हेमन्त शर्मा का आलेख '26 जून की वो मनहूस सुबह… '
'26 जून की वो मनहूस सुबह… ' (आज कविताओं के ज़रिए) हेमन्त शर्मा वह 26 जून का मनहूस सवेरा था. उदास और डरावना. जिसे मैंने चौदह बरस की किशोर आँखों से देखा था. आधी रात में इमरजेंसी लग चुकी थी. दिल्ली में बड़े नेताओं की गिरफ़्तारियाँ भी हो गयी थीं. दिल्ली में तो अख़बारों ने अपने एडिशन रोक कर यह खबर ले ली पर बनारस के सुबह के अख़बारों में यह खबर नहीं छपी थी. सुबह- सुबह जनवार्ता के सम्पादक ईश्वर देव मिश्र का फ़ोन पिता जी के लिए आया. जनवार्ता जेपी मूवमेंट का अख़बार था. फ़ोन सुनते ही पिता जी के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थी. उस समय मेरे मोहल्ले में सिर्फ़ मेरे यहां ही फ़ोन होता था. नंबर था 5574. पिता जी ने बताया इमरजेंसी लग गयी है. मई में ही मैं नौवीं कक्षा से दसवीं में गया था. इमरजेंसी के नाम पर सिर्फ अस्पताल की इमरजेंसी जानता था. समझ नहीं पाया कि इमरजेंसी क्या है? वैसे भी उस वक्त बच्चों में एक्सपोज़र कम होता था. हालांकि पिता जी बनारस में जेपी की संघर्ष वाहिनी के सह-संयोजक थे. कुछ ही रोज पहले मैं जेपी की बेनियाबाग वाली सभा से पहले निकले जुलूस में भी शामिल था. संतोष भारतीय जीप के बोनट प...