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कल्पना मनोरमा के कहानी संग्रह पर विनीता बाडमेरा द्वारा की गई समीक्षा

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आज समय चक्र भले ही इक्कीसवीं सदी में पहुँच चुका है, कुछ अपवादों को छोड़ कर स्त्रियों का जीवन आज भी त्रासद है। सम्पत्ति से बेदखली, हत्या, बलात्कार जैसी यंत्रणाएं उन्हें आज भी भुगतनी पड़ती है। स्त्रियों को अपना पूरा जीवन पिता, पति या पुत्र के देखरेख में बिताना पड़ता है। कल्पना मनोरमा ने स्त्रियों की आपबीती को ज्यों का त्यों अपनी कहानियों में दर्ज किया है। ये कहानियां अब एक संग्रह 'एक दिन का सफर' के रूप में प्रकाशित हुई हैं। इन कहानियों पर समीक्षा लिखी है विनीता बाडमेरा ने। विनीता खुद भी समर्थ रचनाकार हैं और उन्होंने इसी क्रम में रचना की कसौटी पर इस संग्रह की कहानियों को कसा और परखा है। कल्पना की कहानियों की तहकीकात करते हुए वे लिखती हैं "कल्पना मनोरमा की कहानियां 'थोड़ा है, थोड़े की जरुरत' को दिखाती समझाती कहानियां हैं। ये कहानियां स्त्री मन की उन परतों को आहिस्ता से उघाड़ती हैं जो उसने बरसों से छिपा कर रखी है इसलिए ये कहानियां किसी एक स्त्री की नहीं है उन सभी की है जो परिवार और रिश्तों को संभालने में खुद का अस्तित्व ही भुला बैठी है"। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते...

विनीता बाडमेरा का यात्रा वृत्तांत "यात्रा हवेलियों के शहर जैसलमेर की"

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हिन्दुस्तान अपने आप में एक महाद्वीप है। इसीलिए इसे 'देशों का देश' भी कहा जाता है। सचमुच हिन्दुस्तान के अलग अलग राज्य अपने आप में किसी देश से कम नहीं लगते। यहां विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि वाली जगहें हैं जिन्हें देखने के लिए देश विदेश से तमाम पर्यटक वर्ष भर आते रहते हैं। राजस्थान को पहले राजपूताना कहा जाता था। विभिन्न राजपूत राजाओं ने अपने छोटे छोटे राज्यों में मजबूत किलों और भव्य महलों का निर्माण कराया जो आज भी अपने शानदार अतीत की याद दिलाते हैं। राजस्थान का जैसलमेर ऐसी ही जगह है जिसे 'हवेलियों का शहर' ही कहा जाता है। जैसलमेर, उत्तर-पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान का एक शहर है, जो राजधानी जयपुर से 575 किलोमीटर पश्चिम में थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित है। यह एक पूर्व मध्ययुगीन व्यापारिक केंद्र और जैसलमेर राज्य की ऐतिहासिक राजधानी है, जिसकी स्थापना 1156 ई. में भाटी शासक रावल जैसल द्वारा की गई थी। जैसलमेर जिले का भू-भाग प्राचीन काल में ’माडधरा’ अथवा ’वल्लभ मण्डल’ के नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब...

विनीता बाडमेरा की कहानी 'संतोषी बाई'

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  विनीता बाडमेरा  आदमी की यह फितरत होती है कि वह खाली नहीं बैठता। कुछ न कुछ करने की कोशिश करता है। इस कुछ न कुछ करने की वजह से ने केवल सार्वजनिकता से जुड़ाव होता है बल्कि दायित्व बोध का विकास भी होता है।  आजीविका हरेक व्यक्ति के लिए जरूरी होती है। एक समय आता है जब यह आजीविका जीवन से इस तरह बद्धमूल हो जाती है कि जीवन का अनिवार्य हिस्सा लगने लगती है। लेकिन किसी भी व्यक्ति के लिए स्वाभिमान सबसे ऊपर होता है। इसको ताक पर रख कर कुछ भी नहीं किया जा सकता।   'संतोषी बाई' इस भाव भूमि पर ही आधारित एक उम्दा कहानी है जिसे विनीता  बाडमेरा ने लिखा है। कहानी कुछ इस तरह प्रवहमान है कि एक बार पढ़ना शुरू करने पर अन्त तक गए बिना नहीं रहा जा सकता। शिल्प की बुनावट इतनी गझिन है कि आप कहीं से कुछ भी अतिरिक्त नहीं निकाल सकते। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  विनीता बाडमेरा की कहानी 'संतोषी बाई'। 'संतोषी बाई' विनीता  बाडमेरा “संतोषी, संतोषी बाई कहां हो?” “संतोषी बाई जी, कल फैन्सी ड्रेस कार्यक्रम है। ऊपर हॉल की साफ-सफाई ज़रुर देख लेना।” “हां साहब!” “संतोषी, संतोषी बाई!” उसन...