनर्वाचन'. इसके अंतर्गत एक कवि की कविताएं दूसरे कवि की टिप्पणी के साथ प्रस्तुत की जाती है। हमारे इस बार के कवि हैं अजेय. और इनकी कविताओं पर सारगर्भित टिप्पणी की है हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि शिरीष कुमार मौर्य ने। कविता में करूणा खोजता कवि अजेय मेरे लिए बहुत ख़ास आत्मीय कवि हैं। इस कवि में राजनीति की खुली घोषणा भले न मिलती हो पर मैं देख सकता हूँ की वे कविता में मेरे प्रिय एक मेनीफेस्टो का पालन करते हैं। हमारी ज़मीन भी एक ही है। उसने लोग हिमालय के सर्वहारा हैं, कविता के भीतर उनका संघर्ष पूंजी और सामंती ढांचों से टकराने का है। वे सवाल उठाते हैं और सवाल उठाने और उनसे जूझने वाली कविता एक निश्चित राजनीति की कविता होती है। जब आज के संभावनाशील जूझारू कहाए जाने वाले युवा कवि अपनी कविता के उत्तर आधुनिक पाठ के लिए भरपूर उत्सुक हैं, तब अजेय खुद को मनुष्यता के सामान्य किन्तु जटिल सन्दर्भों में पढ़े जाने कीचुनौती पेश करते हैं। ये मेरी पढ़त के कुछ सिरे उनकी कविता में इसी तरह खुलते हैं...