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भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 5 : 'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो!!'

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भरत प्रसाद  मनुष्य ने अपने सभ्य होने के क्रम में प्राकृतिक घटनाओं को उन अलौकिक देवताओं से संबद्ध किया जिनका वास्तविक तौर पर, या कहा जा सकता है कि स्थूल रूप में  कहीं अस्तित्व नहीं था। ये देवता भाग्य निर्धारक माने गए। ये देवता नैतिकता के निर्धारक माने गए। पाप पुण्य की संकल्पनाओं ने समाज में एक व्यवस्था की स्थापना की। भारतीय परम्परा में ऋग्वेद में कुल 33 देवताओं का जिक्र मिलता है जो आगे चल कर 33 करोड़ हो गए। इन देवताओं के साथ पशु पक्षियों और पेड़ पौधों को भी जोड़ा गया। हंस हो या मोर, उल्लू हो या कौवा, शेर हो या भैंसा या फिर चूहा, सभी को किसी न किसी देवता के साथ जोड़ दिया गया। पूर्वांचल का समाज बहुत हद तक इस धार्मिकता से जुड़ा हुआ है जिसे आज भी सहज ही देखा जा सकता है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास कालकलौटी के केन्द्र में पूर्वांचल का समाज और संस्कृति ही है। उपन्यास अंश के पांचवीं कड़ी में भरत पूर्वांचल की इसी संस्कृति और परिवेश का जिक्र कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के धारावाहिक उपन्यास कालकलौटी की पांचवीं कड़ी। उपन्यास अंश-5 : कालकलौटी 'कौन ठगवा नगरिया लूटल...

भरत प्रसाद का उपन्यास अंश 'धूप है कि मोह की आँखमिचौली'

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भरत प्रसाद  प्रकृति का अपना एक अलग मौसम चक्र हुआ करता है। भारत इस मामले में एक समृद्ध देश है जहां अलग अलग मौसम एकरसता को तोड़ते हुए जीवन को थोड़ा सरस बना देते हैं। सावन का महीना सारे महीनों से न्यारा होता है। बारिश की फुहारें एक तरफ जहां गर्मी से निजात दिलाती हैं वहीं दूसरी तरफ गुनगुने ठण्ड के मौसम का बीज बो देती हैं। धरती चारों तरफ शस्य श्यामला नजर आने लगती है। खेतों में धान की रोपाई बनिहारिनों के सुमधुर लोकगीतों के साथ आरम्भ हो जाती है। भरत प्रसाद अपने उपन्यास 'कालकलौटी' के प्रारम्भ में कुदरत के इस खूबसूरत नज़ारे का शब्द चित्र बनाते हैं। आजकल हर महीने के दूसरे रविवार को हम भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का धारावाहिक रूप से प्रकाशन कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं भरत प्रसाद के उपन्यास 'कालकलौटी' का चौथा अंश। उपन्यास अंश 4 : कालकलौटी         'धूप है कि मोह की आँखमिचौली' भरत प्रसाद  धूप मीठी कि छाया? बारिश में भीगना मोहक कि नदी में कूद जाना? बादलों की उमड़-घुमड़ जादुई या उनकी दिशा भेदी गर्जना? टिप-टिप बारिश का संगीत मादक या वर्षा की...

भरत प्रसाद का उपन्यास अंश : 3 - कालकलौटी

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भरत प्रसाद  प्रकृति के साथ जीवन का संबंध नाभिनालबद्ध है। प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। हमारे आस पास न जाने कितने पशु पक्षी विचरण करते रहते हैं। न जाने कितने अनाम पेड़ों की छाँह के हम गवाह बनते हैं। गाँव के साथ जुड़े हैं सीवान और सीवान तक फैले पसरे हुए हैं किसानों के खेत, जिस में लहलहाती फसलें किसानों के मन को उल्लसित कर देती हैं। प्रकृति का शब्द चित्र खींचते हुए भरत प्रसाद लिखते हैं सीवान है तो किसानों के सख्त चेहरों पर रौनक बची है, फसलों से उन्हें खनक का निःशब्द सुख मिल जाता है। छुपे रुस्तम प्रेमियों को भर तबियत विरहा ललकारने का अवसर मिलता है। इसी सीवान के निस्सीम अंचल में निर्भयमान हैं – बबूल, शीशम, आम, बरगद, झरबेरी, पाकड़ और कठजामुन के बिरिछ। जिनकी पतली, गाढ़ी, काली छाया में छुट्टा पशु मुर्दा बेफ्रिकी के साथ दोपहर काटते हैं। कौन है जो सीवान को सीने में जी पाए? कौन है, जो सीवान की महिमा को साकार कर सके? नहीं! सीने यह कोई दृश्य नहीं, यह महज सृष्टि का जादुई रूप नहीं। इसी में छिपा है हमारी चाहतों का फैलाव, इसी ...

भरत प्रसाद का उपन्यास 'कालकलौटी'

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भरत प्रसाद  जीवन प्रकृति की गोद में ही पुष्पित पल्लवित होता है। इसीलिए प्रकृति जीवन को अपनी तरफ आकर्षित करती रहती है। जीवन भी इस प्रकृति की तरफ स्वाभाविक रूप से झुकता है। पेड़ पौधे, पशु पक्षियां, कीड़े मकोड़े पृथिवी की जैविक समृद्धि में अनमोल रत्न की तरह हैं। इनके बिना पृथिवी और पृथिवी पर के जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। रचनाकारों की रचनाओं में यह प्रकृति अनायास ही आती है। क्योंकि इसके बिना रचनाओं में रवानी नहीं आ पाती। अलग बात है कि विकास के नाम पर आजकल प्रकृति पर ही लगातार प्रहार किया जा रहा है। वन दिन ब दिन सिकुड़ते जा रहे हैं। हम प्रकृति की खूबसूरती को निहारने की बजाए दिन रात मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। अपने आस पास के न तो पेड़ पौधों को पहचानते हैं, न ही पशु पक्षियों को। एक अजनबीयत हम सब पर लगातार हावी होती  जा रही है। हालत यह है कि अपने ही घर परिवार में अब हम अजनबी नजर आने लगे हैं। इससे भयावह और भला क्या हो सकता है। भरत प्रसाद इन दिनों एक उपन्यास ' कालकलौटी'  लिख रहे हैं। पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के दूसरे रविवार को 'कालकलौटी' उपन्यास को धारावाहिक रूप...

भरत प्रसाद का आलेख 'नवस्त्री की प्रतिबद्ध कथाकार : कृष्णा सोबती'

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कृष्णा सोबती  कोई भी कहानी महज कोरी कल्पना नहीं होती बल्कि उसमें कहानीकार का जीवन अनुभव भी अनुस्यूत होता है। यह जीवन अनुभव व्यक्तिगत नहीं होता बल्कि व्यापक हो कर समूचे समाज का जीवनानुभव बन जाता है। चर्चित कथाकार और उपन्यासकार  कृष्णा सोबती का लेखन बहुत कुछ  आत्मबद्ध लेखन के रूप में चिह्नित किया जाता है जिसमें उनके व्यक्तिगत दुख, संताप, दैनिक पराजय, विलाप सघन, प्रगाढ़ और प्रखर हैं। लेकिन अगर यह महज उनका ही होता तो उसकी व्याप्ति इतनी सघन न होती। यह उनके समय की स्त्रियों का दुःख दैन्य था। भले ही स्त्रियों बेहतरी की बात की जाती हो, आज भी कमोबेश स्त्रियों की हमारे समाज में त्रासद स्थिति ही है। स्त्रियों के प्रति अपराध न केवल बढ़े हैं बल्कि और निर्मम और कुछ अधिक अमानवीय हुए हैं। स्त्रियों को गुलाम समझे जाने की मानसिकता मन मस्तिष्क में आज भी बनी रहती है। ऐसे में कृष्णा सोबती की रचनाएँ जीवन्त हो कर हमारे सामने आती हैं। हाल ही में  प्रयागपथ का  दिसंबर-2025 का अंक आया है जो  ' कृष्णा सोबती विशेषांक' के रूप में है। भरत प्रसाद का एक आलेख इस अंक से हमने  स...